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    (1966 का अधिनियम संख्यांक 54)


    {29 दिसम्बर, 1966}


    कुछ विक्रयार्थ बीजों की क्वालिटी के विनियमन और तत्संसक्त बातों के लिये उपबन्ध करने के लिये अधिनियम

    भारत गणराज्य के सत्रहवें वर्ष में संसद द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो:-

    1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और विस्तार


    (1) यह अधिनियम बीज अधिनियम, 1966 कहा जा सकेगा।
    (2) इसका विस्तार सम्पूर्ण भारत पर है।
    (3) यह उस तारीख1को प्रवृत्त होगा जिसे केन्द्रीय सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे और इस अधिनियम के विभिन्न उपबन्धों के लिये तथा विभिन्न राज्यों के लिये या उनके विभिन्न क्षेत्रों के लिये विभिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी।

    2. परिभाषाएँ


    इस अधिनियम में, जब तक कि सन्दर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

    (1) “कृषि” के अन्तर्गत उद्यान कृषि आती है;
    (2) “केन्द्रीय बीज प्रयोगशाला” से धारा 4 की उपधारा (1) के अधीन स्थापित या इस रूप में घोषित केन्द्रीय बीज प्रयोगशाला अभिप्रेत है;
    (3) “प्रमाणन अभिकरण” से धारा 8 के अधीन स्थापित या धारा 18 के अधीन मान्यता प्राप्त प्रमाणन अभिकरण अभिप्रेत है;
    (4) “समिति” से धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन गठित केन्द्रीय बीज समिति अभिप्रेत है;
    (5) “आधान” से कोई बक्स, बोतल, सन्दूकची, टिन, पीपा, डिब्बा, पात्र, बोरी, थैला, आवेष्टन या अन्य वस्तु, जिसमें कोई चीज या वस्तु रखी जाती है या पैक की जाती है, अभिप्रेत है;
    (6) “निर्यात” से भारत में से भारत के बाहर के स्थान को ले जाना अभिप्रेत है;
    (7) “आयात” से भारत के बाहर के स्थान से भारत में लाना अभिप्रेत है;
    (8) “किस्म” से फसल के पौधों की एक या अधिक सम्बद्ध जातियाँ या उपजातियाँ अभिप्रेत हैं, जिनमें हर एक अलग-अलग या संयुक्त रूप से एक सामान्य नाम से जानी जाती हैं जैसे बन्दगोभी, मक्का, धान और गेहूँ;

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    (1970 का अधिनियम संख्यांक 16)


    {2 अप्रैल, 1970}


    पंजाब कृषि विश्वविद्यालय अधिनियम, 1961 द्वारा गठित पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के स्थान पर दो स्वतंत्र कृषि विश्वविद्यालयों की स्थापना का और उन स्वतंत्र कृषि विश्वविद्यालयों की स्थापना के पारिणामिक या उससे सम्बद्ध विषयों का उपबन्ध करने के लिये अधिनियम

    अतः हरियाणा और पंजाब राज्यों में कृषि के विकासार्थ यह समीचीन है कि पंजाब कृषि विश्वविद्यालय अधिनियम, 1961 द्वारागठित पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के स्थान पर दो स्वतंत्र कृषि विश्वविद्यालयों की स्थापना का उपबन्ध किया जाये; और हरियाणा और पंजाब राज्यों के विधान-मण्डलों ने उपर्युक्त विषय के और उसके आनुषंगिक विषयों के सम्बन्ध में, जहाँ तक कि ऐसे विषय संविधान की सप्तम अनुसूची की सूची 2 में प्रगणित विषय हैं, संविधान के अनुच्छेद 252 के खण्ड (1) के अनुसार संकल्प पारित कर दिये हैं; अतः भारत गणराज्य के इक्कीसवें वर्ष में  संसद द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो:-

    अध्याय 1


    प्रारम्भिक


    1. संक्षिप्त नाम और प्रारम्भ


    (1) यह अधिनियम हरियाणा और पंजाब कृषि विश्वविद्यालय अधिनियम, 1970 कहा जा सकेगा।
    (2) यह 1970 की फरवरी के दूसरे दिन प्रवृत्त हुआ समझा जाएगा।

    2. परिभाषाएँ


    इस अधिनियम में और तद्धीन बनाए गए सभी परिनियमों में, जब तक कि सन्दर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -

    (क) “विद्या परिषद्” से किसी तत्स्थानी विश्वविद्यालय के सम्बन्ध में, उस विश्वविद्यालय की विद्या परिषद अभिप्रेत है;
    (ख) “कृषि” के अन्तर्गत मृदा और जल के प्रबन्ध का आधारिक और अनुप्रयुक्त विज्ञान, फसल और पशुधन का उत्पादन और प्रबन्ध, गृह विज्ञान और ग्रामीण व्यक्तियों की बेहतरी भी है;
    (ग) “समुचित सरकार” से-

    (i) हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के सम्बन्ध में हरियाणा राज्य की सरकार अभिप्रेत है;

    (ii) पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के सम्बन्ध में, पंजाब राज्य की सरकार अभिप्रेत है;

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    (1972 का अधिनियम संख्यांक 13)


    {20 अप्रैल, 1972}


    सामुद्रिक उत्पाद उद्योग के विकास के लिये संघ के नियंत्रणाधीन एक प्राधिकरण की स्थापना का तथा उससे सम्बन्धित विषयों का उपबन्ध करने के लिये अधिनियम

    भारत गणराज्य के तेईसवें वर्ष में संसद द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो:-

    अध्याय 1


    प्रारम्भिक


    1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ


    (1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम सामुद्रिक उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1972 है।
    (2) इसका विस्तार सम्पूर्ण भारत पर है।
    (3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे;

