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    Author: 
    उमेश कुमार राय

    बकुची-अख्तियारपुर में बागमती और लखनदेई का संगम स्थलबकुची-अख्तियारपुर में बागमती और लखनदेई का संगम स्थलसत्तर के दशक में जब बागमती नदी पर तटबन्ध बनाया जा रहा था, तब ग्रामीणों ने इसका पुरजोर विरोध किया था। उस वक्त कुछ दूर तक तटबन्ध बने, लेकिन लोगों के विरोध के मद्देनजर काम बन्द कर दिया गया था। इस घटना के लगभग चार दशक गुजर जाने के बाद दोबारा बिहार सरकार बाकी हिस्से पर तटबन्ध बनाना चाहती है और इस बार भी ग्रामीण विरोध कर रहे हैं।

    ग्रामीणों का कहना है कि तटबन्ध बनने से उन्हें फायदे की जगह नुकसान होगा लेकिन सरकार का तर्क है कि वह तटबन्ध बनाकर बाढ़ को बाँध देगी। तटबन्ध की खिलाफत करने वाले लोगों के साथ सरकार की बातचीत हुई, तो तटबन्ध से होने वाले नफा-नुकसान का आकलन करने के लिये विशेषज्ञों की कमेटी बनाने पर सहमति बनी, लेकिन तटबन्ध के खिलाफ आन्दोलन करने वाले लोगों का आरोप है कि किसी भी तरह सरकार तटबन्ध बनाने पर आमादा है और वह आम लोगों के हित नहीं देख रही है।

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    Author: 
    रामचंद्र गुहा
    Source: 
    उत्तराखंड उदय (वार्षिकी), 2015, अमर उजाला पब्लिकेशन्स, नोएडा, उत्तर प्रदेश

    चंडी प्रसाद भट्ट पहाड़ में जन्मे ऐसे व्यक्ति हैं, जिन्होंने पहाड़ पर ही रहना और वहाँ के लोगों की सेवा करना पसंद किया। उनके लिये गढ़वाल और गढ़वाली वैसे संसाधन नहीं थे, जिनका वह अपने करियर के लिये इस्तेमाल करते। उनका जीवन-कर्म पहाड़ के लोगों को आत्मनिर्भर बनाने के लिये समर्पित रहा है - आर्थिक, सामाजिक और पारिस्थितिक रूप से आत्मनिर्भर। लेकिन उनके काम की प्रासंगिकता केवल हिमालय तक ही सीमित नहीं थी।

    चंडी प्रसाद भट्टजून, 1981 के पहले सप्ताह में मैंने अलकनंदा की गहरी घाटियों में एक धर्मनिरपेक्ष तीर्थयात्रा शुरू की। मेरा गंतव्य गोपेश्वर था, जो हिंदू तीर्थस्थल बदरीनाथ मंदिर वाली पहाड़ी से सटा हुआ है। मैं यहाँ जिस समकालीन देवता के सम्मान में कुछ बातें बताना चाहता हूँ, वह चिपको आंदोलन के संस्थापक चंडी प्रसाद भट्ट हैं।

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    Author: 
    सुशील कुमार

    लापरवाही के कारण उत्तराखण्ड के जंगलों में लगती आगलापरवाही के कारण उत्तराखण्ड के जंगलों में लगती आगपिछले कुछ वर्षों से जंगलों में लगातार आग लगने की घटनाओं ने सरकार, पर्यावरणविद तथा समाज को एक बार फिर सोचने पर मजबूर किया है। जंगलों में अचानक लगने वाली इस आग से बड़े पैमाने पर जन-धन हानि के साथ-ही पेड़-पौधों और वन्य जीवों को नुकसान होता है। इस बारे में व्यापक अध्ययन तथा आग की रोकथाम के लिये सरकार की ओर से विभागीय जाँच भी कराई जाती है।

    कई बार कमेटियों का गठन कर दोषी लोगों को दंडित करने तथा भविष्य में इस तरह की व्यापक वनाग्नि को रोकने के लिये संस्तुतियाँ भी प्रस्तुत की जाती हैं। इसके बावजूद आग लगने की घटनाओं में कमी की बजाय ये बढ़ती ही जा रही हैं।

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    Author: 
    उमेश कुमार राय

