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    Author: 
    पंकज चतुर्वेदी
    Source: 
    नेशनल दुनिया, 16 नवंबर 2012
    पारंपरिक जल स्रोतों, नदी-नालों व तालाब-बावड़ियों से पटे मध्य प्रदेश में पिछला दशक जल समस्या का चरम काल रहा है। हालांकि इस समस्या को उपजाने में समाज के उन्हीं लोगों का योगदान अधिक रहा है जो इन दिनों इसके निदान का एकमात्र जरिया भूगर्भ जल दोहन बता रहे हैं। जिससे मध्य प्रदेश के मंडला जिले के तिलइपानी, मोहगांव, सिलपुरी, सिमरियामाल और घुघरी विकास खंडों में आठ हजार से अधिक हैंडपंप फ्लोराइड का जहर उगल रहे हैं। यहां बच्चों की समूची पीढ़ी अपाहिज हैं। ‘फ्लोरोसिस’ के नाम से पहचाने जाने वाले इस रोग का कोई इलाज नहीं है।दस साल पहले तिलइपानी के बाशिंदों का जीवन देश के अन्य हजारों आदिवासी गांवों की ही तरह था। वहां थोड़ी-बहुत दिक्कत पानी की ज़रूर थी। अचानक अफसरों को इन आदिवासियों की जल समस्या खटकने लगी। तुरत-फुरत हैंडपंप लगा दिए गए। लेकिन उन्हें क्या पता था कि यह जल जीवनदायी नहीं, जहर है। महज 542 आबादी वाले इस गांव में 85 बच्चे विकलांग हैं। तीन से बारह साल के अधिकांश बच्चों के हाथ-पैर टेढ़े हैं। वे घिसट-घिसटकर चलते हैं और उनकी हड्डियों और जोड़ों में असहनीय दर्द रहता है। यह विदारक कहानी अकेले तिलइपानी की ही नहीं है। मध्य प्रदेश और उससे अलग होकर बने छत्तीसगढ़ के आधा दर्जन जिलों के सैकड़ों गांवों में ‘तिलइपानी’ देखा जा सकता है। पारंपरिक जल स्रोतों, नदी-नालों व तालाब-बावड़ियों से पटे मध्य प्रदेश में पिछला दशक जल समस्या का चरम काल रहा है।

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    Author: 
    डॉ. राजेश कपूर
    Source: 
    प्रवक्ता, 04 जुलाई 2012
    राष्ट्रीय जल संसाधन परिषद ने अंततः ‘राष्ट्रीय जल नीति-2012’ को स्वीकार कर लिया है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अध्यक्षता में हुई राष्ट्रीय जल संसाधन परिषद की छठी बैठक में राष्ट्रीय जल नीति का रास्ता साफ हो गया। हालांकि भारत सरकार का तर्क यह है कि यह जल नीति पानी की समस्याओं से निपटने के लिए सरकार के निचले स्तरों पर जरूरी अधिकार देने की पक्षधर है। पर दरअसल सरकारों की मंशा पानी जैसे बहुमूल्य संसाधन को कंपनियों के हाथ में सौंपने की है। आम आदमी पानी जैसी मूलभूत जरूरत के लिए भी तरस जाएगा, बता रहे हैं डॉ. राजेश कपूर।

    प्रस्ताव की धारा 7.4 में जल वितरण के लिए शुल्क एकत्रित करने, उसका एक भाग शुल्क के रूप में रखने आदि के अलावा उन्हें वैधानिक अधिकार प्रदान करने की भी सिफारिश की गयी है। ऐसा होने पर तो पानी के प्रयोग को लेकर एक भी गलती होने पर कानूनी कार्यवाही भुगतनी पड़ेगी। ये सारे कानून आज लागू नहीं हैं तो भी पानी के लिए कितना मारा-मारी होती है। ऐसे कठोर नियंत्रण होने पर क्या होगा? जो निर्धन पानी नहीं ख़रीद सकेंगे उनका क्या होगा? किसान खेती कैसे करेंगे? नदियों के जल पर भी ठेका लेने वाली कंपनी के पूर्ण अधिकार का प्रावधान है।