    परन्तु इस अधिनियम के विभिन्न उपबन्धों के लिये भिन्न-भिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी।

    2. संघ द्वारा नियंत्रण की समीचीनता के सम्बन्ध में घोषणा


    इसके द्वारा यह घोषित किया जाता है कि लोकहित में यह समीचीन है कि सामुद्रिक उत्पाद उद्योग को संघ अपने नियंत्रण में ले ले।

    3. परिभाषाएँ


    इस अधिनियम में, जब तक कि सन्दर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

    (क) “प्राधिकरण” से धारा 4 के अधीन स्थापित सामुद्रिक उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण अभिप्रेत है;
    (ख) “अध्यक्ष” से प्राधिकरण का अध्यक्ष अभिप्रेत है;
    (ग) “वाहन” के अन्तर्गत वाहक जलयान या यान भी है;
    (घ) “व्यवहारी” से किसी भी सामुद्रिक उत्पाद का व्यवहारी अभिप्रेत है;
    (ङ) “निदेशक” से धारा 7 के अधीन नियुक्त सामुद्रिक उत्पाद निर्यात विकास निदेशक अभिप्रेत है;
    (च) “निर्यात” और “आयात” से भूमि, समुद्र या वायु-मार्ग द्वारा, क्रमशः, भारत से बाहर ले जाना, या भारत में लाना, निदेशक अभिप्रेत है;
    (छ) “मछली पकड़ने का जलयान” से ऐसा पोत या ऐसी नाव अभिप्रेत है जो नोदन के यांत्रिक साधनों से युक्त हो और जो, लाभ के लिये, समुद्र से मछलियाँ पकड़ने में अनन्य रूप से लगी हुई हो;

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    (1972 का अधिनियम संख्यांक 30)


    {14 जून, 1972}


    केन्द्रीय सरकार द्वारा अर्जित भूमियों के अथवा जिन भूमियों के अर्जन की कार्यवाहियाँ उस सरकार द्वारा आरम्भ की जा चुकी हैं उनके, यथास्थिति, अत्यधिक संख्या में तात्पर्यित अन्तरणों अथवा अनिभज्ञ लोगों को ऐसी भूमियों के अन्तरणों को निवारित करने की दृष्टि से कतिपय निर्बन्धन अधिरोपित करने के लिये अधिनियम

    भारत गणराज्य के तेईसवें वर्ष में संसद द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो:-

    1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ


    (1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम दिल्ली भूमि (अन्तरण पर निर्बन्धन) अधिनियम, 1972 है।
    (2) इसका विस्तार सम्पूर्ण दिल्ली संघ राज्यक्षेत्र पर है।
    (3) यह तुरन्त प्रवृत्त होगा।

    2. परिभाषाएँ


    इस अधिनियम में, जब तक कि सन्दर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -

    (क) ‘प्रशासक” से संविधान के अनुच्छेद 239 के अधीन राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त दिल्ली संघ राज्य क्षेत्र का प्रशासक अभिप्रेत है;
    (ख) ‘सक्षम प्राधिकारी” से अभिप्रेत है प्रशासक द्वारा, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, उन क्षेत्रों के लिये, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किये जाएँ, इस अधिनियम के अधीन सक्षम प्राधिकारी के कृत्यों को करने के लिये प्राधिकृत कोई व्यक्ति या प्राधिकारी;
    (ग) विकास अधिनियम” से दिल्ली विकास अधिनियम, 1957 (1957 का 61) अभिप्रेत है;
    (घ) विहित” से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
    (ङ) “स्कीम” से दिल्ली के योजनाबद्ध विकास के लिये भूमि अर्जन की स्कीम अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत दिल्ली महायोजना के उपबन्धों के अनुसरण में क्रियान्वित की जाने वाली, केन्द्रीय सरकार द्वारा विकास अधिनियम की धारा 9 की उपधारा (2) के अधीन यथा अनुमोदित कोई स्कीम, परियोजना या संकर्म भी है।

    3. केन्द्रीय सरकार द्वारा अर्जित भूमियों के अन्तरण का प्रतिषेध

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    बाढ़बाढ़बिहार, असम और उत्तर प्रदेश में बाढ़ का प्रकोप जारी है। बिहार में ज्यादा नुकसान की खबरें आ रही हैं। यहाँ हर साल बाढ़ की समस्या होती है, यह एक स्थायी समस्या बन गई है बल्कि लगातार बढ़ रही है। हर साल वही कहानी दोहराई जाती है। बाढ़ आती है, हल्ला मचता है, दौरे होते हैं और राहत पैकेज की घोषणाएँ होती हैं। लेकिन इस समस्या से निपटने के लिये कोई तैयारी नहीं की जाती।

    पहले भी बाढ़ आती थी लेकिन वह इतने व्यापक कहर नहीं ढाती थी। इसके लिये गाँव वाले तैयार रहते थे। बल्कि इसका उन्हें इंतजार रहता था। खेतों को बाढ़ के साथ आई नई मिट्टी मिलती थी, भरपूर पानी लाती थी जिससे प्यासे खेत तर हो जाते थे।

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    (1972 का अधिनियम संख्यांक 53)


    {9 सितम्बर, 1972}


    1{देश की पारिस्थितिकीय और पर्यावरणीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से, वन्य प्राणियों, पक्षियों और पादपों के संरक्षण के लिये तथा उनसे सम्बन्धित या प्रासंगिक या आनुषंगिक विषयों का उपबन्ध करने के लिये अधिनियम}

    अतः भारत गणराज्य के तेईसवें वर्ष में संसद द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो:-

