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    Source: 
    सामयिक वार्ता, मई 2013
    भोजन के माध्यम से कीटनाशकों से संपर्क कई जीर्ण बीमारियों को जन्म देता है। सबसे बढ़िया तरीका तो यह होगा कि हम अपनी थाली को देखें- यह हिसाब लगाएं कि हम क्या और कितना खा रहे हैं- ताकि यह पक्का कर सकें कि कीटनाशकों की सुरक्षित सीमा निर्धारित की जा सके। पोषण प्राप्त करने के लिए हमें थोड़ा जहर तो निगलना होगा मगर इसे स्वीकार्य सीमा में कैसे रखा जा सकता है? इसका मतलब है कि सारे खाद्य पदार्थों के लिए कीटनाशकों के सुरक्षित स्तर के मानक तय करने होंगे।मेरा स्थानीय सब्जीवाला पॉलीथीन की थैलियों में नींबू पैक करके बेचता है। मैं सोचने लगी कि क्या यह खाद्य सुरक्षा और स्वच्छता के बेहतर मानकों का द्योतक है। आखिर हम जब प्रोसेस्ड फूड की अमीर दुनिया के किसी सुपर मार्केट में जाते हैं, तो नजर आता है कि सारे खाद्य पदार्थ सफाई से पैक किए गए हैं ताकि मनुष्य के हाथ लगने से कोई गंदगी न हो। फिर खाद्य निरीक्षकों की पूरी फौज होती है, जो प्रोसेसिंग कारखाने से लेकर रेस्टोरेंट में परोसे जाने तक हर चीज की जांच करती है। उसूल साफ है: खाद्य सुरक्षा के प्रति जितनी ज्यादा चिंता होगी, क्वालिटी भी उतनी ही अच्छी होगी और परिणाम यह होगा कि इसे लागू करने की कीमत भी उतनी ही ज्यादा होगी। धीरे-धीरे, मगर निश्चित रूप से छोटे उत्पादक बाहर धकेल दिए जाते हैं। भोजन का कारोबार ऐसे ही चलता है। मगर क्या सुरक्षित भोजन का यह मॉडल भारत के लिए ठीक है? यह तो पक्की बात है कि हमें सुरक्षित भोजन चाहिए।

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    Author: 
    सुरेश भाई
    मौजूदा स्थिति में विकास के नाम पर 558 परियोजनाओं से 40,000 मेगावाट बिजली उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। इन बिजली परियोजनाओं के निर्माण के लिए नदियों के किनारों से होकर गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्गों को चौड़ा ही इसलिए किया जा रहा है ताकि बड़ी-बड़ी भीमकाय मशीनें सुरंग बांधों के निर्माण के लिए पहाड़ों की गोद में पहुंचाई जा सकें। यहाँ तो हर रोज सड़कों का चौड़ीकरण विस्फोटों और जेसीबी मशीनों द्वारा हो रहा है। जिसके कारण नदियों के आर-पार बसे अधिकांश गांव राजमार्गों की ओर धंसते नजर आ रहे हैं।हिमालयी क्षेत्र में बाढ़, भूस्खलन, भूकंप की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। उत्तराखंड हिमालय से निकलने वाली पवित्र नदियां, भागीरथी, मंदाकिनी, अलकनंदा, भिलंगना, सरयू, पिंडर, रामगंगा आदि के उद्गम से आगे लगभग 150 किमी तक सन् 1978 से लगातार जलप्रलय की घटनाओं की अनदेखी होती रही है। 16-17 जून 2013 को केदारनाथ में हजारों तीर्थ यात्रियों के मरने से पूरा देश उत्तराखंड की ओर नजर रखे हुए है। इस बीच ऐसा लगा कि मानो इससे पहले यहाँ कोई त्रासदी नहीं हुई होगी, जबकि गंगोत्री से उत्तरकाशी तक पिछले 35 वर्षों में बाढ़, भूकंप से लगभग एक हजार से अधिक लोग मारे गए। 1998 में ऊखीमठ और मालपा, 1999 में चमोली आदि कई स्थानों पर नजर डालें तो 600 लोग भूस्खलन की चपेट में आकर मरे हैं। 2010-12 से तो आपदाओं ने उत्तराखंड को अपना घर जैसा बना दिया है। इन सब घटनाओं को यों ही नजरअंदाज करके आपदा के नाम पर प्रभावित समाज की अनदेखी की जा रही है।

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    Author: 
    खड्गसिंह वल्दिया
    Source: 
    जनसत्ता (रविवारी), 14 जुलाई 2013
    उत्तराखंड की तबाही में हुई जान-माल की क्षतिपूर्ति असंभव है। मगर इससे सबक लेकर विचार तो किया ही जाना चाहिए कि ऐसी आपदाओं से बचाव के उपाय क्या हो सकते हैं। नदियों के प्राकृतिक रास्तों में अतार्किक निर्माण की वजह से वहां त्रासदी ने ज्यादा विकराल रूप धारण कर लिया। इसके भौगोलिक और वैज्ञानिक कारणों की पड़ताल कर रहे हैं खड्गसिंह वल्दिया।

