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    Author: 
    सोपान जोशी
    Source: 
    गांधी मार्ग, जुलाई-अगस्त 2012
    सौंदर्य केवल लघु होने से नहीं आता। लघुता का पाठ पढ़ाने वाले हमारे पर्यावरण वाले भूल जाते हैं कि प्रकृति लघु नहीं, अति सूक्ष्म रचना भी करती है और विशालकाय जीव भी बनाती है। छोटे-बड़े का यह संबंध भुला देना मनुष्य जाति की आफत बन गई है। दुनिया के जाने-माने जीवविज्ञानी विक्टर स्मेटाचैक इस संबंध के रहस्य को और हमारी परंपराओं को ज्ञान और साधना से जोड़ते हैं। वे विज्ञान और अहिंसा, भोजन और भजन की एक नई परिभाषा, हमारे नए जमाने के लिए गढ़ते हुए एक आश्चर्यजनक मांग कर रहे हैं: कुछ लाख रसोइये ले आओ जरा!

    जलवायु परिवर्तन ही प्राणी जगत पर आई प्रलय का कारण नहीं माना जा सकता। अलग-अलग महाद्वीप पर बड़े स्तनपायियों का मिटना समय में थोड़ा अलग है। जैसे आस्ट्रेलिया में ये पहले हुआ, अमेरिका में थोड़ा बाद में। चूंकि बहुत-सा पानी हिमनदों और हिमखंडों में जमा हुआ था इसलिए समुद्र में पानी का स्तर आज की तुलना में कोई 400 फुट नीचे था और महाद्वीपों के बीच कई संकरे जमीनी रास्ते थे जो आज डूब गए हैं। जैसे भारत से आस्ट्रेलिया तक के द्वीप एक दूसरे से जुड़े थे, भारत से लंका तक एक सेतु था।

    कोई 15,000 साल पहले तक धरती पर बहुत बड़े स्तनपायी पशुओं की भरमार थी। इनके अवशेषों से पता चलता है कि इनमें से ज्यादातर शाकाहारी थे और आकार में आज के पशुओं से बहुत बड़े थे। उत्तरी अमेरिका और यूरोप-एशिया के उत्तर में सूंड वाले चार प्रकार के भीमकाय जानवर थे, इतने बड़े कि उनके आगे आज के हाथी बौने ही लगेंगे। वैज्ञानिकों ने इनको मैमथ और मास्टोडोन जैसे नाम दिए हैं। फिर घने बाल वाले गैंडे थे, जो आज के गैंडों से बहुत बड़े थे। ऐसे विशाल ऊंट थे जो अमेरिका में विचरते थे और साईबेरिया के रास्ते अभी एशिया तक नहीं पहुंचे थे। आज के हिरणों, भैंसों और घोड़ों से कहीं बड़े हिरण, भैंसे और घोड़े पूरे उत्तरी गोलार्द्ध में घूमते पाए जाते थे, चीन और साईबेरिया से लेकर यूरोप और अमेरिका तक। कुछ बड़े मांसाहारी प्राणी भी थे।

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    एक तरफ कांग्रेस का एक मंत्री धारी देवी को डुबाने वाली परियोजना को चालू करने की मांग करे और दूसरी तरफ प्रधानमंत्री धारी देवी मंदिर को बचाने का आश्वासन दें, तो इस दोतरफा खेल को आप क्या कहेंगे? शाह से कहो-जागते रहो और चोर से कहो-चोरी करो। गंगा, अब एक कारपोरेट एजेंडा बन चुकी है। गंगाजल का जल और उसकी भूमि अब निवेशकों के एजेंडे में है। किए गये निवेश की अधिक से अधिक कीमत वसूलने के लिए निवेशक कुछ भी करने पर आमादा हैं। अब चूंकि निर्णय राजनेता करते हैं, अतः दिखावटी तौर पर नेता आगे हैं और निवेशक उनके पीछे।

    देश की राष्ट्रीय नदी की कम से कम अविरलता तो फिलहाल पूरी तरह एक प्रदेश की स्वार्थपरक व एकपक्षीय राजनीति में फंस चुकी है। उत्तराखंड सरकार ने इसके लिए लोकतांत्रिक व्यवस्था की मर्यादाओं के उल्लंघन से भी कोई परहेज नहीं किया है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने गंगा को पूरी तरह क्षुद्र राजनीति का अखाड़ा बना डाला है। अभी विधानसभा का सदस्य बनकर मुख्यमंत्री की कुर्सी सुरक्षित करने का काम बाकी है, उससे पहले ही उन्होंने बिजली बांध परियोजनाओं जैसे विवादित मसले को सड़क पर उतरकर निबटने के आक्रामक अंदाज से जो संकेत दिए हैं, वे अच्छे नहीं हैं। गंगा मुक्ति संग्राम समेत गंगा के पक्ष में आंदोलित तमाम समूहों की टक्कर में मुख्यमंत्री ने जैसे बांध बनाओ मुहिम ही छेड़ दी है। इस मामले में वह पूर्ववर्ती सरकार के सहयोगी उत्तराखंड क्रांतिदल ‘उक्रांद’ से आगे निकल गये हैं।