    अध्याय 1


    प्रारम्भिक


    1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ


    (1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 है।

    3{(2) इसका विस्तार जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय सम्पूर्ण भारत पर है।}

    (3) यह किसी राज्य या संघ राज्य क्षेत्र में, जिस पर इसका विस्तार है4***ऐसी तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, नियत करे तथा इस अधिनियम के विभिन्न उपबन्धों के लिये और विभिन्न राज्यों या संघ राज्य क्षेत्रों के लिये विभिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी।

    2. परिभाषाएँ


    इस अधिनियम में, जब तक कि सन्दर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

    5{(1) “प्राणी” के अन्तर्गत स्तनी, पक्षी, सरीसृप, जलस्थल चर, मत्स्य, अन्य रज्जुकी तथा अकशेरूकी हैं और इनमें उनके बच्चे तथा अंडे भी सम्मिलित हैं;}

    (2) “प्राणी वस्तु” से ऐसी वस्तु अभिप्रेत है जो पीड़कजन्तु से भिन्न किसी बन्दी या वन्य प्राणी से बनी है और इसके अन्तर्गत ऐसी कोई वस्तु या पदार्थ है, जिसमें ऐसे पूरे प्राणी या उसके किसी भाग का 6{उपयोग किया गया है और भारत में आयातित हाथी दाँत तथा उससे बनी वस्तुएँ;}

    5{(4) “बोर्ड” से धारा 6 की उपधारा (1) के अधीन गठित राज्य वन्य जीव बोर्ड अभिप्रेत है;}

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    (1974 का अधिनियम सख्यांक 6)


    {23 मार्च, 1974}


    जल प्रदूषण के निवारण तथा नियंत्रण और जल की स्वास्थ्यप्रदता बनाए रखने या पूर्वावस्था में लाने के लिये, पूर्वोक्त प्रयोजनों को क्रियान्वित करने की दृष्टि से जल प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण बोर्डों की स्थापना के लिये, उनसे सम्बन्धित शक्तियाँ और कृत्य ऐसे बोर्डों को प्रदत्त और समनुदेशित करने के लिये और उनसे सम्बन्धित विषयों के लिये उपबन्ध करने के लिये अधिनियम

    अतः जल प्रदूषण के निवारण तथा नियंत्रण और जल की स्वास्थ्यप्रदता बनाए रखने या पूर्वावस्था में लाने के लिये, पूर्वोक्त प्रयोजनों को क्रियान्वित करने की दृष्टि से जल प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण बोर्डों की स्थापना के लिये और उनसे सम्बन्धित शक्तियाँ और कृत्य ऐसे बोर्डों को प्रदत्त और समनुदेशित करने के लिये उपबन्ध करना समीचीन है;

    और अतः संविधान के अनुच्छेद 249 और 250 में यथा उपबन्धित के सिवाय, संसद को पूर्वोक्त विषयों में से किसी के बारे में राज्यों के लिये विधियाँ बनाने की शक्ति नहीं है;

    और अतः संविधान के अनुच्छेद 252 के खण्ड (1) के अनुसरण में, आसाम, बिहार, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, राजस्थान, त्रिपुरा और पश्चिमी बंगाल के राज्यों के विधान-मंडलों के सभी सदनों द्वारा इस आशय के संकल्प पारित किये जा चुके हैं कि पूर्वोक्त विषय संसद को, विधि द्वारा, उन राज्यों में विनियमित करने चाहिए;

    अतः भारत गणराज्य के पच्चीसवें वर्ष में संसद द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो:-

    अध्याय 1


    प्रारम्भिक


    1. संक्षिप्त नाम, लागू होना और प्रारम्भ


    (1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम जल (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) अधिनियम, 1974 है।

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    (1976 का अधिनियम संख्यांक 63)


    {10 अप्रैल, 1976}


    मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सरकारों की ओर से राजघाट में बेतवा नदी पर बाँध का सन्निर्माण करके राजघाट में जलाशय बनाने के लिये और ऐसे जलाशय के विनियमन के लिये एक बोर्ड की स्थापना का उपबन्ध करने के लिये अधिनियम

    भारत गणराज्य के सत्ताइसवें वर्ष में संसद द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-

    अध्याय 1


    प्रारम्भिक


    1. संक्षिप्त नाम और प्रारम्भ


    (1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम बेतवा नदी बोर्ड अधिनियम, 1976 है।

    (2) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जिसे केन्द्रीय सरकार, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सरकारों से परामर्श करके, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे।

    2. संघ द्वारा नियंत्रण की समीचीनता के बारे में घोषणा


    इसके द्वारा यह घोषित किया जाता है कि लोकहित में यह समीचीन है कि केन्द्रीय सरकार अन्तरराज्यिक बेतवा नदी और नदी घाटी के विनियमन और विकास का नियंत्रण इसमें इसके पश्चात उपबन्धित विस्तार तब अपने अधीन ले ले।

    3. परिभाषाएँ


    इस अधिनियम में, जब तक कि सन्दर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -

    (क) “बोर्ड से धारा 4 के अधीन स्थापित बेतवा नदी बोर्ड अभिप्रेत है;
    (ख) “अध्यक्ष” से बोर्ड का अध्यक्ष अभिप्रेत है;
    (ग) “कार्यकारिणी समिति” से धारा 5 के अधीन गठित कार्यकारिणी समिति अभिप्रेत है;
    (घ) “सदस्य” से बोर्ड का सदस्य अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत अध्यक्ष भी है;
    (ङ) विहित” से केन्द्रीय सरकार द्वारा धारा 22 के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
    (च) “राजघाट बाँध” से अनुसूची में वर्णित बाँध अभिप्रेत है;
    (छ) 1{ रानी लक्ष्मीबाई सागर, से राजघाट बाँध के सन्निर्माण से बना हुआ जलाशय अभिप्रेत है;
    (ज) ‘विनियम’ से बोर्ड द्वारा धारा 23 के अधीन बनाए गए विनियम अभिप्रेत हैं;

