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    Author: 
    पूजा सिंह
    गन्दे नालों से आ रही गन्दगी और खेतों की रासायनिक खाद के कारण न केवल भोपाल के मशहूर बड़े तालाब का पानी खराब हो रहा है बल्कि जलीय जीवों के लिये भी खतरा पैदा हो गया है।

    .तकरीबन 35 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला और 362 वर्ग किलोमीटर जल भराव क्षेत्र वाला भोपाल का बड़ा तालाब शहर के कई मोहल्लों की नालियों की गन्दगी अपने आप में समेटता हुआ धीमी मौत की ओर बढ़ रहा है। उल्लेखनीय है कि पर्यटकों और पक्षियों को समान रूप से प्रिय इस तालाब से ही शहर की तकरीबन 40 फीसदी आबादी को पेयजल की आपूर्ति की जाती है।

    मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने विधानसभा में एक लिखित प्रश्न के उत्तर में यह स्वीकार किया कि भोपाल शहर के नेहरू नगर, नया बसेरा, खानुगाँव, हलालपुरा, संजय नगर, राजेन्द्र नगर और बैरागढ़ समेत नौ नालों की गन्दगी लम्बे समय से लगातार बड़े तालाब में मिल रही है।

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    .इन दिनों देश में बाहर की कम्पनियों को कारखाने लगाने के लिये न्योतने का दौर चल रहा है। जबकि देश की बहुसंख्यक आबादी के जीवकोपार्जन के जरिए पर सभी मौन हैं। तेजी से विस्तार पर रहे शहरी मध्य वर्ग, कारपोरेट और आम लोगों के जनमानस को प्रभावित करने वाले मीडिया खेती-किसानी के मसले में लगभग अनभिज्ञ है।

    यही कारण है कि खेती के बढ़ते खर्चे, फसल का माकूल दाम ना मिलने, किसान-उपभोक्ता के बीच कई-कई बिचौलियों की मौजूदगी, फसल को सुरक्षित रखने के लिये गोडाउन व कोल्ड स्टोरेज और प्रस्तावित कारखाने लगाने और उसमें काम करने वालों के आवास के लिये ज़मीन की जरूरत पूरा करने के वास्ते अन्न उगाने वाले खेतों को उजाड़ने जैसे विषय अभी तक गौण हैं।

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    .तैयारी के तीन माह, सम्मेलन के 12 दिन-12 रातें, 50 हजार प्रतिभागी और समझौता मसौदा के 31 पन्ने: जलवायु दुरुस्त करने के मसले पर वैश्विक सहमति के लिये जैसे यह सब कुछ नाकाफी था; जैसे सबने तय कर लिया था कि इस बार नाकामयाब नहीं लौटेंगे। पेरिस जलवायु सम्मेलन की तारीखों में एक रात व एक दिन और जोड़े गए; वार- शनिवार, तारीख - 12 दिसम्बर, 2015।

    सुबह 27 पेजी नया मसौदा आया और शाम को नया क्षण। समय- रात के सात बजकर, 16 मिनट; सजी हुई नाम पट्टिकाएँ, उनके पीछे बैठे 196 देशों के प्रतिनिधि, फ्रांसीसी विदेश मंत्री लारेंट फेबियस की मंच पर वापसी, साथ में संयुक्त राष्ट्र उच्चाधिकारी और माइक पर एक उद्घोषणा - “पेरिस समझौते पर हस्ताक्षर हो चुके हैं।’’

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    Author: 
    अमरनाथ
    .भारत में विभिन्न क्षेत्रों की बढ़ती हुई और प्रतिस्पर्धात्मक माँग के कारण दिन-प्रतिदिन जल प्रबन्धन कठिन होता जा रहा है। हालांकि आज़ादी के बाद से ही भारत ने जल संसाधनों के विकास की दिशा में महत्त्वपूर्ण प्रयास किये हैं, लेकिन- ‘हमारा प्रयास ज्यादातर परियोजनाओं पर केन्द्रित रहा है जिससे पारिस्थितिकीय और प्रदूषण सम्बन्धी पहलुओं पर ध्यान नहीं दिया जा सका।

