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    Author: 
    सुंदरराजन कृष्णन और राजनारायण इंदु
    .भारत में फ्लोरोसिस का पता 1930 के दशक में चला और तब से तकरीबन एक सदी बीतने के बावजूद यह एक विकराल समस्या के रूप में हमारे सामने मौजूद है। 1970 के दशक तक इस मसले पर कुछ गम्भीर शोध किये गए, मगर उस वक्त से अब तक इस विषय को लेकर कोई ढंग का रचनात्मक शोध नहीं हुआ है। जबकि इस दौरान समस्या और जटिल होती चली गई, जिससे इस समस्या पर काम करने वालों के लिये इससे जुड़कर आगे बढ़ना ही मुश्किल हो गया।

    इस रोग से लाखों लोगों के पीड़ित होने के बावजूद वैश्विक स्तर पर इसके निदान के लिये कोई कार्यक्रम तैयार नहीं हुआ है और कोई ऐसी संस्था नहीं है जिसके पास इस रोग से मुकाबले की विशेषज्ञता हो, कुछ छोटे संस्थानों को छोड़कर जो इस दिशा में शोध कर रहे हैं और अपने नतीजों के सहारे फ्लोरोसिस से मुकाबला कर रहे हैं।

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    विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष


    .5 जून को हर साल पूरी दुनिया में अन्तरराष्ट्रीय पर्यावरण दिवस एक रस्म अदायगी के तौर पर मनाया जाता है। रस्म अदायगी इसलिये क्योंकि पिछले 20 साल से दुनिया भर में पर्यावरण संरक्षण को लेकर काफी बातें, सम्मेलन, सेमिनार आदि हुए और लगातार हो भी रहे हैं लेकिन ज़मीनी स्तर पर हालत नहीं बदले या ये कहें की हालात बहुत ख़राब हो गए हैं।

    कार्बन उत्सर्जन कम होने के बजाय बढ़ा है इसके साथ ही दुनिया भर में कई तरह का प्रदूषण भी बढ़ा है। भयंकर वायु प्रदूषण के कारण हालात तो यहाँ तक हो गए हैं कि दुनिया भर के कई शहर रहने लायक ही नहीं बचे हैं। अधिकांश नदियाँ, तालाब, पेड़-पौधे, पशु-पक्षियों की प्रजातियाँ विलुप्त हो चुकी हैं। कथित विकास पर्यावरण को हर दिन, हर समय, हर जगह लील रहा है। प्रकृति को नुकसान पहुँचाने के परिणाम भी अब दिखने लगे हैं जब पिछले दिनों नेपाल में आए विनाशकारी भूकम्प में 8000 से अधिक लोगों को अपनी जान गवानी पड़ी और इसके साथ ही भारी जान-माल का नुकसान भी हुआ।

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    Author: 
    अमरनाथ
    .नमामि गंगे परियोजना की प्रगति से उमा भारती चाहे जितनी आशावादी हों, जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मन्त्रालय ने नदियों को आपस में जोड़ने के काम को प्राथमिकता दी है। एक राष्ट्रीय परिदृश्य योजना तैयार की गई है। इसके अन्तर्गत जल-आधिक्य वाले इलाके से जल-न्यूनता वाले इलाके में जल स्थान्तरित करने पर जोर दिया जाएगा। मन्त्रालय ने चार जून को एक विज्ञप्ति जारी कर अपनी उपलब्धियों का विवरण दिया है।

    विज्ञप्ति के अनुसार, केन-बेतवा परियोजना का तेजी से कार्यान्वयन होगा। दमन गंगा-पिंजल की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार की गई है। पार-तापी-नर्मदा लिंक की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट को अन्तिम रूप दिया जा रहा है। महानदी-गोदावरी बाढ़ नियन्त्रण परियोजना शुरू की गई है। बिहार की दो परियोजनाएँ- बूढ़ी गण्डक नून बाया लिंक और कोसी मेची लिंक की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट पूरी की गई है।

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  • 06/14/15--03:23: नदी पुराण
  • Author: 
    कृष्ण गोपाल 'व्यास’
    .आमतौर पर नदी वैज्ञानिक ही नदियों के जन्म या प्राकृतिक जिम्मेदारियों की हकीक़त को जानने का प्रयास करते हैं। आम नागरिक के लिये यह विषय बहुत आकर्षक नहीं है इसलिये वे उसे, सामान्यतः जानने का प्रयास नहीं करते। वास्तव में नदी की कहानी बेहद सरल और सहज है।

