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सबको, हमेशा, साफ पानी

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    Source: 
    एनडीटीवी, 15 मई 2012

    यह विडंबना है देश की पवित्र नदियों में शामिल यमुना दिल्ली में एक गंदे नाले में तब्दील हो गई है। यमुना की इस हालत के लिए कई कारक हैं। घरेलू और औद्योगिक अपशिष्ट को लेकर गिरने वाले बाइस नालों के अलावा यमुना को गंदा और प्रदूषित करने में धार्मिक आस्था भी कम दोषी नहीं हैं।
    इस खबर के स्रोत का लिंक: 

    http://khabar.ndtv.com

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    सरकार का जलविद्युत परियोजनाओं को ही सबसे सस्ता व सबसे कम नुकसानदेह बताने का उसका नजरिया बदला नहीं है। इस पर सरकार समझौते की मुद्रा में कतई दिखाई नहीं देती। यही बात सबसे खतरनाक है और संघर्ष को शांत करने में बाधक भी। फिलहाल स्थितियां जो भी हों। बिना संकल्प हर उपाय अधूरा है। संकल्पित हों कि गंगा राष्ट्रीय नदी है। जिम्मेदारी पूरे राष्ट्र की है, सिर्फ सरकार या सदन की नहीं। सब अपनी-अपनी जिम्मेदारी तलाशकर उसी के क्रियान्वयन को जुटें। गंगा एक न एक दिन साफ भी हो जायेगी और अविरल भी।

    जिस तरह से गंगा को लेकर वाराणसी आंदोलित है; आगे वाराणसी से दिल्ली कूच की चेतावनी आ चुकी है; सांसद गंगा पर किसी निर्णायक कदम की मांग कर रहे हैं; जल्द ही गंगा पर कोई न कोई निर्णय शीघ्र होगा ही। लेकिन वहीं यह भी सच है कि अब निर्णय लेने की बारी सरकार के साथ-साथ समाज की भी है। संत अपने आश्रमों का मल व अन्य कचरा गंगा में जाने से रोकें। समाज भी लीक तोड़े। मूर्ति विसर्जन, अधजले शवदाह, नदी भूमि पर अवैध बसावट और रासायानिक खेती से मुंह मोड़ना शुरू करें। गंगा पर लोकसभा को आंदोलित करने वाले सांसद रेवती रमण सिंह भी सोचें कि यदि बांध परियोजना गंगा के लिए घातक हैं, तो उनकी पार्टी वाली उत्तर प्रदेश सरकार की पहल पर प्राधिकरण के एजेंडे में आया गंगा एक्सप्रेसवे भी कम खतरनाक नहीं। यदि आंदोलन ही करना है, तो वह बाधों के साथ-साथ गंगा एक्सप्रेसवे को पुनः चालू कराने को आतुर प्रयासों के खिलाफ भी करें।

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    Author: 
    सिराज केसर/मीनाक्षी अरोड़ा
    Source: 
    कादम्बिनी, जून 2012

    आज का विज्ञान और तकनीकी की बात करने वाला नदियों से अलग-थलग पड़ा यह समाज जल-चक्र को ही नकार रहा है। इस नई सोच का मानना है कि नदियां व्यर्थ में ही पानी समुद्र में बहा रही हैं। ये लोग भूल रहे हैं कि समुद्र में पानी बहाना भी जल-चक्र का एक बड़ा हिस्सा है। नदी जोड़ परियोजना पर्यावरण भी नष्ट करेगी और भूगोल भी। नदियों को मोड़-मोड़ कर उल्टा बहाने की कोशिश की गई तो आने वाली पीढ़ियां शायद ही हमें माफ कर पाएंगी।

    दृष्टि, दृष्टिकोण, दर्शन, विचार और उसकी धारा में पानी खो रहा है। पानी के अकाल से पहले माथे का अकाल हो चुका है; अच्छे कामों और विचारों का अकाल हो चुका है। नदी समाजों से खुद को जोड़ने की बजाय सरकारें समाज को नदियों से दूर करना चाहती है। आजादी से अब तक की सरकारी योजनाओं में सबसे खतरनाक और अव्यावहारिक नदी-जोड़ योजना की कोशिश हो रही है। भूगोल को कुछ लोग ‘ठीक’ करना चाहते हैं। कानून से पर्यावरण बचाना और पेड़ लगाना चाहते हैं। बड़े-बड़े बांध बांधकर लोगों की प्यास बुझाना चाहते हैं। कहना ना होगा कि ये बड़े- बड़े विचार लोगों की प्यास तो बिल्कुल नहीं बुझा पा रहे हैं। उदाहरणों के लिये इतिहास में ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है। अभी पिछले साल ही मध्य प्रदेश के कई शहरों में पानी के वितरण के लिए सीआरपीएफ लगानी पड़ी। नदी की बाढ़ से ज्यादा माथे की बाढ़ दुखदायी बन गई है।

