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    source: 
    सीजीनेट स्वर और आदिवासी स्वर
    आप सभी सीजीनेट स्वर और आदिवासी स्वर के प्रयोग के बारे में जानते ही हैं जहां हम लोग मोबाइल फोन पर एक सामुदायिक रेडियो बनाने का प्रयोग कर रहे हैं |

    इस रेडियो में दूर दराज़ के इलाके में रहने वाले साथी ही अपने मोबाइल फोन से अपनी बात, अपने गीत रिकार्ड करते हैं | उन्ही सन्देश और गीतों को और साथी एडिट होने के बाद अपने अपने मोबाइल फोन पर सुनते हैं |

    सीजीनेट स्वर (cgnetswara.org) में साथी हिन्दी में और आदिवासी स्वर (adivasiswara.org) में गोंडी भाषा में संदेश और गीत रिकार्ड करते हैं |सीजीनेट स्वर पर आप 08050068000 पर सन्देश रिकार्ड कर और सुन सकते हैं | आदिवासी स्वर का नंबर 07411079272 है |

    इसी तरह स्वास्थय स्वर के प्रयोग में आप दूर दराज़ के जंगली इलाकों में रहने वाले पारंपरिक वैद्यों के ज्ञान को 07961907775/08602008111 पर एक मिस्ड काल देकर सुन सकते हैं | आप अपनी स्वास्थय की समस्याएँ भी रिकार्ड कर सकते हैं जिस पर ये वरिष्ठ वैद्य साथी अपनी राय देते हैं |

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    Author: 
    मधुकर मिश्र
    Source: 
    शुक्रवार पत्रिका, अप्रैल 2014
    अपने अस्तित्व के लिए जूझती छोटी-बड़ी नदियां तमाम कोशिशों के बावजूद चुनावी मुद्दा नहीं बन सकी हैं। नदियों की निर्मलता और अविरलता का दावा करने वाले वे लोग भी नदारद हैं, जो समय-समय पर खुद को भगीरथ बताते हुए अपनी राजनीति चमकाने की कोशिश करते हैं। नदियों की सुरक्षा के लिए उसकी जमीन को चिन्हित करने, रीवर-सीवर को अलग रखने, अविरल प्रवाह सुनिश्चित करने, अवैध उत्खनन और अतिक्रमण को लेकर किसी भी ठोस योजना का उल्लेख न करने पर कोई सवाल नहीं उठ रहे हैं।कुछ ही पार्टियों ने जीवनरेखा कही जाने वाली नदियों को अपने घोषणापत्रों में जिक्र करके कर्तव्य की इतिश्री की और कुछ ने इतना करने की जरूरत भी नहीं समझी है। कांग्रेस और भाजपा जैसे बड़े दलों ने भले ही अपने घोषणापत्रों में गंगा को प्रदूषण मुक्त करने और नदियों को जोड़ने की बात कही है लेकिन किसी ने भी नदियों के पुनर्जीवन की कारगर रणनीति का विस्तार से उल्लेख करना जरूरी नहीं समझा है।

    इन दोनों बड़ी पार्टियों के नेता भी नदियों के प्रदूषण पर चुनावी मंच से बोलना उचित नहीं समझ रहे हैं। राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण के सदस्य बी.डी. त्रिपाठी के मुताबिक, नदियों के प्रदूषण का मसला एक वोट बैंक में तब्दील नहीं हो सका है, इसलिए कोई बई राजनीतिक दल इसे प्रमुखता से अपने घोषणापत्र में जगह नहीं देना चाहता है। 1986 में बनारस के राजेंद्र प्रसाद घाट पर पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने गंगा कार्य योजना के प्रथम चरण का उद्घाटन किया था।

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    अनुशासित सिंचाई के लिए सरकार से अपेक्षा है कि आपादाकाल न हो तो वह मुफ्त बिजली और मुफ्त नहरी सिंचाई की सौगात देने से बचे। किस इलाके में भूजल आधारित खेती को बढ़ावा देना है? किस इलाके में नहरी सिंचाई कारगर होगी? किस इलाके में वर्षा आधारित खेती को बढ़ावा देना अनुकूल होगा? यह सब तय करने के लिए जरूरी है कि सिंचाई योजना राष्ट्रीय स्तर पर तय करने की बजाए जिलावार तय की जाए। साथ ही सरकार अनुशासित सिंचाई की तकनीक व कम सिंचाई की मांग करने वाले बीज व तौर-तरीकों के शोध व प्रयोग को बढ़ावा दे।

    वैज्ञानिक खेती और सिंचाई से मेरा मतलब देसी बीज, देसी खाद-पांस, रहट-चड़स छोड़कर बाजारू खेती या आधुनिक संयंत्रों को अपना लेना कतई नहीं है। वैज्ञानिक हो जाने का मतलब है खेती को ऐसे तौर-तरीके अपनाना, जिससे खेत की नमी और उर्वरता सुरक्षित रहे, उत्पादन अच्छा व स्वस्थ हो तथा मौजूद पानी की मात्रा, गुणवत्ता और मिट्टी के अनुसार फसल व बीज का चयन किया जाए। अनुशासित सिंचाई का मतलब है कि जितना पानी स्रोत से चले, उतना खेत तक पहुंचे। अनुशासित सिंचाई का मतलब यह भी है कि जितनी जरूरत हो, उससे अधिक सिंचाई न की जाए। यदि हम चाहते हैं कि ऐसा हो, तो निम्नलिखित कदमों को उठाकर देखना चाहिए:

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    Author: 
    आशीष कोठारी
    Source: 
    सर्वोदय प्रेस सर्विस, अप्रैल 2014
    प्रत्येक दल ने जलसंवर्धन को लेकर विकेंद्रीयकरण की बात कही है, लेकिन किसी ने भी यह नहीं कहा है कि इसे महाकाय परियोजनाओं की बनिस्बत प्राथमिकता दी जाएगी। सभी घोषणापत्रों में रिन्युवेबल ऊर्जा की बात की गई है। आप के घोषणापत्र में इस तरह स्रोतो को स्थानीय हाथों में सौंपने की बात है। सभी निर्माण क्षेत्र को बढ़ावा देने की बात कर रहे हैं। लेकिन बढ़ते शर्मनाक उपभोक्तावाद, खासकर अमीरों द्वारा एवं अनैतिक विज्ञापन पर सभी मौन हैं। किसी ने भी यह उल्लेख नहीं किया है कि खतरनाक प्लास्टिक और इलेक्ट्रानिक अपशिष्ट से कैसे मुक्ति पाई जाएगी।चुनावी घोषणापत्र इस बात की ओर इशारा करते हैं कि सत्ता में आने पर राजनीतिक दल क्या करना चाहते हैं। यह जरूरी नहीं है कि सत्ता में आने पर वे इस पर अमल करें, लेकिन इससे दल की मनस्थिति का भान होता है कि किस तरह जनता के हितों की रक्षा की जाएगी। इस लिहाज से आम आदमी पार्टी का घोषणापत्र कांग्रेस और भाजपा से कहीं आगे है, वैसे इसके कई बिंदुओं से निराशा भी होती है। इस वक्त भारत के सामने तीन प्रमुख चुनौतियां हैं, जिम्मेदार एवं जवाबदेह राजनीतिक शासन को हासिल करना, आर्थिक और सामाजिक कल्याण सुनिश्चित करना (विशेषकर ऐसे व्यापक वर्ग हेतु जो कि अभी भी गरीब है) और बिना पारिस्थितिकीय विध्वंस किए जीवन को जीने लायक बनाना। विकास के कई दशक पुराने मॉडल जिसमें कि पिछले दो दशकों का वैश्विक संस्करण भी शामिल है, इसे प्राप्त नहीं कर पाया है और इसने भारत को कमजोर ही किया है।