    वैज्ञानिक बताते हैं कि प्रत्येक नदी प्राकृतिक जलचक्र का अभिन्न अंग है। उसके जन्म के लिये बरसात या बर्फ के पिघलने से मिला पानी जिम्मेदार होता है। उसका मार्ग ढ़ालू जमीन पर बहता पानी, भूमि कटाव की मदद से तय करता है। ग्लेशियरों से निकली नदियों को छोड़कर बाकी नदियों में बरसात बाद बहने वाला पानी ज़मीन के नीचे से मिलता है।

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    .तमिलनाडु के एक छोटे गाँव का गरीब किसान अब समृद्ध हो गया है। ज्यादा लागत और कम उपज वाली रासायनिक खेती को छोड़कर वह जैविक खेती की ओर मुड़ा और सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ता गया। अब वह खुद ही नहीं बल्कि दूसरों को भी जैविक खेती के तौर-तरीके सिखाता है। वह एक गुमनाम किसान नहीं, जाना-माना जैविक खेती का ट्रेनर बन गया है।

    यह कहानी है जयप्पा की, जो कृष्णागिरी जिले के तली गाँव का रहने वाला है। उसके पास 3 एकड़ जमीन है। यह जमीन पथरीली व रेतीली है। वह 15 साल से अपने खेत में रासायनिक खाद का इस्तेमाल नहीं करता है। पूरी तरह जैविक खेती करते हैं, प्राकृतिक व केंचुआ खाद पर आधारित है।

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    Source: 
    इंडिया वाटर पोर्टल (हिन्दी)

    विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष


    इस पर्यावरण दिवस पुरबियातान फेम लोकगायिका चन्दन तिवारी की पहल
    नदी के मर्म को समझने, उससे रिश्ता बनाने की संगीतमय गुहार


    .पाँच जून को पर्यावरण दिवस के मौके पर अपने उद्यम व उद्यमिता से एक छोटी कोशिश लोकगायिका चन्दन तिवारी भी कर रही हैं। साधारण संसाधनों से साधारण फलक पर यह असाधारण कोशिश जैसी है। चन्दन पर्यावरण बचाने के लिये अपनी विधा संगीत का उपयोग कर और उसका सहारा लेकर लोगों से नदी की स्थिति जानने, उससे आत्मीय रिश्ता बनाने और उसे बचाने की अपील करेंगी।

    लोकराग के सौजन्य व सहयोग से चन्दन ने ‘नदिया धीरे बहो...’ नाम से एक नई संगीत शृंखला को तैयार किया है, जिसका पहला शीर्षक गीत वह पर्यावरण दिवस पाँच जून को ऑनलाइन माध्यम से देश तथा देश के बाहर विभिन्न स्थानों पर जनता के बीच लोकार्पित कीं। इस गीत के बोल हैं- अब कौन सुनेगा तेरी आह रे नदिया धीरे बहो...।इस गीत की रचना बिहार के पश्चिम चम्पारण के बगहा के रहने वाले मुरारी शरण जी ने की है।

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    .आजकल पर्यावरण क्षरण और जलवायु परिवर्तन का सवाल बहस का मुद्दा बना हुआ है कारण इसके चलते आज समूची दुनिया का अस्तित्व खतरे में है। पर्यावरणविद् इस बारे में समय-समय पर चेता रहे हैं और वैज्ञानिकों के शोध-अध्ययनों ने इस तथ्य को साबित कर दिया है। सच यह है कि जीवनदायिनी प्रकृति और उसके द्वारा प्रदत्त प्राकृतिक संसाधनों के बेतहाशा उपयोग और भौतिक सुख सुविधाओं की चाहत की अन्धी दौड़ के चलते आज न केवल प्रदूषण बढ़ा है बल्कि अन्धाधुन्ध प्रदूषण के कारण जलवायु में बदलाव आने से धरती तप रही है।

    इसका सबसे बड़ा कारण मानवीय स्वार्थ है जो प्रदूषण का जनक है जिसने खुद उसे भयंकर विपत्तियों के जाल में उलझाकर रख दिया है। उससे बाहर निकल पाना मानव के बूते के बाहर की बात है।

