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    श्रद्धांजलि


    .समस्त इंडिया वाटर पोर्टल परिवार और अर्घ्यम की ओर से पानी के पुरोधा माने जाने वाले श्री अनुपम मिश्र जी को भावभीनी श्रद्धांजलि

    श्री अनुपम मिश्र जी ने ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज दिल्ली में आज 19 दिसम्बर, 2016 प्रातः 5:27 पर अंतिम साँस ली। उनकी अंतिम विदाई यात्रा दोपहर 1:00 बजे से गांधी पीस फाउंडेशन से शुरू होगी और निगम बोध घाट के विद्युतीय शवदाहग्रह पर समाप्त होगी। 2:00 बजे से सभी रीतिरिवाजों के साथ उन्हें अंतिम विदाई दी जाएगी।

    तब देश में पानी और पर्यावरण को लेकर इतनी बातें और आज की तरह का सकारात्मक माहौल नहीं था, और न ही सरकारों की विषय सूची में पानी और पर्यावरण की फ़िक्र थी, उस माहौल में एक व्यक्तित्व उभरा जिसने पूरे देश में न सिर्फ पानी की अलख जगाई बल्कि समाज के सामने सूखी जमीन पर पानी की रजत बूँदों का सैलाब बनाकर भी दिखाया। वे देश में पानी के पहले पहरेदार रहे, जिन्होंने हमे पानी का मोल समझाया।

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    Author: 
    प्रभाष जोशी
    Source: 
    परिषद साक्ष्य धरती का ताप, जनवरी-मार्च 2006

    अनुपम मिश्रअनुपम मिश्रयह कागद मैं उन्हीं अनुपम मिश्र और उनके काम पर काले कर रहा हूँ, जिनका जिक्र आपने कई बार देखा और पढ़ा होगा। यह जीने का वह रवैया है जिसे पहले समझे बिना अनुपम मिश्र के काम और उसे करने के तरीके को समझना मुश्किल है। जो बहुत सीधा-सपाट और समर्पित दिखता है वह वैसा ही होता तो जिन्दगी रेगिस्तान की सीधी और समतल सड़क की तरह उबाऊ होती।

    आप, हम सब एक पहलू के लोग होते और दुनिया लम्बाई चौड़ाई और गहराई के तीन पहलुओं वाली बहुरूपी और अनन्त सम्भावनाओं से भरी नहीं होती। विराट पुरुष की कृपा है कि जीवन-संसार अनन्त और अगम्य है।

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    Author: 
    आशुतोष जोशी

    सच्चाई और साफगोई के व्यक्तित्व-अनुपम मिश्र को समर्पित



    अनुपम मिश्रअनुपम मिश्रविश्वविद्यालय परिसर में अनेकों बार उनसे मुलाकात हुई, साथ बैठने का सानिध्य भी मिला। जबसे कुछ-कुछ समझने लगा हूँ- दो दशक में, लोग मिले लेकिन चेहरे अलग और मुखौटे के पीछे कुछ और। बहुत कम मिले, जो भीतर-बाहर एक समान हों, उनमें से सहज-सरल-प्रतिभा सम्पन्न शख्स जो होगा, जाहिर तौर पर अनुपम ही होगा।

    मिश्र जी जब सहजता से हाथ पकड़कर, समझाते थे तो लगता कि यह कोई संरक्षक या गुरुत्व का आडम्बर नहीं ओढ़े हैं, सहज मित्रवत, या उनके ही शब्दों में “भक्ति सूरदास सी जिसमें छोटे-बड़े का भाव ही नहीं है, फिर काहे ढँकना-छिपाना। या कि होगा कोई बड़े घराने का या कि राजकुमार, जब साथ है तो कोई क्या गरीब-क्या अमीर, कृष्ण-सुदामा सा सख्यभाव।”

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    अनुपम मिश्रअनुपम मिश्रहम सभी के अपने श्री अनुपम मिश्र नहीं रहे। इस समाचार ने पानी-पर्यावरण जगत से जुड़े लोगों को विशेष तौर पर आहत किया। अनुपम जी ने जीवन भर क्या किया; इसका एक अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अनुपम जी के प्रति श्रद्धांजलि सभाओं के आयोजन का दौर इस संवाद को लिखे जाने के वक्त भी देश भर में जारी है।

