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    हिमालय का अनुपम व्याख्यान

    RuralWaterTue, 12/26/2017 - 12:09

    प्रथम अनुपम व्याख्यानप्रथम अनुपम व्याख्यानश्री अनुपम मिश्र जी कागज से लेकर जमीन तक पानी की अनुपम इबारतें लिखने वाली शख्सियत थे। उनकी देह के पंचतत्वों में विलीन जाने की तिथि होने के कारण 19 दिसम्बर हम सभी पानी कार्यकर्ताओं तथा लेखकों के लिये खास स्मरण की तिथि है। किन्तु अनुपम सम्बन्ध में 22 दिसम्बर का भी कोई महत्त्व है; यह मुझे ज्ञात न था। मैं, श्री अनुपम मिश्र के जन्म की तिथि भी पाँच जून को ही जानता था। बाद में पता चला कि पाँच जून तो सिर्फ स्कूल में लिखा दी गई तिथि थी।

    श्री अनुपम मिश्र का जन्म असल में 22 दिसम्बर, 1947 को वर्धा के महिला आश्रम में हुआ था। गाँधी स्मृति एवं दर्शन समिति, नई दिल्ली ने बीते 22 दिसम्बर, 2017 दिन शुक्रवार को ‘अनुपम व्याख्यान’ का प्रथम आयोजन कर यह ज्ञान कराया। सोने पर सुहागा यह कि प्रथम अनुपम व्याख्यान का एकल वक्ता खुद हिमालय को बनाया। विषय रखा - ''हिमालय- बदलते हालात में हमारी संवेदना की कसौटी''।हिमालय का प्रतिनिधि बन पधारे श्री चंडीप्रसाद भट्ट जी।

    सब ओर अनुपम छाप


    स्थान-गाँधी स्मृति एवं दर्शन समिति के राजघाट परिसर का सत्याग्रह मण्डप। व्याख्यान का समय पहले से तय था और चाय-पकौड़ों पर मुलाकातों का भी। मैं पाँच बजने से दो मिनट पहले ही पहुँच गया। मेज पर गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान द्वारा प्रकाशित 'गांधी मार्ग' के अनुपम विशेषांक की प्रतियाँ सजी थीं। ‘गांधी मार्ग’ श्री अनुपम मिश्र के सम्पादन का अनुपम नमूना है।

    'गाँधी मार्ग' पत्रिका के प्रबन्धक श्री मनोज झा ने मण्डप के द्वार पर ही हाथ थाम लिये। पंजीकरण पत्र पर सम्पर्क विवरण भरा। मण्डप के भीतर गया, तो दूर खड़े बसंत जी ने आगे बढ़कर इतनी गर्मजोशी से स्वागत किया कि अपने हर कार्यक्रम में प्रवेश द्वार पर हाथ जोड़कर हर आते-जाते का विनम्र स्वागत करते श्री अनुपम मिश्र याद आ गए।

    मंच पर निगाह गई। एक छोर से दूसरे छोर तक अनुपम-ही-अनुपम।

    ''सैकड़ों, हजारों, तालाब अचानक शून्य से प्रकट नहीं हुए थे।
    इनके पीछे एक इकाई थी बनवाने वालों की, तो दहाई थी बनाने वालों की।
    यह इकाई, दहाई मिलकर सैकड़ा, हजार बनाती थी।
    पिछले दो सौ बरसों में नए किस्म की थोड़ी सी पढ़ाई पढ़ गए समाज ने इस इकाई, दहाई, सैकड़ा, हजार को शून्य ही बना दिया।''


    बाईं ओर अनुपम जी की भाषा, भाव और लोकज्ञान की खास पहचान बने ये शब्द, तो दाईं ओर 'आज भी खरे हैं तालाब' केे कवर पर छपी सीता बावड़ी। बीच में श्री अनुपम मिश्र का एक विशाल चित्र। चित्र में आँखें कुछ पनीली, किन्तु इतनी जीवन्त, जैसे अभी झपक उठेंगी। एक चित्र पोडियम पर। अनुपम हाथों में कलम की जगह छतरी; मानो बारिश से दोस्ती करने निकले हों। अभी गिनती के बीस लोग ही दिख रहे थे; फिर भी आशंका का कोई कारण नहीं था। छह बजते-बजते मण्डप विशाल अनुपम परिवार से भर गया। इस परिवार में दक्षिणपंथी भी थे और ठेठ वामपंथी भी। गाँधी विचार के चाहने वाले तो खैर थे ही।... सभी के जुटते ही गूँज उठी श्री अनुपम मिश्र के पुत्र शुभम की बाँसुरी। धुन पर बोल थे: 'वैष्णव जन तो तेने कहिए' और 'रघुपति राघव राजाराम..।'

    हर वर्ष आयोजित होगा अनुपम व्याख्यान


    क्रम आगे बढ़ा। गाँधी स्मृति एवं दर्शन समिति के निदेशक श्री ज्ञान ने आयोजन की पृष्ठभूमि रखी। ‘अनुपम व्याख्यान’ को हर वर्ष आयोजित करते रहने इरादा जताया और भविष्य में इस मौके पर पानी पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं और लेखकों को सम्मानित करने के विचार पर सहमति ली।

    अपने-अपने गाँधी की तलाश जरूरी


    भाषा के धनी श्री सोपान जोशी मंच पर आये; अपने खास अन्दाज में विषय और वक्ता का परिचय रखा। वर्ष 1972 में दिल्ली की गाँधी निधि में श्री चण्डीप्रसाद भट्ट जी और अनुपम की हुई प्रथम मुलाकात का किस्सा सुनाया। चिपको आन्दोलन में अनुपम उपस्थिति का एक तरह से उद्देश्य बताते हुए उन्होंने अनुपम जी के एक खास कथन का जिक्र किया।

    ''सिर्फ गाँधी जी का नाम जपने से काम नहीं चलेगा।
    हमें अपने-अपने गाँव.. मोहल्ले में अपने-अपने गाँधी तलाशने पड़ेंगे।''


    अनुपम के अपने गाँधी


    फिर वह क्षण आया, जब मंच पर पधारे श्री अनुपम मिश्र के तलाशे हुए अपने गाँधी - श्री चण्डीप्रसाद भट्ट। हिमालय सा ऊँचा कद। बदन पर बकरी के ऊन का बना भूरे रंग का लम्बा कोट और गर्म पायजामा। ज्ञान बूझें तो एकदम जमीनी। कद देखें तो हिमालय जैसा। यश पूछें तो चिपको आन्दोलन से उपजी जनचेतना सरीखा सतत सक्रिय और विद्यमान। व्यवहार इतना सरल व ग्राह्य, जितना अनुपम साहित्य। बोले तो विनम्रता ऐसी कि भट्ट जी ने अनुपम जी को पुष्प और स्वयं को पुष्प में बसा ऐसा कीड़ा बताया, जिसे पुष्प के साथ-साथ अनजाने में सम्मान मिल जाता है। हिमालय की चुनौतियों को सामने रखा, तो पहाड़ के प्रति उन गाँववासियों की संवेदना व समझ का गहरा परिचय दे गए, नई पढ़ाई गए अनेक लोग जिसकी उपेक्षा करने में आज भी नहीं चूकते। हालांकि उपस्थित जन ने ऐसा नहीं किया। उपस्थित जन ने भट्ट जी के आगमन पर खड़े होकर इस संवेदना व समझ के प्रति अपना सम्मान प्रस्तुत किया।

    लोक की हिमालयी संवेदना


    श्री भट्ट ने कहा - ''गाँव के लोग वन और पानी के रिश्ते को जानते हैं। खेती-बाड़ी में नमी का महत्त्व जानते थे। जानते थे कि जंगल बढ़ाए बगैर पानी का इन्तजाम नहीं हो सकता। पहाड़ में सितम्बर से पहले पुष्प तोड़ना मना था। कहते थे कि वनदेवी तुम्हें हर लेगी। इस तरह पेड़ का हर अंग बचाते थे। बुग्याल और चौड़े पत्ते के पेड़ - ये दोनों ही जल भण्डारण का काम करते हैं। किन्तु आज पहाड़ पर कई तरह के दबाव हैं। भौतिक दबाव, बाजार का दबाव। जैसे कीड़ाजड़ी का बाजार इतना बढ़ गया है कि क्या बताए।”

    परम्परागत स्थापत्य कला की अनदेखी नुकसानदेह


    ''पहाड़ में 1950, 1987, 1990 में भी भूकम्प आये। लेकिन मौतें इतनी नहीं हुई। क्यों? क्योंकि लोग परम्परागत तरीके से लकड़ी के मकान बनाते थे। रैथाल गाँव में 400 साल पुराने मकान है। लोगों की स्थापत्य कला ने उनका जीवन बचाया। अब पहाड़ में भी पक्के मकान बन रहे हैं। कहते हैं कि बद्रीनाथ मन्दिर को कुछ नहीं हुआ। बनाने वालों ने उसका स्थान ऐसा चुना। देखें तो उन्होंने नारायण पर्वत के ठीक नीचे मन्दिर बनाया। अब नदी किनारे उससे सटकर घर बन रहे हैं। तथाकथित विकास के नाम पर पहाड़ तोड़े जा रहे हैं। हिमाद्रि क्षेत्र में परियोजनाएँ चल रही हैं। क्रेसर जा रहे हैं। 2013 में आपदा सिर्फ केदारनाथ मन्दिर क्षेत्र में नहीं आई। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखण्ड के चार-चार जिले दुष्प्रभावित हुए। इस क्षति में मानवीय हस्तक्षेप कितना था; सोचना चाहिए। आज उत्तराखण्ड चारधाम में 20 हजार व्यक्ति प्रतिदिन आ रहे हैं। लोगों को सावधान किया जाना चाहिए।''

    हिमालयी देशों का संयुक्त प्राकृतिक मोर्चा बने


    श्री चण्डीप्रसाद भट्ट जी ने चेताया कि लोगों को नहीं भूलना चाहिए कि भारत की आठ प्रमुख नदी घाटियों में गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु नदी का भू-भाग काफी विशाल है। अकेले गंगा का भू-भाग ही कुल भू-भाग का 26 प्रतिशत है। अतः हिमालय मेें जो कुछ होगा, उसका असर भारत भर में होगा। नेपाल में कुछ होगा, तो कोसी में उसका असर दिखेगा। कोसी के रूट बदलने की बात आपको याद होगी।.... जब आपदा आ जाती है, तब हम राहत लेकर जाते हैं। हम पहले ही चेत जाएँ, तो बेहतर होगा। जब आपदा आती है, तो हम अध्ययन करते हैं, जबकि जो अध्ययन पहले हो चुके, उन्हें साइड में रख देते हैं। लोगों को बुग्यालों, तालों, झीलों आदि के बारे में विज्ञान सम्मत जानकारी दी जानी चाहिए। भारत, चीन, नेपाल और भूटान को मिलाकर हिमालय हेतु संयुक्त प्राकृतिक मोर्चा बनना चाहिए।

    चिपको को आवाज देने में महिलाएँ थीं आगे


    श्री भट्ट ने चिपको आन्दोलन का भी स्मरण किया। वह बोले - ''मुझे याद है। अंग्रेज विल्सन ने जंगल खरीद लिया था। विल्सन ने ही हरसिल में लकड़ी के लट्ठों को नदी के जरिए ट्रांसपोर्ट करना शुरू किया था। फिर यह सिलसिला अन्य जगह भी बढ़ा।......20 जुलाई, 1970 को अलकनंदा में बाढ़ आ गई। हमने देखा कि जहाँ-जहाँ पेड़ काटे गए। वहाँ ज्यादा भू-स्खलन हुआ। वहीं से सिल्ट ज्यादा आई और नदी बौखला गई। परिणामस्वरूप कई गाँव, पुल और सड़कें बह गईं। जनवरी, 1974 में प्रशासन ने रैणी गाँव के निकट क्षेत्र के 2500 पेड़ों का ठेका दे दिया। रैणी गाँव से शुरू संघर्ष की कथा आप सब जानते हैं।....शिविर लगा, तो अनुपम भी उसमें आये। वन जागे, वनवासी जागे। अलकनंदा में बाढ़ नहीं आने देना चाहते हैं। शिविर में नौजवानों को ऐसे स्पष्ट सन्देश देने की कोशिश की गई। एक ओर सत्याग्रह चला, तो दूसरी ओर पहाड़ों को हरा-भरा करने का काम किया। बोलने का हक मुख्य रूप से महिलाओं को दिया.. क्योंकि पहाड़ में महिलाएँ ही मुख्य काम देखती हैं; घर-बाहर सब जगह। अनुपम जी अपने लिये वह काम चुनते थे, जो सबसे कठिन हो। यूँ बड़े, दीवार बनाते थे और बच्चे, पेड़ लगाते थे।''

    अनुपम, चिपको की प्रसार शक्ति थे


    श्री भट्ट जी ने अपनी प्रस्तुति में अनुपम जी के पुत्र शुभम की पेड़ लगाते हुए तस्वीर भी दिखाई। उन्होंने बताया कि मसले को लेकर वह उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री कमलापति त्रिपाठी के पास गए, तो उनके साथ क्या अपमानजनक व्यवहार हुआ। लखनऊ से दिल्ली लौटे, तो कैसे गाँधी निधि में अनुपम जी से मुलाकात और चर्चा हुई। उन दिनों श्री रघुवीर सहाय, दिनमान पत्रिका के सम्पादक थे। अनुपम से भट्ट जी को श्री सहाय से मिलवाया और अपनी व्यथा रखने को कहा। इस मुलाकात का लाभ यह हुआ कि दिनमान में हिमालय की चिन्ता पर एक पूरा विशेषांक निकला। चिन्ता ज्यादा लोगों तक पहुँची। बकौल श्री भट्ट जी, विशेषांक का सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि उनके लोगों को भरोसा हुआ कि वह यदि आगे कोई आन्दोलन करेंगे, तो आवाज दबेगी नहीं।

    चिपको-अनुपम सम्बन्ध के नजदीकी साझेदार रहे पत्रकार बनवारी जी ने अपने धन्यवाद ज्ञापन में इस भरोसे की तस्वीर को और साफ किया। व्याख्यान के समापन पर लोगों ने फिर एक बार खड़े होकर हिमालयी संवेदना के प्रति अपने सम्मान का इजहार किया। समापन में भोजन था; अनुपम जी की तरह ही सादा। पूड़ी, एक सब्जी, खीर और लड्डू। इस तरह सम्पन्न हुआ गाँधी स्मृति एवं दर्शन समिति द्वारा नियोजित 'प्रथम अनुपम व्याख्यान' का आयोजन; कुछ चेताता हुआ; कुछ चुनौती देता हुआ - ''अनुपम तो गए। अब हम उन्हें अनुपम बनाने वाली संवेदनाओं और मूल्यों को संजो सकें, तो समझें कि हम पर कुछ छाप अनुपम है।''

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    तीन साल तक शोध कर निकालेंगे आर्सेनिक का तोड़

    RuralWaterSun, 12/31/2017 - 11:59

    आर्सेनिकग्रस्त मरीजआर्सेनिकग्रस्त मरीजगंगा नदी घाटी में आर्सेनिक की मौजूदगी और भविष्य में इसकी क्या स्थिति रहेगी, इसको लेकर व्यापक स्तर पर शोध होने जा रहा है।

    इस शोध कार्य में भारत के चार संस्थानों के साथ ही यूके की भी चार संस्थाएँ हिस्सा लेंगी।शोध कार्य की फंडिंग यूके की संस्था नेचुरल एनवायरनमेंट रिसर्च काउंसिल (एनईआरसी) और केन्द्रीय विज्ञान व तकनीकी मंत्रालय करेंगे। इस प्रोजेक्ट पर करीब 8 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान लगाया गया है। केन्द्र सरकार 4 करोड़ रुपए उपलब्ध कराएगी और बाकी चार करोड़ रुपए नेचुरल एनवायरनमेंट रिसर्च काउंसिल की ओर से दिये जाएँगे।

    भारत के महावीर कैंसर संस्थान व रिसर्च सेंटर, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी, आईआईटी खड़गपुर आईआईटी रुड़की तथा यूके की मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी, सैलफोर्ड यूनिवर्सिटी, बर्मिंघम यूनिवर्सिटी और ब्रिटिश जियोलॉजिकल सोसाइटी यह शोध करेंगे।

    गंगा नदी घाटी में आर्सेनिक को लेकर यह शोध अब तक का सबसे वृहत्तर शोध माना जा रहा है क्योंकि इसमें देश के पाँच राज्यों को शामिल किया गया है। सभी संस्थानों को शोध के लिये अलग-अलग राज्यों की जिम्मेदारी दी गई है। महावीर कैंसर संस्थान बिहार और झारखण्ड के साहेबगंज को लेकर शोध करेगा। आईआईटी खड़गपुर पश्चिम बंगाल को लेकर, आईआईटी रुड़की व आईआईटी खड़गपुर उत्तर प्रदेश और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी उत्तराखण्ड को लेकर शोध करेंगे। यूकी की संस्थाएँ इन संस्थानों के साथ मिलकर काम करेंगी।

    शोध तीन वर्षों का होगा और अगर जरूरत पड़ी, तो इसमें एक साल का इजाफा किया जा सकता है।

    गौरतलब है कि आईआईटी खड़गपुर और महावीर कैंसर संस्थान आर्सेनिक को लेकर लम्बे समय से काम कर रहे हैं। इन संस्थानों की ओर से आर्सेनिक को लेकर अब तक कई शोध किये जा चुके हैं।

    यूपी के बलिया में आर्सेनिक से हाथ में आये जख्म दिखाता एक युवकजनवरी के आखिर में शुरू हो रहे इस शोध में मुख्य रूप से तीन बिन्दुओं पर फोकस रहेगा। इस सम्बन्ध में महावीर कैंसर संस्थान व रिसर्च सेंटर के रिसर्च विभाग के प्रमुख अशोक घोष बताते हैं, ‘शोध में तीन चीजों पर ध्यान दिया जाएगा। अव्वल तो यह पता लगाया जाएगा कि गंगा के मैदानी क्षेत्रों के एक्वीफर में आर्सेनिक की मौजूदगी कैसी है। यानी पहले हम यह देखेंगे कि एक्वीफर में कितना आर्सेनिक है। इसके बाद हम यह पता लगाएँगे कि आने वाले 25 से 30 सालों में एक्वीफर में आर्सेनिक की क्या स्थिति रहेगी और पानी के इस्तेमाल के लिये कौन-सा एक्वीफर सुरक्षित रहेगा। तीसरे हिस्से में हम इस पर शोध करेंगे कि आर्सेनिक की रोकथाम के लिये किस तरह के एहतियाती कदम उठाए जाने चाहिए।’

    घोष बताते हैं, ‘असल में तीसरे हिस्से में हम यह पता लगाएँगे कि भूजल का प्रबन्धन किस तरह किया जाना चाहिए और इससे जुड़े साझेदारों की क्या भूमिका होनी चाहिए ताकि आर्सेनिक के खतरे से निबटा जा सके। शोध के आधार पर हम मशविरे भी देंगे। कुल मिलाकर शोध का आधार एक्वीफर में आर्सेनिक की मौजूदगी, इसके खतरे और इससे बचने की रणनीति होगा।’

    उल्लेखनीय है कि इस शोध के लिये नेचुरल एनवायरनमेंट रिसर्च काउंसिल ने सार्वजनिक अधिसूचना जारी की थी। इस अधिसूचना पर देश व विदेश की 116 संस्थानों ने शोध कार्य करने की इच्छा जताते हुए आवेदन दिया था। इन आवेदनों का गहनता से अध्ययन करने के बाद 20 संस्थानों का चयन किया गया। सभी संस्थानों की तरफ से प्रेजेंटेशन दिया गया और इसी के आधार पर 8 संस्थानों का चुनाव किया गया।

    अशोक घोष कहते हैं, ‘आर्सेनिक को लेकर हमने कई शोध किये हैं, इसलिये हम प्रजेंटेशन देकर अपनी बात बखूबी रख पाये कि शोध की रूपरेखा क्या होनी चाहिए, जिस कारण हमारे संस्थान को शोध के लिये चुन लिया गया।’

    यहाँ यह भी बता दें कि गंगा नदी के मैदानी क्षेत्रों के एक्वीफर में प्राकृतिक तौर पर आर्सेनिक मौजूद है। जब भारी मात्रा में भूजल का दोहन किया जाता है और भूजल को रिचार्ज नहीं किया जाता, तो एक्वीफर में मौजूद आर्सेनिक पानी के साथ बाहर निकलने लगता है।

    भारत में जल प्रबन्धन पर बहुत खास ध्यान नहीं दिया जाता है और चूँकि यहाँ की आबादी बहुत अधिक है, तो पानी की खपत भी ज्यादा होती है। इस वजह से भूजल का खूब दोहन किया जाता है। लेकिन, उसके रिचार्ज की कोई ठोस व्यवस्था नहीं है। आम लोगों में इसको लेकर जागरुकता का घोर अभाव है और सरकार की तरफ से पर्याप्त प्रयास भी नहीं किये जा रहे हैं। इस वजह से यहाँ आर्सेनिक का खतरा दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा है।

    आर्सेनिक से ग्रस्त बिहार का एक व्यक्तिजिन राज्यों को लेकर शोध होने जा रहा है, उन राज्यों में लाखों लोग आर्सेनिक की चपेट में हैं। बिहार की बात करें, तो यहाँ के करीब 16 जिलों के भूजल में आर्सेनिक है। इंटरनेशनल जर्नल ऑफ प्रीवेंटिव मेडिसिन में पिछले साल छपे एक शोध पत्र ‘ग्राउंड वाटर आर्सेनिक कॉन्टामिनेशन : ए लोकल सर्वे इन इण्डिया’ में गंगा के मैदानी क्षेत्र में स्थित बिहार के बक्सर जिले के सिमरी गाँव में पानी में आर्सेनिक को लेकर गहन शोध किया गया था। इसमें गाँव से पानी के 322 नमूने इकट्ठा किये गए थे। इन नमूनों की जाँच की गई तो पाया गया कि उक्त गाँव के हैण्डपम्प से निकलने वाले पानी में आर्सेनिक की मात्रा सामान्य से अधिक थी।

    इसी तरह पश्चिम बंगाल, झारखण्ड का साहेबगंज, उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड भी आर्सेनिक से बुरी तरह ग्रस्त है।

    आर्सेनिक युक्त पेयजल के सेवन से फेफड़े, किडनी व ब्लाडर में कैंसर हो सकता है। इससे चर्मरोग हो जाता है और बदहजमी तथा ब्लड सर्कुलेशन भी बुरी तरह प्रभावित होता है।

    आर्सेनिक पर काम करने वाले विशेषज्ञों की मानें, तो आर्सेनिक एक जानलेवा तत्व है। अगर लगातार आर्सेनिक युक्त पानी का सेवन किया जाये, तो लोगों को कैंसर हो सकता है और जान भी जा सकती है। डॉक्टरों के अनुसार आर्सेनिक की शिनाख्त होने पर मरीज को सबसे पहले साफ पानी उपलब्ध कराया जाना चाहिए और उसे आर्सेनिक से बचाव के लिये दवाइयाँ दी जानी चाहिए। इसके साथ नियमित तौर पर मरीज की जाँच भी जरूरी है।

    पश्चिम बंगाल के जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग की वेबसाइट के अनुसार पश्चिम बंगाल के कुल 9 जिलों के 79 ब्लॉकों में रहने वाले लगभग 1 करोड़ 66 लाख 54 हजार लोग आर्सेनिक के शिकंजे में हैं। यहाँ आर्सेनिक की शिनाख्त 3 दशक पहले वर्ष 1983 में ही कर ली गई थी। पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के गायघाटा व अन्य आर्सेनिक प्रभावित जिलों में आर्सेनिक के कारण कई लोगों की मौत भी हो चुकी है।

    आईआईटी खड़गपुर की टीम को संस्थान के जियोलॉजी व जियोफिजिक्स विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर (हाइड्रोलॉजी) अभिजीत मुखर्जी लीड करेंगे। उन्होंने कहा कि शोध में ग्राउंड वाटर में केवल आर्सेनिक ही नहीं, दूसरे तरह के हानिकारक तत्वों की मौजूदगी की भी पड़ताल करनी है।

    इस शोध के कुछ बिन्दुओं पर पहले कभी उस स्तर पर शोध नहीं किया गया, जिस स्तर पर होना चाहिए था, इसलिये यह अब तक हुए शोधों से ज्यादा फायदेमन्द होगा।

    अपनी बाँह दिखाते मनोतोषप्रो. मुखर्जी कहते हैं, ‘आर्सेनिक को लेकर पहले भी शोध किये जा चुके हैं, लेकिन जिन बिन्दुओं को लेकर हम शोध करने जा रहे हैं, उन पर बहुत कम काम हुआ है।’

    बताया जा रहा है कि जिन राज्यों में शोध किया जाना है, उन राज्यों के उस हिस्से को शामिल किया जाएगा, जो गंगा के मैदानी इलाके में पड़ता है। जैसे कि उत्तर प्रदेश के वाराणसी को शोध के लिए चुना गया है।

    पश्चिम बंगाल के किस क्षेत्र में शोध होगा, इसका चयन अभी नहीं हुआ है। प्रो मुखर्जी ने कहा कि वह पश्चिम बंगाल सरकार के साथ विमर्श कर स्थान का चुनाव करेंगे। लेकिन, सम्भवतः नदिया में शोध किया जा सकता है।

    नदिया पश्चिम बंगाल का सबसे ज्यादा प्रभावित जिला है। 2014 में हुए एक शोध के अनुसार नदिया के सभी 17 ब्लॉक आर्सेनिक की जद में हैं। यहाँ के भूजल में आर्सेनिक की मात्रा सामान्य से कई गुना अधिक है।

    इसी तरह उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड भी आर्सेनिक के शिकंजे में है। बताया जाता है कि उत्तर प्रदेश के करीब 30 जिलों के भूजल में आर्सेनिक है। उत्तराखण्ड के भी कुछ क्षेत्रों के ग्राउंड वाटर में आर्सेनिक देखने को मिल रहा है।

    उल्लेखनीय है कि वर्ष 2015 में सचिवों की एक कमेटी ने आर्सेनिक पर गहन छानबीन कर एक रिपोर्ट सरकार को दी थी। इस रिपोर्ट में कहा गया था कि आर्सेनिक के कारण अब तक 1 लाख लोगों की मौत हो चुकी है।कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में यह भी कहा था कि करीब 7 करोड़ लोगों आर्सेनिक से प्रभावित हैं। इनमें से 3 लाख लोग ऐसे हैं जिन्हें आर्सेनिक ने अपनी जद में ले लिया है। रिपोर्ट में बताया गया था कि आर्सेनिक से निबटने के लिये 9700 करोड़ रुपए की जरूरत है।

    रिपोर्ट में बताया गया था कि देश के 640 जिलों में से 96 जिलों के पानी में आर्सेनिक की मात्रा सामान्य से पाँच गुना अधिक है।

    टाइम्स ऑफ इण्डिया की एक रिपोर्ट के अनुसार हाल ही में लोकसभा में एक सवाल के जवाब में केन्द्र सरकार ने बताया कि भारत की 19 प्रतिशत आबादी आर्सेनिक युक्त पानी पी रही है। केन्द्र सरकार के आँकड़ों का जोड़-घटाव करने पर पाया गया कि आर्सेनिक से ग्रस्त सबसे अधिक लोग उत्तर प्रदेश में हैं। इस मामले में दूसरे स्थान पर बिहार, तीसरे स्थान पर पश्चिम बंगाल, चौथे स्थान पर असम, पाँचवें स्थान पर पंजाब और छठे स्थान पर मध्य प्रदेश है।

    आर्सेनिक से हुए घाव को दिखाते पीड़ित अधीन प्रमाणिकइन राज्यों के अलावा गुजरात, हरियाणा, आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडु, झारखण्ड, कर्नाटक, जम्मू-कश्मीर, छत्तीसगढ़, दिल्ली, ओड़िशा, मणिपुर, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश में भी पेयजल में आर्सेनिक है।

    कुल मिलाकर देखा जाये, तो भारत का एक बड़ा भू-भाग आर्सेनिक की चपेट में है।

    सम्प्रति भारत में पानी में आर्सेनिक व अन्य खतरनाक तत्वों की मौजूदगी के जो आँकड़े सामने हैं, उसके मद्देनजर इस पर वृहत्तर शोध कार्य करने की जरूरत लम्बे समय से महसूस की जा रही थी, जो न केवल आर्सेनिक की मौजूदा स्थिति का पता लगाए बल्कि यह भी बताए कि आने वाले समय में इसकी विकरालता किस मुकाम पर पहुँचेगी और इससे बचने के सम्भावित उपाय क्या-क्या हो सकते हैं।

    विशेषज्ञों को उम्मीद है कि यह शोध आर्सेनिक के मुद्दे से निबटने में काफी कारगर साबित होगा। यही नहीं, स्वच्छ पानी उपलब्ध कराने की दिशा में भी यह शोध मील का पत्थर साबित हो सकता है।


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    बिहार - बाढ़ को बहने का रास्ता भर चाहिएRuralWaterTue, 01/02/2018 - 14:24


    चम्पारण के बीचोंबीच स्थित मोती झील, मनों की शृंखला का एक हिस्सा जो बाढ़ के दिनों में पानी के जलग्रहण का काम करती हैचम्पारण के बीचोंबीच स्थित मोती झील, मनों की शृंखला का एक हिस्सा जो बाढ़ के दिनों में पानी के जलग्रहण का काम करती हैहिमालय की तलहटी में बसा तराई और गंगा के बीच का मैदानी भाग सभ्यता के शुरुआत से ही अपनी कृषि उत्पादकता के लिये मशहूर रहा है। यहाँ नियमित रूप से आने वाली सालाना बाढ़ इसका आधार रही है। इन इलाकों के लिये नदियाँ और बाढ़ कोई नया नहीं है, बल्कि हरेक साल हिमालय से पानी का रेला थोड़े समय के लिये पूरे मैदानी क्षेत्रों में फैलता रहा है।

    पहले बाढ़ आती थी और दो चार दिनों में चली भी जाती थी और इतना कुछ छोड़ जाती थी कि अगले साल भर का काम चल जाता था। लेकिन अब सब कुछ बदला-बदला सा है बाढ़ का मतलब अब राहत, बचाव और नुकसान तक सिमट के रह गया है। समय बदला, आजादी मिली, तकनीक का प्रभाव बढ़ा पर ये क्या समय के साथ बाढ़ की तबाही का दौर जारी है।

    सरकारी आँकड़ों की माने तो आजादी के बाद से हजारों-करोड़ों बाढ़ के तकनीकी प्रबन्धन पर खर्च कर देने के बावजूद राज्य में बाढ़ सम्भावित इलाकों का दायरा कम होने के बजाय भयानक रूप से बढ़ा है। आज पूरे बिहार राज्य का 73% हिस्सा बाढ़ प्रभावित क्षेत्र है। पूरे भारत के स्तर पर ये आँकड़ा कुल प्रभावित क्षेत्र का छठवाँ है।

    इस साल के बाढ़ की विभीषिका का आलम ये है कि बिहार में ही बीस जिलों के लगभग सवा करोड़ लोग प्रभावित हैं। दरअसल सालाना बाढ़ की भयावहता के लिये हम खुद ही जिम्मेदार हैं, ये हमारी नदी और उससे जुड़े समूचे पारिस्थितिकी तंत्र को लेकर नासमझी का एक बेहतरीन नमूना है।

    पूरे बिहार में लगभग 600 छोटी-बड़ी जलधाराएँ और अकेले चम्पारण में लगभग दर्जन भर मुख्य धाराएँ नेपाल से नीचे मैदानी इलाकों की तरफ मिलती हैं। बरसात के दिनों में तो इसकी संख्या और भी बढ़ जाती है। तराई और उससे जुड़े मैदानी इलाके नदियों और नदियों की पुरानी धाराओं से पटा पड़ा है, जिसे स्थानीय लोग 'मन' या ‘छाड़न’ कहते हैं।

    ‘मनों’ की शृंखला इस तरीके से व्यवस्थित है कि बाढ़ के दौरान पानी ज्यादा होने पर पानी एक दूसरे में चला जाता है, जिससे क्षमता से ज्यादा पानी का बहाव आगे की तरफ चला जाता है। बाकी पानी साल भर के लिये 'मन' में ही रह जाता है एवं इससे सिंचाई, पीने के पानी, मछलीपालन आदि के काम आता है। जबकि इन ‘मनों’ को एक दूसरे से जोड़ने वाले चैनल्स बाकी दिनों में सूख जाते हैं। जलोढ़ मिट्टी की नई परत हर साल बाढ़ क्षेत्र में फैल जाती है, जिससे ये इलाके खेती लिये काफी उपजाऊ हो जाते हैं।

    नदी की प्रवृत्ति में बाढ़ मूल रूप से शामिल है, खासकर हिमालय से निकलने वाली नदियों के लिये। उसी तरह बाढ़, यहाँ नदियों के किनारे और जलग्रहण क्षेत्र में बसने वाले लोगों के जीवन का भी अनन्य हिस्सा होती है। जब बाढ़ आती है, जिसका समय लगभग नियत होता है, तो ये डिप्रेशन (नदी की पुरानी धारा, जो अब झील या ‘मन’ का स्वरूप ले चुके हैं) पानी को अपने अन्दर समाहित कर लेते हैं, और फिर एक-एक करके वो भरते चले जाते हैं। तालाबों और ‘मनों’ की ये शृंखला अन्त में गंगा में अनेक बरसाती नालाओं से होकर मिल जाती है। इस प्रकार बाढ़ नियंत्रण का ये प्राकृतिक तरीका काम करता है। नदियों की पुरानी धाराओं की एक शृंखला जिसमें अनगिनत झील या मन शामिल है, वो मुख्य रूप से तीन काम करती है:

    1. नदी के बहाव क्षेत्र से अधिक पानी को अपने मे समाहित करके नदी के जलस्तर को बढ़ने से रोकती है।
    2. चुँकि कई झीलों की एक शृंखला है, जो एक-एक करके भरती हुई जाती है, इससे बहाव की गति तेज नहीं हो पाती हैं और नदियों द्वारा कटाव नियंत्रित रहता है।

    3. जब पानी इन नदी की पुरानी धाराओं, जो कि झीलों या मन के रूप में फैली है, में भर जाती है जिससे नदी के बहाव से उतना पानी नदी के निचले जल क्षेत्र से कम हो जाता है। इससे बाढ़ की तेजी और विभीषिका में काफी हद तक कमी हो जाती है।

    मनों की शृंखला इस तरीके से व्यवस्थित है कि बाढ़ के दौरान पानी ज्यादा होने पर पानी एक दूसरे में चला जाता है, जिससे क्षमता से ज्यादा पानी का बहाव आगे की तरफ चला जाता है। बाकी पानी साल भर के लिये 'मन' में ही रह जाता है एवं इससे सिंचाई, पीने के पानी, मछलीपालन आदि के काम आता है। जबकि इन ‘मनों’ को एक दूसरे से जोड़ने वाले चैनल्स बाकी दिनों में सूख जाते हैं। जलोढ़ मिट्टी की नई परत हर साल बाढ़ क्षेत्र में फैल जाती है, जिससे ये इलाके खेती लिये काफी उपजाऊ हो जाते हैं।इन सबके बावजूद झीलों में जमा पानी अगले साल भर भूजल और सतही जल का सुगम स्रोत बना रहता है। तथा जनता की जरूरत के हिसाब से उनके आर्थिक भरण पोषण में सहायक होता है। गंगा और हिमालय के मध्य नदियों द्वारा लाई गई जलोढ़ मिट्टी से बना पूरा इलाका नदियों और उसके द्वारा बनाए गए छाड़न (नदियों द्वारा छोड़ दिया गया रास्ता), चँवर, चाती, ताल, हद, नदी ताल आदि से पटा पड़ा है।

    इस पूरे विस्तृत भू-भाग में अनगिनत नदियाँ अठखेलियाँ करती हैं और साल के कुछ निश्चित दिनों में बाढ़ का सारा पानी पूरे मैदानी भाग में उड़ेल देती है। बाढ़ के पानी में कच्चे ‘शिवालिक’ श्रेणी (हिमालय का सबसे दक्षिणी हिस्सा) का गाद भी होता है, जो पानी के छँट जाने के बाद खेती को एक नई जान देता है। ये सारे ताल-तलैया नदियों की क्षमता से ज्यादा पानी को समेटने का काम करते हैं, मुख्य नदी के इतर एक समानान्तर व्यवस्था के तहत एक ‘मन’ से दूसरे ‘मन’ में पानी सहेजते हुए सुदूर दक्षिण में गंगा नदी में मिल जाती है।

    बाढ़ के पानी को भण्डारण करने की इस प्राकृतिक व्यवस्था को ‘अनुपम मिश्र’ रेनवाटर हार्वेस्टिंग के ही तर्ज पर फ्लडवाटर हार्वेस्टिंग का तरीका मानते थे। झीलों में संग्रहित पानी अगले बाढ़ के आने तक ना सिर्फ साफ पानी की बल्कि मछलीपालन, सिंचाई, कृषि सहित तमाम संसाधनों का जरिया बना रहता है। वही धीरे-धीरे बाढ़ का पानी मुख्य नदी के रास्ते बंगाल और अन्ततः बांग्लादेश होते हुए बंगाल की खाड़ी में विलीन हो जाता है। नदियों के इसी मकड़जाल में सभ्यता फलती-फूलती आई है, पर नदियों की इस प्राकृतिक व्यवस्था को बिना छेड़े, उनको आत्मसात करते हुए।

    चँवर, चाती, मन, छाड़न आदि पर केवल कृषि कार्य, वहीं ऊँचे जगहों पर गाँव के बसने का नियम रहा है। खेती के तरीके भी बाढ़ और पानी के इसी सामंजस्य पर ही आधारित रहे हैं। यहाँ धान की ऐसी किस्में भी पाई जाती हैं जो बाढ़ के ऊँचे जलस्तर में भी बर्बाद नहीं होतीं। चँवर, जहाँ साल भर पानी रहता है वहाँ अभी तक गरमा धान की खेती की परम्परा थी, जिसे जाड़े के दिनों में रोपा जाता और गर्मी में काट लिया जाता था। कुल मिलाकर बाढ़ को विपदा न मानकर उसी के अनुरूप ढल जाने की प्रवृत्ति थी हमारी। तभी तो पिछली बार आई भयंकर बाढ़ में हुई त्रासदी को अनुपम मिश्र ने बिहार के समाज के बारे में गलत नहीं लिखा था कि तैरने वाला समाज डूब रहा है।

    पिछले सैकड़ों सालों में जल और बाढ़ प्रबन्धन के नाम पर पारिस्थितिकी तंत्र के स्थानीय समझ को किनारे करके तकनीकी ठसक का प्रदर्शन होता रहा है। नदियों के दोनों किनारों पर बड़ी-छोटी बाँध की एक शृंखला तैयार हुई जिससे पानी को फैलने से रोका जा सके। पचास के दशक में जहाँ बिहार में कुल बाँधों की लम्बाई 260 कि.मी. थी, जो ताजा आँकड़ों के हिसाब से अब 3600 किमी तक जा पहुँची है। इतना सब कुछ करने के बावजूद फ्लड प्रोन इलाकों का रकबा लगभग चार गुना बढ़कर 9 मिलियन हेक्टेयर तक जा पहुँचा है।

    नदी और उससे जुड़ी तमाम झीलों और 'मनों' के प्राकृतिक स्वरूप और बहाव की दिशा को दरकिनार कर नहरों का जाल बिछाया गया। जल जमाव वाले क्षेत्रों और चैनल्स के ऊपर शहर बसाए गए, जल ग्रहण क्षेत्रों को अविवेकपूर्ण तरीकों से इस्तेमाल में लाया गया, उस पर बस्तियाँ बसाई गईं। जिसका नतीजा हुआ कि अनगिनत झीलों के आपस में जुड़ाव का जो रास्ता था, वो अब लगभग बन्द हो गया, या तो वहाँ बस्ती बस गई या सड़क या फिर उसको इतना ऊँचा कर दिया गया कि बाढ़ के हालात में भी वे एक दूसरे से जुड़ नही पाये।

    परिणामस्वरूप बाढ़ की भयावहता में और वृद्धि हुई और सारा-का-सारा निचला हिस्सा बाढ़ के पानी में जलमग्न होने लगे। नदी और बाँध के बीच में बढ़ते पानी के दबाव के कारण बाँध टूटने के संख्या भी बढ़ी है। सरकारी आँकड़ों की मानें तो 1987 और 2011 के बीच 371 बार मुख्य बाँध टूट चुके हैं।

    इस तरह तटबन्धों के टूटने का सिलसिला बदस्तूर जारी है, उदाहरण के तौर पर NDTV के हालिया रिपोर्टिंग के अनुसार दरभंगा के रसियारी और देवना गाँव के बीच बना बाँध 1987 से लेकर अब तक 16 बार टूट चुका है। तो अब बाँध के बदस्तूर टूटने से हुई तबाही का अन्दाजा लगाया जा सकता है। तटबन्धों की जो शृंखला बाढ़ को नियंत्रित करने के लिये बाँधी गई वो अब केवल बाढ़ प्रभावित लोगों के लिये तात्कालिक शरणस्थली के काम आ रहा है।

    मोतिहारी शहर की हालत सबसे उपयुक्त है चम्पारण में बाढ़ और उसके प्रबन्धन से जुड़ी मूर्खता को समझने के लिये। मोतिहारी वर्तमान में पूर्वी चम्पारण का (पूर्व में संयुक्त चम्पारण का) मुख्यालय है, जो गंडक और बूढ़ी गंडक के वाटर डिवाइड के लगभग मध्य में स्थित है। शहर चारों तरफ से छोटे-बड़े तालाबों की एक शृंखला से घिरा हुआ है। हालांकि अब सभी ताल धीरे-धीरे शहर के फैलाव की भेंट चढ़ रहे हैं।

    बाढ़ जो पहले कुछ दिनों के लिये आती थी और साल भर के लिये उपजाऊ मिट्टी दे जाती थी, अब स्थिति बदल गई है। अब बाढ़ का पानी निकास के अभाव में हफ्तों, महीनों तक नहीं निकल पाता, जिससे खेती का चक्र बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। किसान बाढ़ के चले जाने के बाद खेतों में फैली उपजाऊ मिट्टी का लाभ नहीं ले पाते हैं क्योंकि पानी तो निकास के अभाव में वहीं रह गया होता है। पिछली बार 2006 में आई बाढ़ का पानी कई जगहों में नवम्बर तक रहा था।शहर के बीचोंबीच मोती झील है, जो बाढ़ आने पर बूढ़ी गंडक (सिकरहना) नदी के जलग्रहण से अधिक पानी को अपने में समाहित कर लेती है। धीरे-धीरे मोती झील अपना अधिक पानी दूसरे 'मनों' के एक लम्बी शृंखला में प्रवाहित कर देती है, जिससे आस-पास के गाँव और शहर बाढ़ में डूबने से बच जाते हैं। वहीं शहर के दूसरे छोर से धनौती नदी पश्चिमी और दक्षिणी हिस्सों से आने वाले पानी को आगे बहा देती है।

    धनौती कोई नदी नहीं है, बल्कि दो बड़े तालाब यानि कि ‘मन’ को जोड़ने का नाला है जो केवल बाढ़ के दिनों में ‘मनों’ के जलग्रहण से ज्यादा पानी होने पर ही नदी जैसा स्वरूप लेती है। ऐसे कई सारी नाले मुख्य नदियों के इतर जल निकास की एक समान्तर व्यवस्था बनाती हैं और ये गंगा के उत्तरी मैदानी इलाकों की एक खास विशेषता भी है। विकास के क्रम में इन सारे प्राकृतिक बहाव के रास्तों पे नकेल कस दिया गया, अब उन पर शहर और कस्बे बस गए हैं।

    मोतिहारी के उत्तर और पूरब से होकर राष्ट्रीय राज्यमार्ग 68A गुजरती है जिसके नीचे से सिकरहना नदी के बाढ़ का पानी मोतीझील (नदी ताल, वे तालाब जो नदियों के पानी से भरता है, ना कि बारिश के पानी से) में मिल जाता था और पानी क्रमश आगे गंगा की तरफ निकल जाता था। अब राष्ट्रीय राजमार्ग के सारे पुलियों को भरकर और शहर से गुजरने वाले नालों को पाटकर उसके ऊपर कई मोहल्ले बसाए जा चुके हैं। तो जाहिर है गया, सिकरहना और मोतिहारी के बीच सब कुछ जलमग्न हो गया जिसमें शहर के निचले हिस्से भी शामिल हैं।

    यहाँ तक कि मोतिहारी को नेपाल से जोड़ने वाली मुख्य सड़क के ऊपर तक पानी पहुँच चुका है। ये हाल केवल मोतिहारी का ही नहीं उत्तर बिहार के लगभग हर शहर की कमोबेस यही स्थिति रही है। हालांकि ये दौर है स्मार्ट सिटी बसाने का, पर हम तो अभिशप्त है प्रबन्धन के नाम पर तकनीक के भौड़ा प्रदर्शन के।

    बाढ़ जो पहले कुछ दिनों के लिये आती थी और साल भर के लिये उपजाऊ मिट्टी दे जाती थी, अब स्थिति बदल गई है। अब बाढ़ का पानी निकास के अभाव में हफ्तों, महीनों तक नहीं निकल पाता, जिससे खेती का चक्र बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। किसान बाढ़ के चले जाने के बाद खेतों में फैली उपजाऊ मिट्टी का लाभ नहीं ले पाते हैं क्योंकि पानी तो निकास के अभाव में वहीं रह गया होता है।

    पिछली बार 2006 में आई बाढ़ का पानी कई जगहों में नवम्बर तक रहा था। बाढ़ अब खेतों-खलिहानों गाँवों और शहरों को अपना निशाना बना रही है और छोड़ जा रही है अपने पीछे सालों के लिये त्रादसी। और हम हैं कि वो सब कुछ कर रहे है बाढ़ नियंत्रण के नाम पर। पर वो असल बात नही समझेंगे और ना ही उसे अमल में लाएँगे जो प्रकृति सम्मत है। भले ही उसकी कीमत कुछ भी चुकानी पड़े। अब तो ये बात लगभग सर्वविदित हो चली है कि बाढ़ की तबाही पानी से नहीं आती बल्कि खोखले प्रबन्धन के चलते आती है।

    नदी के बारे में ये कहावत भी है कि नदी अपना रास्ता और अपना प्रवाह क्षेत्र कभी नहीं भूलती, कम-से-कम अगले 100 सालों तक, उसे आज नहीं तो कल क्लेम जरूर करती है। अभी की बाढ़ शायद हमें कुछ सीख दे जाये कि नदी है तो बाढ़ आएगी ही, उसे बाँधने की जरूरत नहीं है, उसे बस बहाव का रास्ता भर देना है और उसके लिये प्रकृति ने सब इन्तजाम पहले से ही कर रखा है।

    चम्पारण में गंडक और बूढ़ी गंडक के बीच तालाबों, झीलों, बरसाती नालों के शृंखला जो एक दूसरे से जुड़कर बाढ़ के पानी को संग्रहण और बहने का समानान्तर प्राकृतिक व्यवस्था देती है

    डॉ. कुशाग्र राजेंद्र
    चम्पारण के गाँव भतनाहिया में जन्मे, मोतिहारी से कॉलेज तक की शिक्षा, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से पर्यावरण विज्ञान में डॉक्टरेट की उपाधि और सम्प्रति एमिटी विश्वविद्यालय हरियाणा में शिक्षण एवं अनुसन्धान में संलग्न।


    सम्पर्क
    ईमेल- mekushagra@gmail.com

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    नमामि गंगे - बन्द करो निर्मलता का नाटक

    RuralWaterThu, 01/25/2018 - 23:28

    गंगागंगाअब यह एक स्थापित तथ्य है कि यदि गंगाजल में वर्षों रखने के बाद भी खराब न होने का विशेष रासायनिक गुण है, तो इसकी वजह है इसमें पाई जाने वाली एक अनन्य रचना। इस रचना को हम सभी ‘बैक्टीरियोफेज’ के नाम से जानते हैं।

    बैक्टीरियोफेज, हिमालय में जन्मा एक ऐसा विचित्र ढाँचा है कि जो न साँस लेता है, न भोजन करता है और न ही अपनी किसी प्रतिकृति का निर्माण करता है। बैक्टीरियोफेज, अपने मेजबान में घुसकर क्रिया करता है और उसकी यह नायाब मेजबान है, गंगा की सिल्ट।गंगा में मूल उत्कृष्ट किस्म की सिल्ट में बैक्टीरिया को नाश करने का खास गुण है। गंगा की सिल्ट का यह गुण भी खास है कि इसके कारण, गंगाजल में से कॉपर और क्रोमियम स्रावित होकर अलग हो जाते हैं।

    अब यदि गंगा की सिल्ट और बैक्टीरियोफेजेज को बाँधों अथवा बैराजों में बाँधकर रोक दिया जाये और उम्मीद की जाये कि आगे के प्रवाह में वर्षों खराब न होने वाला गुण बचा रहे, तो क्या यह सम्भव है? मछलियाँ, नदियों को निर्मल करने वाले प्रकृति प्रदत तंत्र का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। धारा के विपरीत चलकर अंडे देने वाली माहसीर और हिल्सा जैसी खास मछलियों के मार्ग में क्रमशः चीला और फरक्का जैसे बाँध-बैराज खड़े करके हम अपेक्षा करें कि वे नदी निर्मलता के अपने कार्य को जारी रखेंगी; यह कैसे सम्भव है?