    शासन के स्तर पर भ्रष्टाचार एवं सार्वजनिक क्षेत्र में अकर्मण्यता अभी भी व्याप्त है, लोगों को सशक्त बनाने वाली स्वशासी संस्थाएं

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    Author: 
    रवि शंकर
    Source: 
    जनसत्ता (रविवारी), 27 अप्रैल 2014
    आज हमारे सामने विकास बनाम पर्यावरण का मुद्दा है और दोनों में से किसी को भी त्यागना संभव नहीं इसलिए समन्वित दृष्टिकोण के साथ वैश्विक हितों को साझा किया जाना चाहिए। यह ठीक है कि विकासशील देश चाहते थे कि उनको वह पूंजी और तकनीकी मिले ताकि वे पर्यावरण बचाने के साथ साथ अपने विकास को भी बनाए रख सकें। क्योंकि पर्यावरण की चिंताओं के बीच भी वे विकास को पर्यावरण के आगे क़ुर्बान करने के लिए तैयार नहीं थे और न होंगे।हाल में जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र की अंतर-सरकारी समिति ने भारी-भरकम रिपोर्ट जारी करते हुए यह आगाह किया है कि अगर दुनिया के देश गर्म होने वाली गैसों के प्रदूषण में कमी नहीं लाते तो ग्लोबल वार्मिंग से होने वाला नुकसान बेकाबू हो सकता है। ग्लोबल वार्मिंग से सिर्फ ग्लेशियर ही नहीं पिघल रहे, बल्कि इससे लोगों की खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य और रहन-सहन भी प्रभावित होने लगा है।

    रिपोर्ट में आहार सुरक्षा की तरफ विशेष ध्यान दिया गया है। पर्यावरण परिवर्तन के अंतर-सरकारी समिति (आईपीसीसी) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार अत्यधिक तापमान के कारण आने वाले समय में धान और मक्के की फसलों की बर्बादी का अंदेशा है। मछलियां बहुत बड़ी आबादी का आहार हैं। उन्हें भी क्षति होगी। बड़ी चुनौती है कि जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को कैसे कम किया जाए।

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    खेतिहर की क्षमता विकसित करने के लिए कार्यक्रमों का नियोजन किया। तय किया कि प्रबंधन परियोजना को चाक चौबंद कैसे किया जाए? बनाई अनुदान योजना। खड़ी की परियोजना इकाइयां। चयनित किए गांव। अपने खेत पर खुद काम करने वाले भूमालिक को ही बनाया लाभार्थी। हर गांव में बनाई स्थल क्रियान्वयन समिति। गठित किए जलोपयोग और उत्पादक समूह। महिलाओं के स्वयं सहायता समूह बनाए गए, ताकि आर्थिक कमजोरी ऊसर सुधार के काम में बाधा न बने।

    अमेठी को ले कर एक कहावत है- “जौ न होत अमेठी मा ऊसर, तौ अमेठी कय द इवहौ ते दूसर।’’यदि अमेठी में ऊसर न होता तो अमेठी का देवता कोई और होता। यह कहावत बताती है कि जमीन के ऊसर-बंजर होने का गवर्नेंस से क्या रिश्ता है। यह कहावत इस नतीजे की ओर संकेत है कि जमीन ऊसर हो तो परावलंबन की मजबूरी खुद-ब-खुद हाथ बांधे रखती है। इसी मजबूरी ने आजादी के बाद भी अमेठी के रजवाड़े को लोगों के मानस में राजा-रानी बनाए रखा।

    सरकारी और निजी प्रयासों से कुछ भूमि खेती योग्य हुई जरूर है; बावजूद इसके अमेठी का आज भी काफी बड़ा रकबा ऊसर-बंजर-टांड है। पूरे उत्तर प्रदेश को देखें तो ऐसी भूमि के रकबे का आंकड़ा कई लाख हेक्टेयर में है। हम चाहें तो इस पर बहस कर सकते हैं कि अच्छी-खासी उपजाऊ जमीन को ऊसर बनाने में कितना योगदान शासन-प्रशासन का है और कितना स्वयं खेत मालिकों का, लेकिन इस बात पर कोई बहस नहीं है कि ऐसी भूमि को सुधरना चाहिए।

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    Author: 
    प्रसून लतांत
    Source: 
    जनसत्ता (रविवारी), 27 अप्रैल 2014
    देश के कई हिस्सों में जल, जंगल और जमीन के अधिग्रहण के विरोध में आंदोलनकारी सक्रिय हैं। लेकिन सत्ता में बैठे लोग उन आवाजों की निरंतर अनसुनी कर रहे हैं। ऐसे में करोड़ों लोगों के विस्थापित और बेरोजगार होने का खतरा बढ़ गया है। जायजा ले रहे हैं प्रसून लतांत..
    विडंबना है कि देश के प्राकृतिक संसाधनों को लूटने वाले लोग एकजुट हैं और सत्ता में बैठे लोगों से उनकी गलबहियां है। ऐसे में वंचित वर्ग के लोगों को सरकार से अब कोई उम्मीद नहीं रह गई है। उनके सामने अब अपने हक के लिए आंदोलन के सिवा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा है। आजादी के बाद पिछले छह दशकों में देश के गरीब किसान, मजदूर, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक और घुमंतू जनजाति के लोगों के सामने रोजी-रोटी की समस्या विकराल हो गई है। अब वे अपने वजूद बचाने के लिए आंदोलन पर उतर आए हैं।पूरी दुनिया में जमीन और पानी को लेकर संघर्ष जारी है। एक तरफ बड़े-बड़े उद्योगपति-पूंजीपति हैं जो सारे साधनों-संसाधनों पर कुंडली मार कर बैठ जाना चाहते हैं। दूसरी तरफ छोटे किसान, भूमिहीन और वंचित समाज के लोग हैं, जो चाहते हैं कि भूमि पर उनको भी थोड़ा अधिकार मिले। जिससे वे देश, परिवार और समाज के लिए अन्न पैदा कर सकें। विडंबना है कि देश के प्राकृतिक संसाधनों को लूटने वाले लोग एकजुट हैं और सत्ता में बैठे लोगों से उनकी गलबहियां है।

    ऐसे में वंचित वर्ग के लोगों को सरकार से अब कोई उम्मीद नहीं रह गई है। उनके सामने अब अपने हक के लिए आंदोलन के सिवा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा है। आजादी के बाद पिछले छह दशकों में देश के गरीब किसान, मजदूर, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक और घुमंतू जनजाति के लोगों के सामने रोजी-रोटी की समस्या विकराल हो गई है। अब वे अपने वजूद बचाने के लिए आंदोलन पर उतर आए हैं। मीडिया और राजनीतिक दलों की निष्ठा भी अब गरीबों और वंचितों के हक को दिलाने में नहीं रह गई है।

