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    विश्व साक्षरता दिवस 08 सितम्बर 2015 पर विशेष


    .पानीदार समाज सिर्फ पढ़ने–लिखने भर से नहीं बन जाया करता। पढ़ने–लिखने के लिये साक्षरता जरूरी हो सकती है लेकिन पानीदार होने के लिये पानी के पर्यावरण को समझने भर या मात्र शिक्षित हो जाने से काम नहीं चलता बल्कि उसके लिये ज़मीन पर काम करना ही पड़ता है। पढ़ने–लिखने से हमारी समझ विकसित हो सकती है, दृष्टि बन सकती है हम जागरूक हो सकते हैं पर पानीदार होने के लिये केवल इतना ही जरूरी नहीं होता।

    पानी आज जीवन के लिये सबसे जरूरी होता जा रहा है। पानी के बिना सामाजिक और आर्थिक प्रगति के बारे में सोचा तक नहीं जा सकता। अब सोचिए, उस जमाने के बारे में जब न तो इतने लोग पढ़े–लिखे हुआ करते थे और न ही कागज–किताबों में पानी की इतनी बातें हुआ करती थी तो भी पानी को लेकर उनके अनुभव का ज्ञान किस हद तक उन्नत और उर्वर था कि उन्होंने उस संसाधन विहीन दौर में भी ऐसी–ऐसी जल संरचनाएँ और तकनीकें जुटाई कि आज के वैज्ञानिक दौर में भी हम उन्हें देखकर हैरत में पड़ जाते हैं।

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    हिमालय दिवस 9 सितम्बर 2015 पर विशेष


    .उत्तराखण्ड के ठेठ ग्रामीण परिवेश में रहने वाले लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि एवं पशुपालन है। यही उनकी आजीविका का मुख्य स्रोत भी है। यानि कृषि-पशुपालन से ही से वे भोजन एवं वस्त्रों की अपनी समुचित व्यवस्था भी करते हैं और अपने इस व्यवसाय के साथ-साथ वे प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के भी पुख्ता उपादान करते रहे हैं।

    ज्ञातव्य हो कि ऊँची ढालदार पहाड़ियों में जंगलों के बीच बसे गाँव व पहाड़ों में अन्य जगहों पर प्रवास करने वाले पशुपालकों को जीवनरूपी अमृत ‘पानी’की प्राथमिक आवश्यकता थी। जबकि उन दिनों घने वनों के बीच में रहने वाले पशुओं के लिये चारा-पानी आसानी से मिल जाता है।

    मगर ऊँचे पहाड़ों व ढालदार ज़मीन पर पानी का उपलब्ध होना ही अपने आप में अनोखा माना जाता है। इसलिये कि पानी का स्रोत तो आमतौर पर भूमिगत ही होता है। देखिए कि वहाँ के निवासियों ने वहीं बसेरा किया तो वहीं ‘जल संरक्षण’ के तौर-तरिके भी अख्तियार किये। यही आज के वे दूर-दराज अर्थात दूरस्थ गाँव कहलाए जाते हैं।

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    Author: 
    अमरनाथ

    विश्व साक्षरता दिवस 8 सितम्बर 2015 पर विशेष


    .‘प्यासा कौआ’ पानी और पर्यावरण शिक्षा का पहला पाठ है। घड़े के पेंदे में पानी होने, कंकड़ डालकर पानी ऊपर लाने और प्यास बुझाने की यह कहानी कई रूपों में पढ़ाई जाती है। यह रूपक कथा या कविता बच्चों को विवेक, उद्यम और पानी के महत्त्व को एक साथ बताती है। पर वर्तमान परिस्थितियों में कौआ और कंकड़ का रूपक किसी काम का नहीं।

    सम्भव है अभी के स्कूली बच्चे ऐसे भी हों जिन्होंने घड़ा भी नहीं देखा हो। क्योंकि तकरीबन हर घर में चापाकल है या फिर नल से पानी आने की सुविधा है। पानी कहीं से लाने, रखने की जरूरत नहीं है। और रखना भी है तो वाटर फिल्टर या फ्रिज में रखना है। ऐसे में जल के बारे में शिक्षण या वाटर लिटरेसी थोड़ा कठिन काम हो गया है।