    64वें राष्ट्रीय पुरस्कार में फिल्म कड़वी हवा की सराहना



    कड़वी हवाकड़वी हवाइस बार के नेशनल अवार्ड में सामाजिक मुद्दों पर फिल्में बनाने वाले फिल्म निर्देशक नील माधब पांडा की ताजा फिल्म ‘कड़वी हवा’ का विशेष तौर पर जिक्र (स्पेशल मेंशन) किया गया।

    स्पेशल मेंशन में फिल्म की सराहना की जाती है और एक सर्टिफिकेट दिया जाता है, बस! बॉलीवुड से गायब होते सामाजिक मुद्दों के बीच सूखा और बढ़ते जलस्तर के मुद्दों पर बनी कड़वी हवा की सराहना और सर्टिफिकेट मिलना राहत देने वाली बात है।

    फिल्म की कहानी दो ज्वलन्त मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमती है-जलवायु परिवर्तन से बढ़ता जलस्तर व सूखा। फिल्म में एक तरफ सूखाग्रस्त बुन्देलखण्ड है तो दूसरी तरफ ओड़िशा के तटीय क्षेत्र हैं। बुन्देलखण्ड पिछले साल भीषण सूखा पड़ने के कारण सुर्खियों था। खबरें यह भी आई थीं कि अनाज नहीं होने के कारण लोगों को घास की रोटियाँ खानी पड़ी थी। कई खेतिहरों को घर-बार छोड़कर रोजी-रोजगार के लिये शहरों की तरफ पलायन करना पड़ा था।

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    Source: 
    राइजिंग टू द काल, 2014

    अनुवाद - संजय तिवारी

    2007 में बाढ़ के कारण खगड़िया जिले में जल संकट2007 में बाढ़ के कारण खगड़िया जिले में जल संकटखगड़िया सात नदियों की ससुराल है और ससुराल छोड़कर नदियाँ कहीं दूर न चली जाएँ इसलिये सरकारी योजनाओं ने उन्हें बाँधकर रखने की भरपूर कोशिश की है। कोसी, कमला बलान, करेश, बागमती, बूढ़ी गंडक, अधवारा समूह और गंगा। इन सात नदियों पर आठ बाँध बनाए गए हैं।

    बागमती पर बना बुढ़वा बाँध और कराची बदला, कोसी पर बदला नागरपारा, गंगा पर गोगरी नारायणपुर, बूढ़ी गंडक पर बूढ़ी गंडक बाँध, कोसी पर बना कोसी बाँध और बागमती की ही एक और सहायक नदी पर बना नगर सुरक्षा बाँध।

    सात नदियों पर बने आठ बाँधों के कारण खगड़िया में जल ही जीवन नहीं है, बल्कि जल में ही जीवन है। चारोंं तरफ पानी से घिरा हुआ लेकिन प्यासा। सब तरफ पानी है लेकिन पीने के लिये पानी नहीं है।

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    फरक्का बैराजफरक्का बैराजहमने कभी सिंचाई के नाम पर नदियों को बाँधा और कभी बाढ़ मुक्ति-बिजली उत्पादन के नाम पर। नदी के नफा-नुकसान की समीक्षा किये बगैर यह क्रम आज भी जारी है। एक चित्र में नदियों को जहाँ चाहे तोड़ने-मोड़ने-जोड़ने की तैयारी है, तो दूसरे में भारत की हर प्रमुख नदी के बीच जलपरिवहन और नदी किनारे पर राजमार्ग के सपने को आकार देने की पुरजोर कोशिश आगे बढ़ती दिखाई दे रही है।

    नोएडा से गाजीपुर तक गंगा एक्सप्रेस-वे परियोजना को आगे बढ़ाने की मायावती सरकार की पैरोकारी को याद कीजिए। श्री नितिन गडकरी द्वारा परिवहन मंत्री बनते ही गंगा जलमार्ग के नाम पर इलाहाबाद से हल्दिया के बीच हर सौ किलोमीटर पर एक बैराज बनाने की घोषणा को याद कीजिए।

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    Author: 
    उमेश कुमार राय

    पृथ्वी दिवस, 22 अप्रैल 2017 पर विशेष


    संकट में पृथ्वीसंकट में पृथ्वीतमाम वैज्ञानिकों और महापुरुषों ने प्रकृति या कह लें कि पृथ्वी को बचाने के लिये तमाम बातें कही हैं, लेकिन मानव का रवैया कभी भी प्रकृति या पृथ्वी को लेकर उदार नहीं रहा। लोग यही मानते रहे कि वे पूरी पृथ्वी के कर्ता-धर्ता हैं। मानव ने पृथ्वी के अंगों पेड़-पौधे, हवा, पानी, जानवर के साथ क्रूर व्यवहार किया। जबकि सच यह है कि दूसरे अंगों की तरह ही मानव भी पृथ्वी या प्रकृति का एक अंग भर है। पृथ्वी का मालिक नहीं।

