Are you the publisher? Claim or contact us about this channel


Embed this content in your HTML

Search

Report adult content:

click to rate:

Account: (login)

More Channels


Channel Catalog


older | 1 | .... | 10 | 11 | (Page 12) | 13 | 14 | .... | 65 | newer

    0 0

    Source: 
    यू-ट्यूब
    भारत की सबसे महत्त्वपूर्ण नदी गंगा, जो भारत और बांग्लादेश तक 2,510 किमी की दूरी में उत्तराखंड के गंगोत्री से लेकर बंगाल की खाड़ी के सुंदरवन तक विशाल भू भाग को सींचती है, गंगा देश की प्राकृतिक संपदा ही नहीं, जन जन की भावनात्मक आस्था का आधार भी है।
    इस खबर के स्रोत का लिंक: 

    http://www.youtube.com

    read more


    0 0

    Author: 
    राजेश कुमार व्यास
    Source: 
    जनसत्ता (रविवारी), 08 सितंबर 2013
    अमृतलाल वेगड़ की नर्मदा परिक्रमा एक तरह से उनकी कलायात्रा भी है। नदी-संस्कृति के तमाम रूप उनके चित्रों और रेखांकनों में मुखरित हुए हैं। साथ में लोकजीवन की दूसरी बहुतेरी छवियां भी उनके रचना संसार में रची-बसी हैं। उनके कलारूपों को कलमबद्ध कर रहे हैं राजेश कुमार व्यास।

    अमृतलाल वेगड़ ने नर्मदा की चार हजार से अधिक किलोमीटर की पदयात्रा की है। इस पदयात्रा में निर्जन वन, पहाड़, नदी के संगम गुफाओं, चट्टानों, आदिवासियों, ग्रामीणों की संस्कृति को उन्होंने गहरे से छुआ। अनुभूत किया नर्मदाव्रती चित्रकार के रूप में तात्कालिक स्तर पर रेखाओं के जो जीवनानुभव उन्होंने उकेरे बाद में उनके आधार पर ही रंगीन पेपर कोलाजों में उन्हें अनूठे रूपाकर दिए। इन्हीं में उन्होंने नर्मदा की अपनी की पदयात्रा को फिर से एक प्रकार से जिया भी है।नर्मदा, अमृतलाल वेगड़ के लिए नदी नहीं, पूरी एक संस्कृति है। रेखाओं की सांगीतिक लय में वह नदी और उससे जुड़े संस्कारों,सभ्यता और जीवन से जुड़े तमाम दूसरे सरोकारों से हमारा अपनापा कराते हैं। उनके रेखाचित्रों और पेपर कोलाज में नदी मधुर गान करती हमें लुभाती है तो कभी चीखती-चिल्लाती अपनी पीड़ा भी बताती है। कभी नदी के मोड़ हमसे बतियाते अपने साथ चलने के लिए आमंत्रित करते हैं तो कभी तट के गांव और आदिवासी सभ्यता से जुड़े सरोकार औचक ही हममें बसने लगते हैं। उनके चित्र देखने के हमारे संस्कारों को एक तरह से संपन्न करते हैं। उनके चित्रों में नर्मदा नदी रूप में नहीं, संस्कृति के रूप में हममें जैसे प्रवेश करती है। चित्र देखते लगता है, नर्मदा नदी का अनथक यात्री हमें भी अपने साथ पद परिक्रमा करा रहा है। सम् और कृति के योग से बना है संस्कृति शब्द। संस्कृति इस अर्थ में सम्गति की द्योतक ही तो है।

    read more


    0 0

    Author: 
    आदित्य अवस्थी
    Source: 
    आदित्य अवस्थी की पुस्तक 'नीली दिल्ली प्यासी दिल्ली'
    दिल्ली के विभिन्न इलाकों में बनी बावड़ियों में से कई तो ऐसी हैं, जिन्हें बनवाए हुए 600 से 800 साल या उससे भी अधिक का समय गुजर चुका है। इनमें से कुछ तो अभी भी बची हुई हैं। हां, जिस संरक्षण और संवर्धन के इरादे से इनका निर्माण किया गया था, अब उनमें पानी नहीं रह गया है। उनका पानी आस-पास के विकास की बलि चढ़ गया। हालांकि इस विकास के बाद उनके आस-पास रहने आने वालों के लिए पानी उतना ही जरूरी है जितना कि सैकड़ों साल पहले यहां रहने वालों के लिए था। हां, तब उन्हें बोतलबंद मिनरल वाटर नहीं मिलता था, भले ही इन मिनरल वाटर की बोतलों में मिनरल के अलावा सब कुछ हो।दिल्ली के ज्ञात इतिहास में बावड़ी बनाने का काम इल्तुतमिश के शासन काल के दौरान शुरू किए जाने के ही प्रमाण हैं। दिल्ली में बावड़ी के विकास पर एक नजर डाली जाए तो कम-से-कम दो दर्जन बावड़ियों का पता चलता है। इनका इस्तेमाल गुज़रे कल की दिल्ली और दिल्लीवालों ने अपने जीवन की सबसे प्रमुख जरूरत पानी की आवश्यकता को पूरा करने के लिए किया। ये बावड़ियां उस समय की दिल्ली के लगभग सभी हिस्सों में बनाई गई थीं। यहां यह याद रखना जरूरी है कि जब ये बावड़ियां बनाई जा रही थीं तब की दिल्ली मुख्य रूप से यमुना के पश्चिमी किनारे और रिज की पहाड़ियों के बीच ही हुआ करती थी। इस पुस्तक में शामिल की गई बावड़ियों की सूची को अंतिम नहीं कहा जा सकता। हो सकता है कि 1,000 साल से पुराने शहर में और भी बावड़ियां रही हों। शायद जो हों भी, वे भी विकास की भेंट चढ़ गई हों, अभी भी कूड़े-कचरे, मिट्टी से ढकी कहीं हों। उनके बारे में जानकारी आमतौर पर उपलब्ध नहीं है। इनका पता लगाकर उन्हें फिर बहाल किए जाने की आवश्यकता है। ऐसा किया जा पाना तकनीकी दृष्टि से संभव है और ऐसा भी किया जाना चाहिए।