    पंजाब-हरियाणा में आयोजित श्रद्धांजलि सभाओं से भाग लेकर दिल्ली पहुँचे पानी कार्यकर्ता राजेन्द्र सिंह ने खुद यह समाचार मुझे दिया। राजेन्द्र जी से इन सभाओं का वृतान्त जानने 23 दिसम्बर को गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान पहुँचा, तो सूरज काफी चढ़ चुका था; 10 बज चुके थे; बावजूद इसके राजेन्द्र जी बिस्तर की कैद में दिखे। कारण पूछता, इससे पहले उनकी आँखें भर आईं और आवाज भरभरा उठी।

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  • 12/28/16--21:54: वे नदी थे

  • अनुपम मिश्रअनुपम मिश्रसिरी फोर्ट के उस कमरे में गंगा समग्र की नेता उमा भारती, पर्यावरणविद अनुपम मिश्र और इन पंक्तियों के लेखक के अलावा कुछ लोग और भी मौजूद थे। उमा भारती ने अनुपम जी से कहा कि कार्यक्रम के अन्तिम सत्र में मुझे जनता के सामने एक संकल्प रखना है जिसके आधार पर गंगा सफाई की रूपरेखा तैयार की जाएगी, आप सुझाव दें कि मैं क्या संकल्प लूँ।

    अनुपम जी ने कहा कि आप अच्छा काम कर रही है और ऐसे ही करते रहिए कोई संकल्प मत लीजिए क्योंकि कल को आपका कोई नेता आएगा और कहेगा कि मैं तो विकास पुरुष हूँ, आस्था और पर्यावरण के नाम पर विकास नहीं रोका जा सकता इसलिये बाँध बनना जरूरी है, उस समय आप उसका विरोध नहीं कर पाएँगी और पार्टी लाइन के नाम पर आपको गंगा की बर्बादी का समर्थन करना होगा।

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    Author: 
    डॉ. जयप्रकाश सिंह

    अनुपम मिश्रअनुपम मिश्र‘भाषा, लोगों को तो आपस में जोड़ती ही है, यह किसी व्यक्ति को उसके परिवेश से भी जोड़ती है। अपनी भाषा से लबालब भरे समाज में पानी की कमी नहीं हो सकती और न ही ऐसा समाज पर्यावरण को लेकर निष्ठुर हो सकता है। इसलिये पर्यावरण की बेहतरी के लिये काम करने वाले लोगों को अपनी भाषाओं के प्रति संंजीदा होना पड़ेगा। अपनी भाषाओं को बचाए रखने, मान-सम्मान बख्शने के लिये आगे आना होगा। यदि भाषाएँ बची रहेंगी, तो हम अपने परिवेश से जुड़े रहेंगे और पर्यावरण के संरक्षण का काम अपने आप आगे बढ़ेगा।’

    अनुपम जी की भाव धारा और भाषा धारा, मीडिया चौपाल में शिरकत करने वाले युवा पत्रकारों को सम्मोहित जैसे किये हुए थी। सैकड़ों युवा पत्रकारों के जमावड़े वाले किसी भी कार्यक्रम में इस तरह की शान्ति एक अपवाद ही मानी जाएगी। वह ‘मीडिया चौपाल’ द्वारा आईआईएमसी में आयोजित एक संगोष्ठी में बोल रहे थे। नदियों के संरक्षण पर केन्द्रित इस संगोष्ठी में ही उनसे अन्तिम बार मिलना हुआ।

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    कावेरी नदीकावेरी नदीकावेरी की गिनती हमारे देश की उन सात नदियों में की जाती है, जिनका नाम देश भर में सुबह स्नान के समय या किसी भी मांगलिक कार्य से पहले लिया जाता है। इस तरह पूरे देश में अपनी मानी गई यह नदी आज प्रमुख रूप से दो राज्यों के बीच में ‘मेरी है या तेरी’ जैसे विवाद में फँस गई है। इसमें दो प्रदेश- कर्नाटक और तमिलनाडु के अलावा थोड़ा विवाद केरल व पुदुचेरी का भी है। कुल मिलाकर नदी एक है। उसमें बहने वाला पानी सीमित है या असीमित है, यह लालच तो उसका है, जो इसमें से ज्यादा-से-ज्यादा पानी अपने खेतों में बहता देखना चाहता है।