    दूसरी बात यह है कि पृथ्वी के दूसरे अंग पेड़-पौधे और पानी भी मानव की तरह ही हैं। उनमें भी जीवन है और उन्हें भी अपनी सुरक्षा, देखभाल करने का उतना ही अधिकार है जितना एक आदमी को। हाल ही में उत्तराखण्ड हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में इस आधार को मजबूती दी है। हाईकोर्ट ने नदी को मानव का दर्जा दिया है। यही नहीं, इनके अभिभावक भी तय कर दिये हैं, जिनका काम नदियों को संरक्षित और सुरक्षित करना होगा।

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    वर्ल्ड कल्चरल फेस्टिवल का पोस्टरवर्ल्ड कल्चरल फेस्टिवल का पोस्टरपरसों खबर मिली कि विशेषज्ञ समिति ने माना है कि श्री श्री रविशंकर द्वारा गत वर्ष यमुना पर किये आयोजन के कारण यमुना की क्षति हुई है। कल खबर मिली कि दिल्ली के जलसंसाधन मंत्री श्री कपिल मिश्रा ने विशेषज्ञ समिति के निष्कर्षों का मजाक ही नहीं उड़ाया, बल्कि श्री श्री को पुनः यमुना तट पर आयोजन हेतु आमंत्रित भी किया है। मजाक भी किसी प्राइवेट लिमिटेड विशेषज्ञ समिति का नहीं, बल्कि खुद भारत सरकार के जलसंसाधन मंत्रालय के सचिव की अध्यक्षता में गठित विशेषज्ञ समिति का उड़ाया गया है।

    दुखद भी, अविश्वसनीय भी


    मुझे विश्वास नहीं हो रहा कि पर्यावरण विशेषज्ञ समिति का मजाक उड़ाने वाला यह शख्स वही है, जिसे मैंने पर्यावरण के जाने-माने विशेषज्ञ स्व. श्री अनुपम मिश्र की अन्तिम संस्कार के मौके पर गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान से लेकर निगम बोध घाट तक हर जगह घंटों हाथ बाँधे खड़ा देखा था।

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    Author: 
    ब्रजरतन जोशी

    पृथ्वी दिवस, 22 अप्रैल 2017 पर विशेष


    खतरे में पृथ्वी का अस्तित्वखतरे में पृथ्वी का अस्तित्वपृथ्वी दिवस प्रतिवर्ष 22 अप्रैल को मनाया जाता है। पहले पहल तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक ही है कि यह इसी तिथि को ही क्यों मनाया जाता है? इसके प्रस्तोता संयुक्त राज्य अमेरिका के सीनेटर जेराल्ड नेल्सन हैं। उनकी सोच यह थी कि पृथ्वी पर बढ़ते दबावों, तनावों और चिन्ताओं के लिये मानव मात्र को जागरूक करना नितान्त अनिवार्य है। क्योंकि विद्यालय, महाविद्यालय और विश्वविद्यालय ज्ञान के केन्द्र हैं और वहाँ समूची मानव जाति की युवा पीढ़ी को प्रशिक्षित किया जाता है।

    अतः जेराल्ड नेल्सन ने इस चेतना की जागृति हेतु इस दिनांक यानी 22 अप्रैल को चुना। क्योंकि यह वह समय है जब यूरोप में न तो धार्मिक छुट्टियाँ होती हैं और न ही परीक्षाएँ। अतः परिसर में छात्रों की संख्या का आँकड़ा काफी अच्छा रहता है। इस समय मौसम भी अच्छा ही रहता है। अतः उन्होंने इस तिथि का चयन किया।

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    पृथ्वी दिवस, 22 अप्रैल 2017 पर विशेष