    read more


    0 0

    एक दिन वे अपने कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति से मिलने गए, जो उन्हें बेहद स्नेह करते थे और यह सवाल उनके सामने रखा कि आखिर रासायनिक खेती में मैं कोर्इ गलती नहीं करता, विधि अनुसार खेती करता हूं, फिर क्यों उपज नहीं बढ़ती? उन्होंने जवाब दिया - रासायनिक खाद की मात्रा बढ़ाओ, उपज भी बढ़ेगी। पालेकर समझ गए कुलपति के पास उनके सवाल का जवाब नहीं है। पालेकर जी ने पूर्व में आदिवासियों के बीच एक शोध किया था । वे उनके बीच तीन सालों तक जाते रहे। जंगल की विविधता को देखा और उसका अध्ययन किया। वे यह सोचते रहे कि आखिर में कोर्इ रासायनिक खाद नहीं डालता और न ही सिंचार्इ करता, फिर जंगल हरा-भरा क्यों है?

    आज किसान, खेती और गांव अभूतपूर्व संकट के दौर से गुजर रहे हैं। हरित क्रांति के साथ आए संकर बीजों की चमक अब फीकी पड़ने लगी है। अब किसान अपने आपको ठगा सा महसूस कर रहे हैं। ज्यादा लागत और कम उपज ने उनकी कमर तोड़ दी है। नौबत यहां तक आ पहुंची है कि वे अपनी जान देने पर मजबूर हैं। लेकिन कृषि वैज्ञानिक सुभाष पालेकर ने आधुनिक रासायनिक कृषि पद्धति का विकल्प पेश कर रहे हैं, जिससे न केवल किसान अपनी खेती को सुधार सकते हैं बल्कि इससे उनकी खेती व गांव आत्मनिर्भर बन सकेंगे। सुभाष पालेकर खुद किसान परिवार से हैं। बचपन से खेती से गहरा लगाव रहा। कृषि की पढ़ार्इ करने के बाद फिर वे गांव की ओर लौट आए। खेती करने लगे, जो उनको हमेशा ही भाती थी। आज वे मशहूर कृषि वैज्ञानिक हैं, जिनकी अनूठी कृषि पद्धति की चर्चा देश-दुनिया में हो रही है। पिछले कुछ सालों से पालेकर जी ने एक अनूठा अभियान चलाया हुआ है- जीरो बजट आध्यात्मिक खेती का। इस अभियान से प्रेरित होकर करीब 40 लाख किसान इस पद्धति से खेती कर रहे हैं।

    read more


    0 0

    Author: 
    सूर्यभानु गुप्त
    Source: 
    नवनीत हिंदी डाइजेस्ट, जून 2013
    जल ही जीवन हैआंखों में पड़े छाले, छालों से बहा पानी।
    इस दौर के सहरा में ढूंढ़े न मिला पानी।

    दुनिया ने कसौटी पर दिन-रात कसा पानी।
    बनवास से लौटा तो शोलों पे चला पानी।

    read more


    0 0

    स्वामीश्री ज्ञानस्वरूप सानंद (प्रो जी डी अग्रवाल जी) के गंगा अनशन के 101वें दिन पर मेरी ओर से गंगा निवेदन

    स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद जीतय अब हमको ही करना है
    हंसा तो तैयार अकेला
    जीवित सानंद गले लगायें
    या अर्थी पीछे रुदन गायें
    हरिद्वार से बोल रहा हूं, तय अब हमको...

    read more


    0 0

    Author: 
    शुभू पटवा
    Source: 
    जनसत्ता (रविवारी), 23 सितंबर 2013
    जल संचय की आधुनिक तकनीक अपनाने के बावजूद राजस्थान के थार मरुस्थल में पानी का संकट बरकरार है। जल संरक्षण की परंपरागत प्रणालियों की उपेक्षा की वजह से स्थिति और नाज़ुक होती जा रही है। इस कठिनाई से निजात पाने का सही तरीका क्या हो सकता है? बता रहे हैं शूभू पटवा।