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    .मसला था घर में नलों में आने वाले पानी की कीमतें बढ़ाने के फैसले के विरोध का, बड़े-बड़े नेता एकत्र हुए थे व उनका कहना था कि स्थानीय निकाय का यह कदम गरीब की कमर तोड़ देगा। उन सभी नेताओं के सामने प्लास्टिक की बोतलों में पानी रखा हुआ था, जिसके एक लीटर की कीमत होती है, कम-से-कम पन्द्रह रुपए।

    वहीं दिल्ली में घर पर नलों से आने वाले एक हजार लीटर पानी के दाम बामुश्किल चार रुपए होता है, जो पानी नेताजी पी रहे थे उसके दाम सरकारी सप्लाई के पानी से शायद चार हजार गुणा ज्यादा है, लेकिन स्वच्छ, नियमित पानी की माँग करने के बनिस्पत दाम करने के लिये हल्ला-गुल्ला करने वाले असल में बोतलबन्द पानी की उस विपणन व्यवस्था के सहयात्री हैं जो जल जैसे प्राकृतिक संसाधन की बर्बादी, परिवेश में प्लास्टिक घेालने जैसे अपराध और जल के नाम पर जहर बाँटने का काम धड़ल्ले से वैध तरीके से कर रहे हैं।

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    .माण्डव में आप जैसे-जैसे इमारतों को देखते जाएँगे- जल प्रबन्धन के नए-नए तरीके आपको दिखते जाएँगे..! यहाँ का शाही महलों वाला इलाका भी सदियों पुराने दिलचस्प जल प्रबन्धन से भरा पड़ा है।

    जब हम जहाज महल में प्रवेश करते हैं तो इसका नाम सार्थक होता नजर आता है। इसके एक ओर मुंज तालाब है तो दूसरी ओर कपूर तालाब। मुंज तालाब का नाम धार के परमार शासकों में राजा मुंज के नाम पर है। वे तालाब बहुत रुचि के साथ बनाया करते थे। इस नाम से धार व उज्जैन में भी तालाब है। कपूर तालाब के बारे में किंवदन्ती है कि सुल्तान गयासुद्दीन खिलजी की रानियों के स्नान के लिये यह तालाब काम में आता था। सुल्तान इसमें कपूर व अन्य जड़ी-बूटियाँ डलवाता था- ताकि इन रानियों के बाल सफेद नहीं होने पाए।

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    Author: 
    अमरनाथ
    .अब मानसरोवर का पानी बोतलबन्द करके बेचा जाएगा। तिब्बत में मानसोवर झील के एकदम निकट बॉटलिंग प्लांट लगाने की घोषणा हुई है। मानसरोवर का बोतलबन्द पानी भारत और दूसरे देशों के शिवभक्तों में बेचा जाएगा।

    प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी की चीन यात्रा के दौरान हुई घोषणाओं में यह खबर दब सी गई। प्रोजेक्ट कम्प्यूटर निर्माता डेल के एशिया प्रशान्त क्षेत्र के प्रमुख अमित मिधा की पत्नी वैशाली मिधा लगा रही हैं। इसकी घोषणा 16 मई को हुई। मानसरोवर का पानी अक्टूबर तक भारत में बिकने लगेगा। बोतलों के ढक्कन रूद्राक्ष के बने होंगे। बोतलों पर शिव स्त्रोत लिखें होंगे। अर्थात शिवभक्तों को आकर्षित करने के उपायों के साथ यह कम्पनी पानी के बाजार में उतर रही है। बंगलुरु से संचालित न्यूज पोर्टल ‘स्वराज्य’ ने 11 जून को इस बारे में पत्रकार सहाना सिंह की रपट प्रकाशित की है।

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    Author: 
    अभय मिश्र
    Source: 
    कादम्बिनी, मई 2015
    गंगा सफाई के सवाल पर एक अहम बात यह भी है कि जिस गंगा की सफाई की बात हम कर रहे हैं वह गंगा है भी कि नहीं। कानपुर और बनारस में तो गंगा है ही नहीं, गंगा के नाम पर चम्बल और बेतवा का पानी गन्दले नाले में तब्दील हो चला है।