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    Author: 
    दीपक रस्तोगी
    Source: 
    नेशनल दुनिया, 27 मई-02 जून 2012

    जादवपुर विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ एन्वायरमेंटल स्टडीज की हाल में जारी रिपोर्ट के अनुसार, कोलकाता के 114 में से 78 वार्ड इलाकों के नलकूपों के पानी में आर्सेनिक पाया गया है। 32 वार्ड इलाकों के नलकूपों में आर्सेनिक की मात्रा निर्धारित मानक से बहुत अधिक प्रतिलीटर 50 माइक्रोग्राम पाई गई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित मानक प्रति लीटर 10 माइक्रोग्राम है। आर्सेनिक-दूषण दक्षिण कोलकाता, दक्षिण के उपनगरीय इलाके और मटियाबुर्ज के इलाकों में ज्यादा मिला है।

    अंग्रेजों के जमाने में बसाए गए पूरब के महानगर कोलकाता का स्वास्थ्य लगातार गिर रहा है। शहर अब अपने ढांचे में आमूल-चूल परिवर्तन की मांग कर रहा है। अंग्रेजों के जमाने में विकसित की गई ढांचागत सुविधाओं पर निर्भर इस शहर के प्रशासन को इन दिनों बड़ी दो चुनौतियों की चेतावनी मिल रही है। एक ओर कोलकाता की धरती धंस रही है और दूसरी ओर, यहां से पानी में आर्सेनिक जहर घुलने लगा है। धरती इसलिए धंस रही है, कि जमीन के भीतर का पानी सूख रहा है। अंग्रेजों के जमाने में बनी सीवर लाइनें भीतर-भीतर टूट रही हैं। पेयजल में आर्सेनिक इसलिए घुल रहा है, कि महानगर में कंक्रीट का जंगल बढ़ने के साथ ही भूगर्भ जल का दोहन बढ़ा, जलस्तर नीचे पहुंचा और गहरे नलकूपों (ट्यूबवेल) से पानी निकालने की प्रक्रिया में आर्सेनिक भी पानी के साथ आने लगा। महानगर में धरती के धंसान की समस्या ने पिछले दो- एक वर्षों में बड़ा रूप ले लिया है।

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    Source: 
    चरखा फीचर्स, 08 जून 2012

    हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि विश्व की लगभग 21 प्रतिशत आबादी महासागरों से लगे 30 किलोमीटर तटीय क्षेत्र में निवास करती है इसलिए अन्य जीवों के साथ-साथ मानव समाज के लिए भी प्रदूषण मुक्त महासागर कल्याणकारी साबित होंगे। इसके अलावा पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखने वाले पारितंत्रों में समुद्र की उपयोगिता को देखते हुए यह आवश्यक है कि हम समुद्री पारितंत्र के संतुलन को बनाए रखें।

    महासागर पृथ्वी पर जीवन का प्रतीक है। पृथ्वी पर जीवन का आरंभ महासागरों से माना जाता है। महासागरीय जल में ही पहली बार जीवन का अंकुर फूटा था। आज महासागर असीम जैवविविधता का भंडार है। हमारी पृथ्वी का लगभग 70 प्रतिशत भाग महासागरों से घिरा है। महासागरों में पृथ्वी पर उपलब्ध समस्त जल का लगभग 97 प्रतिशत जल समाया है। महासागरों की विशालता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यदि पृथ्वी के सभी महासागरों को एक विशाल महासागर मान लिया जाए तो उसकी तुलना में पृथ्वी के सभी महाद्वीप एक छोटे द्वीप से प्रतीत होंगे। मुख्यतया पृथ्वी पर पाँच महासागर हैं जिनके नाम इस प्रकार हैं- प्रशांत महासागर, हिन्द महासागर, अटलांटिक महासागर, उत्तरी ध्रुव महासागर और दक्षिणी ध्रुव महासागर। महासागरों का सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से महत्व मानव के लिए इन्हें अतिमहत्वपूर्ण बनाता है। इसलिए महासागरों के प्रति जागरूकता के उद्देश्य से संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा प्रतिवर्ष 08 जून को विश्व महासागर दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस वर्ष की थीम युवा बदलाव की अगली लहर।

