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    Source: 
    छत्तीसगढ़ साक्षात्कार, जुलाई-अगस्त 2014
    जल प्रबन्धन को लेकर नदियों को जोड़ना और मोक्षदायिनी गंगा की सफाई मोदी सरकार अपने साथ चुनाव प्रचार से ही लेती आई है। इसे लेकर चाहे केन्द्र सरकार और कुछ राजनैतिक दलों में उत्साह हो, लेकिन कई मानते हैं कि यह न तो व्यवहारिक और न ही सम्भव- दोनों नदियों को जोड़ना और गंगा की सफाई! इन दोनों ही मुद्दों पर प्रख्यात जल विशेषज्ञ अनुपम मिश्र से नीतिश द्वारा बातचीत पर आधारित लेख।

    .वर्तमान में भारत को किस प्रकार के जल प्रबन्धन की जरूरत आप महसूस कर रहे हैं?
    हम सभी लोग जानते हैं कि हमारे देश में एक तरह की जलवायु नहीं है। हर साल मौसम बदलता रहता है, जिससे बारिश कहीं ज्यादा तो कहीं कम होती है। हमारे यहाँ मोटे तौर पर जैसलमेर में न्यूनतम वार्षिक औसत 15 सेमी से लेकर मेघालय, जिसका नाम ही मेघों पर है, वहाँ पानी मीटरों में गिरता है। सेंटीमीटर में नहीं! इसमें छत्तीसगढ़ भी आता है, जहाँ 200 से 400 सेमी तक बरसात होती है। ऐसी जगहों पर जल-प्रबन्धन न कोई एक दिन में बन सकने वाली व्यवस्था नहीं है।

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    .किसी भी राज्य में प्रदूषण नियन्त्रित करने की सबसे अधिक अधिकारिक जवाबदेही, राज्य प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड की होती है। किन्तु यदि उसे इसके लिए धन ही न मिले अथवा उसे प्रदूषण नियन्त्रण हेतु राज्य के सम्बन्धित विभाग द्वारा जारी आदेशों/निर्देशों की जानकारी ही न हो, तो इस स्थिति को आप किस धिक्कार से नवाजेंगे? किसे दोषी ठहराएँगे-राज्य सरकार को, स्वयं राज्य प्रदूषण बोर्ड के राजनीतिक मुखिया को अथवा उस विभाग के प्रशासक को, जिस पर धन व आदेश जारी करने की जवाबदेही है?

    प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड के पास न पैसा, न जानकारी


    गोमती नदी की सफाई हेतु उत्तर प्रदेश राज्य प्रदूषण बोर्ड को अब तक किसी सरकार से एक पैसा भी प्राप्त नहीं हुआ है।

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    Author: 
    डॉ.ओ.पी.जोशी
    Source: 
    सर्वोदय प्रेस सर्विस, फरवरी 2015
    .जनवरी 2015 में दिल्ली में आयोजित भारत जल सप्ताह में पर्यावरणविदों द्वारा जारी चिन्ताओं को नजरअन्दाज कर भाजपा नीत सरकार नेे घोषणा की कि प्राथमिकता के आधार पर हर हालत में नदियाँ आपस में जोड़ी जाएँगी एवं रास्ते में आने वाली बाधाओं को दूर किया जाएगा। अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार ने सन् 2002 में 5,67,000 करोड़ रु. की नदी जोड़ योजना को अमृत क्रान्ति नाम देकर प्रारम्भ किया था।

    सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार इसे दिसम्बर 2016 तक पूरा किया जाना था। इस योजना के पीछे प्रमुख तर्क यह दिया गया था कि इससे सिंचाई एवं बिजली उत्पादन में जो बढ़ोतरी होगी जिससे सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) लगभग 4 प्रतिशत बढ़ेगी। इसके अन्तर्गत लगभग 3 करोड़ 50 लाख हेक्टेयर में सिंचाई तथा 34 हजार मेगावाट बिजली उत्पादन की सम्भावना बताई गई थी।