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    Author: 
    कृष्ण गोपाल 'व्यास’
    गंगा नदी के प्रारंभिक जलमार्ग में अनेक बाँधों के निर्माण के कारण जलग्रहण क्षेत्र से परिवहित मलबा, आर्गनिक कचरा तथा पानी में घुले रसायन बाँधों में जमा होने लगा है जिसके कारण बाँधों के पानी के प्रदूषित होने तथा जलीय जीव-जंतुओं और वनस्पतियों पर पर्यावरणीय खतरों के बढ़ने की संभावना बढ़ रही है। बाढ़ के गाद युक्त पानी के साथ बह कर आने वाले कार्बनिक पदार्थों और बाँधों के पानी में पनपने वाली वनस्पतियों के आक्सीजनविहीन वातावरण में सड़ने के कारण मीथेन गैस बन रही है।गंगा, अनादिकाल से स्वच्छ जल का अमूल्य स्रोत और प्राकृतिक जलचक्र का अभिन्न अंग रही है। उसने अपनी उत्पत्ति से लेकर आज तक, अपने जलग्रहण क्षेत्र पर बरसे पानी की सहायता से कछारी मिट्टी को काट कर भूआकृतियों का निर्माण कर रही है तथा मुक्त हुई मिट्टी इत्यादि को बंगाल की खाड़ी में जमा कर रही है। उसने लाखों साल से वर्षाजल, ग्लेशियरों के पिघलने से प्राप्त सतही जल तथा भूमिगत जल के घटकों के बीच संतुलन रख, सभ्यता के विकास को सम्बल प्रदान कर सामाजिक तथा आर्थिक कर्तव्यों का पालन किया है। वह, कछार की जीवंत जैविक विविधता का आधार है।

    कहा जा सकता है कि भारत में, मानव सभ्यता के विकास की कहानी, काफी हद तक गंगा के पानी के उपयोग की कहानी है।

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    2 मई-अक्षय तृतीया पर विशेष


    यदि मौसम विभाग ने सूखे की चेतावनी दी है, तो उसका आना तय मानकर उसकी अगवानी की तैयारी करें। तैयारी सात मोर्चों पर करनी है: पानी, अनाज, चारा, ईंधन, खेती, बाजार और सेहत। यदि हमारे पास प्रथम चार का अगले साल का पर्याप्त भंडारण है तो न किसी की ओर ताकने की जरूरत पड़ेगी और न ही आत्महत्या के हादसे होंगे। खेती, बाजार और सेहत ऐसे मोर्चे हैं, जिन पर महज् कुछ एहतियात की काफी होंगे।

    इन्द्र देवता ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी है। अगले आषाढ़-सावन-भादों में वे कहीं देर से आएंगे; कहीं नहीं आएंगे; कहीं उनके आने की आवृति, चमक और धमक वैसी नहीं रहेगी, जिसके लिए वे जाने जाते हैं। हो सकता है कि वह किसी जगह इतनी देर ठहर जाएं कि 2005 की मुंबई और 2006 का सूरत बाढ़ प्रकरण याद दिला दें। इस विज्ञप्ति के एक हिस्से पर मौसम विभाग ने अपनी मोहर लगा दी है; कहा है कि वर्ष-2014 का मानसून औसत से पांच फीसदी कमजोर रहेगा। शेष हिस्से पर मोहर लगाने का काम अमेरिका की स्टेनफार्ड यूनिवर्सिटी ने कर दिया है।

    पिछले 60 साल के आंकड़ों के आधार पर प्रस्तुत शोध के मुताबिक दक्षिण एशिया में अत्यधिक बाढ़ और सूखे की तीव्रता लगातार बढ़ रही है। ताप और नमी में बदलाव के कारण ऐसा हो रहा है। यह बदलाव ठोस और स्थाई है। इसका सबसे ज्यादा प्रभाव भारत के मध्य क्षेत्र में होने की आशंका व्यक्त की गई है। बुनियादी प्रश्न यह है कि हम क्या करें? इन्द्र देवता की विज्ञप्ति सुनें, तद्नुसार कुछ गुनें, उनकी अगवानी की तैयारी करें या फिर इंतजार करें?

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    Author: 
    ਗੁਰਪ੍ਰੀਤ ਦਬੜੀਖਾਨਾ