    थार मरुस्थल में पानी के प्रति समाज का रिश्ता बड़ा ही आस्था भरा रहा है। पानी को श्रद्धा और पवित्रता के भाव से देखा जाता रहा है। इसीलिए पानी का उपयोग विलासिता के रूप में न होकर, जरूरत को पूरा करने के लिए ही होता रहा है। पानी को अमूल्य माना जाता रहा है। इसका कोई ‘मोल’ यहां कभी नहीं रहा। थार में यह परंपरा रही है कि यहां ‘दूध’ बेचना और ‘पूत’ बेचना एक ही बात मानी जाती है। इसी प्रकार पानी को ‘आबरू’ भी माना जाता है।बरसात के पानी को संचित करने के सैकड़ों वर्षों के परंपरागत तरीकों पर फिर से सोचा जाने लगा है। राजस्थान का थार मरुस्थलीय क्षेत्र में सदियों से जीवन रहा है। यहां औसतन 380 मिलीमीटर बारिश होती है। इस क्षेत्र में जैव विविधता भी अपार रही है। जहां राष्ट्रीय औसत बारह सौ मिलीमीटर माना गया है, वहीं राजस्थान में बारिश का यह औसत करीब 531 मिलीमीटर है। क्षेत्रफल की दृष्टि से राजस्थान समूचे देश में सबसे बड़ा राज्य है और इसका दो-तिहाई हिस्सा थार मरुस्थल का है। इसी थार मरुस्थल में जल संरक्षण की परंपरागत संरचनाएं काफी समृद्धशाली रही हैं। जब तक इनको समाज का संरक्षण मिलता रहा, तब तक इन संरचनाओं का बिगाड़ा न के बराबर हुआ और ज्यों-ज्यों शासन की दखलदारी बढ़ी, त्यों-त्यों समाज ने हाथ खींचना शुरू कर दिया और इस तरह वे संरचनाएं जो एक समय जीवन का आधार थीं, समाज की विमुखता के साथ ये ढांचें भी ध्वस्त होते गए या बेकार मान लिए गए।

    read more


    0 0

    आज़ादी के पहले बनारस में जलापूर्ति की पाइप लाइन भी आ गई थी और अस्सी के गंदे नाले को गंगा से जोड़े जाने के घटना पर मदनमोहन मालवीय ने विरोध भी जता दिया था। लेकिन आज़ादी से पहले गंगा व दूसरी नदियों के ज्यादातर शहरों में न जलापूर्ति के लिए कोई पाइप लाइन थी और न सीवर ढोकर ले जाने के लिए। नाले भी सिर्फ बारिश का ही पानी ढोते थे। पीने के पानी के लिए कुंए और हैंडपम्प ही ज्यादा थे। समृद्ध से समृद्ध परिवार भी मोटर से पानी नहीं खींचते थे। जैसे ही जलापूर्ति की लाइनें पहुंची, पानी और बिजली की खपत तेजी से बढ़ गई। इनके पीछे-पीछे फ्लश शौचालयों ने घरों में प्रवेश किया। राजस्व के लालच में सीवर पाइप लाइनें सरकारें ले आईं।

    देवालय से पहले शौचालय’ संबंधी नरेन्द्र मोदी के बयान से किस पार्टी को कितना नफा-नुकसान होगा, यह राजनैतिक विश्लेषकों के विश्लेषण का विषय है, लेकिन मैं कह सकता हूं कि यह बयान देकर जाने-अनजाने मोदी ने देवालयों और शौचालयों की जरूरत और प्रभाव पर एक गंभीर बहस का अवसर सुलभ करा दिया है, जिस पर चर्चा जरूरी है।

    देवालय बनाम शौचालय


    यूं देवालय और शौचालय की तुलना के पक्ष में आप कई तर्क पेश कर सकते हैं। कह सकते हैं कि देवालय और शौचालय... दोनों की श्रेष्ठता की पहली कसौटी स्वच्छता ही है। दोनों ही स्थान विशेष ध्यान की मांग करते हैं। देवालय गए बगैर काम चल सकता है, लेकिन शौचालय गए बगैर... कम से कम शहरी आबादी का तो बिल्कुल नहीं। देवालय अलग-अलग संप्रदायों का विषय है, शौचालय प्रत्येक नागरिक का। अतः यह ज्यादा महत्वपूर्ण है। कोई कह सकता है कि देव तो सर्वव्यापी हैं। इस दृष्टि से यह पूरी दुनिया ही देवालय है। आस्था मन का विषय है, मंदिर का नहीं; तो देवालयों की क्या जरूरत?

    read more


    0 0

    Author: 
    आशीष सागर दीक्षित
    इस योजना के अंर्तगत केंद्र सरकार से 90 प्रतिशत और राज्य सरकार से 10 प्रतिशत अनुदान शामिल है। यह योजना 8.6 अरब रुपए की है। बांदा, महोबा, हमीरपुर के 112 गांव के किसानों की कृषि भूमि को अधिग्रहित किया जाना है। अब तक 223 किसानों की जमीनें आपसी सहमति से ली जा चुकीं हैं। कुल 30 हजार 0.56 हेक्टेयर भूमि अधिग्रहित की जाएगी। इस लिंक परियोजना को महोबा की धसान नदी से जोड़कर 38.60 किमी लंबी नहर लहचुरा डैम जिसकी क्षमता 73.60 क्यूमिक वाटर कैपसिटी की है को अर्जुन बांध से जोड़ा जाएगा।बांदा। भूमि अधिग्रहण की अधिसूचना भी जारी नहीं हुई और बुंदेलखंड की महत्वपूर्ण अर्जुन बांध परियोजना में करीब 10 हजार किसानों को उजाड़ने का खाका तैयार कर लिया गया। परियोजना के अंतर्गत डूब क्षेत्र से प्रभावित किसानों के लिए अभी शासन ने पुनर्वास नीति निर्धारित नहीं की और जिलास्तरीय समिति के द्वारा आपसी सहमति से सर्किल रेट के मुताबिक 112 गांव की भूमि इस योजना की जद में हैं। अर्जुन सहायक बांध परियोजना पर एक पड़ताल....