    गंगोत्री की एक बूँद नहीं पहुँचती प्रयागराज


    हैदराबाद स्थित ‘नीरी’ को पर्यावरण इंजीनियरिंग के क्षेत्र में शोध करने वाला सबसे अग्रणी शासकीय संस्थान माना जाता है। ‘नीरी’ द्वारा जुलाई, 2011 में जारी एक रिपोर्ट स्थापित करती है कि बैक्टीरियोफेज की कुल मात्रा का 95 प्रतिशत हिस्सा, टिहरी बाँध की झील में बैठी सिल्ट के साथ ही वहीं बैठ जाता है। मात्र 05 प्रतिशत बैक्टीरियोफेज ही टिहरी बाँध के आगे जा पाते हैं।

    टिहरी बाँध में सिमट के रह गए बैक्टीरियोफेजसभी को मालूम है कि गंगा में ग्लेशियरों से आने वाले कुल जल की लगभग 90 प्रतिशत मात्रा, बैराज में बँधकर हरिद्वार से आगे नहीं जा पाती है। शेष 10 प्रतिशत को बिजनौर और नरोरा बैराजों से निकलने वाली नहरें पी जाती हैं। इस तरह गंगा मूल से आये जल, बैक्टीरियोफेज और सिल्ट की बड़ी मात्रा बाँध-बैराजों में फँसकर पीछे ही रह जाती है। प्रख्यात नदी वैज्ञानिक स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद दुखी हैं कि गंगोत्री से आई एक बूँद भी प्रयागराज (इलाहाबाद) तक नहीं पहुँचती। परिणामस्वरूप, प्रयागराज (इलाहाबाद) की गंगा में इसके जल का मौलिक मूल गुण विद्यमान नहीं होता।

    यही कारण है कि प्रयागराज (इलाहाबाद) का गंगाजल, गर्मी आते-आते अजीब किस्म के कसैलेपन से भर उठता है। निस्सन्देह, इस कसैलेपन में हमारे मल, उद्योगों के अवजल, ठोस कचरे तथा कृषि रसायनों में उपस्थित विष का भी योगदान होता है; लेकिन सबसे बड़ी वजह तो गंगाजल को मौलिक गुण प्रदान करने वाले प्रवाह, सिल्ट और बैक्टीरियोफेज की अनुपस्थिति ही है।

    अविरलता बिना, निर्मलता असम्भव


    स्पष्ट है कि यदि गंगाजल के विशेष मौलिक गुण को बचाना है, तो गंगा उद्गम से निकले जल को सागर से गंगा के संगम की स्थली- गंगासागर तक पहुँचाना होगा; गंगा की त्रिआयामी अविरलता सुनिश्चित करनी होगी। त्रिआयामी अविरलता का मतलब है, गंगा प्रवाह और इसकी भूमि को लम्बाई, चौड़ाई और गहराई में अप्राकृतिक छेड़छाड़ से मुक्त रखना। इस त्रिआयामी अविरलता को सुनिश्चित किये बगैर, गंगा को निर्मल करने का हर प्रयास विफल होगा। यह जानते हुए भी बीते साढ़े तीन वर्षों में ‘नमामि गंगे’ के तहत इस दिशा में क्या कोई एक जमीनी प्रयास हुआ? उल्टे गंगा को इसके मूल में कैद करने की कारगुजारियों को हरी झंडी दी गई।

    नैनीताल स्थित उत्तराखण्ड हाईकोर्ट द्वारा गंगा-यमुना की इंसानी पहचान पर न्यायालयी ठप्पा लगाने से उम्मीद बँधी थी कि कम-से-कम उत्तराखण्ड में तो गंगा तथा यमुना और अधिक शोषित, प्रदूषित एवं अतिक्रमण होने से बच जाएँगी। हुआ उल्टा। इस दिशा में न्यायालय की मंशा और भारतीय सांस्कृतिक आस्था का सम्मान करने की बजाय, उत्तराखण्ड शासन हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुँच गया।

    फरक्का जैसे बैराज से गंगा को बाँध दिया गयाइस मामले में न तो स्वयं को गंगाभक्त कहने वाले शासकीय कर्णधारों ने स्थगनादेश लाने में कोई शर्म महसूस की और न ही प्रशासन ने गंगा में रेत खनन और पत्थर चुगान खनन माफिया के साथ मिलकर अनैतिक हथकंडे अपनाने में। गंगा में गैरकानूनी खनन और भ्रष्टाचार के खिलाफ वर्षों से संघर्ष कर रहे मातृसदन, हरिद्वार के सन्यासियों को चुप कराने पर उतारू स्थानीय प्रशासन की कारगुजारियाँ इस लेख को लिखे जाने तक भी जारी हैं और गंगा के सन्त और समाज... दोनों चुप हैं। ऐसे में अविरलता की उम्मीद बचे, तो बचे कैसे?

    शून्य प्रयास का नतीजा सूखती गंगा


    खैर, यह सर्वविदित तथ्य है कि गंगा में प्रवाहित होने वाले जल की कुल मात्रा में ग्लेशियरों का योगदान 35-40 प्रतिशत ही है। शेष 65-60 प्रतिशत मात्रा सहायक नदियों और भूजल प्रवाहों की देन है। क्या सहायक नदियों और भूजल प्रवाहों में जल की मात्रा बढ़ाने का कोई प्रयास इस बीच किया गया? यदि प्रभावी प्रयास हुआ होता, तो क्या गंगा जलग्रहण क्षेत्र की गंगा, यमुना, गोमती, नर्मदा जैसी नदियों के नाम, भारत की सबसे तेजी से सूखती आठ प्रमुख नदियों की सूची में शुमार होते? प्रयास होता, तो क्या उत्तराखण्ड की 20 प्रमुख नदियों में जल की उपलब्धता 10 वर्ष पहले 20 करोड़ लीटर की तुलना में घटकर गत वर्ष मध्य अप्रैल में मात्र 11 करोड़ लीटर रह गई होती? कदापि नहीं।

    गंगा हित से विमुख परियोजनाएँ


    कोई बताए कि घाटों को पक्का करने या उनके सौन्दर्यीकरण से क्या गंगा के प्रवाह को कोई लाभ होता है? उत्तराखण्ड में सड़क को 24 मीटर तक चौड़ी करने की जिद के चलते 60,000 पेड़ों को काटे जाने की योजना बनाने से गंगा की प्रवाह धारक क्षमता घटेगी कि बढ़ेगी?

    गंगा जल परिवहन मार्ग के नाम पर वाराणसी से हल्दिया तक गंगा की खोद डालने से गंगा को नुकसान होगा या फायदा? क्या गंगा-यमुना की तह पर बहते हल्के ठोस पॉली, कागज और लकड़ी जैसे कचरे को मशीन लगाकर साफ करने से गंगाजल निर्मल हो जाएगा? खासकर तब, जब कि मशीनें सतही कचरे को ले जाकर प्रवाह से 50-100 फीट की दूरी पर रख देती हों और उस कचरे को उठाकर अन्यत्र ले जाना मशीन ठेकेदार की कार्य संविदा में शामिल न हो। दूसरी ओर, स्थानीय नगरपालिका ‘नमामि गंगे’ बजट से पैसा न मिलने की बिना पर उस कचरे को उठाने से इनकार कर दे। जाहिर है कि बारिश आने पर वह कचरा वापस नदी में पहुँचेगा ही। इससे नदी साफ होगी या पैसा? सूत्रानुसार, दिल्ली की यमुना नदी में पिछले आठ महीने से यही हो रहा है।

    हरिद्वार में गंगा खननहम एक तरफ तो गंगा में नाले गिराते रहें और दूसरी तरफ सतह पर मशीन घुमाते रहें। एक ओर घर-घर शौचालय बनाकर जलीय प्रदूषण बढ़ाते रहें और दूसरी ओर फूलों की खाद बनाने को प्रदूषण घटाने के एक बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश करते रहें। यह आँखों में धूल झोंकने का काम नहीं तो और क्या है?

    खतरनाक है ओडीएफ इण्डिया की हड़बड़ी


    गौर कीजिए कि भारत की वर्तमान मल शोधन क्षमता, मौजूदा मल भार की तुलना में काफी कम है; बावजूद इस अक्षमता के हमें ‘खुले में शौच से मुक्त भारत’ का तमगा हासिल करने की इतनी जल्दी है कि हम उन सुदूर गाँवों में भी मल का एक नया बोझ जबरन खड़ा करते जा रहे हैं, जहाँ किसी ने शौचालयों की कोई माँग नहीं की। इसे मल शोधन संयंत्र कम्पनियों हेतु भविष्य का बाजार सुनिश्चित करने की हड़बड़ी कहें, शासकीय बेसमझी कहें, ऊपरी आमदनी का लालच मानें या स्वच्छता का नाटक? खासकर तब, जब यह सब कुछ ऐसे निराधार तर्कों के आधार पर हो रहा हो, जिन्हें खुद शासकीय आँकड़े नकार रहे हैं।

    भ्रामक है बन्द दरवाजे में शौच की शुचिता


    याद कीजिए कि गुजरात मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए श्रीमती आनंदी बेन का तर्क था कि खुले में शौच के कारण बलात्कार के मामले बढ़ रहे हैं। बलात्कार के मामले 100 फीसदी घरों में शौचालय वाले नगरों में ज्यादा हुए हैं या बिना शौचालय वाले गाँवों में? राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आँकड़े खंगालिए, आनंदी जी के बयान का झूठ खुद-ब-खुद सामने आ जाएगा।

    घर-घर शौचालय बनाने को प्रेरित करने वाले विज्ञापनों का दूसरा बड़ा तर्क यह है कि खुले में शौच करने से बीमारी फैलती है। ‘खुले में शौच से मुक्त’ का दर्जा प्राप्त होने वाले इलाकों में बीमारों की संख्या के लगातार घटने का कोई प्रमाणिक अध्ययन कहीं हो, तो कोई बताए? अलबत्ता, ‘नीरी’ के एक जि़म्मेदार सूत्र के अनुसार, इस निष्कर्ष के प्रमाणिक अध्ययन अवश्य हैं कि जलस्रोतों की दूरी का ध्यान रखे बगैर ‘घर-घर शौचालय’ के गड्ढों को जिस अन्दाज में अंजाम दिया जा रहा है, उसके कारण भूजल में प्रदूषण बढ़ रहा है।

    स्पष्ट है कि भूजल की सेहत खराब होगी, तो बन्द दीवारों में मौजूद शौच, बीमारों की संख्या घटाने की बजाय, बढ़ाएगा ही। भारत में बीमारियाँ, खुले में शौच करने से ज्यादा फैलती हैं या सीवेज को ले जाकर नदियों को प्रदूषित करने से? मेरा मानना है कि ऐसा तुलनात्मक अध्ययन करते ही खुले में शौच को प्रेरित करने वाले विज्ञापनों की पोल स्वतः खुल जाएगी।

    ऋषिकेश में गंगा नदी में गिरता नालाविचारणीय तथ्य यह भी है कि यदि भूजल प्रदूषित होगा, तो क्या तालाब और नदियाँ प्रदूषित होने से बच जाएँगे? जो नदी, तालाब जितना करीब होंगे, वे उतना जल्दी इस भूजल प्रदूषण की चपेट में आएँगे। तय मानिए कि हर घर में शौचालय की इस अनैतिक जिद की अन्तिम परिणति एक दिन जलापूर्ति पाइप, सीवेज पाइप, बिल, निजीकरण तथा गाँवों के तालाबों व नदियों में प्रदूषण के रूप में ही सामने आएगी; बावजूद, इसके गंगा किनारे की 1600 लक्ष्य गंगा ग्रामों में जोर सिर्फ-और-सिर्फ शौचालयों पर है।

    नीयत पर सवाल उठाते नए मानक व निष्कर्ष


    बराबर कहा जा चुका है कि उत्तर प्रदेश के गंगा ग्रामों की आबादी, सामाजिक, आर्थिक, औद्योगिक तथा नदी परिस्थिति कालीबेई व उसके समाज से भिन्न है। अतः पंजाब के संत बलबीर सिंह सींचेवाल कालीबेई नदी निर्मलीकरण मॉडल के उत्तर प्रदेश में सफल होने की सम्भावना भी कम ही है। बावजूद इसके ‘नमामि गंगे’ अन्य विकल्पों पर ध्यान नहीं दे रहा। उल्टे, एक प्रतिष्ठित शासकीय शोध संस्थान के निदेशक दावा कर रहे हैं कि गंगा के 5-7 प्रतिशत प्रवाह मार्ग को छोड़कर, शेष प्रवाह मार्ग का पानी अब ठीक-ठाक है। गंगा किनारे के इलाकों में प्रदूषण के बढ़ते दुष्प्रभावों को देखते हुए ऐसे निष्कर्षों की प्रमाणिकता और उसके मकसद की नीयत पर सवाल उठने स्वाभाविक हैं; सो,उठ रहे हैं।

    सवाल, 13 अक्टूबर, 2017 को पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अपर सचिव श्री अरुण कुमार मेहता की ओर से जारी शुद्ध मानकों में संशोधन सम्बन्धी एक अधिसूचना (संख्या - 843) को लेकर भी है। अधिसूचना के सन्दर्भ में एक पत्रिका द्वारा पेश निम्न तुलनात्मक अध्ययन बताता है कि केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, अक्टूबर, 2015 में अपने द्वारा बनाए मानकों के पैमानों को खुद ही गिराने पर लग गया है। कृपया सारणी देखें:

     

    केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा संशोधित मानक

    तत्व

     

    मानक और निर्धारण वर्ष

    वर्ष 1986

    अक्टूबर 2015

    अक्टूबर 2017

    बीओडी (मिग्रा प्रति लीटर)

    30

    10

    30  (प्रदेशानुसार)

    सीओडी (मिग्रा प्रति लीटर)

    250

    50

    अनन्त

    टीएसएस (मिग्रा प्रति लीटर)

    100

    10

    50 से 100 (प्रदेशानुसार)

    नाइट्रोजन (मिग्रा प्रति लीटर)

    100

    10

    अनन्त

    अमोनिकल नाइट्रोजन (मिग्रा प्रति लीटर)

    50

    05

    अनन्त

    फास्फोरस (मिग्रा प्रति लीटर)

    अनन्त

    01

    अनन्त

    मलीय कोलीफॉर्म (एमपीएन प्रति सौ मिली)

    अनन्त

    100

    1000

     


    ऐसा लगता है कि मानकों में बदलाव की यह कारगुजारी, गंगा नदी को 2018 तक निर्मल करने को लेकर पूर्व में किये गए गंगा मंत्रालयी दावे की असफलता को छिपाने के लिये की गई है; ताकि नए कमजोर मानकों के आधार पर सम्बन्धित मंत्रालय यह दावा कर सके कि ‘नमामि गंगे’ के प्रयासों से गंगा निर्मल हुई है। इस कारगुजारी के कारण, बाजारू भी हो सकते हैं। गौरतलब है कि और अधिक मल शोधन संयंत्र लगाने के लिये अभी जल्द में ही हिंडन, काली, गोमती और रामगंगा नदी को भी ‘नमामि गंगे’ परियोजना में शामिल किया गया है।

    इसी तरह की एक कारगुजारी, माहसीर मछली को आने-जाने के लिये नदी जल की गहराई मानक को लेकर की गई है। विश्व वन्य जीव कोष से सम्बद्ध एक सूत्र के मुताबिक, माहसीर के लिये सुविधाजनक गहराई तीन मीटर मानी गई है। पहले वे इसको घटाकर 0.5 मीटर करना चाहते थे। तमाम तर्कों के बावजूद, वे इसे एक मीटर से आगे लाने पर राजी नहीं हुए हैं। यह हाल तब है जब हमारे कुकर्मों के कारण 100 किलोग्राम तक वजन वाली माहसीर मछली की पीढ़ियाँ, अब गंगाजल में पाँच किलोग्राम से आगे नहीं बढ़ पा रहीं।

    कितनी सदाचारी नमामि गंगे?


    एक ओर अध्ययन के नाम पर 600 करोड़ रुपए, जनजागरण के नाम पर 128 करोड़ रुपए और टास्क फोर्स की चार बटालियनों के निर्माण के लिये 400 करोड़ रुपए और उत्तर प्रदेश मेें योगी जी द्वारा प्रस्तावित गंगा सेवा यात्रा हेतु 400 करोड़ के बजट निर्धारित करना और दूसरी ओर साढ़े तीन साल में चिन्हित 1109 गम्भीर प्रदूषण उद्योगों में से मात्र 300 को बन्द करा पाने की गति को आप सदाचार की श्रेणी में रखेंगे या भ्रष्टाचार की? ‘नमामि गंगे’ के घोषित बजट में केदारनाथ, हरिद्वार, दिल्ली, कानपुर, वाराणसी और पटना के घाटों के लिये 250 करोड़ की धनराशि का प्रावधान था।

    असंख्य नाले गंगा में मलजल छोड़ते हैं15 जनवरी, 2018 की ताजा खबर के अनुसार घाट व मन्दिरों के डिजाइन, सौन्दर्यीकरण तथा रख-रखाव का काम अब अगले 15 साल के लिये हरिद्वार-ऋषिकेश में हिंदुजा बन्धु को, कानपुर में जहाज कारोबारी रवि मल्होत्रा को, वाराणसी में एचसीएल समूह के शिव नादर को, पटना में वेदांता समूह के अनिल अग्रवाल को और सम्भवतः दिल्ली में पेट्रो रसायन, उर्वरक तथा धागा आदि बनाने वाले इंडरोमा समूह को सौंप दिया गया है। गंगा जलग्रहण क्षेत्र में वानिकी एवं हरियाली हेतु केन्द्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री द्वारा 2500 करोड़ की ताजा घोषणा का हश्र आगे पता चलेगा।

    आरोप कई, जाँच जरूरी


    नदी कार्यकर्ताओं के आरोप हैं कि ‘रिवर फ्रंट डेवलपमेंट’ नदी से उसकी जमीन छीनने का खेल है। सौन्दर्यीकरण तथा रख-रखाव के नाम पर घाटों को कम्पनियों को सौंपने से तीर्थ पुरोहित और नाविकों के हाथों से तीर्थ पर्यटन तथा मछुआरों के हाथों से उनकी आजीविका छिन जाने का खतरा हमेशा रहने वाला है। व्यापक वृक्षारोपण के नाम पर गंगा किनारे खेती करने वाले गरीब-गुरबा किसानों के हाथों से नदी भूमि छीनकर कम्पनियों/संस्थाओं के हाथों को देने का खेल है।

    ‘गंगा ग्राम’ की गढ़मुक्तेश्वर परियोजना की सीबीआई जाँच का आदेश देते हुए राष्ट्रीय हरित पंचाट, पहले ही अन्य परियोजनाओं में गड़बड़ी की सम्भावना व्यक्त कर चुका है। सूत्र कहते हैं कि भ्रष्टाचार, राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन निदेशालय में नियुक्ति और खरीद-फरोख्त से लेकर परियोजनाओं के जमीनी क्रियान्वयन तक में हुआ है। बजट का पूरा उपयोग नहीं करने को ‘कैग’ भले ही गलत माने, लेकिन यदि उक्त आरोपों में दम है तो अच्छा ही हुआ; वर्ना शेष खर्च हुआ धन भी कम-से-कम गंगा का हित तो नहीं ही करता। अतः जाँच ज़रूरी है; जाँच हो। जनता की ओर से ‘सूचना के अधिकार’ के कार्यकर्ता पहल करें।

    अविरलता नहीं, तो बन्द करो निर्मलता के नाटक


    भारत को आजाद हुए 70 बरस हो चुके। इस 26 जनवरी, 2018 को एक गणतंत्र राष्ट्र बने भी हमें 67 बरस तो हो ही गए। दुःखद है कि 67 वर्षीय विशाल गणतंत्र होते हुए भी आज हम गंगा जैसी देवतुल्य नदी को बिकते, शोषित होते देख रहे हैं। मुझे यह लिखने मेें कतई गुरेज नहीं, हम आज भी एक अक्षम गणतंत्र ही हैं। यह हमारी अक्षमता का नतीजा है कि भारत की जन-जन की आस्था और राष्ट्रीय अस्मिता की प्रतीक बनी गंगा जैसी अद्भुत नदी भी, आज सामाजिक, धार्मिक अथवा शासकीय एजेंडा न होकर, कारपोरेट एजेंडा बनने को मजबूर हैं और उनका प्रदूषण, महज एक मुनाफा उत्पाद।

    यह भूलने की बात नहीं कि नदियों के नाम पर भारत, विश्व बैंक से अब तक करीब एक अरब डॉलर का कर्ज ले चुका है। आजादी के बाद से अब तक गंगा सफाई के नाम पर 20 हजार करोड़ रुपए खर्च कर चुका है। बावजूद, इसके भारत की नदियों में प्रदूषण का स्तर पिछले एक दशक में घटने की बजाय, दोगुने से अधिक बढ़ गया है। नदियों में मिलने वाले मलीय जल की मात्रा भी 3800 करोड़ लीटर से बढ़कर, 62,000 करोड़ लीटर हो गई है।

    वाराणसी में सिमटता गंगा का दायराप्रदूषित नदियों के कई किलोमीटर के खेत बांझ होने की दिशा में अग्रसर हैं और जीव, बीमार होने की दशा में। ऐसा सिर्फ-और-सिर्फ इसलिये है कि कम्पनियों के मुनाफे बढ़ाने तथा नेता, अफसर, इंजीनियर तथा स्थानीय ठेकेदारों की जेबें भरने की फिक्र में हमारे शासकीय कर्णधारों ने नदियों की अविरलता की पूरी तरह उपेक्षा करना तय कर लिया है और भारतीय जनमानस चुप्पी मारे बैठा है।

    ऐसे में भारतीय वैज्ञानिक, सन्त और समाज.. तीनों से मेरा निवेदन है कि कुछ सार्थक जमीनी पहल करना तो दूर, यदि गंगा जैसी देवतुल्य नदी को भी त्रिआयामी अविरलता सुनिश्चित करने के लिये मुँह तक नहीं खोलना चाहते, तो घुटने दो गंगा का गला; बन्द करो स्वयं को गंगापुत्र और गंगापुत्री कहना। ‘नमामि गंगे’ के कर्णधार भी बन्द करेे निर्मलता के नाटक। इस कारण यदि माँ गंगा अन्ततः मर भी गई, तो कम-से-कम भारत को कर्जदार और भ्रष्टाचारी बनाने की वाहक बनकर तो नहीं मरेगी; जनता पर कर लादकर जुटाया बेशकीमती धन बचेगा, सो अलग।


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    आर्द्रभूमि को लेकर सूख रही आँखों की नमी

    RuralWaterThu, 02/01/2018 - 16:30

    विश्व आर्द्रभूमि दिवस 2 फरवरी 2018 पर विशेष


    लोकटक झीललोकटक झील2 फरवरी को दुनिया भर में विश्व आर्द्रभूमि (वेटलैंड्स) दिवस मनाया जाता है। सन 1971 में इसी दिन वेटलैंड्स को बचाने के लिये ईरान के रामसर में पहला सम्मेलन किया गया था। इसलिये इस सम्मेलन को रामसर सम्मेलन (कन्वेंशन) भी कहा जाता है।

    इस कन्वेंशन में एक अन्तरराष्ट्रीय समझौता किया गया था। इस समझौते की बुनियाद में विश्व भर की आर्द्रभूमि की सुरक्षा का संकल्प था।

    पहला कन्वेंशन सन 1971 में हुआ था, लेकिन 2 फरवरी को विश्व आर्द्रभूमि दिवस के रूप में पालन करने का सिलसिला सन 1997 में शुरू किया गया था। इस साल यह 21वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है।

    हर वर्ष इस खास मौके को सेलिब्रेट करने के लिये एक थीम चुना जाता है। इस वर्ष का थीम है - चिरस्थायी शहरी भविष्य के लिये आर्द्रभूमि।मोटे तौर पर इस थीम के जरिए दीर्घकालिक शहरी विकास में आर्द्रभूमि के महत्त्व को रेखांकित करना है।

    कन्वेंशन के नीति-निर्धारक अंग की बैठक हर तीन साल पर आयोजित की जाती है। वर्ष 2015 में उरुग्वे में बैठक हुई थी। इस वर्ष दुबई में होनी है।

    गुजिस्ता साल विश्व आर्द्रभूमि दिवस का थीम ‘आपदा का जोखिम कम करने में आर्द्रभूमि की भूमिका’था। इससे पूर्व ‘हमारे भविष्य के लिये आर्द्रभूमि’, ‘पानी की देखरेख के लिये आर्द्रभूमि’, ‘स्वस्थ वेटलैंड्स स्वस्थ लोग’, ‘आर्द्रभूमि की विविधता में सम्पत्ति है, इसे खो मत दीजिए’, ‘आर्द्रभूमि नहीं तो पानी नहीं’, ‘पर्वत से सागर तक वेटलैंड्स हमारे लिये कर रहा काम’जैसे थीमों के साथ विश्व आर्द्रभूमि दिवस मनाया जा चुका है।

    ईस्ट कोलकाता वेटलैंडऊपर जिन थीमों का जिक्र किया गया है, उनसे साफ हो जाता है कि आर्द्रभूमि मानव सभ्यता के अस्तित्व के लिये बेहद जरूरी है।

    आर्द्रभूमि के महत्त्व की चर्चा करने से पहले हम यह समझने की कोशिश करते हैं कि आर्द्रभूमि क्या है और तालाब व झील से यह कितनी अलग है।

    आर्द्रभूमि उस दलदले भूखण्ड को कहा जाता है जिसमें करीब 6 मीटर गहरा पानी हो और वह वर्ष भर जमा रहे। कुछ आर्द्रभूमि में 8-9 महीने तक ही पानी रहता है। आर्द्रभूमि में उगने वाले जलीय पेड़-पौधों की विशेषता भी अलग होती है। इनके अलावा कई और भी खासियत हैं, जो आर्द्रभूमि को तालाब व झीलों से अलग करती है। लेकिन, इन दो विशेषताओं के जरिए आर्द्रभूमि व दूसरी वाटरबॉडीज में अन्तर किया जा सकता है।

    रामसर कन्वेंशन के अनुसार, आर्द्रभूमि ऐसे भूखण्ड को कहा जाता है जो दलदला और पानी से भरा हो, जो प्राकृतिक या कृत्रिम हो और जिसका पानी ठहरा या बहता हुआ हो। रामसर कन्वेंशन के मुताबिक, आर्द्रभूमि में पानी की गहराई 6 मीटर से अधिक नहीं होती है।

    आर्द्रभूमि न केवल बनावट और चरित्र में तालाब व झील से अलग होती है, बल्कि इसका किरदार भी दूसरी वाटरबॉडीज से अलहदा और महत्त्वपूर्ण है।

    आर्द्रभूमि मानव सभ्यता के अस्तित्व और लोगों की कई जरूरी जरूरतों को पूरा करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यही नहीं, पानी को स्वच्छ-साफ रखने, बाढ़ नियंत्रण, कार्बन को सोखने, भूजल स्तर को बनाए रखने और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निबटने में भी आर्द्रभूमि का अहम रोल है। आर्द्रभूमि में शहरों से निकलने वाले गन्दे पानी को प्राकृतिक तरीके से ट्रीट कर उसे सिंचाई लायक बनाने की भी क्षमता होती है।

    इस वर्ष होने वाले कन्वेंशन का थीम शहर में स्थित आर्द्रभूमि और इनका शहरी आबादी के साथ अन्तर्सम्बन्ध पर केन्द्रित है और शहरों की आर्द्रभूमि पर ही सबसे अधिक खतरा भी मँडरा रहा है, इसलिये यह कन्वेंशन बहुत अहम माना जा रहा है।

    उल्लेखनीय है कि केन्द्र सरकार व इसरो द्वारा सेटेलाइट इमेजरी के जरिए देश भर में 2,01,503 वेटलैंड्स के बारे में पता लगाया गया है।

    पोंग बाँध वेटलैंडरामसर कन्वेंशन ने वर्ष 2016 तक विश्व भर की 2266 आर्द्रभूमि को अन्तरराष्ट्रीय महत्त्व का घोषित किया है इनमें 26 आर्द्रभूमि भारत की है।

    इनमें पश्चिम बंगाल का ईस्ट कोलकाता वेटलैंड्स, उत्तर प्रदेश का ऊपर गंगा, त्रिपुरा का रुद्रसागर, तमिलनाडु का प्वाइंट कैलिमेरे, राजस्थान के केवलादेव व सम्भर, पंजाब के हरिके, कांजली और रोपर, ओड़िशा के चिल्का व भतरकनिका, मणिपुर का लोकटक, केरल के अष्टमुडी, सस्थामकोट्टा और वेमबनाद कोल, मध्य प्रदेश का भोज, जम्मु-कश्मीर के वुलर, सो मोरारी, होकरसर, मनसर व सुरिनसर, हिमाचल प्रदेश के पोंगडैम, चंद्रताल व रेणुका, गुजरात का नमसरोवर बर्ड सेंचुरी, असम का दीपर बिल और आन्ध्र प्रदेश का कोल्लेरू शामिल है। इनमें सबसे बड़ी आर्द्रभूमि वेमबनाद कोल है, जो 3,73,700 एकड़ में फैला हुआ है।

    पूरी दुनिया में आज विश्व आर्द्रभूमि दिवस का पालन किया जा रहा है। तो इस मौके पर भारत के सन्दर्भ में ये पूछा जाना चाहिए कि इन दो दशकों की अवधि में आर्द्रभूमि को कितना संरक्षण मिला और क्या मौजूदा सूरत-ए-हाल इतना सन्तोषजनक है कि हम खुश हो जाएँ?

    इन सवालों की पृष्ठभूमि में अगर हम बीते कुछ वर्षों की मीडिया रपट और सरकारी आँकड़ों पर गौर करें, तो पाएँगे कि भारत में पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक के क्षेत्रों में स्थित आर्द्रभूमि के अस्तित्व पर गम्भीर खतरा मँडरा रहा है।

    द ट्रिब्यून की एक रिपोर्ट के अनुसार जम्मू-कश्मीर के बंदीपोरा जिले में स्थित एशिया की वृहत्तर आर्द्रभूमि में शुमार वुलर लेक का क्षेत्रफल 157 वर्ग किलोमीटर था, जो वर्ष 2007 तक आते-आते घटकर 86 वर्ग किलोमीटर पर आ गया। बताया जाता है कि इसके 40 फीसद हिस्से को कृषि भूमि में तब्दील कर दिया गया है। इस लेक से आसपास रहने वाले 80 हजार लोगों की आजीविका चलती है।

    वुलर की तरह ही डाल और निगील झील के अस्तित्व पर भी संकट मँडरा रहा है।

    असम के गुवाहाटी में स्थित डीपोर आर्द्रभूमि के किनारे कूड़ा डम्प किया जा रहा है जिस कारण यह गन्दा हो रहा है।

    इसी तरह वर्ष 2002 में रामसर साइट्स के रूप में चिन्हित ईस्ट कोलकाता वेटलैंड्स पर भी अतिक्रमण का आक्रमण तेज है। यह आर्द्रभूमि कोलकाता और आसपास के क्षेत्र से निकलने वाले 250 मिलियन लीटर गन्दे पानी का प्राकृतिक तरीके से परिशोधन करती है और कार्बन भी सोखती है।

    चिल्का झील‘नॉट ए सिंगल बिल बोर्ड: द शिफ्टिंग प्रायरिटी इन लैंड यूज विदिन द प्रोटेक्टेड वेटलैंड्स ऑफ ईस्ट कोलकाता’नाम से किये गए एक रिसर्च के अनुसार सन 2002 में जब ईस्ट कोलकाता वेटलैंड्स को रामसर साइट्स घोषित किया गया था, तब इसके दक्षिण 24 परगना में पड़ने वाले भगवानपुर मौजा (जो वेटलैंड्स का हिस्सा है) में 88.38 फीसद आर्द्रभूमि थी, जो वर्ष 2007 में घटकर 57.15 प्रतिशत पर आ गई। यह वेटलैंड्स अच्छी-खासी आबादी के लिये रोजी-रोटी का भी जरिया है।

    साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रीवर्स एंड पीपल्स की ओर से 2 फरवरी 2017 को प्रकाशित की गई एक रिपोर्ट के अनुसार राजस्थान, यूपी, हरियाणा, गुजरात, गोवा, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, असम, ओड़िशा, मणिपुर, आन्ध्र प्रदेश तेलंगाना, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु की आर्द्रभूमियों पर संकट के बादल मँडरा रहे हैं। यह रिपोर्ट विभिन्न अखबरों में छपी खबरों के आधार पर तैयार की गई है।

    कुछ साल पहले एम. के. बालकृष्णन की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दायर एक जनहित याचिका में देश भर के 36 आर्द्रभूमियों की शिनाख्त कर उन्हें प्राथमिकता में शामिल करते हुए बचाने की गुहार लगाई गई थी।

    इन 36 आर्द्रभूमि में जम्मू-कश्मीर की तीन, पंजाब की चार, हिमाचल प्रदेश की तीन, चंडीगढ़ की एक, उत्तर प्रदेश की एक, उत्तराखण्ड की एक, बिहार की एक, झारखण्ड की एक, राजस्थान की दो, हरियाणा की एक, सिक्किम की एक, गुजरात की एक, मध्य प्रदेश की एक, पश्चिम बंगाल की दो, असम की एक, मणिपुर की एक, त्रिपुरा की एक, हैदराबाद की एक, कर्नाटक की दो, आन्ध्र प्रदेश की दो, तमिलनाडु की एक और केरल की भी एक आर्द्रभूमि शामिल थीं।

    देश भर के इन वेटलैंड्स की यह हालत तब है, जब इसको लेकर केन्द्रीय कानून बन चुका है। केन्द्र सरकार ने सन 2010 में आर्द्रभूमि संरक्षण व प्रबन्धन अधिनियम (2010) बनाया था। इसका उद्देश्य था आर्द्रभूमि को सुरक्षित व संरक्षित करना। लेकिन, कानून बन जाने के बावजूद आर्द्रभूमि की सुरक्षा नहीं हो पा रही है।

    ज्यादातर मामलों में देखा जा रहा है कि आर्द्रभूमि को पाटकर उन पर कंक्रीट के जंगल उगाए जा रहे हैं। कुछ जगहों पर आर्द्रभूमि को डम्पिंग ग्राउंड में तब्दील कर दिया गया है। वहीं, कई मामलों में राज्य व केन्द्र सरकार की तरफ से भी कोताही सामने आई है।

    ‘नॉट ए सिंगल बिल बोर्ड: दी शिफ्टिंग प्रायरिटी इन लैंड यूज विदिन द प्रोटेक्टेड वेटलैंड्स ऑफ ईस्ट कोलकाता’ नाम से छपे शोध पत्र में शोधकर्ताओं ने बताया है कि आर्द्रभूमि को भरकर वहाँ घर बनाकर लोग रहने लगे हैं। शोध में यह भी पाया गया कि राज्य सरकार का रवैया इस मामले में बेहद शर्मनाक रहा। शोध में बताया गया है कि समय के साथ लैंड यूज में बदलाव आता गया, जिसने ईस्ट कोलकाता वेटलैंड्स को बहुत नुकसान पहुँचाया।

    घराना वेटलैंडइन सबके बीच केन्द्र सरकार वर्ष 2010 बनाए गए आर्द्रभूमि संरक्षण व प्रबन्धन अधिनियम में तब्दीली करना चाह रही है। माना जा रहा है कि इस बदलाव से आर्द्रभूमि को संरक्षण मिलना तो दूर, उल्टे उन्हें नष्ट करना आसान हो जाएगा।

    सामाजिक कार्यकर्ता व लेखक नित्यानंद जयरमण ने अपने एक लेख में इस सम्बन्ध में लिखा है कि नए नियम में अधिसूचित आर्द्रभूमि के संरक्षण की बात कही गई है। लेकिन, इसमें राज्य सरकार को यह अधिकार दिया गया है कि वह अगर चाहे तो अपने अधिकार क्षेत्र में पड़ने वाली अर्द्रभूमि के किसी हिस्से को डम्पिंग ग्राउंड में तब्दील कर सकती है। केन्द्र सरकार इसमें हस्तक्षेप नहीं करेगी। साथ ही नए नियम में गैर-अधिसूचित आर्द्रभूमि के संरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है।

    वह आगे लिखते हैं, ‘नए नियम के तहत उन्हीं आर्द्रभूमि को सुरक्षा मिल सकती है जो रामसर कन्वेंशन के तहत अन्तरराष्ट्रीय महत्त्व की आर्द्रभूमि की सूची में शामिल हो या फिर राज्य या केन्द्र सरकार द्वारा अधिसूचित हो।’

    हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने हालिया सुनवाई में आर्द्रभूमि संरक्षण व प्रबन्धन अधिनियम के नए नियम को लागू करने पर रोक लगा दी है, जो राहत देने वाली खबर है।

    बहरहाल, मौजूदा हालात अगर जारी रहे और आर्द्रभूमि की इसी तरह अनदेखी की जाती रही, तो इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

    विशेषज्ञों के मुताबिक, आर्द्रभूमि का इसी तरह अतिक्रमण होता रहा, तो बाढ़ का खतरा बढ़ेगा क्योंकि आर्द्रभूमि बाढ़ के पानी को बसाहट वाले क्षेत्रों में जाने से रोकती है। आर्द्रभूमि में कई प्रकार के वन्य जीव पाये जाते हैं। इनका अस्तित्व आर्द्रभूमि के समाप्त होते ही खत्म हो जाएगा। यही नहीं, आर्द्रभूमि के खत्म होने से ग्राउंड वाटर का रिचार्ज बाधित होगा और मछलियों का उत्पादन भी घटेगा। इन सबके साथ ही आर्द्रभूमि के नहीं रहने पर वायु प्रदूषण बेतहाशा बढ़ जाएगा, क्योंकि आर्द्रभूमि कार्बन को सोखती भी है। आर्द्रभूमि से लाखों लोगों की रोजी-रोटी जुड़ी है, उनको रोजी-रोजगार के लाले पड़ेंगे, सो अलग।

    कुल मिलाकर आर्द्रभूमि के अतिक्रमण का फौरी लाभ भले ही मिल जाये, लेकिन दीर्घकाल में इससे नुकसान-ही-नुकसान होगा। इसलिये जरूरी है कि आर्द्रभूमि के संरक्षण को प्राथमिकता की सूची में डाला जाये और इस पर गम्भीरता से काम किया जाये।


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    चला गया ईस्ट कोलकाता वेटलैंड्स का प्रहरी

    RuralWaterFri, 02/16/2018 - 18:04


    विनम्र श्रद्धांजलि- (16 फरवरी 2018), डॉ. ध्रुव ज्योति घोष के जाने से ईस्ट कोलकाता वेटलैंड आज अनाथ हो गया।

    डॉ. ध्रुव ज्योति घोेषडॉ. ध्रुव ज्योति घोेषप्रकृति-पर्यावरण को लेकर कुछ लोगों के काम को देखकर अनायास ही यह ख्याल जेहन में कौंध जाता है कि उनका इस धरती पर आने का उद्देश्य ही यही रहा होगा।

    पानी को लेकर काम करने वाले अनुपम मिश्र के बारे में ऐसा ही कहा जा सकता है। कोलकाता में रह रहे एक और शख्स के काम को देखकर यही ख्याल आता है। वह शख्स थे डॉ. ध्रुवज्योति घोष।

    शुक्रवार (16 फरवरी 2018) को हार्ट अटैक से उनका निधन हो गया। वह 71 साल के थे। कुछ समय से उनकी तबियत नासाज थी और वह अस्पताल में भर्ती थे। उनके जाने की खबर जब मुझ तक पहुँची, तो यक-ब-यक उनकी मखमली आवाज मेरे कानों में गूँजने लगी।

    ईस्ट कोलकाता वेटलैंड्स को लेकर मैंने कई स्टोरीज लिखी और इस सिलसिले में उनसे कई दफे फोन पर बात हुई। हर बार की बातचीत में वह ईस्ट कोलकाता वेटलैंड्स पर अतिक्रमण के हमले और इस बड़ी आर्द्रभूमि को हो रहे नुकसान पर वह चिन्ता व्यक्त करते।

    ईस्ट कोलकाता वेटलैंड्स पर कोई भी स्टोरी उनकी बातचीत के बिना मुकम्मल नहीं होती थी। यही वजह रही कि द गार्जियन ने दो साल पहले उन पर एक वृहत प्रोफाइल स्टोरी की थी।

    वह एक साथ इंजीनियर, पर्यावरणविद, मानव विज्ञानी और वेटलैंड्स का चलता-फिरता शब्दकोश थे। उनके साथ काम करने वाली ध्रुवा दासगुप्ता कहती हैं, ‘उनके पास अनुभव का भण्डार था। उनसे सीखने को बहुत कुछ था।’

    डॉ घोष इकोलॉजी में पीएचडी थे। यहाँ यह भी बता दें कि वह इकोलॉजी में पीएचडी करने वाले पहले इंजीनियर थे।

    उन्होंने राज्य सरकार के पर्यावरण विभाग के मुखिया और नेशनल वेटलैंड कमेटी के सदस्य के बतौर भी कार्य किया था। यही नहीं, वह वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर के बोर्ड ऑफ ट्रस्टी के सदस्य भी रहे व इसके साथ ही इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर के साथ भी काम किया।

    बहुत कम लोगों को पता होगा कि ईस्ट कोलकाता वेटलैंड्स को यह नाम ध्रुव ज्योति घोष ने ही दिया था। दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि ईस्ट कोलकाता वेटलैंड्स कोलकाता शहर के अस्तित्व के लिये कितना जरूरी है, इसका पता पहले पहल उन्होंने लगाया। इस लिहाज से वह इस आर्द्रभूमि के अभिभावक भी थे। इस आर्द्रभूमि की चमत्कारिक प्रकृति की खोज भी उन्होंने ही की थी।

    ईस्ट कोलकाता वेटलैंड्स की चमत्कारिक प्रकृति की खोज की कहानी भी बेहद दिलचस्प है जिसका यहाँ जिक्र जरूर किया जाना चाहिए ताकि हम समझ सकें कि ध्रुव ज्योति घोष किस समर्पण के साथ अपने दायित्व को अंजाम दिया था।

    यह कोई साल 1981 की बात होगी। वह उस वक्त इंजीनियर थे। उन दिनों न तो सरकार और न ही कोलकाता के आम लोगों को ही पता था कि कोलकाता शहर से निकलने वाला हजारों लीटर गन्दा पानी आखिर जाता कहाँ है।

    उन्हीं दिनों ध्रुवज्योति घोष को यह पता लगाने का दायित्व सौंपा गया कि आखिर कोलकाता का गन्दा पानी किस जगह जा रहा है और उसका क्या हो रहा है। इस टास्क को पूरा करने के लिये वह रोज कोलकाता से उस आर्द्रभूमि तक जाते थे, जिसको उस वक्त तक कोई नाम नहीं मिला था।

    उन्होंने लम्बे समय तक शोध कर यह पाया कि आर्द्रभूमि में अद्भुत तरीके से प्राकृतिक तौर पर गन्दे पानी का परिशोधन हो जाता है। इसमें आर्द्रभूमि में मौजूद बैक्टीरिया व सूरज की रोशनी का अहम किरदार था। यह तथ्य मिलना था कि डॉ घोष चौंक गए और इस आर्द्रभूमि को न केवल नाम दिया बल्कि इसके संरक्षण का दायित्व भी अपने कंधे पर ले लिया।

    उनके शोध के कारण ही दुनिया यह जान सकी कि इस आर्द्रभूमि में प्राकृतिक तरीके से सीवेज के पानी की सफाई हो जाती है और इसके साथ आने वाली गन्दगी मछलियों के भोजन के काम में आती है। इससे पहले इस आर्द्रभूमि की पहचान ऐसी जलाभूमि के रूप में थी जहाँ मछलीपालन किया जाता था।

    शोध में उन्हें पता चला था कि आर्द्रभूमि में ऐसी बैक्टीरिया हैं जिनकी मदद से महज 20 दिनों में ही सूरज की रोशनी से गन्दा पानी परिशोधित होकर मछलियों के खाद्य में तब्दील हो जाता है। साथ ही इस पानी का इस्तेमाल फसलों की सिंचाई के लिये भी किया जाता है।

    बताया जाता है कि एक मछुआरे ने इस तकनीक की शुरुआत की थी। यह तकरीबन 9 दशक पहले की बात होगी। यह तकनीक इतनी प्रख्यात हुई कि दूसरे मछुआरों ने भी इसे अपनाना शुरू कर दिया। कहते हैं इस तकनीकी से ही प्रभावित होकर उस वक्त इंजीनियर भूपेंद्रनाथ डे ने सीवेज पाइपलाइन का निर्माण किया था और उसे इस आर्द्रभूमि से जोड़ दिया गया था।

    सबसे पहले उन्होंने ईस्ट कोलकाता वेटलैड्स का मैप तैयार किया और इसके क्षेत्रफल के बारे में पता लगाया। इसके बाद उन्होंने इसके संरक्षण का काम शुरू किया।

    प्रसिद्ध कृषि विज्ञानि एमएस स्वामिनाथन ने 13 साल पहले ध्रुवज्योति घोष के बारे में लिखा था, ‘मेरी नजर में डॉ. घोष कल्याणकारी पारिस्थितिकी के लिये ठीक उसी तरह आन्दोलन चला रहे हैं, जिस तरह प्रो अमर्त्य सेन कल्याणकारी अर्थव्यवस्था के लिये आन्दोलनरत हैं।’

    ईस्ट कोलकाता वेटलैंड्स को वह इतने करीब से जानते-समझते थे कि बीबीसी के साथ इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, ‘आप मुझे गरीबी व सूरज की रोशन दीजिए, मैं आपको साफ पानी दूँगा।’

    यह उनके प्रयासों का ही परिणाम था कि ईस्ट कोलकाता वेटलैंड्स को 19 अगस्त 2002 को रामसर कनवेंशन में अन्तरराष्ट्रीय महत्त्व के वेटलैंड्स की सूची में शामिल किया गया।

    सन 1990 में जब पश्चिम बंगाल में रीयल एस्टेट का कारोबार अपने उफान पर था तो राज्य सरकार ने इस आर्द्रभूमि पर वर्ल्ड ट्रेड सेंटर बनाने का फैसला लिया था। श्री घोष इस फैसले के खिलाफ खड़े हो गए थे और अन्त में मामला कलकत्ता हाईकोर्ट में पहुँचा जहाँ उनकी जीत हुई।

    तब से लेकर अब तक वह लगातार ईस्ट कोलकाता वेटलैड्स को संरक्षित रखने के लिये चुपचाप काम करते रहे।

    उनके काम के प्रसन्न संयुक्त राष्ट्र ने उन्हें ‘ग्लोबल 500’ अवार्ड से सम्मानित किया था।