    ਕਿਸਾਨ ਵੀਰੋ ਕਣਕ ਦੀ ਫ਼ਸਲ ਨੂੰ ਪੀਲੀ ਕੂੰਗੀ ਅਤੇ ਚੇਪਾ ਅਕਸਰ ਹੀ ਬੁਰੀ ਤਰਾ ਪ੍ਰਭਾਵਿਤ ਕਰਦੇ ਹਨ। ਕਣਕ ਦੀ ਫ਼ਸਲ ਉੱਤੇ ਪੀਲੀ ਕੂੰਗੀ ਅਤੇ ਚੇਪੇ ਦੇ ਤੀਬਰ ਹਮਲੇ ਕਾਰਣ ਕਿਸਾਨ ਲਈ ਇਹਨਾਂ ਦੀ ਰੋਕਥਾਮ ਲਾਜ਼ਮੀ ਹੋ ਜਾਂਦੀ ਹੈ। ਸਮੱਸਿਆ ਤੋਂ ਛੁਟਕਾਰਾ ਪਾਉਣ ਲਈ ਕਿਸਾਨ ਮਹਿੰਗੀਆਂ ਤੋਂ ਮਹਿੰਗੀਆਂ ਕੀਟ ਅਤੇ ਉੱਲੀਨਾਸ਼ਕ ਜ਼ਹਿਰਾਂ ਦਾ ਇਸਤੇਮਾਲ ਕਰਦਾ ਹੈ। ਨਤੀਜੇ ਵਜੋਂ ਖੇਤੀ ਲਾਗਤਾਂ ਵਧਣ ਦੇ ਨਾਲ-ਨਾਲ ਕਣਕ ਦੀ ਗੁਣਵੱਤਾ ਉੱਤੇ ਵੀ ਮਾੜਾ ਅਸਰ ਪੈਂਦਾ ਹੈ। ਕਣਕ ਅੰਦਰ ਵੱਡੀ ਮਾਤਰਾ 'ਚ ਜ਼ਹਿਰੀਲੇ ਮਾਦੇ ਸਮਾ ਜਾਂਦੇ ਹਨ। ਦੂਜੇ ਸ਼ਬਦਾਂ 'ਚ ਕਿਹਾ ਜਾਵੇ ਤਾਂ ਇਹ ਵਰਤਾਰਾ ਜਿੱਥੇ ਇੱਕ ਪਾਸੇ ਕਿਸਾਨਾਂ ਦੀ ਆਰਥਿਕਤਾ ਨੂੰ ਵੱਡਾ ਖੋਰਾ ਲਾ ਰਿਹਾ ਹੈ ਉੱਥੇ ਹੀ ਸਾਡੀ ਭੋਜਨ ਲੜੀ 'ਚ ਜ਼ਹਿਰ ਭਰ ਕੇ ਲੋਕਾਂ ਦੀ ਸਿਹਤ ਨੂੰ ਵੀ ਖਰਾਬ ਕਰ ਰਿਹਾ ਹੈ।
    ਇਸ ਲੇਖ ਰਾਹੀਂ ਅਸੀਂ ਕਣਕ ਦੀ ਫ਼ਸਲ ਵਿੱਚ ਪੀਲੀ ਕੂੰਗੀ ਅਤੇ ਚੇਪੇ ਦੀ ਆਮਦ, ਆਮਦ ਦੇ ਕਾਰਣ ਅਤੇ ਇਲਾਜ਼ ਬਾਰੇ ਵਿਸਥਾਰ ਸਹਿਤ ਵਿਚਾਰ ਕਰਾਂਗੇ। ਇੱਥੇ ਇਹ ਜ਼ਿਕਰਯੋਗ ਹੈ ਕਿ ਕਣਕ ਨੂੰ ਆਧਾਰ ਬਣਾ ਕੇ ਲਿਖੇ ਗਏ ਇਸ ਲੇਖ ਵਿਚਲੀ ਜਾਣਕਾਰੀ ਸਾਡੀਆਂ ਸਮੁੱਚੀਆਂ ਫ਼ਸਲਾਂ 'ਤੇ ਲਾਗੂ ਹੁੰਦੀ ਹੈ।
    ਕਿਸਾਨ ਵੀਰੋ ਅਸੀਂ ਅਕਸਰ ਹੀ ਫ਼ਸਲ ਉੱਤੇ ਕਿਸੇ ਬਿਮਾਰੀ ਜਾਂ ਕੀਟ ਦੀ ਆਮਦ ਉਪਰੰਤ ਉਸਦੇ ਪੁਖਤਾ ਇਲਾਜ਼ ਲਈ ਯਤਨਸ਼ੀਲ ਹੋ ਜਾਂਦੇ ਹਾਂ। ਪਰੰਤੂ ਇਸ ਦੌਰਾਨ ਅਸੀਂ ਕਦੇ ਵੀ ਫ਼ਸਲ ਉੱਤੇ ਸਬੰਧਤ ਕੀਟ ਜਾਂ ਰੋਗ ਦੀ ਆਮਦ ਦੇ ਕਾਰਣਾਂ ਉੱਤੇ ਗੌਰ ਨਹੀਂ ਕਰਦੇ। ਇਹ ਮੰਨੀ-ਪ੍ਰਮੰਨੀ ਸੱਚਾਈ ਹੈ ਕਿ ਕੁਦਰਤ ਵਿੱਚ ਕਿਸੇ ਵਰਤਾਰੇ ਦੇ ਵਾਪਰਨ ਲਈ ਮਾਹੌਲ, ਕਾਰਣ ਅਤੇ ਕਾਰਕ ਹੋਂਦ ਲਾਜ਼ਮੀ ਹੈ। ਇਹਨਾਂ ਤਿੰਨਾਂ ਦੀ ਅਣਹੋਂਦ ਵਿੱਚ ਕੋਈ ਵਰਤਾਰਾ ਨਹੀਂ ਵਾਪਰ ਸਕਦਾ। ਇਸਦਾ ਸਿੱਧਾ ਜਿਹਾ ਅਰਥ ਇਹ ਹੋਇਆ ਕਿ ਸਾਡੀ ਕਣਕ ਦੀ ਫ਼ਸਲ ਵਿੱਚ ਵੀ ਪੀਲੀ ਕੂੰਗੀ ਅਤੇ ਚੇਪੇ ਦੀ ਆਮਦ ਅਕਾਰਣ ਹੀ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦੀ। ਮਾਹੌਲ ਜਾਂ ਵਾਤਾਵਰਣ ਦੋ ਪ੍ਰਕਾਰ ਦਾ ਹੁੰਦਾ ਹੈ ਕੁਦਰਤੀ ਅਤੇ ਗ਼ੈਰ-ਕੁਦਰਤੀ। ਕੁਦਰਤੀ ਮਾਹੌਲ ਹਮੇਸ਼ਾ ਹੀ ਸਾਫ-ਸੁਥਰਾ ਅਤੇ ਸਿਹਤ ਭਰਪੂਰ ਹੁੰਦਾ ਹੈ। ਪਰੰਤੂ ਜਿਵੇਂ ਹੀ ਇਸ ਕੁਦਰਤੀ ਮਾਹੌਲ ਅੰਦਰ ਵੱਡੇ ਪੱਧਰ 'ਤੇ ਗ਼ੈਰ ਕੁਦਰਤੀ ਗਤੀਵਿਧੀਆਂ ਕੀਤੀਆਂ ਜਾਂਦੀਆਂ ਹਨ, ਕੁਦਰਤੀ ਮਾਹੌਲ ਖ਼ਰਾਬ ਹੋ ਕੇ ਗ਼ੈਰ ਕੁਦਰਤੀ ਮਾਹੌਲ 'ਚ ਤਬਦੀਲ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਕਣਕ ਦੀ ਖੇਤੀ ਵਿਚ ਸਾਡੇ ਵੱਲੋਂ ਨਿਰਮਤ ਗ਼ੈਰ ਕੁਦਰਤੀ ਮਾਹੌਲ ਹੀ ਕਣਕ ਦੀ ਫ਼ਸਲ 'ਚ ਪੀਲੀ ਕੂੰਗੀ ਅਤੇ ਚੇਪੇ ਵਰਗੀਆਂ ਸਮੱਸਿਆਵਾਂ ਨੂੰ ਜਨਮ ਦਿੰਦਾ ਹੈ।
    ਆਓ ਸਮਝੀਏ ਅਜਿਹਾ ਕਿਵੇਂ ਹੁੰਦਾ ਹੈ?

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  • 05/04/14--05:26: ਅਲਸੀ
  • Author: 
    ਡਾ. ਪੁਸ਼ਕਰਵੀਰ ਸਿੰਘ ਭਾਟੀਆ

    ਭਾਰਤ ਵਿੱਚ ਇਹ ਕਹਾਵਤ ਪ੍ਰਸਿੱਧ ਰਹੀ ਹੈ ਕਿ ਭੋਜਨ ਹੀ ਦਵਾਈ ਹੈ। ਸਾਡੇ ਦੇਸ਼ ਅੰਦਰ ਭੋਜਨ ਨੂੰ ਦਵਾਈ ਵਜੋਂ ਇਸਤੇਮਾਲ ਕਰਨ ਦੀ ਪਰੰਪਰਾ ਸਦੀਆਂ ਤੋਂ ਚੱਲੀ ਆ ਰਹੀ ਹੈ। ਪਰ ਅਜੋਕੀ ਭੱਜ-ਦੌੜ ਭਰੀ ਜਿੰਦਗੀ ਦੇ ਚਲਦਿਆਂ ਅਸੀਂ ਆਪਣੀ ਇਸ ਅਮੀਰ ਸਮਝ ਅਤੇ ਪਰੰਪਰਾਂ ਤੋਂ ਵਿਰਵੇ ਹੋ ਚੱਲੇ ਹਾਂ। ਅੱਜ ਅਸੀਂ ਅਲਸੀ ਬਾਰੇ ਗੱਲ ਕਰਾਂਗੇ।