    सत्रह साल विवाद में फँसे रहने के बाद जब पंचाट का फैसला आया तो शायद ही कुछ क्षणों के लिये ऐसी स्थिति बनी होगी कि अब यह विवाद सुलझ गया है। घोषणा होते ही एक पक्ष का सन्तोष और दूसरे पक्ष का असन्तोष सड़कों पर आ गया।

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    पाताल देवी धारापाताल देवी धाराउत्तराखण्ड के कुमाऊँ मण्डल में नौलों की एक संस्कृति रही है। इस बार अल्मोड़ा यात्रा के दौरान उस संस्कृति से साक्षात्कार का अवसर मिला। मैंने वहाँ पाया कि कत्युरी राजाओं ने इस सन्दर्भ में बहुत काम किया है।

    हिमालय क्षेत्र में जितने भी पुराने नौले हैं, वहाँ कत्युरी राजाओं की छाया देखी जा सकती है। नौलों में हमारी संस्कृति भी दिखती है, जितने नौले हैं, वहाँ यक्ष देवता की मूर्ति हर नौले में रखी हुई दिख जाएगी। पुराने समय के लोग यह बताते हैं कि इस क्षेत्र में यक्ष देवता को प्रणाम करने के बाद ही पानी लेने का विधान रहा है।

    नौलों में जूता पहनकर जाने की सख्त मनाही थी, इसलिये पानी लेने आने वाला शख्स जूतों को खोलकर, जल में रखे गए देवता की मूर्ति को प्रणाम करके ही पानी लेेता था।

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    Author: 
    राजीव रंजन गिरि
    Source: 
    यथावत, 1-15 जनवरी, 2017

    अनुपम मिश्रअनुपम मिश्रगाँधी शान्ति प्रतिष्ठान परिसर की इस पुरानी इमारत का नाम पर्यावरण कक्ष है। पूछकर मालूम हुआ। कहीं लिखा हुआ था नहीं। बस मान लेना था कि यही पर्यावरण कक्ष है। इसमें अन्दर घुसते ही अखबारों से काटी ढेर सारी तस्वीरें दीवारों पर चिपकी हैं। दाईं तरफ एक छोटे कमरे में लकड़ी की मेज और कुर्सी पर दरमियानी कद का एक व्यक्ति कागज पर लिखे को पढ़ने और बीच-बीच में कलम से निशान लगाने, लिखने में लीन है।

    इस तल्लीनता ने ऐसा वातावरण रच दिया था कि अन्दर आने के लिये पूछने में हिचक हो रही थी। दरवाजा खुला था, इसलिये खटखटाने का संयोग भी नहीं बन रहा था। कुछ क्षण में ही उस व्यक्ति को शायद आहट हुई। नजर ऊपर उठी। ‘आइए’ कहने पर नीरवता थोड़ी भंग हुई।

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    सिंधु नदी घाटीसिंधु नदी घाटीहाल ही में सिंधु जल-विवाद पर भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता करने पर विश्वबैंक ने चुप्पी साध ली और अपने को सिंधु जल-समझौते से अलग कर लिया है। 12 दिसम्बर, 2016 की विश्वबैंक की ओर से भारत-पाक वित्त मंत्रालयों को पत्र लिखकर भारत-पाक को नए समझौते के लिए स्वयं ही पहल करने को कहा गया था। इस बात से साफ हो गया है कि अब समझौते को पाकिस्तान की पाक-नीयत यानी नेकनीयत ही बचा सकती है। पाकिस्तान खून का खेल बंद करे, सिंधु के पानी के लिए भारत से बात करे।

    विश्वबैंक के कदम से पाकिस्तान पूरी तरह बौखला गया। पाकिस्तान के वित्तमंत्री इशाक दार ने विश्वबैंक अध्यक्ष जिम योंग को एक जवाबी पत्र लिखा और विश्वबैंक को उसके कर्तव्य याद दिलाते हुए लिखा कि संधि में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि उसमें शामिल होने वाली कोई पार्टी अपना कर्तव्य निभाने से खुद को तटस्थ कर ले।