    उन्होंने समुदाय आधारित वेस्टवाटर ट्रीटमेंट व रियूज की डिजाइन तैयार की थी जिसका इस्तेमाल बाद में केन्द्र सरकार ने गंगा एक्शन प्लान के तहत किया।

    डॉ घोष ‘ट्रैश डीगर्स: रीथिंकिंग सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट इन अर्बन इण्डिया’ व ‘ईकोसिस्टम मैनेजमेंट’ नाम की किताबें लिख चुके हैं। उन्होंने कई शोधपत्र भी तैयार किया है।

    ईस्ट कोलकाता वेटलैंड्स को लेकर कई पर्यावरण विशेषज्ञों ने हाल ही में एक शोध पत्र तैयार किया था। रिपोर्ट तैयार करने में ध्रुवज्योति घोष भी शामिल थे।

    शोध पत्र में बताया गया था कि किस तरह ईस्ट कोलकाता वेटलैंड्स के हिस्सों को पाटकर वहाँ निर्माण कार्य किया जा रहा है।

    इस सिलसिले में जब उनसे फोन पर मैंने बात की थी, तो उन्होंने कहा था, ‘जिस तरह से वेटलैंड्स का अतिक्रमण किया जा रहा है, अगर ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो आने वाले 20-25 वर्षों में हम अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुके ईस्ट कोलकाता वेटलैंड्स को खो देंगे और अगर ऐसा होता है, तो हमारा बहुत बड़ा नुकसान हो जाएगा, जिसकी भरपाई कभी नहीं हो पाएगी।’

    ध्रुवज्योति घोष का जाना ईस्ट कोलकाता वेटलैंड्स के अभिभावक का जाना है। उनके इस तरह चले जाने से ईस्ट कोलकाता वेटलैंड्स भी आज उदास होगा। उसकी रक्षा के लिये हमेशा दीवार की तरह खड़ा रहने वाला जो चला गया।

     

     

     

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    कावेरी का अपना-अपना पानी

    RuralWaterSat, 02/17/2018 - 14:49


    कावेरी नदीकावेरी नदीप्रकृति ने जल से लेकर जंगल तक बिना किसी भेदभाव के अपनी सम्पदा मानव को दे दी थी और साथ ही अधिकार भी कि जो भी प्राकृतिक है वो तुम्हारा है। मनुष्य ने अपनी स्वार्थी प्रवृत्ति के चलते प्राकृतिक जल के बँटवारे कर डाले और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में लोग बरसों से पानी-पानी करते जल का बँटवारा करते आ रहे हैं। महासागरों का बँटवारा हो सकता है तो हमारे देश की कावेरी नदी को बाँटना कोई बड़ी बात नहीं लगती।

    16 फरवरी 2018 का दिन कावेरी के जल बँटवारे का खास दिन बन गया है। लगभग 120 सालों से भारत के तीन दक्षिणी प्रदेशों कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल के बीच कावेरी जल बँटवारे को लेकर बने मतभेदों को किसी नतीजे पर पहुँचा दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने अन्ततः अपना फैसला सुनाते हुए कावेरी से अपना-अपना पानी लेने के लिये चारों प्रदेशों को आदेश दे दिये हैं।

    कावेरी जल विवाद पर आये सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के अनुसार कावेरी नदी के 177.25 अरब क्यूबिक फीट पानी को तमिलनाडु, 284.75 अरब क्यूबिक फीट पानी को कर्नाटक, 30 अरब क्यूबिक फीट पानी को केरल और 7 अरब क्यूबिक फीट पानी को पुडुचेरी अपना पानी कहेगा।

    पेयजल को सर्वाधिक महत्त्व देते हुए बंगलुरु के निवासियों की 4.75 अरब क्यूबिक फीट पेयजल एवं 10 अरब क्यूबिक फीट भूजल आवश्यकताओं के आधार पर कर्नाटक के लिये कावेरी जल का 14.75 अरब क्यूबिक फीट आवंटन बढ़ाया गया है। जबकि तमिलनाडु को न्यायाधिकरण द्वारा वर्ष 2007 में निर्धारित जल से 14.75 अरब क्यूबिक फीट पानी कम दिया जाएगा। कावेरी जल आवंटन पर सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला आगामी 15 वर्षों तक लागू रहेगा। सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक सरकार को निर्देश दिया है कि वह तुरन्त अपने अन्तरराज्यीय बिलीगुंडलु बाँध से कावेरी नदी का निर्धारित जल तमिलनाडु के लिये छोड़े। इस तरह कावेरी का अपना-अपना पानी चारों प्रदेशों को मिल गया। अच्छा है विवाद सुलझ गया।

    पिछले एक सौ बीस सालों से भारत के पश्चिमी घाट में स्थित कर्नाटक के तालकावेरी कोडगु से उद्भवित कावेरी पहाड़ी क्षेत्र से उतरकर केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी राज्यों के प्रमुख शहरों जैसे कुशालनगर, मैसूर, श्रीरंगापटना, त्रिरुचिरापल्ली, तंजावुर और मइलादुथुरई से गुजरती हुई बंगाल की खाड़ी में मिलती थी, तो बरसों की अपने-अपने पानी की झिकझिक उसे उन्मुक्त कलकल ध्वनि भी नहीं करने देती थी। इतना मेरा पानी, इतना तुम्हारा पानी की रोज-रोज की किल्लत कावेरी के जल में खटास भरती गई।

    लोगों ने कोवेरी को तमिलनाडु के 44000 वर्ग किलोमीटर और कर्नाटक के 32000 वर्ग किलोमीटर तटीय क्षेत्रों में कब का बाँट दिया था और उसके पानी पर अपना हक जताने के लिये व्यर्थ के विवादों में शतकीय समय बर्बाद कर दिया। कावेरी का पानी मुझे ज्यादा मिले के चक्करों में तमिलनाडु और कर्नाटक एक दूसरे के दुश्मन बन गए तथा केरल और पुडुचेरी भी इस दुश्मनी में शामिल हो गए।

    इतिहास में बहुत कुछ ऐसा घटित हो जाता है, जो भविष्य के लिये नासूर बन जाता है। कावेरी का जल नासूर हो जाएगा शायद ही इसकी आशंका कभी दसवीं सदी में तमिलनाडु के उन चोल राजाओं को रही होगी, जिन्होंने सिंचाई के लिये कावेरी नदी पर चेक डैम और रिजर्वायर बनवा दिया था। तब से सिंचाई के लिये पूरी तरह से कावेरी नदी के पानी पर निर्भर तमिलनाडु की करीब 30 लाख एकड़ कृषि भूमि कावेरी के उतने पानी को अपना-अपना कहती रही है। इसके बाद जब इतिहास में 1934 में मैसूर रियासत ने पहली बार कृष्ण राज सागर नाम का पहला रिजर्वायर कावेरी पर बनवा दिया, तो तब से आज के कर्नाटक वाले कावेरी के उतने पानी को अपना-अपना मानने लगे।

    ऐसे देखा जाये तो इतिहास कहता है कि तमिलनाडु और कर्नाटक का यह कावेरी नाटक लगभग 150 सालों से चला आ रहा है। अंग्रेजों ने भारत में भाषा से लेकर पानी तक ऐसा कोई विषय नहीं छोड़ा, जो आज भी हम भारतीयों को लड़वाता रहता है। समझौते यानि तथाकथित समझौते करना ब्रिटिश शासकों से ही भारत ने सीखा. कागज पर और, हकीकत में कुछ और। कावेरी के अपने-अपने पानी कहने के पीछे भी ब्रिटिश शासकों द्वारा 1892 में करावाया गया मद्रास प्रेसीडेंसी और मैसूर रियासत के बीच कावेरी नदी के पानी के बँटवारे का समझौता अपनेआप में लड़ाई की जड़ ही था।

    ब्रिटिश 1947 में भले ही चले गए, पर बहुत से ऐसे मसले छोड़ गए कि भारतीय अलग-अलग मामलों में प्रादेशिक स्तर पर आज भी झगड़ते रहते हैं और तत्कालीन ब्रिटिश शासकों की आत्माएँ तृप्त होती रहती हैं। ये अलग बात है कि स्वतंत्र भारत में जब संविधान का निर्माण हुआ, तो पानी जैसे विषय को भी संवैधानिक धाराओं में बाँधा गया था, जिससे भारतीय नागरिक, प्रशासन और सरकारें प्रदेश और देश के स्तर पर जल के अन्य स्रोतों के साथ-साथ नदियों के पानी को अपना कहने के पहले संवैधानिक प्रावधानों का अनुपालन करें। देश की नदियाँ दो परिभाषाओं में बँट गईं एक ही राज्य के भीतर बहने वाली नदी अन्तराराज्यीय और दो या अधिक राज्यों से होकर बहने वाली नदी अन्तरराज्यीय कही जाने लगी। इस दृष्टि से कावेरी भारत की अन्तरराज्यीय नदी हुई।

    कृष्ण सागर बाँधभारतीय संविधान में इन अन्तरराज्यीय नदियों के पानी को लेकर कोई लड़ाई झगड़ा न हो या कि कोई विवाद न हो, इस बात की आशंका को ध्यान में रखते हुए स्पष्ट शब्दों में देश के वनों, झीलों, नदियों और वन्यजीवन सहित समस्त प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करने, उसे बेहतर बनाने और जीवित प्राणियों के प्रति दया भाव रखने को मौलिक अधिकार का रूप प्रदान कर दिया। इसके बावजूद भी यदि कोई विवाद उत्पन्न हो जाता है तो उसको सुलझाने के लिये केन्द्र सरकार को अधिकार दिये गए हैं।

    साथ ही संविधान में राज्य सरकारों को अपने-अपने राज्यों में जलस्रोतों जैसे उनके ही राज्य के भीतर बहने वाली किसी नदी से सम्बन्धित अपने कानून बनाने के अधिकार भी दिये गए हैं। किन्तु एक से अधिक राज्यों में बहने वाली अन्तरराज्यीय नदियों के लिये वैधानिक प्रावधान अलग हैं, क्योंकि इनसे सम्बन्धित कानून बनाने का अधिकार केन्द्र सरकार को दिया गया है।

    इन परिस्थितियों में राज्य सरकारें ऐसी नदियों के पानी को अपना समझकर उपयोग करने के लिये संसद द्वारा तय की गई सीमाओं में बँधी होती हैं। कावेरी भी तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल और पुडुचेरी राज्यों से लेकर केन्द्र सरकार और भारतीय संविधान के प्रावधानों में बँध गई थी। इस सबके बीच 1960 में कर्नाटक सरकार ने कावेरी की सहायक नदियों पर चार बड़े रिजर्वायरों का निर्माण करवाया तो तमिलनाडु के इस पर कड़े विरोध जताने के कारण कावेरी के जल को लेकर विवाद बढ़ने लगा। दोनों राज्यों में नदियों को लेकर बनाए गए कानूनों की खोजपटक शुरू हो गई।

    भारत में नदियों को लेकर और भी कई नियम कानून हैं, जिनमें नदी बोर्ड अधिनियम-1956, अन्तरराज्यीय जल विवाद अधिनियम-1956, जल न्यायाधिकरण, पंचायती राज कानून की धारा 92 के अन्तर्गत ग्राम पंचायत को जल समितियाँ बनाने के अधिकार शामिल हैं। इन्हीं प्रावधानों के अन्तर्गत जुलाई 1986 में तमिलनाडु ने अन्तरराज्यीय जल विवाद अधिनियम (1956) के तहत इस मामले को सुलझाने के लिये आधिकारिक तौर पर केन्द्र सरकार से एक न्यायाधिकरण के गठन किये जाने का निवेदन किया था।

    हालांकि तत्कालीन केन्द्र सरकार आपसी बातचीत के माध्यम से इस विवाद को सुलझाना चाहती थी। लेकिन तमिलनाडु के किसानों की याचिका की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार को इस मामले में न्यायाधिकरण गठित करने का निर्देश देना पड़ा था। अतः सुप्रीम कोर्ट के आदेश को मानते हुए केन्द्र सरकार ने 2 जून 1990 को ‘द कावेरी वाटर डिस्प्यूट ट्रिब्यूनल’ नामक न्यायाधिकरण का गठन किया था। इसके बाद 1991 में न्यायाधिकरण ने एक अन्तरिम आदेश पारित किया था जिसमें कहा गया था कि कर्नाटक कावेरी जल का एक तय हिस्सा तमिलनाडु को देगा।

    हर महीने कितना पानी छोड़ा जाएगा, यह भी तय किया गया लेकिन इस पर कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ। इस बीच तमिलनाडु इस अन्तरिम आदेश को लागू करने के लिये जोर देने लगा। इस आदेश को लागू करने के लिये एक याचिका भी उसने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की। इस तरह कावेरी का पानी अपने-अपने राज्यीय अधिकारों को पाने के लिये कानूनों के मन्दिरों में बहने लगा।

    ‘द कावेरी वाटर डिस्प्यूट ट्रिब्यूनल’ ने 16 साल की सुदीर्घ सुनवाई के बाद 2007 में विवाद निपटाने के लिये कावेरी के पानी के अपने-अपने कहलाने वाले दावों को सुलझाने के लिये एक निर्णय दिया कि प्रतिवर्ष तमिलनाडु कावेरी के 419 अरब क्यूबिक फीट पानी को अपना कहेगा और कर्नाटक 270 अरब क्यूबिक फीट पानी को अपना कहेगा। वहीं केरल और पुडुचेरी क्रमशः 30 अरब क्यूबिक फीट और 7 अरब क्यूबिक फीट पानी को अपना-अपना कहेंगे। कावेरी बेसिन में 740 अरब क्यूबिक फीट पानी मानते हुए ट्रिब्यूनल’ ने यह फैसला दिया था।

    लेकिन विडम्बना यह हुई कि कर्नाटक के मंड्या और मैसूर जिले एवं तमिलनाडु के तंजावुर, तिरुवरुर, नागपट्टनम और इरोड जिलों में कावेरी के पानी का फसलों की सिंचाई में सर्वाधिक उपयोग करने वाले लोगों से लेकर अन्य कावेरी प्रेमियों तक की प्यासें इन अपने-अपने मिलने पानी से बुझना नहीं चाहती थीं और अहंकार आड़े आये।

    कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में विशेष समीक्षा याचिका दायर हो गई। अपने पानी की लगभग 95 प्रतिशत मात्रा उपयोग करवाने वाली देश की एकमात्र 802 किलोमीटर लम्बी कावेरी, दक्षिण भारत की सिंचाई का प्रमुख साधन कावेरी, मानसून पर निर्भर कावेरी एक बार फिर इंसाफ की चाह में कराहने लगी।

    पाँच साल बाद सन 2012 में तत्कालीन प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाले कावेरी नदी प्राधिकरण ने कर्नाटक सरकार को निर्देश दिया कि वो रोज तमिलनाडु को नौ हजार क्यूसेक पानी दे। सुप्रीम कोर्ट ने भी कर्नाटक को फटकार लगाते हुए कहा कि वो इस फैसले पर अमल नहीं कर रहा है। कर्नाटक सरकार ने इसके लिये माफी माँगी और पानी जारी करने की पेशकश की। लेकिन इसे लेकर वहाँ हिंसक प्रदर्शन शुरू हो गए।

    कावेरी के पानी में अब हिंसा का सैलाब भी मिलने लगा था, विवाद सुलझने के बजाय उलझने लगा था। कावेरी अपने-अपने पानी के झगड़े के साथ एक बार फिर कर्नाटक के पानी रोक देने की बात को लेकर तमिलनाडु की तरफ से अगस्त में सुप्रीम कोर्ट पहुँचा दी गई। तमिलनाडु का कहना था कि ट्रिब्यूनल के निर्देशों के अनुसार उसे पानी दिया जाये। तब पुनः अदालत ने कर्नाटक सरकार से कहा अगले 10 दिन तक तमिलनाडु को 12 हजार क्यूसेक पानी देने का आदेश दिया। लेकिन इससे कर्नाटक में लोग फिर सड़कों पर उतर आये। कावेरी सड़कों पर आ गई थी और आदेश परिहास की सीमाओं में।

    5 सितम्बर 2016 को सुप्रीम कोर्ट ने फिर एक आदेश जारी करते हुए कर्नाटक को निर्देश दिया कि वह लगातार 10 दिन तक तमिलनाडु को 15 हजार क्यूसेक पानी की आपूर्ति करें। इस पर कर्नाटक सरकार ने कावेरी ट्रिब्यूनल के आदेश में रद्दोबदल के लिये सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगा दी।

    सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने आदेश में बदलाव करते हुए तमिलनाडु को 20 सितम्बर 2016 तक हर दिन 12 हजार क्यूसेक पानी छोड़ने का आदेश पारित कर दिया। लेकिन कर्नाटक ने अपनी जरूरतों और पानी की किल्लत का हवाला देते हुए तमिलनाडु को पानी देने से मना कर दिया। फिर सुप्रीम कोर्ट ने 18 अक्टूबर 2016 को अपने अगले आदेश तक कर्नाटक सरकार से तमिलनाडु के लिये हर दिन 2 हजार क्यूसेक पानी छोड़ने का आदेश दिया।

    अब कावेरी अपने पानी को लिये सुप्रीम कोर्ट के आदेशों और राज्य सरकारों की अवमाननाओं के बीच बहने लगी। तभी 9 जनवरी 2017 को एक नया मोड़ आया जब तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट पहुँचकर आरोप लगाया कि कर्नाटक सरकार ने उसे पानी नहीं दिया इसलिये उसे 2480 करोड़ रुपए का हर्जाना मिलना चाहिए। कावेरी का पानी सुप्रीम कोर्ट के गलियारों में लगभग आठ माहों तक बहते-बहते सूखने को था कि तभी 20 सितम्बर 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने अपना आदेश सुरक्षित रख लिया।

    आज 16 फरवरी, 2018 को कावेरी को इंसाफ मिला है, ऐसा कहा जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि नदी पर किसी का अधिकार नहीं होता। कोर्ट ने अपने हिसाब से राज्यों को उनका अपना-अपना पानी फिर से बाँट दिया है। पर राज्यों की प्यासें मिटेंगी या नहीं भविष्य की घटनाएँ बताएँगी। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल फिर चारों प्रदेशों को कावेरी का अपना-अपना पानी देना चाहा है। जबकि यह कितना बड़ा सच है कि कावेरी ने कभी अपने पानी में किसी को नहीं बाँटना चाहा।
     

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    कीटनाशक - प्रोत्साहन बेहतर या नियमन

    RuralWaterMon, 02/19/2018 - 15:22


    कीटनाशक का छिड़काव करता किसानकीटनाशक का छिड़काव करता किसानकीटनाशकों को लेकर एक फैसला, पंजाब के कृषि एवं कल्याण विभाग ने बीती 30 जनवरी को लिया; दूसरा फैसला, 06 फरवरी को उत्तर प्रदेश की कैबिनेट ने। उत्तर प्रदेश कैबिनेट ने कीट रोग नियंत्रण योजना को मंजूरी देते हुए जैविक कीटनाशकों और बीज शोधक रसायनों के उपयोग के खर्च का 75 प्रतिशत तथा लघु-सीमांत किसानों को कृषि रक्षा रसायनों, कृषि रक्षा यंत्रों तथा दाल, तिलहन व अनाजों के घरेलू भण्डार में काम आने वाली बखारों (ड्रमों) पर खर्च का 50 प्रतिशत अनुदान घोषित किया।उत्तर प्रदेश कैबिनेट का फैसला, उत्तर प्रदेश में कीट प्रकोप के कारण फसलों में 15 से 25 प्रतिशत नुकसान के आँकड़े के आइने में आया।

    पंजाब कृषि व कल्याण विभाग ने कीटनाशकों के कारण इंसान, पर्यावरण तथा आर्थिक व्यावहारिकता के पहलू को सामने रखते हुए आदेश जारी किया। विभाग के विशेष सचिव ने एक निर्देश जारी कर पंजाब में 20 कीटनाशकों की बिक्री पर तुरन्त प्रभाव (30 जनवरी, 2018) से रोक लगा दी। विभाग के निदेशक के नाम जारी सम्बन्धित निर्देश पत्र में कीटनाशक विक्रेताओं के लाइसेंसों की समीक्षा करने तथा एक फरवरी, 2018 से नया कोई कीटनाशक बिक्री लाइसेंस नहीं जारी करने का भी निर्देश दिया गया है।

    उक्त विवरण से स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश का फैसला, कृत्रिम रासायनिक कीटनाशकों के उपयोग को थोड़ा कम तथा जैविक कीटनाशकों को थोड़ा ज्यादा प्रोत्साहन देने के लिये है और पंजाब का निर्देश, कीटनाशकों के प्रयोग का नियमन करने के लिये। कौन सा कदम ज्यादा बेहतर है? इसका उत्तर पाने के लिये हमें जरा विस्तार से जानना होगा। आइए, जानें।

     

     

    प्रकृति का कीट नियमन तंत्र


    यूँ तो प्रकृति अपना नियमन खुद करती है। इसके लिये उसने एक पूरी खाद्य शृंखला बनाई है। इस खाद्य शृंखला में यदि उसने ऐसे कीट बनाए हैं, जो वनस्पति को खा डालते हैं, तो उसने ऐसे कीट भी बनाए हैं, जो वनस्पति को चट कर जाने वाले कीटों को चट कर डालते हैं। जाहिर है कि मांसाहारी कीट, फसलों के मित्र हैं और फसलों को चट कर डालने वाले कीट, फसलों के दुश्मन।

     

     

     

     

    कृत्रिम कीटनाशकों का प्रवेश द्वार बनी हरित क्रान्ति


    जब तक हम प्राकृतिक खेती करते थे, प्रकृति के इस नियमन तंत्र पर भरोसा रखते थे। 'हरित क्रान्ति' की जरूरत ने भारतीय कृषि में कई अतिरिक्त प्रयोगों का प्रवेश कराया। रासायनिक उर्वरक, खरपतवारनाशक तथा रासायनिक कीटनाशक भी ऐसे प्रयोग की वस्तु बनकर आये और पूरे भारत के खेतों पर बिछ गए। उत्पादन बढ़ने से इनके प्रति, भारतीय किसानों की दीवानगी बढ़ती गई।

    इस दीवानगी का लाभ उठाकर, भारत में रासायनिक कीटनाशकों का एक भरापूरा उद्योग और बाजार तो खड़ा हो गया, लेकिन जैविक कीटनाशकों को प्रोत्साहित करने का विचार लम्बे समय तक हमारे वैज्ञानिकों और उद्योगपतियों के इरादे से गायब रहा। किसानों को जिन जैविक कीटनाशकों को प्रयोग की जानकारी व अनुभव था, उन्हें पिछड़ा बताकर वैज्ञानिकों ने उन पर से किसानों का भरोसा घटाया।

    आधुनिक खेती के नाम पर वैज्ञानिक और सलाहकार भी रासायनिक कीटनाशकों का बाजार बढ़ाने में लग गए। खरपतवारनाशक दवाइयों की बिक्री बढ़ाने के लिये, कम्पनियाँ आज भी डीएपी जैसे रंगीन उर्वरकों तथा उन्नत बीजों में खरपतवार के रंगे बीजों की मिलावट कर खेतों में नए-नए तरह के खरपतवार पहुँचाने का अनैतिक कर्म कर रही हैं।

     

     

     

     

    अविवेकपूर्ण प्रयोग


    खैर, वैज्ञानिकों और कृषि सलाहकारों की सलाह से किसान ये तो समझ गए कि रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग कर फसल के नुकसान को तत्काल प्रभाव रोक सकता है, लेकिन रासायनिक कीटनाशकों का विवेकपूर्ण प्रयोग करना हमारे किसानों को आज तक नहीं आया। बाजारू खेल को समझने में उन्हें काफी समय लगेगा। वास्तविकता यह है कि नकली-असली कीटनाशक की पहचान, प्रतिबन्धित कीटनाशकों का ज्ञान, कीटनाशकों को चुनने तथा प्रयोग करने के लिये भारत का ज्यादातर किसान, आज भी उन स्थानीय बिक्री ऐसे दुकानदारों पर निर्भर हैं, जिन्हें खुद कीटनाशक प्रयोग के मानक, सुरक्षित सीमा व सुरक्षित तकनीक का आवश्यक ज्ञान नहीं है।

     

     

     

     

    नियम पर्याप्त, पालना अधूरी


    कीटनाशक अधिनियम, 1968 के तहत कीटनाशकों के निर्माण, लेबलिंग, पैकेजिंग, रख-रखाव, वितरण, बिक्री, लाने-ले जाने तथा आयात-निर्माण को नियंत्रित करने के लिये कई नियम हैं। कितने दुकानदारों को इसकी जानकारी है और कितने इसकी पालना करते हैं? एफएओ के मुताबिक, चाय बागानों में डीडीटी जैसे तमाम कीटनाशकों का इस्तेमाल हो रहा है, जिन्हें प्रतिबन्धित किया जा चुका है। टब्युफेनपाइराड नामक कीटनाशक तो भारत में पंजीकृत भी नहीं है; बावजूद इसके, चाय नमूनोें में इसकी उपस्थिति मिली है। ऐसे ही 2011 में उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रतिबन्धित एंडोसल्फान को आठ फीसदी चाय नमूनों में पाया गया।

     

     

     

     

    दुष्प्रभाव व्यापक


    दुर्याेग यह है कि ज्यादातर किसान आज भी नहीं सोच पा रहे कि कीेडों को मारने के इस्तेमाल होने वाली दवाएँ, अमृत तो हो नहीं सकती। जाहिर हैं कि ये जहर ही हैं। जितना हम छिड़कते हैं उसका एक फीसदी ही कीट पर पड़ता है; शेष 99 फीसदी तो मिट्टी, जल, फसल और हवा के हिस्से में ही आता है। अतः कीटनाशकों का अविवेकपूर्ण इस्तेमाल का खामियाजा वाया फसल, हवा, मिट्टी, जल, फसल उत्पाद के इंसान और कुदरत की दूसरी नियामतों को ही झेलना होगा। सब झेल रहे हैं; गिद्ध भी, गौरैया भी और इंसान भी।

    बीते वर्ष 2017 में जुलाई से अक्टूबर के बीच महाराष्ट्र के यवतमाल, अकोला, बुलढाना, वर्धा, नागपुर, चंद्रपुर और धुले में कीटनाशक छिड़काव करते हुए 51 किसान की मौत हुई और 783 विषबाधा के शिकार हुए। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक, कीटनाशक से मरने वालों में से करीब 20,000 मरने वाले खेती में काम करने वाले पाये गए हैं।

     

     

     

     

    फैलता दायरा, बिगड़ती सेहत


    चूँकि कीटनाशकों का इस्तेमाल का दायरा कृषि से फैलकर खाद्य प्रसंस्करण उद्योग, पैकेजिंग उद्योग, घर-फैक्टरी और स्वच्छता कार्यों तक बढ़ चला है। डबलरोटी, शीतल पेय, चाय आदि में कीटनाशकों की उपस्थिति और दुष्प्रभाव को लेकर क्रमशः विज्ञान पर्यावरण केन्द्र तथा ग्रीनपीस की रिपोतार्ज से हम अवगत ही हैं। यहाँ तक कि भूजल और नदियों तक में कीटनाशकों के अंश पाये गए हैं। अतः इनके दुष्प्रभाव का दायरा भी व्यापक हो चला है।

    जाहिर है कि कीटनाशकों का अविवेकपूर्ण इस्तेमाल, हमारे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर और अंगों को बीमार कर रहा हैं। शरीर में कीटनाशकों के प्रवेश से पेट की तकलीफ, जननांगों में विकार, तंत्रिका सम्बन्धी समस्याएँ तथा कैंसर जैसी बीमारियों के खतरे लगातार बढ़ रहे हैं। लंदन फूड कमीशन ने पाया कि ब्रिटेन में बढ़ रहे कैंसर तथा जन्म विकारों का सम्बन्ध ऐसे कीटनाशकों से भी है, जिन्हें वहाँ मान्यता प्राप्त है।

    अमेरिका की नेशनल एकेडमी आॅफ साइंस की रिपोर्ट कहती है कि अमेरिका में कैंसर के 10 लाख अतिरिक्त मामले खाने-पीने के सामान में कीटनाशकों की उपस्थिति के कारण हैं। भिन्न कीटनाशकों की वजह से खासकर अन्य जीवों में पक्षी, मधुमक्खी, मित्र कीट तथा जलीय जीव सबसे ज्यादा दुष्प्रभावित हो रहे हैं।

     

     

     

     

    पोषण क्षमता खोती मिट्टी-खेती


    सोचिए कि किसी भी बीमारी से हम तभी लड़ सकते हैं, जब हमारा खाना-पीना पोषक तत्वों से भरपूर हो। यदि यह खाना और पानी, दोनों ही कीटनाशकों से भरपूर हो, तो बीमारियों से लड़ने की ताकत कहाँ से आएगी? कीटनाशकों के बढ़ते प्रयोग के फलस्वरूप, यही हाल हमारी मिट्टी और खेती की सेहत का हुआ है। मृदा जल संरक्षण एवं अनुसन्धान संस्थान, देहरादून की रिपोर्ट के मुताबिक उर्वरकों और कीटनाशक दवाइयों के अविवेकपूर्ण इस्तेमाल से प्रतिवर्ष 5334 लाख टन मिट्टी नष्ट हो रही है।

    औसतन 16.4 टन प्रति हेक्टेयर उपजाऊ मिट्टी प्रतिवर्ष समाप्त हो रही है। मिट्टी समाप्त होने का मतलब है मिट्टी के भीतर मौजूद सूक्ष्म व सूक्ष्मतम तत्वों तथा सहायक जीवों का नाश। मिट्टी में पोषक तत्वों में इस नाश के परिणामस्वरूप, एक ओर जहाँ हमारे कृषि उत्पादों में पोषक तत्व तेजी से कम हुए हैं, वहीं खेत की उर्वरा शक्ति भी लगातार घट रही है। कम उर्वरा शक्ति वाली भूमि से अधिकाधिक उत्पादन लेने के चक्कर में, किसान अपने खेतों में उर्वरकों की मात्रा को बढ़ाते जा रहे हैं।

     

     

     

     

    मरते मित्र कीट, बढ़ती शाकाहारी कीटों की प्रतिरोधक क्षमता


    कीटनाशकों के लगातार प्रयोग का दूसरा दुष्प्रभाव, मांसाहारी कीटों की घटती संख्या है। मांसाहारी कीटों की घटती संख्या के कारण बचे-खुचे शाकाहारी कीटों की जीवन आयु बढ़ी है। परिणामस्वरूप, शाकाहारी कीटों के प्रति अपनी प्रतिरोधक क्षमता इतनी बढ़ा ली है कि मानक मात्रा में किया गया छिड़काव अब उन पर असर ही नहीं करता है।

    एक अध्ययन के मुताबिक, दुनिया के 504 जीवों और कीटों ने कीटनाशकों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता बढ़ा ली है। मच्छर पर डीडीटी के असर न होने के बारे में तो 1952 में ही पता चल गया था। हरी सुण्डी में साइपरमेथ्रिन और डायमंड बैक मोथ की इल्ली और सफेद मक्खी पर साइपरमेथ्रिन फैनवरलेट और डेल्टामेथ्रिन असरहीन साबित हो रहे हैं। इन्हें नियंत्रित करने के लिये इस्तेमाल की मात्रा बढ़ती जा रही है और कृषि खर्च भी।

     

     

     

     

    बढ़ती खपत, बढ़ता नकली कीटनाशक बाजार


    आँकड़े गवाह हैं कि पिछले 12 वर्षों में भारत में रासायनिक उर्वरकों का उपयोग छह गुना अधिक बढ़ गया है। कीटनाशकों का कारोबार बढ़कर, 19 हजार करोड़ रुपए तक पहुँच गया है। इसमें से पाँच हजार करोड़ रुपए का कारोबार, नकली कीटनाशकों का है।

    भारतीय व्यापारियों एवं उद्योगपतियों के संगठन ‘फिक्की’ के अनुसार, भारत में नकली कीटनाशकों का कारोबार, कुल कीटनाशक कारोबार का करीब 30 फीसदी है। बिना रुकावट पंजीकरण के कारण, नकली कीटनाशकों का यह कारोबार 20 फीसदी सालाना वृद्धि की रफ्तार से आगे बढ़ रहा है। नकली कीटनाशक का सबसे ज्यादा कारोबार उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, आन्ध प्रदेश, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, हरियाणा और कर्नाटक में होता है।

     

     

     

     

    कितना लाभकारी ज्यादा उपयोग?


    गौर कीजिए कि रासायनिक उर्वरक, खरपतवारनाशक और कीटनाशकों का कारोबार बढ़ रहा है, लेकिन हरित क्रान्ति के प्रथम 15 वर्ष की तुलना में, बाद के 52 वर्षों में कृषि उत्पादन की वार्षिक वृद्धि दर की रफ्तार घट रही है। एक अनुमान के मुताबिक, नकली कीटनाशकों के दुष्प्रभाव के कारण, बीते 10 वर्ष में किसानों के करीब 12000 करोड़ रुपए डूब चुके हैं।

    कीटनाशकों की उपस्थिति की वजह से कितने कृषि और खाद्य उत्पाद पैदा होने के बाद भारतीय खरीददार तथा विदेशी आयातकों द्वारा अस्वीकार कर दिये जाते हैं। स्पष्ट है कि कर्ज लेकर नकदी फसलों की खेती करने वाले किसानों द्वारा घाटे में पहुँच जाने के अनेक कारणों में एक कारण कीटनाशक भी हैं। इस तरह भारतीय खेती रासायनिक उर्वरक, रासायनिक कीटनाशक तथा रासायनिक खरपतवार नाशकों के चक्रव्यूह में बुरी तरह फँस चुकी है। अब यह उबरे, तो उबरे कैसे?

     

     

     

     

    सरकारी प्रयास


    ऐसा नहीं है कि सरकार ने खेती को इस चक्रव्यूह से निकालने की बिलकुल ही कोशिश नहीं की। असली-नकली कीटनाशक और इनके अविवेकपूर्ण इस्तेमाल की सम्भावना और खतरों को देखते हुए ही भारत सरकार ने 1968 में कीटनाशक अधिनियम लागू किया। अधिनियम की पालना के लिये कीटनाशक निरीक्षक अधिसूचित किये। फरीदाबाद में केन्द्रीय, चंडीगढ़ व कानपुर में क्षेत्रीय तथा 68 राज्य कीटनाशक परीक्षण प्रयोगशालाएँ खोली। एकीकृत कीट प्रबन्धन कार्यक्रम बनाया।

    दो दिवसीय तथा पाँच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए। मृदा जाँच व सुधार के लिये, सरकार ने मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना शुरू की। वर्ष 2015-16 में 568 करोड़ का अलग से बजट भी रखा। 2016-17 में 2296 मिट्टी परीक्षण छोटी प्रयोगशालाओं को भी मंजूरी दी गई। भारत सरकार के कृषि मंत्रालय ने 04 जनवरी, 2017 को एक राजपत्र जारी कर 18 कीटनाशकों को पर्यावरण के लिये घातक मानते हुए कृषि में प्रयोग पर प्रतिबन्ध लगा दिया। इनमें से 12 कीटनाशकों के उत्पादन को 01 जनवरी, 2018 को रोकने को कहा गया। शेष 06 कीटनाशकों के उत्पादन को 31 दिसम्बर, 2020 तक रखी गई।

    वस्तुस्थिति यह है कि प्रतिबन्ध के इनमें से कई कीटनाशक दवाएँ बाजार में बेरोकटोक मिल रही है और किसान, अज्ञानतावश उनका इस्तेमाल भी कर रहा है। इसी के मद्देनजर, मध्य प्रदेश शासन ने वर्ष 2017 में 10 अक्टूबर और 05 नवम्बर को नियम संशोधित कर यह सुनिश्चित किया कि खाद व कीटनाशक बिक्री के लिये केवल रसायन, कृषि और कृषि विज्ञान स्नातकों को ही कारोबार के लाइसेंस जारी किये जाएँगे।

    मौजूदा कारोबारियों को इस न्यूनतम अर्हता को पूरी करने के लिये दो साल का वक्त दिया गया। कीटनाशकों को लेकर पेश इस देशव्यापी परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए शायद हम सही जवाब पा सकें कि क्या सही है? कीटनाशकों के उपयोग को प्रोत्साहित करने के लिये अनुदान देना अथवा कीटनाशकों के उपयोग के नियमन के लिये कुछ के उपयोग तथा नए लाइसेंस पर प्रतिबन्ध लगाना तथा लाइसेंसों की समीक्षा करना?

     

     

     

     

    मिथक टूटे, तो बात बने


    मेरा मानना है कि कृत्रिम रसायनों और कीटनाशकों के चक्रव्यूह में फँस चुकी भारतीय कृषि को उबारने के लिये सबसे पहले इस मिथक को तोड़ना जरूरी है कि कृत्रिम रसायनों का उपयोग किये बिना, खेत की उत्पादकता बढ़ाना सम्भव नहीं है। इस मिथक को तोड़ने के लिये दुनिया में सैकड़ों उदाहरण मौजूद हैं।

    सिक्किम का एक पूर्ण जैविक प्रदेश होते हुए भी किसानों की आत्महत्या के आँकड़े से मुक्त होना, एक अनुपम उदाहरण है। महाराष्ट्र, बुन्देलखण्ड, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, राजस्थान, मध्य प्रदेश, केरल समेत देश के कई इलाकों के काफी किसान, जैविक व पूर्ण प्राकृतिक खेती की दिशा में कदम आगे बढ़ाकर घाटे से उबर गए हैं। जरूरी है कि जैविक व पूर्ण प्राकृतिक खेती का ज्ञान तथा इसे अपनाने हेतु प्रोत्साहन बढ़े। रासायनिक कीटनाशकों के कहर से पूर्ण मुक्ति तभी सम्भव होगी।

     

     

     

     

     

    सारणी - एक, कृषि मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा प्रतिबंधित 18 कीटनाशक

     

    वेनोमाइल, कार्बराइल, डायजिनोन, फेनारिमोल, फेंथिओन, लिनुरोन, मेथोक्सी ईथाइल, मिथाइल पेराथिओन, सोडियम साइनाइड, थियोमेटोन, ट्राइडेमोर्फ, ट्राइफ्लूरेलिन, अलाक्लोर, डाइक्लोरोक्स, फोरेट, फोस्फोमिडोन, ट्रायाजोफोज, ट्राईक्लोरोफोर्न।

     

     

    सारणी - दो, कृषि एवम् किसान कल्याण विभाग, पंजाब द्वारा प्रतिबंधित 20 कीटनाशक

     

    फॉसफेमिडॉन, ट्राइक्लोरोफोन, बेन्फ्युरोकर्ब, डाईकोफोल, मिथोमाइल, थियोफॉनेट मिथाइल, एन्डोसल्फॉन, बेफेंर्थिन, कार्बोसल्फॉन, क्लोरफेनापर, डाजोमेट, डाईफ्लुबेंजुरॉन, फेनिट्रोथिन, मेटलडीहाइड, कसुगामाइसिन, इथोफेनप्रोक्स (इटोफेनप्रोक्स) फोरेट, ट्राइज़ोफॉस, अलाकोलोर, मोनोक्रोटोफॉस।

     

     

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    जहर उगल रहे स्कूल के ट्यूबवेल

    RuralWaterTue, 02/20/2018 - 13:53


    आर्सेनिकयुक्त पानी पीने को मजबूर बच्चेआर्सेनिकयुक्त पानी पीने को मजबूर बच्चे6 साल की पूर्णिमा वैरागी पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिलान्तर्गत बशीरहाट के मेरूदंडी गाँव में रहती है और पास के ही स्कूल में नियमित पढ़ने जाती है।

    खुशमिजाज पूर्णिमा इस बात से पूरी तरह अनजान है कि उसके शरीर में आर्सेनिक नाम का जानलेवा तत्व प्रवेश कर चुका है और अगर अभी से एहतियात नहीं बरती गई, तो वह आर्सेनिक से होने वाले कैंसर की चपेट में आ सकती है।

    वह यह भी नहीं जानती है कि जो पानी वह घर व स्कूल में पीती है और जो खाना वह स्कूल व घर में खाती है, उन्हीं की वजह से जहरीले आर्सेनिक ने उसके शरीर में ठिकाना बना लिया है।

    उसके यूरिन में प्रति लीटर 250 माइक्रोग्राम आर्सेनिक है। वहीं, उसके बालों में 2.6 माइक्रोग्राम आर्सेनिक पाया गया है। उसके घर में जो चावल खाने में इस्तेमाल होता है उसमें भी भारी मात्रा में आर्सेनिक मिला है। चावल में प्रति किलोग्राम 240 माइक्रोग्राम आर्सेनिक पाया गया है।

    पूर्णिमा वैरागी जिस स्कूल में पढ़ती है उसी स्कूल में 8 साल की के. खातून भी पढ़ाई कर रही है और उसके शरीर में भी आर्सेनिक की मौजूदगी के सबूत मिले हैं। उसके यूरिन में प्रति लीटर 827 माइक्रोग्राम आर्सेनिक मिला है। उसे भी नहीं पता है कि आर्सेनिक क्या है और उसके शरीर में आर्सेनिक है भी कि नहीं? अगर है तो उसके शरीर में वह कैसे गया?