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    Author: 
    रूबी सरकार
    Source: 
    प्रथम प्रवक्ता, मार्च 2015
    .संसाधनों के उपयोग और विकास सम्बन्धी गतिविधियों ने मौजूदा विकास मॉडल की उपयोगिता पर गम्भीर चिन्ताएँ पैदा की हैं। जब बिजली क्षेत्र को निजीकरण के लिए खोला गया था, तब कोई बहस या चर्चा नहीं हुई थी। देश के सामने इसे एक निर्विवाद तथ्य की तरह परोसा गया था। बड़े पैमाने पर बिजली गुल होने का डर दिखाकर निजीकरण को आगे बढ़ाया गया। लेकिन, अब पानी के क्षेत्र में ऐसे ही निजीकरण की राह पकड़ी जा रही है तो चिन्ताएँ बढ़ गई हैं और किसी भी निर्णय के पहले इस मुद्दे पर व्यापक आम बहस की माँग बढ़ती जा रही है।

    मध्य प्रदेश के खण्डवा और शिवपुरी जिले में पानी के निजीकरण को लेकर लम्बे समय से चल रहा आन्दोलन पूरी तरह थमा भी नहीं है कि होशंगाबाद, पिपरिया और इटारसी जिले के नागरिकों पर पानी के निजीकरण का खतरा मँडराने लगा है।

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    Author: 
    कृष्ण गोपाल 'व्यास’
    .केन्द्र सरकार ने वित्तीय स्वीकृति जारी कर दी है। गंगा सफाई के लिये विचार-विमर्श का दौर खत्म हो चुका है। पहले चरण में गंगा से मिलने वाले 144 नालों और उससे लगी औद्योगिक इकाईयों के प्रदूषण को सख्ती से बन्द किया जाएगा। गन्दे नालों और प्रदूषण फैलाने वाली औद्योगिक इकाईयों को हटाने का काम जून 2016 तक पूरा हो जाएगा। अगले छह माह में तकनीकी काम प्रारम्भ हो जाएगा। कामों की निगरानी, नवगठित टास्कफोर्स करेगी।

    सन् 1986 में जब भारत सरकार ने गंगा एक्शन प्लान (प्रथम) प्रारम्भ किया था तब सोचा गया था कि उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के, गंगा तट के 25 शहरों की गन्दगी को रोकने मात्र से गंगा का पानी स्नान योग्य हो जाएगा। प्लान के अनुसार काम हुआ, सीवर ट्रीटमेंट प्लान्ट बने पर बात नहीं बनी।

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    .यह देश-दुनिया जब से है तब से पानी एक अनिवार्य जरूरत रही है और अल्प वर्षा, मरूस्थल, जैसी विषमताएँ प्रकृति में विद्यमान रही हैं- यह तो बीते दो सौ साल में ही हुआ कि लोग भूख या पानी के कारण अपने पुश्तैनी घरों-पिण्डों से पलायन कर गए। उसके पहले का समाज तो हर जल-विपदा का समाधान रखता था। अभी हमारे देखते-देखते ही घरों के आँगन, गाँव के पनघट व कस्बों के सार्वजनिक स्थानों से कुएँ गायब हुए हैं।

    बावड़ियों को हजम करने का काम भी आजादी के बाद ही हुआ। हमारा आदि समाज गर्मी के चार महीनों के लिए पानी जमा करना व उसे किफायत से खर्च करने को अपनी संस्कृति मानता था। वह अपने इलाके के मौसम, जलवायु चक्र, भूगर्भ, धरती संरचना, पानी की माँग व आपूर्ति का गणित भी जानता था। उसे पता था कि कब खेत को पानी चाहिए और कितना मवेशी को और कितने में कण्ठ तर हो जाएगा।

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    Author: 
    केसर सिंह
    होलीहोलीफाल्गुन आते ही फाल्गुनी हवा मौसम के बदलने का एहसास करा देती है। कंपकपाती ठंड से राहत लेकर आने वाला फाल्गुन मास लोगों के बीच एक नया सुख का एहसास कराता है। फाल्गुन मास से शुरू होने वाली बसंत ऋतु किसानों के खेतों में नई फसलों की सौगात देता है। पतझड़ के बाद धरती के चारों तरफ हरियाली की एक नई चुनरी ओढ़ा देता है बसंत, हर छोटे–बड़े पौधों में फूल खिला देता है बसंत, ऐसा लगता है एक नये सृजन की तैयारी लेकर आता है बसंत। ऐसे में हर कोई बसंत में अपनी जिंदगी में भी हँसी, खुशी और नयापन भर लेना चाहता हैं। इसी माहौल को भारतीय चित्त ने एक त्योहार का नाम दिया होली। जैसे बसंत प्रकृति के हर रूप में रंग बिखेर देता है। ऐसे ही होली मानव के तन-मन में रंग बिखेर देती है। जीवन को नये उल्लास से भर देती है।