    इसके फलस्वरूप जल का अत्यधिक प्रयोग हुआ, जल प्रदूषण फैला और विभिन्न क्षेत्रों के बीच अमर्यादित प्रतिस्पर्धा बढ़ी। इसलिये जल के समुचित आवंटन, माँग के प्रबन्धन और उसके उपयोग के लिये प्रभावकारी उपाय किया जाना बहुत जरूरी है।’

    केन्द्रीय जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण राज्य मंत्री प्रोफेसर सांवर लाल जाट ने नई दिल्ली में भारतीय यूरोपीय जल मंच की पहली बैठक का उद्घाटन करते हुए इसे स्वीकार किया।

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    .चेन्नई पिछले दिनों आई भीषण बाढ़ की विभीषिका से धीरे-धीरे उबर रहा है। इसमें दो राय नहीं है कि चेन्नई ने इस बार जैसी बाढ़ का सामना किया, वैसी बाढ़ पिछले 100 सालों में चेन्नई में नहीं आई। इस बाढ़ ने पिछले 100 सालों का रिकार्ड तोड़ दिया। इस बाढ़ से चेन्नई में तबाही का जो मंजर देखने को मिला, वह अभूतपूर्व था।

    कुछ लोग इस तबाही के लिये ग्लोबल वार्मिंग को ज़िम्मेवार ठहराए, लेकिन इस हकीक़त से भी मुँह नहीं मोड़ा जा सकता कि चेन्नई की इस तबाही के लिये मानवीय गतिविधियाँ ज़िम्मेवार रहीं। यह भी एक हकीक़त है कि चेन्नई में भीषण बारिश हुई।

    यहाँ बीती 28 नवम्बर और चार दिसम्बर के बीच जिस तरह की भीषण बारिश हुई, चेन्नईवासियों की मानें तो इस बारिश ने पिछले 100 सालों का बारिश का रिकार्ड तोड़ दिया। इस दौरान चेन्नई के कुछ इलाकों में 500 मिलीमीटर से भी ज्यादा बारिश हुई।

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    Author: 
    अभय मिश्र
    .पिछले पखवाड़े केन्द्रीय गंगा संरक्षण मंत्री उमा भारती ने एक बार फिर गंगा की सफाई की नई तारीख दे दी। उन्होंने कहा कि अक्टूबर 2018 तक गंगा पूरी तरह निर्मल हो जाएगी। इससे पहले उन्होंने इसी तरह का दावा 2016 के लिये किया था।

    जब भारती गंगा की निर्मलता की नई तारीख दे रही थीं करीब–करीब उसी समय सुमेरू पीठ के शंकराचार्य नरेंद्रानंद सरस्वती ने भारती की कार्यक्षमता पर ऊँगली उठाते हुए प्रधानमंत्री से उन्हें बदलने की माँग कर डाली।

    हालांकि नरेंद्रानंद स्वघोषित शंकराचार्य हैं और सुमेरू पीठ का चार मुख्य पीठों में कोई स्थान नहीं है। भारती को उनकी चिन्ता करने की शायद जरूरत भी नहीं है। उनका मंत्रालय लगातार योजनाओं को कार्यरूप देने में जुटा है।

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    .बाढ़ ने दो हफ्ते तक चेन्नई को दहशत में बनाए रखा। इस आपदा में 200 से ज्यादा लोगों की मौत और आठ से दस हजार करोड़ के नुकसान के कारण राजनेताओं और सम्बन्धित सरकारी विभागों की चिन्ता स्वाभाविक थी। उनकी चिन्ता के प्रकार और उनकी चिन्ता की तीव्रता की जानकारी मीडिया लगातार देता रहा। यहाँ उसे दोहराने की जरूरत नहीं है।

    ज्यादातर पर्यावरण कार्यकर्ताओं को जो पिछले एक डेढ़ साल से कुछ चुप से थे उन्हें भी अपनी ज़िम्मेदारी के कारण मुखर होना पड़ा। पूरी गम्भीरता से इतना सब कुछ होने के बाद भी इस हादसे या कुदरती आफ़त के तर्कपूर्ण कारणों या आगे से बचाव या रोकथाम के उपायों पर सुझाव निकलकर अभी भी आ नहीं पाये।