    भारत सरकार के विचार की दिशा, कार्य और चरित्र को समझने के लिए “राष्ट्रीय जल नीति-2012” एक प्रामाणिक दस्तावेज़ है। इस दस्तावेज़ से स्पष्ट रूप से समझ आ जाता है कि सरकार देश के नहीं, केवल मेगा कंपनियों और विदेशी निगमों के हित में कार्य कर रही है। देश की संपदा की असीमित लूट बड़ी क्रूरता से चल रही है। इस नीति के लागू होने के बाद आम आदमी पानी जैसी मूलभूत ज़रूरत के लिए तरस जाएगा। खेती तो क्या पीने को पानी दुर्लभ हो जाएगा।

    29 फरवरी तक इस नीति पर सुझाव मांगे गए थे। शायद ही किसी को इसके बारे में पता चला हो। उद्देश्य भी यही रहा होगा कि पता न चले और औपचारिकता पूरी हो जाए। अब जल आयोग इसे लागू करने को स्वतंत्र है और शायद लागू कर भी चुका है। इस नीति के लागू होने से पैदा भयावह स्थिति का केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है। विश्व में जिन देशों में जल के निजीकरण की यह नीति लागू हुई है, उसके कई उदहारण उपलब्ध हैं।

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    Author: 
    राजु कुमार
    यूनियन कार्बाइड के कचरे का निष्पादन सरकार के लिए बड़ा सिरदर्द बन चुका है। समय बीतने के साथ ही इसका निपटारा कठिन से कठिन होता जा रहा है। 1993-95 में कमर सईद नाम के ठेकेदार को रसायनिक कचरा पैक करने का जिम्मा दिया गया था। उसने फैक्ट्री के आसपास के डंपिंग साइट से बहुत ही कम कचरे की पैक किया था, जो लगभग 390 टन था। उसके बाद परिसर एवं परिसर से बाहर इंपोरेशन तालाब में पड़े कचरे को पैक करने की जहमत किसी ने नहीं उठाई।भोपाल में यूनियन कार्बाइड के कचरे को डंप करने के लिए बनाए गए सोलर इंपोरेशन तालाब की मिट्टी कितना जहरीला है, यह आज के लोगों को नहीं मालूम। अब तो यहां की मिट्टी को लोग घरों में ले जा रहे हैं एवं दीवारों में लगा रहे हैं। यूनियन कार्बाइड के जहरीले रासायनिक कचरे वाले इस मिट्टी को छुने से भले ही तत्काल असर नहीं पड़े, पर यह धीमे जहर के रूप में शरीर पर असर डालने में सक्षम है। कचरे का जहरीलापन इससे साबित होता है कि आसपास की कॉलोनियों के साथ-साथ यह 5 किलोमीटर दूर तक के क्षेत्र के भूजल को जहरीला बना चुका है। इलाके के भूजल का इस्तेमाल करने का साफ मतलब है, अपने को बीमारियों के हवाले करना। भोपाल गैस त्रासदी पर काम कर रहे विभिन्न संगठन लगातार यह आवाज़ उठाते रहे हैं कि यूनियन कार्बाइड परिसर एवं उसके आसपास फैले रासायनिक कचरे का निष्पादन जल्द से जल्द किया जाए, पर सरकार के ढुलमुल रवैये के कारण आज भी यूनियन कार्बाइड परिसर के गोदाम में एवं उसके आसपास खुले में कचरा पड़ा हुआ है।

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    Author: 
    दुष्यंत शर्मा
    Source: 
    नेशनल दुनिया, 23 दिसंबर 2012
    अभी दुनिया भर के बहुत से देशों में परमाणु कचरा संयंत्रों के पास ही गहराई में पानी के पूल में जमा किया जाता है। इसके बाद भी कचरे से भरे कंटेनर्स की सुरक्षा बड़ी चुनौती होती है। परमाणु कचरे से उत्पन्न विकिरण हजारों वर्ष तक समाप्त नहीं होता। विकिरण से मनुष्य की सेहत और पर्यावरण पर पड़ने वाले घातक परिणाम भी सामने आ रहे हैं। परमाणु उर्जा का लंबा इतिहास रखने वाले कई विकसित देशों में भी इस कचरे को स्थायी रूप से ठिकाने लगाने की तैयारियाँ चल रही हैं, प्रयोग चल रहे हैं। बीच में एक विचार यह भी आया था कि इस कचरे को अंतरिक्ष में रखा जाए लेकिन मामला बेहद ख़र्चीला व जोखिम भरा होने के कारण वह विचार त्याग दिया गया।।परमाणु ऊर्जा के पक्ष-विपक्ष में तमाम तरह की चर्चाओं के बीच ब्रिटेन से खबर आई है जो भारतीय संदर्भ में निश्चय ही अत्यंत प्रासंगिक है। खबर के मुताबिक ब्रिटेन में परमाणु कचरे को साफ करने में 100 बिलियन, पौंड जैसी भारी-भरकम राशि खर्च होगी। इससे भी बड़ी बात यह कि इस काम को अंजाम तक पहुंचाने में 120 साल लगेंगे। वहां के विशेषज्ञों ने परमाणु कचरे को ठिकाने लगाने और इसकी सुरक्षा को लेकर भी चिंता व्यक्त की है।