    होली नई फसलों का त्योहार है, प्रकृति के रंगो में सराबोर होने का त्योहार है। मूलतः होली का त्योहार प्रकृति का पर्व है। इस पर्व को भक्ति और भावना से इसीलिए जोड़ा जाता है कि ताकि प्रकृति के इस रूप से आदमी जुडे और उसके अमूल्य धरोहरों को समझे जिनसे ही आदमी का जीवन है।

    इस खबर के स्रोत का लिंक: 

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    .भू-अधिकार के मसले पर सरकार को चेतावनी देने के आयोजनों का एक दौर सम्पन्न हो चुका है। वाया अन्ना, आयोजन का अगला दौर नौ मार्च को वर्धा (महाराष्ट्र) स्थित सेवाग्राम से शुरू होगा। इन आयोजनों का जनता को हुआ हासिल अभी सिर्फ इतना ही है कि वह जान चुकी है कि कोई ऐसा कानून बना था, जिसमें उनकी राय के बगैर खेती-किसानी की ज़मीन नहीं ली जा सकती थी।

    मोदी सरकार ने उसमें कुछ ऐसा परिवर्तन किया है कि जिसके कारण सरकार जब चाहे, खेती-किसानी की जमीन कब्जा सकती है। सम्भव है कि देश के पाँच करोड़ भूमिहीनों में से कुछ ने यह सपना भी हासिल किया हो कि दिल्ली के संसद मार्ग को कई बार रौंदने पर रहने और कहने को ज़मीन का एक टुकड़ा हासिल किया जा सकता है।

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    Author: 
    सुरेन्द्र बांसल
    Source: 
    गाँधी मार्ग, मार्च-अप्रैल 2015

    ‘सथ्थ’ का अर्थ है साथ-साथ मिल बैठना। सथ्थ समाज के भीतर से ही ऐसे आत्मीय लोगों के समूह का नाम है जो कहीं गाँव, चौपाल, घर, द्वार या शामलात भूमि पर मिल बैठ आस-पास के सब दुखों का निदान ढूँढ़ते थे। समाज में तरह-तरह की संस्थाएं काम करती ही हैं। उनमें अच्छे-बुरे का भाव भी ढूँढ़ा ही जा सकता है। लेकिन सथ्थ कुछ बिरले प्रयोगों में लगी संस्था है। सथ्थ का मूल काम दोनों ओर के पंजाब की लुप्त होती आत्मा तलाशना है। सथ्थ का कोई दफ्तर, दस्यता, पहचान पत्र, पिता का नाम, राष्ट्रीयता, अध्यक्ष, सचिव, साइन बोर्ड, बैंक बैलेन्स वगैरा कुछ नहीं है।

    पुराण, इतिहास गवाह हैं कि अपनी जड़ों से कट कर सब चेतन-अचेतन मुरझा जाते हैं। मूल से कट कर मूल्य कभी बचाए नहीं जा सके। सभ्यताएँ, परम्पराएँ, समाज भी हरे पेड़ों की तरह होती हैं। उन्हें भी अच्छे विचारों की खाद, सरल मन जल की नमी, ममता की आँच और प्रकृति के उपकारों के प्रति कारसेवक-सा भाव ही टिका के रख सकता है। इन सब तत्वों के बिना समाज के भीतर उदासी घर करने लगती है।

    पंजाब आज इसी उदासी का शिकार है। अनुभव कहता है कि जब भी कोई समाज अपने को अपने से काट कर अपना भविष्य संवारने निकलता है तो उसमें परायापन झलकने लगता है। परायेपन को बनावटीपन में बदलते देर नहीं लगती। आज ऐसा ही परायापन हरित क्रान्ति के मारे और नशों में झूमते पंजाब के कोने-कोने में देखने को मिलता है। परायापन एक गम्भीर समस्या है, बेशक वो घर का हो या समाज का। उससे सबकी कमर झुकने लगती है।