    हो सकता है कि ऐसा इसलिये हुआ हो क्योंकि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के अकादमिक और व्यावहारिक विद्वानों को आगे बैठाकर उनसे बात करने का चलन अभी शुरू नहीं हो पाया है।

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    Author: 
    रमन त्यागी
    .पेरिस के जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में दो सप्ताह गहन मंथन हुआ। हाथ क्या लगा शायद ही किसी को समझ आया हो। ऐसे सम्मेलनों का आयोजन गरीब व विकासशील देशों के लिये अमीर व विकसित देशों द्वारा लॉलीपोप देने के लिये किया जाता है। पेरिस सम्मेलन में भी यही हुआ।

    अमीरों ने सीनाजोरी करते हुए तय कर दिया है कि हम चोरी भी करेंगे और सीना जोरी भी। जलवायु परिवर्तन के इस सम्मेलन को पिछली कुछ बैठकों के आइने में देखना बहुत जरूरी है। इससे यह समझने में कतई परेशानी नहीं होगी कि अमीर देश आखिर चाहते क्या हैं?

    जब संयुक्त राष्ट्र के महासचिव पद पर बान की मून आसीन हुए तो उन्होंने अपने पहले ही सम्बोधन में दुनिया को आगाह कर दिया था कि जलवायु परिवर्तन भविष्य में युद्ध और संघर्ष की बड़ी वजह बन सकता है। बाद में जब संयुक्त राष्ट्र द्वारा ग्लोबल वार्मिंग के सम्बन्ध में अपनी रिपोर्ट पेश की गई तो उससे इसकी पुष्टि भी हो गई थी।

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    .यह बात कई बार दोहराई जा चुकी है कि बाढ़ और सुखाड़ अब असामान्य नहीं, सामान्य क्रम है। बादल, कभी भी-कहीं भी बरसने से इनकार कर सकते हैं। बादल, कम समय में ढेर सारा बरसकर कभी किसी इलाके को डुबो भी सकते हैं। वे चाहें, तो रिमझिम फुहारों से आपको बाहर-भीतर सब तरफ तर भी कर सकते हैं; उनकी मर्जी।

    जब इंसान अपनी मर्जी का मालिक हो चला है, तो बादल तो हमेशा से ही आज़ाद और आवारा कहे जाते हैं। वे तो इसके लिये स्वतंत्र हैं ही। भारत सरकार के वर्तमान केन्द्रीय कृषि मंत्री ने जलवायु परिवर्तन के कारण भारतीय खेती पर आसन्न, इस नई तरह के खतरे को लेकर हाल ही में चिन्ता व्यक्त की है।

    लब्बोलुआब यह है कि मौसमी अनिश्चितता आगे भी बनी रहेगी; फिलहाल यह सुनिश्चित है। यह भी सुनिश्चित है कि फसल चाहे रबी की हो या खरीफ की; बिन बरसे बदरा की वजह से सूखे का सामना किसी को भी करना पड़ सकता है। यदि यह सब कुछ सुनिश्चित है, तो फिर सूखा राहत की हमारी योजना और तैयारी असल व्यवहार में सुनिश्चित क्यों नहीं?

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    .इस साल सामान्य से कम बारिश होने के कारण देश के 614 में से 302 जिले सूखे का संकट झेल रहे हैं। इससे पहले 2002 में देश को इससे भी अधिक सूखे को झेलना पड़ा था। तब कुल 383 जिले सूखे की चपेट में आये थे।

    सरकार उस इलाके को सूखाग्रस्त मानती है, जहाँ वर्षा सामान्य से 20 प्रतिशत कम होती है। जिन इलाकों में बारिश का आँकड़ा सामान्य से 50 फीसदी या इससे अधिक कमजोर हो, उन्हें भीषण सूखाग्रस्त कहा जाता है।

    इसे परिभाषा की कसौटी पर कसें, तो देश के 18 राज्यों के 66 करोड़ लोगों के सिर पर सूखा का संकट बनकर मंडरा रहा है। चिन्ता की बात यह है कि सूखे की मार उन इलाकों में पड़ी है, जहाँ जमीन बहुत उपजाऊ है।