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    Author: 
    योगिता शुक्ला

    अनुपम मिश्र से योगिता शुक्ला की बातचीत

    अनुपम मिश्रअनुपम मिश्रयोगिता शुक्ला :आपकी दोनों पुस्तकों का विषय मूलतः जल प्रबंध पर आधारित है। एक ही विषय पर दो पुस्तकें लिखने में दुहराव तो रहता ही है, तो क्या इन दोनों पुस्तकों को एक दूसरे के पूरक या विस्तार की तरह देखना चाहिए या फिर दो भिन्न किताबों की तरह।

    अनुपम मिश्र :दोनों का विषय एक है इसमें कोई शक नहीं। अगर हम पीछे लौट कर याद करें तो सबसे पहले हमने पानी के काम को समझना राजस्थान से शुरू किया। इस काम की गहराई बहुत थी और हम उसके लायक नहीं थे। बहुत तैयारी करनी पड़ी इसको समझने में।

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    Author: 
    राजकुमार कुम्भज
    Source: 
    सर्वोदय प्रेस सर्विस, जनवरी 2017

    अनुपम मिश्रअनुपम मिश्रप्रख्यात गाँधीवादी अनुपम मिश्र सच्चे अर्थों में अनुपम थे। वह पानी मिट्टी पर शोध के अलावा चिपको आन्दोलन में भी सक्रिय रहे वे कर्म और वाणी के अद्वैत योद्धा थे। बड़ी-से-बड़ी सच्चाई को भयरहित, स्वार्थरहित, दोषरहित और पक्षपातरहित बोल देने के लिये प्रतिबद्ध थे। अनुपम मिश्र गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान के ट्रस्टी और राष्ट्रीय गाँधी स्मारक निधि के उपाध्यक्ष रहे।

    वह ऐसे पहले भारतीय थे, जिन्होंने पर्यावरण पर ठीक तब से काम और चिन्तन शुरू कर दिया था जबकि देश में पर्यावरण का कोई भी सरकारी विभाग तक नहीं था। उन्होंने हमेशा ही परम्परागत जलस्रोतों के संरक्षण, प्रबन्धन तथा वितरण के सन्दर्भ में अपनी आवाज बुलन्द की। अनुपम मिश्र की पहल पर ही गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान में पर्यावरण अध्ययन कक्ष की स्थापना हुई थी जहाँ से ‘हमारा पर्यावरण’और ‘देश का पर्यावरण’जैसी महत्त्वपूर्ण पुस्तक आई।

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    Author: 
    अनिल सिंदूर

    बिन माँगे वायु मिली, बिन माँगे ही नीर।
    मोल न समझा आदमी, यही प्रकृति की पीर।।


    सीता सागरसीता सागरयक्ष प्रश्न आज भी जस-के-तस खड़े हैं मृत्यु सबको आनी है लेकिन कोई मरना नहीं चाहता, जिन्दा रहने के लिये खाना सबको खाना है, अन्न उगाना कोई नहीं चाहता, इसी तरह पानी सब पीना चाहते हैं पर कोई संचय नहीं करना चाहता। पानी के संचय की तो बात दूर वर्षों पुराने स्रोतों पर स्वार्थों के चलते अतिक्रमण कर उन्हें नष्ट जरूर करना चाहता है।

    लगभग 300 वर्ष पूर्व मध्य प्रदेश राज्य के दतिया शहर को पानी से निजात दिलाने को दतिया के महाराज ने महारानी सीता के नाम पर सीतासागर तालाब का निर्माण करवाया था लेकिन स्वार्थी तत्वों ने उच्चतम न्यायालय के आदेशों को भी अनदेखा कर उस पर भी अपने घर बना लिये और इस अपराध में तंत्र साधना की देवी पीताम्बरा माई को भी शामिल कर लिया जिसकी आड़ में अपने अपराधों को बचाया जा सके।

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    Source: 
    नया ज्ञानोदय, जनवरी, 2017

    अनुपम अब अनुपस्थिति में उपस्थित हैं अपने अमर शब्दों में, अनुभव, कर्म की इबारतों में, पर्यावरण के सकारात्मक सन्देशों में, लोक के अनुभव आलोक में सृष्टि को बचाते प्रतिबद्ध-प्रतिश्रुत। -भारतीय ज्ञानपीठ की विनम्र श्रद्धांजलि!