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    (1977 का अधिनियम संख्यांक 36)


    { 7 दिसम्बर, 1977}


    जल प्रदूषण के निवारण तथा नियंत्रण के लिये जल (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) अधिनियम, 1974 के अधीन गठित केन्द्रीय बोर्ड और राज्य बोर्डों के साधनों में वृद्धि करने की दृष्टि से कुछ उद्योग चलाने वाले व्यक्तियों और स्थानीय प्राधिकरणों द्वारा उपभोग किये गए जल पर उपकर के उद्धहण और संग्रहण का उपबन्ध करने के लिये अधिनियम

    भारत गणराज्य के अट्ठाइसवें वर्ष में संसद द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो:-

    अध्याय 1


    प्राम्भिक


    1. संक्षिप्त नाम, विस्तार, लागू होना और प्रारम्भ


    (1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम जल (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) उपकर अधिनियम, 1977 है।

    (2) इसका विस्तार जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय सम्पूर्ण भारत पर है।

    (3) उपधारा (2) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए यह उन सभी राज्यों को, जिन्हें जल (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) अधिनियम, 1974 (1974 का 6) लागू होता है और संघ राज्य क्षेत्रों को, लागू होगा।

    (4) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे।

    2. परिभाषाएँ


    इस अधिनियम में, जब तक कि सन्दर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -

    (क) “स्थानीय प्राधिकरण” से वह नगर निगम या नगर परिषद (चाहे किसी भी नाम से ज्ञात हो) या छावनी बोर्ड या कोई अन्य निकाय अभिप्रेत है, जिसे जल प्रदाय करने का कर्तव्य उस विधि के अधीन सौंपा गया है, जिसके द्वारा या अधीन उसका गठन किया गया है;
    (ख) “विहित” से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
    1{(ग) “उद्योग” के अन्तर्गत ऐसी कोई क्रिया या प्रक्रिया या उपचार और व्ययन प्रणाली भी है, जिसमें जल का उपभोग होता है या जिससे मल बहिःस्राव या व्यावसायिक बहिःस्राव होता है किन्तु इसके अन्तर्गत कोई हाइडल पावर यूनिट नहीं है;

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    (1980 का अधिनियम संख्यांक 69)


    {27 दिसम्बर, 1980}


    वनों के संरक्षण का तथा उससे सम्बन्धित अथवा उससे आनुषंगिक या प्रासंगिक विषयों का उपबन्ध करने के लिये अधिनियम

    भारत गणराज्य के इकतीसवें वर्ष में संसद द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो:-

    1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ


    (1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 है।
    (2) इसका विस्तार जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय सम्पूर्ण भारत पर है।
    (3) यह 25 अक्तूबर, 1980 को पूर्व हुआ समझा जाएगा।

    2. वनों के अपारक्षण या वन भूमि के वनेतर प्रयोजन के लिये उपयोग पर निर्बन्धन


    किसी राज्य में तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, कोई राज्य सरकार या अन्य प्राधिकारी यह निदेश करने वाला कोई आदेश, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन के बिना, नहीं देगा।

    (i) कि कोई आरक्षित वन (उस राज्य में तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में “आरक्षित वन” पद के अर्थ में) या उसका कोई प्रभाग आरक्षित नहीं रह जाएगा;
    (ii) कि किसी वन भूमि या उसके किसी प्रभाग को किसी वनेतर प्रयोजन के लिये उपयोग में लाया जाये।
    1{(iii) कि कोई वन भूमि या उसका कोई प्रभाग पट्टे पर या अन्यथा किसी प्राइवेट व्यक्ति या किसी प्राधिकरण, निगम, अभिकरण या किसी अन्य संगठन को, जो सरकार के स्वामित्व, प्रबन्ध या नियंत्रण के अधीन नहीं है, समनुदेशित किया जाये;
    (iv) कि किसी वनभूमि या उसके किसी प्रभाग से, पुनर्वनरोपण के लिये उसका उपयोग करने के प्रयोजन के लिये, उन वृक्षों को, जो उस भूमि या प्रभाग में प्राकृतिक रूप से उग आये हैं, काट कर साफ किया जाये।,

    2{ स्पष्टीकरण


    इस धारा के प्रयोजन के लिये “वनेतर प्रयोजन” से, :-

    (क) चाय, काफी, मसाले, रबड़, पाम, तेल वाले पौधे, उद्यान-कृषि फसलों या औषधीय पौधे की खेती के लिये;
    (ख) पुनर्वनरोपण से भिन्न किसी प्रयोजन के लिये,

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    (1981 का अधिनियम संख्यांक 14)


    {29 मार्च, 1981}


    वायु प्रदूषण के निवारण तथा नियंत्रण और उपशमन के लिये और पूर्वोक्त प्रयोजनों को क्रियान्वित करने की दृष्टि से बोर्डों की स्थापना के लिये, उनसे सम्बन्धित शक्तियाँ और कृत्य ऐसे बोर्डों को, प्रदत्त और समनुदेशित करने के लिये और उनसे सम्बन्धित विषयों का उपबन्ध करने के लिये अधिनियम

    जून, 1972 में स्टाकहोम में मानव पर्यावरण पर संयुक्त राष्ट्र संघ सम्मेलन में, जिसमें भारत ने भी भाग लिया था, यह विनिश्चय किया गया कि पृथ्वी के प्राकृतिक संसाधनों को बनाए रखने के लिये, जिनमें अन्य बातों के साथ-साथ वायु की क्वालिटी बनाए रखना और उसके प्रदूषण पर नियंत्रण रखना सम्मिलित है, समुचित कदम उठाए जाएँ;