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    .केन्द्र और दिल्ली सरकार की टकराहट में एक महत्त्वपूर्ण खबर अखबारों के अन्दर के पृष्ठों में कहीं दबकर रह गई। यह खबर उन आठ सूखा प्रभावित राज्यों से सम्बन्धित थी, जहाँ पीड़ितों के परिवार में भोजन के अभाव में कुपोषण और भूखमरी का खतरा है।

    जो देश बुलेट ट्रेन के सपने को पूरा करने वाला हो, सूचना प्रोद्योगिकी में पूरी दुनिया में एक बड़ा केन्द्र बनकर उभरा हो, वहाँ की बड़ी आबादी भूख और कुपोषण जैसे सवालों से टकरा रही है। यह सुनना भी विचित्र लगता है लेकिन यह इस देश की एक सच्चाई है। जिससे इन्कार नहीं किया जा सकता।

    सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के अन्तर्गत सभी सूखा प्रभावित क्षेत्रों में निःशुल्क अनाज उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है।

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    हिन्दी वाटर पोर्टल के आदरणीय पाठकों को ईद, क्रिसमस के साथ-साथ नूतन वर्ष 2016 की शुभकामना।

    .शुभकामना है कि आप स्वस्थ जीएँ; मरें, तो सन्तानों को साँसों और प्राणजयी संसाधनों का स्वस्थ-समृद्ध संसार देकर जाएँ। संकल्प करें; नीचे लिखे 21 नुस्खे अपनाएँ; आबोहवा बेहतर बनाएँ; मेरी शुभकामाना को 100 फीसदी सच कर जाएँ।

    1. स्वच्छता बढ़ाएँ।
    कचरा चाहे, डीजल में हो अथवा हमारे दिमाग में; ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ाने में उसकी भूमिका सर्वविदित है, किन्तु स्वच्छता का मतलब, शौचालय नहीं होता। शौचालय यानी शौच का घर यानी शौच को एक जगह जमा करते जाना। गन्दगी को जमा करने से कहीं स्वच्छता आती है?

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    Author: 
    शशिरंजन कुमार
    Source: 
    जल चेतना तकनीकी पत्रिका, सितम्बर, 2011
    .फ्लोरोसिस आधुनिक भारतीय समाज (खासकर ग्रामीण समाज) का वह अभिशाप है जो सुरसा की तरह मुॅंह फैलाए जा रही है और हजारों लोग प्रतिवर्ष इसकी चपेट में आकर वैसा ही महसूस कर रहे हैं जैसा कोई अजगर की गिरफ़्त में आकर महसूस करता है।

    फ्लोरोसिस मनुष्य को तब होता है जब वह मानक सीमा से अधिक घुलनशील फ्लोराइड-युक्त पेयजल को लगातार पीने के लिये व्यवहार में लाता रहता है।

    भारत में फ्लोरोसिस सर्वप्रथम सन् 1930 के आस-पास दक्षिण भारत के राज्य आन्ध्र प्रदेश में देखा गया था। लेकिन आज भारत के विभिन्न राज्यों में यह बिमारी अपने पाँव पसार चुकी है और दिन-प्रतिदिन इसका स्वरूप विकराल ही होता चला जा रहा है।

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    Author: 
    मनोरमा सिंह
    .लौटता मानसून दक्षिण भारत के खेतों को धान की हरियाली से भर देता है और किसानों के चेहरों को उम्मीद की मुस्कुराहट से। लेकिन अति किसी भी चीज की बुरी होती है, इस बार ये अति तमिलनाडु खासकर इस राज्य की राजधानी चेन्नई के लिये प्रलयंकारी साबित हुई।

    चेन्नई समेत तमिलनाडु के कई जिलों में नवम्बर-दिसम्बर के महीने में लगभग एक महीने तक लगातार हुई बारिश से 50 हजार करोड़ से ज्यादा का सीधे और कुल एक लाख करोड़ से भी ज्यादा का नुकसान हुआ।