    गर्म हो रही पृथ्वीगर्म हो रही पृथ्वीआज पृथ्वी दिवस है। आज के दिन का एक विशेष महत्त्व है। यह दिन वास्तव में एक ऐसे महापुरुष की दृढ़ इच्छाशक्ति के लिये जाना जाता है जिन्होंने ठान लिया था कि हमें अपने गृह पृथ्वी के साथ किये जा रहे व्यवहार में बदलाव लाना है। वह थे अमेरिका के पूर्व सीनेटर गेराल्ड नेल्सन। क्योंकि आज के ही दिन 22 अप्रैल 1970 को उन्हीं के प्रयास से लगभग दो करोड़ लोगों के बीच अमेरिका में पृथ्वी को बचाने के लिये पहला पृथ्वी दिवस मनाया गया था।

    इसके पीछे उनका विचार था कि पर्यावरण संरक्षण हमारे राजनीतिक एजेंडे में शामिल नहीं है। क्यों न पर्यावरण को हो रहे नुकसान के विरोध के लिये एक व्यापक जमीनी आधार तैयार किया जाये और सभी इसमें भागीदार बनें। आखिरकार आठ साल के प्रयास के बाद 1970 में उन्हें अपने उद्देश्य में कामयाबी हासिल हो पाई। तब से लेकर आज तक दुनिया में 22 अप्रैल को पृथ्वी दिवस मनाया जाता है।

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    Author: 
    अमरनाथ

    पृथ्वी दिवस, 22 अप्रैल 2017 पर विशेष


    पृथ्वी के गर्म होने से संकट में जीवनपृथ्वी के गर्म होने से संकट में जीवनपृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है। यह सर्वविदित और निर्विवाद तथ्य है। संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी अन्तर-सरकारी समिति के साथ कार्यरत 600 से ज्यादा वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके कारणों में सबसे अधिक योगदान मनुष्य की करतूतों का है। पिछली आधी सदी के दौरान कोयला और पेट्रोलियम जैसे जीवाश्म ईंधनों के फूँकने से वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड और दूसरी ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा खतरनाक हदों तक पहुँच गई है। मोटे अनुमान के मुताबिक आज हमारी आबोहवा में औद्योगिक युग के पहले की तुलना में 30 प्रतिशत ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड मौजूद है।

    सामान्य स्थितियों में सूर्य की किरणों से आने वाली ऊष्मा का एक हिस्सा हमारे वातावरण को जीवनोपयोगी गर्मी प्रदान करता है और शेष विकिरण धरती की सतह से टकराकर वापस अन्तरिक्ष में लौट जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार वातावरण में मौजूद ग्रीनहाउस गैसें लौटने वाली अतिरिक्त ऊष्मा को सोख लेती हैं जिससे धरती की सतह का तापमान बढ़ जाता है।

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    पृथ्वी दिवस, 22 अप्रैल 2017 पर विशेष


    पृथ्वी का अस्तित्व खतरे मेंपृथ्वी का अस्तित्व खतरे मेंशेयर बाजार अपनी गिरावट का दोष, बारिश में कमी को दे रहा है। उद्योगपति, गिरते उत्पादन का ठीकरा पानी की कमी पर फोड़ रहे हैं। डाॅक्टर कह रहे हैं कि हिन्दुस्तान में बढ़ती बीमारियों का कारण जहरीला होते हवा-पानी हैं। भूगोल के प्रोफेसर कहते हैं कि मिट्टी में अब वह दम नहीं रहा। उपभोक्ता कहते हैं कि सब्जियों में अब स्वाद नहीं रहा। कृषि वैज्ञानिक कह रहे हैं कि तापमान बढ़ रहा है, इसलिये उत्पादन घट रहा है। किसान कहता है कि मौसम अनिश्चित हो गया है, इसलिये उसके जीवन की गारंटी भी अनिश्चित हो गई है।

    पेयजल को लेकर आये दिन मचने वाली त्राहि-त्राहि का समाधान न ढूँढ पाने वाली हमारी सरकारें भी मौसम को दोष देकर अपना सिर बचाती रही हैं। अप्रैल के इस माह में बेकाबू होते पारे को हम सभी कोस रहे हैं, किन्तु अपने दोष को स्वीकार कर गलती सुधारने की दिशा में हम कुछ खास कदम उठा रहे हों; ऐसा न अभी सरकार के स्तर पर दिखाई देता है और न ही हमारे स्तर पर।

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    पृथ्वी दिवस, 22 अप्रैल 2017 पर विशेष