    देश में पहला हरित पाठ्यचर्या तैयार करने वाले प्रोफेसर विनय कंठ ने कहा कि कुछ विकसित देशों में पर्यावरण का ज्ञान भूगोल के अंग के रूप में कराया जाता है,

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    हिमालय दिवस 9 सितम्बर 2015 पर विशेष


    .आज समूचा हिमालय क्षेत्र संकट में है। इसका प्रमुख कारण इस समूचे क्षेत्र में विकास के नाम पर अन्धाधुन्ध बन रहे अनगिनत बाँध हैं। दुख इस बात का है कि हमारे नीति-नियन्ताओं ने कभी भी इसके दुष्परिणामों के बारे में सोचा तक नहीं। वे आँख बन्द कर इस क्षेत्र में पनबिजली परियोजनाओं को ही विकास का प्रतीक मानकर उनको स्वीकृति-दर-स्वीकृति प्रदान करते रहे, बिना यह जाने-समझे कि इससे पारिस्थितिकी तंत्र को कितना नुकसान उठाना पड़ेगा।

    पर्यावरण प्रभावित होगा वह अलग जिसकी भरपाई असम्भव होगी। उस स्थिति में जबकि दुनिया के वैज्ञानिकों ने इस बात को साबित कर दिया है कि बाँध पर्यावरण के लिये भीषण खतरा हैं और दुनिया के दूसरे देश अपने यहाँ से धीरे-धीरे बाँधों को कम करते जा रहे हैं। अब सवाल यह उठता है कि यदि यह सिलसिला इसी तरह जारी रहा तो इस पूरे हिमालयी क्षेत्र का पर्यावरण कैसे बचेगा।

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    हिमालय दिवस 9 सितम्बर 2015 पर विशेष


    .पच्चीस सौ किलोमीटर लम्बे और करीब तीन सौ किलोमीटर चौड़ाई वाले हिमालय क्षेत्र के स्वास्थ्य की चिन्ता में पिछले कुछ वर्षों से देश भर और खासकर उत्तराखण्ड और हिमाचल प्रदेश में 9 सितम्बर को ‘हिमालय दिवस’ मनाया जा रहा है। उत्तराखण्ड सहित अन्य हिमालयी राज्यों की सरकारें भले ही पूरे साल जल-जंगल-ज़मीन को नुकसान पहुँचाकर और भू-वन-रेता-बजरी माफ़िया को संरक्षण देकर पारिस्थितिकी और पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाले काम करती रहें, लेकिन 9 सितम्बर को हिमालय दिवस मनाना नहीं भूलती हैं। उत्तराखण्ड सरकार तो बाकायदा स्कूलों को सर्कुलर भेजकर हिमालय दिवस मनाने को कहती है।

    सरकार ही नहीं, अनेक राजनीतिक और सामाजिक संगठन भी इस दिन बड़े-बड़े वादों के साथ हिमालय दिवस मनाने की रस्म अदायगी करते हैं। अगले दिन समाचारपत्रों में अपना समाचार और फोटो देखने के बाद ये लोग भूल जाते हैं कि हिमालय के सरोकारों को लेकर उन्होंने कुछ कहा था। समाचारपत्र की तरह हिमालय दिवस भी एक दिन में ही बासी हो जाता है।

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    Author: 
    अमरनाथ

    हिमालय दिवस 9 सितम्बर 2015 पर विशेष


    .नेपाल में भूकम्प के बाद राहत, बचाव और क्षति के आकलन का दौर पूरा हो गया है। यह पुनरुद्धार और पुनर्निर्माण का दौर है। इसी दौर में ऐसे तौर-तरीके अपनाए जा सकते हैं जिससे भविष्य में सम्भावित आपदाओं का मुकाबला आसानी से किया जा सके।