    हालांकि चेन्नई के लिये ये प्राकृतिक आपदा उतनी विनाशक होनी नहीं चाहिए थी जितनी ये साबित हुई, शहर का अनियोजित विकास और बारिश के पानी को सोख लेने वाले झीलों, जलाशयों व दलदलों को पाट दिया जाना इस बाढ़ के ज्यादा बड़े कारण रहे, चेन्नई के 300 के करीब तालाब, टैंक और छोटी झीलें इन्हीं इमारतों में समा गईं।

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    .गंगा को निर्मल और अविरल बनाने का अभियान देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के एजेंडे में प्राथमिकता की दृष्टि से सर्वोपरि है। कारण गंगा सफाई के तीन दशक बाद भी गंगा जस-की-तस है। असलियत तो यह है कि गंगा पहले से और मैली हुई है और उसकी शुद्धि के लिये किये जाने वाले दावे-दर-दावे बेमानी साबित हुए हैं।

    2014 में मोदी सरकार के अस्तित्त्व में आने के डेढ़ साल बाद भी गंगा की शुद्धि एक सपना ही है। अभी हाल-फिलहाल गंगा में प्रदूषण की निगरानी के लिये एनजीटी की कानपुर पहुँची टीम ने जब कॉमन ट्रीटमेंट प्लांट का मुआयना किया तो उसके होश उड़ गए।

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    .साल के जाते-जाते नर्मदा से फिर भेंट हो गई। मन में आस लगी ही रहती है, उसके दर्शन की। इस बार 26 दिसम्बर को जब नरसिंहपुर में था तो बहन बोली- चलो भैया नर्मदा चलते हैं। सुबह ठंड बहुत थी तो निकलते-निकलते देर हो गई। आटो से चले तो राजमार्ग से होते हुए कुछ ही देर में बरमान पहुँच गए।

    मुझे पिछली बार की यात्रा की याद आ गई। जो मैंने करेली के पहले कठौतिया से अन्दर वाले रास्ते से की थी। वह रास्ता भी बहुत अच्छा था। उस रास्ते में हमें पेड़, पौधे, गेहूँ और गन्ने के खेत, बैलगाडियाँ और लोग मिले थे। राजमार्ग पर गुड़ बनाने की फ़ैक्टरियाँ, ढाबे और कुछ जगह अंग्रेजी स्कूल दिखे।

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    Author: 
    रवि प्रकाश, अपना तालाब अभियान

    . 14 दिसम्बर, 2015, बाँदा। 'अपना तालाब अभियान और अपना उद्यान अभियान'चित्रकूट मंडल के चारों जिलों में राज-समाज की साझी पहल बनाये जाने के लिये आयुक्त एल बेंकटेश्वर लू की अध्यक्षता में बैठक बुलाई गई। इस बैठक में सभी जनपदों के प्रमुख सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि, प्रमुख किसान और मुख्य विकास अधिकारी सहित सम्बन्धित विभागों के अधिकारी उपस्थित रहे। जिसमें अपना तालाब अभियान महोबा के सफल कार्यों, परिणामों से परिचय करते हुए अभियान संयोजक पुष्पेन्द्र भाई ने प्रस्ताव रखा। उन्होंने कहा कि बुन्देलखण्ड के सभी जनपदों में सूखा और पानी का संकट गहराता जा रहा है। इस संकट से निपटने और स्थाई समाधान की दिशा में साझे प्रयास करने की जरूरत है।

    जिसमे किसानों को अपने खेतों पर तालाब बनाने और एक-तिहाई भूभाग पर पेड़ लगाने के लिये प्रोत्साहित करना हमारी मुहिम का हिस्सा बने, साथ ही इस काम के लिये उपयुक्त योजनाएँ भी। पुष्पेन्द्र भाई ने इस मुहिम को गति और ऊर्जा देने के लिये सुझाव प्रस्तुत किया कि यहाँ का किसान अकेले अनुदान अथवा आर्थिक मदद से नहीं बल्कि उसके काम के सम्मान किये जाने पर बुन्देलखण्ड की तस्वीर बदल सकता है।

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    Author: 
    केसर और रवि प्रकाश