    यह आवश्यक समझा गया कि उक्त विनिश्चयों को, जहाँ तक कि उनका सम्बन्ध वायु की क्वालिटी बनाए रखने और उसके प्रदूषण पर नियंत्रण रखने से है; कार्यान्वित किया जाये;

    अतः भारत गणराज्य के बत्तीसवें वर्ष में संसद द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -

    अध्याय 1


    प्रारम्भिक


    1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ


    (1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981 है।
    (2) इसका विस्तार सम्पूर्ण भारत पर है।
    (3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे।

    2. परिभाषाएँ


    इस अधिनियम में, जब तक कि सन्दर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

    (क) “वायु प्रदूषक” से वायुमण्डल में ऐसी सान्द्रता में विद्यमान कोई ठोस, द्रव या गैसीय पदार्थ 1{(जिसके अन्तर्गत शोर भी है)} अभिप्रेत है जो मानव, अन्य जीवित प्राणी या वनस्पति या सम्पत्ति या पर्यावरण के लिये क्षतिकर हो सकता है या जिसका क्षतिकर होना सम्भाव्य है;
    (ख) “वायु प्रदूषण” से वायुमण्डल में किसी वायु प्रदूषक का विद्यमान होना अभिप्रेत है;

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    (1981 का अधिनियम संख्यांक 42)


    {28 सितम्बर, 1981}


    भारत के कुछ सामुद्रिक क्षेत्रों में विदेशी जलयानों द्वारा मत्स्यन को विनियमित करने और उससे सम्बन्धित विषयों के लिये उपबन्ध करने के लिये अधिनियम

    भारत गणराज्य के बत्तीसवें वर्ष में संसद द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-

    अध्याय 1


    प्रारम्भिक


    1. संक्षिप्त नाम और प्रारम्भ


    (1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम भारत का सामुद्रिक क्षेत्र (विदेशी जलयानों द्वारा मत्स्यन का विनियमन) अधिनियम, 1981 है।

    (2) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे:

    परन्तु इस अधिनियम के विभिन्न उपबन्धों के लिये विभिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी और ऐसे किसी उपबन्ध में इस अधिनियम के प्रारम्भ के प्रति किसी निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस उपबन्ध के प्रवृत्त होने के प्रति निर्देश है।

    2. परिभाषाएँ


    इस अधिनियम में, जब तक कि सन्दर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

    (क) “भारत का अनन्य आर्थिक क्षेत्र से राज्य क्षेत्रीय सागर खण्ड, महाद्वीपीय मग्नतट भूमि, अनन्य आर्थिक क्षेत्र और अन्य सामुद्रिक क्षेत्र अधिनियम, 1976 (1976 का 80) की धारा 7 के उपबन्धों के अनुसार भारत का अनन्य आर्थिक क्षेत्र अभिप्रेत है;
    (ख) “मत्स्य” से कोई जलीय जीव जन्तु अभिप्रेत है चाहे वह सरोवर पाटप समुदाय का हो अथवा नहीं और इसके अन्तर्गत जलीय कवच प्राणी, क्रस्टेशियाई, मोलस्क, कूर्म (चेनोनिया) जलीय स्तनधारी, (उसके युवशील, पोना अंडे और जलांडक) होल्थूरियन्स, सीलन्टरेटूस, समुद्री घास-पात, प्रवाल (पोरीफेरा) और कोई अन्य जलीय जीव हैं-
    (ग) “मत्स्यन” से किसी भी ढंग से मछली को फँसाना, बझाना, उसको मार डालना, आकर्षित करना या उसका पीछा करना अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत मछली का प्रसंस्करण, परिरक्षण, अन्तरण, प्राप्त करना तथा परिवहन है;

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    (1981 का अधिनियम संख्यांक 61)


    {30 दिसम्बर, 1981}


    1{ समेकित ग्रामीण विकास के संवर्धन और ग्रामीण क्षेत्र की उन्नति को सुनिश्चित करने की दृष्टि से, कृषि, लघु उद्योगों, कुटीर और ग्राम उद्योगों, हस्त-शिल्पों और अन्य ग्रामशिल्पों तथा ग्रामीण क्षेत्रों में अन्य सहबद्ध आर्थिक क्रियाकलापों के संवर्धन और विकास के लिये उधार तथा अन्य सुविधाएँ देने और उनका विनियमन करने के लिये और उनसे सम्बद्ध या उनके आनुषंगिक विषयों के लिये एक विकास बैंक की, जो राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक के नाम से ज्ञात होगा, स्थापना करने के लिये अधिनियम}

    भारत गणराज्य के बत्तीसवें वर्ष में संसद द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो:-

    अध्याय 1


    प्रारम्भिक


    1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ


    (1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक अधिनियम, 1981 है।

    (2) इसका विस्तार सम्पूर्ण भारत पर है।

    (3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे और इस अधिनियम के भिन्न-भिन्न उपबन्धों के लिये भिन्न-भिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी तथा इस अधिनियम के प्रारम्भ के प्रति किसी उपबन्ध में किसी निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस उपबन्ध के प्रवृत्त होने के प्रति निर्देश है।

    2. परिभाषाएँ


    इस अधिनियम में, जब तक कि सन्दर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

    (क) “कृषि” के अन्तर्गत बागवानी, पशुपालन, वनोद्योग, दुग्ध उद्योग और कुक्कुट पालन; मत्स्य पालन और अन्य सहबद्ध क्रियाकलाप हैं चाहे उन्हें कृषि के साथ संयुक्त रूप से किया गया है या नहीं और “कृषि संक्रिया” पद का तद्नुसार अर्थ लगाया जाएगा।