    दोनों संग्रामपुर मेरूदंडी स्विसगेट शिशु शिक्षा केन्द्र में पढ़ती हैं। यह स्कूल कोलकाता से करीब 75 किलोमीटर दूर स्थित है और इसमें 5 से 10 साल के 75 बच्चे पढ़ते हैं।

    जादवपुर विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ एनवायरन्मेंट स्टडीज की ओर से इस स्कूल में पढ़ने वाले कुछ बच्चों के नाखून व बालों में आर्सेनिक की मौजूदगी को लेकर शोध किया गया है। यही नहीं स्कूल में बने दो चापाकल व स्कूली बच्चों के घरों के जलस्रोत व घर में इस्तेमाल होने वाले चावल को भी शोध में शामिल किया गया। शोध में जो परिणाम सामने आये हैं, वे बेहद चिन्ताजनक हैं।

    शोध से सम्बद्ध विशेषज्ञों ने बताया कि करीब 50 बच्चों के नाखून व यूरिन के नमूने जाँच के लिये संग्रह किये गए थे और उनकी जाँच में पाया गया कि आर्सेनिक उनके शरीर में प्रवेश कर चुका है और जल्द ही कुछ नहीं किया गया, तो उनमें इसका असर दिखने लगेगा।

    यूरिन के नमूनों की जाँच में पता चला है कि इन बच्चों में सामान्य से कई गुना ज्यादा आर्सेनिक है। एक आदमी के यूरिन में प्रति लीटर 3 से 26 माइक्रोग्राम आर्सेनिक सामान्य है, लेकिन शोध में बच्चों के यूरिन में 39 से 827 माइक्रोग्राम आर्सेनिक मिला है।

    यूरिन में आर्सेनिक की मात्रा सामान्य से कई गुना अधिक होना चिन्ताजनक है क्योंकि एक व्यक्ति के शरीर में जितना आर्सेनिक प्रवेश करता है, उसका 70 प्रतिशत हिस्सा यूरिन के साथ बाहर निकल जाता है। आँकड़ों से साफ है कि इन बच्चों के शरीर में भारी मात्रा में आर्सेनिक प्रवेश कर रहा है। इसका 30 फीसदी हिस्सा भी अगर शरीर में जमा हो रहा है, तो वह बच्चों के लिये खतरनाक है। इसी तरह सिर के बालों के नमूनों में भी आर्सेनिक की मौजूदगी मिली है।

    अन्तरराष्ट्रीय मानक के अनुसार एक व्यक्ति के शरीर में प्रति ग्राम 0.08 से 0.25 माइक्रोग्राम आर्सेनिक सामान्य है। शोध में बच्चों के बालों में 0.003 माइक्रोग्राम से 8.13 माइक्रोग्राम तक आर्सेनिक मिला है।

    जादवपुर यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ एनवायरमेंट स्टडीज के डायरेक्टर प्रो. तरित रायचौधरी के अनुसार, बालों में आर्सेनिक की सामान्य से अधिक उपस्थिति इस बात की तरफ इशारा करती है कि बच्चों के शरीर में लम्बे समय से आर्सेनिक प्रवेश कर रहा है।

    प्रो. रायचौधरी इस पर और रोशनी डालते हुए कहते हैं, ‘मानव शरीर में आर्सेनिक नीचे से ऊपर की ओर बढ़ता है। सिर के बाल शरीर के सबसे ऊपर होते हैं, इसलिये बालों में आर्सेनिक सबसे बाद में पहुँचता है। शोध में जो तथ्य सामने आये हैं, उससे साफ है कि बालों में सामान्य से कई गुना ज्यादा आर्सेनिक है और लम्बे समय से आर्सेनिक उनके शरीर में जा रहा है।’

    वहीं, नाखूनों के 17 नमूने संग्रह किये गए थे। इन नमूनों की जाँच में पता चला है कि इसमें प्रति ग्राम 1.65 से 6.77 माइक्रोग्राम आर्सेनिक है। अन्तरराष्ट्रीय मानक के अनुसार नाखूनों में प्रति ग्राम 0.43 माइक्रोग्राम से 1.08 माइक्रोग्राम तक आर्सेनिक सामान्य है।

    अगर घरों में मौजूद चावल की जाँच रिपोर्ट की बात करें, तो चावल में भी सामान्य से बहुत अधिक आर्सेनिक मिला है। चावल में प्रति ग्राम 60 से 450 माइक्रोग्राम आर्सेनिक पाया गया है।

    प्रो. तरित रायचौधरी ने कहा, ‘आर्सेनिकयुक्त चावल का सेवन बेहद खतरनाक है। चावल में आर्सेनिक अपने मूल रूप में पहुँचता है क्योंकि चावल में सीधे पानी से रॉ आर्सेनिक पहुँचता है। यह आर्सेनिक जैविक नहीं होता है।’

    उन्होंने बताया, ‘पौधों में आर्सेनिक सबसे पहले जड़ों में पहुँचता है। जड़ों से तने में और फिर ऊपर की तरफ बढ़ते हुए फलों में पहुँचता है। धान की जड़ें काफी दूर तक फैली हुई होती हैं। ऐसे में अगर पानी में आर्सेनिक की मात्रा कम हो, तो वह जड़ों तक ही रह जाता है। यहाँ के चावल में सामान्य से अधिक आर्सेनिक इस बात का प्रमाण है कि यहाँ के पानी में आर्सेनिक की मौजूदगी खतरनाक स्थिति में है।’

    धान के पौधे चूँकि ज्यादा समय तक पानी में रहते हैं और साथ ही धान को दो बार उबाला भी जाता है। आर्सेनिक के प्रभाव वाले क्षेत्रों में आर्सेनिकयुक्त पानी में ही धान को उबाला जाता है। इन वजहों से भी धान में अधिक आर्सेनिक पहुँचता है।

    पिछले कुछ सालों में हुए शोधों में भी पता चला है कि आर्सेनिकयुक्त पानी से सिंचाई करने से अन्न में भी आर्सेनिक पहुँचता है।

    संग्रामपुर मेरूदंडी स्विसगेट शिशु शिक्षा केन्द्र में दो ट्यूबवेल हैं और स्कूली बच्चे इन्हीं ट्यूबवेल से पानी का सेवन करते हैं। यही नहीं, स्कूल में जो मिड डे मील बनता है, वह भी इसी पानी से तैयार किया जाता है। शोध के लिये इन ट्यूबवेल से भी पानी के नमूने लिये गए थे।

    शोध में एक ट्यूबवेल के पानी में प्रति लीटर 600 माइक्रोग्राम व दूसरे ट्यूबवेल के पानी में प्रति लीटर 275 माइक्रोग्राम आर्सेनिक मिला है।

    शोध के परिणाम को बेहद चिन्ताजनक बताते हुए यादवपुर यूनिवर्सिटी की तरफ स्कूल के टीचर-इन-चार्ज को पत्र लिखकर एहतियाती कदम उठाने को कहा गया है। पत्र में कहा गया है, ‘जाँच के परिणाम संकेत देते हैं कि पानी के नमूने में भारी मात्रा में आर्सेनिक है।’

    प्रो. तरित रायचौधरी ने कहा, ‘हमने स्कूल प्रबन्धन को बच्चों को आर्सेनिक मुक्त पानी देने की सलाह दी है। साथ ही डीप ट्यूबवेल/पानी के वैकल्पिक स्रोत/आर्सेनिक रिमूवल प्लांट स्थापित करने की भी अनुशंसा की है।’

    जाँच रिपोर्ट पर हैरानी जताते हुए स्कूल की टीचर-इन-चार्ज सुचित्रा सरकार ने कहा, ‘स्कूल के ट्यूबवेल के पानी में आयरन व टीडीएस अधिक है, यह तो हमें पता था, लेकिन आर्सेनिक इतना अधिक है यह हम नहीं जानते थे।’

    उन्होंने कहा, ‘स्कूल के इन्हीं दो ट्यूबवेल से बच्चे पानी पीते हैं। इसी पानी से मिड डे मिल भी बनाया जाता है। हमारे पास कोई दूसरा विकल्प भी तो नहीं है। जाँच रिपोर्ट के बाद कुछ बच्चे अपने घर से पानी लाते हैं, लेकिन ज्यादातर बच्चे बिना पानी के ही आते हैं और ट्यूबवेल का ही पानी पीते हैं।’

    सुचित्रा सरकार ने कहा कि उन्होंने वाटर ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित करने के लिये स्थानीय प्रशासन से अपील की है, लेकिन अब तक इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया है।

    उल्लेखनीय है कि इससे पहले बशीरहाट ब्लॉक-1 स्थित चक कमारडांगा गाँव के चक कमारडांगा फ्री प्राइमरी स्कूल में मौजूद दो ट्यूबवेल के पानी की जाँच की गई थी। इन ट्यूबवेल के पानी में भी सामान्य से अधिक आर्सेनिक मिला था। इस तथ्य के सामने आने के बाद उस स्कूल के बच्चों के घरों के जलस्रोत और बच्चों के नाखून, सिर के बाल और यूरिन की भी जाँच की गई थी।

    बच्चों की यूरिन में औसतन 160 माइक्रोग्राम (प्रति लीटर) आर्सेनिक मिला था। वहीं, बालों में औसतन 3.4 माइक्रोग्राम आर्सेनिक (प्रति ग्राम) पाया गया था। बच्चों के बालों में अधिकतम आर्सेनिक 17 माइक्रोग्राम व न्यूनतम आर्सेनिक 0.76 माइक्रो ग्राम मिला था। इसी तरह, नाखून के सैम्पल में बच्चों में औसतन 6.5 माइक्रोग्राम (प्रति ग्राम) आर्सेनिक मिला था।

    जाँच रिपोर्ट के बाद गुजरात के सेंट्रल साल्ट एंड मरीन केमिकल्स रिसर्च इंस्टीट्यूट की ओर से स्कूल में एक प्लांट स्थापित किया गया। फिलहाल चक कमारडांगा स्कूल के बच्चे प्लांट के पानी का सेवन कर रहे हैं।

    चक कमारडांगा स्कूल के टीचर-इन-चार्ज सुजीत विश्वास ने कहा, ‘उक्त प्लांट में भूजल को साफ कर पीने लायक बनाया जाता है और स्कूल के बच्चों को निःशुल्क मुहैया कराया जाता है। प्लांट के रख-रखाव पर सलाना दो से तीन हजार रुपए खर्च होते हैं। हम लोग खुद यह खर्च वहन करते हैं। इसके अलावा राज्य के जन-स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग की ओर से हाल ही में सोलर प्लांट स्थापित किया गया है।’

    विश्वास ने बताया कि सेंट्रल साल्ट एंड मरीन केमिकल्स रिसर्च इंस्टीट्यूट द्वारा स्थापित वाटर ट्रीटमेंट प्लांट में फिटकिरी, क्लोरिन और रेडियोएक्टिव पद्धति से पानी को साफ किया जाता है।

    संग्रामपुर मेरूदंडी स्विसगेट स्कूल के बच्चों के शरीर में आर्सेनिक की जो मात्रा मिली है, अगर जल्द ही उन्हें साफ पानी मुहैया कराना शुरू नहीं किया गया, तो वे कैंसर जैसी महामारी की जद में आ सकते हैं।

    विशेषज्ञों के अनुसार चूँकि अभी उनकी उम्र कम है और आर्सेनिक का असर दिखना शुरू भी नहीं हुआ है, तो उनके शरीर से आर्सेनिक को बाहर किया जा सकता है।

    प्रो. तरित रायचौधरी ने कहा, ‘अभी इन बच्चों के शरीर के बाहर के हिस्से में आर्सेनिक का कोई असर नहीं दिख रहा है। अगर वे इसी तरह आर्सेनिकयुक्त पानी का सेवन करते रहे तो 12 साल की उम्र के बाद धीरे-धीरे उनके शरीर में इसका असर दिखने लगेगा। अगर उन्हें अभी से साफ पानी देना शुरू किया जाये, तो उनके रिकवर कर जाने की 90 प्रतिशत तक सम्भावना है।’

    उन्होंने कहा कि साफ पानी मुहैया कराकर 2-3 सालों में इन बच्चों के शरीर से आर्सेनिक निकाला जा सकता है।

    पिछले साल लोकसभा में पेश की गई एक रिपोर्ट के अनुसार 21 राज्यों के 153 जिलों के पेयजल में सामान्य से अधिक आर्सेनिक है। उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक लोग आर्सेनिकयुक्त पानी का सेवन कर रहे हैं। वहीं, असम की 65 फीसदी आबादी आर्सेनिकयुक्त पानी पीने को मजबूर है। बिहार की 60 प्रतिशत आबादी आर्सेनिकयुक्त पानी पी रही है।

    उक्त रिपोर्ट के अनुसार पश्चिम बंगाल में आर्सेनिक से ग्रस्त लोगों की संख्या 1.04 करोड़ है। राज्य के आठ जिले बर्दवान, मालदह, हुगली, हावड़ा, मुर्शिदाबाद, नदिया, उत्तर 24 परगना और दक्षिण 24 परगना के 83 ब्लॉक के पानी में आर्सेनिक है।

    वर्ष 2016 के विधानसभा चुनाव से पहले पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने चुनावी घोषणापत्र जारी किया था। इसमें दावा किया गया था कि राज्य सरकार करोड़ों रुपए खर्च कर सूबे के 91 प्रतिशत लोगों को आर्सेनिकमुक्त पानी मुहैया कराया जा रहा है। लेकिन, मेरूदंडी स्कूल की ताजा रिपोर्ट कुछ और ही कहानी कह रही है।

    जादवपुर यूनिवर्सिटी की ओर से स्कूल प्रबन्धन को भेजे गए पत्र को पढ़ने के लिये अटैचमेंट देखें।
     

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    ग्रामीणों ने कड़वापानी जलस्रोत का किया पुनरुद्धार

    RuralWaterThu, 03/01/2018 - 15:05

    कड़वापानी जलस्रोत की सफाई करते ग्रामीणकड़वापानी जलस्रोत की सफाई करते ग्रामीणउत्तराखण्ड की अस्थायी राजधानी देहरादून कभी बासमती चावल, लीची फल के लिये देश में विख्यात थी। अब सिर्फ-व-सिर्फ बासमती की खुशबू ही बची है। बासमती का स्वाद चखना स्थानीय लोगों के लिये भी मुश्किल होने लगा है। कारण अधिकांश खेती में कंक्रीट के जंगल उग आये हैं तो बची-खुची जमीन सिंचाई के अभाव में असिंचित में बदल रही हैं।

    यह भी तब जब देहरादून में भारी मात्रा में निर्माण कार्य चल रहा है। क्योंकि इस निर्माण कार्य ने सिंचाई के साधनों को भी बाधित किया है। जिसका जीता-जागता उदाहरण है देहरादून से मात्र 20 किमी के फासले पर बसे कारबारी गाँव, भुड्डी गाँव, नया गाँव पेलियो, झीवरहेड़ी, मल्हान ग्रांट व भूड़पुर गाँव की खेतीहर जमीन। जहाँ की सिंचाई और पेयजल की आपूर्ति कड़वापानी तालाब से होती थी।

    हालांकि स्थानीय लोगों ने स्वस्फूर्त इस जमीन को फिर से सिंचित में बदल डाला। क्योंकि पिछले 17 वर्षों में यहाँ बसने की चाहत रखने वाले लोगों और बिल्डरों ने कड़वापानी तालाब को कूड़ेदान में बदल दिया था। स्थानीय लोगों की मेहनत रंग लाई और मौजूदा समय में कड़वापानी तालाब का पानी पुनर्जीवित हो उठा। जिससे लगभग 15 हजार की आबादी को पीने का पानी उपलब्ध हुआ तो वहीं लगभग 10 हजार हेक्टेयर की जमीन को सिंचाई लिये कड़वापानी तालाब से पानी मिलने लग गया है।

    उल्लेखनीय हो कि (तत्काल उत्तर प्रदेश सरकार) जल संस्थान ने 35 साल पहले कड़वापानी तालाब से एक पेयजल योजना का निर्माण किया था। जो पेयजल लाइन तत्काल खेती के साथ- साथ जल संस्थान के ही द्वारा ग्रामसभा कारबारी, भुड्डी गाँव, नया गाँव पेलियो, झीवरहेड़ी, मल्हान ग्रांट व भूड़पुर के लिये छह लाख लीटर पानी की आपूर्ति करती थी। सो संस्थान के कायदों ने लोगों को संस्थान और सरकार पर निर्भर बना डाला। हुआ यूँ कि धीरे-धीरे यह पेयजल लाइन पेयजल के काम को कम करती रही।

    क्योंकि इसमें गन्दा पानी आने लग गया था। इसी के साथ-साथ कड़वापानी का तालाब भी देखरेख के अभाव में तालाब के स्रोत में कीचड़ जमा होने लगा। यह हालात तब और बिगड़ गई जब उत्तर प्रदेश से पृथक उत्तराखण्ड राज्य हुआ। यानि यूँ कहे कि साल 2000 से इस क्षेत्र में पानी का संकट खड़ा हो गया। कभी-कभार जब इस पेयजल लाइन में पानी चलता भी था तो वह बहुत ही दूषित पानी होता था।

    ग्रामीण इस आस में थे कि अब तो पृथक राज्य बन चुका है, सरकार पास में है, वह सब कुछ देख रही है वगैरह। 17 वर्षों की इन्तजार में आखिर लोगों की तन्द्रा टूटी और इक्कट्ठे हुए। बात आगे बढ़ी तो लोगों ने कड़वापानी के तालाब को पुनर्जीवित करने का निर्णय ले लिया।

    अब ग्रामीण अधिकारियों, जन-प्रतिनिधियों से अजीज आ चुके हैं। हालात यूँ बनी हुई है कि उनकी पेयजल आपूर्ति भी ठप हो चुकी है, खेतों की सिंचाई बाधित हो चली है। यहाँ का पानी लगातार दूषित होता चला जा रहा है, अब स्थिति ये है कि स्रोत में कीचड़ व पत्ते जमा होने से पानी काफी घटता जा रहा है, सरकारी मुलाजिम तनख्वा लेने में चूकते नहीं हैं, पर इस जलस्रोत की सुध लेने वाला कोई नहीं। अब देर किस बात की सरकार ने समस्या पर ध्यान नहीं दिया तो कोई बात नहीं।

    ग्रामीणों ने ग्रामसभा कारबारीग्रांट के ग्राम प्रधान दयानंद जोशी के नेतृत्व में उप प्रधान जयवती नंदन पुरोहित, सतेंद्र बुटोला, प्रद्युम्न बुटोला, नवीन व बुद्धिबल्लभ थपलियाल सहित खुद हाथों में फावड़े, कुदालें उठाए और निकल पड़े स्रोत की सफाई के लिये। तीन दिन तक ग्रामीणों ने रात-दिन एक कर स्रोत की सफाई कर डाली। नतीजा यह हुआ कि अब कड़वापानी तालाब के स्रोत से छह लाख लीटर साफ पानी प्रतिदिन ग्रामीणों को मिलने लगा है। साथ ही किसानों के सामने सिंचाई का संकट भी समाप्त हो गया है।

    कारबारीग्रांट के ग्राम प्रधान दयानंद जोशी कहते हैं कि भविष्य में भी इस तरह के कार्यों के लिये कभी भी सरकारी अधिकारियों के रहमोकरम पर नहीं रहेंगे।उन्होंने बताया कि वे कई बार जल संस्थान के अधिकारियों से लेकर स्थानीय विधायक तक इस जलस्रोत की सफाई कराने के लिये पत्र दे चुके थे। लेकिन कोई सुनने को राजी नहीं था, उन्हें यानि कुछ ठेकेदार किस्म के जन-प्रतिनिधियों को तो उनके क्षेत्र की उपजाऊ जमीन को कृषि से बदलकर बसासत में तब्दील करनी थी। जिसे वे हरगिज नहीं होने देंगे।कहा कि ग्रामीणों ने यह करके दिखा दिया कि लोकशक्ति से ही सम्भव है कि कड़वापानी का प्राकृतिक जलस्रोत पुनर्जीवित हो गया है।

    कारबारी ग्रांट के आस-पास के ग्रामीण इस काम के सम्पन्न होने से फूले नहीं समा पा रहे हैं। भला उनकी पेयजल और सिंचाई की समस्या का समाधान 35 बरस बाद जो हो गया। स्थानीय ग्रामीण बुद्धिबल्लभ थपलियाल का कहना है कि जलस्रोत साफ करने का उनका मकसद सभी लोगों को यह सन्देश देना था कि सिर्फ सरकार के भरोसे न बैठे रहें।

    यदि अधिकारी काम नहीं करते तो लोगों को स्वयं अपने लिये खड़ा होना पड़ेगा। वहीं कारबारी ग्रांट के युवक मंगल दल के अध्यक्ष सतेंद्र बुटोला का कहना है कि पिछले कई सालों से वे लोग इस स्रोत की दुर्दशा के कारण बहुत परेशानी झेल रहे थे। लेकिन, अब साफ-सफाई होने के बाद लोगों को फिर से पर्याप्त पानी मिल रहा है। स्थानीय ग्रामीण प्रद्युम्न बुटोला का कहना है कि क्षेत्र में पानी का संकट गहराने पर भी जब अधिकारियों ने स्रोत की सुध नहीं ली तो उन्होंने मौजूदा सिस्टम को आईना दिखाने के लिये यह कदम उठाया। आज लोग राहत की साँस ले रहे हैं।

    ताज्जुब हो कि जिस जमीन के कारण देहरादून की एक पहचान है, उसी जमीन को आसपास के निर्माण ने असिंचित में बदल डाला। हुआ यह कि इन गाँवों की जमीन जो कड़वापानी नामक तालाब से सिंचित होती थी, उस तालाब को चारों तरफ से कब्जाधारियों ने कब्जाने का पुरजोर प्रयास किया। ग्रामीणों ने सही समय पर निर्णय लिया तो सत्ता प्रतिष्ठानों से जुड़े कब्जाधारी एक-एक करके खिसते नजर ही नहीं आये बल्कि वे ही अब ग्रामीणों के साथ खुद को भी जोड़ने लग गए कि उन्होंने भी कड़वापानी के तालाब की सफाई में ग्रामीणों के साथ हाथ बँटाए।

    बता दें कि दून के कड़वापानी तालाब का प्राकृतिक जलस्रोत, जिससे आसपास की लगभग सौ बीघा खेती की तो सिंचाई होती ही है, क्षेत्र के आधा दर्जन गाँवों की 15 हजार आबादी को भी पीने का पानी भी मिलता था। लेकिन, देखरेख के अभाव में और कब्जाधारियों के जमावाड़ा ने यह स्रोत नेपथ्य मे डाल दिया था। ऐसे में कारबारीग्रांट के ग्रामीणों ने खुद स्रोत को साफ करने की जिम्मेदारी ली और अब उससे छह लाख लीटर पानी रोज पीने को मिल रहा है तो 10 हजार हेक्टेयर की खेती सिंचित हो रही है।

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    सी. वी. रमण की जलचेतना और भारत के जल सम्बन्धी प्रयास

    RuralWaterSat, 03/03/2018 - 15:56

    चन्द्रशेखर वेंकट रमणचन्द्रशेखर वेंकट रमणप्रायः हम सभी लोग हमारे एकमात्र विशुद्ध भारतीय नोबेल विजेता वैज्ञानिक सर सी. वी. रमण यानि चन्द्रशेखर वेंकट रमण को उनके भौतिक शास्त्र के अनुसन्धानों विशेष रूप से प्रकाश विज्ञान के उनके रमन प्रभाव के लिये जानते हैं। सूक्ष्म अवलोकन किया जाये तो वास्तव में रमण के शोधों का जल से गहरा सम्बन्ध है। रमन प्रभाव की उत्पत्ति के आधार में समुद्री जल के नीले रंग के दिखने के प्रश्न के वैज्ञानिक समाधान समाहित हैं।

    कहते हैं कि सन 1921 में जब सर सी. वी. रमण ऑक्सफोर्ड में आयोजित हुई विश्वविद्यालयों की कांग्रेस में भाग लेकर जलयान से भारत वापस आ रहे थे, तभी भूमध्य सागर के जल के अद्भुत नीलेपन ने रमण के वैज्ञानिक अवचेतन में खलबली मचा दी और वापस कलकत्ता विश्वविद्यालय पहुँचकर उन्होंने सात वर्षों तक अथक वैज्ञानिक विश्लेषण किये और अन्ततः गणितीय व सैद्धान्तिक व्याख्याओं के आधार पर पहली बार प्रकाश के प्रकीर्णन की व्याख्या ने समुद्र के नीले होने के राज दुनिया के समक्ष खोल दिये।

    इस तरह रमन प्रभाव के नाम से विख्यात इस घटना ने प्लांक की क्वांटम परिकल्पना की पुष्टि करते हुए मानो प्रकाश को प्रकाशमार्ग दिखा दिया। इसी खोज ने सर सी.वी. रमण को वर्ष 1930 में भौतिकी के नोबेल पुरस्कार का विजेता बना दिया। 28 फरवरी 1928 को सी. वी. रमण ने रमन प्रभाव की खोज की थी, इसी स्मृति में भारत में इस दिन को प्रत्येक वर्ष 'राष्ट्रीय विज्ञान दिवस' के रूप में मनाया जाता है। अल्बर्ट आइंस्टाइन ने एक बार सी वी रमण के लिये कहा था कि सी वी रमण ही वे प्रथम वैज्ञानिक थे जिन्होंने स्वीकारा और दर्शाया कि फोटोन की ऊर्जा द्रव्य के भीतर आंशिक रूपान्तरण कर सकती है। मुझे अब भी याद है कि इस खोज का हम सब पर गहरा प्रभाव हुआ था।’

    एक ओर जहाँ रमण ने ध्वनिक, अल्ट्रासोनिक, प्रकाशीय, चुम्बकत्व और क्रिस्टल भौतिक में बड़े-बड़े शोध किये, वहीं खगोल-विज्ञान और मौसमी-विज्ञान से लेकर शरीर-विज्ञान और संगीत तक में भी उनकी विशेष अभिरुचियों के कारण ये विषय भी उनकी युगान्तरकारी मेधा से सिंचित हुए। फिर जल का विषय कैसे छूट सकता था।

    रमण के कुल 475 प्रकाशित शोध-पत्रों और असाधारण प्रबन्धों व निबन्धों में से “The Elixir of Life” नामक उनका सर्वाधिक लोकप्रिय निबन्ध है। इसमें उन्होंने जल को जीवन का अमृत घोषित किया है। इस निबन्ध में उन्होंने विशेष रूप से तत्कालीन मिस्र की सभ्यता के विकास में नील नदी के जल की महत्ता का उदाहरण देते हुए विश्व में समस्त जीवों (पौधों व प्राणियों) के जीवन के लिये जल को अमृत तुल्य कहा है। वहीं जल के दूसरे स्वरूप का जिक्र करते हुए यह भी दर्शाया है कि मृदा अपरदन के समय जल कितना भयावह भी हो जाता है।

    आज भी हमारे देश के कुछ निजी स्कूलों में उनका यह निबन्ध अंग्रेजी विषय की पाठ्यपुस्तकों में पढ़ाया जाता है। लगभग 1960 के दशक में लिखा गया सी. वी. रमण का यह निबन्ध जल की महत्ता के दृष्टिकोण से आज भी उतना ही प्रासंगिक बना हुआ है या कि यह कहना गलत नहीं होगा कि वर्तमान में इसके मायने कहीं अधिक बढ़ गए हैं। सी. वी. रमण ने अपने इस निबन्ध में जल के प्राकृतिक सौन्दर्य से लेकर पौधों, प्राणियों और मनुष्यों के लिये इसकी अमृतमयी भूमिका के साथ-साथ भविष्य में इसके संरक्षण की भी स्पष्ट चेतावनी दे दी थी।

    भारत ने रमण के जल संरक्षण के संकेतों को पहचाना है और इसलिये स्वतंत्रता के बाद से ही इस दिशा में विशेष ध्यान भी दिया गया है। भारत सरकार द्वारा जल सहित अन्य प्राकृतिक संसाधनों से सम्बन्धित तथ्यों के लिये 1951 में निर्मित किये गए राष्ट्रीय संसाधन और वैज्ञानिक अनुसन्धान नामक एक मंत्रालय के बाद से उसमें सामयिक व परिस्थितिजन्य परिवर्तनों के साथ आज का जल संसाधन मंत्रालय रमण के उस जीवन अमृत जल की सुरक्षा का उत्तरदायित्व निभा रहा है।

    देश के जल संसाधनों के सुव्‍यवस्‍थित विकास से सम्बन्धित समस्त पहलुओं की समग्र आयोजना और इसके समन्‍वय के लिये राष्ट्रीय जलनीतियों के तहत राष्‍ट्रीय जल संसाधन परिषद और राष्ट्रीय जल बोर्ड के सहयोग से जल संसाधन मंत्रालय कार्य कर रहा है। यह देश के जल संसाधनों के विकास और विनिमयन हेतु नीतिगत दिशा-निर्देश और कार्यक्रम बनाने के लिये उत्तरदायी है।

    जल संसाधन मंत्रालय ने एकीकृत जल संसाधन विकास और प्रबन्धन के माध्‍यम से सभी राज्‍यों के अन्दर और बाहर जल का संरक्षण करने, जल के दुरुपयोग को कम करने और एक समान वितरण सुनिश्चित करने के प्रमुख उद्देश्‍यों को पूरा करने के लिये राष्‍ट्रीय जल मिशन बनाया।

    भूमण्डलीय जलवायु परिवर्तन को दृष्टिगत रखते हुए राष्‍ट्रीय जल मिशन सहित आठ जल मिशनों के माध्‍यम से जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से उत्‍पन्‍न चुनौतियों का सामना करने के लिये एक परिकल्‍पना निर्धारित की गई।

    वर्तमान में जल संसाधन मंत्रालय के अधीन केन्‍द्रीय जल आयोग, केन्‍द्रीय मृदा और सामग्री अनुसन्धानशाला, केन्‍द्रीय भूजल बोर्ड, केन्‍द्रीय जल और विद्युत अनुसन्धानशाला, बाणसागर नियंत्रण बोर्ड, सरदार सरोवर निर्माण सलाहकार समिति, गंगा बाढ़ नियंत्रण आयोग, फरक्‍का बाँध परियोजना, ऊपरी यमुना नदी बोर्ड, नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण, तुंगभद्रा बोर्ड, बेतवा नदी बोर्ड, ब्रह्मपुत्र बोर्ड, राष्‍ट्रीय जल विकास अभिकरण, राष्‍ट्रीय जल विज्ञान संस्‍थान, जल और भूमि प्रबन्धन का पूर्वोत्‍तर क्षेत्र संस्‍थान, नेशनल प्रोजेक्‍टस कंस्‍ट्रक्‍शन कारपोरेशन लिमिटेड और वाप्‍कोस लिमिटेड जैसे अनेक सम्बद्ध और अधीनस्‍थ कार्यालय, सांविधिक निकाय, पंजीकृत और सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम भारत के जलविश्लेषण और जल संरक्षण सम्बन्धी विविध कार्यों में संलग्न हैं।

    ये सभी जल सम्बद्ध कार्य विभिन्न केन्‍द्रीय और राज्य स्तरीय योजनाओं के तहत देश में जल संसाधन सूचना प्रणाली का विकास, बाढ़ पूर्वानुमानों, जल विज्ञान परियोजना, भूमि जलप्रबन्धन और विनियमन, जल अनुसन्धान और विकास, मानव संसाधन विकास/क्षमता निर्माण, राष्‍ट्रीय जल अकादमी, भूजल प्रशिक्षण संस्‍थान, सूचना, शिक्षा और संचार, सिंचाई प्रबन्धन, बाँध पुनरूज्‍जीवन और सुधार कार्यक्रम, जल निकायों की मरम्‍मत, नवीकरण और संरक्षण, नदी बेसिन प्रबन्धन और सीमावर्ती क्षेत्रों में कार्यों से सम्बन्धित कामों के सुचारु ढंग से संचालन के लिये किये जाते हैं।

    रमण के वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सोचा जाये तो इन सभी प्रबन्धनों के साथ-साथ देश के जल संसाधनों में जल की गुणवत्ता का परीक्षण भी उतना ही मायने रखता है। इस कार्य के लिये देश के जलविज्ञान संस्‍थानों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।

    भारत में सन 1978 में जलविज्ञान के समस्‍त पहलुओं पर वैज्ञानिक कार्यों में सहयोग देने के साथ-साथ व्‍यवस्‍थित रूप से इनका समन्‍वयन तथा प्रसार करने के लिये राष्‍ट्रीय जलविज्ञान संस्‍थान, रुड़की की स्‍थापना की गई थी। इस संस्‍थान का मुख्‍यालय रुड़की (उत्‍तराखण्ड) में स्‍थित है तथा बेलगाँव, जम्‍मू, काकीनाडा एवं सागर में इसके चार क्षेत्रीय केन्द्र तथा गुवाहाटी एवं पटना में दो बाढ़ प्रबन्धन अध्‍ययन केन्द्र भी हैं।

    शैक्षिक स्तर पर इस समय भारत में जलवैज्ञानिक विश्लेषणों के लिये विशेष पाठ्यक्रमों और प्रशिक्षणों को संचालित करने वाले और भी अनेक संस्थान हैं, जो देश के भावी जलवैज्ञानिकों को तैयार कर रहे हैं। इनमें अन्ना विश्वविद्यालय, चेन्नई, एम.एस. बड़ौदा विश्वविद्यालय, वड़ोदरा, श्री गुरू गोबिंद सिंह जी कॉलेज जल प्रबन्धन (सिविल) ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी, नांदेड़, क्षेत्रीय इंजीनियरी कॉलेज जल संसाधन इंजीनियरी और प्रबन्धन विभाग, तिरुचिरापल्ली, आन्ध्र विश्वविद्यालय, विशाखापत्तनम, अन्नामलाई विश्वविद्यालय हाइड्रोजियोलॉजी विभाग, अन्नामलाई नगर, दिल्ली कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग, सिविल इंजीनियर, द्रव-विज्ञान तथा बाढ़ नियंत्रण विभाग, दिल्ली, इंजीनियरी कॉलेज, जल संसाधन विकास तथा सिंचाई इंजीनियरी विभाग, रायपुर, आईआईटी मद्रास द्रव-विज्ञान और जल संसाधन इंजीनियरी एवं सिविल इंजीनियरी विभाग, चेन्नई, जवाहरलाल नेहरू प्रौद्योगिकीय विश्वविद्यालय हैदराबाद, षणमुगा कला विज्ञान प्रौद्योगिकी और अनुसन्धान जल विज्ञान और जल संसाधन अकादमी तंजावूर, भारत यूनिवर्सिटी (भारत उच्चतर शिक्षा और जल विज्ञान और जल संसाधन अनुसन्धान संस्थान), चेन्नई जैसे प्रमुख संस्थानों सहित इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय भी इंजीनियरी और सिंचाई और जल प्रबन्धन में डिग्रियाँ प्रदान करते हैं। इन संस्थानों में जल विज्ञान का अध्ययन रासायनिक जल विज्ञान, पारिस्थितिकी जल विज्ञान, हाइड्रोजियोलॉजी, हाइड्रोइन्फारमैटिक्स, हाइड्रोमिटियोरोलॉजी, भूतल जल-विज्ञान नामक विविध जलवैज्ञानिक शाखाओं के अन्तर्गत किया जाता है।

    समुद्र विज्ञान को भले ही व्यावहारिक तौर पर जलविज्ञान में शामिल नहीं किया गया है, परन्तु सी. वी. रमण के नीले समुद्री जल के विश्लेषण और अन्य समुद्री अनुसन्धानों के भी अपने विशेष महत्त्व होते हैं। अतः भारत की लम्बी समुद्री तटरेखा और देश की 37 प्रतिशत जनता की इस पर निर्भरता तथा देश के 32.8 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल की तुलना में 10 से 15 लाख वर्ग किमी की अतिरिक्त महाद्वीपीय खाड़ी क्षेत्र वाले 20 लाख वर्ग किमी क्षेत्रफल के विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र (ईईजेड) का ध्यान रखने वाले भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अन्तर्गत आने वाले समुद्र विज्ञान संस्थाओं में समुद्री जलों से सम्बन्धित अनुसन्धान किये जाते हैं।


    भारत सरकार द्वारा जल सहित अन्य प्राकृतिक संसाधनों से सम्बन्धित तथ्यों के लिये 1951 में निर्मित किये गए राष्ट्रीय संसाधन और वैज्ञानिक अनुसन्धान नामक एक मंत्रालय के बाद से उसमें सामयिक व परिस्थितिजन्य परिवर्तनों के साथ आज का जल संसाधन मंत्रालय रमण के उस जीवन अमृत जल की सुरक्षा का उत्तरदायित्व निभा रहा है। देश के जल संसाधनों के सुव्‍यवस्‍थित विकास से सम्बन्धित समस्त पहलुओं की समग्र आयोजना और इसके समन्‍वय के लिये राष्ट्रीय जलनीतियों के तहत राष्‍ट्रीय जल संसाधन परिषद और राष्ट्रीय जल बोर्ड के सहयोग से जल संसाधन मंत्रालय कार्य कर रहा है।

    इन संस्थानों में मौसम /जलवायु पैरामीटरों, समुद्र स्थिति, भूकम्पों, सुनामियों और पृथ्वी प्रणाली से सम्बन्धित अन्य परिघटनाओं के पूर्वानुमानों के साथ-साथ समुद्री संसाधनों (सजीव एवं निर्जीव) के अन्वेषण और दोहन हेतु समुद्र विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी पर भी कार्य किये जाते हैं। इनके अलावा अंटार्कटिक/आर्कटिक तथा दक्षिणी महासागर अनुसन्धान भी शामिल हैं।

    भारत के महासागर नीति संकल्प में परिभाषित एकता निर्माण एवं विशेषज्ञता प्राप्त प्रशिक्षित मानव संसाधन तैयार करने की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए देश में कुछ प्रमुख राष्ट्रीय संस्थानों जैसे राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान (एनआईओ), गोवा, राष्ट्रीय महासागर प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईओटी) चेन्नई, राष्‍ट्रीय अंटार्कटिक एवं समुद्री अनुसन्धान केन्‍द्र, (एनसीएओआर) गोवा, भारतीय राष्ट्रीय महासागर सूचना एवं सेवा केन्द्र (आईएनसीओआईएस) हैदराबाद, परियोजना निदेशालय, एकीकृत तटीय एवं समुद्री क्षेत्र प्रबन्धन (पीडी-आईसीएमएएम) चेन्नई तथा समुद्री सजीव संसाधन एवं पारिस्थितिकी केन्द्र (सीएमएलआरई) कोच्चि में उत्कृष्ट समुद्री अनुसन्धान सम्पादित किये जाते हैं।

    इन संस्थानों में समुद्री आपदा पूर्व चेतावनी सहायता, चक्रवात पूर्वानुमान, भूकम्प प्रेक्षण, पूर्वानुमान और प्रशमन, पूर्वानुमान प्रदर्शन, मानसून परिवर्तनीयता, तूफान महोर्मि, सुनामी चेतावनी प्रणाली, समुद्री प्रेक्षण प्रणाली, समुद्र विज्ञान व समुद्री सेवाएँ, समुद्री रंग अनुसन्धान, समुद्री मॉडलिंग, समुद्री प्रेक्षण प्रणाली, समुद्री सर्वेक्षण संसाधन और प्रौद्योगिकी, गहरा समुद्र प्रौद्योगिकी विकास, एकीकृत गहरा समुद्र खनन प्रणाली का विकास, एकीकृत महासागर वेधन कार्यक्रम (आईओडीपी), प्रौद्योगिकी प्रदर्शित जलयानों की आरम्भण, समुद्री सेंसरों, इलेक्ट्रॉनिक यंत्रों और समुद्री ध्वानिकी यंत्रों की स्थापना, समुद्री ऊर्जा के दोहन का अध्ययन, अपतटीय अवसंरचनाओं एवं समुद्र संस्त‍र खनिजों के अध्ययन तटीय और समुद्री पारिप्रणाली विषयों पर गम्भीर रूप से अनुसन्धान कार्य व अध्ययन चल रहे हैं।

    विज्ञान की नितनूतन उत्कृष्ट तकनीकों के आविर्भाव ने जल-विज्ञान और समुद्र विज्ञान की जल-विज्ञान प्रक्रियाओं के गूढ़ अध्ययनों में सैद्धान्तिक दृष्टिकोणों को कई नए आयाम दिये हैं।

    एक बात जरुर है कि जहाँ एक ओर देश के ये जल संस्थान जल गुणवत्ता से लेकर जल संरक्षण की दिशा में निरन्तर प्रयासरत रहते हैं, फिर भी व्यावहारिक स्तर पर स्थिति यह है कि भारत का एक बड़ा भूभाग जल समस्याओं से गुजर रहा है।

    जनसंख्या वृद्धि, शहरीकरण और जीवनशैली में परिवर्तन के कारण तेजी से बढ़ रही जल की माँग, जलस्रोतों में बढ़ते प्रदूषण और बाढ़, अधिक भू-कटाव तथा सूखे जैसी प्राकृतिक जल सम्बन्धी आपदाओं ने देश में जल सुरक्षा के लिये गम्भीर चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं। इनको दृष्टिगत रखते हुए भारतीय जल संस्थान सम्बन्धित समस्त आँकड़ों जैसे वर्षा, हिम वर्षा, भू-आकृति विज्ञान, जलवायु, सतही जल, भूजल, जल गुणवत्ता, पारिस्थितिकी, जल निकासी, सिंचित क्षेत्र, हिमनद इत्यादि सम्बन्धित सभी आँकड़ों को सुव्यवस्थित ढंग से समेकित करते हैं तथा आजकल डाटाबेस विकसित किये जा रहे हैं।

    बिल्कुल अद्यतन जल संरक्षण की बात की जाये तो पिछले वर्ष ही मार्च 2017 में विश्व बैंक ने 17.5 करोड़ डॉलर की एक राष्ट्रीय जलविज्ञान परियोजना को अपनी स्वीकृति दी। इससे भारतीय जल संस्थानों को जहाँ अपने-अपने क्षेत्रों में जल की स्थिति का आकलन करने में सहायता मिली है, बल्कि बाढ़ व सूखे को लेकर संवेदनशीलता की स्थिति भी कम हुई है। इसके पहले भी भारत ने अपनी कई बड़ी जल परियोजनाओं पर सफलतापूर्वक काम किये हैं।

    एक रिपोर्ट के अनुसार भारत के 4500 बड़े-बड़े बाँध में 220 अरब घनमीटर जल के संरक्षण की क्षमता रखते हैं और 11 मिलियन कुओं को जल पुनर्भरण द्वारा पुनर्जीवित किया जा सकता है। देश में जल संरक्षण एवं प्रबन्धन को सुदृढ़ बनाने, नदियों के बहाव की निगरानी करने और जल संरक्षण एवं प्रदूषण निवारण आदि के लिये एक ‘जल क्रान्ति अभियान’ नामक एकीकृत योजना भी चल रही है। इसके अलावा कृषि सिंचाई योजना, जल निकायों की मरम्मत, नवीकरण एवं पुनरुद्धार, एकीकृत वाटरशेड मैनेजमेंट कार्यक्रम, राष्ट्रीय जल मिशन कार्यक्रम, त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम, बाँध पुनरुद्धार एवं सुधार परियोजना आदि भी क्रियारत हैं।

    यह भी सही है कि कभी-कभी इन सभी कामों का व्यावहारिकता में दिखना बहुत जरूरी होता है, जो भारत में कम ही होता है। हमेशा से आवश्यकता इस बात की रही है कि देश और उसकी योजनाएँ और उसके प्रयास सही मायनों में वो सब कुछ करके दिखाएँ जिसका आह्वान सी. वी. रमण की जलचेतना ने आज से बरसों पहले किया था। तभी सच्चे अर्थों में हम राष्ट्रीय विज्ञान दिवस को सार्थक रूप दे पाएँगे। प्रयास ऐसे हों जो सर सी. वी. रमण के कालजयी निबन्ध “The Elixir of Life” के प्रति अपनी वैज्ञानिक निष्ठा के सजीव प्रतीक साबित हो सकें।


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    दीपांकर चक्रवर्ती - अपना घर जलाकर उजाला करने वाला शख्स

    RuralWaterSun, 03/04/2018 - 15:25

    श्रद्धांजलि


    दीपांकर चक्रवर्तीदीपांकर चक्रवर्तीसन 1983 में केसी साहा ने पश्चिम बंगाल के पानी में जब पहली बार आर्सेनिक की मौजूदगी पर शोध किया था, तो कोई नहीं जानता था कि आखिर यह क्या बला है और क्यों है।

    लेकिन, आज पश्चिम बंगाल में आर्सेनिक बहस का मुद्दा है। यहाँ की एक बड़ी आबादी आर्सेनिक की चपेट में है।

    आर्सेनिक जैसे विषय को चर्चा में लाने का सबसे ज्यादा श्रेय अगर किसी व्यक्ति को जाता है, तो वे थे दीपांकर चक्रवर्ती। दीपांकर चक्रवर्ती का निधन 28 फरवरी, 2018 को हो गया। 28 फरवरी को अचानक उनकी तबीयत बिगड़ जाने से उन्हें इलाज के लिये अस्पताल ले जाया गया था, जहाँ उन्होंने अन्तिम साँस ली। वह 72 वर्ष के थे।

    वह चुपचाप रहकर जिस तरह आर्सेनिक पर काम करते रहे, उसी तरह खामोशी से इस दुनिया से भी चले गए। बस छोड़ गए तो अपना काम, जो आने वाले समय में आर्सेनिक के शोधकर्ताओं का काम आसान कर देगा।

    आज अगर सरकार आर्सेनिक को लेकर थोड़ा-बहुत भी गम्भीर है, तो इसके लिये केवल और केवल दीपांकर चक्रवर्ती को ही शुक्रिया कहना चाहिए।

    दीपांकर चक्रवर्ती ने आर्सेनिक पर इतना ज्यादा काम किया है कि उन्हें ‘बंगाल का आर्सेनिक मैन’ तक कहा जाता था।

    उन्होंने जादवपुर विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर और पीएचडी की डिग्री ली थी। इसके बाद उसी विश्वविद्यालय में बतौर अध्यापक उन्होंने करियर की शुरुआत की थी। बाद में शोध के सिलसिले में वह विदेश गए और करीब डेढ दशक तक विदेश में शोध कार्य को अंजाम दिया। बाद में वह पश्चिम बंगाल लौटे और फिर यहीं रहकर शोध कार्य करने लगे।

    सन 2008 में वह स्कूल ऑफ एनवायरन्मेंट स्टडीज के डायरेक्टर के पद से सेवानिवृत्त हुए, लेकिन शोध कार्य को नेतृत्व देते रहे।

    उनके विदेश से लौटने का किस्सा इतना सीधा-सपाट नहीं है। असल में उनके पश्चिम बंगाल लौटने के पीछे दिलचस्प कहानी है, जिससे काम के प्रति उनके समर्पण, अपनी मिट्टी से लगाव और उनकी संवेदनशीलता का पता चलता है।

    शोध के सिलसिले में जब वह पश्चिमी देश गए थे, तो पश्चिमी देशों में उन्होंने वहाँ लम्बे समय तक शोध किया, लेकिन बंगाल को लेकर उन्होंने कभी बडे पैमाने पर काम नहीं किया था।

    यह सन 1988 की बात है। वह विदेश से कोलकाता लौटे, तो उन्हें बंगाल में आर्सेनिकोसिस से कुछ लोगों के बीमार पड़ने की सूचना मिली। उस वक्त आर्सेनिक के बारे में न तो सरकार को ज्यादा पता था और न ही आम लोगों को। लोग वर्षों से ट्यूबवेल का वही पानी पी रहे थे, जिसमें आर्सेनिक था।

    उन्हें जब सूचना मिली, तो उन्होंने आर्सेनिक से बुरी तरह ग्रस्त मालदह जिले के गाँवों में जाने का फैसला किया। जब वह मालदह के गाँवों में गए, तो उन्हें पता चला कि यहाँ आर्सेनिक किस तरह लोगों को मौत के करीब ले जा रहा है। उन्होंने पाया कि यहाँ के कई लोग आर्सेनिक से होने वाले कैंसर से जूझ रहे हैं, लेकिन उन्हें पता ही नहीं है कि यह बीमारी उन्हें हुई कैसे।

    मौत के मुँह में जा रहे असहाय लोगों का थका व मायूस चेहरा उनकी आँखों के सामने बार-बार आने लगा। वह बेचैन हो उठे और फिर एक दिन उन्होंने पश्चिम बंगाल में रहकर आर्सेनिक पर काम करने का जोखिम भरा निर्णय ले लिया।

    उनका यह निर्णय कुछ-कुछ सन 2004 में आयी शाहरुख खान अभिनीत ‘स्वदेश’ फिल्म के मोहन भार्गव जैसा था। जिस तरह मोहन भार्गव गाँव की समस्याओं को देखकर परेशान हो जाता है और अमेरिका में नासा की नौकरी छोड़कर गाँव आ जाता है। उसी तरह चक्रवर्ती ने भी विदेश का अच्छा खासा काम छोड़ दिया और पश्चिम बंगाल में आकर आर्सेनिक पर काम करने लगे।

    विदेश से लौटने के बाद उन्हें यह महसूस हुआ कि आर्सेनिक जिस तरह बंगाल में अपनी जड़ें फैलाए हुए है, उसके लिये छिटपुट काम करने से कोई फायदा नहीं होने वाला, बल्कि इसकी जगह एक अलग ही विंग तैयार किया जाना चाहिए, जो आर्सेनिक पर केन्द्रित हो।

    जादवपुर यूनिवर्सिटी में वर्ष 1989 में शामिल किया गया नया विभाग ‘स्कूल ऑफ एनवायरन्मेंटल स्टडीज’ उनकी ही सोच का परिणाम था। दूसरे शब्दों में कहें, तो इस विभाग की स्थापना उन्होंने ही की थी। डॉ चक्रवर्ती स्कूल ऑफ एनवायरन्मेंटल स्टडीज के डायरेक्टर के पद पर भी रहे।

    स्कूल ऑफ एनवायरन्मेंटल स्टडीज अभी आर्सेनिक व पर्यावरण को लेकर व्यापक स्तर पर काम कर रहा है।जनकल्याण का काम उनकी प्राथमिकता की सूची में पहले पायदान पर था और यही वजह रही कि कई बार उन्होंने निजी कमाई खर्च कर आर्सेनिक पर काम किया और कराया।

    जादवपुर विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ एनवायरन्मेंट स्टडीज में आर्सेनिक रिसर्च यूनिट बनाने का श्रेय भी उनको ही जाता है। बताया जाता है कि इस यूनिट की स्थापना करने के लिये उन्होंने निजी कमाई से 1.22 करोड़ रुपए जमा किया था और उसे बैंक में डाल दिया था। बैंक से जो ब्याज मिलता था, उससे कई योजनाओं पर काम किया जाता।

    अब यह यूनिट इतना समर्थ हो गया है कि उसे किसी फंड की जरूरत नहीं पड़ती है। इस यूनिट की ओर से गंगा-मेघना-ब्रह्मपुत्र के मैदानी इलाकों में आर्सेनिक के असर को लेकर कई शोध किये जा चुके हैं। इसके अलावा तमाम स्कूल-कॉलेजों के जलस्रोतों की भी जाँच कर पता लगाया गया कि पानी में आर्सेनिक है या नहीं। यही नहीं, ढाका कम्युनिटी अस्पताल के साथ मिलकर आर्सेनिक रिसर्च यूनिट ने बांग्लादेश के 64 जिलों में आर्सेनिक के असर पर भी शोध किया।

    आर्सेनिक को लेकर उनकी चिन्ता को इससे भी समझा जा सकता है कि आर्सेनिक पर काम करते हुए उन्हें जो पुरस्कार राशि, कंसल्टेंसी फीस व एनवायरन्मेंटल एनालिटिकल फीस मिलती थी, वह उसे स्कूल ऑफ एनवायरन्मेंटल स्टडीज के डेवलपमेंट फंड के हवाले कर देते थे।

    अपने फंड से शोध कार्य करने के पीछे उनका एक और तर्क था। वह मानते थे कि किसी दूसरी संस्था के फंड से शोध करने पर शोध पत्र के छपने की सम्भावनाएँ सीमित हो जाती हैं। वहीं, अगर स्वतंत्र रूप से शोध किया जाये, शोध पत्र को बड़ा फलक मिलता है।

    फिलहाल आर्सेनिक रिसर्च यूनिट के खाते में 100 से ज्यादा शोध पत्र व तीन पेटेंट हैं। खुद चक्रवर्ती के 200 से अधिक शोध-पत्र अलग-अलग प्रकाशनों में प्रकाशित हो चुके हैं। यही नहीं, वह अब तक 20 से अधिक किताबें भी लिख चुके हैं।

    बहरहाल, हम वापस लौटते हैं उस कहानी की तरफ जब वह विदेश छोड़कर पश्चिम बंगाल में रहने का फैसला लेते हैं।

    यहाँ आकर उन्होंने सबसे पहले सन 1982 से लेकर 1988 तक विभिन्न अखबारों में छपी उन खबरों को एक जगह संकलित किया, जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से आर्सेनिक से जुड़ी हुई थीं। इससे उनके सामने पश्चिम बंगाल में आर्सेनिक के असर की एक तस्वीर आ गई। इसमें उन्होंने कुछ छात्रों की मदद ली, जिन्होंने पूरे समर्पण के साथ छह सालों तक विभिन्न अखबारों में छपी आर्सेनिक की खबरों को इकट्ठा करने का दुरूह कार्य किया।

    इससे उन्हें आर्सेनिक पर काम शुरू करने में काफी मदद मिली।

    इसके बाद उन्होंने शोध का जिम्मा अपने हाथ में लिया और सन 1995 में बंगाल में आर्सेनिक को लेकर एक अन्तरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस किया। यही नहीं, वे विदेशी प्रतिनिधियों को आर्सेनिक का असर दिखाने के लिये दक्षिण 24 परगना जिले के बारुईपुर के रामगढ़ ले गए। वहाँ मीडियाकर्मी भी पहुँचे और इसके बाद ही बंगाल में आर्सेनिक की समस्या को लेकर गम्भीर विमर्श शुरू हुआ। तब से लेकर अब तक वह लगातार आर्सेनिक को लेकर काम कर रहे थे।

    उन्होंने जिस तरह अपने बूते पश्चिम बंगाल में आर्सेनिक को लेकर काम किया, उसके लिये राज्य सरकार को चाहिए था कि उन्हें पुरस्कृत करती, लेकिन पुरस्कार देना तो दूर राज्य सरकार ने उनके काम को तवज्जो ही नहीं दिया।

    इसको लेकर उनमें नाराजगी भी थी, जो कभी-कभी सामने आ जाती थी, लेकिन वह हमेशा उस रास्ते पर जाने से परहेज करते रहे, जिससे सरकार के साथ टकराव की स्थिति बनती। वह विदेश से इसलिये नहीं आये थे कि सरकार से टकराएँ। वह यहाँ आर्सेनिक पर काम करने आये थे, इसलिये सरकार से टकराने की जगह उन्होंने सिर्फ-और-सिर्फ अपना काम किया, किसी भी तरह के सम्मान की आकांक्षा से परे रहकर।