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    Source: 
    एनडीटीवी, 25 मई 2012

    महाराष्ट्र में 15 जिले अकाल की चपेट में हैं। पश्चिमी महाराष्ट्र के इलाके इस कदर सूखे की मार झेल रहे हैं कि वहां के खेत रेगिस्तान जैसे नजर आने लगे हैं। अकालग्रस्त क्षेत्र में राहत कार्य शुरू करने और प्रभावित जनता को सहायता पंहुचाने की प्रक्रिया भी काफी समय ले लेगी।
    इस खबर के स्रोत का लिंक: 

    http://khabar.ndtv.com

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    धरती के गर्म होते मिजाज, इसकी वजह से हो रहे जलवायु परिवर्तन और अंतत: मानव के साथ-साथ तमाम जंतुओं और वनस्पतियों, वृक्ष प्रजातियों, फसलों इत्यादि पर हो रहे असर को कम करने के लिए लोगों में जागरूकता बढ़ाने और उन्हें इन तमाम विषयों के प्रति संवेदनशीलता की परम आवश्यकता है। आज पूरे विश्व की निगाह आगामी दिसंबर में संयुक्त राष्ट्र के कोपेनहेगेन सम्मेलन पर टिकी है। इस सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन से जुड़े उन तमाम विषयों पर चर्चा होनी है जिनका संबध संपूर्ण मानवता, जीव-जंतुओं और वनस्पतियों की सुरक्षा, संरक्षण और संवर्धन से है। आज के हालात में जलवायु परिवर्तन गंभीर और संवेदनशील मामला बन गया है इसलिए जलवायु में आ रहे बदलाव को रोकने के लिए तरह-तरह के उपाय जारी हैं।

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    Source: 
    समकालीन भारत II, सीबीएसई- कक्षा दस


    प्रस्तुत प्रेजेन्टेशन सीबीएसई- कक्षा दस एनसीईआरटी की भूगोल की पाठ्यपुस्तक- समकालीन भारत II पर आधारित है।



    प्रेजेन्टेशन की विभिन्न स्लाइड़ो का विवरण जानने के लिये अटैचमेंट देखे।

    प्रेजेन्टेशन की मूल प्रति भी अटैचमेंट से डाउनलोड की जा सकती है।


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    Source: 
    रियो से सुरेश नौटियाल, 11 जून 2012

    यह सम्मेलन धरती को ताप और जलवायु परिवर्तन से बचाने के अलावा भी कई और मायनों में खास है, इसीलिये इसमें प्रधानमंत्रियों और राष्ट्रपतियों के अलावा निजी क्षेत्र से लेकर सिविल सोसायटी तक के नेतागण शामिल हो रहे हैं। यहां तक कि इस सम्मेलन को सदी में एक-आध बार आने वाले अवसर की तरह भी देखा जा रहा है। भविष्य की आर्थिकी टिकाऊ कैसे बने, इस विषय पर नेतागण इसमें गहन मंथन करेंगे।

    भारत जैसे देश में रियो+20 का मतलब कितने प्रतिशत लोग समझते हैं, यह तो नहीं मालूम; लेकिन इतना ज़रूर है कि 1992 में आयोजित पृथ्वी शिखर सम्मेलन के 20 साल बाद हो रहे रियो+20 सम्मेलन से जो कुछ निकलेगा, उसका प्रभाव भारत ही नहीं पूरी दुनिया के लोगों और तमाम प्राणिमात्र पर पड़ेगा। आशा और आशंका के बीच ब्राज़ील के रियो दी-जानीरो शहर में संयुक्तराष्ट्र का रियो+20 सम्मेलन 13 से 22 जून तक होने जा रहा है, हालांकि राष्ट्राध्यक्षों और प्रधानमंत्रियों की मुख्य बैठक 20 से 22 जून तक होगी। सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह समेत दुनियाभर के 100 से ज्यादा देशों के राष्ट्राध्यक्ष और शासनाध्यक्ष तथा विभिन्न क्षेत्रों के अग्रणी लोग हिस्सा लेंगे।

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    Author: 
    बान की मून
    Source: 
    नवभारत टाइम्स, 30 मई 2012
    1992 में लगभग 20 साल पहले पृथ्वी सम्मेलन का आयोजन किया गया था। जो ब्राजील के शहर रियो दि जेनेरियो में हुआ था। यह सम्मेलन पृथ्वी पर जीवों के सतत् विकास कि चिंताओं को लेकर हुआ था। 20 साल बाद फिर रियो में ही पृथ्वी सम्मेलन का आयोजन हो रहा है। इस आयोजन के मुद्दों, चिंताओं, और भविष्य की पीढ़ियों को सतत् विकास के लिए जरूरी संसाधनों की सोच को बता रहे हैं संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून।