    बुंदेलखंड में नदी बांध परियोजना हमेशा ही विवादों के घेरे में रहीं हैं। फिर चाहे केन-बेतवा लिंक परियोजना हो या अर्जुन बांध परियोजना। एशिया के सर्वाधिक बांधों वाले क्षेत्र में एक के बाद एक नदी बांध परियोजनाएं केंद्र सरकार के एजेंडे में शामिल होती हैं और हाशिए पर चली जाती है।

    read more


    0 0

    दुर्गापूजा प. बंगाल का पर्व है। वाराणसी, फैजाबाद, इलाहाबाद, कानपुर आदि कुछ चुनिंदा शहरों में कुछ बंगाली परिवारों के रहने के कारण यह पर्व अवश्य काफी लंबे समय से इस समुदाय विशेष द्वारा मनाया जाता है। जिस तरह महाराष्ट्र में गणपति पूजा, गुजरात से डांडिया छाता जा रहा है उसी तरह बंगाल से निकल कर दुर्गापूजा भी अब पूरे भारत का उत्सव बन गया है। यह भारतीय संस्कृति का एक अच्छा गुण ही है। लेकिन इससे मूर्ति विसर्जन की संख्या व चमक-दमक में जितनी तेजी से वृद्धि हो रही है, उसे देखते हुए अब जरूरी है कि मूर्तियों को प्राकृतिक बनाने और मूर्तियों के विसर्जन से नदियों की प्रकृति बचाने का यह आदेश अब और आगे बढ़ें। इसी से हमारी आस्था भी बचेगी और नदियां भी।इलाहाबाद नगरीय दुर्गा पूजा प्रतिमाओं को इस वर्ष गंगा-यमुना में मूर्ति विसर्जन की छूट के हाईकोर्ट के आदेश से भले ही स्थानीय बारवड़ियों को राहत महसूस हो रही हो, लेकिन यह राहत की बात है नहीं। गंगा और यमुना को प्रदूषित करने का जितना बड़ा कलंक खासकर उत्तर प्रदेश के माथे पर पहले से ही है, इसे देखते हुए तो कतई नहीं। इलाहाबाद की गंगा-यमुना में प्रतिमा विसर्जन पर एक वर्ष पहले 2012 में लगी इस रोक को लेकर इलाहाबाद प्रशासन व उत्तर प्रदेश शासन ने पिछले एक वर्ष के दौरान जो उपेक्षित भाव प्रदर्शित किया है, वह तो कतई राहत देने वाला नहीं है। आदेश के इस उजले पक्ष को देखते हुए भी गंगा-यमुना के धर्म समाज ने आस्था पर चोट का जो तर्क पेश किया है; राहत की बात यह भी नहीं है।

    प्रशासन ने लगातार की मूल आदेश की अनदेखी


    उल्लेखनीय है कि इको ग्लोबल ऑर्गेनाइजेशन (याचिका संख्या-41310) ने वर्ष 2010 में यमुना के सरस्वती घाट पर मूर्ति विसर्जन पर रोक का अनुरोध किया था।

    read more


    0 0

    Author: 
    राजीव चन्देल

    किसानों, मज़दूरों ने झूठे विकास को एक स्वर से नकार दिया


    राज्य सरकार, प्रशासन, जनता के प्रतिनिधि, सरकारी दलाल व ठेकेदार यह कहते नहीं थकते कि किसानों ने तो स्वयं ही मुआवजा लिया। किसानों ने अपनी ज़मीन छोड़ी। गांव से हट गए। लेकिन जिला प्रशासन क्या इस बात का वास्तविक प्रमाण दे सकता है कि किसानों ने अपनी सहमति, समझ से ज़मीन दी और मुआवजा लिया, सिवाय प्रशासन के इस दावे के कि कुछ किसानों ने करार पत्र पर हस्ताक्षर किया है और उन्होंने मुआवज़े का चेक प्राप्त कर लिया है। क्या एसडीएम व लेखपाल द्वारा फार्म नम्बर 11 करार पत्र पर हस्ताक्षर होना किसानों की सहमति का आधार है?इलाहाबाद के किसानों व मज़दूरों ने यमुनापार में स्थापित होने जा रहे तीन दैत्याकार ताप विद्युत घरों को सर्वसम्मति से नकारकर निर्णायक संघर्ष प्रारंभ कर दिया है। किसानों द्वारा जोरदार आन्दोलन व न्याय की फरियाद पर करछना में जहां हाईकोर्ट ने भूमि अधिग्रहण रद्द कर दिया है, वहीं मेजा तहसील के कोहड़ार में एनटीपीसी का दृढ़ता के साथ विरोध किया जा रहा है। मेजा ऊर्जा निगम प्रा.लि. (संयुक्त उपक्रम एनटीपीसी) के नाम से लग रही इस ताप विद्युत उत्पादक कंपनी के खिलाफ भी बड़ा आन्दोलन शुरू हो गया है। यहां पर प्रभावित सात ग्राम सभाओं ने सर्वसम्मति से विस्थापन विरोधी मंच गठित कर न केवल आन्दोलन का आगाज कर दिया है, बल्कि उन्होंने अपनी ज़मीन को अधिग्रहण से मुक्त करने का मजबूत दावा भी प्रस्तुत किया है। इनका आधार बन रहा है, उत्तर प्रदेश लैण्ड एक्यूजन (डिटरमिनेशन ऑफ कम्पंसेशन एण्ड डेक्लरेशन ऑफ अवार्ड बाई एग्रीमेंट) रूल्स 1997, जिसका कलेक्टर द्वारा खुलेआम उल्लंघन किया गया है।