    पर्यावरणविद सौमेंद्र मोहन घोष ने करीब एक दशक तक उनके साथ काम किया था। सन 1990 से 95 तक आदि गंगा के आसपास के क्षेत्रों के ग्राउंड वाटर की जाँच में उन्हें दीपांकर चक्रवर्ती की मदद मिली और इसके बाद सन 2000 से 2005 तक वायु प्रदूषण को लेकर दोनों ने काम किया। सौमेंद्र मोहन घोष उन्हें याद करते हुए कहते हैं, ‘सन 1990 से 1995 तक हमने कोलकाता के दक्षिणी हिस्से में काम किया था और आर्सेनिक वाले ट्यूबवेल पर लाल निशान लगाए थे। दीपांकर चक्रवर्ती ने ही कहा था कि कोलकाता आर्सेनिक के बम पर बैठा है।’

    घोष आगे कहते हैं, ‘दीपांकर चक्रवर्ती इंटेलिजेंट थे और बिना किसी स्वार्थ के लगातार काम करते रहे। आर्सेनिक पर सरकार के उदासीन रवैए से वह नाराज थे। उनके साथ काम करते हुए मैंने यह महसूस किया था, लेकिन इससे उनके काम पर जरा-सा भी असर नहीं दिखता था।’

    दीपांकर चक्रवर्ती का मानना था कि आर्सेनिक की समस्या के समाधान में वाटर बॉडीज की बड़ी भूमिका हो सकती है।

    उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था, ‘बारिश के पानी का संग्रह कर उनका इस्तेमाल इसका एक समाधान है, लेकिन असल बात यह है कि आर्सेनिकग्रस्त क्षेत्रों में पानी की मौजूदगी है, बस, उनके प्रभावी प्रबन्धन की जरूरत है। आर्सेनिकग्रस्त क्षेत्र में जलाशय हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल न कर भूजल का दोहन किया जा रहा है।’

    उन्होंने आगे कहा था, ‘वाटरशेड मैनेजमेंट के साथ ही वाटर रेगुलेशंस, नीति व जागरुकता की आवश्यकता है, क्योंकि सभी जगहों के लिये एक तरह का समाधान कारगर नहीं हो सकता है।’

    वह यह भी मानते थे कि आर्सेनिक रिमूवल प्लांट प्रभावी हो सकता है लेकिन इसके लिये बढ़िया प्रबन्धन व जनभागीदारी यानी प्लांट के लाभुकों की भागीदारी होनी चाहिए।

    जादवपुर विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ एनवायरन्मेंट स्टडीज के वर्तमान डायरेक्टर तरित राय चौधरी ने दीपांकर चक्रवर्ती की देखरेख में पीएचडी की थी। रायचौधरी ने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ साइंस (टोक्यो) में 6 वर्षों के लिये शोध किया था। इस शोध कार्य में भी उन्होंने दीपांकर चक्रवर्ती की मदद ली थी।

    तरित राय चौधरी उन्हें आर्सेनिक योद्धा मानते हैं। उन्होंने कहा, ‘दीपांकर चक्रवर्ती ने आर्सेनिक को लेकर सन 1989 से काम करना शुरू किया था और जीवन पर्यन्त वे यही काम करते रहे। ऐसा शायद ही कोई वक्त रहा होगा, जब उन्होंने आर्सेनिक व उसके असर के बारे में नहीं सोचा होगा। उन्होंने अपना पूरा जीवन ग्राउंड वाटर में आर्सेनिक की मौजूदगी, मानव पर इसके प्रभाव और इसकी रोकथाम पर शोध करने में ही खपा दिया।’

    आर्सेनिक पर दीपांकर चक्रवर्ती का शोध इतना गहन और प्रभावी था कि नेचर जैसे जर्नल में उनके शोध पत्र को जगह दी गई थी।

    तरित राय चौधरी ने बताया कि नेचर के सन 1999 के अंक में वह विस्तृत शोध छपा था और इसमें मैं भी बतौर लेखक शामिल था।

    तरित राय चौधरी पिछले तीन दशकों से दीपांकर चक्रवर्ती के साथ काम कर रहे थे। दूसरे शब्दों में कहें, तो वह आर्सेनिक के मुद्दे पर तरित राय चौधरी के ‘गुरू’ थे। राय चौधरी कहते हैं, ‘विज्ञान को लेकर उनमें गजब का उत्साह और समर्पण था। उनमें अथाह ऊर्जा और क्षमता थी। उन्होंने जिस तरह आर्सेनिक की वीभिषिका को पूरे समर्पण के साथ सामने लाया था, वह काबिल-ए-तारीफ है।’

    दीपांकर चक्रवर्ती अच्छे कामों के कद्रदान भी थे और कोई बेहतर शोध करता, तो खुलकर उसकी तारीफ करते थे।

    तरित राय चौधरी बताते हैं कि जब उन्होंने भोज्य पदार्थों में आर्सेनिक की घुसपैठ पर वृहद शोध किया था, तो दीपांकर चक्रवर्ती ने उस शोध की खूब प्रशंसा की थी।

    दीपांकर चक्रवर्ती संप्रति आर्सेनिक को लेकर चल रहे कई शोधों की देखरेख कर रहे थे। उनके जाने से ये शोध कार्य प्रभावित होंगे। तरित राय चौधरी ने कहा, ‘अधूरे पड़े शोध कार्यों को पूरा करना अभी सबसे बड़ी चुनौती है हमारे लिये। जादवपुर विश्वविद्यालय प्रबन्धन अगर मुझे इजाजत देगा तो मैंने पिछले तीन दशकों तक उनके अभिभावकत्व में जो कुछ सीखा है, उसकी बदौलत अधूरे शोध कार्यों को पूरा करने की कोशिश करुँगा।’

    किसी व्यक्ति ने विदेश में एक अच्छा-खासा करियर के मौके को छोड़कर अपने खर्च पर अपने देश में आकर शोध किया, ऐसे उदारहण विरले ही होते हैं। दीपांकर चक्रवर्ती ऐसे ही शख्स थे।

    आर्सेनिक को लेकर उनका किया गया काम मील का पत्थर है। उनका जाना बहुत बड़ा नुकसान है, जिसकी भरपाई मुमकिन नहीं है।

    दीपांकर चक्रवर्ती का जाना केवल उनका जाना नहीं है, आर्सेनिक से लोगों को बचाने और इस महामारी से निबटने की तमाम सम्भावनाओं का जाना है।

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    जलवायु परिवर्तन के प्रभावRuralWaterMon, 03/05/2018 - 15:09

    Source
    आईसेक्ट विश्विद्यालय द्वारा अनुसृजन परियोजना के अन्तर्गत निर्मित पुस्तक जलवायु परिवर्तन - 2015

    ग्लोबल वार्मिंगग्लोबल वार्मिंगजीवाश्म ईंधन के दहन और प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन के कारण जलवायु परिवर्तन की गम्भीर समस्या उत्पन्न हुई है। यदि जलवायु परिवर्तन को समय रहते न रोका गया तो लाखों लोग भुखमरी, जल संकट और बाढ़ जैसी विपदाओं का शिकार होंगे। यह संकट पूरी दुनिया को प्रभावित करेगा। यद्यपि जलवायु परिवर्तन का सबसे अधिक असर गरीब देशों पर पड़ेगा।इसके साथ ही इसका सबसे ज्यादा असर ऐसे देशों को भुगतना पड़ेगा, जो जलवायु परिवर्तन के लिये सबसे कम जिम्मेदार हैं। पिछड़े और विकासशील देशों पर जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न समस्याओं का खतरा अधिक होगा।

    जलवायु परिवर्तन आर्कटिक क्षेत्र, अफ्रीका और छोटे द्वीपों को अधिक प्रभावित कर रहा है। उत्तरी ध्रुव (आर्कटिक) शेष दुनिया की तुलना में दोगुनी दर से गर्म हो रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार आगामी कुछ वर्षों में ग्रीष्म ऋतु के दौरान उत्तरी ध्रुव की बर्फ पिघल जाएगी। एक अन्य अध्ययन के अनुसार ऐसा छः वर्ष के दौरान भी हो सकता है।

    पिछले 100 वर्षों में अंटार्कटिका के तापमान में दोगुनी वृद्धि हुई है। इसके कारण अंटार्कटिका के बर्फीले क्षेत्रफल में भी कमी आई है। इस प्रकार वहाँ की पारिस्थितिकी में होने वाले बदलावों के कारण वहाँ उपस्थित समस्त जीव भी प्रभावित होते हैं। यदि तापमान में वृद्धि इसी तरह होती रही तो इस सदी के अन्त तक एल्प्स पर्वत शृंखला के लगभग 80 प्रतिशत हिमनद (ग्लेशियर) पिघल जाएँगे। हमारे लिये यह चिन्ता का विषय है कि हिमालय क्षेत्र के हिमनद विश्व के अन्य क्षेत्रों के हिमनदों से अधिक तेजी से पिघल रहे हैं।

    धरती के तापमान में वद्धि के कारण हिमनद और ध्रुवीय प्रदेशों की बर्फ पिघलने की रफ्तार बढ़ गई है जिसके परिणामस्वरूप महासागरों का जल स्तर औसतन 27 सेंटीमीटर ऊपर उठ चुका है। जलवायु विज्ञानियों के अनुसार यदि वायुमंडल में ग्रीन हाउस गैसों में जमाव का सिलसिला जारी रहा तो धरती के तापमान में वृद्धि होती रहेगी जिसके परिणामस्वरूप हिमनद और ध्रुवीय इलाकों की बर्फ पिघलने की रफ्तार बढ़ने से सागर तटीय इलाकों के डूबने का खतरा बढ़ जाएगा और महासागरों का बढ़ता जलस्तर मालदीव जैसे हजारों द्वीपों को डूबा देगा।

    इसके अलावा कार्बन डाइऑक्साइड की बढ़ती मात्रा के कारण महासागरीय पारिस्थितिकी तंत्र भी प्रभावित हुए हैं। आज महासागरीय जल में अम्लता की मात्रा बढ़ती जा रही है, जिसके कारण महासागरों में रहने वाले जीवों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इसके अतिरिक्त महासागरों की कार्बन डाइऑक्साइड गैस को सोखने की क्षमता में भी दिनोंदिन कमी हो रही है। प्रदूषण के कारण पारिस्थितिकी-तंत्र को काफी नुकसान पहुँचता है और इस कारण से पृथ्वी पर व्यापक उथल-पुथल मच सकती है।

    भविष्य में यदि तापमान में वृद्धि अधिक तेजी से होने लगी तो इसका परिणाम बहुत भयानक हो सकता है। तापमान में केवल 1-2 डिग्री सेल्सियस के अन्तर के कारण ही धरती के अनेक भागों में कृषि में व्यापक परिवर्तन हो सकता है। चराई के लिये उपलब्ध क्षेत्रों में परिवर्तन होने के साथ ही पानी की उपलब्धता पर भी इसका प्रभाव पड़ेगा और इन सब के परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में लोगों का पलायन होगा।

    जलवायु परिवर्तन जनित सूखे और बाढ़ के कारण बड़े पैमाने पर पलायन होने से सामाजिक सन्तुलन बिगड़ेगा। इसके परिणामस्वरूप अस्थिरता और हिंसा से राष्ट्रीय अन्तरराष्ट्रीय असुरक्षा पैदा होगी। जलवायु परिवर्तन के कारण उत्पन्न खाद्यान्न संकट और पानी की कमी से विश्वव्यापी अशान्ति फैलने वाली है उसकी चपेट में भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश तथा चीन भी आएँगे। ‘‘जलवायु परिवर्तन खाद्य सुरक्षा के लिये खतरा नामक’’ एक रिपोर्ट के अनुसार आने वाले दशकों में जलवायु परिवर्तन कई समुदायों के आपसी तालमेल को प्रभावित करेगा।

    जलवायु परिवर्तन का प्रभाव विश्व के समस्त क्षेत्रों में दिखाई देगा। भारत भी जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणामों से बच नहीं पाएगा। पृथ्वी के बढ़ते तापमान के कारण भारत को भी अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि इस शताब्दी के अन्त तक भारत में औसत तापमान में 4 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होगी।

    भारतीय अन्तरिक्ष अनुसन्धान संगठन (इसरो) ने उपग्रहों से प्राप्त आँकड़ों के आधार पर बताया है कि भारतीय समुद्र 2.5 मिलीमीटर वार्षिक की दर से ऊपर उठ रहा है। एक अध्ययन से यह अनुमान लगाया जा रहा है कि यदि भारतीय सीमा से सटे समुद्रों के जल-स्तर के ऊपर उठने का यह सिलसिला जारी रहा तो सन 2050 तक समुद्री जलस्तर 15 से 36 सेंटीमीटर ऊपर उठ सकता है। समुद्री जलस्तर में 50 सेंटीमीटर की वृद्धि होने पर अनेक इलाके डूब जाएँगे। भारत के सुन्दरबन डेल्टा के करीब एक दर्जन द्वीपों पर डूबने का खतरा मँडरा रहा है जिससे सात करोड़ से अधिक आबादी प्रभावित होगी।

    जलवायु परिवर्तन के प्रभाव


    हाल के दशकों में ग्रीन हाउस प्रभाव के चलते अनेक क्षेत्रों में औसत तापमान में बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है। वैज्ञानिकों की भविष्यवाणी के अनुसार वर्ष 2020 तक पूरी दुनिया का तापमान पिछले 1000 वर्षों की तुलना में सर्वाधिक होगा।

    इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज ने वर्ष 1995 में भविष्यवाणी की थी कि अगर मौजूदा प्रवृत्ति जारी रही तो 21वीं सदी में तापमान में 3.5 से 10 डिग्री सेल्सियस तक की वृद्धि होगी। बीसवीं सदी में विश्व की सतह का औसतन तापमान 0.6 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ा है। वैश्विक स्तर पर वर्ष 1998 सबसे गर्म वर्ष था और वर्ष 1990 का दशक अभी तक का सबसे गर्म दशक था जो यह साबित करता है कि ग्रीन हाउस प्रभाव के परिणामस्वरूप जलवायु परिवर्तन का दौर आरम्भ हो चुका है। जलवायु परिवर्तन के अनेक परिणाम होंगे जिनमें से ज्यादातर हानिकारक होंगे।

    वर्षा पर प्रभाव


    जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप दुनिया के मानसूनी क्षेत्रों में वर्षा में वृद्धि होगी जिससे बाढ़, भूस्खलन तथा भूमि अपरदन जैसी समस्याएँ पैदा होंगी। जल की गुणवत्ता में गिरावट आएगी। ताजे जल की आपूर्ति पर गम्भीर प्रभाव पड़ेंगे।

    जहाँ तक भारत का सवाल है, मध्य तथा उत्तरी भारत में कम वर्षा होगी जबकि इसके विपरीत देश के पूर्वोत्तर तथा दक्षिण-पश्चिमी राज्यों में अधिक वर्षा होगी। परिणामस्वरूप वर्षाजल की कमी से मध्य तथा उत्तरी भारत में सूखे जैसी स्थिति होगी जबकि पूर्वोत्तर तथा दक्षिण पश्चिमी राज्यों में अधिक वर्षा के कारण बाढ़ जैसी समस्या होगी। दोनों ही स्थितियों में कृषि उत्पादकता पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। सूखा और बाढ़ के दौरान पीने और कपड़े धोने के लिये स्वच्छ जल की उपलब्धता कम होगी। जल प्रदूषित होगा तथा जल-निकास की व्यवस्थाओं को हानि पहुँचेगी।

    जलवायु परिवर्तन जलस्रोतों के वितरण को भी प्रभावित करेगा। उच्च अक्षांश वाले देशों तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के जलस्रोतों में जल अधिकता होगी जबकि मध्य एशिया में जल की कमी होगी। निम्न अक्षांश वाले देशों में जल की कमी होगी।

    समुद्री जल स्तर पर प्रभाव


    जलवायु परिवर्तन के फलस्वरूप ध्रुवीय बर्फ के पिघलने के कारण विश्व का औसत समुद्री जलस्तर इक्कीसवीं शताब्दी के अन्त तक 9 से 88 सेमी. तक बढ़ने की सम्भावना है, जिससे दुनिया की आधी से अधिक आबादी जो समुद्र से 60 कि.मी. की दूरी पर रहती है, पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा।

    बांग्लादेश का गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा, मिस्र की नील डेल्टा तथा मार्शल द्वीप और मालदीव सहित अनेक छोटे द्वीपों का अस्तित्व वर्ष 2100 तक समाप्त हो जाएगा। इसी खतरे की ओर सम्पूर्ण विश्व का ध्यान आकर्षित करने के लिये अक्टूबर 2009 में मालदीव सरकार की कैबिनेट ने समुद्र के भीतर बैठकर एक अनूठा प्रयोग किया था। इस बैठक में दिसम्बर 2009 के कोपेनहेगन सम्मेलन के लिये एक घोषणापत्र भी तैयार किया गया था। प्रशांत महासागर का सोलोमन द्वीप जलस्तर में वृद्धि के कारण डूबने के कगार पर है।

    जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप भारत के उड़ीसा, आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल कर्नाटक, महाराष्ट्र, गोवा, गुजरात और पश्चिम बंगाल राज्यों के तटीय क्षेत्र जलमग्नता के शिकार होंगे। परिणामस्वरूप आसपास के गाँवों व शहरों में 10 करोड़ से भी अधिक लोग विस्थापित होेंगे जबकि समुद्र में जलस्तर की वृद्धि के परिणामस्वरूप भारत के लक्षद्वीप तथा अंडमान निकोबार द्वीपों का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। समुद्र का जलस्तर बढ़ने से मीठे जल के स्रोत दूषित होंगे परिणामस्वरूप पीने के पानी की समस्या होगी।

    जलवायु परिवर्तन का प्रभाव समुद्र में पाये जाने वाली जैवविविधता सम्पन्न प्रवाल भित्तियों पर पड़ेगा जिन्हें महासागरों का उष्ण कटिबन्धीय वर्षावन कहा जाता है। समुद्री जल में उष्णता के परिणामस्वरूप शैवालों (सूक्ष्मजीवी वनस्पतियों) पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा जो कि प्रवाल भित्तियों को भोजन तथा वर्ण प्रदान करते हैं। उष्ण महासागर विरंजन प्रक्रिया के कारक होंगे जो इन उच्च उत्पादकता वाले पारितंत्रों को नष्ट कर देंगे।

    प्रशान्त महासागर में वर्ष 1997 में अलनीनो के कारण बढ़ने वाली ताप की तीव्रता प्रवालों की मृत्यु का सबसे गम्भीर कारण बनी है। एक अनुमान के अनुसार पृथ्वी की लगभग 10 प्रतिशत प्रवाल भित्तियों की मृत्यु हो चुकी है, 30 प्रतिशत गम्भीर रूप से प्रभावित हुई हैं तथा 30 प्रतिशत का क्षरण हुआ है। ग्लोबल कोरल रीफ मॉनीटरिंग नेटवर्क (आस्ट्रेलिया) का अनुमान है कि वर्ष 2050 तक सभी प्रवाल भित्तियों की मृत्यु हो जाएगी।

    कृषि पर प्रभाव


    जलवायु परिवर्तन का प्रभाव कृषि पैदावार पर पड़ेगा। संयुक्त राज्य अमरीका में फसलों की उत्पादकता में कमी आएगी जबकि दूसरी तरफ उत्तरी तथा पूर्वी अफ्रीका, मध्य पूर्व देशों, भारत, पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया तथा मैक्सिको में गर्मी तथा नमी के कारण फसलों की उत्पादकता में बढ़ोत्तरी होगी। वर्षाजल की उपलब्धता के आधार पर धान के क्षेत्रफल में वृद्धि होगी। भारत में जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप गन्ना, मक्का, ज्वार, बाजरा तथा रागी जैसी फसलों की उत्पादकता दर में वृद्धि होगी जबकि इसके विपरीत मुख्य फसलों जैसे गेहूँ, धान तथा जौ की उपज में गिरावट दर्ज होगी। आलू के उत्पादन में भी अभूतपूर्व गिरावट दर्ज होगी।

    तापमान में वृद्धि के फलस्वरूप दलहनी फसलों में नाइट्रोजन स्थिरीकरण की दर में वृद्धि के कारण अरहर, चना, मटर, मूंग, उड़द मसूर आदि की उपज में वृद्धि होगी। तिलहनी फसलों जैसी पीली सरसों, भूरी सरसों (राई), सूरजमुखी, तिल, काला तिल, अलसी, बर्रा (कुसुम) की पैदावार में गिरावट होगी जबकि सोयाबीन तथा मूँगफली की पैदावार में वृद्धि होगी। एक अनुमान के अनुसार अगर वर्तमान वैश्विक तापवृद्धि की दर जारी रही तो भारत में वर्षा सिंचित क्षेत्रों में 12.5 करोड़ टन खाद्यान्न उत्पादन में कमी आएगी। शीत ऋतु में 0.50 सेल्सियस तापमान वृद्धि के कारण पंजाब राज्य में गेहूँ की फसल की पैदावार में 10 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है।

    भारत जैसे उष्ण कटिबन्धीय देश में जलवायु परिवर्तन के फलस्वरूप आम, केला, पपीता, चीकू, अनानास, शरीफा, अनार, बेल, खजूर जामुन, अंजीर, बेर, तरबूज तथा खरबूजा जैसे फलों के उत्पादन में बढ़ोत्तरी होगी जबकि सेब, आलू बुखारा, अंगूर, नाशपाती जैसे फलों के पैदावार में गिरावट आएगी। जलवायु परिवर्तन का प्रभाव फसल पद्धति पर भी पड़ेगा। जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप उत्तर तथा मध्य भारत में ज्वार, बाजरा, मक्का तथा दलहनी फसलों के क्षेत्रफल में विस्तार होगा। उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में गेहूँ तथा धान के क्षेत्रफल में अभूतपूर्व गिरावट आएगी जबकि देश के पूर्वी, दक्षिणी तथा पश्चिमी राज्यों में धान के क्षेत्रफल में बढ़ोत्तरी होगी।

    वातावरण में ज्यादा ऊर्जा के जुड़ाव से वैश्विक वायु पद्धति में भी परिवर्तन होगा। वायु पद्धति में परिवर्तन के परिणामस्वरूप वर्षा का वितरण असमान होगा। भविष्य में मरुस्थलों में ज्यादा वर्षा होगी जबकि इसके विपरीत पारम्परिक कृषि वाले क्षेत्रों में कम वर्षा होगी। इस तरह के परिवर्तनों से विशाल मानव प्रव्रजन को बढ़ावा मिलेगा जो कि मानव समाज के सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक ताने-बने को प्रभावित करेगा।

    जलवायु परिवर्तन के फलस्वरूप बाढ़, सूखा तथा आँधी-तूफान जैसी प्राकृतिक आपदाओं की बारम्बारता में वृद्धि के कारण अनाज उत्पादन में गिरावट दर्ज होगी। स्थानीय खाद्यान्न उत्पादन में कमी भुखमरी और कुपोषण का कारण बनेगी जिससे स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ेंगे। खाद्यान्न और जल की कमी से प्रभावित क्षेत्रों में टकराव पैदा होंगे।

    जैव विविधता पर प्रभाव


    जलवायु परिवर्तन का प्रभाव जैवविविधता पर भी पड़ेगा। किसी भी प्रजाति को अनुकूलन हेतु समय की आवश्यकता होती है। वातावरण में अचानक परिवर्तन से अनुकूलन के प्रभाव में उसकी मृत्यु हो जाएगी। जलवायु परिवर्तन का सर्वाधिक प्रभाव समुद्र की तटीय क्षेत्रों में पाई जाने वाली दलदली क्षेत्र की वनस्पतियों पर पड़ेगा जो तट को स्थिरता प्रदान करने के साथ-साथ समुद्री जीवों के प्रव्रजन का आदर्श स्थल भी होती हैं। दलदली वन जिन्हें ज्वारीय वन भी कहा जाता है, तटीय क्षेत्रों को समुद्री तूफानों में रक्षा करने का भी कार्य करते हैं। जैव-विविधता क्षरण के परिणामस्वरूप पारिस्थितिक असन्तुलन का खतरा बढ़ेगा।

    जलवायु में उष्णता के कारण उष्ण कटिबन्धीय वनों में आग लगने की घटनाओं में वृद्धि होगी परिणामस्वरूप वनों के विनाश के कारण जैवविविधता का ह्रास होगा।

    मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव


    जलवायु परिवर्तन का प्रभाव मानव स्वास्थ्य पर भी पड़ेगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार जलवायु में उष्णता के कारण श्वास तथा हृदय सम्बन्धी बीमारियों में वृद्धि होगी। दुनिया के विकासशील देशों में दस्त, पेचिश, हैजा, क्षयरोग, पीत ज्वर तथा मियादी बुखार जैसी संक्रामक बीमारियों की बारम्बारता में वृद्धि होगी। चूँकि बीमारी फैलाने वाले रोगवाहकों के गुणन एवं विस्तार में तापमान तथा वर्षा की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है अतः दक्षिण अमेरीका, अफ्रीका तथा दक्षिण-पूर्व एशिया में मच्छरों से फैलने वाली बीमारियों जैसे- मलेरिया (शीत ज्वर), डेंगे, पीला बुखार तथा जापानी बुखार (मेनिन्जाइटिस) के प्रकोप में बढ़ोत्तरी के कारण इन बीमारियों से होने वाली मृत्यु दर में इजाफा होगा। इसके अतिरिक्त फाइलेरिया तथा चिकनगुनिया का भी प्रकोप बढ़ेगा।

    मच्छरजनित बीमारियों का विस्तार उत्तरी अमरीका तथा यूरोप के ठंडे देशों में भी होगा। मानव स्वास्थ्य पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के चलते एक बड़ी आबादी विस्थापित होगी जो ‘पर्यावरणीय शरणार्थी’ कहलाएगी। स्वास्थ्य सम्बन्धी और भी समस्याएँ पैदा होंगी।

    जलवायु परिवर्तन के फलस्वरूप न सिर्फ रोगाणुओं में बढ़ोत्तरी होगी अपितु इनकी नई प्रजातियों की भी उत्पत्ति होगी जिसके परिणामस्वरूप फसलों की उत्पादकता पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। फसलों की नाशीजीवों तथा रोगाणुओं से सुरक्षा हेतु नाशीजीवनाशकों के उपयोग की दर में बढ़ोत्तरी होगी जिससे वातावरण प्रदूषित होगा साथ ही मानव स्वास्थ्य पर भी विपरीत प्रभाव पड़ेगा।

    अन्य प्रभाव


    नाशीजीवों तथा रोगाणुओं की संख्या में वृद्धि तथा इनकी नई प्रजातियों की उत्पत्ति का प्रभाव दुधारू पशुओं पर भी पड़ेगा। जिससे दुग्ध उत्पादन पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा।

    भारत जैसे उष्ण कटिबन्धीय देश मेें जलवायु परिवर्तन के फलस्वरूप पुष्पीय पौधों के पोयेसी, साइप्रेसी, फैबेसी, यूर्फोबियेसी, अमरेंथेसी, तथा एस्लेपिडेसी कुलों से सम्बद्ध खरपतवारों की जनसंख्या में अभूतपूर्व वृद्धि होगी। इसके परिणामस्वरूप इन खरपतवारों का प्रकोप बढ़ेगा जिससे फसलों की उत्पादकता पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। कृषि उत्पादकता में बढ़ोत्तरी हेतु रासायनिक खरपतवारनाशकों पर निर्भरता में वृद्धि होगी।

    तापवृद्धि के कारण वाष्पीकरण तथा वाष्पोत्सर्जन की दर में अभूतपूर्व वृद्धि होगी परिणामस्वरूप मृदा जल के साथ ही जलाशयों में जल की कमी होगी जिससे फसलों को पर्याप्त जल उपलब्ध न होने के कारण उनकी पैदावार प्रभावित होगी। भारत जैसे उष्ण कटिबन्धीय देश में जलाशयों में जल की कमी के कारण सिंघाड़े तथा मखाने की खेती पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। इसके अतिरिक्त मत्स्यपालन तथा उत्पादन पर भी विपरीत प्रभाव पड़ेगा।

    जलवायु परिवर्तन का प्रभाव जलीय जन्तुओं पर भी पड़ेगा। मीठे जल की मछलियों का प्रव्रजन ध्रुवीय क्षेत्रों की ओर होगा जबकि शीतल जल मछलियों का आवास नष्ट हो जाएगा। परिणामस्वरूप बहुत से मछलियों की प्रजातियाँ विलुप्त हो जाएँगी।

    वैश्विक जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्री तूफानों की बारम्बारता में वृद्धि होगी जिसके परिणामस्वरूप तटीय क्षेत्रों में जान-माल की क्षति होगी। इसके अतिरिक्त अलनीनो की बारम्बारता में भी बढ़ोत्तरी होगी जिससे एशिया, अफ्रीका तथा आस्ट्रेलिया महाद्वीपों में सूखे की स्थिति उत्पन्न होगी जबकि वहीं दूसरी तरफ उत्तरी अमेरीका में बाढ़ जैसी आपदा का प्रकोप होगा। दोनों ही स्थितियों में कृषि उत्पादकता पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा।

    जलवायु परिवर्तन का प्रभाव हिमनदों (ग्लेशियर) पर भी पड़ेगा। उष्णता के कारण हिमनद पिघल कर खत्म हो जाएँगे। एक शोध के अनुसार भारत के हिमालय क्षेत्र में वर्ष 1962 से 2000 के बीच हिमनद 16 प्रतिशत तक घटे हैं। पश्चिमी हिमालय में हिमनदों के पिघलने की प्रक्रिया में तेजी आई है। बहुत से छोटे हिमनद पहले ही विलुप्त हो चुके हैं। कश्मीर में कोल्हाई हिमनद 20 मीटर तक पिघल चुका है। गंगोत्री हिमनद 23 मीटर प्रतिवर्ष की दर से पिघल रहा है।

    अगर पिघलने की वर्तमान दर कायम रही तो जल्दी ही हिमालय से सभी हिमनद समाप्त हो जाएँगे जिससे गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र, सतलज, रावी, झेलम, चिनाब, व्यास, आदि नदियों का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। इन नदियों पर स्थित जलविद्युत ऊर्जा इकाइयाँ बन्द हो जाएँगी। परिणामस्वरूप विद्युत उत्पादन पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। इसके अतिरिक्त सिंचाई हेतु जल की कमी के कारण कृषि उत्पादकता पर भी विपरीत प्रभाव पड़ेगा। उपर्युक्त नदियों का अस्तित्व समाप्त हो जाने से भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान, अफगानिस्तान तथा बांग्लादेश भी प्रभावित होेंगे।

    जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप जीवांश पदार्थों के तेजी से विघटन के कारण पोषक-चक्र की दर में बढ़ोत्तरी होगी जिसके कारण मृदा की उपजाऊ क्षमता अव्यवस्थित हो जाएगी जो कृषि पैदावार को प्रभावित करेगी। वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की वृद्धि के कारण पौधों में कार्बन स्थिरीकरण में बढ़ोत्तरी होगी। परिणामस्वरूप मृदा से पोषक तत्वों के अवशोषण की दर कई गुना बढ़ जाएगी। जिसके कारण मृदा की उर्वराशक्ति पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। मृदा की उर्वराशक्ति को बनाए रखने के लिये रासायनिक खादों के उपयोग की दर में वृद्धि होगी।

    जलवायु परिवर्तन का प्रभाव वनस्पतियों तथा जन्तुओं पर भी पड़ेगा। स्थानीय महासागर उष्णता 3 डिग्री सेल्सियस बढ़ने के कारण प्रशान्त महासागर में सोलोमन मछली की आबादी में अभूतपूर्व गिरावट दर्ज की गई है। बढ़ती उष्णता के कारण वसंत ऋतु में जल्दी बर्फ पिघलने के कारण हडसन की खाड़ी में ध्रुवीय भालुओं की जनसंख्या में गिरावट आई है।

    जलवाहयु परिवर्तन का सर्वाधिक दुष्प्रभाव सामाजिक तथा आर्थिक क्षेत्रों पर पड़ेगा। आर्थिक क्षेत्र का भौकि मूल ढाँचा जलवायु परिवर्तन द्वारा सर्वाधिक प्रभावित होगा। बाढ़, सूखा, भूस्खलन तथा समुद्री जलस्तर में वृद्धि के परिणमास्वरूप बड़े पैमाने पर मानव प्रव्रजन होगा जिससे सुरक्षित स्थानों पर भीड़भाड़ की स्थिति पैदा होगी। उष्णता से प्रभावित क्षेत्रों में प्रशीतन हेतु ज्यादा ऊर्जा की आवश्यकता होगी।

    इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि जलवायु परिवर्तन एक गम्भीर वैश्विक समस्या है जिसके परिणामस्वरूप सम्पूर्ण विश्व में बड़े पैमाने पर उथल-पुथल होगी। जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया में द्वीपों का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। जलवायु परिवर्तन का मानव स्वास्थ्य पर भी विपरीत प्रभाव पड़ेगा। प्राकृतिक आपदाओं जैसे- सूखा, बाढ़, समुद्री तूफान, अलनीनो की बारम्बारता में बढ़ोत्तरी होगी।

    जलवायु परिवर्तन के फलस्वरूप फसलों की उत्पादकता में वृद्धि हेतु कीटनाशकों, खरपतवारनाशकों तथा रासायनिक खादों पर निर्भरता बढ़ेगी जिससे न सिर्फ पर्यावरण प्रदूषित होगा अपितु भारत जैसे विकासशील देश में किसानों की आर्थिक दशा में गिरावट होगी। वैश्विक जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को देखते हुए समय की सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि ग्रीन हाउस प्रभाव के लिये उत्तरदायी गैसों के उत्सर्जन पर रोक लगाई जाये जिससे वैश्विक तापवृद्धि पर प्रभावी नियंत्रण हो सके और विश्व को जलवायु परिवर्तन के सम्भावित खतरों से बचाया जा सके।

    आज बढ़ती मानवीय गतिविधियों व आवश्यकताओं की पूर्ति, प्राकृतिक-संसाधनों का अन्धाधुन्ध प्रयोग इन समस्याओं की मूल जड़ है। इनका उपयोग समुचित व सन्तुलित मात्रा में किया जाना आवश्यक है। अन्यथा भविष्य में होने वाली अनहोनी को टाला नहीं जा सकेगा। जैसा कि हम जानते हैं किसी स्थान की जलवायु स्थिरता वहाँ की कृषि, आमदनी, रोजगार, जल-जीवन, समाज एवं संस्कृति को प्रोत्साहित करते हुए स्थायित्व प्रदान करती है। इसलिये हम सभी को एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में पर्यावरणीय पारितंत्र को स्वच्छ एवं स्थायी बनाए रखने में अपनी भूमिका निभाने के साथ-साथ पर्यावरणीय जागरुकता को जन-जन तक पहुँचाना होगा।

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    जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण RuralWaterTue, 03/06/2018 - 15:28

    Source
    आईसेक्ट विश्विद्यालय द्वारा अनुसृजन परियोजना के अन्तर्गत निर्मित पुस्तक जलवायु परिवर्तन - 2015

    जलवायु परिवर्तनजलवायु परिवर्तनजलवायु पर्यावरण को नियंत्रित करने वाला प्रमुख कारक है, क्योंकि जलवायु से प्राकृतिक वनस्पति, मिट्टी, जलराशि तथा जीव जन्तु प्रभावित होते हैं। जलवायु मानव की मानसिक तथा शारीरिक क्रियाओं पर प्रभाव डालती है। मानव पर प्रभाव डालने वाले तत्वों के जलवायु सर्वाधिक प्रभावशाली है क्योंकि यह पर्यावरण के अन्य कारकों को भी नियंत्रित करती है।

    सृष्टि के विकास-क्रम में अतीत में यह देखा गया है कि जलवायु में छोटे बदलाव से लेकर बड़े बदलाव तक हुए हैं जैसे अफ्रीका के सहारा क्षेत्र की भू-दृश्यों से भरी झील कुछ ही सदियों मेें एक अनुपजाऊ मरुस्थल में परिवर्तित हो गई। अब अनेक वैज्ञानिकों को भय है कि वर्तमान में ग्रीन हाउस के निर्माण से उत्पन्न गैसों से भी बड़ी संख्या में परिवर्तन हो सकता है।

    अनेक वैज्ञानिकों का यह विश्वास है कि गैसें ग्रहों के तापमान में क्रमिक वृद्धि करके पृथ्वी पर गम्भीर रूप से जीवन को दुर्लभ बनाती है। अन्य विशेषज्ञ इससे सहमत नहीं हैं अपितु इनका यह मानना है कि पृथ्वी का तापमान सदियों से घटता-बढ़ता रहा है तथा जलवायु परिवर्तन के दीर्घकालीन प्रभाव को अभी समझने की जरूरत है।

    वैश्विक तापन के परिणामस्वरूप पृथ्वी के तापमान में वृद्धि हुई है। ध्रुवों की बर्फ तेजी से पिघलने लगी है जिसके कारण समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है। ओजोन परत के क्षरण से पराबैंगनी किरणों के दुष्प्रभाव बढ़ने लगे हैं। न केवल मानव जीवन बल्कि पशु-पक्षी और वनस्पतियों पर भी प्रदूषित पर्यावरण का प्रभाव पड़ रहा है। कई दुर्लभ प्रजातियाँ नष्ट हो चुकी हैं। पशु-पक्षियों की संख्या घट रही है। बाढ़, सूखा, समुद्री तूफान, चक्रवात, भूकम्प भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाएँ भी बढ़ी हैं।

    वैश्विक तापन का पर्यावरण पर प्रभाव


    वैश्विक तापन का सबसे स्पष्ट और कदाचित सबसे सर्वव्यापी और भयंकर दुष्परिणाम है वायुमंडल का निरन्तर गर्म होते जाना। वर्षों तक गहन अध्ययनों के बाद वैज्ञानिकों ने यह पाया कि पृथ्वी का ताप निश्चय ही बढ़ रहा है। 19वीं शताब्दी के मध्य से लेकर अब तक पृथ्वी के ताप में 0.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो गई है और यदि हालत यही रहे तो हर दशक में पृथ्वी के ताप में 0.2 से 0.5 डिग्री सेल्सियस तक की वृद्धि हो सकती है और इक्कीसवीं सदी के मध्य तक भूमंडल का ताप 2 से 5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाएगा। यह ताप वृद्धि उपध्रुवीय क्षेत्रों में अपेक्षाकृत अधिक होगी।

    पृथ्वी की जलवायु के निरन्तर गर्म होते जाने के सम्भावित दुष्परिणाम होंगे-


    बहुत बड़े क्षेत्रों में सूखा पड़ना, वनों का सूख जाना, धरती में दारारें पड़ जाना, वन्य प्राणियों का विनाश हो जाना और ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका की बर्फ का पिघलना, सागर की सतह का ऊँचा उठ जाना, आदि। जलवायु के गर्म होते रहने से सूखों की विकरालता में वृद्धि हो जाएगी और वे पृथ्वी के विभिन्न क्षेत्रों में जल्दी-जल्दी आने लगेंगे और वन सूख जाएँगे। ऐसा भी हो सकता है कि वनों का स्वरूप ही बदलने लगे। इससे उनमें वन्य प्राणियों का रहना दूभर हो जाएगा। उन्हें अन्य प्रदेशों मेें जाना पड़ेगा अथवा वे नष्ट हो जाएँगे। इनके साथ ही चक्रवात और टॉरनेडो अधिक विनाशकारी हो जाएँगे।

    शीत प्रदेशों, विशेष रूप से टुंड्रा, की बर्फ पिघलने लगेगी जिससे वहाँ बड़े-बड़े दलदलमय क्षेत्र बन जाएँगे। उन क्षेत्रों में कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन अधिक मात्रा में उत्पन्न होने लगेगी जिसके परिणामस्वरूप हाउस प्रभाव भी तीव्रतर हो जाएँगे।

    वैश्विक तापन के कुप्रभाव पृथ्वी के 71 प्रतिशत भाग को घेरे सागरों पर भी पड़ेंगे। उनका पानी गर्म होकर फैलने लगेगा। साथ ही जलवायु के अधिक गर्म हो जाने से ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका में जमी बर्फ पिघलने लगेगी। उससे बनने वाली जल विशाल मात्रा भी सागरों में मिल जाएगी। परिणामस्वरूप सागरों की सतह ऊँची उठ जाएगी जिससे निचले तटीय प्रदेश पानी में डूब जाएँगे। बांग्लादेश जैसे निचले क्षेत्रों के अधिकांश भाग जलमग्न हो जाएँगे।

    वैश्विक तापन के परिणामस्वरूप पिछली एक शताब्दी में संयुक्त राज्य अमेरिका के पूर्वी तट पर सागर-सतह एक फुट ऊँची हो गई है और अगले सौ वर्षों में उसके एक फुट और ऊँचे जाने की सम्भावना है। उसके फलस्वरूप ही काफी बड़े तटीय क्षेत्रों के डूबने की आशंका हो जाएगी। अब सोचिए कि अगर ग्रीनलैंड की हिमकिरीट (आइसकैप) के पिघलने से सागर के जल का स्तर लगभग 6 मीटर ऊँचा उठ जाता है तब क्या हालत होगी? ऐसा वास्तव में यदि हो जाता है तब हमारे देश के भी अनेक तटीय क्षेत्र और बन्दरगाह डूब जाएँगे। हालैंड जैसे देश तो जहाँ इस समय भी सागर को रोकने के लिये दीवार (डाइक) बनानी पड़ती है, शायद पूरे के पूरे जलमग्न हो जाएँ।

    कुछ वैज्ञानिकों का यह भी अनुमान है पृथ्वी के ताप में बढ़ोत्तरी के फलस्वरूप ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका के हिमकिरीट तक पिघलने के स्थान पर और बढ़ जाएँगे। इस बारे में वे यह तर्क देते हैं कि पृथ्वी के ताप में वृद्धि होने से वायुमंडल की जलवाष्प को वहन करने की क्षमता बढ़ जाएगी। इसलिये ध्रुवीय क्षेत्रों में अधिक हिमपात होने लगेगा। परिणामस्वरूप जहाँ एक ओर सागरों में जल स्तर नीचे गिर जाएगा वहाँ दूसरी ओर धु्रवीय प्रदेशों में अधिक बर्फ जमने लगेगी।

    पृथ्वी के तापमान के बढ़ने का प्रभाव सम्पूर्ण पर्यावरण पर पड़ेगा। इसका एक प्रभाव यह होगा कि पहाड़ों पर तथा अन्य स्थानों पर जो बर्फ है वह पिघलेगी। इस प्रकार बर्फ के पिघलने से सागरों में पानी की मात्रा बढ़ेगी। दूसरी ओर तापमान के बढ़ने से सागरों में उपस्थित पानी का आयतन बढ़ेगा। ऐसी स्थिति में सागर तल के ऊपर उठने की प्रबल सम्भावना होगी।

    कई स्थानों पर समुद्र तल के ऊपर उठने के प्रमाण भी सामने आने लगे हैं। प्रशान्त महासागर में स्थित द्वीप तुवालू में लोग अपने घरों को छोड़कर दूसरे स्थानों को जाने लगे हैं। दूसरी ओर उत्तर ध्रुवीय प्रदेश में भालुओं की संख्या में कमी के प्रमाण भी मिले हैं। जिसे वैज्ञानिक इस मामले से जोड़ रहे हैं कि उस क्षेत्र में बर्फ कम हो रही है और उन भालुओं के वास स्थान पर एक प्रकार से उजड़ रहे हैं।

    भारत में भी ऐसी घटनाएँ घट रही हैं जिन्हें लोग समुद्र तल के उठने की प्रक्रिया से जोड़ रहे हैं। सुन्दरबन में काफी बड़ा क्षेत्र पूरी तरह से जलमग्न हो चुका है। जादवपुर विश्वविद्यालय के एक अध्ययन से यह तथ्य सामने आया है कि पिछले 30 वर्षों में सुन्दरबन क्षेत्र में 259 वर्ग कि.मी. भूमि लुप्त हो चुकी है। वहाँ का घोड़ामारा नामक इलाके का क्षेत्रफल अब केवल 5.17 वर्ग कि.मी. रह गया है, जबकि 1969 में उस इलाके का क्षेत्रफल इसके लगभग दोगुना था। इसके अतिरिक्त उसी क्षेत्र में दो द्वीप पूरी तरह से लुप्त हो चुके हैं।

    ऐसा उस क्षेत्र में पहले भी होता रहा है। नए द्वीप बनते रहे हैं तथा पुराने द्वीप लुप्त होते रहें। परन्तु इस समय जिस प्रकार से यह प्रक्रिया चल रही है उसके विषय में वैज्ञानिकों को विश्वास है कि इसके पीछे जलवायु में होने वाले उस परिवर्तन की मुख्य भूमिका है जो पृथ्वी पर मानवीय क्रियाकलाप के कारण हो रही है, अर्थात इस सम्बन्ध में पृथ्वी के तापमान में वृद्धि की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। पृथ्वी जिस प्रकार गरम हो रही है उससे मुम्बई को काफी खतरा है। इसके अतिरिक्त अन्य तटीय क्षेत्रों को भी खतरा हैै।

    विश्व में 180 देश ऐसे हैं जहाँ कम ऊँचाई वाले क्षेत्रों में लोग बसते हैं और चिन्ता का विषय यह है कि 70 प्रतिशत देश ऐसे हैं जहाँ 50 लाख से अधिक जनसंख्या वाले शहर ऐसे क्षेत्रों में बसे हैं, जहाँ तबाही की आशंका बहुत अधिक है। इनमें टोक्यो, न्यूयार्क, जकार्ता, शंघाई, ढाका, मुम्बई, आदि शामिल हैं। ऐसे क्षेत्र में बाढ़ तथा प्रबल समुद्री तूफान आने की सम्भावना अधिक होगी।

    यदि कुल तटीय क्षेत्र की बात की जाये जहाँ इस प्रकार का खतरा है तो वहाँ की जनसंख्या काफी अधिक है। अगर केवल भारत, चीन, बांग्लादेश, इंडोनेशिया और वियतनाम के विषय में विचार किया जाये तो ऐसे क्षेत्र में लगभग 65 करोड़ लोग बसते हैं। यदि स्थिति पर काबू नहीं पाया जा सका तो इतनी बड़ी संख्या में लोगों को वहाँ से हटाना पड़ सकता है।

    यदि इस प्रकार के क्षेत्र में आबादी और अधिक बढ़ी तो समस्या की गम्भीरता और अधिक बढ़ जाएगी। इसीलिये वैज्ञानिकों की सलाह है कि ऐसे क्षेत्र में आबादी को बढ़ने नहीं दिया जाना चाहिए। मालदीव के मामले में तो स्थिति और भी गम्भीर हो सकती है। वहाँ कुल मिलाकर 1190 द्वीप हैं और समुद्र तल से उनकी औसत ऊँचाई 1.5 मीटर है। इसलिये अगर समुद्र तल थोड़ा भी ऊपर उठेा तो बड़ी संख्या में लोगों को विस्थापित होना पड़ेगा। इससे मिलती-जुलती स्थिति अन्य कई स्थानों पर भी है।

    अगर उन जगहों पर समुद्र तल आधा से एक मीटर ऊपर उठता है तो बड़े पैमाने पर तबाही होगी। बांग्लादेश की स्थिति ऐसी है, कि अगर समुद्र तल केवल आधा मीटर ऊपर उठता है तो लगभग एक करोड़ लोगों को विस्थापित होना पड़ेगा। यहाँ यह भी समझना आवश्यक है कि ऐसे क्षेत्र में केवल लोगों का विस्थापन नहीं होगा, कृषि उद्योग तथा अन्य सुविधाएँ भी प्रभावित होंगी।

    पर्यावरण निम्नीकरण


    पर्यावरण जैव मण्डल का आधार है, लेकिन औद्योगिक क्रान्ति के बाद से विकास की जो तीव्र प्रक्रिया अपनाई गई है उसमें पर्यावरण के आधारभूत नियमों की अवहेलना की गई जिसका परिणाम पारिस्थितिक असन्तुलन एवं पर्यावरणीय निम्नीकरण के रूप में हमारे समक्ष उपस्थित है। आज विश्व के विकसित देश हों अथवा विकासशील देश, कोई भी पर्यावरण प्रदूषण के कारण उत्पन्न गम्भीर समस्या से अछूता नहीं है।