    दो ढालों के बीच नदी की चौड़ी घाटी उसका स्वाभाविक मार्ग है। उसे ‘फ्लड-वे’ कहते हैं। उस प्राकृतिक चौड़े मार्ग पर कभी भी बाढ़ का पानी बह सकता है। अपने फ्लड-वे यानी प्राकृतिक मार्ग में नदी अपनी धारा बदलती रहती है, पुरानी वाहिकाओं को छोड़कर नई वाहिकाएं बना लेती है। नदी कभी दाएं किनारे बहती है, कभी बाएं और कभी बीच में। बाढ़ की स्थिति में तो अपनी धारा बदलती ही है। अनेक स्थलों पर नदियां अपना बहाया हुआ मलबा जमा कर देती हैं। कच्चे मलबे के अंबार बढ़ते चले जाते हैं और वेदिकाओं में बदलती जाती है। स्थानीय बोली में ऐसी वेदिकाओं को ‘बगड़’ कहते हैं।उत्तुंग केदारनाथ, चौखंबा (बदरीनाथ), त्रिशूल, नंदादेवी और पंचचूली शिखरों वाले वृहद हिमालय (या हिमाद्रि) की विकट दक्षिणी ढाल सदा से भारी वर्षा की मार झेलती रही है। लेकिन पिछले सात-आठ सालों से अतिवृष्टि और भूस्खलनों की न थमने वाली आपदाओं से पिट रही है और बार-बार क्षत-विक्षत हो रही है। सीमित क्षेत्रों में अल्प अवधि में होने वाली अतिवृष्टि (बादल फटने) के कारण वृहद हिमालय की तलहटी की पट्टी के हजारों गांव बार-बार प्राकृतिक विपदाओं की त्रासदी भोग रहे हैं। संयोग से यही वह पट्टी है, जो जब-तब भूकंपों से डोलने लगती है और टूटते हैं पहाड़, सरकती हैं ढालें, और धंसती है धरती। 2009 में जिला पिथौरागढ़ के मुनस्यारी-तेजम क्षेत्र में और 2010 और 2012 में गढ़वाल की भागीरथी और अलकनंदा घाटियों में प्रकृति के अकल्पनीय प्रकोप को कभी भुलाया नहीं जा सकता। मौसम विज्ञानी वर्षों से कह रहे हैं कि आबोहवा में बदलाव के कारण अब देश में मानसूनी वर्षा असमान रूप से होगी और अतिवृष्टि और अनावृष्टि का दुश्चक्र चलेगा।

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    Author: 
    शमशेर सिंह बिष्ट
    Source: 
    जनसत्ता (रविवारी), 14 जुलाई 2013
    चालीस साल पहले तक उत्तराखंड की राजनीति में लकड़ी और लीसे के ठेकेदार हावी थे। आज यहां शराब और पानी का माफिया राज कर रहा है। पहाड़ों में बन रही जल विद्युत परियोजनाएं इन राजनीतिक दलों के लिए पैसा उगल रही हैं। पूरे उत्तराखंड में 558 जल विद्युत परियोजनाएं प्रस्तावित हैं, जिनमें अकेले भागीरथी और अलकनंदा में ही 53 परियोजनाएं हैं। अनुमान है कि इन योजनाओं के बनने पर पूरे उत्तराखंड में नदियों को करीब 1500 किलोमीटर सुरंगों के भीतर बहना होगा। मनेरी से उत्तरकाशी तक भागीरथी 10 किलोमीटर सुरंग में कैद हो गई है।भू-वैज्ञानिकों के मुताबिक हिमालय का निर्माण यूरेशियन और एशियन प्लेट्स की आपसी टक्कर का नतीजा है। अरबों साल पहले गोंडवाना लैंड (वर्तमान अफ्रीका और अंटार्कटिका) से टूटकर आए भारतीय उपमहाद्वीप का ऊपरी हिस्सा ही हिमालय है। हिमालय अब तक मूल स्थान से दो हजार किलोमीटर की यात्रा कर चुका है और अभी भी दो सेंटीमीटर प्रति वर्ष की दर से चीन की तरफ धंस रहा है। इस भूगर्भीय हलचल के कारण हिमालय क्षेत्र में ज़बरदस्त तनाव रहता है। इस तनाव को कम करने का उपाय भी प्रकृति के ही पास है। बार-बार 6 रिक्टर स्केल का भूकंप आता रहे तो यह भूगर्भीय हलचल कम हो जाती है और इससे अधिक तीव्र स्तर का भूकंप आने की आशंका कम हो जाती है। पिछले सौ वर्ष से यहां आठ या उससे अधिक शक्ति का भूकंप नहीं आया है, इसलिए ऐसा भूकंप आने की आशंका बहुत अधिक है। पूरा उत्तराखंड ही भूकंप के मामले में संवेदनशील है। यहां के नौ जिले-पिथौरागढ़ अल्मोड़ा, बागेश्वर, चंपावत, चमोली, उत्तरकाशी, पौड़ी, टिहरी और रुद्रप्रयाग जोन पांच में और शेष चार, देहरादून, हरिद्वार, उधमसिंह नगर और नैनीताल के कुछ हिस्से जोन चार में आते हैं।