    कई देशों में वृद्धि रुक गई है। नौकरियां कम हैं, अमीर-गरीब के बीच खाई बढ़ती जा रही है और भोजन, ईंधन तथा उन प्राकृतिक संसाधनों की कमी होने लगी है, जिन पर सभ्यता निर्भर होती है। रियो में उपस्थित प्रतिनिधि सहस्राब्दि विकास लक्ष्यों की सफलता की बुनियाद पर आगे बढ़ने की कोशिश करेंगे। इन लक्ष्यों ने लाखों लोगों को गरीबी के दलदल से निकालने में मदद की है। स्थायी विकास या वहनीय विकास पर नया जोर नौकरियों से भरपूर आर्थिक वृद्धि और पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ सोशल इनक्लूजन की गुंजाइश भी बना सकता है।

    अब से 20 साल पहले पृथ्वी शिखर सम्मेलन हुआ था। रियो दि जेनेरियो में जमा हुए पूरी दुनिया के नेता इस ग्रह के अधिक सुरक्षित भविष्य के लिए एक महत्वाकांक्षी योजना पर सहमत हुए थे। वे जबर्दस्त आर्थिक विकास और बढ़ती जनसंख्या की आवश्यकताओं के साथ हमारी धरती के सबसे मूल्यवान संसाधनों जमीन, हवा और पानी के संरक्षण का संतुलन बनाना चाहते थे। इस बात को लेकर वे सहमत थे कि इसका एक ही रास्ता है - पुराना आर्थिक मॉडल तोड़कर नया मॉडल खोजा जाए। उन्होंने इसे टिकाऊ विकास का नाम दिया था। दो दशक बाद हम फिर भविष्य के मोड़ पर खड़े हैं। मानवता के सामने आज भी वही चुनौतियां हैं, बस उनका आकार बड़ा हो गया है। धीरे-धीरे हम समझने लगे हैं कि हम नए युग में आ गए हैं। कुछ लोग इसे नया भूगर्भीय युग कहते हैं, जिसमें इंसानी गतिविधियां धरती की चाल बदल रही हैं।
    इस खबर के स्रोत का लिंक: 

    http://navbharattimes.indiatimes.com

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    Source: 
    पैरवी, साडेड, भारत जनविज्ञान जत्था, आदि संगठनों द्वारा जारी पर्चा

    रियो सम्मेलन विश्व स्तर पर होने वाला सबसे बड़ा सम्मेलन है जो कि विकास के भविष्य का एजेंडा व रणनीति को तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। किंतु भारत सरकार द्वारा अभी तक अपना पक्ष या दृष्टि स्पष्टता से नहीं रखी गई है और न ही लोकसभा व राज्यसभा में इस विषय पर चर्चा व बहस कराई गई है। यह निराशाजनक है खासकर तब जब हम जानते हैं कि 2015 तक सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों को पाना नामुमकिन है, विश्व की आधी से अधिक भुखमरी हमारे देश में व्याप्त है।

    अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संपूर्ण विश्व के राष्ट्राध्यक्ष, सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधि और विकास के मुद्दों से जुड़े विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधी 20 से 22 जून 2012 को ब्राजील की राजधानी रियो दी जेनेरियो में एकत्रित होने जा रहे हैं। इस महासम्मेलन को रियो+20 का नाम दिया है क्योंकि 20 वर्ष पूर्व (1992) भी रियो में 172 सरकारों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा पर्यावरण और विकास के मुद्दों पर वैश्विक सम्मेलन का आयोजन किया गया था और पहली बार वैश्विक राजनैतिक पटल पर सतत् विकास (Sustainable Development) पर गंभीरता से चिंतन किया गया और माना गया कि सामाजिक, आर्थिक व पर्यावरणीय विकास को पृथक न कर समग्रता में देखते हुए विकास के मुद्दों पर कार्य करना चाहिए। इस सम्मेलन का महत्वपूर्ण परिणाम था एजेंडा 21 जो कि 21वीं शताब्दी के विकास का एक्शन प्लान था और जिसे राष्ट्रों से अपने विकास के एजेंडा में शामिल करने की अपील की गई थी।