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    Author: 
    महेश पांडे
    Source: 
    नेशनल दुनिया, 30 दिसंबर 2012
    उत्तराखंड का परंपरागत जल प्रबंधन मनुष्य की सामुदायिक क्षमता और आत्मनिर्भरता का बेहतरीन उदाहरण है। जल, अन्य प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग और प्रबंधन को और अधिक सरलीकृत करने हेतु इसमें ग्रामीणों के सहयोग लेने की और अधिक आवश्यकता आन पड़ी है। हिमालय की कठिन परिस्थितियों में यहां के निवासियों ने प्राकृतिक संसाधनों के दोहन की टिकऊ विधियां तो विकसित की लेकिन सरकारी हस्तक्षेप ने इन विधियों को इनसे दूर कर दिया।भारत के हिमालय क्षेत्र के गांवों में ही लगभग दो लाख घराट यानी पनचक्कियां मौजूद हैं। इसी तरह विश्वभर के पहाड़ी क्षेत्रों में बीस लाख पनचक्कियां तीसरी, चौथी सदी से लोगों की सेवा कर रही हैं। इन पनचक्कियों से गेहूं पिसाई एवं अन्य तरीके के काम लिए जाते रहे हैं। अब इन पनचक्कियों के जरिए पिसाई के अलावा ऊर्जा ज़रूरतों को भी पूरा करने का काम लिए जाने की तकनीक विकसित होने पर इनका महत्व बढ़ रहा है। इन घराटों को ग्रामीण क्षेत्र के कारखाने के रूप में भी इस्तेमाल किए जाने से कई जगह इनको समृद्धि का प्रतीक भी माना जाता है। इन घराटों में छिटपुट तकनीकी सुधार से ही इन मिलों की क्षमता में यहां काफी हद तक वृद्धि की सकती है वहीं इससे ऊर्जा उत्पादन एवं लेथ मशीन चलाने जैसे काम लिए जा सकते हैं।

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  • 01/07/13--02:47: जल चालीसा
  • Author: 
    रमेश गोयल
    जल मंदिर, जल देवता, जल पूजा जल ध्यान।
    जीवन का पर्याय जल, सभी सुखों की खान।।
    जल की महिमा क्या कहें, जाने सकल जहान।
    बूंद-बूंद बहुमूल्य है, दें पूरा सम्मान।।

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    हिंडन की देह


    कोई हिंडन का ख्याल रखे न रखे लेकिन हिंडन को अपने दायित्व का ख्याल हमेशा रहता है। इस पूरी यात्रा के दौरान हिंडन पांच हजार वर्ग किलोमीटर का विशाल खादर क्षेत्र रचती है। हिंडन का परमार्थ तो देखिए! वह यमुना में विलीन होते-होते भी हिंडन-यमुना संगम पर गांव अहा-चुहारपुर और गढ़ी समसपुर के शानदार खादर बनाना नहीं भूलती। ...और तो और हिंडन कट के नाम से एक नहर बनकर अपने ही खादर को सींचने भी खुद ही निकल पड़ती है।किसी जल प्रवाह को जानना, उसकी देह को जानने जैसा ही है। जिस देह के बारे में हम यहां लिख रहे हैं, उसे कभी किसी ने हरनेन्द्री कहा, तो कभी किसी ने हरिनन्दी... हरनन्दी यानी शिव का नन्दी। इसीलिए हरनन्दी को नदी नहीं, नद्य कहना उचित होगा। यदि नदी या नद्य के उद्गम को उसका चरण मानें, तो हरनन्दी के चरण वहां स्थित हैं, जहां कभी स्वर्ग धरती से मिलने आया करता था और धरती की संतानें परम पिता से मिलने सशरीर स्वर्ग जाया करते थे: हरिद्वार और सहारनपुर। एक शैव क्षेत्र का प्रवेश द्वार, तो दूसरा शिव के नंदी का आसन। ये ही क्षेत्र आज उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के संधि क्षेत्र हैं।इसी बीच काल ने करवट ली। नई पढ़ाई ने दस्तक दी। भारत... इंडिया हुआ और हरनन्दी... हिंडन। पहले नाम बदला और कालांतर में देह ही बदल गई। आइये जाने - हिंडन की देह: उद्गम से संगम तक। हिंडन उत्तर प्रदेश के पश्चिमी इलाके से निकलने वाली सबसे प्रमुख नद्य है।