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    जहां तक जलविद्युत परियोजनाओं से बिजली और रोज़गार के स्थानीय लाभ का सवाल है, तो हकीक़त और भी हास्यास्पद है। बतौर केन्द्रीय मंत्री श्री के एल राव ने खुद माना था कि जलविद्युत परियोजनाओं से स्थानीय लोगों को बिजली नहीं मिलती। टिहरी व भाखड़ा इसके पुख्ता उदाहरण हैं। ताज़ा उदाहरण धौली गंगा परियोजना का है। इसकी क्षमता 280 मेगावाट। इसका पहला आपूर्ति सब स्टेशन बरेली है। परियोजना के नज़दीक मुनस्यारी को एक मेगावाट बिजली नहीं दे पा रहे। यह इलाक़ा अक्सर अंधेरे में डूबा रहता है। हम सब जानते हैं कि परियोजना निर्माण में आधुनिक तकनीक व मशीनों का उपयोग होता है।पानी से पैदा बिजली स्वच्छ, स्वस्थ और सबसे सस्ती होती है। जलविद्युत परियोजनाओं में जो ‘पीकिंग पावर’ होती है। ताप विद्युत की तरह धुआं फैलाकर यह वायुमंडल को प्रदूषित नहीं करती। परमाणु विद्युत उत्पादन इकाइयों से विकरण जैसी आशंका से भी जलविद्युत परियोजनाएं मुक्त हैं। ‘रन ऑफ द रिवर’ परियोजनाएं तो पूरी तरह सुरक्षित हैं। आम ही नहीं खास पर्यावरण कार्यकर्ताओं की धारणा है कि इनमें कोई बांध नहीं बनता। नदी को इनसे कोई नुकसान नहीं होता। अतः ‘रन ऑफ द रिवर’ जल विद्युत परियोजनाएं बनाई जानी चाहिए। जलविद्युत के पक्ष में दिए जाने वाले ये दावे महज दावे हैं या हकीक़त ? जलविद्युत परियोजनाओं की जद में आने वाली आबादी के लिए यह जानना आज बेहद जरूरी है; खासकर तब, जब उत्तराखंड पुनर्निर्माण की दिशा तय हो रही हो।

    उत्तराखंड में आज 98 जलविद्युत परियोजनाएं कार्यरत हैं और 111 निर्माणरत। वर्तमान कार्यरत परियोजनाओं की कुल स्थापना क्षमता 3600 मेगावाट है। 21,213 मेगावाट की 200 परियोजनाएं योजना में हैं। ये उत्तराखंड जलविद्युत निगम के आंकड़े हैं।

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    Source: 
    राज्यसभा टीवी, 27 जून 2013

    हम सभी जानते हैं कि मानव सहित सभी प्राणी पंचतत्वों अर्थात ‘पृथ्वी’, ‘जल’, ‘अग्नि’, ‘वायु’ और ‘आकाश’ से बने हैं। मानव का तन और मन इन तत्वों से स्वतः स्फूवर्त और इनके असंतुलन से निष्क्रिय सा हो जाता है। प्रकृति ने इन पंचतत्वों को प्राणी मात्र के लिए बिना किसी भेदभाव के सुलभ कराया है।
    इस खबर के स्रोत का लिंक: 

    http://www.youtube.com

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    आधुनिक खेती में ज्यादा प्यासे बीजों के आने से भी नदियों के भू-पृष्ठ के पानी को खींचा ही जा रहा है। सीधे नदियों से डीजल ईंजन या बिजली के मोटर पंपों के माध्यम से पानी उलीचा जा रहा है। दूसरा नदियों के तटों पर जो कुहा, खकरा, गूलर और छोटे बड़े पौधे दूब तथा घास होती थी, तटों के आसपास जो पड़त भूमि होती थी। यानी नदी का जो पेट होता था, उस पर अब खेती होने लगी है। नदी की रेत उठाई जा रही है, जो स्पंज की तरह पानी को जज्ब करके रखती थी। रेत उठाने से नदियों में बड़े-बड़े गड्ढे या खदान बन जाती है, जो नदी के स्वाभाविक प्रवाह में बाधक होती है।।पिछले कुछ अरसे से देश और दुनिया में पर्यावरण संकट की चर्चा चल रही है। इसमें ग्लोबल वार्मिंग, ओजोन परत का क्षरण और पारिस्थितिकी असंतुलन पर तो चिंता जताई जाती है लेकिन इसका सबसे ज्यादा असर जिन समुदायों पर हो रहा है, जिनकी आजीविका सीधे तौर पर पर्यावरण से जुड़ी है, उस पर चर्चा कम है। सदानीरा नदियों के दम तोड़ने से इन नदियों पर आश्रित जीवनयापन करने वाले मछुआरों की आजीविका संकट में पड़ गई है। मध्य प्रदेश के सतपुड़ा अंचल में पिछले सालों में कई नदियां सूख गई हैं। लगातार सूखा या कम बारिश के कारण कई बारहमासी नदियां अब बरसाती नालों में बदल गई हैं। दुधी, मछवासा, पलकमती, शक्कर, छींगरी, गंजाल और कालीमाचक जैसी नदियां या तो सूख गई हैं या सूखने के कगार पर हैं। ये छोटी नदियां, जो नर्मदा जैसी बड़ी नदियों का पेट भरती थी, अब या तो दम तोड़ रही हैं। इनका असर नर्मदा पर भी है, अब इसे गर्मी के मौसम में पैदल ही पार किया जा सकता है। जबकि पहले नाव से पार करना पड़ता था। ऊपर से उस पर कई बांध भी बन गए हैं और बन रहे हैं।