    1970 के दशक में ही यह अनुभव किया गया कि वर्तमान विकास की प्रवृत्ति असन्तुलित है एवं पर्यावरण की प्रतिक्रिया उसे विनाशकारी विकास में परिवर्तित कर सकती है। तब से लेकर वर्तमान वैश्विक स्तर पर पर्यावरणीय निम्नीकरण की समस्या के समाधान हेतु कई योजनाएँ प्रस्तुत की गईं, समाधानमूलक उपायों पर व्यापक विचार-विमर्श हुआ।

    बावजूद इसके वास्तविक उपलब्धियाँ अति न्यून ही रहीं। तो इसका तात्पर्य यह निकाला जाये कि वैश्विक स्तर पर ईमानदार प्रयास नहीं किये गए। साथ ही विभिन्न राष्ट्रों ने राष्ट्रीय आर्थिक विकास को कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण माना एवं पर्यावरणीय असन्तुलन के प्रति उदासीन बने रहे। उन तथ्यों की समीक्षा से पूर्व आवश्यकता है कि संक्षेप में उन समस्याओं पर विचार किया जाये जो पर्यावरणीय प्रदूषण को उत्पन्न कर रही हैं एवं जिनके कारण सम्पूर्ण जैव जगत के साथ समक्ष गम्भीर चुनौती उत्पन्न हो गई है।

    वैश्विक तापन के कारण प्रकृति मेें बदलाव आ रहा है। कहीं भारी वर्षा तो कहीं सूखा, कहीं लू तो कहीं ठंड। कहीं बर्फ की चट्टानें टूट रही हैं तो कहीं समुद्री जल स्तर में बढ़ोत्तरी हो रही है। आज जिस गति से ग्लेशियर पिघल रहे हैं इससे भारत और पड़ोसी देशों को खतरा बढ़ सकता है। वैश्विक ताप से फसल-चक्र भी अनियमित हो जाएगा। इससे कृषि उत्पादकता भी प्रभावित होगी। मनुष्यों के साथ-साथ पक्षी भी इस प्रदूषण का शिकार हो रहे हैं। वैश्विक तापन पक्षियों के दैनिक क्रियाकलाप और जीवन-चक्र को प्रभावित करता है।

    वैश्विक तापन में सर्वाधिक योगदान कार्बन डाइऑक्साइड का है। 1880 से पूर्व वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा 280 पीपीएम थी, जो आज आईपीसीसी रिपोर्ट के अनुसार 379 पीपीएम हो गई है। कार्बन डाइऑक्साइड की वार्षिक वृद्धि दर गत वर्षों में (1995-2005) 1.9 पीपीएम वार्षिक है।

    आईपीसीसी ने भविष्यवाणी की है कि सन 2100 आते-आते इसके तापमान में 1.1 से 6.4 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ोत्तरी हो सकती है। सदी के अन्त तक समुद्री जलस्तर मेें 18 से 58 सेमी. तक वृद्धि की सम्भावना है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 2080 तक 3.20 अरब लोगों को पानी उपलब्ध नहीं होगा। 60 करोड़ लोग भूखे मरेंगे। इससे अल्पविकसित देशों को हानि होगी। अल्पाइन क्षेत्रों और दक्षिणी अमेरिका के अमेजन वन के समाप्त हो जाने की सम्भावना है। प्रशान्त क्षेत्र के कई द्वीप जलमग्न हो जाएँगे।

    वैश्विक तापन के संकेत


    1. फैलती बीमारियाँ
    2. ऋतुओं का समय पूर्व आगमन
    3. वनस्पति और जीवों के क्रिया-कलाप में परिवर्तन
    4. पानी के ताप में वृद्धि से प्रवाल-भित्ति संकट में
    5. भारी वर्षा, बाढ़, बर्फबारी, सूखा आदि।

    वैश्विक तापन के प्रभाव


    1. तापमान में तीव्र बढ़ोत्तरी
    2. समुद्री जल स्तर में वृद्धि
    3. पहाड़ों से पिघलते ग्लेशियर
    4. जल संकट

    पृथ्वी के तापमान पर प्रभाव


    यह तो तय है कि पृथ्वी का औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है। पर कितना बढ़ेगा, यह निश्चित रूप से बताना कठिन है। सामान्य परिसंचारी मॉडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा दोगुनी करने पर देखा गया कि तापमान एक डिग्री सेल्सियस बढ़ गया पर इसके अन्य प्रभाव भी देखे गए जैसे तापमान बढ़ने के कारण जलवाष्प ज्यादा बनेगी, जो ग्रीन हाउस प्रभाव उत्पन्न कर आधा डिग्री सेल्सियस तापमान और बढ़ाएगी।

    ज्यादा तापमान के कारण बर्फ पिघलेगी, जिससे धूप का परावर्तन कम होगा, अवशोषण ज्यादा होगा। परिणामस्वरूप आधा डिग्री सेल्सियस तापमान और बढ़ जाएगा। ज्यादातर मॉडलों से पता लगा है कि कार्बन डाइऑक्साइड दोगुनी करने पर ऊँचाई पर बादल ज्यादा बनेंगे, पर मध्यम ऊचाई के बादलों में कमी आएगी। परिणामस्वरूप दो डिग्री सेल्सियस तापमान और बढ़ जाएगा।

    उल्लेखनीय है कि बादल ग्रीन हाउस प्रभाव को सीधा प्रभावित करते हैं। इस तरह कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा दोगुनी होने पर पृथ्वी की औसत तापमान कुल चार डिग्री सेल्सियस बढ़ जाएगा।

    पर्यावरण हितैशी जीवनशैली की आवश्यकता


    आज प्राकृतिक संसाधनों के दोहन को कम-से-कम करने के साथ पर्यावरण को संरक्षित रखते हुए दीर्घकालिक यानी सतत विकास की आवश्यकता है। पर्यावरण अनुकूल जीवनशैली अपनाकर पृथ्वी को बचाया जा सकता है। इसके लिये हर कदम पर ऊर्जा की बचत कर और भूमि एवं जंगलों का संरक्षण करके पर्यावरण के अनुकूल माहौल बना सकते हैं।

    पूरी दुनिया को वृक्षारोपण द्वारा पुनः हरा-भरा बनाना होगा और जीवाश्म ईंधन के उपयोग में कमी लानी होगी। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा जैसे प्रदूषण मुक्त ऊर्जा स्रोतों को ज्यादा-से-ज्यादा अपनाना होगा। इन उपायों से निश्चित ही इस धरती को जलवायु परिवर्तन के खतरों से बचाने में मदद मिल सकती है। इनके अलावा पृथ्वी ग्रह को जलवायु के संकट से बचाने के लिये सभी को प्रयास करने होंगे तभी यह ग्रह सुन्दर और जीवनमय बना रहेगा। इसके लिये हमें प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग कुशलता और पूरी दक्षता के साथ करना होगा। ह

    में जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने के लिये ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने वाली प्रौद्योगिकियों को अपनाने एवं इस दिशा में नई प्रौद्योगिकियों के विकास को प्रोत्साहित करना होगा। इस प्रयास में हमें परम्परागत ज्ञान का भी सहारा लेना होगा ताकि जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने की दिशा में हमारा प्रयास सफल होने के साथ ही पूरे समाज को जोड़ने वाला हो। इस प्रकार सभी की भागीदारी के द्वारा जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटा जा सकता है।

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    मल प्रबन्धन - स्वच्छ भारत अभियान के लिये चुनौती (Sewage management - Challenge for Swachh Bharat Abhiyan)RuralWaterTue, 03/06/2018 - 18:31

    Source
    कुरुक्षेत्र, फरवरी 2018


    इकोसैन शौचालयइकोसैन शौचालयपूरे देश में 2 अक्टूबर, 2014 को आरम्भ किये गए स्वच्छ भारत अभियान ने 76 प्रतिशत ग्रामीण घरों और 97 प्रतिशत से अधिक शहरी घरों में शौचालय बनाने में मदद की है, जबकि पहले ग्रामीण क्षेत्रों में 38 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 91 प्रतिशत घरों में शौचालय थे। इन आँकड़ों से ही पता चल जाता है कि अभियान 2 अक्टूबर, 2019 तक खुले में शौच से मुक्त (ओडीएफ) हो जाने का अपना उद्देश्य प्राप्त करने की दिशा में बढ़ रहा है।

    भारत सरकार के पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय के अनुसार ओडीएफ का अर्थ है मल अथवा विष्ठा में पाये जाने वाले विषाणुओं या जीवाणुओं का मुँह के रास्ते पहुँचना बन्द होना। ओडीएफ तब माना जाता है, जब

    (अ) वातावरण अथवा गाँव में विष्ठा नहीं दिखती है।
    (आ) प्रत्येक घर तथा सार्वजनिक/सामुदायिक संस्था में विष्ठा के निस्तारण के लिये सुरक्षित तकनीक का प्रयोग होता है। सुरक्षित तकनीक के विकल्प का अर्थ है:

    क- भूमि, भूजल तथा सतह पर पाया जाने वाला जल प्रदूषित नहीं होना।
    ख- मक्खियों अथवा पशुओं का विष्ठा तक नहीं पहुँच पाना।
    ग- ताजी विष्ठा हटाने की नौबत नहीं आना।
    घ- बदबू और घृणाजनक स्थितियों से मुक्ति मिलना।

    पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय ने बन रहे शौचालयों की वास्तविक संख्या की निगरानी करने के लिये प्लेटफॉर्म तैयार किया है, लेकिन मंत्रालय की निगरानी व्यवस्था में शौचालय के प्रकार का पता नहीं लगाया जा सकता, जो बहुत महत्त्वपूर्ण सूचक है। एकदम जमीनी-स्तर पर पहुँचना और अभियान के तहत बनाए जा रहे शौचालयों की निगरानी करना आवश्यक है।

    जमीनी-स्तर पर ग्रामीण स्वच्छता की बदलती स्थिति को समझने के लिये भारतीय गुणवत्ता परिषद ने पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय के निर्देश पर एक सर्वेक्षण ‘स्वच्छ सर्वेक्षण - ग्रामीण’ कराया। सर्वेक्षण के अनुसार लगभग जिन ग्रामीण घरों में शौचालय हैं, उनमें से 91 प्रतिशत उनका प्रयोग कर रहे हैं। इससे मिशन की सफलता का पता चलता है।

    जो परिवार शौचालय होने के बाद भी उनका प्रयोग नहीं कर रहे हैं, उनसे इसका कारण जानने का प्रयास भी सर्वेक्षण ने किया। सर्वेक्षण के आँकड़े बताते हैं कि खुले में शौच करने की पुरानी आदत तो शौचालयों के प्रयोग की राह में बड़ी बाधा है ही, 31.97 प्रतिशत घर शौचालयों के निर्माणाधीन होने, सीट टूटी होने और गड्ढे या टैंक भर जाने के कारण उनका प्रयोग नहीं करते।

    शौचालय इस्तेमाल नहीं करने के अन्य कारण हैं- पानी की किल्लत (10.33 प्रतिशत), शौचालय में बैठने की स्थिति नहीं होना (3.25 प्रतिशत), बदबू आना (1.41 प्रतिशत), शौचालय में अंधेरा होना (1.11 प्रतिशत) और ताजी हवा नहीं आना (0.91 प्रतिशत)। इससे अभियान के लिये तकनीकी चुनौती खड़ी होती है।

    गड्ढे लबालब भर जाने, शौचालय में अन्धेरा होने, हवा की आवाजाही नहीं होने, बदबू आने और पानी नहीं होने जैसे कारणों से कुछ लाभार्थी शौचालयों का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं। हो सकता है कि जिन शौचालयों का प्रयोग किया जा रहा है, इन्हीं कारणों से आगे चलकर उनका प्रयोग नहीं किया जाये। अभियान के लिये यह चुनौती है। जो लाभार्थी शौचालय जैसी सुविधाओं के निर्माण के लिये सरकार से वित्तीय सहायता ले चुके हैं, उन्हें दोबारा वित्तीय सहायता नहीं मिल सकेगी, जिससे अभियान के तहत खुले में शौच से मुक्ति का उद्देश्य अधूरा रह सकता है। शौचालयों की घटिया गुणवत्ता पिछले स्वच्छता कार्यक्रमों की असफलता का एक कारण रही है और इस अभियान में वही नहीं दोहराया जाना चाहिए।

    विष्ठा की गाद या मलबे का प्रबन्धन स्वच्छता सुविधाओं से जुड़ा अहम पहलू है। विष्ठा के मलबे में फ्लश किया हुआ पानी, सफाई करने वाली सामग्री और विष्ठा होती है, जो शौचालय के पास स्थित टैंक आदि में रहती है। लेकिन पानी के साथ फ्लश वाले शौचालय या शौच बहाने के लिये अधिक पानी की जरूरत वाले शौचालय विष्ठा के मलबे का प्रबन्धन करने में चुनौती खड़ी कर रहे हैं।

    अधिकतर शहरों और गाँवों में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट का अभी तक इन्तजार हो रहा है। ऐसी स्थितियों में प्रत्येक शौचालय में ही विष्ठा के मलबे का शोधन जरूरी हो जाता है। अभियान के तहत यह नई चुनौती है। देश भर में जनसंख्या बहुत सघन होने और प्रत्येक घर में सीवेज कनेक्शन नहीं होने के कारण शौचालय के पास ही ट्रीटमेंट का संयंत्र बनना या विकेंद्रीकृत कचरा प्रबन्धन की सुविधा होना आवश्यक है।

    पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय दो टैंकों या गड्ढों वाले शौचालयों को लोकप्रिय बनाने के लिये कई जागरुकता कार्यक्रम चलाता आया है। किन्तु स्वच्छ सर्वेक्षण की रिपोर्ट बताती है कि जिन घरों का सर्वेक्षण किया गया, उनमें से 40.87 प्रतिशत में केवल एक टैंक वाले शौचालय हैं, 31.93 प्रतिशत में सेप्टिक टैंक वाले शौचालय और 23.89 प्रतिशत घरों में दो टैंक वाले शौचालय हैं।

    एक टैंक वाले शौचालय में केवल एक गड्ढा होता है, जिसमें मल, मूत्र और सफाई के लिये इस्तेमाल किया गया पानी इकट्ठा होता रहता है। अगर पानी का इस्तेमाल बहुत कम हो तो यह शौचालय भरने में बहुत समय लेता है। लेकिन भारत में पानी शौचालयों का अभिन्न अंग होता है, ऐसे में यदि गड्ढे से पानी आर-पार जा सकता है और भूजल का स्तर काफी ऊँचा हो तो विष्ठा के मलबे से रिसकर पानी भूजल में मिल जाएगा। दोनों ही स्थितियाँ शौचालयों के सतत इस्तेमाल और भूजल को प्रदूषित होने से बचाने की राह में चुनौती हैं। साथ ही गड्ढा भर जाने पर उसे खाली करना दूसरी चुनौती होती है। इसके अलावा गड्ढा पूरा भरने और खाली होने के बीच की अवधि में लाभार्थी को वर्तमान शौचालय का विकल्प ढूँढना पड़ेगा।

    जिन गाँवों में आबादी की सघनता बीचोंबीच में होती है, वहाँ शौचालय खाली करना दूर-दूर बने घरों वाले गाँव की तुलना में अधिक कठिन होता है। लेकिन शहरों में अधिकर सेप्टिक टैंक घरों के नीचे बनाए जाते हैं, जहाँ टैंक साफ करने वाला वाहन पहुँच ही नहीं सकता। चूँकि अधिकतर स्थानीय निकायों के पास सेप्टिक टैंक खाली करने की पर्याप्त सुविधा नहीं है, इसलिये निजी क्षेत्र की भूमिका शुरू हो जाती है, जिसे सेप्टिक टैंक साफ ही नहीं करना चाहिए बल्कि विष्ठा के मलबे को सुरक्षित तरीके से निपटाना भी चाहिए।

    सेप्टिक टैंकों से जुड़ी कुछ अन्य समस्याएँ भी हैं। भारतीय मानक ब्यूरो के निर्देश के अनुसार 2,000 लीटर से अधिक क्षमता वाले सेप्टिक टैंक के लिये कम-से-कम दो चैम्बर होने चाहिए, जिनके बीच में दीवार हो। लेकिन गाँवों और शहरों में इन मानकों का पालन नहीं किया जा रहा है, जिसके कारण एक ही चैम्बर वाले टैंक बनाए जाते हैं, जिनके पाइप से मलबा निकलता रहता है। ऐसे मलबे से कभी-कभार पेयजल भी दूषित हो जाता है। ऐसे सेप्टिक टैंकों को समय-समय पर साफ करने और कचरे का शोधन करने के लिये स्थानीय निकायों द्वारा कोई वैज्ञानिक प्रणाली विकसित किया जाना बहुत जरूरी है।

    खुले इलाके या खुली, नाली में विष्ठा बहाना भी ग्रामीण और शहरी इलाकों में बड़ी समस्या है। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट का इस्तेमाल बहुत कम नगर निगम कर रहे हैं। ये प्लांट तब तक आर्थिक रूप से व्यावहारिक भी नहीं हैं, जब तक बारिश का पानी, सतह पर इकट्ठा पानी और बेकार पानी अलग-अलग नहीं किया जा सकता क्योंकि विष्ठा के मलबे में अतिरिक्त पानी मिल जाने से सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट पर ज्यादा बोझ पड़ जाता है। इसीलिये देश को ऐसी प्रौद्योगिकी अपनानी चाहिए, जिनमें शौचालय आदि में पानी की जरूरत ही नहीं पड़े या कम पड़े।

    सुशील सैम्युअल के ‘सेप्टेजः केरलाज लूमिंग सेनिटेशन चैलेंज’ लेख में बताया गया है कि केरल में प्रत्येक घर में शौचालय उपलब्ध कराने के बाद समुदाय के सामने सेप्टिक टैंक को बार-बार साफ करने और उससे निकले मलबे के सुरक्षित निस्तारण की दूसरी चुनौती खड़ी हो गई है। उन्होंने बताया कि टैंक खाली करने से जुड़ी अधिकतर गतिविधियाँ रात 10 बजे से सुबह 5 बजे के बीच ही निपटाई जाती हैं और उससे निकला मलबा खुले में डाल दिया जाता है क्योंकि सुरक्षित निपटारे की कोई प्रणाली ही नहीं है।

    शौचालयों में पानी के अधिक इस्तेमाल से दुर्लभ जन संसाधनों का नुकसान ही नहीं होता है बल्कि कम्पोस्टिंग की प्रक्रिया में भी देर होती है। स्वच्छता के क्षेत्र में श्री बिंदेश्वर पाठक द्वारा स्थापित प्रसिद्ध संस्था सुलभ फाउंडेशन ने 25 से 28 डिग्री ढलान वाली शौचालय की सीट बनाई है, जिसमें मल बहाने के लिये केवल एक से 1.5 लीटर पानी की जरूरत होती है। इससे पानी बचाने और कम्पोस्टिंग की प्रक्रिया तेज करने में मदद मिलती है।

    सेप्टिक टैंक वाले शौचालयों के लिये दूसरा विकल्प ईकोसैन शौचालय है, जो बेहद सस्ता है, जिसमें पानी की जरूरत नहीं होती और जो पानी की कमी वाले इलाकों के लिये भी उचित है तथा गाँवों में ऊँचे भूजलस्तर वाले क्षेत्रों के लिये भी। शौचालय का बुनियादी सिद्धान्त विष्ठा में से पोषक तत्व पुनः प्राप्त करना और उन्हें कृषि कार्यों में इस्तेमाल करना है।

    प्रयोग के बाद हर बार विष्ठा को मिट्टी अथवा राख से ढँक देना चाहिए और शौचालय का इस्तेमाल नहीं होने पर टैंक को ढक्कन से ढँक देना चाहिए। ईकोसैन शौचालय में जब गड्ढा भर जाता है तो उसे सीलबन्द कर दिया जाता है। चैम्बर में इकट्ठी विष्ठा को छह से नौ महीने के लिये छोड़ दिया जाता है ताकि यह सड़कर कम्पोस्ट में बदल जाये। चैम्बर से निकले कम्पोस्ट का इस्तेमाल खेतों में खाद के रूप में किया जाता है। कम्पोस्ट बनने की अवधि में शौचालय के लिये दूसरे गड्ढे का इस्तेमाल किया जा सकता है।

    सौर ऊर्जा से स्वयं ही साफ होने वाले शौचालय हाल के वर्षों में तैयार की गई नई प्रौद्योगिकी है। इन स्वचालित, छोटे आकार वाले स्टेनलेस स्टील के शौचालयों की डिजाइन इस तरह तैयार की गई है कि जहाँ भी बिजली और विष्ठा के मलबे के शोधन की सुविधा नहीं है, वहाँ इन्हें लगाया जा सकता है। स्वचालित शौचालय होने के कारण ये इस्तेमाल के बाद हर बार सेंसर की मदद से पानी की कम-से-कम मात्रा प्रयोग कर खुद ही साफ हो जाते हैं।

    आमतौर पर विष्ठा बहाने के लिये हर बार 1.5 लीटर पानी का इस्तेमाल होता है, जबकि सामान्य शौचालयों में 8-10 लीटर पानी लगता है। 10 बार इस्तेमाल के बाद इसका फर्श भी स्वयं ही धुल जाता है। बत्ती अपने-आप जलती है और उसके लिये बिजली इसमें लगे सोलर पैनल से ली जाती है। हवा के बगैर ही जैव अपघटन के जरिए कचरे के ट्रीटमेंट की व्यवस्था भी है।

    कम-से-कम ऊर्जा में काम करने वाले इस शौचालय में सबसे अच्छी बात यह है कि एक बुनियादी ढाँचे पर पूरा शौचालय फिट किया जा सकता है। ऐसी प्रौद्योगिकी ग्रामीण और शहरी दोनों इलाकों के लिये सर्वोत्तम है। झुग्गियों के लिये भी हमें ऐसी तकनीक चाहिए, जिसमें विष्ठा का ट्रीटमेंट स्वयं ही हो जाये।

    जहाँ विष्ठा के मलबे के ट्रीटमेंट की प्रभावी प्रक्रिया उपलब्ध नहीं है, वहाँ बायो-डाइजेस्टर शौचालय भी बहुत उपयोगी होते हैं। बायो-डाइजेस्टर शौचालय आरम्भ में रक्षा अनुसन्धान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) की ग्वालियर स्थित प्रयोगशाला ने सशस्त्र बलों के लिये ऊँचाई वाले इलाकों में लगाने के उद्देश्य से बनाए थे। इन्हें बनाने का मकसद यह था कि विष्ठा को हाथ से नहीं उठाना पड़े और उसका सुरक्षित निस्तारण भी हो जाये।

    पहले शौचालयों के गहरे गड्ढों से मल निकालने के लिये कर्मचारी नियुक्त किये जाते थे और उस मल को ऊर्जा का इस्तेमाल कर जला दिया जाता था क्योंकि कम तापमान पर कचरे का प्राकृतिक जैव अपघटन नहीं होता। ऊँचाई पर इसी तरह के शौचालय बनाए जाते हैं, जिनमें 240 वॉट का सोलर पैनल भी होता है ताकि कचरे को निपटाने के लिये जरूरी ऊर्जा तैयार हो सके। इन शौचालयों को ऐसे तैयार किया गया है कि ये मानव मल को गैस और खाद में बदल देते हैं। बायो-डाइजेस्टर शौचालयों में इस्तेमाल होने वाले सूक्ष्म जीवाणु मानव विष्ठा को इस्तेमाल लायक पानी और गैप में तब्दील कर देते हैं।


    देश को विकेंद्रीकृत ट्रीटमेंट संयंत्र की बहुत अधिक आवश्यकता है। इनसे निजी क्षेत्र के प्रतिभागियों को अधिक मौके मिलेंगे, रोजगार की दर बढ़ेगी, वातावरण स्वच्छ और सुरक्षित होगा। स्थानीय निकायों को बढ़ती हुई जनसंख्या की चुनौतियों से निपटने और विष्ठा मलबे के निपटारे अर्थात टैंक खाली करने से लेकर ट्रीटमेंट संयंत्र तक ले जाने की प्रभावी व्यवस्था मुहैया कराने में सक्षम बनाना आवश्यक है।बायो-डाइजेस्टर शौचालयों में बायो-डायजेस्टर टैंक लगे होते हैं, जिनमें हवा के बगैर ही पाचन की क्रिया होती है। इन टैंकों से बनी मीथेन गैस का इस्तेमाल गैस के चूल्हे जलाने और बिजली बनाने में किया जाता है, जबकि बचे हुए पदार्थ को बागवानी और खेती में खाद के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है।

    चूँकि ऐसे शौचालयों के साथ किसी भौगोलिक क्षेत्र या तापमान की बन्दिश नहीं होती, इसलिये इन्हें कहीं भी लगाया जा सकता है और इन्हें सीवर नेटवर्क से जोड़ने की जरूरत भी नहीं होती। श्रीनगर के हाउसबोट और भारतीय रेल में लगे ऐसे शौचालय काफी सफल साबित हुए हैं। ऊँचे भूजल-स्तर वाले इलाकों में भी उपयुक्त होने के कारण लक्षद्वीप में भी बड़ी तादाद में ऐसे शौचालय बनाए गए हैं।

    बायो-डाइजेस्टर शौचालय बनाने का खर्च स्वच्छ भारत अभियान के तहत बन रहे शौचालयों के लिये मिल रही वित्तीय सहायता से अधिक होता है, लेकिन अगर सेप्टिक टैंक से मलबा इकट्ठा करने और ट्रीटमेंट प्लांट तक ले जाने या सीवर प्रणाली लगाने में आने वाला खर्च अथवा सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाने के लिये जमीन की कीमत और उसे चलाने पर आने वाला खर्च देखा जाये तो ये शौचालय आर्थिक रूप से फायदेमन्द लग सकते हैं। बड़े स्तर पर निर्माण किया जाये, जागरुकता फैलाई जाये और आम आदमी के बीच माँग पैदा की जाये तो बायो-डाइजेस्टर शौचालयों की लागत भी घटाई जा सकती है।

    ऊपर बताए गए स्वच्छता के मॉडल ऐसे इलाकों के लिये सबसे कारगर हैं, जहाँ सीवेज व्यवस्था नहीं है। मलबे के निपटारे की केन्द्रीकृत व्यवस्था के बजाय विकेन्द्रीकृत व्यवस्था बनाने के लिये यह एकदम सही समय है। साथ ही यह भी देखा गया है कि केन्द्रीकृत व्यवस्था में खर्च भी अधिक होता है और कई मंत्रालयों तथा विभागों का दखल भी होता है।

    देश को विकेन्द्रीकृत ट्रीटमेंट संयंत्र की बहुत अधिक आवश्यकता है। इनसे निजी क्षेत्र के प्रतिभागियों को अधिक मौके मिलेंगे, रोजगार की दर बढ़ेगी, वातावरण स्वच्छ और सुरक्षित होगा। स्थानीय निकायों को बढ़ती हुई जनसंख्या की चुनौतियों से निपटने और विष्ठा मलबे के निपटारे अर्थात टैंक खाली करने से लेकर ट्रीटमेंट संयंत्र तक ले जाने की प्रभावी व्यवस्था मुहैया कराने में सक्षम बनाना आवश्यक है। यदि शौचालयों का सही नमूना चुना जाता है और स्थानीय निकायों को विष्ठा के मलबे की समस्या से निपटने में सक्षम बनाया जाता है तो स्वच्छता की बेहतर सुविधा प्रदान करने के पूरे फायदे उठाए जा सकते हैं।

     

     

    लेखक परिचय


    पद्मकांत झा, योगेश कुमार सिंह

    (पद्म कांत झा नीति आयोग में उप सलाहकार (पेयजल एवं स्वच्छता) हैं; योगेश कुमार सिंह नीति आयोग में यंग प्रोफेशनल (ग्रामीण विकास) से हैं।)
    ईमेल : jha.pk@gov.in;
    singh.yogeshkr@gmail.com

     

     

     

     

     

    TAGS

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    Comments

    Submitted by pawan (not verified) on Fri, 03/09/2018 - 09:24

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    toilet complaint

    Submitted by pawan (not verified) on Fri, 03/09/2018 - 09:27

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    I have filed toilet complaints about an open dumbing ground and the dengu coming from there by burning it. Ambernath muncipality is not even bothered about the health of their own people. The dumbing ground is in a private land . Burning the garbage by saying it is going to shift. nothing will happen .sir please think about the people over here . you can see the real face of swatchatha in Ambernath east the toilet and mountain of garbage.

    Submitted by Mahesh vaishnav (not verified) on Fri, 03/09/2018 - 11:31

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    Sir mera residence rajshatn ke barmer dis ke gira tahsil me rateu gav me hh.. Mera ghr gav se thoda dur hhh mere ghr me jo let bath bna hi nhi hhh or gav ke sarpach ne ek plate thama Di kli ye lo plate with name of house holder Ab jb tiolate bna hi nhi to vo plate kha se aai me yha jodhpur me study krta hoo Ghr me mumy jyda pde nhi hh to unhe nhj pta ki ye Kya huaa Bt Sir gav me bhut currpssn hhh chhe aap vha chq krva lo...... Bhut se ghro me let bath bne hi nhi hh jbki unhe plate pkda Di gai hhhh jo glt hh Hmare name ka amount bee log Es trh kha jate hhh.... Bs apna pet bher rhe hh to ye sra sr glt hhh know es bat pe koi action nhii liya jayega Bt hope kkoi to interest leke action lega..... Hope esa Ho or modi sir ki govt me ache kam Ho

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    नमामि गंगे रोपेगी, ऑलवेदर रोड समाप्त करेगीRuralWaterFri, 03/09/2018 - 18:19


    चमोली-कर्णप्रयाग हाईवे पर विकास की बलि चढ़ते पेड़चमोली-कर्णप्रयाग हाईवे पर विकास की बलि चढ़ते पेड़सड़क बहुत चौड़ी होगी, चमकती हुई यह सड़क होगी, मोटर वाहन फर्राटे भरेंगे, कभी अवरोध नहीं होगा, ना ही मोटर दुर्घटना होगी, ना कभी भूस्खलन और आपदा के कारण सड़क बन्द रहेगी, वर्ष भर लोग चारों धार्मिक स्थलों का दीदार करते रहेंगे और पुण्य कमाएँगे। जहाँ-जहाँ से ऑलवेदर रोड जाएगी वहाँ-वहाँ स्थानीय लोगों को स्वरोजगार प्राप्त होगा।

    पड़ोसी दुश्मन राज्य अपनी सीमाओं तक आधुनिक सुविधाओं को जुटा चुका है, इसलिये ऑलवेदर रोड की नितान्त आवश्यकता है। ऐसी सुन्दर कल्पना और सुहावना सपना हमारे प्रधानमंत्री मोदी ही देख सकते हैं। अब वह ऑलवेदर रोड के रूप में साकार होने जा रही है। ऐसा ऑलवेदर रोड महापरियोजना से जुड़े राजनेता और अफसरान गाहे-बगाहे कहते फिरते दिखते हैं।

    उल्लेखनीय हो कि यहाँ ऑलवेदर रोड को लेकर एक दूसरा पक्ष भी सामने आ रहा है। लोगों का कहना है कि हमारे प्रधानमंत्री का यह भी सपना है कि गंगा को स्वच्छ और निर्मल बनाया जाये। इसलिये ‘नमामि गंगे परियोजना’ है।बताया जा रहा है कि नमामि गंगे परियोजना के तहत उत्तरकाशी से गंगोत्री तक 30 हजार हेक्टेयर में वृहद वृक्षारोपण होगा और इन्हीं क्षेत्रों से ऑलवेदर रोड गुजरेगी जहाँ हजारों पेड़ों का कटान होना तय हो चुका है।

    गफलत यह है कि पेड़ तुरन्त लगाएँगे भी और तुरन्त उनकी बलि ऑलवेदर रोड के लिये अन्य वृक्षों के साथ चढ़ जाएगी। बता दें कि ढालदार पहाड़ों पर एक पेड़ गिराने का अर्थ है 10 अन्य पेड़ों को खतरे में डालना। जहाँ-जहाँ से ऑलवेदर रोड गुजरेगी वहाँ-वहाँ के स्थानीय लोगों से बातचीत करने पर पता चला कि उनके लिये ऑलवेदर रोड जैसी परियोजना मौजूदा समय में चिन्ता का विषय बना हुआ है।

    श्रीनगर गढ़वाल में बद्रीनाथ हाइवे पर वर्षों पुराने स्वस्थ पेड़ों पर ऑलवेदर रोड योजना के तहत खूब आरिया चल रही हैं। जैसे-जैसे पेड़ों की कटाई आगे बढ़ रही है वैसे-वैसे श्रीनगर शहर की हालात निर्वस्त्र जैसी दिखने लग गई है।

    इस पर हेमवती नन्दन बहुगुणा केन्द्रीय विश्वविद्यालय श्रीनगर गढ़वाल में भूगोल विभागाध्यक्ष डॉ. मोहन पंवार ने कहा कि अभी तक ऑलवेदर रोड की जानकारी विशेषज्ञों को नहीं मिली है। वे चाहते हैं कि इस सड़क के चौड़ीकरण के लिये टिकाऊ डिजाइन यहाँ की भूगर्भिक संरचना के अनुसार बनाया जाय।हे.न.ब. केन्द्रीय विश्वविद्यालय श्रीनगर गढ़वाल में पर्वतीय शोध केन्द्र के नोडल अधिकारी डॉ. अरविन्द दरमोड़ा ने कहा कि जंगल बचाकर सड़क बनाने की नई तकनीकी पर विचार किया जाना चाहिए।

    नंदप्रयाग- बद्रीनाथ हाईवे पर कटे हुए पेड़ों को लादते श्रमिकऑलवेदर रोड के कारण ऋषिकेश से बद्रीनाथ और रुद्रप्रयाग-गौरीकुण्ड मार्गों पर सरकारी आँकड़ों के अनुसार अब तक कुल 9105 पेड़ काटे जा चुके हैं। इसके अलावा 8939 और नए पेड़ ऋषिकेश बद्रीनाथ हाइवे पर चिन्हित किये गए हैं। जिसके कटान की स्वीकृति ऑनलाइन ली जा रही है। जबकि उत्तराखण्ड सरकार के अपर मुख्य सचिव (लोनिवि) ओम प्रकाश का दावा है कि इस परियोजना से लगभग 43 हजार पेड़ों का कटान होगा।तिलवाड़ा-गौरीकुण्ड मार्ग पर पीपल के पेड़ भी काट दिये गए हैं।

    होटल व्यावसायी जे.पी. नौटियाल ने कहा कि उनके होटल के आगे तीन पीपल के बड़े पेड़ यात्रा सीजन में देशी-विदेशी पर्यटकों को छाँव प्रदान करते थे। पीपल के पेड़ों के दोनों ओर गाड़ियाँ जा सकती थीं, उन्हें दुखः है कि इन पेड़ों की बलि भी ऑलवेदर रोड के कारण चढ़ गई। इसके अलावा उनका होटल भी 2-3 मीटर तक सड़क चौड़ीकरण की जद में आ चुका है, लेकिन उन्हें मुआवजे की राशि का अभी तक ठीक-ठीक पता नहीं है।

    बताया जा रहा है कि सड़क चौड़ीकरण से केदारनाथ हाइवे में रुद्रप्रयाग से लेकर फाटा तक तिलवाड़ा, रामपुर, सिल्ली, अगस्तमुनि, विजयनगर, गंगा नगर, बेड़ूबगड़, सौड़ी, गबनीगाँव, चन्द्रापुरी, भीरी, कुण्ड, काकड़ागाड़, सिमी, गुप्तकाशी, नाला, हयूनगाँव, नारायण कोटी, आदि स्थान आधे अथवा पूर्ण क्षतिग्रस्त हो सकते हैं। जबकि लोगों का विरोध देखकर रुद्रप्रयाग जिले के जिलाधिकारी मंगलेश घिल्डियाल को कहना पड़ा कि बस्तियों के आस-पास 24 मीटर के स्थान पर केवल 12 मीटर भूमि का अधिग्रहण होगा। लेकिन इसकी सच्चाई अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाई है।

    यहाँ फाटा में हार्डवेयर की दुकान चलाने वाले रघुवरशाह और गुप्तकाशी में कमल रावत का कहना है कि मुख्य मार्ग को छोड़कर नए स्थानों से प्रस्तावित सड़क का एलाइनमेंट भारी नुकसान का कारण बनेगा। केदारनाथ मार्ग पर काकड़ा गाड़ से सेमी होते हुए गुप्तकाशी तक के मार्ग को छोड़कर 10 किमी से अधिक सिंगोली के घने जंगलों के बीच से नया एलाइनमेंट लोहारा होकर गुप्तकाशी तक किया जाएगा। इसी तरह फाटा बाजार को छोड़कर मैखण्डा से खड़िया गाँव होते हुए नई रोड का निर्माण किया जाना है। फाटा और सेमी के लोग इससे बहुत आहत हैं। यदि ऐसा होता है तो इन गाँवों के लोगों का व्यापार और सड़क सुविधा बाधित होगी। इसके साथ ही फाटा के पास पौराणिक मन्दिर, जलस्रोत भी समाप्त हो जाएँगे इससे लोगों की आस्था को नुकसान पहुँचेगा।उनका कहना है कि जिस रोड पर वाहन चल रहे हैं उसी रोड पर सुविधा मजबूत की जानी चाहिए। नई जमीन का इस्तेमाल होने से लम्बी दूरी बढ़ेगी और चौड़ीपत्ती के जंगल भारी मात्रा में नष्ट होंगे। इसी प्रकार रुद्रप्रयाग, अगस्तमुनि दो अन्य ऐसे स्थान हैं जहाँ पर लोग सड़क चौड़ीकरण नहीं चाहते हैं।

    केदारनाथ हाईवे पर निर्ममता से काटा गया पीपल का पेड़इस सम्बन्ध में विश्व हिन्दू परिषद की कार्यकर्ता उमा जोशी का कहना है कि अगस्तमुनि बाजार को छोड़कर नए स्थान से यदि ऑलवेदर रोड बनाई गई तो वनों का बड़े पैमाने पर कटान होगा और यहाँ का बाजार सुनसान हो जाएगा।काकड़ा गाड़ में चाय की दुकान चलाने वाले वन पंचायत सरपंच दिनेश रावत का कहना है कि सरकार केवल डेंजर जोन का ट्रीटमेंट कर दें तो सड़कें ऑलवेदर हो जाएगी। उनकी चिन्ता है कि सड़क चौड़ीकरण से उनका होटल नहीं बच सकता है और वे बेरोजगार हों जाएँगे।

    इधर चार धामों में भूस्खलन व डेंजर जोन बेतरतीब निर्माण एवं अन्धाधुन्ध खनन कार्यों से पैदा हुए हैं। रुद्रप्रयाग जिले में रामपुर, सिल्ली सौड़ी बांसवाड़ा सेमी, कुंड, फाटा, बड़ासू आदि स्थानों में लगातार भूस्खलन वाले डेंजर जोन बने हुए हैं। बद्रीनाथ मार्ग पर देवप्रयाग, सिरोहबगड़, नन्दप्रयाग के पास मैठाणा, चमोली से पीपलकोटी के बीच 10 किमी सड़क और बिरही, गुलाबकोटी, हेलंग, हाथी पहाड़, पाण्डुकेश्वर, गोविन्दघाट, लामबगड़, विष्णु प्रयाग के निकट भी डेंजर जोन बने हुए हैं। इनके आस-पास से बाईपास के लिये भी कहीं से सड़क नहीं बन सकती है।

    गुप्तकाशी के आगे खुमेरा गाँव में सामाजिक कार्यकर्ता आत्माराम बहुगुणा और जिला पंचायत की पूर्व सदस्या उर्मिला बहुगुणा ने बताया कि केदारनाथ के लिये लगभग 23 हेली कम्पनियों को मिले लाइसेंस के कारण प्रदूषण बढ़ रहा है। गुप्तकाशी, नारायणकोटी, फाटा से जाने वाली हेली कम्पनियों के हेलीकाप्टर प्रतिदिन 28 बार उड़ान भरते हैं। इस तरह 23 कम्पनियों के हेलीकाप्टर कुल 644 बार उड़ान भरते हैं। इसके कारण हिमालय की बर्फ तेजी से पिघल रही है। इस तरह बढ़ रहे वायु प्रदूषण के कारण यहाँ पालतू और वन्य पशु खतरे में पड़ गए हैं। इस तरह न जाने कितने ही जानवरों की पहाड़ों से कूद कर मृत्यु हो चुकी है।

    मौजूदा समय में ऑलवेदर रोड के नाम पर बेहिचक सैकड़ों पेड़ कट रहे हैं। लोगों का कहना है कि बद्रीनाथ हाईवे के दोनों ओर कई ऐसे दूरस्थ गाँव हैं, जहाँ बीच में कुछ पेड़ों के आने से मोटर सड़क नहीं बन पा रही है। कई गाँवों की सड़कें आज भी 2013 की आपदा के बाद से नहीं सुधारी जा सकी है।

    गोपेश्वर के नगरपालिका अध्यक्ष संदीप रावत ने बताया कि सम्पूर्ण परियोजना को शुरू करने से पहले पहाड़ों की भूगर्भीय और भौगोलिक जाँच की जानी जरूरी थी। ताकि भविष्य में लामबगड़ और सिरोहबगड़ जैसे नए भूस्खलन जोन न बन सकें।उन्होंने ने कहा कि गौचर, नंदप्रयाग, कर्णप्रयाग, चमोली और पीपलकोटी में स्थानीय जनता की परिसम्पतियों पर क्षरण मूल्य लागू न किया जाय। निर्माण के दौरान मार्ग अवरुद्ध होने पर जनता को होने वाली परेशानी के हल को हाईवे पर मौजूदा वैकल्पिक मार्गों की व्यवस्था से की जाय। वन सम्पदा को होने वाले नुकसान के आँकड़ों को सार्वजनिक किया जाय, साथ ही योजना का निर्माण सुनिश्चित तरीके से हो, जिससे कम-से-कम वनस्पतियों को नुकसान हो, सड़क चौड़ीकरण शुरू होने से क्षेत्र के लोगों को होने वाले नुकसान की भरपाई के लिये योजना सुनिश्चित की जानी चाहिए। चारधाम यात्रा के दौरान तीर्थयात्रियों को निर्माण कार्यों से कोई दिक्कत न हो, इसके लिये यात्रा शुरू होने से पहले ही रोडमैप तैयार किया जाये और बद्रीनाथ हाईवे पर तीन धारा और जोशीमठ में पिकनिक स्पॉट जैसे प्राकृतिक स्थलों के साथ कोई छेड़-छाड़ न की जाय।

    ऑलवेदर रोड के लिये बलि देते पेड़चिपको आन्दोलन से जुड़े रहे मुरारी लाल ने कहा कि पहाड़ों में निर्माण कार्य का मलबा आपदा का कारण बन रहा है।उनका सुझाव है कि मलबा बंजर जमीन को आबाद कर सकता है, जिस पर वृक्षारोपण करके सड़क को भी टूटने से बचाया जा सकता है।डॉ. गीता शाह का मानना है कि पर्यावरण और विकास दोनों की चिन्ता साथ-साथ करनी चाहिए विकास की अन्धी दौड़ से पर्यावरण को खतरा न पहुँचे।उन्होने कहा कि इस दिशा में शोध व अध्ययन की आवश्यकता है। श्रीनगर, रुद्रप्रयाग से होते हुए कर्णप्रयाग, चमोली, पीपलकोटी, जोशीमठ तक टू लेन सड़क कुछ जगहों को छोड़कर सम्पूर्णतः बनी हुई है। यहाँ पर नन्दप्रयाग से चमोली पीपलकोटी के बीच ऐसे डेंजर जोन हैं जहाँ यात्रा सीजन में सड़कें टूटती रहती हैं। श्रीनगर से आगे भी सिरोहबगड़ एक बड़ा भूस्खलन क्षेत्र है जहाँ पर जान माल का खतरा बना रहता है। ऐसे डेंजर जोनों से गाड़ियों की आवाजाही रखने के लिये लगातार काम होता रहता है लेकिन हर बरसात में इनकी संवेदनशीलता कुछ ज्यादा ही बढ़ जाती है। इन स्थानों पर चौड़ी सड़क बनाना बहुत बड़ी चुनौती होगी।

    प्रधानमंत्री मोदी ने ऑलवेदर रोड बनाने की घोषणा उत्तराखण्ड विधानसभा चुनाव प्रचार के वक्त की थी। तब से अब तक यह चर्चा रही है कि पहाड़ों के दूरस्थ गाँव तक सड़क पहुँचाना अभी बाकी है। सीमान्त जनपद चमोली में उर्गम घाटी के लोग सन 2001 से सुरक्षित मोटर सड़क की माँग कर रहे हैं। यहाँ कल्प क्षेत्र विकास आन्दोलन के कारण सलना आदि गाँवों तक जो सड़क बनी है उस पर गुजरने वाले वाहन मौत के साये में चलते हैं।

    यहाँ पर सड़क की माँग करने वाले प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता और वर्तमान में ग्राम प्रधान लक्ष्मण सिंह नेगी कहते हैं कि यहाँ 3500 कि जनसंख्या वाले क्षेत्र में कोई पलायन नहीं है। वे अपने जंगल लगा रहे हैं और गाँव तक पहुँचने के लिये कठिन रास्तों के कारण दोनों ओर 35 किमी सड़क चाहते हैं।पिलखी गाँव निवासी बलवीर सिंह नेगी का कहना है कि चीन सीमा पर मलारी से आगे रोड बहुत चौड़ी है।वे कहते हैं कि बद्रीनाथ मार्ग पर भूस्खलन क्षेत्रों का ट्रीटमेंट हो जाय तो बाकी रोड टू लेन बनी हुई है।ग्रामीण नन्दन सिंह नेगी दुखीः होकर कहते हैं कि सड़कों पर डामरीकरण के बाद बार-बार केबिल बिछाने के नाम पर सड़कें टूटती रहती हैं। जिसके कारण डामर भी उखड़ते हैं और सरकारी धन का दुरुपयोग होता है।उनका कहना है कि डामरीकरण से पहले ही सड़कों के किनारों के काम सभी विभागों को सामंजस्य के साथ पूरे कर लेने चाहिए।महिला नेत्री कलावती और हेमा का कहना है कि जोशीमठ से होकर बद्रीनाथ जाने वाली सड़क को ही ऑलवेदर का हिस्सा मान लेना चाहिए। क्योंकि यहाँ सड़क पहले से ही चौड़ी है।

    जोशीमठ के लोग हेलंग-मरवाड़ी बाईपास बनाने का विरोध कर रहे हैं। जबकि वर्षों से बद्रीनाथ का रास्ता जोशीमठ से बना हुआ है। जोशीमठ में तीर्थयात्री नृसिंह मन्दिर का दर्शन करते हैं और यहाँ हजारों स्थानीय लोगों की आजीविका होटल, रेस्टोरेंट आदि से चलती हैै। दूसरा अद्भुत प्राकृतिक सौन्दर्य और सीमान्त क्षेत्र का यह मुख्य स्थान है। पत्रकार कमल नयन का कहना है कि सड़क निर्माण का मलबा सीधे अलकनंदा में उड़ेला जा रहा है। जबकि यहीं पर जोशीमठ और बद्रीनाथ के बीच आधा दर्जन से अधिक डेंजर जोन पाण्डुकेश्वर, गोविन्दघाट, लामबगड़, बलदौड़ा पुल आदि स्थानों पर देखे जा सकते हैं।

    चमोली से कर्णप्रयाग तक कटे हुए पेड़ों के ढेर मिल जाएँगेजहाँ वर्षों से निरन्तर भूस्खलन हैै। इसको सुधारने का जितना भी काम अभी हो रहा है, उससे ऊपरी हिस्से के जंगल और ग्लेशियर द्वारा बने मलबों के ढेर लगातार गिरते जा रहे हैं। यहाँ दोनों ओर की ट्रैफिक हरेक घंटे में रोकनी पड़ती है। लोगों का कहना है कि यहाँ 20 किमी के क्षेत्र में कहीं भी दो लेन सड़क नहीं बन सकती है।पीपलकोटी के राकेश शाह बताते हैं कि सड़क चौड़ी होगी, यातायात सुलभ हो जाएगी मगर सड़क के ऊपरी साइड की दुकानें हमेशा के लिये समाप्त इसलिये हो जाएगी कि उसके बाद ऊपरी हिस्से में कोई भूमि नहीं बचती है। सड़क चौड़ीकरण के नाम पर दो बार सर्वे हो चुका है लेकिन यह भी तय नहीं हुआ कि प्रभावित लोगों को मिलने वाले मुआवजे की व्यवस्था कैसी होगी?