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    Source: 
    दैनिक जागरण, 22 जून 2012
    22 जून की सुबह जी.डी अग्रवाल के साथ धारी देवी के जाने के दौरान बांध समर्थकों ने बदसलूकी की और उनकी गाड़ी का पीछा किया और पथराव किया। फिर बाद में प्रसिद्ध लेखक भरत झुनझुनवाला के घर पर तोड़फोड़ की।

    पुलिस स्वामी ज्ञानस्वरुप सानंद को अपनी गाड़ी में बैठाकर धारी देवी मंदिर से निकली तो बांध समर्थक भी बाइक और कारों में सवार होकर पीछे हो लिए। उन्होंने लछमोली तक पुलिस वाहन का पीछा किया। रास्ते में ढामक, चमधार, श्रीनगर, कीर्तिनगर और जुयालगढ़ में पुलिस वाहन रोकने का भी प्रयास किया गया। इस दौरान उन्होंने वाहन पर पथराव कर सानंद पर स्याही डालने की कोशिश भी की। यहां पहुंचे बांध समर्थकों का अगला निशाना सानंद के मित्र डॉ. झुनझुनवाला बने। लछमोली में उनके आवास पर धावा बोलकर तोड़फोड़ की गई। बांध समर्थकों ने उनके चेहरे पर स्याही उड़ेली और उनकी पत्नी के साथ मारपीट की।

    22 जून 2012 जागरण टीम, श्रीनगर / हरिद्वार। श्रीनगर जल विद्युत परियोजना बंद होने की चर्चा के बीच पहली बार धारी देवी मंदिर पहुंचे स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद (प्रो.जीडी अग्रवाल), जल पुरुष राजेंद्र सिंह और वरिष्ठ पत्रकार वेदप्रताप वैदिक को परियोजना समर्थकों के भारी विरोध का सामना करना पड़ा। हालात की गंभीरता को देखते हुए पुलिस सुरक्षा में उन्हें वहां से निकाला गया, लेकिन गुस्साए लोगों ने उनका 19 किलोमीटर दूर लछमोली तक पीछा किया। उग्र रूप ले चुके प्रदर्शनकारियों ने यहां भी जमकर बवाल काटा। इन लोगों ने स्वामी सानंद के मित्र वरिष्ठ साहित्यकार डॉ.भरत झुनझुनवाला के घर पर जमकर तोड़फोड की। आक्रोशित प्रदर्शनकारियों ने डॉ. झुनझुनवाला के चेहरे पर स्याही उड़ेल दी और पत्‍‌नी के साथ मारपीट की। उधर, सानंद और उनके साथियों को पुलिस ऋषिकेश होते हुए हरिद्वार ले गई। दोपहर बाद सानंद को पुलिस सुरक्षा में मुजफ्फरनगर के लिए रवाना कर दिया गया।
    इस खबर के स्रोत का लिंक: 

    http://www.jagran.com

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    Source: 
    सत्यमेव जयते, 24 जून 2012

    देश की एक बड़ी आबादी धीमा जहर खाने को मजबूर है। हम बात कर रहे हैं भोजन के साथ लिए जा रहे उस धीमे जहर की, जो सिंचाई जल और कीटनाशकों के जरिए अनाज, सब्जियों और फलों में शामिल हो चुका है।
    इस खबर के स्रोत का लिंक: 

    http://www.satyamevjayate.in

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    Author: 
    दीपक रस्तोगी
    Source: 
    नेशनल दुनिया, 17-23 जून 2012

    अंधाधुंध शहरीकरण की वजह से कोलकाता का वेटलैंड क्षेत्र तेजी से घट रहा है। एक अनुमान के अनुसार, अब यह क्षेत्र 10 हजार एकड़ तक सिमट कर रह गया है। इन दिनों सुंदरवन के इलाकों में जिस तरीके से विकास के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों से खिलवाड़ चल रहा है, इस कवायद का खास असर होता नहीं दिख रहा। यहां के पानी में ऑक्सीजन कम हो रहा है। आर्सेनिक की मौजूदगी के संकेत भी मिले हैं। पानी में आर्सेनिक की मात्रा 15 मिली ग्राम तक मिली है।