    read more


    0 0

    Author: 
    सीत मिश्रा
    Source: 
    जनसत्ता (रविवारी), 13 अक्टूबर 2013
    भारत के कई राज्यों में अब भी मैला ढोने की प्रथा जारी है। दो बार कानून बनने और करोड़ों रुपए खर्च होने के बावजूद इस दिशा में पूरी सफलता नहीं मिल पाई। सर्वोच्च न्यायालय और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग भी इसे लेकर काफी चिंतित हैं। मामले की पड़ताल कर रही हैं सीत मिश्रा।

    सरकार ने तमाम आंदोलन और जनदबाव के बाद 1993 में एक कानून बनाकर सिर पर मैला प्रथा को खत्म करने की कोशिश की थी, लेकिन वह कानून नाकाफी सिद्ध हुआ। इसमें मैला ढोने के तरीकों को स्पष्ट नहीं किया गया था। उसमें केवल शुष्क शौचालयों को शामिल किया गया था। जबकि मैला साफ करने के कई और तरीके हैं, जो बेहद अमानवीय हैं। ओपेन ड्रेन, सेप्टिक टैंक में सफाई, रेलवे ट्रैक पर बिखरे मल को साफ करना, सीवर की सफाई करना वगैरह। 1993 में बने कानून के बेअसर होने की वजह से सरकार एक बार फिर जनदबाव के सामने झुकी।ऐसे समय में जब पूरी दुनिया में भारत एक महाशक्ति बनने की ओर बढ़ रहा है तब यह जानना कितना दुखद है कि देश में करीब डेढ़ लाख लोग अब भी सिर पर मैला ढोकर अपना गुजर-बसर कर रहे हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के मुताबिक इस प्रथा में लगे लोगों की संख्या इससे कहीं ज्यादा हैं। इस कुप्रथा को बनाए रखने में कई तरह की राजनीतिक और सामाजिक शक्तियां जिम्मेदार हैं। वैसे तो देश में कई राज्यों ने इस क्षेत्र में अच्छा काम भी किया है, लेकिन आठ से ज्यादा राज्य अभी भी इस शाप से मुक्त नहीं हो पाए हैं। सबसे ज्यादा खराब स्थिति हिंदी पट्टी के राज्यों की है। इसमें भी सबसे बड़ी आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में आज भी सबसे ज्यादा लोग मैला प्रथा में लगे हैं। केंद्र सरकार ने निर्मल भारत अभियान के तहत जो आंकड़े जारी किए हैं, उसके मुताबिक अकेले उत्तर प्रदेश में करीब डेढ़ लाख शुष्क शौचालय हैं। ये वे आंकड़े हैं जो स्वयं जिला प्रशासन ने सरकार को भेजे हैं। वे आंकड़े 2011 की जनगणना के आधार पर तैयार किए गए हैं।

    read more


    0 0

    परंपरागत तौर पर बनने वाली मूर्तियां मिट्टी, रूई, बांस की खप्पचियां और प्राकृतिक रंगों से बनाई जाती थी। आज इनकी जगह प्लास्टर ऑफ पेरिस, लोहे की सलाखों, पॉलीस्टर कपड़ों, प्लास्टिक, सिंथेटिक पेंट और कई अन्य सजावटी-दिखावटी सामानों ने ले ली है। मूर्तियों की बढ़ती संख्या और उन्हें ज्यादा से ज्यादा सुंदर दिखाने के लिहाज से ऐसा हुआ है। जल्दी सूखने की क्षमता के कारण प्लास्टिक ऑफ पेरिस इस्तेमाल बढ़ा है। प्लास्टर ऑफ पेरिस जिप्सम को 300 डिग्री फारनेहाइट पर गर्म करके बनाया जाता है।आम धारणा है कि मुख्य रूप से उद्योग, सीवेज और शहरी ठोस कचरा मिलकर हमारी नदियों को प्रदूषित करते हैं। प्रदूषण के दूसरों स्रोत कभी किसी बड़े प्रदूषण विरोधी आंदोलन का निशाना नहीं बने। समाज ने खेती में प्रयोग होने वाले रासायनिक उर्वरकों व कीटनाशकों को नदी के लिए कभी बड़ा खतरा नहीं माना। संस्कार व दूसरे धार्मिक कर्मकाण्डों में प्रयोग होने वाली सामग्रियों के कारण नदियों का कुछ नुकसान होने की बात का विरोध ही हुआ। देखने में यही लगता है कि धूप, दीप, कपूर, सिंदूर, रोली-मोली, माला, माचिस की छोटी सी तीली, और पूजा के शेष अवशेष मिलकर भी क्या नुकसान करेंगे इतनी बड़ी नदी का। इसी सोच के कारण हम अपनी आस्था को आगे पाते हैं और नदी की सेहत को पीछे। इसी बिना पर अभी हमारे कुछेक धर्माचार्यों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा मूर्ति विसर्जन पर लगाई रोक को उचित नहीं माना। हालांकि यह रोक देश में पहली नहीं है।