    .गंगा समग्र यात्रा के दौरान कानपुर में अपने भाषण में उमा भारती ने दो बातें कही थीं। उन्होंने दावा किया था कि सरकार बनते ही ये दोनों काम उनकी प्राथमिकता में होंगे। पहला, कानपुर के गंगा जल को आचमन के योग्य बनाएँगे और दूसरा यह कि गौ हत्या पर ऐसा कानून बनाया जाएगा कि असली गाय तो दूर कोई कागज पर बनी गाय को काटने की भी हिम्मत नहीं कर पायेगा। लेकिन यहाँ हम बात केवल गंगा की कर रहे हैं।

    तो कानपुर से ही बात शुरू करते हैं, इन पंक्तियों के लेखक का दावा है कि कानपुर में गंगा जल है ही नहीं। तो फिर आचमन योग्य किस चीज को बनाया जाएगा? कानपुर, गंगा पथ का ऐसा अभागा शहर है जहाँ नाव पतवार से नहीं बाँस से चलती है।

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    Author: 
    ज्ञानेन्द्र रावत
    आज हमें भूजल के भयावह संकट के रूप में भुगतना पड़ रहा है। इसका इलाज भी हमें ही खोजना होगा। यह सच है कि पंच तत्वों में शामिल पानी सबसे अमूल्य प्राकृतिक संसाधन है। पानी के बिना जीवन असम्भव है। लेकिन दुख इस बात का है मानव के अस्तित्व के लिये जरूरी जल को वही मानव सुरक्षित नहीं रख सका। इसका कारण यह रहा कि पानी धरती पर प्रचुर मात्रा में उपलब्ध था। लिहाजा पानी के प्रति मानव के गैर जिम्मेदाराना व्यवहार ने जलस्रोतों के खात्मे के द्वार खोल दिये।आज समूची दुनिया में पेयजल का सबसे बड़ा स्रोत भूजल गम्भीर संकट में है। बेतहाशा बढ़ती आबादी, कृषि और उद्योगों के विकास के कारण एक तिहाई भूजल बेसिन में पानी तेजी से कम होता जा रहा है। अमेरिकी अन्तरिक्ष एजेंसी नासा के ट्विन ग्रेस उपग्रहों की तस्वीरों में यह खुलासा हुआ है कि जितना पानी इन बेसिन में पहुँचता है, उससे कहीं ज्यादा उसका अवशोषण हो रहा है।

    इस तरह भूजल बेसिन में पानी धीरे-धीरे कम होता जा रहा है और यदि यही हाल रहा तो आने वाले दिनों में यह समस्या और विकराल रूप धारण कर लेगी। वर्ष 2003 से 2013 के बीच किये गए इस अध्ययन में खुलासा हुआ है कि समुद्र में ज्यादा पानी पहुँचने से यह समस्या और गम्भीर होती जा रही है। यदि इस पर तत्काल ध्यान नहीं दिया गया तो भविष्य में भारत, चीन, अमेरिका और फ्रांस में बहुत बड़ी तादाद में लोग पानी के लिये तरस जाएँगे।

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    Source: 
    सीएसई

    काल और स्थान (टाइम और स्पेस)


    .फ्लोराइड नामक विष और उससे होने वाली बीमारी फ्लोरोसिस के बारे में हमें 1930 में ही पता चल गया था। फ्लोरोसिस रोग का फैलाव देश के बड़े भू-भाग में हो चुका है और 19 राज्यों के लोग इसके चपेट में आ गए हैं। इसके भौगोलिक फैलाव और इससे होने वाली समस्या की गम्भीरता का आकलन मुमकिन होने के बावजूद अब तक हमारे पास इसके बारे में समुचित जानकारी नहीं है। देश में अब भी फ्लोराइड प्रभावित इलाकों की खोज हो रही है; परन्तु इसके फैलाव की सीमा रेखा खींचने का काम अभी बाकी है। हालांकि इसका यह मतलब नहीं है कि यह कहीं और विद्यमान नहीं है।

    बरसों से इसने पेयजल के जरिए मिलने वाले पोषण को नुकसान पहुँचाया है। फ्लोराइड प्रभावित इलाकों में लोग बड़ी तेजी से अपंग हो रहे हैं। आज वास्तव में उस इलाकों में रहने वाले लोग एक अलग मुल्क के बाशिंदे लगने लगे हैं। उस देश के सभी नागरिक भावनात्मक रूप से एक हो गए हैं, सभी ज़मीन से निकाला गया ऐसा पानी पीते हैं, जिसमें प्रति लीटर पानी में 1.5 मिलिग्राम (मि.ग्रा.) से भी ज्यादा फ्लोराइड है। यहाँ रहने वाले सभी लोग बीमार हैं।