    अनुपम मिश्रअनुपम मिश्रसबसे पहले तो आप सबसे माफी माँगता हूँ कि मैं इतने सरस और तरल आयोजन में उपस्थित नहीं हो पा रहा हूँ। देश भर की छोटी-बड़ी नदियों की चिन्ता में आप सब यहाँ है- इसलिये मेरी कोई कमी नहीं खलेगी।

    नदियों पर सरकारों का ध्यान गए अब कोई चालीस बरस पूरे हो रहे हैं। इन चालीस वर्षों में इस काम पर खर्च होने वाली राशि भी लगातार बढ़ती गई है और तरह-तरह के कानून भी बनते गए हैं। और अब यह भी कहा जा सकता है कि राशि के साथ-साथ सरकार का उत्साह भी बढ़ा है। पहले के एक दौर में शोध ज्यादा था, अब शोध भी है और श्रद्धा भी।

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    Author: 
    मनु मुदगिल

    कम बरसात के बावजूद चतर सिंह जाम ने परम्परागत जल व्यवस्थाओं को पुनर्जीवित कर जैसलमेर के कई गाँवों को आत्मनिर्भर बनाया है

    चतर सिंह जामचतर सिंह जाम“क्या तुम्हें भी आसमान में सफेद और काली पट्टियाँ दिख रही हैं,”चतर सिंह ने मुझसे पूछा। मेरे हाँ कहने पर वह बोले, “यह मोघ है। अभी जहाँ सूरज छिप रहा है वहाँ बादल है। अगर इस तरफ की हवा चले तो यह रात तक यहाँ पहुँच कर बरस सकते हैं। रेगिस्तान में लोग इनकी प्राकृतिक चिन्हों पर निर्भर रहते हैं।”

    हम रामगढ़ में थे, जैसलमेर से 60 किमी दूर भारत-पाक सीमा की तरफ। इस क्षेत्र की सालाना औसतन बारिश 100 मिमी है और वह भी हर साल नहीं। दस साल में तीन बार सूखे का सामना करना पड़ता है। पर थार रेगिस्तान के इन गाँवों में पानी है, पलायन नहीं। इस उपलब्धि का बहुत बड़ा श्रेय 55 साल के चतर सिंह जी को जाता है। उन्हें लोग उनके पारिवारिक पदवी ‘जाम साहब’से भी बुलाते हैं।

    मेरा नहीं समाज का काम

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    Author: 
    मनु मुदगिल
    जयपुर के पास बने इस जलाशय को पुनर्जीवित करने के सारे प्रयास विफल साबित हो रहे हैं क्योंकि अधिकारी अवरोधों की लगातार अनदेखी कर रहे हैं।

    उपेक्षित रामगढ़ झीलउपेक्षित रामगढ़ झीलपिछले साल एक मगरमच्छ खाने की तलाश में रामगढ़ बाँध से चल कर सात किलोमीटर दूर जामवा रामगढ़ गाँव तक पहुँच गया। बाँध में एक समय पर 100 से ज्यादा मगरमच्छ थे पर 2006 के बाद से यह सूखा पड़ा है जिसके कारण मछली और मगरमच्छों का अन्य खाद्य ना के बराबर हो गया।

    जयपुर के महाराज माधो सिंह द्वितीय के द्वारा बनवाया गया यह बाँध 1903 में निर्मित हुआ पर शहर को पानी की सप्लाई 1931 में शुरू हुई। जल्द ही यह जलाशय या झील एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल बन गया जिसमें 1982 के एशियाई खेलों में नौकायान प्रतियोगता भी काफी धूमधाम से आयोजित की गई।

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    Author: 
    उमेश कुमार राय