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    Author: 
    सोपान जोशी
    Source: 
    गांधी मार्ग, जनवरी-फरवरी 2013

    युद्ध की हिंसा से तो जोसेफ बच गए पर अपनी अंतरआत्मा से नहीं। उन्हें ये मंजूर नहीं था कि उनकी कमाई से वसूले कर का इस्तेमाल अमेरिकी सरकार युद्ध के लिए करे। उन्होंने गरीबी में रहने का प्रण लिया ताकि उन्हें सरकार को कर चुकाना ही न पड़े।

    सिर पर स्लेट पत्थर की छत और पांव के नीचे अपने ही मल-मूत्र से बनी जमीन! जोसेफ जेंकिन्स का बस ही तो है संक्षिप्त परिचय। श्री जोसेफ ने पन्द्रह साल पहले एक पुस्तक लिखी थी ‘द स्लेट रूफ बाइबल’। 17 साल पहले लिखी थी ‘द ह्यूमन्योर हैंडबुक’। दोनों किताबों ने हजारों लोगों को प्रभावित किया है, प्रेरणा दी है। वे दूसरों को बताते नहीं हैं कि उनकी नीति क्या होनी चाहिए, उन्हें अपना जीवन कैसे जीना चाहिए। वे खुद ही वैसा जीवन जीते हैं और अपने जीवन की कथा सहज और सरल आवाज में बताते जाते हैं।

    जोसेफ जेंकिन्स की अहिंसक यात्रा एक युद्ध से ही शुरू हुई थी। उनके पिता अमेरिकी सेना में काम करते थे। दूसरे विश्व युद्ध के बाद वे जर्मनी में तैनात थे। वहीं श्री जोसेफ का जन्म सन् 1952 में हुआ था। सेना की नौकरी। हर कभी पिताजी का तबादला हो जाता। बालक जोसेफ हर साल-दो-साल में खुद को एक नए शहर में पाता, नए लोगों के बीच, नए संस्कारों में।

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    Author: 
    योगेश मिश्र और रतन दीक्षित
    Source: 
    नेशनल दुनिया, 06 जनवरी 2013

    इलाहाबाद में संगम पर आस्था का सैलाब उमड़ने को तैयार है। सरकार भी जी-जान से तैयारियों में जुटी है। दंडी स्वामियों के साधना-स्थल पर कार्य गतिशील है। अखाड़ों के विशालकाय प्रवेश-द्वार वाले बैनर टंग चुके हैं। बांस की सीमा-रेखा बनाकर, टिन से घेर कर तंबुओं की परिधि बनाने में संन्यासी जुटे दिखने लगे हैं। अखाड़ों की धर्मध्वजा ईशान कोण में फहरा रही हैं। कई प्रख्यात धर्माचार्यों के पंडाल और प्रवेश-द्वार चकाचौंध पैदा कर रहे हैं। लैपटॉप और मोबाइल लिए साधु अपने निर्माण कार्य की निगरानी करते तथा परंपरा और आधुनिकता की संस्कृति में रचे-बसे दिख रहे हैं। सारा वातावरण किसी विशाल यज्ञ की तैयारियों में जुटा जान पड़ता है।