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    Author: 
    सुंदरराजन कृष्णन और राजनारायण इंदु
    .भारत में फ्लोरोसिस का पता 1930 के दशक में चला और तब से तकरीबन एक सदी बीतने के बावजूद यह एक विकराल समस्या के रूप में हमारे सामने मौजूद है। 1970 के दशक तक इस मसले पर कुछ गम्भीर शोध किये गए, मगर उस वक्त से अब तक इस विषय को लेकर कोई ढंग का रचनात्मक शोध नहीं हुआ है। जबकि इस दौरान समस्या और जटिल होती चली गई, जिससे इस समस्या पर काम करने वालों के लिये इससे जुड़कर आगे बढ़ना ही मुश्किल हो गया।

    इस रोग से लाखों लोगों के पीड़ित होने के बावजूद वैश्विक स्तर पर इसके निदान के लिये कोई कार्यक्रम तैयार नहीं हुआ है और कोई ऐसी संस्था नहीं है जिसके पास इस रोग से मुकाबले की विशेषज्ञता हो, कुछ छोटे संस्थानों को छोड़कर जो इस दिशा में शोध कर रहे हैं और अपने नतीजों के सहारे फ्लोरोसिस से मुकाबला कर रहे हैं।

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    Author: 
    मीनाक्षी अरोरा और केसर
    Source: 
    गाँधी-मार्ग, जुलाई-अगस्त 2015
    .मेघ ही वे कहार हैं, जो नदी-नाले, गाड़-गधेरे और कुआँ-बावड़ी, ताल-तलैया- हर जलस्रोत में पानी भरते हैं। मेघ प्रति वर्ष यह काम सचमुच कश्मीर से कन्याकुमारी तक अथक करते हैं। मेघ बड़े बहादुर कहार हैं। ये खूब भारी डोली यानी सारा तरल वाष्प लेकर हजारों मील दूर से भारत की यात्रा केरल से शुरू करते हैं। हमारे यहाँ मानसून हिन्द महासागर, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से आता है। कभी-कभी मानसून जम्मू-कश्मीर की सीमाओं को पार कर पाकिस्तान होते हुए ईरान की ओर यात्रा पर चला जाता है, तो कभी पूर्वी सीमा पार कर जापान की ओर।

    दिल्ली तक आते-आते ये मेघ लगभग पच्चीस सौ से चार हजार किलोमीटर की यात्रा कर चुके होते हैं। बूँद, बारिश, मेघ और मानसून के इस मिले-जुले खेल का रूप है वर्षाऋतु। प्रकृति ने धरती की सतह का दो-तिहाई भाग को समुद्र बनाया है। पानी की कोई कमी नहीं छोड़ी है। सूरज की तपस्या से, सूरज के तपने से समुद्र का पानी भाप बनता है। बूँद-बूँद भाप बनकर ऊपर उठती है और नीचे जो खारा समुद्र है, उसका कुछ अंश उठाकर आकाश में निर्मल जल का एक और सागर तैरा देती है।

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    Author: 
    अनीता शर्मा
    Source: 
    पीएसआई, देहरादून
    .धार जिला मध्य प्रदेश के दक्षिणी आदिवासी इलाके में स्थित है। यह एक सूखा प्रभावित जिला है जो न सिर्फ नियमित तौर पर जल संकट की समस्या से जूझता है बल्कि यहाँ के भूमिगत जल में फ्लोराइड की मात्रा भी काफी अधिक है, जिसकी वजह से हड्डियाँ टेढ़ी कर देने वाले फ्लोरोसिस रोग का यहाँ प्रकोप रहता है। यहाँ के लोग भूमिगत जल पर आश्रित हैं जिसमें फ्लोराइड की सान्द्रता काफी अधिक पाई जाती है।

    सिंचित खेती में बढ़ोत्तरी के साथ-साथ यहाँ भूमिगत जल के स्तर में गिरावट आने लगी, लिहाजा लोगों को और गहराई तक जाने के लिये मजबूर होना पड़ा। बिजली ने काफी अधिक गहराई से पानी बाहर निकालने की सुविधा उपलब्ध करा दी है, जिसकी वजह से अधिक दूषित भूजल बाहर आने लगा है।