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    Author: 
    स्वामी आनंदस्वरूप
    Source: 
    जनसत्ता, 12 जुलाई 2012
    अंग्रेजों ने भी गंगा की अविरलता का सम्मान किया लेकिन दुर्भाग्य है कि आज की सरकारें गंगा जैसी नदी को भी नाला बनाने पर तुली है। उसके शरीर से एक-एक बूंद निचोड़ लेना चाहते हैं। कानपुर जैसे शहरों में चमड़ा फैक्ट्रियों का पानी गंगाजल को गंदाजल ही बना देता है। अपने उद्गम प्रदेश में हर-हर बहने वाली गंगा अब सुरंगों और बांधों में कैद हो रही है। उद्गम के कैचमेंट में खनन, सुरंगों के बनने से हजारों लाखों पेड़ काटे जा रहे हैं जिससे हिमालय की कच्ची मिट्टी गाद बनकर गंगाजल को गंधला बना रही है। शहरों के कचरे, नैसर्गिक बहाव का कम होना और सरकारों की लापरवाही और बेइमानी गंगा पूर्णाहुति के जिम्मेदार हैं बता रहे हैं स्वामी आनंदस्वरूप।

    दुर्भाग्य तो यह है कि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा सिंचाई के लिए लिया जाने वाला यह गंगाजल, दिल्ली में विदेशी कंपनियों द्वारा पीने के लिए बेचा जा रहा है। साथ ही पवित्र गंगाजल कार और शौचालय साफ करने के काम आ रहा है। बाणगंगा और काली नदी जैसी सहायक नदियों के द्वारा उत्तर प्रदेश की चीनी, कागज और अन्य मिलों के साथ घरेलू मल-मूत्र गंगा नदी में डाल कर पूरी नदी की हत्या कर देते हैं। रही-सही कसर कानपुर के छब्बीस हजार से भी अधिक छोटे-बड़े उद्योग पूरी कर देते हैं, जिनमें करीब चार सौ चमड़ा शोधन कारखाने भी शामिल हैं।

    गंगा का नाम लेने मात्र से पवित्रता का बोध होता है। यह देश की एकता और अखंडता का माध्यम और भारत की जीवन रेखा के अतिरिक्त और बहुत कुछ है। गंगा जीवनदायिनी और मोक्षदायिनी दोनों है। आज भी लगभग तीस करोड़ लोगों की जीविका का माध्यम है। मगर पिछली डेढ़ सदी से गंगा पर हमले पर हमले किए जा रहे हैं और हमें जरा भी अपराध-बोध नहीं है। एक समय में हमारी आस्था इतनी प्रबल थी कि फिरंगी सरकार को भी झुकना पड़ा था। अंग्रेजी हुकूमत ने गंगा के साथ आगे और छेड़छाड़ न करने का वचन दिया था। उसने बहुत हद तक उसका पालन करते हुए हरिद्वार में भागीरथ बिंदु से अविरल प्रवाह छोड़ कर गंगा की अविरलता बनाए रखी। देश आजाद तो हुआ, पर अंग्रेजों की सांस्कृतिक संतानें भारत में ही थीं और उन्होंने भारत की संस्कृति की प्राण, मां गंगा पर हमले करने शुरू किए।
    इस खबर के स्रोत का लिंक: 

    http://www.jansatta.com

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    Author: 
    डॉ. कश्मीर उप्पल
    Source: 
    सर्वोदय प्रेस सर्विस, जुलाई 2012

    वैज्ञानिक शोधों से सिद्ध हुआ है कि आर.ओ. पद्धति से भारी धातुएं जैसे आर्सेनिक, क्रोमियम, लोहा आदि की तरह यूरेनियम को दूर भी नहीं किया जा सकता है। पंजाब सरकार ने कई गांवों में आर.ओ. सिस्टम लगाये हैं जहां गरीबों को न्यूनतम मूल्य पर पीने का पानी दिया जाता है। पर पशु तो वही पानी पीते हैं जो तीन सौ फुट नीचे से खींचा जाता है। पशुओं के दूध में दूषित पानी का असर लोगों तक भी पहुंचता रहता है। पंजाब के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में आर.ओ. सिस्टम से साफ किया पानी पीना समृद्ध और पढ़ा-लिखा होने की निशानी है। क्या यही है हमारा पंजाब?

    रासायनिक खेती, नदियों और भूजल स्तर जैसे पर्यावरणीय विषयों पर लिखना किसी अंधेरे में चीख की तरह लगता है। टी.वी. और समाचारपत्रों में बढ़ता तापमान प्रतिदिन हेडलाइन्स बनता है। उसके साथ ही पंखों, कूलरों और एयरकंडीशनर के विज्ञापन भी बढ़ जाते हैं और उनकी बिक्री भी। परन्तु ओजोन-परत और घटता वन क्षेत्र हमारी चिन्ता का विषय नहीं बनता। शहरों और गांवों में नित नई खुलती दवाई की दुकानें अब हमें नहीं डरातीं। सिने अभिनेता आमिर खान ने 24 जून के ‘सत्यमेव जयते’ कार्यक्रम में रासायनिक खेती के ‘अभिशापों’ और जैविक खेती के ‘वरदानों’ को देश के सम्मुख रखा। लेकिन अभी तक समाज और सरकार की ऐसी कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है कि कोई रासायनिक खेती के दुष्परिणामों से चितिंत हो। पंजाब को आधुनिक कृषि का मॉडल मानकर उसका अनुकरण करने से पूरे देश में भी रासायनिक और यांत्रिक खेती के दोष फैल गए हैं।