    जंगली बिल्ली, छोटे बंदर, ऊदबिलाव, सफेद गर्दन वाले किंगफिशर, तितलियां और पानी के सांपों की विशेष प्रजातियां, जैसे अभी कल की ही बात लगती हैं। कोलकाता के एक हिस्से में ये वन्य जीव ऐसे दिखते थे, जैसे प्रकृति की किसी वीरान और हरी-भरी गोद में सांस ले रहे हों। हाल तक वन्य जीवों की ये विशेष प्रजातियां कोलकाता के पूर्वी छोर के किनारे से गुजरती बड़ी सड़क यानी ‘ईस्टर्न मेट्रोपोलिटन बाईपास’ के किनारे के तालाबों, दलदलों और छोटी झीलों के इर्द-गिर्द फैली हरियाली की विशेषता हुआ करती थी। वजह वन्य जीवों की ऐसी ढाई सौ से अधिक प्रजातियां सिर्फ और सिर्फ कोलकाता के जलभूमि क्षेत्र (वेटलैंड्स) में पाई जाती थी। लेकन अब भूमि के इस्तेमाल के कानूनों को तोड़-मरोड़ कर वेटलैंड्स पाटे जा रहे है और उन पर कॉलोनियां विकसित करने की होड़ लगी है, उससे प्रकृति का यह वरदान नष्ट हो रहा है। इससे भी कहीं ज्यादा रफ्तार से यहां की लुप्तप्राय प्रजातियों का रहा-सहा अस्तित्व भी संकट में है।

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    Author: 
    बाबा मायाराम

    यह कहा जा सकता है कि कृषि में महिलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण है। खासतौर पर जंगल और पहाड़ में खेती उन पर ही निर्भर है। नई रासायनिक और आधुनिक खेती में जो अभूतपूर्व संकट आया है उससे जंगल व परंपरागत खेती भी प्रभावित हो रही है।

    परंपरागत कृषि का अधिकांश कार्य महिलाओं पर निर्भर है। वे खेत में बीज बोने से लेकर उनके संरक्षण - संवर्धन और भंडारण तक का काम बड़े जतन से करती हैं। पशुपालन से लेकर विविध तरह की हरी सब्जियां व फलदार वृक्ष लगाने व उनके परवरिश का काम करती हैं। जंगलों से फल-फूल, पत्ती के गुणों की पहचान करना व संग्रह करने में उनकी प्रमुख भूमिका रही है। वे जैव विविधता की जानकार और संरक्षक हैं। यानी वे प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से लेकर खाद्य सुरक्षा का महत्वपूर्ण काम करती रही हैं।

    लेकिन जबसे खेती में मशीनीकरण हुआ है तबसे महिलाओं की भूमिका सिमटती जा रही है। जबकि पूर्व में खेती में सिर्फ हल-बक्खर चलाने को छोड़कर महिलाएं सभी काम करती थीं।

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    Author: 
    विश्वनाथ त्रिपाठी
    Source: 
    नेशनल दुनिया, 24-30 जून 2012
    यह ज्येष्ठ मास है। ग्रीष्म अपने पूर्ण प्रताप में है। इस ताप में वर्षा की इच्छा बसी है। कहते हैं-
    ‘जब जेठ तपै निरंता, तब जानौ बरखा बलवंता।’
    निराला ने इस स्थिति-द्वंद्व का चित्रण इन पंक्तियों में किया है-
    ‘जला है जीवन यह आतप में दीर्घ काल
    सूखी भूमि सूखे तरु सूखे सिल आल बाल
    बंद हुआ अलि गुंज धूलि धूसर हुए कुंज
    किंतु देखो व्योम-उर पड़ी बंधु मेघ-माल।’


    कहने की जरूरत नहीं कि कविता में चित्रित जलने वाला जीवन निराला का भी है और लोक और प्रकृति का भी। इस घोर ताप का ही फल है आकाश (और निराला के कंठ में भी) पड़ने वाली मेघ माला (निराला के पक्ष में यश की माला) इस द्वंद्व में जीवन-राग है। यह राग कभी-कभी विलाप भी बनकर रह जाता है किंतु यह सच है, प्रकृति का नियम है,ग्रीष्म और वर्षा का कारण-कार्य संबंध।

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    Author: 
    अंशु मेश्क
    Source: 
    चरखा फीचर्स

    सोलह वर्ष बाद आज भी हमें इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिल पाया है कि माजुली को बचाने के लिए दूसरा कोई उपाय क्या है? संजय लिखते हैं ‘‘हमें लोगों के इस हौसले और शक्ति का पूरा एहसास है जिसे ब्रह्मपुत्र ने सुरक्षित रखा है।’’ माजुली के अस्तित्व के लिए संघर्श कर रहे लोगों के लिए यह पंक्तियां आज भी उनका हौसला बढ़ाती हैं। क्योंकि अहसास जगाने वाला माजुली का वह हीरो उनके दिलों में अब भी जिंदा है।