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    Author: 
    सचिन बैरागी
    .झाबुआ मध्य प्रदेश के पश्चिमी भाग में स्थित 3782 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है। पहाड़ी ढलानों पर बसे इस आदिवासी बहुल जिले में प्राकृतिक संसाधनों का विपुल भण्डार है। जिले के पूरब में राज्य के सीमाई जिले बड़वानी, धार व रतलाम हैं तो पश्चिमी सीमा गुजरात राज्य तथा पश्चिम-उत्तरी सीमा राजस्थान राज्य से लगती है। यह जिला मध्यम वर्षा मण्डल के तहत आता है।

    जिले के उत्तरी भाग में हथिनी नदी व दक्षिणी भाग में अनास नदी बहती है। यहाँ पर सागोन, खेर, महुआ, ताड़ी व बाँस के पेड़ बहुतायत में हैं। लाइम स्टोन, डोलामाइट, केल्साइट आदि यहाँ की प्रमुख खनिज सम्पदा हैं। मेघनगर जिले का मुख्य औद्योगिक क्षेत्र है।

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    Author: 
    कुमार कृष्णन

    विश्व जनसंख्या दिवस पर विशेष


    बढ़ती जनसंख्या के कारण कृषि विस्तार के लिये वनों को काटा जा रहा है। इससे कृषि योग्य बंजर भूमि तथा विविध वृक्ष प्रजातियों तथा बागों की सुरक्षित भूमि में कमी हो रही है। औद्योगिक विकास तथा आर्थिक विकास की चाह में उष्ण कटिबंधीय वनों का विनाश होते हम सभी देख रहे हैं। उष्ण कटिबंधीय सघन वन प्रतिवर्ष एक करोड़ हेक्टेयर की वार्षिक दर से लुप्त हो रहे हैं। थाईलैण्ड तथा फिलीपीन्स जैसे देश में जो कभी प्रमुख लकड़ी निर्यातक देशों में अग्रणी थे, वनों के विनाश के कारण बाढ़, सूखे तथा पारिस्थितिकी विनाश के शिकार हैं।पूरी दुनिया जनसंख्या के बढ़ते बोझ से चिन्तित है। इससे न केवल हमारा आर्थिक सन्तुलन बल्कि पारिस्थितिकीय सन्तुलन को भी बिगाड़ दिया है, जिसका परिणाम हम बढ़ती प्राकृतिक एवं मानव जन्य आपदाओं तथा जलवायु परिवर्तन जैसी पर्यावरण चुनौतियों से जोड़कर देख सकते हैं। जल प्रदूषण, वायू प्रदूषण जैसी समस्याओं का कारण बढ़ती जनसंख्या ही है। जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव सीमित प्राकृतिक संसाधनों पर अत्यधिक दबाव पड़ रहा है, य​ह चिन्ताजनक स्थिति है।

    वर्तमान में विश्व की जनसंख्या 7 अरब से भी ज्यादा है, जो वर्ष 2100 तक दस अरब 90 करोड़ होने का अनुमान है। जनसंख्या की वृद्धि मुख्यतः विकासशील देशों में होने की सम्भावना है। इसमें से आधी से ज्यादा जनसंख्या अफ्रीकी देशों में होगी। वर्ष 2050 में नाइजीरिया की जनसंख्या संयुक्त राष्ट्र अमेरिका से ज्यादा हो जाने की सम्भावना है।

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    विश्व जनसंख्या दिवस पर विशेष