    हालांकि नेपाल की वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में किसी बड़ी पहल की उम्मीद नहीं की जा सकती, बल्कि बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार अवश्यम्भावी है। फिर भी पुनर्निर्माण हो रहे हैं और नेपाल सरकार के राष्ट्रीय योजना आयोग के साथ मिलकर आईसीआईएमओडी (इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट) ने ‘भूकम्प पीड़ित क्षेत्रों में टिकाऊ आजीविका की रणनीतिक रूपरेखा’तैयार की है। हिमालय क्षेत्र में जारी भूगर्भीय हलचलों के मद्देनज़र यह महत्त्वपूर्ण पहल है।

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    हिमालय दिवस 9 सितम्बर 2015 पर विशेष


    .भूगर्भीय कालचक्र में हिमालय प्रकृति की एक नवीनतम कृति है। विशेषज्ञों के मुताबिक हिमालय अपनी रचना पक्रिया में है इसीलिये अस्थिर है और इसकी सारी हलचल अपने स्थिर होने की कोशिश के कारण है। ये तथ्य भूगर्भशास्त्रियों में कुतूहल तो पैदा करते ही हैं लेकिन उससे भी बड़ी बात यह कि भारत की जलवायु और मौसम को निर्धारित करने में हिमालय की बड़ी भूमिका है।

    विशेषज्ञों ने यहाँ तक सिद्ध कर दिया है कि हिमालय बनने के बाद ही उस पार से आने वाली बर्फीली हवाओं के रुकने का कुदरती इन्तज़ाम हुआ था। भारत की छह ऋतुओं की अनुपम व्यवस्था का निर्धारक भी हिमालय ही सिद्ध हुआ है।

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    हिमालय दिवस 9 सितम्बर 2015 पर विशेष


    .इसी साल अप्रैल माह में नेपाल में आये विनाशकारी भूकम्प ने साबित कर दिया है कि इस भूभाग में भूकम्प का सबसे ज्यादा खतरा देश के हिमालय और उसके आस-पास के क्षेत्र पर मँडरा रहा है। यह सब हिमालय की अनदेखी का परिणाम है जिसे झुठलाया नहीं जा सकता। यह भूकम्प हिरोशिमा पर बरसाये परमाणु बम से 504.4 गुना ताकतवर था।

    यदि इस भूकम्प का केन्द्र ज़मीन के अन्दर ज्यादा गहराई में न होता तो यह नेपाल के साथ-साथ भारत और समूचे दक्षिण एशिया के लिये और अधिक विनाशकारी होता। इससे पड़ोसी देशों खासकर नेपाल से जुड़े भारतीय क्षेत्र में काफी तबाही हुई। इसके अलावा चीन, भूटान, बांग्लादेश और पाकिस्तान तक में इसका असर पड़ा। इससे जो मानवीय क्षति हुई, उसकी भरपाई असम्भव है। वह कभी नहीं हो पाएगी।

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    हिमालय दिवस 9 सितम्बर 2015 पर विशेष


    .ग्लोबल वार्मिंग या धरती का गरम होना, कार्बन उत्सर्जन, जलवायु परिवर्तन और इसके दुष्परिणाम स्वयं धरती के शीतलीकरण का काम कर रहे ग्लेशियरों पर आ रहे भयंकर संकट व उसके कारण समूची धरती के अस्तित्त्व के खतरे की बातें अब महज कुछ पर्यावरण-विशेषज्ञों तक सीमित नहीं रह गई हैं।

    इसका विमर्श बच्चे की पाठ्यपुस्तकों तक में है और इसी आसन्न खतरे की चेतावनी के बदौलत भारत की झोली में विज्ञान का एक नोबेल पुरस्कार आ गया।

    ‘नोबेल’ वैज्ञानिक एक महिला के यौन उत्पीड़न को लेकर बदनाम हो गए और धीरे से उनके उस दावे के दूसरे पहलू भी सामने आने लगे कि जल्द ही हिमालय के ग्लेशियर पिघल जाएँगे, जिसके चलते नदियों में पानी बढ़ेगा और उसके परिणामस्वरूप जहाँ एक तरफ कई नगर-गाँव जलमग्न हो जाएँगे, वहीं धरती के बढ़ते तापमान को थामने वाली छतरी के नष्ट होने से भयानक सूखा, बाढ़ व गर्मी पड़ेगी और जाहिर है कि ऐसे हालात में मानव-जीवन पर भी संकट होगा।