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    Author: 
    पुष्पेन्द्र कुमार
    .बुन्देलखण्ड उत्तर प्रदेश के महोबा जनपद में राज-समाज की साझी पहल के प्रभाव से समझ में समानता नजर आने लगी है। अच्छे काम, अच्छी योजना के विचार का माध्यम चाहे जो भी हों। उस पर राज-समाज की सहमति का अकाल बाधक नहीं है। कुछ विभाग और उनके मुखिया तो ऐसे भी हैं। जिन्हें अपनी ही किसी पूर्व प्रस्तावित परियोजना को नकारने में भी देर नहीं लगती है।

    यदि उसकी तुलना में कोई दूसरी परियोजना से अधिक फायदा लिया जा सकता होे। ऐसे ही एक परियोजना में बदलाव हुआ है। जो इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि बुन्देलखण्ड में अकाल छँटने की शुरुआत हुई है। और अच्छे विचारों का जनमत संग्रह भी हुआ है।

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    विश्व जल दिवस पर विशेष


    .अब सुनने में आया है कि लखनऊ में शामे अवध की शान गोमती नदी को लन्दन की टेम्स नदी की तरह सँवारा जाएगा। महानगर में आठ किलोमीटर के बहाव मार्ग को घाघरा और शारदा नहर से जोड़कर नदी को सदानीरा बनाया जाएगा। साथ ही इसके सभी घाट व तटों को चमकाया जाएगा। इस पर खर्च आएगा ‘महज’ छह सौ करोड़।

    पूर्व में भी गोमती को पावन बनाने पर कोई 300 करोड़ खर्च हुए थे, लेकिन इसकी निचली लहर में बीओडी की मात्रा तयशुदा मानक से चार गुणा ज्यादा जहरीली ही रही। इससे पहले काॅमनवेल्थ खेलों के पहले दिल्ली में यमुना तट को भी टेम्स की तरह सुन्दर बनाने का सपना दिया गया था, नदी तो और मैली हो गई हाँ, जहाँ नदी का पानी बहना था, वहाँ काॅमनवेल्थ गेम विलेज, अक्षरधाम मन्दिर और ऐसे ही कई निर्माण कर दिए गए।

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    विश्व जल दिवस पर विशेष


    .बधाई! यह विश्व जल दिवस के आने से पहले की कई तारीखें भारत की नदियों के लिए कुछ खास आस लेकर आई हैं। अच्छी खबरें कई हैं, लेकिन इससे अच्छी और अतुलनीय.. कोई नहीं।

    प्रदूषण करने वाले को पार्टी से निकाला


    कुछ वर्ष पूर्व खनन में संलग्न होने पर जल बिरादरी के एक प्रदेश संयोजक की पदमुक्ति के निर्णय का बखान करते मैंने कई को सुना। किन्तु एक मार्च, 2015 से पहले मैंने यह कभी नहीं सुना कि नदी प्रदूषित करने के दोषी पदाधिकारी को किसी राजनैतिक दल ने पार्टी से ही निकाल दिया हो।

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    विश्व जल दिवस पर विशेष


    .विश्व जल दिवस यानी पानी के वास्तविक मूल्य को समझने का दिन, पानी बचाने के संकल्प का दिन। पानी के महत्व को जानने का दिन और जल संरक्षण के विषय में समय रहते सचेत होने का दिन। आँकड़े बताते हैं कि विश्व के 1.6 अरब लोगों को पीने का शुद्ध पानी नहीं मिल रहा है।

    पानी की इसी जंग को खत्म करने और जल संकट को दूर करने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने 1992 में रियो डि जेनेरियो के अपने अधिवेशन में 22 मार्च को विश्व जल दिवस के रूप में मनाने का निश्चय किया था। विश्व जल दिवस की अन्तरराष्ट्रीय पहल रियो डि जेनेरियो में 1992 में आयोजित पर्यावरण तथा विकास का संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में की गई।

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    Author: 
    कुमार कृष्णन
    विश्व जल दिवस पर विशेष
    .'अगली शताब्दी के युद्ध पानी के कारण होंगे।'यह घोषणा विश्व बैंक के तत्कालीन अध्यक्ष इस्माइल सेराबेल्डिन ने 1995 में ही की थी। पानी का संकट भारत, इजराइल, चीन, बोलिविया,कनाडा, मेक्सिको, घाना और संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के मीडिया की सुर्खियाँ बन रही हैं। दुनिया में 1993 से हर 22 मार्च को विश्व जल दिवस मनाया जाता है।