    इस यात्रा मार्ग पर होटल व्यवसाय से जुड़े विवेक नेगी को चिन्ता है कि निर्माण कार्यों का मलबा नदी में गिराया जा रहा है जबकि नदी सूख रही है। अब तो नदी भी ऑलवेदर रोड के कारण मलबे के लिये उपयुक्त डम्पिंग यार्ड बन गया है।बताया कि इस मार्ग पर दुकान, ठेली, चाय का ढाबा चलाने वाले छोटे व्यवसायों को ऐसा कोई नोटिस नहीं आया कि सड़क चौड़ीकरण के कारण उनकों उक्त स्थान से हटना पड़ेगा।

    आम लोगों में दहशत भी फैला रही है, जबकि होना यह चाहिए कि इस दौरान जिला पंचायत की भूमि पर ऐसे व्यापारियों के लिये दुकानों की व्यवस्था करनी भी सरकार की जिम्मेदारी होनी चाहिए। उनका यह भी कहना है कि केवल दिल्ली में बैठकर सड़क चौड़ीकरण का गूगल मैप सामने रखकर के चारों धामों के जन जीवन पर संकट पैदा करने जैसी स्थिति बना रहे हैं। यहाँ सड़क किनारे होटल चलाने वाले व्यवसायी कहते हैं कि सीमा सड़क संगठन और कम्पनियों के काम करने का तरीका बिल्कुल भिन्न है। इसलिये राष्ट्रीय राजमार्ग विस्तारीकरण में प्रभावित परिवारों की अनदेखी भारी पड़ सकती है।पीपलकोटी में नाम ना छपवाने बाबत कुछ शिक्षिकाएँ कहती है कि पहाड़ों की भूगर्भिक स्थिति को बाहर की निर्माण कम्पनियाँ नजरअन्दाज कर देती हैं। वे निर्माण करते समय भारी विस्फोटों का इस्तेमाल करते हैं। पहाड़ों के जलस्रोत प्रदूषित हो रहे हैं और भूस्खलन की समस्या दिनों दिन बढ़ रही है।कहा कि तीर्थयात्रियों के लिये पहाड़ केवल सैरगाह बन रहा है जो ऑलवेदर रोड बनने के बाद और अधिक बढ़ जाएगा।उनका कहना है कि पीपलकोटी से चमोली राजमार्ग के बीच कुछ स्थानों पर सक्रिय बड़े भूस्खलनों की एक सूची है। अच्छा हो कि ऐसे खतरनाक जोन पहले आधुनिक तकनीकी से ठीक किये जाने चाहिए।

    बद्रीनाथ हाईवे

    ऑलवेदर सड़क परियोजना एक महत्वाकांक्षी काम है वे समझते हैं कि पर्यावरण के कारणों पर आपत्तियाँ होंगी लेकिन वे दिशा-निर्देशों का पालन करने के लिये अपनी पूरी कोशिश करेंगे। सभी मौसमों की सड़कों की परियोजना का निर्माण अन्तरराष्ट्रीय मानदंडों के सख्त पालन के साथ किया जा रहा है, ताकि उचित परिशोधन पर विशेष जोर दिया जा सके और उन्हें प्रतिरोधक बना दिया जा सके। अगले दो वर्षों में उत्तराखण्ड में 2019 तक लगभग 50,000 करोड़ रुपए की 70 सड़कों का निर्माण होगा। जिसमें चारधाम रोड परियोजना और भारतमाला योजना के अन्तर्गत मंजूरी दे दी गई हैं। उन्होंने ऑलवेदर सड़क परियोजनाओं पर सक्रिय रूप से काम करने की प्रशंसा की है, जो चार प्रसिद्ध हिमालयी तीर्थस्थलों को जोड़ती है। सभी मौसम सड़क परियोजनाओं से कुल 900 किमी में से 400 किमी के लिये काम किया जा रहा है...नितिन गडकरी, केन्द्रीय सड़क एवं परिवहन मंत्री।

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    गंगा गाद - बिहार में बाढ़ की आशंकाRuralWaterSat, 03/10/2018 - 18:40


    गंगागंगागंगा की पेट में इकट्ठा गाद को हटाने का इन्तजाम शीघ्र नहीं किया गया तो बिहार में बाढ़ की विभीषिका अधिक भयावह हो सकती है। यह चेतावनी गंगा की गाद की समस्या का अध्ययन करने के लिये केन्द्र सरकार द्वारा बनाई गई एक उच्चस्तरीय समिति की है जिसकी रिपोर्ट अगले महीने सौंपी जानी है।

    इस ग्यारह सदस्यीय समिति के सदस्य राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, पटना के प्राध्यापक डॉ. रामाकांत झा ने कहा कि गाद को हटाने के लिये पहली बार बड़ा प्रयास करना होगा, फिर ऐसे इन्तजाम करने होंगे कि गाद जमा होने के बजाय प्रवाहित हो जाये। अभी बिहार में गंगा की धारा में गाद के बड़े जमाव वाले ग्यारह स्थल चिन्हित किये गए हैं, जहाँ से गाद हटाने का प्रभाव समूचे बिहार पर होगा और जल-निकासी में आसानी होगी। साथ ही गंगा में राह बदलने और कई धाराओं में बँट जाने की प्रवृत्ति में कमी आएगी।

    गंगा में एकत्र गाद की भयावह समस्या का अध्ययन करने के लिये हाल के वर्षों में चार समितियाँ बनीं। लेकिन डॉ. झा बताते हैं कि सभी समितियों ने राष्ट्रीय बाढ़ आयोग के उन्हीं आँकड़ों के आधार पर अध्ययन किया जिसका संकलन बाढ़ आयोग ने 1980 में किया था।

    इसरो की सहायता से अद्यतन आँकड़ा संकलित करने का काम अभी चल रहा है। इसके लिये केन्द्र सरकार ने केन्द्रीय जल आयोग के पूर्व अध्यक्ष ए.बी. पंड्या के नेतृत्व में ग्यारह सदस्यीय समिति का गठन किया है। इस समिति में एनआईटी पटना के डॉ. रमाकर झा भी एक सदस्य हैं। समिति एक महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट देने वाली है।

    इसरो से मिले आँकड़ों के साथ ही डॉ. झा की टीम ने गंगा की धारा का सरजमीनी सर्वेक्षण भी किया है। उनके अध्ययन के दायरे में बक्सर से लेकर फरक्का तक की गंगा की धारा समेटी गई है। इस सर्वेक्षण में ग्यारह ऐसे स्थल चिन्हित किए गए हैं जहाँ सर्वाधिक गाद जमा है और उसे हटाया जा सकता है।

    मोटे तौर पर उन स्थलों पर अधिक गाद एकत्र है जहाँ गंगा से कोई सहायक नदी मिलती है। इनमें घाघरा, सोन, गंडक, कोसी और बुढ़ी गंडक के अलावा कई छोटी नदियों के संगम स्थल शामिल हैं। सबसे अधिक गाद घाघरा के गंगा से मिलन स्थल डोरीगंज-बबुरा और गंडक नदी के मिलन स्थल सोनपुर के पास जमा है।

    बड़ी मात्रा में गाद जमाव के अन्य स्थल मनेर, माहुली, राघोपुर दियरा, रानीतोल-मेकरा, सिमरिया-बरौनी, मुंगेर, भागलपुर के पहले नरकटिया-मकंदपुर, कहलगाँव के पास अंभिया-घोघा, कोसी के मिलन-स्थल बरारी और साहेबगंज के निकट मनिहारी आदि हैं।

    उल्लेखनीय है कि जल संसाधन, नदी विकास और गंगा पुनरुद्धार मंत्रालय ने जुलाई 2016 में गंगा के गाद विमुक्तिकरण के उपाय सुझाने के लिये चितले समिति का गठन किया था और भीमगौड़ा (उत्तराखण्ड) से फरक्का तक गंगा के गाद विमुक्तिकरण के लिये दिशा-निर्देश तैयार करने का जिम्मा सौंपा था।

    इस मसले पर हाल के दिनों में इस समिति ने सबसे विस्तृत अध्ययन किया था तथा गाद और बालू में अन्तर स्पष्ट करते हुए नदी की पारिस्थितिकी और पर्यावरणीय प्रवाह के लिये गाद विमुक्तिकरण की भूमिका पर विचार किया है।

    समिति ने इस मसले को विस्तृत अध्ययन के लिये किसी तकनीकी संस्थान को सौंप देने का सुझाव दिया था जो आकृति वैज्ञानिक (मॉरफोलॉजिकल) अध्ययन कर ठोस सुझाव दे सके। चितले समिति ने निर्धारित तीन महीने के समय के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी।

    चितले समिति ने कहा है कि कटाव, गाद संवहन और गादजमाव बेहद जटिल परिघटनाएँ हैं। गाद प्रबन्धन और नियंत्रण के लिये हर जगह एक ही उपाय नहीं किया जा सकता क्योंकि इस पर क्षेत्रीयता का प्रभाव बहुत अधिक होता है। स्थानीय कारण जैसे टोपोग्रॉफी, नदी नियंत्रण संरचनाएँ, मिट्टी व जल संरक्षण उपाय, वृक्षाच्छादन और तटीय क्षेत्र में भूमि के उपयोग के तौर-तरीकों का नदी के गाद पर अत्यधिक प्रभाव होता है।

    नदी नियंत्रण संरचनाएँ (जैसे जलाशय, बैराज और पुल आदि), भूमि संरक्षण उपायों और गाद नियंत्रण कार्यक्रमों से निम्न प्रवाह क्षेत्र में गाद का बहाव कम होता है और वह गाद उक्त संरचना के आसपास एकत्र हो जाता है। लेकिन अनियंत्रित ढंग से गाद निकालने से पारिस्थितिकी और पर्यावरणीय प्रवाह पर प्रतिकूल प्रभाव हो सकता है। इसलिये गाद विमुक्तिकरण कार्यों की योजना बनाने और निष्पादित करने में बेहतर सिद्धान्तों और दिशा-निर्देशों का पालन करना आवश्यक है।

    रिपोर्ट के अनुसार गंगा मुख्य नदी का गूगल अर्थ मानचित्र पर पैमाइश करने से पता चला कि नदी के दोनों पाट गतिशील सन्तुलन की स्थिति में हैं। गाद का जमाव मुख्य तौर पर भीमगौड़ा बैराज के नीचे और गंगा से विभिन्न सहायक नदियों के मिलन स्थल के आसपास है। निकासी मार्ग का संकरापन, बड़े पैमाने पर गाद का जमाव और इसके नकारात्मक प्रभाव मुख्य तौर पर घाघरा के संगम और उसके आगे के बहाव क्षेत्र में देखा गया। घाघरा के संगम के बाद नदी के बाढ़ क्षेत्र की चौड़ाई लगभग 12 से 15 किलोमीटर तक फैल जाती है।

    नदी में गाद संवहन के महत्त्व को स्वीकार करते हुए समिति ने कहा है कि गाद विमुक्तिकरण के लिये जलग्रहण क्षेत्र का उपचार और जल छाजन विकास के साथ-साथ कृषि की बेहतर पद्धतियों को अपनाना जरूरी है और नदी तट संरक्षण, कटावरोधक कार्य इत्यादि नदी में गाद का प्रवाह कम करते हैं और इन्हें समेकित ढंग से कराया जाना चाहिए। कटाव, गाद का स्थानान्तरण और गाद जमाव नदी की प्राकृतिक व्यवस्थाएँ हैं और नदी की गाद सन्तुलन की अवस्था को बनाए रखा जाना चाहिए।

    नदी की बाढ़ को फैलने के लिये पर्याप्त जगह मिलनी चाहिए, जिसमें वह बिना किसी अड़चन के प्रवाहित हो सके। गाद को दूर करने के बजाय गाद को बहने का रास्ता देना बेहतर उपाय है।

    बालू खनन के मामले में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के दिशा-निर्देशों का उल्लेख करते हुए समिति ने गंगा नदी के गाद विमुक्तिकरण के लिये स्पष्ट दिशा-निर्देश प्रस्तावित किये। उसने कहा कि गंगा नदी अपने जलविज्ञान, गाद और प्राकृतिक तल और तट के अनुरूप सन्तुलन हासिल करने का प्रयास करती है।

    बाढ़ को नियंत्रित करने के लिये पर्याप्त बाढ़ क्षेत्र और झीलें उपलब्ध होना आवश्यक है। बाढ़ क्षेत्र में किसी भी प्रकार का अतिक्रमण, झीलों के भरने या नदी से सम्पर्क टूटने से बचाना चाहिए बल्कि निकट की झीलों से गाद हटाकर उनकी भण्डारण क्षमता बढ़ानी चाहिए। झीलों से गाद हटाने में भी यह ध्यान रखना चाहिए कि गाद प्रवाह की निरन्तरता कायम रहे।

    चितले समिति ने स्पष्ट कहा कि ऊपरी बहाव क्षेत्र में बैराज, पुल जैसे निर्माण कार्यों के कारण गाद भरने लगता है और नदी रास्ता भटक जाती है। नदी प्रशिक्षण करना और निर्माण स्थल के पास बहाव के अतिरिक्त मार्ग बनाने का कार्य इस तरह से कराया जाना चाहिए जिसका अन्यत्र नदी की आकारिकी पर प्रभाव नहीं पड़े।

    ऑक्सबो झीलों के रूप में खाली हुए इलाके को भरने के बजाय इसका इस्तेमाल बाढ़ नियंत्रण के लिये किया जाना चाहिए। प्रवाह के संकुचन के कारण बड़ी मात्रा में गाद जमा हो रही हो तो चयनित धारा से गाद निकालकर उसे गहरा किया जा सकता है ताकि जल प्रवाह उससे होकर हो।

    निकाली गई गाद को ऐसे वैकल्पिक जगहों पर रखा जा सकता है जिससे तटों के कटाव रोकने में मदद मिलने वाली हो। ऐसे स्थिर प्रवाह के विकास पर ध्यान देना चाहिए जिससे ऊपरी प्रवाह या निम्न प्रवाह में प्रतिकूल प्रभाव नहीं हो। बैराज और वीयर के पास गाद की निरन्तरता बनाए रखने पर ध्यान देना चाहिए। तटबन्ध, ठोकर और नदी प्रशिक्षण कार्यों को बाढ़ क्षेत्र में अतिक्रमण नहीं करना चाहिए या झीलों और दूसरे पर्यावरणीय क्षेत्र को नदी से अलग नहीं करना चाहिए।

    सहायक नदियों के संगम के पास, खासकर अत्यधिक गाद लाने वाली नदियों के संगम क्षेत्र में गाद निकालना आवश्यक हो सकता है जिससे नदी के जल प्रवाह की कुशलता में बढ़ोत्तरी हो।

    फरक्का बैराज के सामने इकट्ठा गाद के बारे बार बार उठने वाले मुद्दों को ध्यान में रखते हुए समिति ने यह सुझाव दिया कि वहाँ बनी उथली जगहों के आसपास नदी प्रशिक्षण कार्य का ध्यान रखते हुए गाद हटाई जा सकती है। इस गाद से फरक्का फीडर नहर की फिर से ग्रेडिंग और बैराज के जलाशय तटबन्धों को मजबूत किया जा सकता है।

    आवश्यक अध्ययन के बाद सेडिमेंट स्लूइसिंग की पद्धति अपनाई जा सकती है ताकि ऊपरी प्रवाह और निम्न प्रवाह के बीच गाद के संवहन की निरन्तरता बनी रहे और बरसात के समय गाद अपने आप बहकर निकल जाये। गाद निकालने की प्रक्रिया में इसका खासतौर पर ध्यान रखना होगा कि बैराज की वर्तमान संरचना को कोई नुकसान न पहुँचे।

    ऊपरी प्रवाह क्षेत्र से आने वाली गाद के सुरक्षित ढंग से निम्न प्रवाह क्षेत्र में चले जाने के लिये बैराज में आवश्यक इन्तजाम करने के लिये समुचित अध्ययन कराना चाहिए। यह भी ध्यान रखना होगा कि इस तरह बैराज से आगे निकला गाद निम्न प्रवाह क्षेत्र में अत्यधिक कटाव या दूसरे आकारिक समस्या पैदा नहीं करे।

    चितले समिति ने यह चेतावनी भी दी कि गाद हटाने के लिये खनन गतिविधियों के कई प्रतिकूल प्रभाव हो सकते हैं जैसे कि नदी तल का नीचे जाना, तटों का कटाव, धारा का चौड़ा होना, नदी की धारा के जल के सतह की प्रवणता कम होना, नदी के आसपास भूजल की प्रवणता का कम होना, पुलों, पाइपलाइनों, जेटी, बैराज, वीयर, जैसे मानव निर्मित संरचनाओं की नींव कमजोर होना और इन सबका पर्यावरणीय प्रभाव।

    गाद निकालने की कोई योजना बनाने या कार्य निष्पादन करने में एहतियात बरतने के लिये समिति ने खासतौर से हिदायत दी और एहतियाती उपायों को सूचीबद्ध किया है। उसने कहा कि गंगा के गाद प्रबन्धन का अध्ययन करने का जिम्मा किसी एक संस्थान को दी जा सकती है जो गंगा के साथ ही उसकी सहायक नदियों के गाद प्रबन्धन का अध्ययन करेगी। इस अध्ययन रिपोर्ट को गंगा से जुड़ी किसी परियोजना के पर्यावरणीय मंजूरी के समय आधार दस्तावेज के तौर पर उपयोग किया जाएगा।

    बहरहाल, चितले समिति की सिफारिशों पर वर्तमान में कार्यरत ग्यारह सदस्यीय समिति क्या रूप अपनाती है, यह तो उसकी आखिरी रिपोर्ट आने के बाद पता चलेगा।

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    नाउम्मीद स्वामी सानंद, फिर गंगा अनशन की राह पर

    HindiSun, 03/11/2018 - 13:38

    स्वामी सानंदस्वामी सानंदस्वामी श्री ज्ञानस्वरूप सानंद को उम्मीद थी कि भारतीय जनता पार्टी जब केन्द्र की सत्ता में आयेगी, तो उनकी गंगा माँगें पूरी होंगी। अपना पिछला गंगा अनशन, उन्होने इसी आश्वासन पर तोड़ा था। यह आश्वासन तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष श्री राजनाथ सिंह द्वारा दिया गया था।

    20 दिसम्बर, 2013 को वृंदावन के एक भवन में पुरी के शंकराचार्य स्वामी श्री निश्चलानंद जी ने अपने हाथों से जल पिलाकर आश्वस्त किया था कि राजनाथ जी ने जो कहा है, वह होगा। किन्तु स्वामी जी व्यथित हैं कि वह आज तक नहीं हुआ।इसीलिये उन्होने प्रधानमंत्री के नाम एक खुला पत्र लिखा है और उसमें लिखी तीन अपेक्षाओं की पूर्ति न होने पर आमरण अनशन करते हुए देहत्याग के अपने निर्णय से प्रधानमंत्री जी को अवगत कराया है। प्रसिद्ध पानी कार्यकर्ता श्री राजेन्द्र सिंह ने इसे सही समय पर उठाया कदम बताते हुए देश-दुनिया के सभी गंगा प्रेमियों से इसके समर्थन की अपील की है।

    असह्य हो गई है अब गंगा उपेक्षा


    निजी बातचीत में स्वामी श्री ज्ञानस्वरूप सानंद ने कहा - ''शुरु-शुरु में तो लगा कि भाजपा की सरकार कुछ करेगी। गंगाजी का अलग मंत्रालय बनाया। उमाजी माँ धारी देवी के मंदिर को डुबोने वाले श्रीनगर बांध के विरुद्ध वह खुद अनशन पर बैठी थीं। निशंक उस वक्त मुख्यमंत्री थे। उनका आश्वासन था कि धारी देवी के मंदिर को बचाया जायेगा। उमाजी गंगा मंत्री बनी तो सोचा कि वह कुछ ज़रूर करेंगी। लेकिन धारी देवी की मूर्ति तो अभी भी 20-25 फीट गहरे पानी में डूबी हुई है। इस तरह करते भाजपा को तीन साल, नौ महीने तो बीत चुके; मैं और कितनी प्रतीक्षा करुं ? गंगा जी के हितों की जिस तरह उपेक्षा की जा रही है। इससे होने वाली असह्य पीड़ा के कारण तो मेरा जीवन ही एक यातना बनकर रह गया है। अब और नहीं सहा जाता।सरकार की प्राथमिकता और कार्यपद्धति देखते हुए मेरी अपेक्षा की मेरे जीवन में पूर्ण होने की संभावना नगण्य है। मैने, प्रधानमंत्री को एक खुला पत्र भेजकर अपनी व्यथा कह दी है। पत्र में अपनी तीन अपेक्षाएं भी लिख दी है।''

    24 जनवरी को उत्तराखण्ड की उत्तरकाशी से जारी एक खुले पत्र में स्वामी श्री सानंद ने प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र भाई मोदी को 'प्रिय छोटे भाई नरेन्द्र मोदी' लिखकर संबोधित किया है। अपने संबोधन में स्वामी जी ने लिखा है - ''2014 के लोकसभा चुनाव तक तो तुम भी स्वयं को माँ गंगाजी के समझदार, सबसे लाडले और माँ के प्रति समर्पित बेटा होने की बात करते थे; पर माँ के आशीर्वाद और प्रभु राम की कृपा से वह चुनाव जीतकर तो तुम अब माँ के कुछ लालची, विलासिता प्रिय बेटे-बेटियों के समूह में फंस गये हो....।''

    उन्होने लिखा है - ''माँ के रक्त के बल पर ही सूरमा बने तुम्हारी चाण्डाल चौकड़ी के कई सदस्यों की नज़र तो हर समय जैसे माँ के बचे-खुचे रक्त को चूस लेने पर ही लगी रहती है....।’’

    तीन अपेक्षाएं


    स्वामी सानंद द्वारा पत्र में प्रस्तुत तीन अपेक्षाए कुछ यूं हैं:

    अपेक्षा - एक :पहली अपेक्षा में अलकनंदा और मंदाकिनी को गंगा की बाजू बताते हुए स्वामी जी ने अपेक्षा की है कि प्रधानमंत्री जी इन दोनो बाजुओं में छेद करने वाली क्रमशः विष्णुगाड-पीपलकोटी परियोजना, फाटा-ब्यूंग तथा सिगोली-भटवारी परियोजनाओं पर चल रहे सभी निर्माण कार्यों को तुरंत बंद करायें।

    इन परियोजनाओं पर चल रहे सभी निर्माण कार्य तब तक बंद रहें, जब तक कि अपेक्षा - दो में उल्लिखित न्यायमूर्ति गिरधर मालवीय समिति द्वारा प्रस्तावित गंगाजी संरक्षण विधेयक पर संसद में विस्तृत चर्चा कर मत-विभाजन द्वारा गंगाजी के हित में निर्णय नहीं हो जाता तथा अपेक्षा - तीनमें अपेक्षित “गंगा भक्त परिषद” की भी सहमति नहीं हो जाती।

    अपेक्षा - दो :न्यायमूर्ति गिरधर मालवीय समिति के द्वारा प्रस्तावित गंगाजी संरक्षण विधेयक पर संसद में अविलम्ब विचार कर पारित करने की बजाय, उसे ठण्डे बस्ते में डालने के लिए प्रधानमंत्री जी का जो कोई भी नालायक सहयोगी या अधिकारी अपराधी हो, प्रधानमंत्री जी उसे तुरंत बर्खास्त करें और खुद भी इस अपराध का प्रायश्चित करें। प्रायश्चित स्वरूप, वह विधेयक को शीघ्रातिशीघ्र पारित व लागू करायें।

    विक्रम संवत् 2075 में गंगा संरक्षण विधेयक को क़ानून बनाकर लागू करने तक संसद अन्य कोई भी कार्य न करे; यहां तक कि श्रृद्धांजलि, शोक प्रस्ताव तथा प्रश्नकाल भी नहीं। स्वामी जी ने अपेक्षा की है कि सरकार और संसद के लिए माँ गंगाजी के संरक्षण से ऊपर अब कुछ भी न हो।

    अपेक्षा - तीन :राष्ट्रीय स्तर पर एक 'गंगा भक्त परिषद' का गठन हो। गंगाजी के विषय में किसी भी निर्माण या विकास कार्य को करने के लिए (गंगा संरक्षण विधेयक कानून ) के अंतर्गत स्वीकार्य होने के साथ-साथ गंगा भक्त परिषद की सहमति भी आवश्यक हो।

    इस 'गंगा भक्त परिषद' में सरकारी और गैर-सरकारी दोनो प्रकार के व्यक्ति, सदस्य हों। प्रत्येक सदस्य यह शपथ ले कि वह कुछ भी सोचते, कहते और करते समय गंगाजी के हितों का ध्यान रखेगा तथा उसका कोई भी बयान, सुझाव, प्रस्ताव, सहमति अथवा कार्य ऐसा नहीं होगा, जिससे माँ गंगाजी का रत्ती भर भी अहित होने की संभावना हो।

    अपेक्षाएं पूरी न हुईं तो आमरण अनशन करते हुए देहत्याग


    मूल पत्र की भाषा तनिक भिन्न है। मैने, सरलता की दृष्टि से यहां से तनिक परिवर्तन के साथ प्रस्तुत किया है। मूल भाषा पढें तो स्पष्ट होता है उक्त तीनों अपेक्षाएं, महज अपेक्षाएं नहीं एक गंगापुत्र सन्यासी द्वारा एक गंगापुत्र प्रधानमंत्री को दिए आदेश हैं। इनकी पूर्ति न होने पर स्वामी श्री सानंद ने आमरण अनशन करते हुए देहत्याग और देहत्याग करते हुए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र भाई को हत्या के लिए अपराधी के तौर पर दण्डित करने के लिए प्रार्थना का विकल्प पेश किया है।

    उन्होेने प्रधानमंत्री जी को अपने इस निर्णय से अवगत कराते हुए लिखा हुआ है कि यदि गंगा दशहरा ( 22 जून, 2018 ) तक तीनों अपेक्षायें पूर्ण नहीं हुई, तो वह आमरण उपवास करते हुए अपने प्राण त्याग देंगे। ऐसा करते हुए वह माँ गंगाजी को पृथ्वी पर लाने वाले महाराजा भगीरथ के वंशज शक्तिमान प्रभु राम से प्रार्थना करेंगे कि वह, गंगाभक्त बडे़ भाई की हत्या के अपराध में छोटे भाई प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी को समुचित दण्ड दे।

    कठिन उपवासों का इतिहास


    गौरतलब है कि सन्यास लेने से पूर्व डाॅ. गुरुदास अग्रवाल (जी डी ) के नाम से जाने वाले स्वामी श्री ज्ञानस्वरूप सानंद की पहचान, कभी आई. आई. टी., कानपुर के प्रोफेसर और केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य-सचिव के रूप में थी। फिलहाल, उनकी यह पहचान पुरानी पड़ चुकी है। अब उनकी पहचान, गंगाजी की अविरलता के लिए व्यक्तिगत संघर्ष करने वाली भारत की सबसे अग्रणी शख्सियत की हैं। उन्होने, सन्यासी का बाना भी अपने संघर्ष को गति देने के लिए ही धारण किया।

    स्वामी श्री ज्ञानस्वरूप सानंद गंगा मूल की भगीरथी, अलकनंदा और मंदाकिनी.. जैसी प्रमुख धाराओं की अविरलता सुनिश्चित करने के लिए पहले भी पांच बार लंबा अनशन कर चुके हैं।

    पहला अनशन : 13 जून, 2008 से लेकर 30 जून, 2008;
    दूसरा अनशन : 14 जनवरी, 2009 से 20 फरवरी, 2009;
    तीसरा अनशन : 20 जुलाई, 2010 से 22 अगस्त, 2010;
    चौथा अनशन : 14 जनवरी, 2012 से कई टुकड़ों में होता हुआ अप्रैल, 2012 तक और
    पांचवां अनशन : 13 जून, 2013 से 20 दिसंबर, 2013

    इन पांच अनशन में प्रत्येक, कठिन उपवास और धार्मिक, राजनीतिज्ञ और स्वयंसेवी जगत के गलियारों की एक अलग दास्तां समेटे हुए है। इस दास्तां से रुबरू होने के लिए आप 'हिंदी वाटर पोर्टल’ पर उपलब्ध 'स्वामी सानंद गंगा संकल्प संवाद’शीर्षकयुक्त एक लंबी श्रृंखला पढ़ सकते हैं।

    प्रधानमंत्री जी याद रखें, तो बेहतर


    यहां याद रखने की बात यह भी है कि यह स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद के अनशनों और उनके समर्थन में जुटे गंगा प्रेमी समुदाय का ही प्रताप था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार, गंगा के पर्यावरणीय प्रवाह के निर्धारण करने को लेकर, उच्च स्तरीय समिति गठित करने को विवश हुई। उसे गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करना पड़ा। राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण का गठन हुआ। उसमें 09 गैर सरकारी लोगों को बतौर गैर-सरकारी विशेषज्ञ सदस्य शामिल किया गया। भगीरथी मूल में गोमुख से लेकर नीचे 130 किलोमीटर तक एक भूगोल को 'इको सेंसिटिव ज़ोन' (Eco Sensitive Zone) यानी पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र घोषित किया गया। इस क्षेत्र में आने वाली तीन बड़ी विद्युत परियोजनाओं को बंद करने का आदेश दिया गया।

    यह बात और है कि ये सभी कदम मिलकर भी गंगाजी का कुछ भला नहीं कर सके। शासकीय घोषणाओं और आदेशों पर राजनीति तब भी हुई और अब भी हो रही है; बावजूद इसके, गंगा की अविरलता और निर्मलता की चाहत रखने वाले इन अनशनों को भूल नहीं सकते। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र भाई मोदी जी भी न भूलें तो बेहतर है।

    स्वामी सानंद द्वारा प्रधानमंत्री कोे लिखी गई चिट्ठी को पढ़ने के लिये क्लिक करें

    स्वामी सानंद गंगा संकल्प संवाद शृंखला : एक परिचय

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    खेतों से क्रोमियम को दूर भगाएगा बैक्टीरिया

    RuralWaterThu, 03/15/2018 - 14:01

    सुन्दरबनसुन्दरबनपश्चिम बंगाल का सुन्दरबन क्षेत्र रिहायश के लिहाज से दुर्गम इलाकों में एक है। यहाँ करीब 40 लाख लोग रहते हैं। पानी से घिरे इस क्षेत्र के लोगों के दरवाजे पर साल भर मुश्किलों का डेरा रहता है। इसके बावजूद मुश्किलों से जूझते हुए जीवन बिताते हैं।

    कभी मौसम की मार तो कभी आदमखोर बाघों के हमलों का उन्हें सामना करना पड़ता है।

    चूँकि लम्बे समय से ये लोग मुश्किलों से घिरे रहे हैं, इसलिये ये सब उनके लिये सामान्य बात हो गई है। लेकिन, पिछले कुछ वर्षों से उन्हें एक अलग तरह की समस्या से जूझना पड़ रहा है। इस समस्या ने खेती को बुरी तरह प्रभावित किया है जिससे किसान परेशान हैं। सरकार की तरफ से इस समस्या का अब तक कोई हल नहीं निकला है।

    सुन्दरबन के खेतों में पिछले कुछ वर्षों में क्रोमियम की मात्रा में बेतहाशा इजाफा हुआ है जिससे किसानी में दिक्कतें आ रही हैं। खेतों में उगाई जा रही फसलों खासकर चावल का निर्यात रुक गया है।

    सुन्दरबन में गोविंदभोग समेत कई तरह के महंगे चावल की खेती होती है। यहाँ उगने वाले इन उन्नत किस्म के चावलों का निर्यात दूसरे देशों में किया जाता है। यहाँ साल में दो बार धान की खेती होती है। सुन्दरबन में रहने वाले लोगों की रोजी-रोटी मुख्य रूप से खेती पर ही आधारित है। लोग खेती के साथ ही मछलीपालन भी करते हैं, लेकिन उससे कम आय होती है और साथ ही इसमें अनिश्चितता भी है। दूसरी बात यह है कि सुन्दरबन क्षेत्र में बाघों के हमले भी बढ़े हैं, जिससे मछलियाँ पकड़ने में किसान कतराते हैं।

    खेत में क्रोमियम की मात्रा इतनी बढ़ गई है कि चावल में भी क्रोमियम प्रवेश कर जा रहा है। इन्हें जब निर्यात किया जाता है, तो जाँच में क्रोमियम पाये जाने के कारण निर्यात में दिक्कत आ रही है।

    सुन्दरबन के किसान अनिल मिस्त्री ने कहा, ‘करीब एक दशक पूर्व सबसे पहले यह समस्या देखी गई थी। खेत की मिट्टी का रंग देखकर ही हमें समझ में आ गया था कि कोई अलग तत्व मिट्टी में आ गया है, लेकिन यह नहीं पता था कि इसमें क्रोमियम है।’

    खेत में उगने वाली फसल खासकर धान में क्रोमियम होने की जानकारी सबसे पहले साल 2009 में सामने आई थी। सुन्दरबन में उत्पादित चावल यूरोपियन यूनियन में भेजा जाता रहा है। सन 2009 में निर्यात से पहले जब इसकी जाँच की गई, तो पता चला कि इसमें भारी मात्रा में क्रोमियम है। यह तथ्य सामने आते ही उक्त चावल का निर्यात रोक दिया गया और उसी समय किसानों को भी पता चला कि फसल में क्रोमियम है।

    उल्लेखनीय है कि वर्ष 2009 में आइला तूफान ने सुन्दरबन में भारी तबाही मचाई थी। इस तूफान ने भारी जान-माल की क्षति पहुँचाई थी। साथ ही खेतों में नमकीन पानी भी घुस गया था जिससे किसान परेशान थे। आइला के तूफान से लोग सम्भल भी नहीं पाये थे कि चावल के निर्यात पर प्रतिबन्ध ने एक और बड़ा झटका दे दिया था।

    यहाँ यह भी बता दें कि क्रोमियम एक रसायन है जिसका इस्तेमाल लेदर फैक्टरियों में किया जाता है। क्रोमियम का इस्तेमाल खासतौर से लेदर को मांस से अलग करने व उसे रंगने में किया जाता है।

    क्रोमियम शरीर के लिये बेहद खतरनाक है। इससे साँस की बीमारी, चर्म रोग व प्रजनन से सम्बन्धित रोग भी हो सकते हैं।

    एक दशक पहले जब चावल में क्रोमियम की मात्रा बढ़ने के कारणों की जाँच शुरू हुई, तो पता चला कि दक्षिण 24 परगना जिले के बानतल्ला में हाल के वर्षों में काफी संख्या में लेदर फैक्टरियाँ खोली गई हैं। इन फैक्टरियों से निकलने वाली गन्दगी (जिसमें क्रोमियम भी होता है) नदी में बहा दी जा रही है, जो सुन्दरबन तक पहुँच रहा है और खेतों में अपना ठिकाना बना रहा है।

    जादवपुर विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ एनवायरन्मेंटल स्टडीज के प्रोफेसर व माइक्रोबायोलॉजिस्ट जयदीप मुखर्जी ने कहा, ‘इन फैक्टरियों से निकलने वाली गन्दगी में क्रोमियम भी शामिल होता है, जो नदियों के रास्ते सुन्दरबन डेल्टा में जमा हो रहा है और खेतों में पहुँचकर वहाँ की खेती पर असर डाल रहा है।’

    आश्चर्य की बात ये है कि लेदर फैक्टरियों से निकलने वाले इस कचरे को ठिकाने लगाने के लिये कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई है। इससे मिट्टी को तो नुकसान हो रहा है, सो हो ही रहा है, साथ ही इससे नदियों की सेहत पर बुरा असर हो रहा है जिसका दूरगामी परिणाम झेलना पड़ सकता है।

    पश्चिम बंगाल की नदियाँ वैसे ही कई तरह के प्रदूषण के बोझ से कराह रही हैं। हाल ही में आई एक रिपोर्ट में भी इसका खुलासा हुआ है। पश्चिम बंगाल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्य की दो दर्जन से अधिक नदियाँ गन्दी हैं।

    उक्त रिपोर्ट के लिये दो वर्ष पहले नमूने लिये गए थे और उनकी कई स्तरों पर जाँच की गई। रिपोर्ट के अनुसार भागीरथी व हुगली (गंगा नदी को पश्चिम बंगाल में इन्हीं दो नामों से जाना जाता है) बताया जाता है कि नदियों में प्रदूषण फैलाने वाले तत्वों की लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। रिपोर्ट में वर्ष 2014 में मिले आँकड़ों के साथ ताजा आँकड़ों का मिलान किया गया है जिसमें पाया गया कि नदियों में प्रदूषण फैलाने वाले तत्वों में बेतहाशा इजाफा हो रहा है।

    रिपोर्ट में यह भी पता चला है कि प्रदूषण की सबसे बड़ी वजह शहरों घरों से निकलने वाले गन्दे पानी को बिना ट्रीट किये नदियों में बहाना है।

    जादवपुर यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने अपने शोध से इस समस्या का समाधान खोज लिया हैबहरहाल, चूँकि यह लेख क्रोमियम के दुष्प्रभाव और उसके समाधान के उपायों से सम्बन्धित है, इसलिये हम नदियों के प्रदूषण पर विस्तार से चर्चा किसी और लेख मे करेंगे। यहाँ हम दोबारा क्रोमियम पर लौटते हैं।

    ऊपर बताया जा चुका है कि लेदर फैक्टरियों से निकलने वाली गन्दगी (जिसमें क्रोमियम भी है) सुन्दरबन डेल्टा में डिपोजिट हो रहा है और धीरे-धीरे खेतों में फैल रहा है। यहाँ दिक्कत यह है कि क्रोमियम को मिट्टी से अलग करने की कोई रासायनिक तकनीक नहीं है। खेतों की मिट्टी में समा रहे क्रोमियम को मिट्टी से निकालना करीब-करीब असम्भव है।

    लेकिन, जादवपुर यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने एक शोध कर इस समस्या का समाधान निकाल लिया है और अच्छी बात ये है कि इससे खेतों पर या खेत में उगने वाले अनाज के सेवन से लोगों पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ता है।

    शोधकर्ताओं व प्रोफेसरों ने एक ऐसी बैक्टीरिया की खोज कर ली है जो मिट्टी से क्रोमियम को खत्म करने में पूरी तरह सक्षम हैं। अच्छी बात ये है कि यह बैक्टीरिया पहले से ही मौजूद है लेकिन इसके बारे में वैज्ञानिकों व शोधार्थियों को पता नहीं था। इस शोध से यह भी पता चलता है प्रकृति में ऐसे तत्व मौजूद हैं, जो कई समस्याओं का समाधान कर सकते हैं, लेकिन किसी को इसकी जानकारी नहीं है।

    पूरे शोध में बड़ी भूमिका दो छात्रों की रही, जो इसी यूनिवर्सिटी में एमटेक कर रहे थे। इनमें से एक छात्र ने वर्ष 2013 में सुन्दरबन से मिट्टी का नमूना संग्रह किया था। इसके बाद वर्ष 2014 में एक अन्य छात्र ने भी मिट्टी का नमूना लिया। नमूने की जाँच की गई तो पता चला कि इसमें ऐसी बैक्टीरिया मौजूद है, जो क्रोमियम को मिट्टी से खत्म कर सकती है।

    जादवपुर यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ एनवायरन्मेंट स्टडीज के डायरेक्टर तरित रायचौधरी कहते हैं, ‘इस शोध से हमें पता चला है कि यही एक ऐसी बैक्टीरिया मौजूद है, जो खेतों से क्रोमियम निकाल सकती है।’

    यह महत्त्वपूर्ण शोध अभिषेक दत्ता, शायंती घोष, जयंत डी. चौधरी, ऋद्धि महानसरिया, मालंच रॉय, आशीष कुमार घोष, तरित रायचौधरी व जयदीप मुखर्जी ने संयुक्त रूप से किया है।

    शोध के अनुसार ये बैक्टीरिया 70 प्रतिशत तक क्रोमियम खत्म कर सकती है। शोध में शामिल प्रो जयदीप मुखर्जी ने कहा, ‘सबसे अच्छी बात यह है कि जिस बैक्टीरिया के बारे में पता लगाया गया है, वह एकदम स्वदेशी है और लम्बे समय से यहाँ की मिट्टी में मौजूद है।’

    मिट्टी से क्रोमियम हटाने के लिये करना यह होगा कि भारी संख्या में ये बैक्टीरिया तैयार करनी होगी और उन्हें खेतों में छोड़ देना होगा। ये बैक्टीरिया मिट्टी व फसल को नुकसान पहुँचाये बिना क्रोमियम हटा देगी।

    जयदीप मुखर्जी कहते हैं, ‘हम दो साल तक लैब में शोध कर इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि क्रोमियम हटाने की यह विधि किसी भी तरह के साइड इफेक्ट्स से परे है। चूँकि हमने यह प्रयोग बहुत छोटे पैमाने पर किया है, इसलिये इसके व्यावहारिक इस्तेमाल के लिये बड़े पैमाने पर काम करने की जरूरत है।’

    इसके लिये अच्छा खासा फंड के ही साथ ही संसाधन की भी दरकार होगी। इसके अलावा इसमें राज्य सरकार के सहयोग की भी आवश्यकता होगी। शोधकर्ताओं ने कहा कि वे इस विधि के जरिए क्रोमियम हटाने को लेकर बेहद गम्भीर हैं और चाहते हैं कि सरकार इसमें उनकी मदद करे।

    हालांकि, अभी यह आकलन नहीं किया जा सका है कि कितना खेत में कितनी बैक्टीरिया की जरूरत है। प्रो. चौधरी ने कहा कि अगर सरकार सहयोग देगी तो बड़े पैमाने पर काम किया जाएगा।
    उन्होंने कहा, ‘बड़े पैमाने पर प्रायोगिक तौर पर शोध करने के लिये सुन्दरबन में ऐसे प्लॉट का चयन करना होगा, जिसमें क्रोमियम मौजूद हो। इस प्लॉट में हम बैक्टीरिया डालकर धान की खेती कर देखेंगे और अगर प्रयोग सफल रहता है, तो इसका दायरा सुन्दरबन के उन सभी खेतों तक बढ़ाया जा सकता है, जहाँ क्रोमियम है।’

    शोधकर्ता जल्द ही इसको लेकर पश्चिम बंगाल सरकार को विस्तृत प्रस्ताव देंगे। प्रो. चौधरी ने कहा कि वह जल्द ही राज्य सरकार को पत्र लिखकर इसके बारे में बताया जाएगा और उनसे सहयोग की अपील की जाएगी।

    शोधकर्ताओ व विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि इस शोध के तर्ज पर ही और भी कई तरह के शोध कर नई चीजें सामने लाई जा सकती हैं, जो लोगों के लिये मददगार साबित होंगी।

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    नर्मदा की जान जंगलRuralWaterSun, 03/18/2018 - 18:53

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    नर्मदा के प्राण हैं वन, नर्मदा संरक्षण पहल - 2017

    नर्मदा नदीनर्मदा नदीनर्मदा या हिमविहीन ऐसी ही किसी भी दूसरी नदी के लिये जंगल अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। सामान्य बोलचाल की भाषा में यदि कहा जाये कि जलग्रहण क्षेत्र के वनों में नर्मदा की जान बसती है और जंगल उसके प्राणदाता हैं तो अतिश्योक्ति न होगी। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या जंगल वास्तव में हिमविहीन नदियों के लिये प्राणदाता की भूमिका निभाते हैं? या यह केवल एक भावनात्मक वक्तव्य है?