    read more


    0 0

    Author: 
    आशीष सागर दीक्षित
    जब मूर्ति नौवें दिन अपने अंतिम दिवस हवन के बाद स्थान से हटाई जाती है तो स्वतः ही देवी का परायण हो जाता है। इसके पश्चात वह मिट्टी है और यदि मिट्टी की वस्तु का मिट्टी में विसर्जन कर दिया जाए तो गलत क्या है? हिंदु धर्म में जल विसर्जन उनका किया जाता है जो अकाल मृत्यु मरे हों, जहरीले कीड़े ने काटा हो, जल कर मरा हो, अविवाहित हो, पाचक में मरा हो। मां दुर्गा और श्री गणेश महोत्सव में किया जाने वाला जल विसर्जन नदी की आस्था को प्रदूषित करने से अधिक कुछ भी नहीं है। बांदा। उच्च न्यायालय इलाहाबाद उत्तर प्रदेश के गंगा प्रदूषण बोर्ड की तरफ से दाखिल की गई जनहित याचिका संख्या 4003/2006 गंगा-यमुना में मूर्ति विसर्जन पर रोक से सकते में आई उत्तर प्रदेश सरकार और इलाहाबाद जिला प्रशासन के लिए नदी में मूर्ति विसर्जन गले की फांस बन गया। एक वर्ष पूर्व उच्च न्यायालय इलाहाबाद ने इसी याचिका पर आदेश पारित करते हुए इलाहाबाद जिला प्रशासन को जल विसर्जन के विकल्प तलाश करने की हिदायत दी थी। बावजूद इसके एक वर्ष तक ब्यूरोक्रेसी नींद में सोती रही और वर्ष 2013 के मां दुर्गा महोत्सव के बाद मूर्तियों के जल विसर्जन को लेकर न्यायालय में उसकी जवाबदेही को याचिका कर्ताओं ने कटघरे में खड़ा कर दिया।

    उच्च न्यायालय ने सख्त लहजे में इलाहाबाद जिला प्रशासन से कहा कि आप एक वर्ष तक सोते रहे तो अब सजा भी भुगतिए। कोर्ट के ये शब्द सुनकर प्रशासन से लेकर प्रदेश सरकार तक के प्रमुख सचिव के लिए मूर्तियों का विसर्जन मुद्दा बन गया।

    read more


    0 0

    Author: 
    आशीष सागर दीक्षित

    बुंदेलखंड के सभी जनपदों से सालाना बालू और पत्थर खनिज से 510 करोड़ रूपए राजस्व की वसूली होती है। सीएजी की रिपोर्ट 2011 पर नजर डाले तो 258 करोड़ रुपए सीधे राजस्व की चोरी की गई है। वहीं वन विभाग की लापरवाही से जारी की गई एनओसी के बल पर वर्ष 2009 से 2011 के मध्य जनपद महोबा, हमीरपुर, ललितपुर में परिवहन राजस्व वन विभाग को न दिए जाने के चलते सरकार को 3 अरब की राजस्व क्षति का ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ा है।

    सोनभद्र के खनिज विभाग की ओर से सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत मुहैया कराई गई जानकारी पर गौर करें तो यहां डोलो स्टोन, सैंड स्टोन बालू और मोरम के खनन और स्टोन क्रेसर प्लांटों के संचालन में अवैध खनन की पुष्टि हुई है। (केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, उच्चतम न्यायालय, उत्तर प्रदेश वन विभाग, उत्तर प्रदेश शासन, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और जिला प्रशासन की विभिन्न जांच रिपोर्ट में अवैध खनन, अवैध परिवहन और स्टोन क्रेसर प्लांटों के मानक विपरीत चलने का भी जिक्र होता रहता है।) खनन के गोरखधंधे में राज्य की सत्ता में काबिज समाजवादी पार्टी, मुख्य विपक्षी पार्टी बहुजन समाज पार्टी, अखिल भारतीय कांग्रेस पार्टी, भारतीय जनता पार्टी के कई वर्तमान विधायकों और सांसदों के साथ-साथ अनेक राजनेता और आपराधिक छवि के लोग शामिल हैं।