    इस दिन संयुक्त राष्ट्र की सिफारिशों को पूरा करने के लिए प्रतिबद्धता की है। संयुक्त राष्ट्र ने स्वच्छ पेयजल, पेयजल की उपलब्धता को बनाए रखने, पानी को बचाने, ताजे पानी के स्रोतों को बचाने और इसके सम्बन्ध में विभिन्न देशों में चलाई जाने वाली गतिविधियों को प्रोत्साहित करने की सिफारिश की थी। विश्व जल दिवस के अवसर पर यह स्मरण कराया जाता है कि पानी का महत्व क्या है और कैसे उसके स्रोतों को बचाया जा सकता है।

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    Author: 
    डॉ. सरिता

    विश्व जल दिवस पर विशेष


    विन्ध्य क्षेत्र में दैत्याकार पाँच ताप बिजली घरों से होगी भारी तबाही

    .स्वराज की लड़ाई के दौरान महात्मा गाँधी एक बार इलाहाबाद आए हुए थे। उन्हें दातून करना था। वह एक लोटा पानी लेकर एक पेड़ के पास चले गए। जिससे दातुन करते समय जो भी पानी गिरे वह पेड़ की जड़ में चला जाए। यह देखकर जवाहर लाल नेहरू ने कहा-ये आप क्या कर रहे है? यहाँ तो पानी की कोई कमी नहीं है। पास में ही गंगा-यमुना का संगम है। तब गाँधी ने कहा गंगा-यमुना का पानी हम लोगों के लिये नहीं है, उसे अविरल बहने दो।

    इस बात पर विचार करने की जरूरत है कि 70 साल पहले गाँधी एक लोटा पानी भी बर्बाद नहीं करना चाहते थे और आज, उसी प्रयाग में ताप बिजली घरों के लिये करोड़ो लीटर पानी गंगा-यमुना से खींचकर प्रयाग को बंजर बनाने की तैयारी चल रही है। अफसोस होता है कि आज नई-नई टेक्नोलॉजी विकसित होने के बाद भी कोयले से बिजली बनाने की होड़ मची हुई है।

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    Author: 
    प्रदीप सिंह
    विश्व जल दिवस पर विशेष
    .जब मानवजाति का विकास नहीं हुआ था तब जीवन पूरी तरह प्रकृति पर ही निर्भर थी। जैसे-जैसे विकास की गति तेज होती गई प्रकृति का दोहन शुरू हो गया। हवा, जल, मिट्टी और यहाँ तक कि आकाश पर मानव अपना एकाधिकार जताने लगा। पहले पर्यावरण अपने आप में इतनी सन्तुलित थी कि शायद ही कभी किसी बीमारी या प्राकृतिक आपदा का सामना करना पड़ा रहा हो।

    आज यह सन्तुलन इतना बिगाड़ गया है कि पानी जैसे प्राकृतिक संसाधनों की कमी से लोग दो-चार हो रहे हैं। पहले पानी सामुदायिक इस्तेमाल की चीज होती थी। लोग पानी के स्रोत के पास जाकर पानी भरते थे लेकिन अब पानी आपके पास आ जाता है। ‘प्यासा कुआँ के पास जाता है’ जैसे कहावत उल्टे हो रहे हैं।

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    Author: 
    प्रेमविजय पाटिल

    विश्व जल दिवस पर विशेष


    .जल मानव सभ्यता के लिए सबसे जरूरी प्राकृतिक संसाधन है। इसलिए नदियों को मानव सभ्यता की पालक माना जाता है। बिजली, सिंचाई और आजीविका का आधार होने के कारण नदियाँ विकास की धुरी रही हैं। जल ग्रहण क्षेत्र की जमीन का दोषपूर्ण उपयोग एवं घटते वृक्ष आवरण की वजह से भू-क्षरण और प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है।

    नर्मदा नदी जो कि मप्र के कई जिलों की लाइफ लाइन मानी जाती है। उस नर्मदा को हरियाली चुनरी यानी पौधारोपण की सौगात देने के लिए योजनाएँ तो बन रही हैं, किन्तु उसके क्रियान्वयन में दिक्कत है। वहीं निर्मलता के लिए कदम तो उठाए जा रह हैं, किन्तु उनके नतीजे सामने नहीं आ रहे हैं।

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    विश्व जल दिवस पर विशेष


    प्रकृति और इंसान के बनाए ढाँचों में सन्तुलन कैसे हो?