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    मध्य प्रदेश में होशंगाबाद जिले में सोयाबीन की खेती की शुरूआत हुई। पहले इसे फैलाने और बढ़ाने के लिए मुफ्त में बाँटा गया। जब कोई चीज मुफ्त में मिलती है तो सभी लोग ले लेते हैं। ऐसा सोयाबीन के साथ भी हुआ और सोयाबीन यहां तेजी से फैला। इससे समृद्धि भी दिखाई दी। धीमे और पैदल चलने वाले किसान और उनके बेटे मोटर साइकिल से दौड़ने लगे। शादी-विवाह में खर्चीले हो गए। जीवनशैली बदली। कहा यह गया कि भारतीय भोजन में प्रोटीन की कमी है, जिसकी पूर्ति सोयाबीन से होगी। लेकिन सोया खली, जिसमें प्रोटीन रहता है, उसे निर्यात किया गया। यहां सिर्फ सोया तेल की आपूर्ति की गई।खेती-किसानी का संकट अब मौसमी न होकर स्थाई हो गया है। कभी सूखा, कभी बाढ़, कभी अधिक वर्षा और कभी कम वर्षा ने किसानों की कमर तोड़ दी है। हाल ही हुई भारी बारिश ने एक बार फिर किसानों का संकट बढ़ा दिया है। इससे न केवल मूंग की खड़ी फसल खराब हो गई है बल्कि सोयाबीन की फसल प्रभावित हुई है। धान की फसल की बढ़वार भी रुक गई है। इस बार लगातार बारिश से मूंग की फसल खेत में सड़ गई। उसकी फल्लियां किसान तोड़ ही नहीं पाए। सोयाबीन की बुआई भी किसान नहीं कर पाए और जिन्होंने बुआई की, उनकी फसल बारिश से नष्ट हो गई है। अगर हम बारिश मध्य प्रदेश मे होशंगाबाद जिले के बारिश के आंकड़ों पर नजर डालें तो इतनी बारिश 14 साल बाद हुई है। यहां अब तक 1000 मिमी औसत बारिश से अधिक हो गई जबकि यहां की औसत बारिश 1311.7 मिमी है। पिछले कुछ सालों से किसान सूखे की मार झेल रहे थे अब अधिक बारिश ने उनका चैन छीन लिया है। किसान अब आंदोलित हो रहे हैं और फसल बीमा राशि देने की मांग कर रहे हैं।

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    Author: 
    स्वतंत्र मिश्र
    Source: 
    शुक्रवार, जुलाई 2013
    आर्सेनिक ग्रसित इलाके बलिया और भोजपुर में वैज्ञानिक पीने योग्य पानी के लिए पारंपरिक कुओं की ओर लौटने की सलाह दे रहे हैं। गैर-सरकारी संगठन ‘इनर वॉयस फ़ाउंडेशन’ और 95 वर्षीय धनिकराम वर्मा की पहल से कुओं को साफ किया जा रहा है। बलिया नगरपालिका ने भी शहर के 25 कुओं का जीर्णोंद्धार करने की घोषणा की है।उत्तर प्रदेश का बलिया और बिहार का भोजपुर जिला आर्सेनिक की चपेट में है। आर्सेनिक युक्त पानी पीने से यहां के लोग पहले मेलानोसिस (शरीर के विभिन्न अंगों पर काले-काले धब्बा पड़ना), फिर केटोसिस (काले धब्बों का गांठ में तब्दील होना और उसमें मवाद भर जाना) और अंततः कैंसर से पीड़ित होकर मरने को विवश हैं। कोलकाता के जादवपुर विश्वविद्यालय में रिसर्च स्कूल ऑफ एन्वायरमेंटल स्टडीज के निदेशक प्रोफेसर दीपांकर चक्रवर्ती ने ‘शुक्रवार’ को बताया, ‘बलिया और भोजपुर का शाहपुर इलाक़ा एशिया के सर्वाधिक आर्सेनिक ग्रस्त इलाकों में से एक है।’ पिछले दो दशकों के दौरान इस इलाके में कम-से-कम 2000 लोगों की मौत आर्सेनिक युक्त पानी पीने से हो चुकी है।

    दरअसल 1990 के दशक में केंद्र और राज्य सरकारों ने पूरे देश में ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पीने योग्य पानी पहुंचाने के लिए हैंडपंप (नलकूप) लगवाने शुरू कर दिए डॉक्टरों ने भी अपने मरीज़ों को कुएँ का पानी नहीं पीने और साफ पानी के लिए नलकूप का पानी इस्तेमाल करने के लिए कहना शुरू कर दिया।

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    Author: 
    गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’
    बांधएक तरफ बर्बाद बस्तियाँ-एक तरफ हो तुम।
    एक तरफ डूबती कश्तियाँ-एक तरफ हो तुम।
    एक तरफ है सूखी नदियाँ-एक तरफ हो तुम।
    एक तरफ है प्यासी दुनिया- एक तरफ हो तुम।

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    Author: 
    सुधीर गुप्ता
    Source: 
    कल्चर अनप्लग्ड
    भारत की नदियों का देश के आर्थिक एवं सांस्कृतिक विकास में प्राचीनकाल से ही महत्वपूर्ण योगदान रहा है। सिन्धु तथा गंगा नदियों की घाटियों में ही विश्व की सर्वाधिक प्राचीन सभ्यताओं - सिन्धु घाटी तथा आर्य सभ्यता का आविर्भाव हुआ। यदि मानव सभ्यता के विकास पर गौर करें तो इसका विकास नदियों के ही किनारे हुआ है।
    इस खबर के स्रोत का लिंक: 

    http://www.cultureunplugged.com

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    Author: 
    अतुल चौरसिया
    महाराष्ट्र के मेंढा गांव का उदाहरण बताता है कि स्वाभिमान और स्वावलंबन के साथ आजीविका का अवसर मिले तो नक्सलवाद से जूझते इलाकों में खुशहाली का नया अध्याय शुरू हो सकता है..