    भारतीय जनमानस की अंतश्चेतना में आधुनिकता के मोहपाश के बावजूद धर्म और अध्यात्म के प्रति आस्था की जड़ें कितनी मजबूत हैं, इसका साक्षात्कार रेत पर बसे आस्था के शहर से गुजरते हुए आसानी से हो सकता है। कुंभ के लिए बसाए गए इस शहर में-
    ‘चंवर जमुन अरु गंग तरंगा।
    देखि होहिं दुख दारिद भंगा’।।


    की पवित्र भावना से लोक-परलोक सुधारने के लिए जुटे श्रद्धालुओं, संतों-महात्माओं, नागाओं और धर्मभीरुओं की आस्थाएं न डगमगाएं इसलिए सरकार ने भी खासी मेहनत-मशक्कत कर रखी है। लंबी तैयारी है। लेकिन स्नान से पहले इन तैयारियों की परीक्षा संभव नहीं है।

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  • 01/11/13--22:20: महाकुंभ
  • Source: 
    एनडीटीवी, 11 जनवरी 2013

    इलाहाबाद में गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम पर 14 जनवरी, मकर संक्रांति से दुनिया का सबसे बड़ा मेला होने को है, इसमें जमीन के हर जर्रे से 7 करोड़ लोग शामिल होंगे। यह मेला प्रति 12 वर्षों के अन्तराल पर आयोजित किया जाता है।
    इस खबर के स्रोत का लिंक: 

    http://khabar.ndtv.com

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    ए नये भारत के दिन बता!
    ए नदिया जी के कुंभ बता!
    उजरे-कारे सब मन बता!!
    क्या गंगदीप जलाना याद तुम्हें
    या कुंभ जगाना भूल गये ?
    या भूल गये कि कुंभ सिर्फ नहान नहीं,
    गंगा यूं ही है महान नहीं।
    नदी सभ्यतायें तो कई जनी,
    पर संस्कृति गंग ही परवान चढ़ी।

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    भारत का पांरपरिक ज्ञान भले ही कितना गहरा व व्यावहारिक हो, लेकिन सिर्फ पाप-पुण्य कहकर हम नवीन पीढ़ी को उसके अनुसार चलने को प्रेरित नहीं कर सकते। उसे तर्क की कसौटी पर खरा उतारकर दिखाना ही होगा; वरना् भारत का अद्भुत ज्ञान जरा से आलस्य के कारण पीछे छूट जायेगा। उस पर जमी धूल को पोछना ही होगा। कुंभ के असल मंतव्य को न समझाये जाने का ही परिणाम है कि आज कुंभ... नदी समृद्धि बढ़ाने वाला पर्व होने की बजाय, नदी में गंदगी बहाने वाला एक दिखावटी आयोजन मात्र बनकर रह गया है।दुनिया में पानी के बहुत से मेले लगते हैं, लेकिन कुंभ जैसा कोई नहीं। स्वीडन की स्टॉकहोम, ऑस्ट्रेलिया की ब्रिसबेन, अमेरिका की हडसन, कनाडा की ओटावा...जाने कितने ही नदी उत्सव साल-दर-साल आयोजित होते ही हैं, लेकिन कुंभ!.. कुंभ की बात ही कुछ और है। जाति, धर्म, अमीरी, गरीबी.. यहां तक कि राष्ट्र की सरहदें भी कुंभ में कोई मायने नहीं रखती। साधु-संत-समाज-देशी-विदेशी... इस आयोजन में आकर सभी जैसे खो जाते हैं। कुंभ में आकर ऐसा लगता ही नहीं कि हम भिन्न हैं। हालांकि पिछले 50 वर्षों में बहुत कुछ बदला है, बावजूद इसके यह सिलसिला बरस.. दो बरस नहीं, हजारों बरसों से बदस्तूर जारी है। छः बरस में अर्धकुंभ, 12 में कुंभ और 144 बरस में महाकुंभ! ये सभी मुझे आश्चर्यचकित भी करते हैं और मन में जिज्ञासा भी जगाते हैं।

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    Author: 
    योगेश मिश्र
    Source: 
    नेशनल दुनिया, 13 जनवरी 2012
    कुंभ महज प्रदेश का पर्व या राष्ट्रीय जमावड़ा नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय आकर्षण का सबब भी है। दुनिया भर की निगाह कुंभ में जुटे करोड़ों लोगों के साथ इस आयोजन के बंदोबस्त को लेकर की गई व्यवस्था पर भी होती है।