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    जलापूर्ति पर निर्णय का अधिकार किसका? प्राकृतिक संसाधनों का मालिक कौन? सरकार प्राकृतिक संसाधनों की ठीक से देखभाल न करे, तो जनता क्या करे? दिल्ली-खण्डवा जलापूर्ति निजीकरण ने बहस के ये तीन मुद्दे ताजा कर दिए हैं।

    दिल्ली जलबोर्ड को सौंपे जाने से पहले जलापूर्ति दिल्ली नगर निगम के पास ही थी। यह कहकर ही दिल्ली जलबोर्ड बनाया गया था कि निगम इसे संभालने में सक्षम नहीं है। अब इसका परिचालन तीन कंपनियों को सौंपे जाने के निर्णय से स्पष्ट है कि दिल्ली जलबोर्ड ने अपनी अक्षमता स्वीकार ली है। ऐसे में आगे चलकर ऐसा ही दावा जल उपभोक्ता संघ दिल्ली या खण्डवावासी भी पेश कर सकते हैं।

    दिलचस्प है कि खण्डवा में अप्रैल से ही जलापूर्ति के निजीकरण के खिलाफ मुहिम बुलंद है। जनता बोल रही है और उसके साथ-साथ जनता के अलग-अलग वर्गों की नुमांइदगी करने वाले संगठन व शख्सियतें भी। पानी-पर्यावरण पर काम करने वाले ‘मंथन’ जैसे प्रमुख स्वयंसेवी संगठनों के अलावा कई सामाजिक व राजनैतिक कार्यकर्ता निजीकरण के खिलाफ मुहिम में जी जान से जुटे हैं। स्थानीय मीडिया में इसकी चर्चा भी खूब है। दूसरी तरफ देश की राजधानी दिल्ली है। यहां स्थिति विपरीत है। दिल्ली में सत्ता है; पैसा है; देश के दूसरे इलाकों में जाकर आंदोलनों को रास्ता दिखाने वाले पर्यावरणविद् हैं, बड़ी आबादी है, सामाजिक कार्यकर्ता हैं और आवाज को दुनिया भर में फैलाने की कुव्वत रखने वाला राष्ट्रीय मीडिया है। बावजूद इन सबके दिल्ली की जनता चुप है।

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    बाढ़ में अतिरिक्त पानी को लेकर समझने की बात यह है कि उत्तर बिहार से होकर जितना पानी गुजरता है, उसमें मात्र 19 प्रतिशत ही स्थानीय बारिश का परिणाम होता है। शेष 81 प्रतिशत भारत के दूसरे राज्यों तथा नेपाल से आता है। गंगा में बहने वाले कुल पानी का मात्र तीन प्रतिशत ही बिहार में बरसी बारिश का होता है। बिहार का गंगा घाटी क्षेत्र का ढाल सपाट है। नहरें वर्षा के प्रवाह के मार्ग में रोड़ अटकायेंगी ही। इससे बड़े पैमाने पर सेम की समस्या सामने आयेगी। सेम से जमीनें बंजर होंगी और उत्पादकता घटेगी।

    लगता है कि तटबंध निर्माण की सजा भुगत रहा बिहार अपनी गलतियों से कुछ सीखने को तैयार नहीं है। ताजा परिदृश्य पूर्णतया विरोधाभासी है। नीतीश सरकार ने एक ओर आहर-पाइन की परंपरागत सिंचाई प्रणाली के पुनरुद्धार का एक अच्छा काम हाथ में लिया है, तो दूसरी ओर नदी जोड़ को आगे बढ़ाने का निर्णय कर वह बिगाड़ की राह पर भी चल निकली है। प्रदेश के जलसंसाधन मंत्री का दावा है कि नदी जोड़ की इन परियोजनाओं के जरिए नदी के पानी में अचानक बहाव बढ़ जाने पर सामान्य से अधिक पानी को दूसरी नदी में भेजकर समस्या से निजात पाया जा सकेगा। वह भूल गए है कि तटबंधों को बनाते वक्त भी इंजीनियरों ने हमारे राजनेताओं को इसी तरह आश्वस्त किया था। उसका खामियाजा बिहार आज तक भुगत रहा है।

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    Author: 
    रामबहादुर राय
    Source: 
    भारतीय पक्ष, 03 जुलाई 2012
    भारत की सबसे प्रमुख पहचान गंगा है। अगर गंगा को नहीं बचाया गया तो भारत देश का नाम कैसे बचेगा। जिस गंगा का नाम लेने मात्र से पवित्रता का बोध होता है। यह देश की एकता और अखंडता का माध्यम और भारत की जीवन रेखा के अतिरिक्त और बहुत कुछ है। गंगा जीवनदायिनी और मोक्षदायिनी दोनों है। एक समय में हमारी आस्था इतनी प्रबल थी कि फिरंगी सरकार को भी झुकना पड़ा था। अंग्रेजी हुकूमत ने गंगा के साथ आगे और छेड़छाड़ न करने का वचन दिया था। पर अंग्रेजों की सांस्कृतिक संतानें आज गंगा को लुटने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं। गंगा पर हो रहे अत्याचार के बारे में बता रहे हैं रामबहादुर राय।