    इस वर्ष ब्रह्मपुत्र नदी में आई बाढ़ ने जैसी तबाही मचाई है वैसी कल्पना कभी असमवासियों ने नहीं की थी। पानी के विकराल रूप ने सबसे ज्यादा माजुली द्वीप पर बसे 1.6 लाख वासियों को प्रभावित किया है। जो जिंदगी और मौत के दरम्यान खुद को बचाने की कशमकश में घिरे हुए हैं। सबके मन मस्तिष्क में बस एक ही प्रश्न घूम रहा है ‘यदि ऐसा होता तो क्या होता? और इन प्रश्नों में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि ‘यदि आज संजय जीवित होते तो क्या होता? परंतु संजय के जीवित रहने की आशा तो 15 वर्ष पहले ही (4 जुलाई) को उस समय समाप्त हो गई जब उल्फा विद्रोहियों ने उनका अपहरण करके उसी माजुली द्वीप में कत्ल कर दिया जिसे तबाही से बचाने के लिए वह दिन रात संघर्ष कर रहे थे।

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    Author: 
    हरिकृष्ण यादव
    Source: 
    जनसत्ता रविवारी, 24 जून 2012

    हरियाणा जहां अपने कारखानों के जहरीले कचरे को दिल्ली भेज रहा है वहीं दिल्ली भी उत्तर प्रदेश को अपने गंदे नालों और सीवर का बदबूदार मैला पानी ही सप्लाई कर रही है। दिल्ली में यमुना की सफाई के नाम पर अब तक साढ़े तीन हजार करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। ढाई हजार करोड़ रुपए अभी और खर्च होने हैं। दिल्ली में यमुना में अठारह बड़े नाले गिरते हैं, जिनमें नजफगढ़ का नाला सबसे बड़ा और सबसे अधिक प्रदूषित है। इस नाले में शहरी इलाकों के अड़तीस और ग्रामीण इलाकों के तीन नाले गिरते हैं।

    यमुना से कृष्ण का अटूट नाता रहा है और इसकी पवित्रता को बरकरार रखने के लिए उन्होंने कालिया नाग को खत्म किया था। लेकिन द्वापर में प्रदूषित होने से बची यमुना कलयुग में जहर उगलते कारखानों और गंदे नालों की वजह से मैली हो गई है। यमुना की निर्मलता और स्वच्छता को बनाए रखने के दावे तो किए जा रहे हैं, लेकिन इस पर कायदे से अब तक अमल नहीं हो पाया है। अपने उद्गम से लेकर प्रयाग तक बहने वाली इस नदी की थोड़ी-बहुत सफाई बरसात के दिनों में इंद्र देव की कृपा से जरूर हो जाती है। लेकिन यमुनोत्री से निकली इस यमुना की व्यथा बेहद त्रासद है। अतीत में यमुना को भी पवित्रता और प्राचीन महत्ता के मामले में गंगा के बराबर ही अहमियत मिलती थी। पश्चिम हिमालय से निकल कर उत्तर प्रदेश और हरियाणा की सीमाओं की विभाजन रेखा बनी यह नदी पंचानवे मील का सफर तय कर उत्तरी सहारनपुर के मैदानी इलाके में पहुंचती हैं।

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  • 07/06/12--03:25: मरती गंगा
  • Author: 
    निराला
    Source: 
    तहलका, 13 जून 2012
    लगभग 40 करोड़ लोगों को अपने पानी से सिंचने वाली गंगा विलुप्त होना तय माना जा रहा है। जैसे राष्ट्रीय पक्षी मोर और राष्ट्रीय पशु शेर धीरे-धीरे खत्म हो चुके हैं वैसे ही गंगा भी खत्म होने के कगार पर है। गंगा का राष्ट्रीय नदी होना ही उसके लिए खतरा है। क्योंकि जबसे गंगा को राष्ट्रीय नदी का सम्मान मिला है तब से कुछ ज्यादा ही गंगा को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। अब गंगा शहरों का सीवर तथा कचरा ढोने वाली मालगाड़ी हो गई है। बांध, बैराज, खनन तथा शहरों से निकला कचरा गंगा के प्रवाह में ज्यादा खतरनाक साबित हो रहे हैं। गंगा पर हो रहे अतिक्रमण के बारे में बताती निराला की रिपोर्ट।

    गंगा, दुनिया की उन 10 बड़ी नदियों में है जिनके अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। इस पर बनते बांधों, इससे निकलती नहरों, इसमें घुलती जहरीली गंदगी और इसमें होते खनन को देखते हुए यह सुनकर हैरानी नहीं होती। गंगा के बेसिन में बसने वाले करीब 40 करोड़ लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से इस पर निर्भर हैं। गंगा के पूरी तरह से खत्म होने में भले ही अभी कुछ समय हो लेकिन उस पर आश्रित करोड़ों जिंदगियां खत्म होती दिखने लगी हैं।