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    Author: 
    विनायक परिहार
    Source: 
    गाँधी मार्ग, सितम्बर-अक्टूबर 2015
    उज्जैन में क्षिप्रा नदी ने अपने किनारों को तोड़ कर सब मन्दिरों, घाटों, हाट-बाजारों और गली-मोहल्लों में चक्कर लगा कर एक बार फिर यह बताने, समझाने की कोशिश की है कि नदियों को जीवित करने के लिये उनमें कहीं और से पानी लाकर डालना ठीक नहीं है। ऐसी सूखी मानी गई नदी पूरे शहर-गाँवों को डुबो सकती है। नदी, वर्षा, तालाब और भूजल का यह विचित्र खेल समझा रहे हैं श्री विनायक परिहार।

    .देश भर में नदियों को जोड़ने की बात एक बार फिर तेजी से होने लगी है। इसे समय की जरूरत बताते हुए कहा जा रहा है कि इससे देश की 90 प्रतिशत कृषि योग्य भूमि को सिंचित किया जा सकता है। इस परियोजना को देश के सर्वोच्च न्यायालय से समयबद्ध क्रियान्वयन का निर्देश भी दिया जा चुका है।

    लेकिन इस पर न तो कोई आम बहस होने दी गई और न सम्बन्धित लोगों, जन संगठनों या स्वतंत्र विशेषज्ञों से कोई राय ही ली गई है। वैसे तो नदी जोड़ो परियोजना कागज और भाषणों में सम्मोहक लगती है लेकिन इस परियोजना के दूसरे पहलुओं पर नजर डालें तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि जब तक यह कागज और जुबान पर है, तभी तक अच्छी है।

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    Author: 
    अमरनाथ
    पहले पानी 45 फीट पर आता था, आज 60 फीट पर मिलता है। उसमें गंध रहता है और थोड़ी देर रखने पर पानी के उपर एक परत नजर आती है। कुल्हड़िया में पहले पानी 20 फीट पर था, अब 60 फीट पर है। कपड़े धोने पर पीले पड़ जाते हैं, पानी को स्थिर रखने पर ऊपर एक परत जम जाती है। पेयजल के माध्यम से मानव शरीर में एकत्र लौहतत्वों की अधिकता से कई बीमारियाँ होती हैं। जिनमें बाल गिरने से लेकर किडनी-लीवर की बीमारी के अलावा चिड़चिड़ापन व मस्तिष्क की बीमारियाँ भी शामिल हैं।भूजल घटने से पूरा देश, बल्कि दुनिया के अधिकतर देश चिन्तित हैं। फिर भी बाढ़ग्रस्त कोसी क्षेत्र के भूगर्भीय जल भण्डार घटने और दूषित होने की खबरें चौंकाती हैं, सचेत करती हैं। 18 गाँवों के सर्वेक्षण में पता चला कि पहले जहाँ 10-15 फीट गहराई पर पानी था, अब 70-80-100 फीट नीचे चला गया है।

    लोग हर काम के लिये भूजल पर निर्भर हैं। पेयजल के लिये चापाकल और सिंचाई के लिये नलकूप का प्रयोग लगातार बढ़ता गया है। करीब 79 प्रतिशत सिंचाई नलकूपों से होती है। वर्षाजल की हिस्सेदारी महज 15 प्रतिशत है। नदी और तालाब की हिस्सेदारी महज 5-6 प्रतिशत है।

    यह बाढ़ ग्रस्त क्षेत्र हैं। बाढ़ में आई पतली मिट्टी (सिल्ट या विभिन्न जैविक उर्वरकों से युक्त गाद) -बालू के कारण क्षेत्र की मिट्टी बलुआही है। उसकी जलधारण क्षमता कम है। इसलिये बरसात में जलनिकासी की समस्या भी उत्पन्न होती है और जल-जमाव होता है। कोसी तटबन्ध बनने के बाद बाढ़ विकराल हुई। उसका रूप बदला, वह विध्वंसक हो गई।

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    विश्व नदी दिवस, 27 सितम्बर 2015 पर विशेष