    प्रयागराज में महाकुंभ को लेकर साधु-संतों का आगमन बढ़ने लगा है। इसी क्रम में श्री शंभू पंचाग्नि अखाड़े की शोभायात्रा शाही अंदाज में निकाली गई। अखाड़ों की परंपरा से अलग हटकर पहली बार अग्नि अखाड़े ने अपने महामंडलेश्वरों की अलग से शोभायात्रा निकाली है। इस यात्रा को दर्जनों डीजे व हाथी-घोड़ों के साथ कड़ी सुरक्षा के बीच निकाला गया। शोभा यात्रा में शामिल महामंडलेश्वरों के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का जमावड़ा लगा रहा। यह शोभा यात्रा भारी सजावट के साथ हाथी, घोड़ों व चार पहिया वाहन को साथ लेकर हिंदी साहित्य सम्मेलन से निकली।को कहि सकहिं, प्रयाग प्रभाऊं...। इन दिनों उत्तर प्रदेश सरकार मानस की इन लाइनों को साकार करने में शिद्दत से जुटी है। इसकी वजह भी साफ है कि जब तक प्रयाग के प्रभाव का जिक्र नहीं होगा तब तक कुंभ की सफलता को लेकर पीठ नहीं थपथपाई जा सकेगी क्योंकि कुंभ महज प्रदेश का पर्व नहीं है, राष्ट्रीय जमावड़ा नहीं बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय आकर्षण का सबब है। दुनिया भर की निगाह कुंभ में जुटे करोड़ों लोगों के साथ ही साथ इस आयोजन के बंदोबस्त को लेकर की गई व्यवस्था पर भी होती है। एक तरफ जहां कुंभ देश के धार्मिक समागम की अभिव्यक्ति होता है, वहीं साधु-संतों, नागाओं-हठयोगियों की परंपरा का ऐसा वाहक होता है जो न केवल हमें विस्मित करता है बल्कि हमारी संपन्न धार्मिक विरासत से भी हमें रू-ब-रू कराता है। साधना और प्रार्थना के साधनों के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध भारत के हठयोगी कुंभ में श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बन बैठे हैं।

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    आज नोएडा, नोएडा एक्सटेंशन, ग्रेटर नोएडा के इलाकों में सैंकड़ों बिल्डर्स भूजल को मुफ्त का समझकर अंधाधुंध खींच रहे हैं। मुफ्त पानी से निर्माण की लागत घटती है, बिल्डर्स का मुनाफ़ा बढ़ता है; लेकिन मकान खरीदने वाले का कोई फायदा नहीं होता। उसे घाटा ही घाटा है। हम क्यों भूल जाते हैं कि इससे ग्रेटर नोएडा व नोएडा का भूजल उतरकर कई फीट और गहरे चला जाने वाला है। कल को यही इलाके पानी की कमी वाले इलाकों में तब्दील होने वाले हैं। बिल्डर्स तो इमारत बनाकर और मुनाफ़ा कमाकर चले जायेंगे, आगे चलकर इन बहुमंजिली इमारतों में रहने वालों को पानी कहां से मिलेगा?

    नोएडा और ग्रेटर नोएडा के सभी बिल्डर्स पर निर्माण या किसी अन्य उद्देश्य हेतु भूमिगत जल निकालने पर जारी स्थगनादेश जल संरक्षण की गुहार बनकर एक बार फिर सामने है। जी हां! तब तक यह गुहार ही रहेगी, जब तक इसकी अनुपालना सुनिश्चित नहीं हो जाती। यूं तो 11 जनवरी, 2013 को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने स्थगनादेश जारी कर दिया है। ट्रिब्यूनल के अगले निर्णय तक यह स्थगनादेश बरकरार भी रहेगा। इस स्थगनादेश की अनुपालना कराने की जिम्मेदारी भारत सरकार के केन्द्रीय भूजल प्राधिकरण की है। उसने नोएडा व ग्रेटर नोएडा के स्थानीय प्रशासन तथा विकास प्राधिकरणों को उक्त स्थगनादेश की पालना सुनिश्चित कराने का एक आदेश भेजने के अलावा अखबारों में एक सार्वजनिक सूचना भी जारी कर दी है। स्थगनादेश की पालना न करने वाले बिल्डर्स की बिजली आपूर्ति आदि बंद कर देने की कार्रवाई का अधिकार भी इस आदेश का हिस्सा है। लेकिन क्या कागज़ पर दर्ज इन आदेशों को जारी कर देने मात्र से इन इलाकों में चल रहे अंधाधुंध जलदोहन पर रोक लग जायेगी?