    ਜਾਣ-ਪਛਾਣ: ਅਲਸੀ ਭਾਰਤ ਦੇ ਲਗਭਗ ਸਾਰੇ ਪ੍ਰਾਂਤਾਂ ਵਿੱਚ ਤੇਲ ਲਈ ਬੀਜੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ। ਇੱਕ ਸਮੇਂ ਭਾਰਤ ਵਿੱਚ ਅਲਸੀ ਦੇ ਪੌਦਿਆਂ ਨੂੰ ਗਲਾ-ਸੜਾ ਕੇ ਉਹਨਾਂ ਸਣ ਵਰਗਾ ਪਰ ਸਣ ਤੋਂ ਕਿਤੇ ਵਧ ਮੁਲਾਇਮ ਧਾਗਾ ਬਣਾਇਆ ਜਾਂਦਾ ਸੀ। ਭਾਰਤੀ ਜੁਲਾਹੇ ਉਸ ਧਾਗੇ ਤੋਂ ਉੱਤਮ ਕਿਸਮ ਦਾ ਕੱਪੜਾ ਤਿਆਰ ਕਰਦੇ ਸਨ। ਪਰ ਢਾਕੇ ਦੀ ਮਲਮਲ ਦੀ ਵਾਂਗੂੰ ਇਹ ਕਲਾ ਵੀ ਹੁਣ ਨਸ਼ਟ ਹੋ ਗਈ ਹੈ।
    ਬੀਜਣ ਦਾ ਸਮਾਂ: ਅਲਸੀ ਦੀ ਬਿਜਾਈ ਕਣਕ ਦੇ ਨਾਲ ਹੀ ਕੀਤੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ।
    ਗੁਣ ਧਰਮ: ਅਲਸੀ ਦਾ ਤੇਲ ਮਿੱਠਾ, ਵਾਤਨਾਸ਼ਕ, ਕਫ਼ਨਾਸ਼ਕ, ਚਮੜੀ ਦੋਸ਼ ਨਾਸ਼ਕ, ਮਦਹੋਸ਼ ਕਰਨ ਵਾਲੀ ਗੰਧ ਵਾਲਾ, ਕੁਸੈਲਾ ਅਤੇ ਭਾਰੀ ਹੁੰਦਾ ਹੈ।
    ਫ਼ਾਇਦੇ-
    *ਸਿਰ ਦਰਦ: ਅਲਸੀ ਦੇ ਬੀਜਾਂ ਨੂੰ ਠੰਢੇ ਪਾਣੀ ਵਿੱਚ ਪੀਸ ਕੇ ਮੱਥੇ ਉੱਪਰ ਲੇਪ ਕਰਨ ਨਾਲ ਸਿਰ ਦਰਦ ਠੀਕ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।
    *ਖਾਂਸੀ ਅਤੇ ਦਮਾ: ਖਾਂਸੀ ਅਤੇ ਦਮਾ ਹੋਣ 'ਤੇ ਅਲਸੀ ਦੇ 5 ਗ੍ਰਾਮ ਬੀਜ ਲੈ ਕੇ ਚਾਂਦੀ ਦੇ ਜਾਂ ਕੱਚ ਦੇ ਕਟੋਰੇ ਵਿੱਚ 40 ਮਿ.ਲੀ. ਪਾਣੀ ਪਾ ਕੇ 12 ਘੰਟੇ ਲਈ ਭਿਉਂ ਕੇ ਰੱਖੋ। 12 ਘੰਟੇ ਬਾਅਦ ਇਸਨੂੰ ਛਾਣ ਕੇ ਪੀ ਲਉ। ਇਸ ਨਾਲ ਰੋਗੀ ਨੂੰ ਬਹੁਤ ਸ਼ਾਂਤੀ ਮਿਲਦੀ ਹੈ।
    ਅਲਸੀ ਦੇ 5 ਗ੍ਰਾਮ ਬੀਜ ਲੈ ਕੇ 100 ਮਿਲੀ ਲੀਟਰ ਪਾਣੀ ਵਿੱਚ ਉਬਾਲ ਲਉ। 2 ਚਮਚ ਮਿਸ਼ਰੀ ਪਾ ਕੇ ਮਰੀਜ਼ ਨੂੰ ਪਿਲਾਉ। ਖਾਂਸੀ ਅਤੇ ਦਮੇ ਵਿੱਚ ਰਾਹਤ ਮਿਲੇਗੀ।
    *ਪੁਰਾਣਾ ਜ਼ੁਕਾਮ: ਅਲਸੀ ਦੇ ਬੀਜਾਂ ਨੂੰ ਹਲਕੀ ਗੰਧ ਆਉਣ ਤੱਕ ਤਵੇ ਉੱਪਰ ਭੁੰਨੋ। ਫਿਰ ਇਹਨਾਂ ਨੂੰ ਪੀਸ ਕੇ ਬਰਾਬਰ ਮਾਤਰਾ ਵਿੱਚ ਪਿਸੀ ਹੋਈ ਮਿਸ਼ਰੀ ਮਿਲਾ ਲਉ। 1 ਤੋਂ 4 ਚਮਚ ਗਰਮ ਪਾਣੀ ਨਾਲ ਸਵੇਰੇ-ਸ਼ਾਮ ਲੈਣ 'ਤੇ ਪੁਰਾਣੇ ਜ਼ਕਾਮ ਵਿੱਚ ਫ਼ਾਇਦਾ ਹੁੰਦਾ ਹੈ।
    *ਅਲਸੀ ਅਤੇ ਮੁਲੱਠੀ ਦੋਵੇਂ ਇੱਕ-ਇੱਕ ਮੁੱਠੀ ਲੈ ਕੇ 16 ਗੁਣਾ ਪਾਣੀ ਵਿੱਚ ਪਾ ਕੇ ਇੱਕ ਘੰਟੇ ਲਈ ਰੱਖ ਦਿਉ। ਫਿਰ ਹਰ ਇੱਕ ਘੰਟੇ ਬਾਅਦ 4-4 ਚਮਚ ਲੈਂਦੇ ਰਹੋ। ਪ੍ਰੈਗਨੈਂਸੀ ਦੇ ਪਹਿਲੇ ਹਫ਼ਤੇ ਵਿੱਚ ਹੋਣ ਵਾਲੀਆਂ ਉਲਟੀਆਂ ਤੋਂ ਆਰਾਮ ਮਿਲਦਾ ਹੈ। ਪੇਸ਼ਾਬ ਦੀ ਜਲਨ ਦੂਰ ਹੁੰਦੀ ਹੈ। ਪੇਸ਼ਾਬ ਖੁੱਲ ਕੇ ਆਉਂਦਾ ਹੈ। ਫੇਫੜਿਆਂ ਦੀ ਸੋਜਿਸ਼ ਦੂਰ ਹੁੰਦੀ ਹੈ।

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  • 05/06/14--02:01: ਜਲ ਥਲ ਮਲ
  • Author: 
    ਸੋਪਾਨ ਜੋਸ਼ੀ