    स्पष्टीकरण

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    (1982 का अधिनियम संख्यांक 49)


    {18 अक्तूबर, 1982}


    गंगा-भागीरथी-हुगली नदी के इलाहाबाद-हल्दिया खण्ड को राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित करने का उपबन्ध करने के लिये और उक्त जलमार्ग पर पोत-परिवहन और नौ-परिवहन के प्रयोजनों के लिये उस नदी का विनियमन और विकास करने का और उनसे सम्बद्ध या उनके आनुषंगिक विषयों का भी उपबन्ध करने के लिये अधिनियम

    भारत गणराज्य के तैंतीसवें वर्ष में संसद द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -

    1. संक्षिप्त नाम और प्रारम्भ


    (1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम राष्ट्रीय जलमार्ग (गंगा-भागीरथी-हुगली नदी इलाहाबाद-हल्दिया खण्ड) अधिनियम, 1982 है।

    (2) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे।

    2. गंगा-भागीरथी-हुगली नदी के किसी खण्ड की राष्ट्रीय जलमार्ग के रूप में घोषणा


    गंगा-भागीरथी-हुगली नदी के इलाहाबाद-हल्दिया खण्ड को, जिसकी सीमा अनुसूची में विनिर्दिष्ट की गई है, इसके द्वारा राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित किया जाता है।

    3. कुछ प्रयोजनों के लिये गंगा-भागीरथी-हुगली नदी के संघ द्वारा नियंत्रण की समीचीनता के बारे में घोषणा


    यह घोषित किया जाता है कि लोकहित में यह समीचीन है कि 1{संघ} राष्ट्रीय जलमार्ग पर पोत-परिवहन और नौ-परिवहन के प्रयोजनों के लिये गंगा-भागीरथी-हुगली नदी का विनियमन और विकास 1{भारतीय अन्तर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण अधिनियम, 1985 में उपबन्धित विस्तार तक} अपने नियंत्रण में ले ले।

    अनुसूची


    (धारा 2 देखिए)


    राष्ट्रीय जलमार्ग (गंगा-भागीरथी-हुगली नदी इलाहाबाद-हल्दिया खण्ड) की सीमाएँ

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    (1985 का अधिनियम संख्यांक 21)


    {29 मार्च, 1985}


    यह सुनिश्चित करने के लिये कि भोपाल गैस विभीषिका से उद्भूत होने वाले या उससे सम्बन्धित दावों के सम्बन्ध में शीघ्रता से, प्रभावी रूप से, साम्यापूर्ण रूप से और दावेदारों के सर्वोत्तम हित में कार्यवाही की जाये, केन्द्रीय सरकार को कतिपय शक्तियाँ प्रदान करने के लिये और उससे आनुषंगिक विषयों के लिये अधिनियम

    भारत गणराज्य के छत्तीसवें वर्ष में संसद द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो:-

    1. संक्षिप्त नाम और प्रारम्भ


    (1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम भोपाल गैस विभीषिका (दावा-कार्यवाही) अधिनियम, 1985 है।
    (2) यह 20 फरवरी, 1985 को प्रवृत्त हुआ समझा जाएगा।

    2. परिभाषाएँ


    इस अधिनियम में, जब तक कि सन्दर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो:-

    (क) “भोपाल गैस विभीषिका” या “विभीषिका” से 2 और 3 दिसम्बर, 1984 की घटना अभिप्रेत है, जिसमें भोपाल संयंत्र से (जो संयुक्त राज्य अमेरिका की यूनियन कार्बाइड कारपोरेशन की समनुषंगी यूनियन कार्बाइड इण्डिया लिमिटेड का संयंत्र है) अत्यधिक अनिष्टकारी और अत्यन्त खतरनाक गैस का निकलना अन्तर्वलित था और जिसके परिणामस्वरूप बड़ी मात्रा में जीवन-हानि और सम्पत्ति का नुकसान हुआ;
    (ख) “दावा” से अभिप्रेत है,-

    (i) प्रतिकर या नुकसानी के लिये विभीषिका से उद्भूत होने वाला या उससे सम्बन्धित कोई ऐसा दावा जो ऐसी जीवन-हानि या वैयक्तिक क्षति के लिये है, जो हुई है या जिसके होने की सम्भावना है;
    (ii) विभीषिका से उद्भूत होने वाला या उससे सम्बन्धित कोई ऐसा दावा, जो सम्पत्ति के किसी ऐसे नुकसान के लिये है, जो हुआ है या जिसके होने की सम्भावना है;
    (iii) ऐसे व्ययों के लिये दावा जो विभीषिका को नियंत्रण में रखने के लिये या विभीषिका के प्रभावों को कम करने या उसके साथ अन्यथा निपटने के लिये उपगत किया गया है या उपगत किये जाने के लिये अपेक्षित है;

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    (1986 का अधिनियम संख्यांक 29)


    {23 मई, 1986}


    पर्यावरण के संरक्षण और सुधार का और उनसे सम्बन्धित विषयों का उपबन्ध करने के लिये अधिनियम

    संयुक्त राष्ट्र के मानवीय पर्यावरण सम्मेलन में, जो जून, 1972 में स्टाकहोम में हुआ था और जिसमें भारत ने भाग लिया था, यह विनिश्चय किया गया था कि मानवीय पर्यावरण के संरक्षण और सुधार के लिये समुचित कदम उठाए जाएँ;