    पिछले दो-तीन सालों से जिस तरह की गतिविधियां गंगा के बारे में चलाई जा रही हैं, वे आशा नहीं जगातीं। यह बात अलग है कि उन गतिविधियों को संचालित करने वाले कोई ऐरे-गैरे लोग नहीं हैं। साफ है कि वे बहुत माने-जाने लोग हैं। उनकी प्रतिष्ठा है। कई तो ऐसे हैं जो न केवल प्रतिष्ठित हैं, बल्कि पदस्थापित भी हैं। ऐसे लोगों के प्रयास से गंगा को बचाने का जो भी काम चलेगा, उसे सफल होना चाहिए। यही आशा की जाती है।

    इसमें कोई संदेह न पहले था न आज है कि गंगा का हमारे जीवन में कितना गहरा असर है। धार्मिक ग्रंथों में गंगा का जो वर्णन है, वह उसके प्रभाव को बढ़ाता है और बनाए रखता है। न जाने कब से यह परंपरा बनी हुई है। इतना तो साफ है कि गंगोत्री से गंगासागर तक दूरी चाहे जितनी हो और गंगा चाहे जहां की भी हो, उसकी एक-एक बूंद पवित्र मानी जाती है। इसी तरह गंगा के किनारे जो थोड़ा क्षण भी गुजार लेता है, वह इस रूप में स्वयं को धन्य पाता है कि गंगा के प्रवाह में वह न केवल भागीरथ को देखता है बल्कि उन पुरखों को भी देखता है, जो उसके अपने हैं। गंगा का प्रवाह ही ऐसा है। गंगा की पवित्रता उसके प्रवाह में है। वह प्रवाह परंपरा का है और उस क्षण का है, जिस क्षण का व्यक्ति साक्षी बनता है।
    इस खबर के स्रोत का लिंक: 

    http://www.bhartiyapaksha.com

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    Author: 
    शेखर पाठक
    Source: 
    जनसत्ता, 21 जुलाई 2012
    भारतीय लोकतंत्र की परिधि में विकास के नये मंदिर नहीं आते। चाहे सेज का मामला हो, चाहे लंबी चौड़ी सड़कें बनाना हो या किसी बड़े बांध का मामला हो कभी भी इन पर सवाल नहीं उठाया जाता। बड़ी परियोजनाओं में लोगों को अपने घर, खेती, पनघट, गोचर और जंगलों से हाथ धोना पड़ता है। बड़ी परियोजनाएं यानी बड़ी कंपनियां साथ ही प्राकृतिक संसाधनों का निजीकरण ही है। और यह प्रक्रिया दिन प्रतिदिन तेज होती जा रही है और जिसमें जनता का कोई रक्षक नहीं रह गया है। वर्तमान में उत्तराखंड सहित भारत के सभी पहाड़ी इलाकों में बांधों का दौर शुरू हो गया है। नदियां लगातार बांधी जा रही हैं। बांधों में ही पहाड़ की सभी समस्याओं का हल देख रहे लोग एक बड़े दुराग्रह का शिकार हैं बता रहे हैं शेखर पाठक।

    विकास के बारे में अलग-अलग दृष्टिकोण हो सकते हैं और हर एक को अपनी बात कहने का जनतांत्रिक अधिकार है। इसलिए जीडी अग्रवाल, राजेंद्र सिंह और उनके साथियों, भरत झुनझुनवाला और श्रीमती झुनझुनवाला के साथ पिछले दिनों जो बदसलूकी हुई, वह सर्वथा निंदनीय है। यह हमला कुछ लोगों ने नियोजित तरीके से किया था। राजनीतिक पार्टियों का नजरिया बहुत सारे मामलों में एक जैसा हो गया है, पर विभिन्न समुदायों ने अभी अपनी तरह से सोचना नहीं छोड़ा है।
    इस खबर के स्रोत का लिंक: 

    http://www.jansatta.com

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    Author: 
    बाबा मायाराम

    जिस तरह प्रकृति में विविधता है उसी तरह फसलों में भी दिखाई देती है। कहीं गरम, कहीं ठंडा, कहीं कम गरम और ज्यादा ठंडा। रबी की फसलों में इतनी विविधता नहीं है लेकिन खरीफ की फसलें विविधतापूर्ण हैं। बारहनाजा परिवार में तरह-तरह के रंग-रूप, स्वाद और पौष्टिकता से परिपूर्ण अनाज, दालें, मसाले और सब्जियां शामिल हैं। यह सिर्फ फसलें नहीं हैं, बल्कि एक पूरी कृषि संस्कृति है। स्वस्थ रहने के लिए मनुष्य को अलग-अलग पोषक तत्वों की जरूरत होती है, जो इस पद्धति में मौजूद हैं।