    .नदी और समाज के बीच कई हजारों साल पुराना मजबूत और आत्मीय किस्म का रिश्ता रहा है। अब तक का इतिहास देखें तो दुनिया की तमाम सभ्यताएँ नदियों के किनारे ही पली–बढ़ी और अतिश्योक्ति नहीं होगी कि नदियों के कारण ही सैकड़ों सालों तक उनका अपना अस्तित्व भी बना रहा।

    शायद इस नजरिए से ही नदियों को मानव सभ्यता की माताओं का दर्जा दिया जाता रहा है। दुनिया की कोई भी प्राचीनतम सभ्यता रही हो, चाहे वह सिन्धु और गंगा की सभ्यता हो या दजला फरात की या नील की हो या ह्वांगहो की सभ्यता रही हो, वे इन नदियों की घाटियों में ही पनपी और आगे बढ़ी।

    शायद नदियों के बिना किसी सभ्यता की कल्पना इसलिये भी सम्भव नहीं कि मनुष्य के लिये सबसे जरूरी पानी की आपूर्ति उसे नदी तटों या अन्य जलस्रोतों से ही करना पड़ता है।

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    विश्व नदी दिवस, 27 सितम्बर 2015 पर विशेष


    .बारिश के बादल अपने घरों को लौट रहे हैं, सुबह सूरज कुछ देर से दिखता है और जल्दी अंधेरा छाने लगा है, मौसम का यह बदलता मिज़ाज असल में उमंगों, खुशहाली के स्वागत की तैयारी है। सनातन मान्यताओं की तरह प्रत्येक शुभ कार्य के पहले गजानन गणपति की आराधना अनिवार्य है और इसी लिये उत्सवों का प्रारम्भ गणेश चतुर्थी से ही होता है।

    अब दुर्गा पूजा या नवरात्रि, दीपावली से लेकर होली तक एक के बाद एक के आने वाले त्योहार असल में किसी जाति-पंथ के नहीं, बल्कि भारत की सम्बद्ध सांस्कृतिक परम्पराओं के प्रतीक हैं। विडम्बना है कि जिन त्योहारों के रीति-रिवाज, खानपान कभी समाज और प्रकृति के अनुरूप हुआ करते थे, आज पर्व के मायने हैं पर्यावरण, समाज और संस्कृति सभी का क्षरण।

    खूब हल्ला हुआ, निर्देश, आदेश का हवाला दिया गया, अदालतों के फरमान बताए गए, लेकिन गणपति का पर्व वही पुरानी गति से ही मनाया जा रहा है।

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    विश्व नदी दिवस, 27 सितम्बर 2015 पर विशेष


    .उत्तराखण्ड के सीमान्त जनपद उत्तरकाशी के पुरोला विकासखण्ड में बहने वाली कमल नदी का अपना अलग ही महत्त्व है। स्थानीय लोग इस नदी को ‘कमोल्ड’ नाम से जानते हैं। कमल नदी यहाँ के लोगों की जीवनरेखा है।

    यह नदी कोई ग्लेशियर से निकलने वाली नहीं है, यह तो कमलेश्वर स्थित जंगल के बीच एक प्राकृतिक जलस्रोत से निकलती है। जो सदाबहार जलधारा है। यह जलधारा कमल नदी के रूप में लगभग 30 किमी बहकर नौगाँव के पास यमुना में संगम बनाती है। जो कि क्रमशः कमलेश्वर से रामा, बेष्टी, कण्डियाल गाँव, कुमोला, देवढुंग, पुरोला, चन्देली, नेत्री, हुडोली, सुनाराछानी, थलीछानी सहित 55 गाँवों की खेती को सिंचित करते हुए नौगाँव स्थित यमुना से मिल जाती है।

    शुद्ध और बारहमास बहने वाली कमल नदी शनै-शनै बहती हुई अपने आस-पास की लगभग 4500 हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचित करती है।