    यह आवश्यक समझा गया है कि पूर्वोक्त निर्णयों को, जहाँ तक उनका सम्बन्ध पर्यावरण संरक्षण और सुधार से तथा मानवों, अन्य जीवित प्राणियों, पादपों और सम्पत्ति को होने वाले परिसंकट के निवारण से है, लागू किया जाये;

    भारत गणराज्य के सैंतीसवें वर्ष में संसद द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो:-

    अध्याय 1


    प्रारम्भिक

    1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ


    (1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 है।
    (2) इसका विस्तार सम्पूर्ण भारत पर है।
    (3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे और इस अधिनियम के भिन्न-भिन्न उपबन्धों के लिये और भिन्न-भिन्न क्षेत्रों के लिये भिन्न-भिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी।

    2. परिभाषाएँ


    इस अधिनियम में, जब तक कि सन्दर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -

    (क) “पर्यावरण” के अन्तर्गत जल, वायु और भूमि हैं और वह अन्तरसम्बन्ध है जो जल, वायु और भूमि तथा मानवों, अन्य जीवित प्राणियों, पादपों और सूक्ष्मजीव और सम्पत्ति के बीच विद्यमान है;
    (ख) “पर्यावरण प्रदूषक” से ऐसा ठोस, द्रव या गैसीय पदार्थ अभिप्रेत है जो ऐसी सान्द्रता में विद्यमान है जो पर्यावरण के लिये क्षतिकर हो सकता है या जिसका क्षतिकर होना सम्भाव्य है;
    (ग) “पर्यावरण प्रदूषण” से पर्यावरण में पर्यावरण प्रदूषकों का विद्यमान होना अभिप्रेत है;

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    (1987 का अधिनियम संख्यांक 16)


    {23 मई, 1987}


    गोवा, दमण और दीव संघ राज्य क्षेत्र में प्रचलित और पहली तथा दूसरी अनुसूचियों में विनिर्दिष्ट खनन रियायतों के उत्सादन का और ऐसी खानों के, जिनसे ऐसी रियायतें सम्बन्धित हैं, विनियमन की दृष्टि से तथा संघ के नियंत्रणाधीन खनिजों के विकास के लिये, ऐसी खनन रियायतों की, खान और खनिज (विनियमन और विकास) अधिनियम, 1957 के अधीन खनन पट्टों के रूप में घोषणा का और उनसे सम्बन्धित या उनके आनुषंगिक विषयों के लिये उपबन्ध करने के लिये अधिनियम

    भूतपूर्व पुर्तगाली सरकार द्वारा और गोवा, दमण और दीव की सरकार द्वारा ऐसे, राज्य क्षेत्रों में जो अब गोवा, दमण और दीव के संघ राज्य क्षेत्रों में सम्मिलित हैं, तत्कालीन पोर्तगीज माइनिंग लाॅज (20 सितम्बर, 1906 की डिक्री) के अधीन कुछ खनन रियायतें शाश्वत रूप में दी गई हैं;

    और पूर्वोक्त खनन विधियाँ प्रवर्तन में नहीं रह गई हैं और इस सम्बन्ध में सन्देह व्यक्त किये गए हैं कि क्या ऐसी खनन रियायतें खान और खनिज (विनियमन और विकास) अधिनियम, 1957 (1957 का 67) के अर्थ के अन्तर्गत खनन पट्टा हैं;

    और ऐसी खनन रियायतों का उत्सादन करना और उन्हें, सामूहिक हित साधन के लिये, ऐसी खानों के विनियमन की दृष्टि से और संघ के नियंत्रणाधीन खनिजों का विकास करने के लिये, उस अधिनियम के उपबन्धों को ऐसी खानों पर, जिनसे ऐसी रियायतें सम्बन्धित हैं, लागू करने के प्रयोजन के लिये, पूर्वाेक्त अधिनियम के अधीन खनन पट्टों के रूप में घोषित करना लोकहित में समीचीन है;

    भारत गणराज्य के अड़तीसवें वर्ष में संसद द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित होः-

    अध्याय-1


    प्रारम्भिक


    1. संक्षिप्त नाम


    इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम गोवा, दमण और दीव खनन रियायत (उत्सादन और खनन पट्टा के रूप में घोषणा) अधिनियम 1987 है।

    2. परिभाषाएँ


    इस अधिनियम में, जब तक कि सन्दर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

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    (1988 का अधिनयम संख्यांक 40)


    {1 सितम्बर, 1988}


    ब्रह्मपुत्र नदी के सदिया-धुबरी खण्ड को राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित करने का उपबन्ध करने के लिये और उक्त जलमार्ग पर पोत-परिवहन और नौपरिवहन के प्रयोजनों के लिये उस नदी के उक्त खण्ड के विनियमन और विकास का तथा उनसे सम्बन्धित या उनके आनुषंगिक विषयों का भी उपबन्ध करने के लिये अधिनियम

    भारत गणराज्य के उनतालीसवें वर्ष में संसद द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो:-

    1. संक्षिप्त नाम और प्रारम्भ


    (1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम राष्ट्रीय जलमार्ग (ब्रह्मपुत्र नदी का सदिया-धुबरी खण्ड) अधिनियम, 1988 है।

    (2) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे।

    2. ब्रह्मपुत्र नदी के सदिया-धुबरी खण्ड की राष्ट्रीय जलमार्ग के रूप में घोषणा


    ब्रह्मपुत्र नदी के सदिया-धुबरी खण्ड को, जिसकी सीमाएँ अनुसूची में विनिर्दिष्ट हैं, राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित किया जाता है।

    3. कतिपय प्रयोजनों के लिये ब्रह्मपुत्र नदी के सदिया-धुबरी खण्ड के संघ द्वारा नियंत्रण की समीचीनता के बारे में घोषणा