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    Author: 
    प्रतिभा आडवाणी
    Source: 
    यू-ट्युब, 20 सितंबर 2012

    पतित पावनी, गंगा मइया।
    जगत जननी तु गंगा मइया।।

    सुरसरि मां, गंगा मइया।
    जगत जननी तु गंगा मइया।।

    इस खबर के स्रोत का लिंक: 

    http://www.youtube.com

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    गाज़ियाबाद जिले में मोहन नगर के पास नदी भूमि का काफी हिस्सा पहले से ही भूमाफियाओं के चंगुल में है। इधर इसी में से होकर पहले गाज़ियाबाद-मेरठ बाइपास का निर्माण किया गया। उद्देश्य शहर की भीड़ से बचाने से ज्यादा वहां खेती की ज़मीन कब्ज़ा कर बन रहे बिल्डर्स निर्माण परिसरों को मार्ग मुहैया कराना तथा बाढ़ के खतरे से बचाना था। उसके बाद बाइपास को करहैड़ा गांव से जोड़ने के नाम पर एक भरवा पुल बनाकर हिंडन की बेशकीमती ज़मीन को सुखाने-कब्ज़ाने का खेल शुरू किया गया।पर्यावरण मंत्री रहते हुए जयराम रमेश ने जब नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के गठन के प्रस्ताव को आगे बढ़ाया था, तो इसका असल मकसद प्रदूषण नियंत्रण क़ानूनों व शिकायतों की परवाह न करने वाले खासकर उद्योग, म्युनिसपलिटी व व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को क़ानूनों का पालन करने को बाध्य करना था। मकसद था कि प्रदूषकों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराना आसान बने। बरसों लटके रहने वाले मुकदमों के स्थान पर तय समय सीमा के भीतर सजा सुनाई जा सके। पूरी प्रक्रिया को कम ख़र्चीला व पारदर्शी बनाया जा सके। यह सामान्य मान्यता है कि निजी क्षेत्र ही पर्यावरण विरोधी गतिविधियों में ज्यादा लिप्त है। वही सरकारी नियम-कायदों की धज्जी ज्यादा उड़ाता है। जबकि सच यह है कि यदि सरकारी अमला अपने नियुक्ति के वक्त ली गई शपथ और सौंपे गये दायित्व की पूर्ति ठीक से करे, तो न निजी क्षेत्र क़ानूनों की धज्ज्यिां उड़ाने की हिम्मत करे और न ही अदालतों को उन्हें बार-बार निर्देशित करने की जहमत उठानी ही न पड़े।

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    Author: 
    ਮੀਨਾਕਸ਼ੀ ਅਰੋੜਾ ਅਤੇ ਸਿਰਾਜ ਕੇਸਰ
    Source: 
    ਗਾਂਧੀ ਮਾਰਗ, ਜਨਵਰੀ-ਫ਼ਰਵਰੀ 2013
    ਦੇਵਾਸ ਦੇ ਪਿੰਡਾਂ ਦਾ ਹਾਲ ਪਾਣੀ ਦੇ ਮਾਮਲੇ ਵਿੱਚ, ਜਿਥੇ ਤਾਲਾਬ ਨਹੀਂ ਹਨ।ਦੇਵਾਸ ਦੇ ਪਿੰਡਾਂ ਦਾ ਹਾਲ ਪਾਣੀ ਦੇ ਮਾਮਲੇ ਵਿੱਚ, ਜਿਥੇ ਤਾਲਾਬ ਨਹੀਂ ਹਨ।ਮਾਂ ਚਾਮੁੰਡਾ ਅਤੇ ਮਾਂ ਤੁਲਜਾ ਦੇਵੀਆਂ ਦੇ ਵਾਸ ਦਾ ਸ਼ਹਿਰ ਹੈ ਦੇਵਾਸ। 17ਵੀਂ ਸਦੀ ਵਿਚ ਇਸ ਸ਼ਹਿਰ ਨੂੰ ਸ਼ਿਵਾਜੀ ਦੇ ਸੇਨਾਪਤੀ ਸਾਬੂ ਸਿੰਘ ਪੰਵਾਜ ਨੇ ਵਸਾਇਆ ਸੀ। ਚੰਦਬਰਦਾਈ ਦੁਆਰਾ ਲਿਖੀ ਗਈ 'ਪ੍ਰਿਥਵੀਰਾਜ ਰਾਸੋ'ਵਿੱਚ ਵੀ ਸ਼ਹਿਰ ਦਾ ਉਲੇਖ ਹੈ। ਉੱਜੈਨ ਤੋਂ ਵਾਪਿਸ ਦਿੱਲੀ ਆਉਂਦੇ ਸਮੇਂ ਇਥੇ ਪ੍ਰਿਥਵੀਰਾਜ ਨੇ ਆਪਣੀ ਸੈਨਾ ਦਾ ਪੜਾਅ ਪਾਇਆ ਸੀ। ਦੋ ਦੇਵੀਆਂ ਦੀ ਇਹ ਜਗ੍ਹਾ 15