    .बुन्देलखण्ड में 2013 के साल को छोड़ दें तो अवर्षा के कारण सूखे की कुदरती मार एक बार फिर गम्भीर हो चुकी है। अति सूखा ग्रस्त इलाकों में महोबा, हमीरपुर, चित्रकूट, बांदा, झाँसी और ललितपुर हैं। लाखों की संख्या में लोग पलायन कर रहे हैं। पहले रबी की फसल कमजोर हुई और अब खरीफ की फसल भी लगभग बर्बाद हो गई है नतीजा लोग भुखमरी झेल रहे हैं। पानी और चारा की कमी के कारण पालतू गायों को लोग खुला छोड़ रहे हैं अन्ना प्रथा जोर पकड़ रही है और सियार जैसे जंगली जानवर गोइणर में मरे पाए जा रहे हैं। बरसात का मौसम बीत चुका है, सर्दियाँ आ चुकी हैं और गर्मी आने वाली है। आने वाली गर्मी में पानी की किल्लत की आशंका से लोग अभी से हलकान हैं। लोग चिन्तित हैं कि जब सर्दी में ही पानी की दिक्कत हो रही है तो गर्मी में हलक कैसे गीला होगा।

    पिछले दो-तीन दशकों से सतही पानी और भूजल में भारी गिरावट देखी जा रही है। भूजल स्तर के लगातार गिरावट से हैण्डपम्प, ट्यूबवेल और नलकूप साथ छोड़ते जा रहे हैं। बड़े-बड़े तालाब भी सूख चले हैं। ऐसे में कोई ऐसा तालाब दिख जाए जिसमें अभी भी 20 फीट पानी भरा हो तो रेगिस्तान में नखलिस्तान जैसा ही नज़र आता है।

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    .इस बार बारिश बहुत कम होने की चेतावनी से देश के अधिकांश शहरी इलाकों के लोगों की चिन्ता की लकीरें इस लिये भी गहरी हैं कि यहाँ रहने वाली सोलह करोड़ से ज्यादा आबादी के आधे से ज्यादा हिस्सा पानी के लिये भूजल पर निर्भर है। वैसे भी भूजल पाताल में जा रहा है और इस बार जब बारिश हुई नहीं तो रिचार्ज भी हुआ नहीं, अब पूरा साल कैसे कटेगा।

    ज़मीन की नमी बरकरार रखनी हो या फिर भूजल का स्तर या फिर धरती के बढ़ते तापमान पर नियंत्रण, तालाब या झील ही ऐसी पारम्परिक संरचनाएँ हैं जो बगैर किसी खास खर्च के यह सब काम करती हैं। यह दुखद है कि आधुनिकता की आँधी में तालाब को सरकारी भाषा में ‘जल संसाधन’ माना नहीं जाता है, वहीं समाज और सरकार ने उसे ज़मीन का संसाधन मान लिया। देश भर के तालाब अलग-अलग महकमोें में बँटे हुए हैं।

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    अपनी वनौषधियों और सुरम्य प्राकृतिक नजारों के लिये विश्व प्रसिद्ध पातालकोट के मूल निवासी जीवन की सबसे मूलभूत आवश्यकता 'पानी'के लिये संघर्ष कर रहे हैं।


    .जिन लोगों को लगता है कि मोबाइल पर इंटरनेट का धीमा चलना या फेसबुक की फ्रीबेसिक्स जैसी पहल ही हमारे समय की सबसे बड़ी समस्या हैं, उनको एक बार मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले स्थित पातालकोट क्षेत्र में अवश्य जाना चाहिए।

    समुद्र तल से औसतन 3,000 फीट की ऊँचाई पर बसा पातालकोट अपनी खूबसूरत घाटियों और मेहराबदार पहाड़ियों के चलते पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र भले ही है लेकिन स्थानीय लोगों के लिये वहाँ जिन्दगी काटना लगातार मुश्किल बना हुआ है।

    सरकार ने वहाँ स्कूल, चिकित्सालय आदि सब बनवा दिये लेकिन जीवन की सबसे मूलभूत आवश्यकताओं में से एक पानी की कमी सही मायनों में इन सब पर 'पानी फेर'रही है।

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