    इन दिनों खेती-किसानी का संकट काफी गहरा रहा है। अब यह संकट खेत-खलिहान से घरों तक पहुंच चुका है। नौबत यहां तक आ पहुंची है कि किसान बड़ी तादाद में अपनी जान दे रहे हैं। किसानों की आत्महत्या सिर्फ फौरी घटनाएं नहीं हैं, बल्कि यह आधुनिक व रासायनिक खेती के गहरे संकट का नतीजा है। यह हरित क्रांति का संकट भी है। इसके विकल्प की जरूरत शिद्दत से महसूस की जा रही है। पर यह तो पारंपरिक खेती में पहले से ही मौजूद है। उत्तराखंड के पहाड़ों में बारहनाजा की मिश्रित खेती इसी का एक उदाहरण मानी जा सकती है। हाल ही में बीज बचाओ आंदोलन से जुड़े विजय जड़धारी से मेरी मुलाकात हुई। वे उत्तराखंड से भोपाल एक बैठक के सिलसिले में आए हुए थे। उन्हें परंपरागत कृषि ज्ञान के संरक्षण के लिए 5 जून को इंदिरा गांधी पर्यावरण पुरस्कार से नवाजा गया है। वे पूर्व में चिपको आंदोलन से भी जुड़े रहे हैं।

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    Author: 
    सुनीता नारायण
    Source: 
    कादम्बिनी, जून 2012

    महाराष्ट्र अकेला ऐसा राज्य है जो कृषि के मुकाबले उद्योगों को पानी उपलब्ध कराने को ज्यादा प्राथमिकता देता है। इसलिए सिंचाई योजनाएं बनती हैं तो उनका पानी शहरों में उद्योगों की जरूरतों पर खर्च कर दिया जाता है। अमरावती जिले में ही, जो सबसे ज्यादा सूखाग्रस्त इलाका है, प्रधानमंत्री राहत योजना के तहत अपर वर्धा सिंचाई प्रोजेक्ट बनाया गया, लेकिन जब यह बनकर तैयार हुआ तो राज्य सरकार ने निर्णय लिया कि इसका पानी सोफिया थर्मल पावर प्रोजेक्ट को दे दिया जाए।

    फिर से एक बार सूखे के दिन हैं। इसमें नया कुछ भी नहीं है। हर साल दिसंबर और जून के महीनों में हम सूखे से जूझते हैं फिर कुछ महीने बाढ़ से। यह हर साल का क्रमिक चक्र बन चुका है। लेकिन इसका कारण प्रकृति नहीं है जिसके लिए हम उसे दोष दें। ये सूखा और बाढ़ हम मनुष्यों के ही कर्मों का नतीजा है। हमारी लापरवाहियों का, जिनके कारण हम पानी और जमीन की सही देखभाल नहीं करते। हमारी लापरवाही के कारण ही ये प्राकृतिक आपदाएं पिछले कुछ सालों में विकराल रूप लेती रही हैं। इस सालों में महाराष्ट्र का एक बड़ा हिस्सा सूखे की चपेट में आया है जिसके कारण बड़े पैमाने पर किसानों की फसलें चौपट हुई हैं और वे आत्महत्या के लिए विवश हुए हैं। किसानों की मदद के नाम पर मुख्यमंत्री और पैसा चाहते हैं और विपक्ष इस पर अपनी सियासत करता है।

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    source: 
    सैण्ड्रप
    केन एवं बेतवा नदी गंगा नदी घाटी की प्रमुख उत्तर प्रवाही नदियां है। बुंदेलखंड क्षेत्र की जीवनदायनी मानी जाने वाली इन नदियों पर आज संकट आ खड़ा हुआ है। भारत सरकर की देश भर की नदियों को आपस में जोड़ने की योजना के तहत केन एवं बेतवा नदियों को भी आपस में जोड़ने की योजना है। केन-बेतवा नदीजोड़ योजना पर शायद सबसे पहले अमलीकरण प्रस्तावित है। जबसे इस परियोजना के बारे में नदियों को जोड़ने के लिए बने कार्यदल की सबसे पहली बैठक फरवरी 2003 में चर्चा हुई थी तभी से केन-बेतवा नदीजोड़ पर बुंदेलखंड के लोगों की प्रतिक्रियाएं बढ़नी शुरू हुईं। केन एवं बेतवा के बारे में लोगों का विरोध धीरे-धीरे यह एक आन्दोलन का स्वरूप लेता नजर आ रहा है।

    माना तो यह भी जा रहा है कि नदीजोड़ योजना के माध्यम से देश भर में नदियों एवं प्राकृतिक संसाधनों के निजीकरण की व्यापक कोशिश की जा रही है। सैण्ड्रप ने देश के अलग-अलग क्षेत्रों में कार्यशालाओं के माध्यम से इस विषय पर व्यापक व खुली चर्चा भी आयोजित की। सैण्ड्रप द्वारा प्रकाशित “डैम्स, रिवर्स एंड पिपुल”

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    Author: 
    डॉ. शीला डागा
    क्यों नहीं नदी जोड़? शीला डागा की पुस्तक है। इस पुस्तक में नदी जोड़, इससे पैदा होने वाले विवाद, पानी की लूट, समाज, संस्कृति की टूटन और विकल्प के सभी पहलूओं को समेटा गया है। पर्यावरणीय खतरे व आर्थिक असमानता को बढ़ाने का नाम है नदी जोड़ परियोजना।

    तरुण भारत संघ द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक की लेखिका का मानना है कि नदी जोड़ परियोजना भारत सरकार के नेताओं, बड़े प्रशासनिक अधिकारियों और अंतरराष्ट्रीय ताकतों की स्वार्थ-सिद्धि तथा भूगोल के विनाश का साधन बनने जा रहे हैं।