    ‘25 साल पहले गंगा की सफाई के नाम पर हमारे इलाके में वाटर ट्रीटमेंट प्लांट लगा। शहर के गंदे नालों का पानी आया तो पहले-पहल तो खेतों में क्रांति हो गई। फसल चार से दस गुना तक बढ़ी। लेकिन अब तो हम अपनी फसल खुद इस्तेमाल करने से बचते हैं। लोग भी अब हमारे खेत की सब्जियां नहीं लेते, क्योंकि वे देखने में तो बड़ी और सुंदर लगती हैं मगर उनमें कोई स्वाद नहीं होता। दो घंटे में कीड़े पड़ जाते हैं उनमें। वही हाल गेहूं-चावल का भी है। चावल या रोटी बनाकर अगर फौरन नहीं खाई तो थोड़ी देर बाद ही उसमें बास आने लगती है। अब तो हम लोगों ने फूलों की खेती पर ध्यान देना शुरू कर दिया है। फूल भगवान पर चढ़ेंगे। उनको तो कोई शिकायत नहीं होगी।’
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    Author: 
    अतुल चौरसिया
    Source: 
    तहलका, 13 जून 2012
    यमुना, गंगा से ज्यादा अच्छी है क्योंकि यमुना में पानी की मात्रा एक चौथाई है और उसके इलाके चट्टानी नहीं होकर मिट्टी वाले हैं। जिससे यमुना पर गंगा के मुकाबले बांध बनाने की होड़ नहीं है फिर भी यमुना को मारने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं। गंगा के बाद यमुना भारत की दूसरी पूजनीय नदी है। यमुना नदी को भी हम मां का संज्ञा प्रदान करते हैं। परन्तु जहां आज यमुना थोड़ा बहुत जिंदा हैं वहां उसे मारने का भरपूर कोशिश हो रही है और जहां यमुना नदी पर चुकी है। वहां उसकी लाश नोचने का काम कर रहे हैं ताकि यमुना किसी भी स्थिति में बच न सके।

    200 किलोमीटर पहाड़ों तथा थोड़ा मैदानी भागों में यात्रा करके यमुना पल्ला गांव पहुंचती है। यहां से यमुना की दिल्ली यात्रा शुरू होती है। 22 किलोमीटर की इस पट्टी में 22 तरह की मौतें हैं। एक मरी हुई नदी को बार-बार मारने का मानवीय सिलसिला। वजीराबाद संयंत्र के पास बचा पानी निकालने के बाद दो करोड़ लोगों के भार से दबे यमुना बेसिन के इस शहर का एक हिस्सा अपनी प्यास बुझाता है। यमुना से पानी निकालने के बाद इसकी पूर्ति करना भी तो जरूरी है सो दिल्ली ने नजफगढ़ नाले का मुंह खोल दिया है। आठ सहायक नालों के साथ तैयार हुआ यह नाला शहर की शुरुआत में नदी का गला घोंट देता है।

    सूरज ठीक सिर पर आ चुका है। धूप तेज है मगर हवा ठंडी। देहरादून से करीब 45 किलोमीटर दूर जिस जगह पर हम हैं उसे डाक पत्थर कहते हैं। डाक पत्थर वह इलाका है जहां यमुना नदी पहाड़ों का सुरक्षित ठिकाना छोड़कर मैदानों के खुले विस्तार में आती है। यमुना इस मामले में भाग्यशाली है कि पहाड़ अब भी उसके लिए सुरक्षित ठिकाना बने हुए हैं। उसकी बड़ी बहन गंगा की किस्मत इतनी अच्छी नहीं। जिज्ञासा होती है कि आखिर गंगा की तर्ज पर यमुना के पर्वतीय इलाकों में बांध परियोजनाओं की धूम क्यों नहीं है। जवाब डाक पत्थर में गढ़वाल मंडल विकास निगम के रेस्ट हाउस में प्रबंधक एसपीएस रावत देते हैं। रावत खुद भी वाटर राफ्टिंग एसोसिएशन से जुड़े रहे हैं। वे कहते हैं, 'पहाड़ों पर यमुना में गंगा के मुकाबले एक चौथाई पानी होता है। इसके अलावा यमुना पहाड़ों में जिस इलाके से बहती है वह चट्टानी नहीं होकर कच्ची मिट्टी वाला है जिस पर बांध नहीं बनाए जा सकते।
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