    देवाजी टोफा वह शख्स हैं जिन्होंने अधिकारों के लिए इस क्रांति की अलख जगाई थी। अंग्रेजों ने 1927 में भारतीय वन अधिनियम बनाकर एक तरह से जंगल पर निर्भर समाज को उससे बेदखल कर दिया था। 2006 में केंद्र सरकार द्वारा वनाधिकार कानून पास करने के साथ ही यह अधिकार एक बार फिर से बहाल हुआ। लेकिन हक की यह बहाली सिर्फ फाइलों में हुई थी। वन विभाग के अधिकारियों ने मेंढावासियों को उनका हक देने की राह में जमकर रोड़े अटकाए, मेंढा के पास बांस का अकूत भंडार था। इसके अलावा उसके 1,800 हेक्टेयर के जंगलों में चिरौंजी, महुआ, तेंदू पत्ता, हर्र, बरड़ आदि भी खूब होते हैं।महाराष्ट्र के गढ़चिरोली की सबसे बड़ी पहचान फिलहाल यही है कि यह नक्सल प्रभावित जिला है। आदिवासी और जंगल की बहुलता वाले इस जिले की धनौरा तहसील में एक गांव है मेंढा। मेंढा और लेखा नाम के दो टोलों का यह गांव देखने में कहीं से भी विशेष नहीं लगता। लेकिन अपनी करनी से इसने वह मिसाल कायम की है जिसमें नक्सलवाद से जूझते देश के कई इलाकों में खुशहाली का एक नया अध्याय कैसे शुरू हो, इसका संकेत छिपा है। मेंढा के नाम दो बड़ी उपलब्धियाँ हैं। यह देश का पहला गांव है जिसने सामुदायिक वनाधिकार हासिल किया और जिसकी ग्राम सभा को ट्रांजिट परमिट (टीपी) रखने का अधिकार मिला। इस अधिकार ने गांववालों को अपने जंगल का बांस अपनी मर्जी से बेचने की आजादी दी है। इससे वे न सिर्फ स्वाभिमान के साथ आजीविका कमा रहे हैं बल्कि वनों की सुरक्षा भी सुनिश्चित कर रहे हैं।

    सबल, स्वावलंबी, अपने हित के फैसले खुद ले सकने वाला और स्वाभिमानी, महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज की यही आत्मा थी। लेकिन विकास की आधुनिक परिभाषा में गांधी और उनके सिद्धांत पीछे छूटते गए।

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    Author: 
    सुरेश भाई

    आपदा के बाद पुनः निर्माण से पहाड़ बचाए जाएं।


    जहाँ उत्तराखंड की सरकार आपदा के बाद पुनःनिर्माण की योजना बना रही है वहीं आपदाग्रस्त क्षेत्रों में इन दिनों पलायन की भी चर्चा जोरों पर है। सरकार को सावधानी से इससे निपटने के सुझाव दे रहे हैं सामाजिक कार्यकर्ता सुरेश भाई की एक रिपोर्ट-

    चर्चा गहरी हो गई है कि यहाँ से कहीं दूसरी जगह ही पलायन हो। इससे सावधान रहने के लिए वर्तमान में राज्य को कठिन प्रतिज्ञा करनी चाहिए। राज्य सरकार ने यह निर्णय लेकर कि नदियों के किनारे कोई निर्माण नहीं होगा, इसका स्पष्टीकरण नहीं हो सका है। क्या इसका अर्थ इस नाम पर लिया जाय कि नदियों के किनारों की दूर तक की आबादी को खाली करवाना है, या नदियों के किनारों को सुदृढ़ ही नहीं करना है। यदि ऐसा है तो जो नदियों के किनारों की आबादी है वह भविष्य में अधिक खतरे की जद में आने वाली है। ऐसी स्थिति पैदा करने से पलायन बढ़ेगा।गंगा, यमुना, भागीरथी, अलकनंदा जैसी पवित्र नदियों के संगम व इनके तटों पर निवास करने वाले लोग कभी बड़े भाग्यशाली माने जाते थे। इसमें ऐसी भी कहावत है कि इन नदियों के तटों पर जो एक रात्रि भी विश्राम करे, वह पुण्य का भागीदार माना जाता है। लेकिन अब स्थिति भिन्न होती नजर आ रही है। नदियों के पास रहने वाले समाज को अनुभव हो रहा है कि उनके आने वाले दिन संकट में गुजरेंगे। हर बरसात में औसत दो गांव और दो ऐसी आबादी वाले क्षेत्र तबाह होते नजर आ रहे हैं, जहाँ पर लोग तीर्थ स्थलों तक पहुँचने से पहले चाय, पानी पीकर विश्राम लेते थे। बरसात में पहाड़ी राज्यों में खासकर उत्तराखंड़, हिमाचल, जम्मू कश्मीर और उत्तर पूर्व के राज्यों में भी लोगों को अपने पाँव के नीचे की ज़मीन असुरक्षित नजर आ रही है। आखिर ऐसा पिछले वर्षों में क्या हो गया कि लोग अकस्मात पहाड़ी क्षेत्रों में अब अपने को सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रहे हैं।