    ਵਿਅੰਗ ਨਾਲ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਤੁਸੀਂ ਸ਼ਾਇਦ ਪੜਿਆ ਵੀ ਹੋਵੇ ਕਿ ਭਾਰਤ ਵਿੱਚ ਟਾਇਲਟ ਤੋਂ ਜ਼ਿਆਦਾ ਮੋਬਾਇਲ ਫ਼ੋਨ ਹਨ। ਜੇਕਰ ਭਾਰਤ ਵਿੱਚ ਹਰ ਵਿਅਕਤੀ ਦੇ ਕੋਲ ਮਲ ਤਿਆਗਣ ਦੇ ਲਈ ਟਾਇਲਟ ਹੋਵੇ ਤਾਂ ਕਿਵੇਂ ਰਹੇ? ਲੱਖਾਂ ਲੋਕ ਸ਼ਹਿਰਾਂ ਅਤੇ ਕਸਬਿਆਂ ਵਿੱਚ ਪੇਸ਼ਾਬ ਜਾਣ ਲਈ ਜਗਾ ਲੱਭਦੇ ਹਨ ਅਤੇ ਮਲ ਦੇ ਨਾਲ ਵੱਕਾਰ ਵੀ ਤਿਆਗਣਾ ਪੈਂਦਾ ਹੈ। ਔਰਤਾਂ ਜੋ ਕਠਿਨਾਈ ਝੱਲਦੀਆਂ ਹਨ ਉਸਨੂੰ ਤਾਂ ਦੱਸਣਾ ਵੀ ਮੁਸ਼ਕਿਲ ਹੈ। ਸ਼ਰਮਸਾਰ ਤਾਂ ਉਹ ਵੀ ਹੁੰਦੇ ਹਨ ਜਿੰਨਾਂ ਨੂੰ ਦੂਸਰਿਆਂ ਨੂੰ ਖੁੱਲੇ ਵਿੱਚ ਪੇਸ਼ਾਬ ਕਰਦਿਆਂ ਦੇਖਣਾ ਪੈਂਦਾ ਹੈ। ਤਾਂ ਕਿੰਨਾ ਵਧੀਆ ਹੋਵੇ ਕਿ ਹਰ ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਟਾਇਲਟ ਮਿਲੇ। ਅਜਿਹਾ ਕਰਨ ਦੇ ਲਈ ਕਈ ਲੋਕਾਂ ਨੇ ਬੜੀ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਕੀਤੀ ਹੈ, ਜਿਵੇਂ ਗੁਜਰਾਤ ਵਿੱਚ ਈਸ਼ਵਰ ਭਾਈ ਪਟੇਲ ਦਾ ਬਣਾਇਆ ਸਫ਼ਾਈ ਸਕੂਲ ਅਤੇ ਬਿੰਦੇਸ਼ਵਰੀ ਪਾਠਕ ਦੇ ਸੁਲਭ ਸ਼ੌਚਾਲਿਆ।

    ਪਰ ਜੇਕਰ ਹਰ ਭਾਰਤੀ ਦੇ ਕੋਲ ਟਾਇਲਟ ਹੋਵੇ ਤਾਂ ਬਹੁਤ ਬੁਰਾ ਹੋਵੇਗਾ। ਸਾਡੇ ਸਾਰੇ ਜਲ ਸ੍ਰੋਤ- ਨਦੀਆਂ ਅਤੇ ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਮੁਹਾਨੇ, ਛੋਟੇ-ਵੱਡੇ ਤਲਾਬ, ਜੋ ਪਹਿਲਾਂ ਤੋਂ ਹੀ ਬੁਰੀ ਤਰਾ ਦੂਸ਼ਿਤ ਹਨ- ਪੂਰੀ ਤਰਾ ਤਬਾਹ ਹੋ ਜਾਣਗੀਆਂ। ਅੱਜ ਤਾਂ ਕੇਵਲ ਇੱਕ ਤਿਹਾਈ ਭਾਰਤੀਆਂ ਦੇ ਕੋਲ ਹੀ ਟਾਇਲਟ ਦੀ ਸੁਵਿਧਾ ਹੈ। ਇਹਨਾਂ ਤੋਂ ਹੀ ਜਿੰਨਾਂ ਮੈਲਾ ਪਾਣੀ ਗਟਰ ਵਿੱਚ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਉਸਨੂੰ ਸਾਫ਼ ਕਰਨ ਦੀ ਵਿਵਸਥਾ ਸਾਡੇ ਕੋਲ ਨਹੀ ਹੈ। ਨਤੀਜਾ ਤੁਸੀਂ ਕਿਸੇ ਵੀ ਨਦੀ ਵਿੱਚ ਦੇਖ ਸਕਦੇ ਹੋ। ਜਿੰਨਾਂ ਵੱਡਾ ਸ਼ਹਿਰ ਓਨੇ ਹੀ ਜ਼ਿਆਦਾ ਟਾਇਲਟ ਅਤੇ ਓਨੀਆਂ ਹੀ ਦੂਸ਼ਿਤ ਨਦੀਆਂ। ਦਿੱਲੀ ਵਿੱਚ ਯਮੁਨਾ ਹੋਵੇ ਚਾਹੇ ਬਨਾਰਸ ਵਿੱਚ ਗੰਗਾ। ਜੋ ਨਦੀਆਂ ਸਾਡੀ ਮਾਨਤਾ ਵਿੱਚ ਪਵਿੱਤਰ ਹਨ ਉਹ ਅਸਲ ਵਿੱਚ ਗਟਰ ਬਣ ਚੁੱਕੀਆਂ ਹਨ। ਸਰਕਾਰਾਂ ਨੇ ਦਿੱਲੀ ਅਤੇ ਬਨਾਰਸ ਜਿਹੇ ਸ਼ਹਿਰਾਂ ਵਿੱਚ ਅਰਬਾਂ ਰੁਪਏ ਖਰਚ ਕਰਕੇ ਮੈਲਾ ਪਾਣੀ ਸਾਫ਼ ਕਰਨ ਦੇ ਸੰਯੰਤ੍ਰ ਬਣਾਏ ਹਨ ਜੋ ਸੀਵਰੇਜ ਟ੍ਰੀਟਮੈਂਟ ਪਲਾਂਟ ਕਹਾਉਂਦੇ ਹਨ। ਇਹ ਸਭ ਸੰਯੰਤ੍ਰ ਦਿੱਲੀ ਜਿਹੇ ਸੱਤਾ ਦੇ ਅੱਡੇ ਵਿੱਚ ਗਟਰ ਦਾ ਪਾਣੀ ਬਿਨਾਂ ਸਾਫ਼ ਕੀਤਿਆਂ ਯਮੁਨਾ ਵਿੱਚ ਸੁੱਟ ਦਿੰਦੇ ਹਨ।

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    Author: 
    कृष्ण गोपाल 'व्यास’
    एन.डब्ल्यू.डी.ए. ने भारत की नदियों को हिमालयीन घटक और दक्षिण भारतीय घटक में बांटा। हिमालयीन नदियों और दक्षिण भारत की नदियों से जुड़े बिंदुओं पर लगभग दो दशक तक अध्ययन किया गया। इस अध्ययन से संबंधित कुछ रिपोर्टें समय-समय पर भारत सरकार के जल संसाधन विभाग द्वारा प्रकाशित भी की गईं। इस सब जद्दोजहद के बावजूद नदी जोड़ योजना पर हाशिम कमीशन के प्रश्न चिन्ह लगाने के कारण, काफी समय तक असमंजस, अस्पष्टता और दिशाहीनता की स्थिति बनी रही।भारत की नदियों को आपस में जोड़ने का सपना उन्नीसवीं सदी में सर आर्थर काटन ने देखा था। वे इस स्वप्न को देखने वाले पहले व्यक्ति थे और उनका सपना था दक्षिण भारत की नदियों को आपस में जोड़ना, ताकि उनके बीच नौकायन (परिवहन) की व्यवस्था कायम हो सके। इसके बाद, केन्द्रीय मंत्री डाॅ. के.एल. राव ने सन 1972 में दक्षिण भारत के जल संकट को हल करने के लिए गंगा को कावेरी से जोड़ने की अवधारणा पेश की।