    मकबरा तालाबमकबरा तालाबभारत के राष्ट्रीय नायकों में शुमार शेरशाह सूरी द्वारा 16वीं शताब्दी में बिहार के रोहतास जिले के सासाराम में एक बड़े तालाब के मध्य मकबरा बनाया गया था।

    उस वक्त से ही इस तालाब को मकबरा तालाब कहा जाने लगा। उन दिनों तालाब का पानी कंचन हुआ करता था। बताया जाता है कि उस वक्त इस तालाब के पानी से स्थानीय लोग खाना भी बनाते थे, लेकिन आज यह तालाब अपनी दयनीय हालत पर जार-जार रो रहा है, लेकिन उसके आँसू पोंछने वाला कोई नहीं है।

    305 मीटर क्षेत्रफल वाले तालाब के बीच एक चबूतरे पर बना यह मकबरा भारतीय-अफगानी स्थापत्य कला के बेजोड़ नमूनों में एक है।

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    विश्व नम भूमि दिवस - 02 फरवरी, 2017 पर विशेष


    लोकटक झीललोकटक झीलहर्ष की बात है कि विश्व नमभूमि दिवस - 2017 से ठीक दो दिन पहले आस्ट्रेलिया सरकार ने 15 लाख डॉलर की धनराशि वाले ‘वाटर एंबडेंस प्राइज’हेतु समझौता किया है। यह समझौता, भारत के टाटा उद्योग घराने और अमेरिका के एक्सप्राइज घराने के साथ मिलकर किया गया है।

    विषाद का विषय है कि जल संरक्षण के नाम पर गठित इस पुरस्कार का मकसद हवा से पानी निकालने की कम ऊर्जा खर्च वाली सस्ती प्रौद्योगिकी का विकास करने वालों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ाना है।

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    Author: 
    सुरेंद्र बांसल

    सरस्वती नदी मैपसरस्वती नदी मैपनदी संस्कृति के मामले में भारत कभी सिरमौर था। संसार के किसी भी क्षेत्र की तुलना में सर्वाधिक नदियाँ हिमालय अधिष्ठाता शिव की जटाओं से निकलकर भारत के कोने-कोने को शस्य-श्यामला बनती रही हैं। तमाम नदियाँ करोड़ों लोगों की जीवन का सेतु और आजीविका का स्थायी स्रोत होने के साथ-साथ जैव विविधता, पर्यावरणीय और पारिस्थितिक सन्तुलन की मुख्य जीवनरेखा रही हैं।

    ऋग्वेद में वर्णित सरस्वती नदी भी इनमें से एक थी। करीब पाँच हजार वर्ष पहले सरस्वती के विलुप्त होने के कारण चाहे कुछ भी रहे हों, लेकिन सरस्वती की याद दिलाने वाले इस पावन स्तोत्र को करोड़ों-करोड़ लोग आज भी गुनगुनाते हैं।

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    राज्य चुनाव 2017 पर विशेष



    पारम्परिक जलस्रोतों की अनदेखी ने बढ़ाया जल संकटपारम्परिक जलस्रोतों की अनदेखी ने बढ़ाया जल संकटपंजाब, उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश, गोवा और मणिपुर - पाँच राज्य, एक से सात चरणों में चुनाव। 04 फरवरी से 08 मार्च के बीच मतदान; 11 मार्च को वोटों की गिनती और 15 मार्च तक चुनाव प्रक्रिया सम्पन्न। मीडिया कह रहा है - बिगुल बज चुका है। दल से लेकर उम्मीदवार तक वार पर वार कर रहे हैं।

    रिश्ते, नाते, नैतिकता, आदर्श.. सब ताक पर हैं। कहीं चोर-चोर मौसरे भाई हो गए हैं, तो कोई दुश्मन का दुश्मन दोस्तवाली कहावत चरितार्थ करने में लगे हैं। कौन जीतेगा? कौन हारेगा? रार-तकरार इस पर भी कम नहीं। गोया जनप्रतिनिधियों का चुनाव न होकर युद्ध हो। सारी लड़ाई, सारे वार-तकरार.. षड़यंत्र, वोट के लिये है। किन्तु वोटर के लिये यह युद्ध नहीं, शादी है।

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