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    Source: 
    तहलका, अगस्त 2013
    हिवड़े बाजार जाने पर आपको तरतीब से बने गुलाबी मकान दिखेंगे। साफ और चौड़ी सड़कें भी। नालियां बंद हैं और जगह-जगह कूड़ेदान लगे हैं। हर जगह एक अनुशासित व्यवस्था के दर्शन होते हैं। शराब और तंबाकू के लिए अब गांव में कोई जगह नहीं रही। हर घर में पक्का शौचालय है। खेतों में मकई, ज्वार, बाजरा, प्याज और आलू की फसलें लहलहा रही हैं। सूखे से जूझते किसी इलाके में यह देखना किसी चमत्कार से कम नहीं। 235 परिवारों और 1,250 लोगों की आबादी वाले इस गांव में 60 करोड़पति हैं।ताराबाई मारुति कभी दिहाड़ी मजदूर थीं। आज उनके पास 17 गायें हैं और वे ढाई सौ से तीन सौ लीटर दूध रोज बेचती हैं। वे बताती हैं, 'पहले मजदूरी करते थे। पांच-दस रुपये रोज मिलते थे तो खाना मिलता था। आज आमदनी बढ़ गई है।'हिवड़े बाजार नाम के जिस गांव में ताराबाई रहती हैं वहां के ज्यादातर लोगों का अतीत कभी उनके जैसा ही था। वर्तमान भी उनके जैसा ही है। आज राजनीति से लेकर तमाम क्षेत्रों में जिस युवा शक्ति को अवसर देने की बात हो रही है वह युवा शक्ति कैसे समाज की तस्वीर बदल सकती है, इसका उदाहरण है हिवड़े बाजार। दो दशक पहले तक महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में बसे इस गांव की आबादी का एक बड़ा हिस्सा मजदूरी करने आस-पास के शहरों में चला जाता था। यानी उन साढ़े छह करोड़ लोगों में शामिल हो जाता था जो 2011 की जनगणना के मुताबिक देश के 4000 शहरों और कस्बों में नारकीय हालात में जी रहे हैं।

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    Author: 
    उमेश चतुर्वेदी
    Source: 
    नेशनल दुनिया, 28 अगस्त 2013
    गुजरात की रिफ़ाइनरी में रोज़ाना पांच से छह मिलियन गैलन पानी का इस्तेमाल होता है। यानी अगर बाड़मेर की प्रस्तावित रिफ़ाइनरी बनती है तो सूखा प्रभावित इलाके में रोज़ाना लाखों लीटर पानी की जरूरत होगी। जल संसाधन मंत्रालय पहले ही राजस्थान को ज़मीन के अंदर के पानी के मामले में काला क्षेत्र घोषित कर चुका है। ऐसे में, सवाल उठता है कि इतना सारा पानी कहां से आएगा। इसके लिए अभी तक कोई कार्ययोजना भी पेश नहीं की गई है। फिर राजस्थान समुद्र के किनारे भी नहीं है कि वहां से खारा पानी लाकर उसे पहले मीठे पानी में तब्दील करके फिर रिफ़ाइनरी में इस्तेमाल किया जाए।विकास के लिए जारी आपाधापी और मशक्कत के दौर में यह सवाल निश्चित तौर पर कड़वा लग सकता है। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु काफी पहले ही कह गए हैं कि बड़े उद्योग देश के नए तीर्थस्थल हैं। जिस देश में ऐसी परंपरा रही हो और जहां उदारीकरण की तेज बयार बह रही हो, ऐसे में यह सवाल न सिर्फ बेमानी, बल्कि विकास विरोधी भी लग सकता है। इस सवाल पर विस्तार से चर्चा से पहले उत्तराखंड में 16 जून को आई त्रासदी और उसके बाद उठ रहे सवालों पर गौर फरमाया जाए तो निश्चित मानिए कि यह सवाल कुछ ज्यादा ही महत्वपूर्ण लगने लगेगा। यह सच है कि तमाम कोशिशों के बावजूद राजस्थान अब भी विकसित राज्यों की उस पांत में शामिल नहीं हो पाया है, जिसमें तमिलनाडु, गुजरात, महाराष्ट्र और हरियाणा जैसे राज्य स्थापित हो चुके हैं। ऐसे मे अगर बाड़मेर में तेल रिफायनरी बनती हैं तो उसका स्वागत ही होना चाहिए। क्योंकि इससे राजस्थान के राजस्व ना सिर्फ बढ़ोतरी होगी, बल्कि रोज़गार के नए मौके बढ़ेगे। बीमारू राज्यों में शुमार रहे राजस्थान के लिए यह प्रस्ताव बेहतरी की गुंजाइश ही लेकर आया है।

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    Author: 
    गुंजन कुमार, शंभूनाथ शुक्ल
    Source: 
    जनसत्ता (रविवारी), 25 अगस्त 2013
    उत्तराखंड की आपदा ऐसे छोड़ गई है जिसकी टीस मिटने में लंबा वक्त लगेगा। दो महीने बाद भी कहीं राहत सामग्री और मुआवजे की बंदरबांट चल रही है तो कहीं मलबों में दबे शव डीएनए परीक्षण के इंतजार में दुर्गंध फैला रहे हैं। प्रशासन की उदासनता और हीलाहवाली लोगों की तकलीफ़ को और बढ़ा रही है। इस उथल-पुथल की दास्तान बयान कर रहे हैं गुंजन कुमार साथ में शंभूनाथ शुक्ल का यात्रा अनुभव।