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    Name_in_English: 
    Jayprabha Gram Vikas Mandal
    फोन न.-: 
    06184-221718, 9431839946
    संपर्क व्यक्ति: 
    Shivadhar Rai
    ईमेल: 
    shivadharrai@yahoo.com
    Fax: 
    06184-221718
    डाक पता/ Postal Address: 
    Jayprabha Gram Vikas Mandal Pream Chand Road, Gaurakshni, Sasaram District Rohtas Bihar PIN 821 115
    राज्य / State: 
    बिहार
    जिला / District: 
    रोहतास

    काम के मुद्दे


    Animal Husbandry, Dairying & Fisheries, Agriculture, Children, Civic Issues, Disaster Management, Dalit Upliftment, Drinking Water, Education & Literacy, Food Processing, Health & Family Welfare, HIV/AIDS, Human Rights, Legal Awareness & Aid, Labour & Employment, Micro Finance (SHGs), Minority Issues, Micro Small & Medium Enterprises, Nutrition, Panchayati Raj, Right to Information & Advocacy, Rural Development & Poverty Alleviation, Tribal Affairs, Vocational Training, Water Resources, Women's Development & Empowerment

    तालुका / शहर: 
    रोहतास

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  • 01/21/13--05:16: जागो जन जन
  • Name_in_English: 
    JAGO JAN JAN
    वेब साइट/ ब्लॉग: 
    .
    फोन न.-: 
    9304-266915, 09431837095
    संपर्क व्यक्ति: 
    MANOJ KUMAR
    ईमेल: 
    jagojanjan@mail.com
    Fax: 
    .
    डाक पता/ Postal Address: 
    Ward No. –10, Chakbandi Road, Near Dr. Mangla Sinha, P.O. : Bhabua, Distt. : Kaimur, Pin : 821101 (Bihar)
    राज्य / State: 
    बिहार
    जिला / District: 
    कैमूर

    काम के मुद्दे


    Animal Husbandry, Dairying & Fisheries, Aged/Elderly, Agriculture, Art & Culture, Biotechnology, Children, Civic Issues, Differently Abled, Disaster Management, Dalit Upliftment, Drinking Water, Education & Literacy, Environment & Forests, Food Processing, Health & Family Welfare, HIV/AIDS, Housing, Human Rights, Information & Communication Technology, Legal Awareness & Aid, Labour & Employment, Land Resources, Micro Finance (SHGs), Minority Issues, Micro Small & Medium Enterprises

    तालुका / शहर: 
    कैमूर

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    Author: 
    सुनीता नारायण और एसवी सुरेश बाबू
    Source: 
    दैनिक देशबंधु, रायपुर, जून 26, 2005, सुनीता नारायण की पुस्तक 'पर्यावरण की राजनीति' से साभार
    यमुना के तट पर बसे दिल्ली शहर ने यमुना को अपने कचरे से एक काले गंदे नाले में बदल दिया है। यमुना की वर्तमान सफाई-रणनीति तो धराशायी हो चुकी है; आज इस नदी में पहले की अपेक्षा कहीं ज्यादा गंदगी है। समय आ गया है कि इसकी अंतहीन दुर्दशा की रोना रोने के बजाय हम एक ऐसी कार्यनीति की रचना करें जो यमुना को साफ करवाने में कारगर सिद्ध हो।

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