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    Author: 
    अमरनाथ

    विश्व नदी दिवस, 27 सितम्बर 2015 पर विशेष


    .पानी का चंचल रूप है नदी। यह अपने कछार में बसे लोगों की जीवनरेखा है। नदी के कारण कृषि सम्भव हुआ। जो शिकारी था, वह किसान बन गया। उसे शिकार की भागदौड़ से मुक्ति मिली। वह एक जगह घर बसा कर कला, धर्म, आध्यात्म, विज्ञान और साहित्य की ओर अग्रसर हो सका। हजारों वर्षों से मनुष्य नदी की ओर खिंचता चला आया है।

    संस्कृतियों का जन्म नदियों की कोख से हुआ है। नदी हमारी आत्मा को तृप्त करती है। नदी हमारी चेतना का प्रवाह भी है।

    इन शास्त्रीय उल्लेखों के अलावा नदियों के बारे में अनेक साहित्यिक अभिव्यक्तियाँ भी मिलती हैं। जैसे नदियाँ राष्ट्रों की माताएँ हैं और पर्वत पिता। पिता निष्चेष्ट, निर्बन्ध और चिन्तामुक्त निर्द्वन्द्व पुरुष है तो नदियाँ सचेष्ट, गतिशील-मुक्तिदात्री एवं रसवती सरस्वती हैं। शून्य में स्वच्छन्द विचरण करने वाले मेघ जब क्षितिज की शय्या पर हलचल मचाकर रिक्त हो जाते हैं तब माता पृथ्वी उस तेजोदीप्त जीवन-पुष्प को अपनी सरितन्तुओं द्वारा धारण करती है।

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    Author: 
    डॉ. दिनेश कुमार मिश्र

    विश्व नदी दिवस, 27 सितम्बर 2015 पर विशेष


    .उत्तर बिहार में बहुत सी नदियों के किनारे तटबन्ध बने हुए हैं। इन तटबन्धों के बीच बहुत से गाँव बसे हुए है जिनका पुनर्वास होना चाहिए था मगर लोग पुनर्वास स्थलों पर या तो गए ही नहीं या जाकर लौट आये। कारण यह था कि उन्हें खेती की ज़मीन के बदले ज़मीन नहीं दी गई थी और मजबूरन उनकी वापसी हुई।

    कोसी के अलावा दूसरी नदियों में या तो घर बनाने के लिये कुछ रुपए दे दिये गए या फिर बागमती में जैसा हुआ कि सिर्फ घर उठा कर पुनर्वास में सामान ले जाने की लिये कुछ रुपये दे दिये गए और हो गया पुनर्वास। कई जगहों पर पुनर्वास स्थलों में जल-जमाव हो गया और लोग अपने पुश्तैनी ज़मीन पर वापस आने के लिये मजबूर हुए।

    आमतौर पर उत्तर बिहार की सभी नदियों के साथ यही हुआ। आज कोसी तटबन्धों के बीच 380 गाँव भारत के और 61 गाँव नेपाल के फँसे हुए है और इनकी आबादी अब 15 लाख के आस-पास होगी।

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    Author: 
    पुष्यमित्र

    विश्व नदी दिवस 27 सितम्बर 2015 पर विशेष


    .मीठे जल के स्रोत के रूप में अनादि काल से इंसानों को हर तरह की सुविधा उपलब्ध कराने वाली नदियाँ क्या किसी मानव समूह के लिये निरन्तर दुख की वजह बन सकती हैं? जिस नदियों के किनारे दुनिया भर की सभ्यताएँ विकसित हुई हैं, उद्योग-धंधे पाँव पसारने को आतुर रहते हैं, खेती की फसलें लहलहाती हैं, उन्हीं नदियों के किनारे बसी उत्तर बिहार की एक बड़ी आबादी गरीबी और लाचारी भरा जीवन जीने को विवश है।

    दुनिया भर में नदियों के किनारे बसे लोग लगातार समृद्ध होते रहे हैं, मगर इन इलाकों के लोग आज भी अठारहवीं सदी वाला जीवन जी रहे हैं। आखिर इसकी वजह क्या है? कहा जाता है कि सालाना बाढ़ की वजह से ऐसा होता है, मगर क्या बात इतनी सरल है?