    नदी जोड़ परियोजना परिचय


    नदी जोड़ परियोजना भारत की नदियों को आपस में जोड़ने की परियोजना है। इसके अंतर्गत जहां बाढ़ आती हो, वहां का पानी....वहां की नदियों पर बांध बनाकर नहरों द्वारा सूखे क्षेत्रों की उन नदियों में ले जाया जायेगा, जिनमें पानी कम होगा।

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    Author: 
    योगेश मिश्र
    Source: 
    नेशनल दुनिया, 15-21 जुलाई 2012

    देश के कुल क्षेत्रफल के 23.81 फीसदी हिस्से पर जंगल हैं। वहीं, भारत सरकार का आंकड़ा कहता है कि हाल के वर्षों में 367 वर्ग किलोमीटर जंगल का सफाया कर दिया गया है। यह कुचक्र गंगोत्री से लेकर गंगासागर तक के पूरे इलाके में चल रहा है। कहीं कारण प्राकतिक है तो कहीं मानव निर्मित। अगर कुछेक राज्यों को छोड़ दें तो कमोबेश इस हरियाली को बनाए रखने के लिए प्रति उदासीनता एक जैसी ही नजर आती है।

    पर्यावरण से पृथ्वी का गहरा नाता है। इस रिश्ते की डोर को सबसे मजबूती से जिसने बांधे रखा है वे पेड़ हैं। लेकिन दरख्तों की बेहिसाब कटाई और कंक्रीट के जंगलों के बीच आज अगर हम छांव को तरसते हैं तो हैरानी नहीं होनी चाहिए क्योंकि इन हालातों के जनक भी हम ही हैं। प्रदेश में पेड़ लगाने का अभियान छेड़ने वाली समाजवादी पार्टी सरकार भी अब हरियाली को लेकर चिंतित दिखाई पड़ रही है। इसलिए बीते दिनों के आदेश में उन्होंने बेवजह पेड़ काटने और कटवाने वालों पर सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। पर सरकार के इस आदेश पर अमल करने वाले महकमे की पड़ताल करें तो साफ होता है कि उसके पास सरकारी आदेश को जमीन पर उतारने के लिए कोई नीति और नीयत नहीं है। यही वजह है कि जब वन महकमे के हुक्मरानों से पेड़-पौधे लगाने के बाबत बातचीत की जाती है तब उनके दावे इतने बढ़-चढ़कर होते हैं कि उस पर सहसा विश्वास कर पाना आसान नहीं होता।

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    Author: 
    प्रयाग पांडे
    Source: 
    जनसत्ता रविवारी, 05 अगस्त 2012
    नैनीताल देश के गिने-चुने पर्यटन स्थलों में है। यह सुंदर पहाड़ों और झीलों के लिए मशहूर है। लेकिन शासन और प्रशासन की उपेक्षा और लापरवाही की वजह से इस नगरी का वजूद खतरे में है। इसका जायजा ले रहे हैं प्रयाग पांडे।

    नैनीताल झीलनैनीताल झीलकहते हैं कि सियासत जब जन सरोकारों से दूर हो, सत्ता की प्यासी हो जीती है तो नौकरशाही की बन आती है। अपनी सुविधा और मर्जी से संचालित नौकरशाही कुछ भी गुल खिला सकती है।

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    Source: 
    राष्ट्रीय सहारा ईपेपर (हस्तक्षेप), 10 जुलाई 2012
    जब से नदी जोड़ के नाम पर 5,60,000 करोड़ रुपये की हरियाली दिखाई देने लगी है, यह प्रश्न जानबूझकर बार-बार उठाया जाने लगा है। हालांकि जनता-जनार्दन ऐसी कोई मांग नहीं कर रही। फिर भी अपने को जनता के तथाकथित हितैषी बताने वाले ही कह रहे हैं कि यदि नदियां जोड़ दी जाएं तो कम से कम मानसून के विलंब या कमी की चिंता तो नहीं ही सताएगी। उनका यकीन है कि सौ बार दोहराने से झूठ भी सच हो जाता है; वे दोहराते रहेंगे। लेकिन हमें जानना चाहिए कि क्या ऐसा करना वाकई वाजिब है।

    पानी को लेकर हाय-तौबा ही मचानी है तो बिहार में सिंचाई की शानदार आहर-पाइन प्रणाली के बड़े पैमाने पर ध्वस्त होने को लेकर मचाइए। देश के अधिकांश तालाब या तो कब्जा हो गए हैं या सूख गए हैं। हजारों छोटी नदियों समेत अधिकांश जलसंरचनाएं हमारे ही कुकृत्यों के कारण बारिश के तीन महीने बाद ही बेपानी होने लगी हैं। जहां हमारे भूजल को समृद्ध करने वाली जलसंरचनाएं पानीदार बची हैं, वहां किसान आज भी 10-20 दिन तो क्या, पूरे तीन साला अकाल को झेलकर भी कर्ज और खुदकुशी के चक्रव्यूह में नहीं फंसे।