    यह घोषित किया जाता है कि लोकहित में यह समीचीन है कि राष्ट्रीय जलमार्ग पर पोत-परिवहन और नौपरिवहन के प्रयोजनों के लिये ब्रह्मपुत्र नदी के सदिया-धुबरी खण्ड के विनियमन और विकास को, भारतीय अन्तरदेशीय जलमार्ग प्राधिकरण अधिनियम, 1985 (1985 का 82) में उपबन्धित विस्तार तक, संघ को अपने नियंत्रण में ले लेना चाहिए।

    अनुसूची


    (धारा 2 देखिए)


    राष्ट्रीय जलमार्ग (ब्रह्मपुत्र नदी का सदिया-धुबरी खण्ड) की सीमाएँ

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    (1992 का अधिनियम संख्यांक 40)


    {26 दिसम्बर, 1992}


    पूर्वोत्तर क्षेत्र में कृषि के विकास के लिये एक विश्वविद्यालय की स्थापना और उसके निगमन का तथा उस क्षेत्र में कृषि और सहबद्ध विज्ञान सम्बन्धी विद्या की अभिवृद्धि को अग्रसर करने और अनुसन्धान कार्य करने का उपबन्ध करने के लिये अधिनियम

    भारत गणराज्य के तैंतालीसवें वर्ष में संसद द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो:-

    1. संक्षिप्त नाम और प्रारम्भ


    (1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय अधिनियम, 1992 है।

    (2) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे।

    2. परिभाषाएँ


    इस अधिनियम में और इसके अधीन बनाए गए सभी परिनियमों में, जब तक कि सन्दर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

    (क) “विद्या परिषद” से विश्वविद्यालय की विद्या परिषद अभिप्रेत है;
    (ख) “शैक्षिणक कर्मचारीवृंद” से ऐसे प्रवर्ग के कर्मचारीवृंद अभिप्रेत हैं, जो अध्यादेशों द्वारा शैक्षिणक कर्मचारीवृंद अभिहित किये जाएँ;
    (ग) “कृषि” से अभिप्रेत है मृदा और जल प्रबन्ध सम्बन्धी बुनियादी और अनुपर्युक्त विज्ञान, फसल उत्पादन, जिसके अन्तर्गत सभी उद्यान फसलों का उत्पादन, पौधों, नाशकजीवों और रोगों का नियंत्रण है, उद्यान-कृषि, जिसके अन्तर्गत पुष्प विज्ञान भी है, पशुपालन, जिसके अन्तर्गत पशु चिकित्सा और दुग्ध विज्ञान है, मत्स्य विज्ञान, वन विज्ञान, जिसके अन्तर्गत फार्म वन विज्ञान है, गृह विज्ञान, कृषि इंजीनियरी और प्रौद्योगिकी, कृषि तथा पशुपालन उत्पादों का विपणन और प्रसंस्करण, भू-उपयोग और प्रबन्ध;
    (घ) “बोर्ड से विश्वविद्यालय का प्रबन्ध बोर्ड अभिप्रेत है;
    (ङ) “अध्ययन बोर्ड से विश्वविद्यालय का अध्ययन बोर्ड अभिप्रेत है;
    (च) “कुलाधिपति” से विश्वविद्यालय का कुलाधिपति अभिप्रेत है;

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    Author: 
    विजयदत्त श्रीधर
    Source: 
    समाज, प्रकृति और विज्ञान (समाज का प्रकृति एजेण्डा), माधवराव सप्रे स्मृति समाचारपत्र संग्रहालय, भोपाल, 2017

    गांधी जी ने पश्चिम की औद्योगिक सभ्यता को राक्षसी सभ्यता कहा है। असंयमी उपभोक्तावाद और लालची बाजारवाद ने सृष्टि विनाश की नींव रखी। भारत का परम्परागत संयमी जीवन-दर्शन ही त्रासद भविष्य से बचाव का मार्ग सुझाता है। समाज में वैज्ञानिक चेतना का प्रसार जरूरी है। इसके सघन प्रयास जरूरी हैं। परम्परागत ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का समन्वय जरूरी है, सम्यक सन्तुलन जरूरी है। इसके लिये हमें लोक संस्कृति, लोक संस्कार और लोक परम्पराओं के पास लौटना होगा।

    भारतीय ज्ञान परम्परा में श्रुति और स्मृति का प्रचलन रहा है। प्रकृति के सान्निध्य में सृष्टि के समस्त जैव आयामों के साथ सामंजस्य और सह-अस्तित्व के बोध को जाग्रत करते हुए जीवन की पाठशाला अरण्य के गुरुकुल में आरम्भ होती थी। इसी परिवेश और पर्यावरण में 5000 वर्ष पहले विश्व के आदिग्रंथ वेद की रचना हुई। वेद हों या अन्यान्य वाङ्मय सनातन ज्ञान के आदि स्रोत ऐसी ऋचाओं, श्लोकों, आख्यानों से भरे पड़े हैं जिनमें प्रकृति की महिमा और महत्ता का गुणगान है। ये भारतीय संस्कृति की कालजयी धरोहर हैं। इनका सम्बन्ध मानव जीवन की सार्थकता से है। जीवन को उत्कृष्ट बनाने की दिशा में उत्तरोत्तर आगे बढ़ने से है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे समाज के व्यवहार में आया यह ज्ञान लोक-विज्ञान है। कालान्तर में लोक संस्कृतियों ने लोक-विज्ञान को अपने इन्द्रधनुषी रंगों में रंगा। उसकी छटा दैनन्दिन रीति-रिवाज, संस्कार, मान्यताओं, परम्पराओं में लोक संस्कृति के माध्यम से विस्तार पाने लगी।

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