    .प्रकृति है, तो पानी है। पानी है, तो प्रकृति का हर जीव है; पारिस्थितिकी है। समृद्ध जल सम्पदा के बगैर, पारिस्थितिकीय समृद्धि सम्भव नहीं। पारिस्थितिकीय समृद्धि के बगैर, जल समृद्धि की कल्पना करना ही बेवकूफी है। विश्व जल दिवस के प्रणेताओं की चिन्ता है कि जलचक्र, अपना अनुशासन और तारतम्य खो रहा है। प्रकृति और इंसान की बनाए ढाँचों के बीच में सन्तुलन कैसे बने? प्रकृति को बदलने का आदेश हम दे नहीं सकते। हम अपने रहन-सहन और आदतों को प्रकृति के अनुरूप कैसे बदलें? चिन्ता इसकी है।

    स्लम बढ़े या गाँव रहें?


    पानी बसाता है। सारी सभ्यताएँ पानी के किनारे ही बसीं। किन्तु दुनिया भर में हर सप्ताह करीब 10 लाख लोग अपनी जड़ों से उखड़कर शहरों की ओर पलायन कर रहेे हैं। 7400 लाख लोगों को वह पानी मुहैया नहीं, जिसे किसी भी मुल्क के मानक पानी योग्य मानते हैं।

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    Author: 
    डॉ. वेंकटेश दत्ता
    .रिवर फ्रंट प्रोजेक्ट के लिये नदी के स्वाभाविक और पर्यावरणीय प्रवाह का सटीक आकलन जरूरी है। सबसे जरूरी है कि इसके आस-पास की ज़मीन पर किसी तरह का निर्माण न हो, नदियों के मूल स्वरूप में किसी तरह की छेड़छाड़ न की जाए।

    गोमती नदी से शहर के करीब बीस लाख लोगों को पानी की आपूर्ति की जाती है। ऐसा पहली बार हुआ है कि गोमती नदी की सफाई के लिये लखनऊ में कुडिया घाट के पास सिंचाई विभाग के द्वारा नदी की धारा को रोककर पानी का डायवर्सन किया गया है। गोमती रिवर फ्रंट प्रोजेक्ट के तहत नदी की धारा को नियन्त्रित करने के लिये एक बाईपास बनाया गया है। जो पिछले महीने पानी के तेज बहाव के चलते बह गया था। दस मीटर चौड़े इस बाईपास पर बोल्डर, सैंड-बैग्स और बल्लियों से बाँधकर नियन्त्रित मात्रा में पानी निकालने का इन्तजाम किया गया है।

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    संस्मरण


    विश्व जल दिवस पर विशेष


    .जल संरक्षण परम्पराओं की प्राचीन तकनीक में पूरी दुनिया में भारत का अपना स्थान है। भारत का हृदय प्रदेश- मध्य प्रदेश भी इस सन्दर्भ में देश में अपना अहम स्थान रखता है। प्रदेश के मालवा, निमाड़, ग्वालियर, चम्बल, बुन्देलखण्ड, बघेलखण्ड, महाकौशल और मध्य क्षेत्र में विविध परम्पराओं की झलक दिखाई देती है। यहाँ प्रमुख तकनीकी में पहाड़ियों, किलों में जल प्रबन्धन, बड़े तालाब, कुएँ, कुण्ड, बावड़ियाँ, बन्धान तो है ही लेकिन कुछ अद्भुत परम्पराएँ भी यहाँ आकर्षण का कारण है।

    बुरहानपुर में सुरंग बनाकर जल संरक्षण की तकनीक थी जिसका मूल स्रोत पहाड़ियाँ रही हैं। खूनी भण्डारा की मिसाल दुनिया में केवल तेहरान में ही मिलती है। मध्य प्रदेश में कृत्रिम नदियाँ हैं। पानी के बाँध, बन्धिया और हवेलियाँ भी हैं। यहाँ आदिवासी क्षेत्रों में बिना किसी मोटर या इंजन के पानी को पहाड़ियों पर चढ़ाने की तकनीक ख्यात रही है। पहाड़ों पर सरोवर बनाए जाते थे ताकि तलहटी में पानी की आवक सदा बनी रहे। पन्ना में जलसुरंगें पाई जाती हैं।

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