    आषाढ़ सूखा गया। सावन का आगाज भी ऐसा रिमझिम-रिमझिम नहीं है कि कारे मेघा सूरज को निकलने न दें और बाबा नागार्जुन की कविता जुबां पर आ जाए, ‘कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास।’ जून में औसत से 31 प्रतिशत कम वर्षा हुई। आषाढ़ आखिर में मानसून दक्षिण पश्चिम से निकलकर पूर्वी उत्तर प्रदेश पहुंचा भी, तो गोरख के गढ़ में आकर टें बोल गया। जेठ तपा भी खूब। आद्रा नक्षत्र में आद्रता 67 फीसद तक दर्ज की गई लेकिन बारिश के नाम पर सूखा ही रहा। बहरहाल, नजारा यह है कि एक ओर अब भी कई इलाके ‘अल्लाह मेघ दे, पानी दे..पानी दे,’ पुकार रहे हैं और दूसरी ओर पानी की अधिकता के कारण कई इलाकों की जमीन बुआई लायक भी नहीं बची।

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    Author: 
    बी. चन्द्रशेखर, 'आइएएस'
    Source: 
    रोजगार समाचार

    “आधे भारतीय घरों में सेलफोन हैं, किंतु शौचालय नहीं”, घरेलू जनगणना-2011


    अनीता बाई नेरे को सुलभ स्वच्छता पुरस्कार देते केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री, जयराम रमेशअनीता बाई नेरे को सुलभ स्वच्छता पुरस्कार देते केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री, जयराम रमेश स्थान था दक्षिण कोरिया की राजधानी शहर-सिओल का कोरिया डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट (के.डी.आई.)। भारत एवं कोरिया के अधिकारियों से भरे एक सम्मेलन–कक्ष में एक लघु फिल्म दिखाई जा रही थी, इस फिल्म में एक सफलता की कहानी प्रदर्शित की जा रही थी कि किस तरह से एक गांव को खुले में शौच करने से मुक्त (ओ.डी.एफ) कराया गया।

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    Source: 
    इलाहाबाद से राजीव चन्देल, 10 अगस्त 2012

    इलाहाबाद में तीन पॉवर प्लान्टों की स्थापना से लाखों किसानों, मछुआरों की रोजी-रोटी पर संकट के बादल


    पानी के ‘अतिभोग’ व ‘अतिदोहन’ से चिंतित भारत सरकार ‘कानून’ बनाकर जल संरक्षण का खाका तैयार कर रही है, जबकि दूसरी ओर कार्पोरेट सेक्टर को अतिशय जल उपभोग की इजाजत भी बिना किसी रोक-टोक व उसके स्रोतों की स्थिति जाने बगैर दी जा रही है। इलाहाबाद जनपद में केवल 25 कि0मी0 की परिधि में तीन कोल बेस्ड थर्मल पॉवर प्लान्टों और उन्हें गंगा तथा यमुना नदी से भारी मात्रा में पानी देने का फैसला भी सरकार के जल संरक्षण की दोहरी नीति की तरफ इशारा करता है।

    पानी के ‘अतिभोग’ व ‘अतिदोहन’ से चिंतित भारत सरकार ‘कानून’ बनाकर जल संरक्षण का खाका तैयार कर रही है, जबकि दूसरी ओर कार्पोरेट सेक्टर को अतिशय जल उपभोग की इजाजत भी बिना किसी रोक-टोक व उसके स्रोतों की स्थिति जाने बगैर दी जा रही है। हाल में तैयार किये गए ‘राष्ट्रीय जल नीति-2012’ के मसौदे और इसी दरम्यान कुछ फैक्ट्रियों, थर्मल पॉवर प्लांटों को दिये जा रहे पानी के उपभोग की खुली छूट में कोई तालमेल दिखाई नहीं पड़ता। इसी मसौदे की प्रस्तावना (1.3-पैरा 4) में एक तरफ सरकार यह कह रही है कि खाद्य सुरक्षा, जीविका तथा सभी के लिए समान और निरंतर विकास हेतु राज्य द्वारा ‘सार्वजनिक धरोहर के सिद्धान्त’ के तहत जल का प्रबंधन सामुदायिक संसाधन के रूप में किये जाने की आवश्यकता है, वहीं कोल बेस्ड थर्मल पॉवर प्लान्टों और प्रस्तावित दिल्ली से मुम्बई तक इंडस्ट्रीयल कॉरिडोर (इटली की स्कॉट विलस्न कंपनी द्वारा दिल्ली से मुम्बई तक पानी की उपलब्धता और उपभोग के पैमाने पर एक सर्वे रिपोर्ट भारत सरकार को सौंपी गई है) को भारी मात्रा में पानी देने पर सरकार स्वयं राजी है। इलाहाबाद जनपद में केवल 25 कि0मी0 की परिधि में तीन कोल बेस्ड थर्मल पॉवर प्लान्टों और उन्हें गंगा तथा यमुना नदी से भारी मात्रा में पानी देने का फैसला भी सरकार के जल संरक्षण की दोहरी नीति की तरफ इशारा करता है।

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    पीपीपी मॉडल के नाम पर इस देश में बुनियादी ढांचा क्षेत्र में जो खेल चल रहा है, वह सर्वजन हिताय या राष्ट्रीय हित का नहीं, बल्कि सरेआम लूट का खेल है। पीपीपी यानी जन-निजी भागीदरी! किंतु भारत में यह भागीदारी जिस तरह से निभाई जा रही है, इसमें न तो जनभागीदारी है, न जनमान्य नीति की पालन, न पारदर्शिता, न जवाबदेही, न विश्वसनीय परीक्षण न उचित नियमन और न ही तमाम जानकारियों तक जनता की पहुंच।