    read more


    0 0

    चंबल घाटी से जुड़े इटावा में बीहड़ के भ्रमण के दौरान करीब 20 से अधिक प्रजाति की अनगिनत तितलियां नजर आई हैं। इससे पहले इतनी ज्यादा संख्या में हाल के दिनों में कभी भी तितलियों को कहीं पर भी देखा नहीं गया है। इन रंगबिरंगी तितलियों को देख कर एक बात कही जा सकती है कि भले ही शहरी इलाकों को विकास पक्षियों के साथ कीट पंतगों को प्रभावित करे लेकिन बीहड़ इनका सबसे खास आशियाना है।जब हम छोटे थे तब रंग बिरंगी तितलियों को पकड़ने की जिद अपने मम्मी पापा से करते थे क्योंकि तितलियां हमको नजर आती थीं हमारी जिद को पूरा करने के लिए घर वाले कभी-कभी पकड़ कर देते भी इस बात को आज हमारे बड़े होने पर घर वाले अमूमन याद दिलाया करते हैं लेकिन आज हमारे बच्चे तितली को दिखाने की बात कहते हैं तो हमारे पास सिवाय इसके कोई जबाब नहीं होता है अब नहीं दिखतीं तितलियां।

    कभी रंग बिरंगी तितलियों को देखकर मन इनको पकड़ने के लिए लालायित हुआ करता था ऐसे में अगर कोई कहे कि हम दिखाएंगे सैकड़ों तितलियां। तो इस पर यकीन करना थोड़ा सा मुश्किल होगा लेकिन उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के बीहड़ों में अनगिनत तादाद में नजर आ रही कई प्रजाति की तितलियों ने लोगों के मन में एक खास किस्म का कौतूहल पैदा कर दिया।

    read more


    0 0

    पहले नदियों में बच्चे अपने अभिभावकों के साथ नहाने आते थे तो रेत में घंटों खेलते थे। रेत का घर बनाते थे, तरह-तरह की आकृतियां बनाते थे। पानी में खेलते थे, तैरना सीखते थे और नदी किनारे लगे बेर और फलदार वृक्षों के फल तोड़कर खाते थे और मजे करते थे। अब बच्चों से यह सब छिन गया है। जहां जल है, वहां जीवन है। यहां बड़ी संख्या में पक्षी भी पानी पीने आते थे। आसमान में रंग-बिरंगे पक्षी दल उड़ते हुए हवाई जहाज की तरह उतरकर पानी पीते थे। नदी किनारे हरी दूब और पेड़ मोहते थे, अब वे भी नहीं हैं।नर्मदा की सहायक नदी दुधी बारहमासी नदी थी लेकिन कुछ बरसों से बरसाती नदी बन गई है। गरमी आते ही जवाब देने लगती है। पहले इसके किनारे जन-जीवन की चहल-पहल हुआ करती थी अब उजाड़ और सूनापन रहता है। दुधी यानी दूधिया। दूध की तरह सफेद। मीठा निर्मल पानी। दुधी का उद्गम स्थल सतपुड़ा पहाड़ है। यह छिंदवाड़ा में पातालकोट के पास से निकलती है और खेराघाट के पास नर्मदा में मिलती है। मध्य प्रदेश के पूर्वी छोर पर यह नदी होशंगाबाद और नरसिंहपुर जिले को विभक्त करती है। नदी किनारे के गाँवों का इससे निस्तार चलता था। वे इसमें सामूहिक स्नान करते थे। जब गाँवों में हैंडपंप नहीं हुआ करते थे तब लोग इस नदी का पानी भी पीते थे। दीपावली के मौके पर लोग अपने गाय-बैल को नहलाते थे। कपड़े धोते थे और साफ-सफाई करते थे। तीज-त्योहार पर नदी में मेला जैसा माहौल होता था।

    read more


    0 0

    Author: 
    हिमांशु ठक्कर
    Source: 
    रोजगार समाचार, 13-19 जून 2013
    उत्तराखंड में पिछले एक दशक से सड़कों का निर्माण और विस्तार किया जा रहा है। इसके लिए भूवैज्ञानिक फॉल्ट लाइन, भूस्खलन के जोखिम को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है और विस्फोट के इस्तेमाल, वनों की कटाई, भूस्खलन के जोखिम पर कोई ध्यान दिए बगैर, उपयुक्त जलनिकासी संरचना के अभाव सहित विभिन्न सुरक्षा नियमों की अनदेखी की जा रही है। पिछले दशक में पर्यटन के तीव्र विस्तार में आपदा प्रबंधन के आधारभूत नियमों पर ध्यान नहीं दिया गया। 38,000 वर्ग कि.मी. से भी अधिक के दायरे में फैले हिमालयी क्षेत्र की पर्वतधाराओं, नदियों, वनों, हिमनदों और लोगों को प्रभावित करने वाली प्राकृतिक आपदा का जटिल होना लाज़िमी है। प्राकृतिक आपदाएं और इसके प्रभाव अक्सर एक साथ कई चीजों के घटने का परिणाम होती हैं। हाल में उत्तराखंड में आई आपदा उन मानव जनित कारणों को उजागर करती है जिसकी वजह से इस घटना का प्रभाव कई गुना बढ़ गया। उत्तराखंड कच्चे और नए पहाड़ों वाला राज्य है। यह क्षेत्र भारी वर्षा, बादल फटने, भूस्खलन, आकस्मिक बाढ़ और भूस्खलन से अक्सर प्रभावित होता रहता है। यहां के भूतत्व में काफी समस्याएं हैं। जलवायु परिवर्तन की वजह से बादल फटने और आकस्मिक बाढ़, हिमनद के फटने से बाढ़ (हाल में हुई आपदा में एक से अधिक जगहों पर इनकी आशंका लगा रही है जिसमें केदारनाथ, हेमकुंड साहिब और पिथौरागढ़ के ऊपर बहने वाली धाराएं शामिल हैं) सहित काफी तेज वर्षा के प्रभाव में वृद्धि हो रही है और इन सबके साथ भूस्खलन की घटनाएँ हो रही हैं।