    वे, पटना के पास से गंगा के 60,000 क्यूसेक पानी को उठाकर सोन, नर्मदा, ताप्ती, गोदावरी, कृष्णा, पेन्नार घाटियों के रास्ते ग्रेन्ड एनीकट के अपस्ट्रीम में कावेरी से जोड़ना चाहते थे। उनके प्रस्ताव के अनुसार जलमार्ग की लम्बाई 2640 किलोमीटर थी। गंगा से पानी का परिवहन, साल में 150 दिन किया जाना था और पानी को 450 मीटर से भी अधिक ऊँचा उठाना था। यह सही है कि सर आर्थर काटन और डाॅ. के.एल. राव काबिल इंजीनियर थे।

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    पहले जंगल से वनोपज मिल जाती थी। महुआ, गुल्ली, तेंदू, अचार, गोंद, आंवला और आम मिल जाते थे। कंदमूल, फूल और भाजियां मिल जाती थीं। अगर एक दो दिन भोजन न मिले तो इससे गुजारा हो जाता था। भंजनी घास जिससे रस्सियां बनती हैं, वह जंगल से ले आते थे और बेचते थे, उस पर भी रोक है। जीने का कोई सहारा नहीं होने के कारण जंगल से सिरगट्ठा लाकर बेचते थे। इसमें दो दिन लगते थे। एक दिन 8-10 किलोमीटर जाना और फिर इतना ही वापिस आना। सिरगट्ठा लेकर पिपरिया कस्बे में जाना। उससे जो कुछ पैसे मिलते उससे राशन खरीदना। लेकिन पिछले दो-तीन साल से उस पर पाबंदी है।पहले हम कोसम के पेड़ों पर लाख की खेती करते थे, अब कोसम के पेड़ नहीं हैं, जंगल से सिरगट्ठा (जलाऊ लकड़ी) लाते थे, उस पर रोक है, महुआ, गुल्ली और तेंदू बीनते थे, वह भी नहीं ला सकते और दिहाड़ी मजदूरी भी महीने पर नहीं मिलती, यह कहते-कहते बसंती बाई की आंखें भर आती हैं।

    बसंती बाई होशंगाबाद जिले के पिपरिया तहसील के सिमारा गांव की रहने वाली हैं। वह रज्झर समुदाय से हैं। उनके परिवार में 9 सदस्य हैं जिनमें 3 लड़कियों की शादी हो चुकी है। तीनों पढ़ी-लिखी नहीं हैं, स्कूल नहीं गई। बड़ा लड़का कुछ पढ़ा लेकिन जल्द छोड़ दिया। एक लड़का पढ़ रहा है, लेकिन कितना आगे तक पढ़ पाएगा, कहना मुश्किल है।

    बसंती और उसके पति बैजा बताते हैं कि 25-30 साल पहले तक यहां कोसम की अच्छी डांग हुआ करती थी।

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    Author: 
    ध्रुव शुक्ल
    Source: 
    तरुण भारत संघ

    जब समाज और सेवा दो अलग-अलग शब्दों की तरह टूटते हैं तो बीच-बीच खाली जगह से सोशल वर्करों की घुसपैठ होती है। इन्हीं सोशल वर्करों में से तरक्की करके कुछ लोग एनजीओज बनते हैं, फिर इन एनजी.ओज को समाज की बजाए कंप्यूटर की वेबसाइट में ढूंढना पड़ता है।

    बूंदों को देखो तो लगता है कि जैसे वे पानी के बीज हों। वर्षा धरती में पानी ही तो बोती है। पहले झले के पानी की एक-एक बूंद को पीकर धरती की गोद हरियाने लगती है। जैसे हरेक बूंद से एक अंकुर फूट रहा हो, जैसे धरती फिर से जी उठी हो। बरसात आते ही वह फूलों, फलों, औषधियों और अन्न को उपजाने के लिए आतुर दिखाई देती है।

    कोई धरती से पूछे कि उसे सबसे अधिक किसकी याद आती है तो वह निश्चित ही कहेगी कि पानी की। वह पानी से ऊपर उठकर ही तो धरती बनी है। वह पानी को कभी नहीं भूलती। वह तो पानी की यादों में डूबी हुई है। ग्रीष्म ऋतु में झुलसती हुई धरती को देखो तो लगता है कि वह जल के विरह में तप रही है। उससे धीरे-धीरे दूर होता जल और उसकी गरम सांसें एक दिन बदली बनकर उसी पर छाने लगती हैं और झुलसी हुई धरती के श्रृंगार के लिए मेघ पानी लेकर दौड़े चले आते हैं।

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    Author: 
    कृष्ण गोपाल 'व्यास’
    जलमार्गों की श्रृंखला के तालमेल एवं पानी उठाने वाली व्यवस्था के सुचारु रूप से संचालित होने पर ही कावेरी नदी को पानी मिलेगा। योजना के प्रस्ताव के अनुसार गंगा के पानी को सुवर्णरेखा में 60 मीटर, सुवर्णरेखा के पानी को महानदी में 48 मीटर और महानदी के पानी को गोदावरी में 116 मीटर उठाना पड़ेगा। उम्मीद है दक्षिण की उत्तर पर निर्भरता टिकाऊ होगी पर नहर टूटने, बिजली की सप्लाई अवरुद्ध होने, पंप खराब होने या नक्सलवादी या आतंकवादी गतिविधियों के कारण व्यवस्था अवरुद्ध होती है तो जल आपूर्ति का क्या विकल्प होगा?नदी जोड़ परियोजना की कल्पना का मूल आधार अमीर और गरीब नदी घाटियां हैं। यही सवाल सबसे अधिक महत्वपूर्ण एवं जटिल है। इस सवाल का उत्तर सामान्य अंकगणितीय जलविज्ञान द्वारा नहीं दिया जा सकता। इसका उत्तर इको-हाइड्रोलॉजी द्वारा दिया जाना चाहिए। गौरतलब है कि नेशनल कमीशन फॉर इंटीग्रेटेड वाटर रिसोर्स डेवलपमेंट प्लान (भारत सरकार द्वारा नियुक्त कमीशन) भी इस योजना को लेकर सशंकित है।

    जे. वंद्योपाध्याय और एस. परवीन के ई. पी. डब्ल्यू. में 11 दिसम्बर 2004 को प्रकाशित लेख में उल्लेख है कि इस कमीशन ने इको-सिस्टम की निरंतरता के लिए पानी की माँग का आकलन किया है। वंद्योपाध्याय और एस. परवीन कहते हैं कि इसमें आकलन करने के तरीके का उल्लेख ही नहीं है। इको-सिस्टम की निरंतरता के लिए जरूरी पानी को रोकने का असर खेती और जंगल की जमीन की उत्पादकता, ग्राउंड वाटर रिचार्ज, जैव विविधता एवं मछलियों के निर्बाध आवागमन और उत्पादन पर प्रतिकूल तरीके से पड़ता है इसलिए इन तथ्यों को इको-हाइड्रोलाजी के नज़रिए से समझने की जरूरत है।

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    नदी जोड़ घातक - मेनका गांधी