    आपदा के शुरुआती दिनों में आपदाग्रस्त गाँवों में हेलिकॉप्टर से बिस्कुट, पानी वगैरह गिराया गया था। उसके बाद लोग रोज़ाना दर्जनों बार हेलिकॉटर को अपने गांव के ऊपर से उड़ान भरते देखते हैं। जैसे ही किसी हेलिकॉप्टर की आवाज़ इनके कानों में पड़ती है तो सभी अपने आंगन में आकर आसमान को निहारने लगते हैं। ऐसा करते हुए इन्हें दो महीने हो गए हैं। लेकिन एक भी पैकेट अन्न इस क्षेत्र में नहीं गिरा। राहत सामग्री नहीं मिलने के कारण घाटी के लोगों पर भुखमरी का संकट गहराने लगा है। आपदा के दो महीने बाद भी उत्तराखंड में केदारनाथ इलाके की हकीक़त अब भी भयावह है। वहां मलबों में अब भी दबी लाशें डीएनए परीक्षण के इंतजार में दुर्गंध फैला रही हैं। भूख से तड़पते लोग हैं, मगर राहत सामग्री उन तक नहीं पहुंच पाई है। कालीमठ और मदमहेश्वर घाटी की सूरत-ए-हाल जानने के लिए जान जोखिम में डालकर उन दुर्गंध घाटियों में गया, जहां अभी तक कोई मीडियाकर्मी नहीं पहुंचा पाया था और न सरकारी कारिंदा। मुआवज़े का मरहम ज़ख्म तक पहुंचने से पहले ही प्रहसन में तब्दील हो रहा है। पीड़ा की घाटियों को जानने-समझने के क्रम में हमारा पहला पड़ाव ऊखीमठ था। इसी तहसील में केदारनाथ है, जो रुद्रप्रयाग जनपद में है। अगले दिन सबसे पहले ऊखीमठ का पैंज गांव जाना हुआ। बताया गया कि इस गांव के आठ लोग केदारनाथ के काल के गाल में समा गए, जिनमें पांच बच्चे थे।

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    Author: 
    सोपान जोशी
    Source: 
    गांधी-मार्ग, सितंबर-अक्टूबर 2013
    सन् 1908 में हुई एक वैज्ञानिक खोज ने हमारी दुनिया बदल दी है। शायद किसी एक आविष्कार का इतना गहरा असर इतिहास में नहीं होगा। आज हममें से हर किसी के जीवन में इस खोज का असर सीधा दीखता है। इससे मनुष्य इतना खाना उगाने लगा है कि एक शताब्दी में ही चौगुनी बढ़ी आबादी के लिए भी अनाज कम नहीं पड़ा। लेकिन इस आविष्कार ने हिंसा का भी एक ऐसा रास्ता खोला है, जिससे हमारी कोई निजाद नहीं है। दो विश्व युद्धों से लेकर आतंकवादी हमलों तक। जमीन की पैदावार बढ़ाने वाले इस आविष्कार से कई तरह के वार पैदा हुए हैं, चाहे विस्फोटकों के रूप में और चाहे पर्यावरण के विराट प्रदूषण के रूप में।

    दुनिया के कई हिस्सों में ऐसे ही हादसे छोटे-बड़े रूप में होते रहे हैं। इनको जोड़ने वाली कड़ी है उर्वरक के कारखाने में अमोनियम नाइट्रेट। आखिर खेती के लिए इस्तेमाल होने वाले इस रसायन में ऐसा क्या है कि इससे इतनी तबाही मच सकती है? इसके लिए थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा उन कारणों को जानने के लिए, जिनसे हरित क्रांति के उर्वरक तैयार हुए थे।

    इस साल 17 अप्रैल को एक बड़ा धमाका हुआ था। इसकी गूंज कई दिनों तक दुनिया भर में सुनाई देती रही थी। अमेरिका के टेक्सास राज्य के वेस्ट नामक गांव में हुए इस विस्फोट से फैले दावानल ने 15 लोगों को मारा था और कोई 180 लोग हताहत हुए थे। हादसे तो यहां-वहां होते ही रहते हैं और न जाने कितने लोगों को मारते भी हैं। लेकिन यह धमाका कई दिनों तक खबर में बना रहा। इससे हुए नुकसान के कारण नहीं, जिस जगह यह हुआ था, उस वजह से। धमाका किसी आतंकवादी संगठन के हमले से नहीं हुआ था। उर्वरक बनाने के लिए काम आने वाले रसायनों के एक भंडार में आग लग गई थी। कुछ वैसी ही जैसी कारखानों में यहां-वहां कभी-कभी लग जाती है। दमकल की गाड़ियां पहुंचीं और अग्निशमन दल अपने काम में लग गया। लेकिन उसके बाद जो धमाका हुआ, उसे आसपास रहने वाले लोगों ने किसी एक भूचाल की तरह महसूस किया।