    नेपाल की सीमा से सटे उत्तर बिहार के तराई इलाकों से होकर बिहार में सात बड़ी नदियाँ गुजरती हैं।

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    Author: 
    आशीष कुमार ‘अंशु’

    विश्व नदी दिवस, 27 सितम्बर 2015 पर विशेष


    नहीं रहे जल विषयों के अय्यार


    .पानी को पर्यावरण से जुड़े मुद्दों को ठीक से समझने वाला एक नाम पिछले दिनों हमारे बीच नहीं रहा। यह सच है कि उसके जाने की चर्चा हिन्दी पट्टी में थोड़ी कम हुई। लेकिन पानी के लिये किया गया उनका काम हिन्दी हो या तेलगू, पंजाबी हो या तमिल सबके लिये एक तरह से उपयोगी रहेगा।

    यहाँ हम बात कर रहे हैं, पानी से जुड़े मुद्दों के गहरे जानकार रामास्वामी आर अय्यर की। वे 1929 में तमिलनाडू में जन्मे और 86 साल की उम्र में 09 सितम्बर को वायरल का प्रकोप उनकी मौत का कारण बना। उनकी मृत्यु दिल्ली में हुई।

    जिन लोगों ने अय्यर साहब का नाम नहीं सुना, उन्हें जानना चाहिए कि उन्होंने 1987 में भारत की पहली जल नीति तैयार की।

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    विश्व नदी दिवस, 27 सितम्बर 2015 पर विशेष


    . 27 सितम्बर को हर वर्ष आना है अन्तरराष्ट्रीय नदी दिवस बनकर। किन्तु अब श्री रामास्वामी आर. अय्यर नहीं आएँगे। मुद्दा नदी का हो या जलनीति का, कार्यक्रम छोटा हो या बड़ा; बाल सुलभ सरलता.. मुस्कान लिये दुबले-पतले-लम्बे-गौरवर्ण श्री अय्यर सहजता से आते थे और सबसे पीछे की खाली कुर्सियों में ऐसे बैठ जाते थे, मानों वह हों ही नहीं। वह अब सचमुच नहीं हैं। 9 सितम्बर, 2015 को वह नहीं रहे। कई आयोजनों, रचनाओं और आन्दोलनों की ‘बैकफोर्स’ चली गई।

    श्री अय्यर यदि कोई फिल्म स्टार, खिलाड़ी, नेता, बड़े अपराधी या आतंकवादी होते, तो शायद यह हमारे टी वी चैनलों के लिये ‘प्राइम न्यूज’ और अखबारों के लिये ‘हेडलाइन’ होती।

    नई दिल्ली के लोदी रोड स्थित श्मशान गृह में हुए उनके अन्त्येष्टि संस्कार में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री से लेकर शोक जताने वालों की सूची अच्छी-खासी लम्बी होती; कैमरों की कतार होती; फ्लैश चमके होते, किन्तु यह सब नहीं हुआ; क्योंकि वह, वे सभी नहीं थे।

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    विश्व नदी दिवस, 27 सितम्बर 2015 पर विशेष


    .इस साल भी सूखा है। अब सूखा अनहोनी घटना नहीं रही, स्थायी हो गई है। भारतीय मौसम विभाग की भविष्यवाणी सही निकल गई है। खुद कृषि मंत्रालय ने स्वीकार कर लिया है कि सामान्य से पन्द्रह- सोलह फीसद कम बारिश हुई है। इससे खरीफ की फसल प्रभावित होगी। सबसे ज्यादा असर चावल, दलहन और मोटे अनाजों की पैदावार पर पड़ेगा। सबसे खराब हालत महाराष्ट्र, आन्ध्रप्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना में है। मध्य प्रदेश में सोयाबीन और मूँग की फसल को काफी नुकसान हो चुका है।

    पिछले कुछ सालों से किसानों को हर साल सूखे से जूझना पड़ता है और अब लगभग यह हर साल बना रहने वाला है। वर्ष 2009 में सबसे बुरी स्थिति रही है। पहले से ही खेती-किसानी बहुत संकट के दौर से गुजर रही है। कुछ सालों से किसानों की आत्महत्याओं का सिलसिला रुक नहीं रहा है।

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