    ग्लोबल वार्मिंगग्लोबल वार्मिंगसम्पूर्ण विश्व पृथ्वी और उसके पर्यावरण की सुरक्षा हेतु संकल्पबद्ध होकर पिछले 47 सालों से लगातार 22 अप्रैल को पृथ्वी दिवस मनाता आ रहा है। 1970 में पहली बार पूरी दुनिया ने पृथ्वी दिवस का शुभारम्भ एक अमेरिकी सीनेटर जेराल्ड नेल्सन के पर्यावरण संरक्षण के लिये किये गए प्रयासों को समर्थन देने के उद्देश्य से किया था। तब से जैसे यह एक विश्व परम्परा बन गई है और पृथ्वी दिवस ने हर देश के एक वार्षिक आयोजन का रूप ले लिया है। पर्यावरण की रक्षा के लिये भारत सहित कई देशों में कानून भी बनाए गए हैं, जिससे विभिन्न पर्यावरणीय असन्तुलनों पर काबू पाया जा सके।

    लेकिन यथार्थ यह है कि पृथ्वी दिवस के सफल आयोजनों के बावजूद भी विश्व के औसत तामपान में हुई 1.5 डिग्री की वृद्धि, औद्योगिक उत्पादन के बढ़ने और अन्धाधुन्ध विकास कार्यों और पेट्रोल, डीजल तथा गैसों के अधिक इस्तेमाल के कारण कॉर्बन उत्सर्जन की बढ़ोत्तरी, ग्लेशियरों के पिघलाव और असन्तुलित भयंकर बाढ़ों और प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती घटनाओं ने पृथ्वी का स्वरूप ही बदल दिया है।

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    Author: 
    उमेश कुमार राय

    .रोज करीब 250 मिलियन लीटर गंदे पानी का परिशोधन करने वाले व कार्बन को सोखने की अकूत क्षमता रखने वाले ईस्ट कोलकाता वेटलैंड्स पर अतिक्रमण का आक्रमण बढ़ रहा है। यह हमला अगर आने वाले समय में भी जारी रहा, तो एक दिन इसका अस्तित्व ही मिट जायेगा।

    चार पर्यावरणविदों द्वारा किये गये एक शोध में खुलासा हुआ है कि वेटलैंड्स (आर्द्रभूमि) का तेजी से अतिक्रमण किया जा रहा है और उस पर मकान बनाये जा रहे हैं।

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    Source: 
    राइजिंग टू द काल, 2014

    अनुवाद - संजय तिवारी
    .पहली जून की वह तपती दोपहरी थी। राजस्थान के सबसे गर्म जिलों में शामिल बाड़मेर में पारा 40 डिग्री के पार था। तिस पर रोजाना छह से आठ घंटे की बिजली कटौती। नये कोटरा में सब तपती गर्मी की मार झेल रहे थे लेकिन कुछ लोग ऐसे थे जिन्हें बाड़मेर में भी यह गर्मी परेशान नहीं कर रही थी। बाड़मेर के इस इलाके में मंगनियरों के घर दूसरे घरों के मुकाबले ज्यादा ठंडे थे। ऐसा नहीं था कि इन घरों में कूलर या पंखा लगा था। घरों की ठंडक के पीछे का राज घरों की डिजाइन में ही छिपा था। एक जैसे दिखने वाले इन 65 घरों को कुछ इस तरह से डिजाइन किया गया था कि वो गर्मी में ठंडे और सर्दी में अंदर से गर्म रहते हैं।

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    Author: 
    आशीष

    .शायद आप यह सुनकर हैरान हो जाएँ जिस गोमती के पानी को हम लखनऊ में छू तक नहीं सकते हैं उसी गोमती के पानी को लखनऊ से कुछ किलोमीटर पहले के गाँव वाले रोजाना पीते हैं। गोमती के पानी से कई घरों का खाना पकता है। दूर दराज के खेत खलिहानों में जब इस चटक धूप में प्यास लगती है तो वो भी इसी गोमती के पानी से प्यास बुझाता है। नदी के किनारे बसे गाँव वालों का कहना है कि आज तक उनके इलाके में न तो कभी गोमती की सफाई हुई और न ही कभी कोई विभाग का अधिकारी गोमती की सफाई के नाम पर आया। बरसों से लखनऊ जिले में गोमती का पानी सदैव निर्मल होकर बहता रहा है। वैज्ञानिकों का भी कहना है कि इस इलाके में गोमती का जल बेहद निर्मल और शुद्ध है।

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    रिकाॅर्डधारक ब्रह्मपुत्र