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    मतभेद इस बात पर भी संभव है कि बिल खरीददार को भूमि जबरन खरीदने से रोकने की चिंता तो करता है, लेकिन जंगल, नदी, पहाड़ और समंदर की उस भूमि की कोई चिंता इस बिल में नहीं है, जिसकी सरकार जबरिया मालकिन बन बैठी है; जबकि संकट ऐसी भूमि पर भी कम नहीं है।’ जनांदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय’ ने मतभेद जताया है कि रोक सिर्फ बहुफसली भूमि पर होगी, जबकि गरीब-आदिवासियों के पास ज्यादातर भूमि एकफसली ही है।यह न हृदय परिवर्तन है और न किसी पाप का प्रायश्चित। इसे ‘गेम चेंजर’ कहना भी जल्दबाजी होगी। किंतु यह बिल भूमि अधिग्रहण पर छप चुके 119 साल पुराने ब्रितानी निशान को मिटाने की सिर्फ एक कोशिश भर भी नहीं है। यह यू टर्न है 23 साल पहले लिए आर्थिक उदारवाद के उस फैसले का, जिसने तीन-चौथाई आबादी के कृषि आधारित होने के बावजूद विकास को सिर्फ और सिर्फ औद्योगिक विकास व शोषण के रास्ते पर ढकेल दिया। भूमि अधिग्रहण का यह बिल यदि कानून बन सका, तो खाद्य सुरक्षा के लिए जरूरी खाद्यान्न उत्पादन को भूमि सुरक्षा मुहैया कराएगा। कृषि-सामुदायिक भूमि बचाएगा। ग्रामसभाओं की ताकत बढ़ाएगा। किसान की हैसियत बढ़ाएगा। इतनी ही नहीं, खाद्यान्न और भूमि के समझदार उपयोग के लिए हमें विवश भी करेगा यह बिल।

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    Author: 
    रमेशदत्त शर्मा
    Source: 
    गांधी-मार्ग, सितंबर-अक्टूबर 2013
    इसके बिना न होय दिवाली इसके बिना न होय पूजा।
    भुनकर खिले, उबलकर निखरे, है दुनिया में कोई दूजा?


    एक सौ करोड़ से ज्यादा किसान धान की खेती से दूसरों का पेट भरते हैं और अपना पेट पालते हैं। कोई एक सौ से ज्यादा देशों में धान की खेती की जाती है। लेकिन दुनिया का 90 प्रतिशत धान एशिया में ही उगाया और खाया जाता है। धान के पौधे को हर तरह की जलवायु पसंद है। नेपाल और भूटान में 10 हजार फुट से ऊंचे पहाड़ हों, या केरल में समुद्रतल से भी 10 फुट नीचे पाताल-धान दोनों जगह लहराते हैं।जी ठीक ही पहचाना आपने। इसे धान, चावल, अक्षत, तंदुल किसी भी नाम से पुकारिये। जब तक बताशों के साथ खील न हो तो दिवाली कैसी? पूजा की थाली में अक्षत यानी चावल के दाने और रोली का लाल रंग न हो तो पूजा बेरंग। भुनने के बाद ऐसा खिलता है कि भुने धान की खील या मुरमुरों के लड्डू या चना-मुरमुरे भला किसे नहीं लुभाते। झोपड़ी से लेकर आलीशान होटलों तक हर जगह दुनिया में धान की मांग है। एशिया के दो सौ करोड़ से ज्यादा लोगों की जान है धान। उधर अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में भी करोड़ों लोग चावल खाते हैं। और फिर यूरोप, अमेरिका में भी तो इस अनाज ने अपनी जगह बना ली है। धरती का हर तीसरा व्यक्ति किसी न किसी रूप में हर रोज चावल खाता है। एक सौ करोड़ से ज्यादा किसान धान की खेती से दूसरों का पेट भरते हैं और अपना पेट पालते हैं। कोई एक सौ से ज्यादा देशों में धान की खेती की जाती है। लेकिन दुनिया का 90 प्रतिशत धान एशिया में ही उगाया और खाया जाता है।

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    होशंगाबाद जिले की दुधी, मछवासा, ओल, कोरनी आदि सभी नदियां सतपुड़ा से निकली हैं। नाम भी बहुत अच्छे हैं। दुधी यानी दूध जैसा साफ पानी। इसे स्थानीय भाषा में दूधिया पानी कहते हैं। नरसिंहपुर जिले में शक्कर नदी है यानी शक्कर की तरह मीठा पानी। लेकिन अब ये सदानीरा नदियां बरसाती नाले में बदल गई हैं। बरसात में ही प्रकट होती है बाकी समय ग़ायब हो जाती हैं। दुधी कभी बारहमासी नदी थी। साल भर पानी रहता था। अब मार्च अप्रैल तक आते-आते दम तोड़ देती है।मध्य प्रदेश में हाल ही हुई तेज बारिश ने बाढ़ की स्थिति को विकराल बना दिया। नर्मदा पर बने बरगी बांध, तवा नदी पर बने तवा बांध व बारना नदी पर बने बारना बांध के गेट खोलने से कई गांव जलमग्न हो गए। कुछ जान-माल की हानि भी हुई। निचली बस्तियों के लोगों को अपने घरों से हटाकर राहत शिविरों में रखा गया। हरे-भरे खेत पानी में डूब गए। नेताओं ने हवाई दौरा कर बाढ़ क्षेत्रों का जायजा लिया। होशंगाबाद जिले में पिछले दिनों से हो लगातार बारिश से नदी-नालों का जलस्तर बढ़ गया। नर्मदा खतरे के निशान से ऊपर थी। पलकमती, मछवासा, दुधी, ओल आदि नदियां पूरे उफान पर रहीं। नरसिंहपुर की शक्कर, सींगरी, बारू रेवा, शेढ़ आदि में भी बाढ़ आ गई। इसी प्रकार हरदा जिले में गंजाल और कालीमाचक और अजनाल समेत 9 नदियां हैं। ये नदियां नर्मदा में आकर मिलती हैं। हरदा जिले में 21 से 24 अगस्त के बीच बाढ़ की स्थिति गंभीर हो गई।

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