    दुनिया की शहरी आबादी का 86 फीसद हिस्सा इन क्षेत्रों में निवास करेगा। शहरी जनसंख्या में इस तरह की अभूतपूर्व बढ़ोत्तरी से शहरों में नौकरी, घर और बिजली प्रदान करने की नई चुनौतियाँ पैदा होंगी। यही नहीं शहरी गरीबी को कम करने के लिये बुनियादी ढाँचे का विकास, मलिन बस्तियों का विस्तार, पीने के पानी की समस्या और पर्यावरण में गिरावट आदि अन्य बहुतेरी चुनौतियों का सामना भी सरकारों को करना पड़ेगा जो आसान नहीं होगा।आज दुनिया की आबादी सात अरब को पार कर चुकी है और सबसे बड़ी चिन्ता की बात यह है कि इसमें बेतहाशा बढ़ोत्तरी हो रही है। ग़ौरतलब है कि साठ के दशक के आखिरी वर्षों में सालाना वैश्विक जनसंख्या वृद्धि दर 2.1 फीसदी थी जो 2011 में 1.2 फीसदी को पार कर गई है। अभी वैश्विक आबादी में हर साल 8 से 9 करोड़ की वृद्धि हो रही है। इस बारे में संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि भविष्य में कुछ बड़े अफ्रीकी और दक्षिण एशियाई देश ही वैश्विक आबादी को तेजी से बढ़ाएँगे। इसमें खासतौर से भारत भी शामिल है जो दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला दूसरा देश है।

    आने वाले 10-12 वर्षों में भारत चीन से भी आगे निकल जाएगा। जल क्षेत्र में प्रमुख परामर्श कम्पनी इए वॉटर की मानें तो वर्ष 2025 में भारत को भीषण जल संकट का सामना करना पड़ेगा। इस संकट के पीछे पानी की माँग एवं आपूर्ति में भीषण अन्तर की अहम भूमिका होगी। इसका प्रमुख कारण परिवार की आय बढ़ने तथा सेवा एवं उद्योग क्षेत्र से योगदान बढ़ने के कारण घरेलू और औद्योगिक क्षेत्रों में पानी की माँग में उल्लेखनीय बढ़ोत्तरी होगा। ऐसी आशंका है वर्ष 2060 में भारत की आबादी 1.7 अरब तक पहुँच जाएगी।

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    Author: 
    मनीष वैद्य

    विश्व जनसंख्या दिवस पर विशेष


    जनसंख्या के अनुपात में पानी की माँग एक तरफ तेजी से बढ़ रही है तो दूसरी तरफ पानी ज़मीन में गहरे से भी गहरे जा रहा है। परम्परागत स्रोतों को हम पहले ही सिरे से नकार चुके हैं। वे या तो अतिक्रमण की भेंट चढ़ चुके हैं या इतने उपेक्षित कि अब वे पानी देने से रहे। वर्ष 2010 की वर्ल्ड बैंक रिपोर्ट ने ही साफ कर दिया था कि भारत में जल स्तर लगातार घट रहा है। हम पानी का सबसे ज्यादा और फिजूल खर्च करने वाले देशों में गिने जाते हैं। इससे पीने के पानी की समस्या हर साल विकराल होती जा रही है।तेजी से बढ़ती जनसंख्या पूरी दुनिया के लिये परेशानी का सबब बनती जा रही है। दुनिया की आबादी जिस तेज रफ्तार से बढ़ रही है, उससे कई पर्यावरणीय समस्याओं के खतरे अब साफ़ तौर पर सामने नजर आने लगे हैं। जनसंख्या विस्फोट का सबसे बुरा असर हमारे प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ता है। जनसंख्या बढ़ने के साथ ही प्राकृतिक संसाधनों पर भी दबाव बढ़ने लगता है। जल, जंगल और ज़मीन लगातार कम होते जा रहे हैं। दरअसल प्राकृतिक संसाधन तो हमारे पास उतने ही हैं सदियों से, अब उनमें तो कोई बढ़ोत्तरी सम्भव है नहीं।

    दुनिया की आबादी 7 अरब तक पहुँच गई है और यह इतनी तेजी से लगातार बढ़ रही है कि वर्ष 2100 तक लगभग 11 अरब तक पहुँचने की विशेषज्ञों ने सम्भावना जताई है। अकेले भारत की जनसंख्या चीन से आगे बढ़ने की होड़ में है। स्वाभाविक ही है कि जैसे–जैसे जनसंख्या बढ़ती है, वैसे-वैसे प्राकृतिक संसाधन कम होने लगते हैं। नदियाँ हों या ज़मीन के अन्दर का पानी, ज़मीन हो या जंगल, पहाड़ हो या खेत–खलिहान, पेड़–पौधे हो या वन्यजीव, खाद्य सामग्री हो या कपड़े इन सबकी अपनी एक सीमा है और उसी के अनुपात में ये हमें पिछली कई पीढ़ियों से जीवन के लिये जरूरी सामग्री उपलब्ध कराते रहे हैं।

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