    read more


    0 0

    Author: 
    विमल भाई
    Source: 
    माटू जनसंगठन
    लखवार बांध परियोजना ब्यासी बांध परियोजना से जुड़ी है जिसमें 86 मीटर ऊंचा बांध होगा और 2.7 कि.मी लम्बा सुरंग के द्वारा भूमिगत विद्युतगृह में 120 मेगावाट बिजली पैदा करने की बात कही गई है। इसमें कट्टा पत्थर के पास 86 मीटर उंचा बैराज भी बनाया जाएगा। ब्यासी परियोजना भी एक के बाद एक दूसरी बांध कंपनियों के हाथ में दी गई है किंतु अभी तक उसका भी कोई निश्चित नहीं हुई है। अब योजना आयोग लखवार बांध को वित्तीय निवेश की अनुमति देने के लिए विचार कर रहा है।‘‘जितनी गंगा की उतनी ही यमुना की बर्बादी हो” इस लक्ष्य में सरकारें लगातार आगे बढ़ रही है। दिल्ली में यमुना के नाले में तब्दील करने के बाद गंगा पर टिहरी बांध से हर क्षण 300 क्यूसेक पानी का दोहन और यमुना की ऊपरी स्वच्छ धारा को भी समाप्त करके वहीं से यमुना को नहरों, पाइपलाइनों में डालकर दिल्ली की गैर जरूरतों को पानी दिया जाए इसकी कवायद चालू है। दूसरी तरफ कोका कोला कम्पनी जिसने लोगों में प्यास जगाने का ठेका लिया है उसे भी उत्तराखंड सरकार ने न्यौता दे दिया। वो भी वहीं अपनी यूनिट चालू करेगी। राज्य सचिव का कहना है कि कम्पनी भूगर्भीय जल का दोहन करेगी। उद्योग मंत्रालय के प्रमुख सचिव ने आश्वासन दिया है कि कोका कोला को पानी की कमी नहीं होने दी जाएगी। चाहे हमे यमुना बैराज की जगह पास की दूसरी नहरों से पानी लाना पड़े। किंतु इस विषय में कोई विवाद नहीं होने दिया जाएगा। सचिव जी कोका कोला कंपनी की इस उदारता पर बड़े ही नम्र है कि कंपनी ने भूमि लागत में 25 प्रतिशत छूट लेने से इंकार कर दिया।

    read more


    0 0

    Author: 
    आशीष सागर दीक्षित
    किसानों के लिए प्रस्तावित बुंदेलखंड की 2 फ़सलों रबी और खरीफ के लिए क्रमशः 5690 एकड़, 1966 एकड़ ज़मीन सिंचित किए जाने का दावा किया गया है, लेकिन एक किसान नेता के नाम पर बने इस रसिन बांध की दूसरी तस्वीर कुछ और ही है। जो कैमरे की नजर से बच नहीं सकी। जब इस बांध की बुनियाद रखी जा रही थी तब से लेकर आज तक रह-रहकर किसानों की आवाजें मुआवज़े और पानी के विरोध स्वरों में चित्रकूट मंडल के जनपद में गूंजती रहती है। अभी भी कुछ किसान इस बांध के विरोध में जनपद चित्रकूट में आमरण अनशन पर बैठे हैं।चित्रकूट। बुंदेलखंड पैकेज के 7266 करोड़ रुपए के बंदरबांट की पोल यूं तो यहां बने चेकडेम और कुएं ही उजागर कर देते हैं, लेकिन पैकेज के इन रुपयों से किसानों की ज़मीन अधिग्रहण कर बनाए गए बांध से किसानों को सिंचाई के लिए पानी देने का दावा तक साकार नहीं हो सका। चित्रकूट जनपद के रसिन ग्राम पंचायत से लगे हुए करीब एक दर्जन मजरों के हजारों किसानों की कृषि ज़मीन औने-पौने दामों में सरकारी दम से छीनकर उनको सिंचाई के लिए पानी देने के सब्जबाग दिखाकर पैकेज के रुपयों से खेल किया गया।

    उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग के मातहत बने चौधरी चरण सिंह रसिन बांध परियोजना की कुल लागत 7635.80 लाख रुपया है, जिसमें बुंदेलखंड पैकेज के अंतर्गत 2280 लाख रुपए पैकेज का हिस्सा है, शेष अन्य धनराशि अन्य बांध परियोजनाओं के मद से खर्च की गई है। बांध की कुल लंबाई 260 किमी है और बांध की जलधारण क्षमता 16.23 मी. घनमीटर है।

    read more


older | 1 | .... | 10 | 11 | (Page 12) | 13 | 14 | .... | 65 | newer