    दिलचस्प है कि जहां मांग होनी चाहिए कि जलापूर्ति के क्षेत्र में निजी कंपनियों का प्रवेश पूरी तरह रोका जाये; विरोध होना चाहिए कि जन-निजी भागीदारी (पी पी पी) के नाम पर सुनिश्चित किए जा रहे पानी के व्यावसायीकरण का; विरोध होना चाहिए बुनियादी ढाचें में पीपीपी को लेकर सरकार, कर्जदाता और कंपनियों के बीच बढ़ती खतरनाक सहमति को लेकर; वहां विरोध हो रहा है दिल्ली में अपनाये जा रहे नागपुर मॉडल को लेकर। हालांकि इस आरोप में दम है कि नागपुर में जिस कंपनी के साथ जलप्रदाय परियोजना का अनुबंध किया गया है, वह धांधली कर रही है। उसे कुल परियोजना लागत का 30 फीसदी यानी 116 करोड़ रुपया लगाना था। उसने अब तक मात्र 10 करोड़ रुपये ही निवेश किए हैं। उस पर से तुर्रा यह कि इसकी एवज में वह रखरखाव आदि के नाम पर 7.90 रुपये की दर से प्रतिवर्ष करीब 72 करोड़ रुपया वसूल रही है।

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    Author: 
    डॉ. उषा भटनागर
    Source: 
    आधुनिक पश्चिमी मालवा का ग्रामीण वैज्ञानिक एवं तकनीकी योगदान

    वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो स्पष्ट है कि वृक्ष की पूजा कर वहीं बैठ कर भोजन करना, यह शुद्ध वायु-प्राप्ति का एक तरीका है। गांवों में महिलाएँ चूल्हे-चौके या खेती-बाड़ी के कार्यों में लगी रहती हैं। शुद्ध वायु प्रत्येक के लिये आवश्यक होती है।

    भारत के मध्य भाग में स्थित मालवा की अपनी अलग महिमा रही है। कल-कल करती वर्ष भर प्रवाहमान नदियां, हरे-भरे भू-भाग, माटी की सौंधी सुगंध, सर्व शुद्धता- इन सबसे प्रसन्न होकर लोकनायक कबीर ने अपने अनुभूतिजन्य विचार प्रस्तुत करते हुए कहा था-

    देश मालव गहन गम्भीर, पग-पग रोटी डग-डग नीर


    कबीर की यह अनुभूति शाश्वत सत्य को प्रकट करती है। वास्तव में यहां के शुद्ध पर्यावरण में मालवा-वासियों एवं पर्यावरण के बीच अटूट रिश्ते की स्पष्ट छाप दिखाई देती है। यह सब मालवा के ग्रामीणों द्वारा पर्यावरण शुद्धता के लिये अपनाई जा रही विधियों का प्रतिफल है। आज पर्यावरण शुद्धता की इन विधियों एवं उनके वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अध्ययन की महती आवश्यकता प्रतीत हो रही है।

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    Author: 
    बाबा मायाराम, अगस्त 2012

    आजकल बाढ़ प्राकृतिक होने की बजाय मानव निर्मित ज्यादा दिखाई देने लगी है। बाढ़ से बचने के लिए हमें नदियों के जल-भराव, भंडारण, पानी को रोकने और सहेजने के परंपरागत ढांचों को फिर से खड़ा करना होगा। पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ पेड़ों को कटने से बचाना तथा नए पेड़ लगाना होगा। यही पेड़ पानी को स्पंज की तरह सोखकर रखते हैं। हमें मिट्टी-पानी के संरक्षण वाली जैविक खेती की ओर बढ़ना चाहिए क्योंकि रासायनिक खेती से मिट्टी की जलधारण क्षमता कम हो जाती है। ऐसे उपायों को अपनाएंगे तभी बाढ़ नियंत्रण हो पाएगा।

    पिछले कुछ दिनों से मध्य प्रदेश के होशंगाबाद और हरदा जिले बाढ़ की चपेट में हैं। कई गांव जलमग्न हैं और खेत की फसलें डूब गई हैं। कई गांवों से संपर्क टूट गया है। पर यह बाढ़ प्राकृतिक होने की बजाय मानव निर्मित ज्यादा दिखाई देती है। तवा-बरगी बांध के गेट खोलने और इंदिरा सागर बांध के बैक वॉटर और नदी-नालों के स्वाभाविक बहाव को रोकना ही इस बाढ़ के कारण बताए जा रहे हैं। होशंगाबाद जिले में कुछ दिनों से लगातार बारिश से नदी-नालों का जलस्तर बढ़ गया है। नर्मदा भी उफान पर हो गई। इससे होशंगाबाद की निचली बस्तियों व आसपास के गांवों में पानी भर गया। इसी प्रकार हरदा जिले का भी बड़ा हिस्सा बाढ़ की चपेट में आ गया। हरदा शहर में अजनाल नदी का पानी निचली बस्तियों में भर गया। जिले की टिमरन, कालीमाचक, गंजाल, हंडली, सदानी, आदि नदियों में बाढ़ के कारण कई गांव इससे घिर गए। इस बीच खबर है इंदिरा सागर और सरदार सरोवर बांध के कई गांव बाढ़ की चपेट में आ गए हैं।

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