    .जैसे पूर्वोत्तर भारत के सात राज्यों के बिना भारत के बाजूदार नक्शे की कल्पना अधूरी है, वैसे ही ब्रह्मपुत्र के बिना पूर्वोत्तर भारत का कल्पनालोक भी अधूरा ही रहने वाला है। ब्रह्मपुत्र, पूर्वोत्तर भारत की संस्कृति भी है, सभ्यता भी और अस्मिता भी। ब्रह्मपुत्र बर्मी भी है, द्रविड़ भी, मंगोल भी, तिब्बती भी, आर्य भी, अनार्य भी, अहोम भी और मुगल भी। उसने खुद अपनी आँखों से इन तमाम संस्कृतियों को आपस में लड़ते, मिलते, बिछुड़ते और बढ़ते देखा है। तमाम बसवाटों को बसते-उजड़ते देखने का सुख व दर्द। दोनों का एहसास ब्रह्मपुत्र में आज भी जिंदा है। ब्रह्मपुत्र, पूर्वोत्तर भारत की लोकास्थाओं में भी है, लोकगीतों में भी और लोकगाथाओं में भी। ब्रह्मपुत्र, भूपेन दा का संगीत भी है और प्रकृति का स्वर प्रतिनिधि भी। पूर्वोत्तर की रमणियों का सौंदर्य भी ब्रह्मपुत्र में प्रतिबिम्बित होता है और आदिवासियों का प्रकृति प्रेम भी और गौरवनाद भी। आस्थावानों के लिये ब्रह्मपुत्र, ब्रह्म का पुत्र भी है और बूढ़ा लुइत भी। लुइत यानी लोहित यानी रक्तिम।

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    .एक तरफ मध्यप्रदेश की सरकार नर्मदा को जीवित इकाई माने जाने का संकल्प आगामी विधानसभा सत्र में ले चुकी है। नर्मदा के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिये नमामि देवी नर्मदे यात्रा निकाल रही है तो दूसरी तरफ नर्मदा की बीमारी बढ़ती ही जा रही है। नर्मदा की बीमारी अब गंभीर रूप लेने लगी है। नर्मदा के जलस्तर में तेजी से गिरावट आ रही है। कुछ दिनों पहले तक नर्मदा नदी में इतनी बड़ी तादाद में अजोला घास फ़ैल गई थी कि लोगों को स्नान और आचमन करने में भी परेशानी होने लगी थी।

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    Author: 
    अनिल सिंदूर

    बचपन


    .उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले में स्वामी विज्ञानानन्द का आश्रम गंगा नदी के ओम तट पर भिटौरा गाँव में है। वर्ष 1970 के दिनों में रामशंकर पुत्र रामलखन गाँव बड़नपुर जनपद फतेहपुर में अपने माता-पिता और तीन बहनों के साथ रहते थे। जब रामशंकर की उम्र 13-14 वर्ष की रही होगी, उस समय वह दसवीं कक्षा के छात्र थे। अचानक एक दिन कुछ असाधारण करने की लालसा में रामशंकर सब कुछ छोड़ कर घर से बिना किसी को बताये चले जाता है और 33 वर्ष बाद जब वह अपने गाँव लौटा तो वह पिता के द्वारा रखे गये नाम रामशंकर को छोड़ चुका था। रामशंकर अब स्वामी विज्ञानानंद हो चुके थे।

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    .ऐसा लगता है कि गंगा की शुद्धि का मसला जितना आसान समझा जा रहा था उतना है नहीं। असलियत यह है कि भले मोदी सरकार इस बाबत लाख दावे करे लेकिन केन्द्र सरकार के सात मंत्रालयों की लाख कोशिशों के बावजूद 2014 से लेकर आज तक गंगा की एक बूँद भी साफ नहीं हो पाई है। 2017 के पाँच महीने पूरे होने को हैं, परिणाम वही ढाक के तीन पात के रूप में सामने आए हैं। कहने का तात्पर्य यह कि इस बारे में अभी तक तो कुछ सार्थक परिणाम सामने आए नहीं हैं जबकि इस परियोजना को 2018 में पूरा होने का दावा किया जा रहा था। गंगा आज भी मैली है। दावे कुछ भी किए जायें असलियत यह है कि आज भी गंगा में कारखानों से गिरने वाले रसायन-युक्त अवशेष और गंदे नालों पर अंकुश नहीं लग सका है। नतीजन उसमें ऑक्सीजन की मात्रा बराबर कम होती जा रही है।

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