    भारत की राजनीति और सरकारें अब बाजार की बंधक बन चुकी हैं। खतरा यह है कि हमारी सरकारें जब तक इस बंधन से बाहर निकलेंगी, तब तक काफी देर हो चुकी होगी। भारत की नदियों पर इतने ढांचे बन चुके होंगे... भूगोल से इतनी छेड़छाड़ हो चुकी होगी कि कई पीढ़ियों तक भरपाई संभव नहीं होगी। नदी जोड़ परियोजना से बेहतर तो कम खर्च और स्वावलंबी पानी प्रबंधन की मिसाल बने उफरैखाल, अलवर, महोबा, देवास और स्वयं कच्छ के रण के प्रयोग उनकी प्राथमिकता में क्यों नहीं हैं?हालांकि भाजपा नेता मेनका गांधी ने नदी जोड़ को घातक बताते हुए चुनाव नतीजों से ऐन पहले बयान दिया है कि उन्होंने इस बाबत अटल जी को भी रोका था, लेकिन नदी जोड़ परियोजना को भाजपा के घोषणापत्र में प्राथमिकता पर शामिल किए जाने से भारत सरकार की राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी बांछे निश्चित ही खिली हुई होंगी। वह खुश होगी कि अब कोई रोड़ा नहीं अटकाएगा।विलंब होने से लागत बढ़ेगी; इस बिना पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी एक पूर्व निर्देश अनुकूल है ही। अतः नदी जोड़ परियोजना को एक समयबद्ध कार्यक्रम बनाकर जमीन पर करना ही होगा।

    लोकतंत्र के बावजूद कोर्ट और सत्ता ही सुप्रीम है। यही भारतीय लोकतंत्र का वर्तमान स्थिति है। यह सच है। लेकिन राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी तो देश में पानी की समृद्धि लाने के लिए बनी एजेंसी है। पिछले दो दशक में इसके समक्ष नदी जोड़ की अव्यावहारिकता को लेकर जो तर्क रखे गए, उनसे कम से कम इसे तो आशंकित होना चाहिए था। वह इतनी खुश क्यों हैं? नदी जोड़ को जमीन पर उतारने का सपना क्या सचमुच खुश होने की बात है? आइये, जाने।

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    नदियों में जल की मात्रा और गुणवत्ता हासिल करने के लिए फिर छोटी संरचनाओं और वनस्पतियों की ओर ही लौटना होगा। नदियों को धरती के ऊपर से नहीं, बल्कि धरती के भीतर से जोड़ने की जरूरत है। वर्षाजल संचयन के छोटी-छोटी संरचनाएं नदी जोड़ का सही विकल्प हैं। इस बात के प्रमाण देश भर में मौजूद हैं कि जहां समाज ने खुद अपने पानी का इंतजाम करने की ठान ली; वहीं पानी का इंतजाम हो गया। सूखी नदियां जिंदा हो गईं।मेरे जैसे अध्ययनकर्ता तो इतना जानते हैं कि बाढ़ और सुखाड़ के कारण कमोबेश एक जैसे ही हैं : जल संचयन संरचनाओं का सत्यानाश, जल बहाव के परंपरागत मार्ग में अवरोध, कब्जे, बड़े पेड़ व जमीन को पकड़कर रखने वाली छोटी वनस्पतियों का खात्मा, भूस्खलन, क्षरण और वर्षा के दिनों में आई कमी। इन मूल कारणों का समाधान किए बगैर बाढ़ और सुखाड़ से नहीं निपटा जा सकता। समस्या के मूल पर चोट करनी होगी।

    नदियों में जल की मात्रा और गुणवत्ता हासिल करने के लिए फिर छोटी संरचनाओं और वनस्पतियों की ओर ही लौटना होगा। नदियों को धरती के ऊपर से नहीं, बल्कि धरती के भीतर से जोड़ने की जरूरत है। वर्षाजल संचयन के छोटी-छोटी संरचनाएं नदी जोड़ का सही विकल्प हैं।

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    देश के एक बड़े समुदाय को अभी भी यह समझने की जरूरत है कि हमारी परंपरागत छोटी-छोटी स्वावलंबी जल संरचनाएं ही हमें वह सब कुछ लौटा सकती हैं, जो पिछले तीन दशक में हमने खोया है। इस दावे को यहां कागज पर समझना जरा मुश्किल है। लेकिन लेह, लद्दाख, कारगिल और लाहुल-स्पीति के शुष्क रेगिस्तानों को देखकर आसानी से समझा जा सकता है कि यदि पानी संजोने का स्थानीय कौशल न होता, तो यहां मानव बसावट ही न होती।

    अभी जेठ भले ही न आया हो, लेकिन उमड़ते-घुमड़ते बदरा के बावजूद उसकी आहट अभी से सुनाई देने लगी है। पेयजल के संकट से जूझते दक्षिणी दिल्ली के खानपुर, संगम विहार जैसी काॅलोनी वासियों ने बीच दुपहरी सड़कों पर दौड़ती रफ्तार रोक दी। यह घटना नई भले हो, लेकिन हर साल मई-जून का नजारा यही है: पानी-पानी चिल्लाते लोग, टी.वी., अखबार, रैली, गोष्ठियां ! पानी के लिए झगड़ा-मारपीट-बाजार!!

    सूखते चेहरे, सूखती नदियां, कुएं, तालाब, झीलें! चटकती-दरकती धरती और पानी के टूटती परंपराएं व कानून!! सब कुछ जैसे बेपानी होने को लालायित दिखाई देता है। यह आधुनिक भारत है। महाशक्ति बनने का दंभ भरता भारत! पर ताज्जुब है कि अपनी इस नाकामी के लिए हममें से कोई भी आज पानी-पानी होता नजर नहीं आता; न समाज, न सरकार, न नेता और न अफसर। यह प्रश्न नई सरकार के लिए भी है कि क्यों होते जा रहे हैं बेपानी हम? क्यों मरता जा रहा है हमारी आंखों का पानी?

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    परिदृश्य-एक
    उतरता पानी : बैठती धरती


    भारत की ज्यादातर फैक्टरियों और उनसे दूषित नदी किनारे के गांवों का सच यही है। कृष्णी नदी किनारे के इस गांव का भूजल जहर बन चुका है। काली नदी के किनारे क्रोमियम-लैड से प्रदूषित है। हिंडन किनारे बसे गाजियाबाद की लोहिया नगर काॅलोनी की धरती में जहर फैलाने वाली चार फैक्टरियों में ताले मारने पड़े और तो और गोरखपुर की आमी नदी के प्रदूषण से संत कबीर के मगहर से लेकर सोहगौरा, कटका और भडसार जैसे कई गांव बेचैन हो उठे हैं।भारत में एक भी ऐसा राज्य नहीं, जिसका प्रत्येक विकासखंड भूजल की दृष्टि से पूरी तरह सुरक्षित होने का दावा कर सके। आजादी के वक्त 232 गांव संकटग्रस्त थे। आज दो लाख से ज्यादा यानी हर तीसरा गांव पानी की चुनौती से जूझ रहा है। देश के 70 फीसदी भूजल भंडारों पर चेतावनी की छाप साफ देखी जा सकती है। पिछले 18 वर्षों में 300 से ज्यादा जिलों के भूजल में चार मीटर से ज्यादा गिरावट दर्ज की गई है।

    जम्मू, हिमाचल, उत्तराखंड, झारखंड जैसे पहाड़ी प्रदेशों से लेकर सबसे ज्यादा बारिश वाले चेरापूंजी तक में पेयजल का संकट है। हरित क्रांति के अगुवा पंजाब के भी करीब 40 से अधिक ब्लॅाक डार्क जोन हैं। नारनौल, हरियाणा के गांव - दोहन पच्चीसी में पानी के चलते चुनाव के बहिष्कार का किस्सा पुराना है। बेचने के लिए पानी के दोहन ने दिल्ली में अरावली के आसपास जलस्तर 25 से 50 मीटर गिरा दिया है।

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