    वैज्ञानिक तथ्यों के आलोक में यह स्पष्ट होता है कि जंगल सीधे-सीधे नर्मदा के प्रवाह को जितना प्रभावित नहीं करते उससे कहीं अधिक परोक्ष रूप से सहायक नदियों को प्रभावित करके करते हैं। वनों का घनत्व, वनस्पति प्रजातियों की संरचना और भूगर्भीय शैल संरचना नदियों के सन्दर्भ में महत्त्वपूर्ण हैं। हम पिछले अध्याय में बता चुके हैं कि वन नदियों में प्रवाह की मात्रा, उसकी निरन्तरता और गुणवत्ता, तीनों को प्रभावित करके तिहरा काम करते हैं और जलधाराओं को सबल, अविरल और निर्मल बनाते हैं।

    नर्मदा बेसिन में होने वाली कुल वर्षा का भविष्य तय करने में वन आवरण चमत्कारी काम करता है। जहाँ वन का घनत्व व स्वास्थ्य अच्छा होता है वहाँ जल का जमीन की सतह के नीचे बहाव अच्छा होने से नदियाँ सदानीरा और निर्मल बनी रहती हैं जबकि वन उजड़ जाने के बाद नदियाँ जल्दी ही सूख जाया करती हैं। इस अर्थ में विंध्य और सतपुड़ा पर्वतों व नर्मदा घाटी में मौजूद घने जंगलों को नर्मदा की जान कहना न केवल साहित्यिक व अलंकारिक दृष्टि से बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी बिल्कुल उपयुक्त है।

    जुगलबंदी नदियों की और वनों की


    जंगलों के रहने और नर्मदा के बहने के बीच की अदृश्य जुगलबंदी को समझने और नर्मदा व इसकी सहायक नदियों में प्रवाह की निरन्तरता तथा जल की गुणवत्ता बनाए रखने में वनों की भूमिका का वैज्ञानिक आधार समझना आवश्यक है। इस अध्याय में हम नर्मदा अंचल के जंगल, पानी, मिट्टी, जैवविविधता और जन-जीवन की पारस्परिक निर्भरता को वैज्ञानिक तथ्यों के आइने में देखने का एक संक्षिप्त प्रयास करेंगे।

    ‘सौन्दर्य की नदी नर्मदा’ के रचयिता श्री अमृतलाल वेगड़ तो जंगलों को एक अनूठी उपमा देते हुए कहते हैं कि जंगल बादलों के उतरने के हवाई अड्डे हैं।देखने में भी आता है कि जहाँ घने वन होते हैं वहाँ उनकी आर्द्रता से द्रवित होकर बादलों का बरसना अधिक होता है परन्तु वायुमण्डल के जल को खींचकर वर्षा कराने में वनों की भूमिका को लेकर वैज्ञानिक एकमत नहीं हैं।

    वनों की मौजूदगी और वर्षा की मात्रा में आमतौर पर सीधा-सीधा सम्बन्ध होने की मान्यता जनमानस में है परन्तु अधिक वनों के कारण अधिक वर्षा होना या वनों का नाश हो जाने के कारण वर्षा की मात्रा में कमी हो जाने की धारणा वैज्ञानिकों के समुदाय में लम्बे समय से बहस का कारण रही है। ली (1980) के अनुसार वनों की अधिकता वाले क्षेत्रों में आमतौर पर अधिक वर्षा होने के कारण आम धारणा बन गई है कि वर्षा को आकर्षित करके वन वर्षा की मात्रा में वृद्धि करते हैं, जिससे यह मान्यता भी बनी है कि वनों के कट जाने से वर्षा में कमी आ जाती है, परन्तु उनके अनुसार यह सार्वभौमिक सत्य नहीं है। वनों की उपस्थिति के कारण स्थानीय तौर पर वर्षा का वितरण भी कुछ सीमा तक प्रभावित होता है।

    बादलों को आकर्षित करके बारिश कराने और जल उपलब्ध कराने की क्षमता की दृष्टि से वनों को दो वर्गों में विभक्त किया जा सकता है- मेघ वन (cloud forest) तथा गैर-मेघ वन (non-cloud forest)। मेघ वन कुहरे या बादलों को रोककर वातावरण में मौजूद उस नमी को जमीन में सोखने में मददगार होते हैं जो अन्यथा वातावरण में ही रह जाती। इसके विपरीत गैर-मेघ वनों की भूमिका सामान्य तौर पर वर्षा से प्राप्त जल के प्रवाह को नियंत्रित करने तक ही सीमित रहती है। इस प्रकार मेघ वनों और गैर-मेघ वनों की जल उत्पादन सम्बन्धी क्षमताएँ अलग-अलग होती हैं नर्मदा अंचल के वनों में विशुद्ध रूप से मेघ वन जैसी स्थितियाँ प्रायः नहीं पाई जाती हैं।

    अमरकंटक व पचमढ़ी और इसके निकटवर्ती क्षेत्रों में वर्षा ऋतु में मेघ वन जैसी स्थितियाँ दिखती अवश्य हैं परन्तु वर्षा कराने में इनकी भूमिका के सम्बन्ध में नर्मदा पर वैज्ञानिक अध्ययनों का अभाव होने से अभी इतना ही कहा जा सकता है कि यहाँ पर्वतों की ऊँचाई कम होने के कारण बादलों को रोककर वर्षा कराने में इन वनों की भूमिका सीमित हैं परन्तु धरातल पर गिरे जल को सोखकर भूजल स्तर बढ़ाने में ये वन अति महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

    सबल धारा - नदियों में जल की मात्रा


    वैज्ञानिक अनुसन्धान से अब तक मिली जानकारी के आधार पर ठोस रूप से यह कह पाना कठिन है कि वनों के कारण नदियों में जल की मात्रा शुद्ध रूप से बढ़ती है या नहीं। सघन वन क्षेत्रों में अधिक बारिश को आधार मानें तो यह अनुमान होता है कि वनों के कारण नदियों में जल की कुल मात्रा नदी बेसिन के परिप्रेक्ष्य में कम या ज्यादा हो सकती है। परन्तु यह मात्रा भी अन्ततः किसी इलाके में होने वाली वर्षा की कुल मात्रा के ऊपर ही निर्भर करती है और कुल वर्षा से अधिक तो नहीं ही हो सकती जो क्षेत्र विशेष की जलवायु से अधिक प्रभावित होती है।

    वाष्प के रूप में मौजूद ये बारीक फुहारें वृक्षों के छत्र में पत्तियों के बीच जमे रहकर लम्बे अरसे तक नमी बनाए रखती हैं। भारतीय वन अनुसन्धान संस्थान, देहरादून में किये गये प्रयोगों से स्पष्ट हुआ है कि औसत घनत्व के वनों में लगभग 25 मिमी वर्षा प्रत्येक बार की बारिश में वृक्षों के छत्रों में अन्तावरोधित हो जाती है। वृक्षों के छत्र द्वारा जल के अन्तावरोधन की प्रक्रिया वन के घनत्व से प्रभावित होती है। यदि वन में वृक्षों का वितान सघन नहीं है तो अन्तावरोधन कम हो जाता है जबकि वृक्षों के सघन वितान होने की स्थिति में अन्तावरोधन बढ़ जाता है।इस अर्थ में हिमविहीन किसी नदी बेसिन में गिरने वाली वर्षा का कुल जल वह अधिकतम मात्रा है जो नदियों में आ सकती है। यद्यपि कुछ वैज्ञानिकों का मत यह भी है कि वनों के कारण काफी बड़ी मात्रा में जल वाष्पोत्स्वेदन (evapotranspiration) के माध्यम से वातावरण में वापस उड़ जाता है, अतः वन कट जाने से आस-पास की जलधाराओं में जल की उपलब्ध मात्रा में पहले तो आकस्मिक वृद्धि दिखाई देती है परन्तु यह आकस्मिक बाढ़ (flash floods) पैदा करके जल्दी ही चुक जाती है जबकि धीरे-धीरे चलने वाले प्रवाह की अवधि असामान्य रूप से घट जाती है।

    एंडरसन हूवर तथा रीन्हार्ट (1976) के अनुसार धरती पर पहुँचने वाले जल के भविष्य का निर्धारण करने में अन्य वनस्पतियों की तुलना में वन प्रमुख भूमिका निभाते हैं। परन्तु यह भी सच है कि वाष्पोत्स्वेदन द्वारा हवा में जल वाष्प मुक्त करने व भूमि की निचली सतहों में जल सोखकर भूजल बढ़ाने के वनों के प्राकृतिक गुण के कारण सैद्धान्तिक रूप से किसी भी क्षेत्र में वर्षा का समस्त जल नदियों में नहीं आ सकता। इसमें से कुछ-न-कुछ नीचे या ऊपर की दिशा में गमन करता ही है। इस अर्थ में नदियों में प्रवाह की मात्रा को एक सरल समीकरण से दिखना हो तो इसे कुछ निम्न अनुसार व्यक्त किया जा सकता है :-

    वर्षा में प्राप्त जल- (वाष्पोत्स्वेदन + भूजल पुनर्भरण) = नदियों के प्रवाह में उपलब्ध जल


    इस परिप्रेक्ष्य में यह अवश्य कहा जा सकता है कि नदियों में जल की मात्रा में उतार-चढ़ाव वनों के घनत्व से सीधे जुड़ा हुआ होता है और वन इस उतार-चढ़ाव को उसी तरह नियंत्रित कर जलधाराओं को सदानीरा और स्वस्थ बनाए रखते हैं जिस तरह इन्सुलिन हार्मोन का स्राव हमारे रक्त में शर्करा की मात्रा को नियंत्रित रखता है।

    अविरल धारा - नदियों में जल के प्रवाह की निरन्तरता


    नर्मदा के प्रवाह को निरन्तरता में अविरल बनाए रखने में नर्मदा अंचल के वनों की भूमिका बड़ी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यहाँ हिमालय से निकलने वाली नदियों की तरह बर्फीले हिमनदों (ग्लेशियरों) के पिघलने से लगातार जल प्राप्त नहीं होता और यहाँ जल आपूर्ति का एकमात्र स्रोत मानसूनी वर्षा है। अर्थात मानसूनी वर्षा के दौरान मिले पानी से ही यहाँ के नदी नालों को साल भर काम चलाना पड़ता है।

    नर्मदा और इसके अपवाह तंत्र में आने वाले सभी नदी-नालों को जल की सारी आपूर्ति मानसूनी वर्षा के समय केवल कुछ महीनों में ही होती है। मानसून के समय ये नदी-नाले भीषण उफान पर रहते हैं जबकि मानसून गुजर जाने के बाद इनमें से ज्यादातर लगभग पूरी तरह सूख जाते हैं। वर्षा के दौरान जलागम में आये जल का रिसाव धीरे-धीरे करके इन नदी-नालों को बारहमासी बनाए रखने में नर्मदा अंचल के वन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

    सतपुड़ा और विंध्य पर्वतमालाओं में फैले ये वन स्वयं तो पानी पैदा नहीं करते हैं परन्तु पानी के रिसाव को नियंत्रित करने में भगवान शंकर की जटाओं जैसी भूमिका निभाकर वर्षाजल को संचित करने और बाढ़ के रूप में व्यर्थ बहने से रोककर बाद में कई महीनों तक धीरे-धीरे मुक्त करते हुए अंचल की अनेक सरिताओं को सदानीरा बनाए रखने में जो भूमिका निभाते हैं वह पानी का उत्पादन करने से कम महत्त्वपूर्ण नहीं है।

    वर्षा से प्राप्त जल को भूमि में सोखने और जलधाराओं में प्रवाह बनाए रखने की भूमिका वन अपनी विशिष्ट संरचना के कारण ही निभा पाते हैं। जंगल एक विशाल शामियाने जैसी भूमिका निभाते हुए वर्षा के पानी की बौछार को अपने ऊपर झेल लेता है और बहते हुए पानी के वेग को कम करके उसे जमीन की निचली सतहों में उतारने में मदद करता है। वनों का यह गुण हिमविहीन नदियों के प्रवाह को मानसून के बाद भी निरन्तर जारी रखने में काम आता है। वर्षापूरित नर्मदा और उसकी सहायक नदियों के मामले में भी यह तथ्य अत्यन्त प्रासंगिक है।

    सबसे पहले तो वर्षाजल का काफी भाग वृक्षों के छत्र (Tree canopy) में अन्तावरोधित (Intercept) हो जाता है। वृक्षों के छत्र द्वारा अन्तावरोधन वर्षा के जल को व्यर्थ बह जाने से रोकने में काफी मददगार होता है। बादलों से लम्बी दूरी तय करके पूरी ताकत से धरती पर प्रहार करने को तत्पर वर्षा की बूँदें जब वृक्षों के पत्तों के रूप में मौजूद ढाल से टकराती हैं तो वे मंद फुहारों और छींटों में बदल जाती हैं और उनकी संहारक क्षमता बहुत कम हो जाती है।

    वाष्प के रूप में मौजूद ये बारीक फुहारें वृक्षों के छत्र में पत्तियों के बीच जमे रहकर लम्बे अरसे तक नमी बनाए रखती हैं। भारतीय वन अनुसन्धान संस्थान, देहरादून में किये गये प्रयोगों से स्पष्ट हुआ है कि औसत घनत्व के वनों में लगभग 25 मिमी वर्षा प्रत्येक बार की बारिश में वृक्षों के छत्रों में अन्तावरोधित हो जाती है। वृक्षों के छत्र द्वारा जल के अन्तावरोधन की प्रक्रिया वन के घनत्व से प्रभावित होती है। यदि वन में वृक्षों का वितान सघन नहीं है तो अन्तावरोधन कम हो जाता है जबकि वृक्षों के सघन वितान होने की स्थिति में अन्तावरोधन बढ़ जाता है।

    सघन वनों में वृक्षों के साथ-साथ जमीन पर उगी झाड़ियाँ, छोटे पौधे व घास आदि वन धरातल पर पानी की धारा के प्रवाह को तोड़कर तेजी से बहने में अवरोध पैदा करती हैं तथा पानी सोखने में मदद करती हैं। वन धरातल की वनस्पति जल के प्रवाह को नालियाँ बनाकर धारा में बहने देने की बजाय सतह पर परत के रूप में फैल जाने के लिये विवश कर देती है। इस प्रकार तेज बहती जलधारा के अवरुद्ध होकर पतली परत में फैल जाने से जल के अन्तः रिसाव के लिये अधिक बड़ी सतह और अधिक समय मिल जाता है।

    भूमि की सतह के नीचे-नीचे बहने वाली अदृश्य जलधाराओं के इस अधोसतहीय अपवाह के कारण ही वर्षा के बहुत समय बाद तक भी पानी रिस-रिसकर नदी-नालों में मिलता रहता है और धाराओं को अवरिल बनाता है। इसी कारण सघन वनक्षेत्रों से लगे हुए आबादी वाले इलाकों में भूजल स्तर बढ़ जाता है और नलकूपों तथा कुओं में कम गहराई पर ही लम्बे समय तक जल उपलब्ध रहता है। इस प्रकार वैज्ञानिक अनुसन्धानों से प्राप्त जानकारी के आलोक में हम यह निर्विवाद रूप से कह सकते हैं कि हिमविहीन नदियों में अविरल धारा बनाए रखने का सबसे व्यावहारिक, कारगर और प्राकृतिक नुस्खा घने वन ही हैं।नर्मदा अंचल में भी पहाड़ी सघन वनों से युक्त इलाकों में छोटी-छोटी जलधाराएँ लम्बे समय तक अविरल बहती रहतीं हैं जबकि वनविहीन क्षेत्रों में वर्षा में आने वाला जल भूमि में सोखे जाने की बजाय सतही जल के रूप में तेजी से बहकर चला जाता है और अधोसतहीय अपवाह नहीं हो पाने से बड़े नदी-नाले भी वर्षाऋतु समाप्त होने के बाद जल्दी ही सूख जाते हैं। किसी क्षेत्र के वन आवरण के घनत्व में जैसे-जैसे कमी आती जाती है उसी अनुपात में नदी-नालों में प्रवाह की अवधि घटती जाती है। इसी कारण नर्मदा अंचल के वनाच्छादित पूर्वी भाग में सहायक नदियों में पानी की उपलब्धता की मात्रा और अवधि वनविहीन पश्चिमी भाग की अपेक्षा काफी बेहतर है।

    चार माह की चाँदनी - असमय सूखती नदियों का दर्द


    नर्मदा अंचल में नदियों नालों के स्वास्थ्य के बारे में पूछताछ करने पर आमतौर पर एक मोटी बात उभरती है कि लगभग 25-30 वर्ष पहले यहाँ के नालों में प्रवाह लम्बे समय तक बना रहता था। घने वन प्रांतरों में बहने वाली अनेक सरिताओं में प्रवाह बारहमासी होता था जबकि अन्य बहुत सी नदियाँ मार्च-अप्रैल तक बहती रहती थीं। अब यह अवधि घट चली है और नवम्बर-दिसम्बर आते-आते अनेक नदियाँ प्रायः पूरी तरह सूख जाया करती हैं। इन असमय सूखती नदियों का दर्द व उनके दर्द का इलाज वनों के स्वास्थ्य और सघनता के आइने में देखने पर साफ हो जाता है।

    वन आवरण की सघनता और सरिताओं में जल की उपलब्धता की अवधि के बीच सम्बन्ध का आकलन करने के लिये मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के सघन वन आवरण वाले पचमढ़ी वन्य प्राणी अभयारण्य की तुलना पश्चिमी मध्य प्रदेश के अपेक्षाकृत वनविहीन जिले बड़वानी से की गई (श्रीवास्तव, 2007)। लगभग 300 किमी की दूरी पर बसे इन दोनों जिलों में चयनित अध्ययन क्षेत्र से वर्ष 2006 तथा 2007 के आँकड़ों का संकलन, वर्गीकरण और विश्लेषण किया गया।

    इस अध्ययन के लिये पचमढ़ी वन्य प्राणी अभयारण्य के पचमढ़ी परिक्षेत्र में दिनांक 1 मई से 15 मई की अवधि के बीच 116 स्थलों के लिये तथा बड़वानी जिले के वरला परिक्षेत्र में 22 स्थानों से संकलित सतही जल उपलब्धता की जानकारी का विश्लेषण व उनकी आपस में तुलना की गई। इस अध्ययन में पाया गया कि अच्छे सघन वन आवरण की अधिकता वाले पचमढ़ी अभयारण्य में वर्ष 2006 व 2007 में मई के सूखे महीने में भी 97 प्रतिशत से अधिक जलधाराओं में पानी मिला जबकि विरल वन आवरण वाले बड़वानी जिले के वरला क्षेत्र में मई 2006 में केवल 27 प्रतिशत तथा मई 2007 में केवल 18 प्रतिशत जलधाराओं में पानी मिला।

    यद्यपि इस अध्ययन में औसत वर्षा, तापमान, आर्द्रता और मिट्टी जैसे कारकों की भूमिका पर बहुत गहराई से दीर्घकालिक शोध नहीं किया जा सका और कई बिन्दु परीक्षण के लिये शेष रह गए, पर जितनी जानकारी मिल सकी उससे मोटे तौर पर इतना तो स्पष्ट हुआ ही कि जलधाराओं में प्रवाह की निरन्तरता पर वनों का सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इस अध्ययन के सम्बन्ध में लेखक की अन्य पुस्तक ‘पानी के लिये वन प्रबन्ध’ (2009) में जानकारी दी गई है।

    वैज्ञानिक शोध से यह भी स्पष्ट हुआ है कि सघन वन भूमि में सतही अपवाह तो कम होता है परन्तु वृक्षों की जड़ों के साथ भूमि की निचली सतहों में पहुँचे पानी के कारण अधोसतहीय अपवाह की मात्रा अधिक होती है। यह अपवाह काफी धीमी गति से और सतह के नीचे होने के कारण इसका वेग भी रुक जाता है और भूमि का क्षरण भी नहीं होता। इस प्रकार तेज बहती जलधारा के अवरुद्ध होकर पतली परत में फैल जाने से जल के अन्तःरिसाव (Infiltration) के लिये अधिक बड़ी सतह और अधिक समय मिल जाता है। इसके फलस्वरूप जमीन में पानी का अन्तःरिसाव बढ़ जाने से भूजल स्तर में तेजी से वृद्धि होती है।

    यही कारण है कि घने वनों से लगे गाँवों-बस्तियों में कुओं व नलकूपों आदि में भूजल स्तर अपेक्षाकृत काफी ऊँचा पाया जाता है। भूमि की सतह के नीचे-नीचे बहने वाली अदृश्य जलधाराओं के इस अधोसतहीय अपवाह के कारण ही वर्षा के बहुत समय बाद तक भी पानी रिस-रिसकर नदी-नालों में मिलता रहता है और धाराओं को अवरिल बनाता है। इसी कारण सघन वनक्षेत्रों से लगे हुए आबादी वाले इलाकों में भूजल स्तर बढ़ जाता है और नलकूपों तथा कुओं में कम गहराई पर ही लम्बे समय तक जल उपलब्ध रहता है। इस प्रकार वैज्ञानिक अनुसन्धानों से प्राप्त जानकारी के आलोक में हम यह निर्विवाद रूप से कह सकते हैं कि हिमविहीन नदियों में अविरल धारा बनाए रखने का सबसे व्यावहारिक, कारगर और प्राकृतिक नुस्खा घने वन ही हैं।

    निर्मल धारा - जंगल और नदियों में जल की गुणवत्ता


    नदियों में प्रवाह की निर्मलता का वनों के घनत्व से सीधा सम्बन्ध है। इस मामले में वैज्ञानिक प्रायः एकमत हैं कि वन आच्छादित पहाड़ी जलग्रहण क्षेत्र शुद्ध पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करने में बहुत मददगार होते हैं। शुद्ध जल एक महत्त्वपूर्ण वन उत्पाद हैं। सघन जलग्रहण क्षेत्रों से आती जल धाराओं का पानी खेतों और नगरीय क्षेत्रों से आते पानी की तुलना में काफी साफ होता है। वन एक प्राकृतिक छन्ने की तरह जल में घुली हुई गन्दगी को छानकर धारा को निर्मल बना देते हैं।

    नर्मदा के जल की गुणवत्ता बनाए रखने में नर्मदा अंचल के वनों द्वारा महत्त्वपूर्ण योगदान दिया जाता है। यह एक स्थापित तथ्य है कि उच्च गुणवत्ता के शुद्ध जल प्रदाय में वन महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। नर्मदा का जल आज भी यदि अन्य नदियों की तुलना में काफी स्वच्छ एवं निर्मल है तो इसका एक बड़ा कारण इसके जलग्रहण क्षेत्र के वन हैं। जल को शुद्ध करने की क्षमता वनों में अपने कई गुणों के कारण आती है। वनों की भूमि पर मौजूद जैविक द्रव्य (ह्यूमस) पानी को सोखकर नीच जाने में सहायता करता है और मिट्टी प्रदूषक तत्वों को सोख लेती है। इस प्रकार भूमि में नीचे जाने वाला जल छन-छनकर लगातार निर्मल और शुद्ध होता रहता है।

    अपने इसी गुण के कारण ही नदी तटीय क्षेत्रों में मौजूद वन एक सोख्ता बफर पट्टी जैसे काम करते हुए तलछट, पोषक तत्वों और विषैले प्रदूषक तत्वों को रोककर जलधाराओं के सतही प्रवाह में मिलने से बचाते हैं जिससे जल की गुणवत्ता में सुधार होता है। नदी तटीय क्षेत्रों में पाई जाने वाली वनस्पति जलधारा के प्रवाह को मन्द कर देती है और अवांछित तत्वों को धीरे-धीरे छानते हुए जल की गुणवत्ता सुधारने में काफी मदद करती है। जलधारा की तीव्रता में कमी आने के कारण पानी को जमीन के अन्दर रिसने के लिये पर्याप्त समय मिल जाता है और अवसाद के बारीक कणों का जमाव वनस्पति में ही हो जाता है।

    नदी तटीय वन बफर में पाई जाने वाली वनस्पति के कारण इन क्षेत्रों में कार्बनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ जाती है और सूक्ष्म जीवों, केचुओं व अन्य कृमियों के पनपने के लिये अनुकूल स्थितियाँ बन जाती हैं। इन कारणों से डी-नाइट्रीकरण तथा अन्य जैव रासायनिक प्रक्रियाएँ तेज हो जाती हैं जिससे मिट्टी भुरभुरी हो जाती है और भूमि में जल रिसाव की दर बढ़ जाती है। इन प्रक्रियाओं में जल की गुणवत्ता में प्राकृतिक रूप से ही काफी सुधार हो जाता है। जल की गुणवत्ता सुधारने में वनों की भूमिका को मुख्यतः पोषक तत्वों और हानिकारक रासायनिक कीटनाशकों की अधिकता पर नियंत्रण के रूप में समझा जा सकता है।

    जल में पोषक तत्वों की असामान्य अधिकता पर वनों का नियंत्रण


    पोषक तत्व जल की गुणवत्ता से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण कारक हैं। ये जलीय पारिस्थितिक तंत्र के अनिवार्य तत्व होते हैं परन्तु इनकी असामान्य रूप से अधिक मात्रा जलीय वातावरण में अनेक अवांछित बदलाव ला देती है जिनके कारण यह जल मानव के लिये उपयोग लायक नहीं रह जाता। खेतों में उपयोग होने वाले विभिन्न रासायनिक उर्वरक, मल तथा अपशिष्ट पदार्थ, जहरीले कीटनाशक इत्यादि वर्षा के जल के प्रवाह के साथ बह-बहकर जलधाराओं तथा तालाबों को प्रदूषित करते रहते हैं।

    प्रदूषण के कारण जल की गुणवत्ता बिगड़ती है और मानव जीवन तथा स्वास्थ्य को दुष्प्रभावित करती है। जहरीले पदार्थों के जलधाराओं में मिश्रित होने से दूषित जल पीने, तैरने, नहाने या संक्रमित मछलियाँ खाने पर मनुष्यों को अनेक बीमारियाँ हो सकती हैं। जॉनसन व अन्य द्वारा किये गए शोध से इस बात के संकेत मिले हैं कि नदी तटीय वन बफर अनेक प्रकार के प्रदूषक तथा विषैले तत्वों के प्रवाह को जल प्रवाह में जाने से रोक लेते हैं और उन्हें जमाकर मिट्टी या कार्बनिक पदार्थों में अवशोषित करा देते हैं अथवा सूक्ष्म जैविक प्रक्रियाओं या रासायनिक क्रियाओं द्वारा अन्य अहानिकारक तत्वों मे बदल देते हैं।जलधाराओं के किनारे मौजूद जंगल प्रदूषकों को सोखकर जलधारा के लिये एक विषपायी छन्ने या बफर का काम करते हैं। नदी तटीय वन बफर (Riparian forest buffer) नाइट्रोजन, फास्फोरस, कैल्शियम, पोटैशियम, सल्फर तथा मैग्नीशियम जैसे पोषक तत्वों की अपशिष्ट मात्रा को छानकर जलधाराओं में पहुँचने से पहले ही रोकने में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

    अधिकांश प्रदूषकों में नाइट्रोजन तत्व की मात्रा काफी अधिक होती है जो आमतौर पर खेतों से आने वाले पानी के साथ घुले हुए यूरिया जैसे रासायनिक उर्वरक के रूप में आता है। इसी प्रकार पानी के साथ बहकर आने वाले कार्बनिक पदार्थों में फास्फेट और मिट्टी के कणों पर सतह-शोषित (adsrobed) रूप में फास्फोरस रहता है।

    जलधाराओं में इन पोषक तत्वों की अत्यधिक मात्रा से यूट्रोफिकेशन (eutrophication) नामक क्रिया प्रारम्भ हो जाती है जिसमें ज्यादा पोषक तत्व प्राप्त होने से जलीय शैवालों तथा अन्य जलीय वनस्पतियों की मात्रा में बड़ी तेजी से वृद्धि होने लगती है। जब ऐसी जलीय वनस्पतियों की मात्रा में असामान्य वृद्धि होती है तो पानी में घुली ऑक्सीजन की खपत (Biological Oxygen Demand) में अप्रत्याशित वृद्धि हो जाती है और बुरी दिखने वाली शैवाल तथा सड़ते हुए कार्बनिक पदार्थों की तैरती हुई कालीन जैसी परतें बन जाती हैं जो जल की सतह को ढँक लेती हैं। इसके फलस्वरूप जल में अवांछनीय रंग और गन्ध पैदा हो जाते हैं, स्वाद बिगड़ जाता है और वह प्राणियों के उपयोग लायक नहीं रह जाता। हाल के वर्षों में यह स्थिति नर्मदा के किनारे भी कई क्षेत्रों में अक्सर दिखाई देने लगी है।

    वर्ष 2015 में नर्मदा के मध्य भाग में काफी क्षेत्रों में आश्चर्यजनक रूप से एजोला नामक जलीय फर्न की अप्रत्याशित बढ़त देखी गई। यह वृद्धि इतने बड़े पैमाने पर और इतने कम समय में हुई कि इसने मध्य नर्मदा उप-बेसिन के कई खण्डों में नर्मदा जल की सतह को लगभग पूरा का पूरा ढँक लिया। फतेहगढ़-जोगा के निकट एजोला की वृद्धि से पूरी नर्मदा किसी नदी की बजाय हरे फुटबॉल मैदान जैसी दिखाई दे रही थी जिसके चित्र समाचार पत्रों में भी छपे।

    यह स्थिति, शाहपुर, बुदनी, छीपानेर, नेमावर, किटी और आस-पास के क्षेत्रों में भयावह रूप में देखी गई जिसके कारण नौका चालन और मछली पकड़ने के लिये जाल फेंकना भी दुश्वार हो गया। यह सोचने और शोध का विषय है कि बाँधों के कारण ठहरे हुए पानी वाले खण्डों में जहाँ खेती से रासायनिक उर्वरकों की अपशिष्ट मात्रा जल में बढ़ रही है कहीं यह उसका सीधा परिणाम तो नहीं है? इस विषय पर निरन्तर शोध और अनुश्रवण किये बिना नर्मदा घाटी में बसे समाज का दीर्घकालिक कल्याण सुनिश्चित करना कठिन है।

    जल में विषैले पदार्थों के मिलने पर वनों की चौड़ी बागड़ द्वारा नियंत्रण
    प्रदूषण के कारण जल की गुणवत्ता बिगड़ती है और मानव जीवन तथा स्वास्थ्य को दुष्प्रभावित करती है। जहरीले पदार्थों के जलधाराओं में मिश्रित होने से दूषित जल पीने, तैरने, नहाने या संक्रमित मछलियाँ खाने पर मनुष्यों को अनेक बीमारियाँ हो सकती हैं। जॉनसन व अन्य (1984) द्वारा किये गए शोध से इस बात के संकेत मिले हैं कि नदी तटीय वन बफर अनेक प्रकार के प्रदूषक तथा विषैले तत्वों के प्रवाह को जल प्रवाह में जाने से रोक लेते हैं और उन्हें जमाकर मिट्टी या कार्बनिक पदार्थों में अवशोषित करा देते हैं अथवा सूक्ष्म जैविक प्रक्रियाओं या रासायनिक क्रियाओं द्वारा अन्य अहानिकारक तत्वों मे बदल देते हैं।

    लॉरसेन तथा उनके सहयोगियों (1984) ने पाया कि केवल दो फुट चौड़ी बफर पट्टी भी बीमारी पैदा करने वाले हानिकारक फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया (Faecal Coliform Bacteria) को 83 प्रतिशत तक रोक लेती है जबकि 7 फुट की बफर पट्टी तो लगभग 95 प्रतिशत फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया को पानी में जाने से रोकने में सक्षम है। यंग तथा उनके साथियों (1980) ने मिनीसोटा में आकलन किया कि 118 फीट चौड़ी बफर पट्टी से छनकर आने के बाद पानी में फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया की मात्रा इतनी कम हो जाती है कि वह जल मानव उपयोग के लायक हो जाता है। इस प्रकार हम पाते हैं कि नदी तटीय वन बफर जल की गुणवत्ता सुधारने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं।

    घने वनों में मौजूद वानस्पतिक बागड़ पोषक तत्वों को छानने में कारगर


    अमेरिकी कृषि विभाग के शोधकर्ताओं लॉरेन्स तथा उनके सहयोगियों (1984) ने टिफटन, जॉर्जिया में एक लम्बे अध्ययन में पाया कि पर्णपाती वन बफर खेतों से बहकर आने वाले नाइट्रोजन की मात्रा में 68 फीसदी तक कमी कर देते हैं। इसी प्रकार मेरीलैण्ड में चैसापीक खाड़ी में पश्चिमी किनारे पर पीटरजॉन तथा कौरल (1984) द्वारा किये गए प्रयोगों में पाया गया कि खेतों से बहकर आने वाली लगभग 89 प्रतिशत नाइट्रोजन तटीय बफर पट्टी के पहले 62 फीट में ही छनकर रुक जाती है।

    जॉर्डन तथा अन्य ने मेरीलैण्ड के पूर्वी समुद्री तट पर पाया कि खेतों से बहकर आने वाले नाइट्रेट्स की 95 प्रतिशत मात्रा तटीय बफर वनों द्वारा छानकर रोक ली जाती है। अध्ययनों से यह भी पुष्टि हुई है कि नदी तटीय वन हानिकारक नाइट्रेट को डी-नाइट्रीकरण की क्रिया द्वारा गैसीय नाइट्रोजन तथा नाइट्रस ऑक्साइड में बदलकर उन्हें वातावरण में मुक्त कर देते हैं और खेतों से बहकर आने वाले जल में से नाइट्रोजन की मात्रा में कमी करने में प्रभावी हैं।

    इसी प्रकार नदी तटीय वन बफर फॉस्फोरस के लिये भी महत्त्वपूर्ण सोख्ते (सिंक) का काम करते हैं क्योंकि अवसाद (मिट्टी के महीन कण) के साथ जुड़ा हुआ फास्फोरस बफर पट्टी में ही जमा हो जाता है जिसकी कुछ मात्रा पौधों के ऊतकों द्वारा सोख ली जाती है और काफी मात्रा मिट्टी में पाये जाने वाले सूक्ष्म जीवों द्वारा इस्तेमाल कर ली जाती है। उत्तरी कैरोलिना में कूपर तथा गिलियम (1987) द्वारा किये गए अध्ययन में पाया गया कि फास्फोरस की लगभग आधी मात्रा नदी तटीय वन बफर में शोषित हो जाती है।

    मेरीलैण्ड में पीटरजॉन तथा कौरल (1984) ने पाया कि पर्णपाती काष्ठीय वन बफर खेतों के पानी के साथ आने वाले फास्फोरस की मात्रा में 80 प्रतिशत तक की कमी कर देते हैं। भले ही अध्ययनों के अभाव के कारण हमें आँकड़ों के रूप में स्थानीय जानकारी न हो, नर्मदा अंचल के वन भी यहाँ की सरिताओं के लिये निश्चित रूप से इसी प्रकार की भूमिका लगातार अदा कर रहे हैं। आधुनिक खेती में रासायनिक उर्वरकों व घातक विषैले कीटनाशकों का व्यापक पैमाने पर प्रयोग होने के बावजूद नर्मदा का जल अभी भी अपेक्षाकृत साफ होने का एक प्रमुख कारण यहाँ के वन ही हैं।

    इस प्रश्न का कोई निश्चित उत्तर नहीं दिया जा सकता कि नदी तटीय वन बफर के रूप में घास या वृक्ष किसे अधिक प्राथमिकता दी जानी चाहिए क्योंकि अब तक किये गए अध्ययन भिन्न-भिन्न स्थानीय परिस्थितियों में किये गए होने के कारण सही तुलना सम्भव नहीं है परन्तु दोनों की अपनी-अपनी विशेषताएँ और उपयोग हैं। घास और वृक्ष दोनों के बफर पोषक तत्वों और तलछट को छान (फिल्टर) करके रोकने और जल में नाइट्रेट की मात्रा को घटाने में मदद करते हैं। वृक्ष बफर में डी-नाइट्रीकरण की दर तो अधिक होती है परन्तु इन्हें स्थापित करने में अधिक समय लगता है। इसके विपरीत घास बफर काफी जल्दी स्थापित किया जा सकता है और तलछट के बारीक कणों को रोकने और उन्हें जल प्रवाह से अलग करके जमा करने के लिये अधिक सतह उपलब्ध कराता है। वन बफर की संरचना चित्र 3.5 में दर्शाई गई है।

    भू-क्षरण व जलाशयों में अवसाद जमाव पर नियंत्रण में वनों की भूमिका


    नदियों के सन्दर्भ में वनों की एक महत्त्वपूर्ण भूमिका पानी के बहाव के कारण होने वाले मिट्टी के कटाव और भू-क्षरण को काबू में रखने की है। इस तरह के भू-क्षरण के फलस्वरूप जलाशयों में होने वाले अवसाद के जमाव (sedimentation) को नियंत्रित करने में वन बड़ी कारगर भूमिका निभाते हैं। अवसाद मिट्टी के वे कण हैं जो क्षरण से प्रभावित भूमियों (जैसे वन विहीन हो चुकी पहाड़ियाँ जुते हुए खेत, निर्माण क्षेत्र, वनों की कटाई वाले क्षेत्र तथा अपरदन प्रभावित नदी तट आदि) से उत्पन्न होकर जलधाराओं, झीलों व अन्य खुले जलस्रोतों में मिल जाते हैं।

    जलप्रवाह की तीव्रता को घटाकर भूमि का क्षरण रोकने में वनों की भूमिका बड़ी महत्त्वपूर्ण है। वन आच्छादित भूमि की पारगम्यता अधिक होने के कारण इस पर गिरने वाला वर्षा का जल ह्यूमस और जैविक द्रव्य के कचरे में सोखकर धीरे-धीरे भूमि में प्रवेश कर जाता है। इसके फलस्वरूप भूमि की सतह पर स्वतंत्र रूप से बहने के लिये अपेक्षाकृत कम पानी शेष बचता है। इस कारण वन अच्छादित भूमि पर प्राप्त होने वाले वर्षाजल का सतही अपवाह बहुत कम हो जाता है जिसके फलस्वरूप भूमि का क्षरण होने की क्रिया पर अंकुश लगता है।वन रहित क्षेत्रों में जल का सतही अपवाह धीरे-धीरे छोटी-छोटी नालियों का निर्माण कर देता है जो ढलवाँ क्षेत्रों में बड़ी नालियों व गली और होते-होते बीहड़ों का रूप धारण कर लेता है। ये सभी नालियाँ, गलियाँ व बीहड़ किसी-न-किसी नदी से जुड़े होते हैं। वनस्पति विहीन क्षेत्रों में वर्षा में आने वाले जल प्रवाह के साथ मिट्टी की ऊपरी सतह का नियमित रूप से क्षरण होता रहता है और उपजाऊ मिट्टी, रेत, कंकड़ व गाद (सिल्ट) आदि जलधारा के साथ बहते और जलाशयों में एकत्र होते रहते हैं। मिट्टी की ऊपरी सतह के क्षरित होकर बह जाने के कारण भूमि की उत्पादकता में कमी आने लगती है और भूमि धीरे-धीरे बंजर होती जाती है।

    जहाँ की भूमि पर वन आवरण होता है वहाँ पौधों की जड़ें मिट्टी को बाँधकर रखती हैं जिससे मिट्टी के क्षरण पर अंकुश लगता है। जलप्रवाह की तीव्रता को घटाकर भूमि का क्षरण रोकने में वनों की भूमिका बड़ी महत्त्वपूर्ण है। वन आच्छादित भूमि की पारगम्यता (permieability) अधिक होने के कारण इस पर गिरने वाला वर्षा का जल ह्यूमस और जैविक द्रव्य के कचरे में सोखकर धीरे-धीरे भूमि में प्रवेश कर जाता है। इसके फलस्वरूप भूमि की सतह पर स्वतंत्र रूप से बहने के लिये अपेक्षाकृत कम पानी शेष बचता है। इस कारण वन अच्छादित भूमि पर प्राप्त होने वाले वर्षाजल का सतही अपवाह बहुत कम हो जाता है जिसके फलस्वरूप भूमि का क्षरण होने की क्रिया पर अंकुश लगता है।

    जलधाराओं में अवसाद की अधिकता जल की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव डालने के साथ-साथ जलाशयों की जल भराव क्षमता में कमी करके उनकी उपयोगी आयु घटा देती है। कई अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि वन काफी प्रभावी तरीके से अवसाद छन्नी (sediment trap) का काम करते हैं।

    जलधाराओं के समीपवर्ती क्षेत्र में बड़े पैमाने पर खेती तथा तटीय वनों की दुर्दशा जलाशयों में अवसाद इकट्ठा होने की गति को तेजी से बढ़ा सकती है। तीव्र ढाल वाले क्षेत्रों में जब खेती या अन्य कारणों से जल में अवसाद की मात्रा तथा बहाव बढ़ जाता है तो जगह-जगह अवसाद के जमाव से छोटे-छोटे टापू बनने लगते हैं और जलधारा का प्रवाह बाधित होने लगता है। स्वस्थ नदी तटीय वन मिट्टी के क्षरण के माध्यम से आने वाले अवसाद को छानकर रोक लेते हैं और नदियों के कगारों को स्थायित्व देते हैं।

    स्वस्थ वनों से युक्त जलग्रहण क्षेत्रों में अन्य किसी भी प्रकार की वनस्पति आवरण की अपेक्षा सबसे कम गाद एकत्रित होती है। इसीलिये वनों को बहुधा जलाशयों में गाद की मात्रा नियंत्रित करने वाली कुदरती प्रणाली के रूप में देखा जाता है। इस सम्बन्ध में कुछ महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक प्रयोगों के निष्कर्ष वनों की महत्त्वपूर्ण भूमिका को स्पष्ट करते हैं।

    एरिजोना में विलसन (1967) ने पाया कि जलधारा के किनारे मौजूद घास के बफर रेत के कणों को बहुत कम दूरी (प्रारम्भ से लगभग 10 फीट तक) में ही रोक लेते हैं जबकि गाद के महीन कणों को हटाने के लिये लगभग 50 फीट चौड़ी बफर पट्टी आवश्यक है। वैज्ञानिकों ने यह भी पाया कि नदी तटीय घास बफर रेत जैसे बड़े कणों को रोकने में तो बहुत कारगर हैं परन्तु चिकनी मिट्टी के महीन कणों को रोकने में ये उतने प्रभावी नहीं हैं।

    जॉर्जिया में लिटिल रिवर के तटीय क्षेत्रों में किये गए कुछ अध्ययनों में लॉरेन्स तथा उनके सहयोगी वैज्ञानिकों (1986) ने पाया कि एक नदी तटीय वन में 311600 से 471000 पौंड प्रति एकड़ की मात्रा तक गाद प्रतिवर्ष लगभग पिछले 100 वर्षों में एकत्र हुआ है। उत्तरी कैरोलिना में कूपर व अन्य वैज्ञानिकों (1987) ने पाया कि उत्पादक कृषि क्षेत्रों में खेतों से आने वाली अवसाद का 84-90 प्रतिशत तक समीपवर्ती नदी तटीय पर्णपाती वनों द्वारा रोक लिया जाता है। उत्तरी कैरोलिना में ही पीडमॉन्ट इलाके में डेनियल्स तथा उनके सहयोगियों (1996) द्वारा अपने अध्ययन में पाया गया कि केवल घास अथवा घास-वन की तटीय छन्नी पट्टियाँ अवसाद को 60-90 प्रतिशत तक रोकने में समान रूप से प्रभावी हैं।

    ब्लैक्सबर्ग, वर्जिनिया डिलाहा तथा उनके साथी शोधकर्ताओं (1989) ने पाया कि 30 फीट चौड़ी ऑचर्ड घास की पट्टी जल के प्रवाह के साथ आये अवसाद तथा घुलनशील पदार्थों को 84 प्रतिशत तक कम कर देती है जबकि 15 फीट चौड़ी पट्टी से जलधारा में जाने वाले अवसाद की मात्रा 70 प्रतिशत तक कम हो जाती है। प्रयोगों में यह भी पाया गया है कि घास की बफर पट्टी की अवसाद को छानकर रोक लेने की क्षमता समय के साथ क्रमशः कम होती जाती है क्योंकि बफर पट्टी धीरे-धीरे जमा हुए अवसाद से भर जाती है।

    वर्जिनिया में डिलाहा तथा उनके सहयोगियों (1989) द्वारा अध्ययन में पाया गया कि घास की एक बफर पट्टी जो प्रारम्भ में 90 प्रतिशत तक अवसाद को रोक लेती थी, 6 बार के बाद केवल 5 प्रतिशत तक ही कारगर रही। गुरमेल सिंह, रामबाबू तथा उनके सहयोगियों (1992) द्वारा पाया गया कि 40 प्रतिशत से अधिक छत्र घनत्व वाले सघन वन क्षेत्रों में मिट्टी के ह्रास की औसत वार्षिक दर मात्र 0.9 से 1.3 टन प्रति एकड़ है जबकि 40 प्रतिशत से कम छत्र घनत्व वाले विरल वनों में मिट्टी के ह्रास की दर 2.2 से 8.9 टन प्रति एकड़ है।

    इस अध्ययन से पता चला कि जहाँ वन आवरण घना है वहाँ मिट्टी के कटाव की दर बहुत कम है और जहाँ वन आवरण नगण्य है वहाँ मिट्टी के कटाव की दर बहुत अधिक है। ऑस्बार्न तथा कौवेसिक (1993) ने पाया कि बफर पट्टी की अवसाद रोकने की क्षमता अवसाद के कणों के आकार और मात्रा, ढलान, वनस्पति का प्रकार और घनत्व, भूमि पर ह्यूमस तथा पत्तियों के कचरे की उपस्थिति या अनुपस्थिति, मिट्टी की संरचना, अधोसतहीय जल अपवाह तथा बाढ़ की आवृत्ति और तीव्रता पर निर्भर करती है।

    इन बातों को ध्यान में रखते हुए नदी तटीय वन बफर को ठीक से बनाया तथा लगातार रख-रखाव करके उनकी उपयोगिता को लम्बी अवधि तक बनाए रखा जा सकता है। नर्मदा पर बने बाँधों की शृंखला के साथ निर्मित जलाशयों के सन्दर्भ में भी अवसादन की समस्या को समय रहते गम्भीरता से लिये जाने की आवश्यकता है। इसके लिये गम्भीर रूप से भू-क्षरण प्रभावित जलागम क्षेत्रों का प्राथमिकता पर उपचार व निरन्तर रख-रखाव आवश्यक होगा।

    नदी के तटों का कटाव रोककर उन्हें स्थिर रखने में वनों की भूमिका


    पानी के बहाव के कारण होने वाले भू-क्षरण पर नियंत्रण की दृष्टि से वनों की एक अन्य भूमिका नदियों के कगारों को स्थायित्व देने में भी है। वनस्पतिविहीन कगारों की मिट्टी कट-कटकर नदियों में गिरने से मूल्यवान भूमि का क्षय होता है। वन आच्छादित कगारों पर नाना प्रकार की वनस्पतियों की जड़ें मिट्टी को बाँधे रखती हैं जिससे मिट्टी को अधिक स्थायित्व मिलता है।

    जलधाराओं के तटीय इलाकों में कगारों पर वनस्पति आवरण नष्ट हो जाने के फलस्वरूप भूमि का लगातार क्षरण होता रहता है जिससे नालियाँ और नालों के मुहाने बनने के साथ-साथ बीहड़ों का निर्माण होने लगता है। वन आच्छादित कगारों के कटाव का खतरा अपेक्षाकृत काफी कम रहता है।

    जलधारा के सीधे सम्पर्क में आ जाने की स्थिति में भी ऐसे इलाकों में वनविहीन क्षेत्रों की अपेक्षा कटाव की गति नहीं बढ़ने पाती। यद्यपि नर्मदा के कगार काफी बड़े क्षेत्र में चट्टानी और तरंगित हैं परन्तु बाकी क्षेत्रों में नदी के कगारों का कट-कटकर नर्मदा व उसकी सहायक नदियों में गिरना जारी है। वन की हरित पट्टी इस पर रोक लगाने में काफी कारगर हो सकती है।

    भूजल भण्डार और वन


    नर्मदा पदयात्री और साहित्यकार श्री वेगड़ द्वारा दी गई उपमा के अनुरूप जंगल बादलों के उतरने के हवाई अड्डे हों न हों, बारिश का पानी सोखने वाले विराट स्पंज तो हैं ही! वर्षा के दौरान धरती को मिलने वाले जल का भविष्य तय करने में वनों की बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका है। वर्षाजल को सोखकर भूजल भण्डार समृद्ध करने में वनों की भूमिका अमूल्य और अतुलनीय है। ऐसा उनकी अनूठी वानस्पतिक संरचना और जंगल की स्वस्थ मिट्टी के कारण सम्भव हो पाता है।

    वर्षाजल जब बड़े वेग के साथ वन आवरण से टकराता है तो सबसे पहले वृक्षों के छत्र से टकराकर उनका वेग कम होता है। इसके बाद वही जल वृक्षों के छत्र से छन-छन कर वनों के धरातल पर मौजूद छोटे पौधों, घास, खर-पतवार और सड़ी गली पत्तियों, शाखाओं, छाल, फल-फूल के जैविक द्रव्य की भुरभुरी सरंध्र परतों में किसी सूखे स्पंज की भाँति सोख लिया जाता है।

    वनभूमि की रंध्रता बढ़ाकर पानी सोखने की क्षमता कई गुना बढ़ाने में मिट्टी में रहने वाले केंचुए, कीड़े-मकोड़े और भूमिगत सुरंगें व बिल बनाकर रहने वाले अन्य जीव बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन जीवों द्वारा बनाए गए असंख्य भूमिगत छिद्रों नालियों व बिलों के कारण पानी सोखने के लिये उपलब्ध धरती की सतह सामान्य से कई गुना बढ़ जाती है। इन छिद्रों के कारण बने खोखले स्थानों में भी काफी मात्रा में पानी जमा हो जाता है और लम्बे समय तक धीरे-धीरे भीतर रिसता रहता है।वन आवरण यह भूमिका धरातल पर मौजूद जैविक द्रव्य और ह्यूमस के गद्देदार और स्पंजी कवच के कारण निभा पाता है। स्वस्थ और भरे-पूरे वनों में भूमि पर पत्तियों, शाखाओं, छाल, फल-फूल आदि के गिरते रहने के कारण धरातल पर काफी जैविक द्रव्य पाया जाता है जो भूतल और मिट्टी की ऊपरी सतह में पाये जाने वाले नाना प्रकार के जीवों की अनेक जैविक क्रियाओं द्वारा धीरे-धीरे सूक्ष्म जीवों का भोज्य पदार्थ बनता है और गर्मी तथा नमी के फलस्वरूप धीरे-धीरे सड़कर लम्बी अवधि में ह्यूमस बनाता है।

    भूमि की सतह पर पड़ा यह जैविक द्रव्य वर्षा की ऊँचाई से गिरने वाली ताकतवर बूँदों के धरती पर सीधे प्रहार में बाधा उत्पन्न करता है जिससे वर्षा के दौरान सीधे बादलों से आने वाली बूँदों तथा वृक्षों के ऊँचे छत्र से टपककर नीचे पहुँचने वाले पानी की तेज बूँदों की ऊर्जा कम हो जाती है और मिट्टी का कटाव करने की उनकी शक्ति घट जाती है। इस प्रकार स्वस्थ वनों में धरातल पर पाई जाने वाली जैविक द्रव्ययुक्त यह परत एक मोटे गद्देदार स्पंज की तरह रक्षात्मक आवरण या कवच का काम करती है और पानी की बूँदों को भूमि से सीधे टकराकर मिट्टी का क्षरण करने से रोकती है।

    वृक्षों के छत्र से छन-छनकर भूमि की सतह पर पहुँचने वाले जल को जैविक द्रव्य व ह्यूमस की सोख्ते जैसी रंध्रयुक्त सतह से गुजरना पड़ता है। इस अर्थ में वृक्षों का घना छत्र किसी हेलमेट जैसा काम करता है। जिससे टकराने से भूमि पर वर्षा बूँदों की चोट कम लगती है और जल का काफी भाग अवशोषित हो जाता है।

    भूजल स्रोतों का अत्यधिक दोहन होने और पुनर्भरण में कमी होने के कारण भूजल उपलब्धता का सन्तुलन बिगड़ जाता है और अनेक क्षेत्रों में समस्याएँ उत्पन्न होने लगती हैं। जहाँ पानी न होने के कारण या वर्षा की मात्रा में कमी के कारण पुनर्भरण न हो वहाँ तो इसे समझा जा सकता है परन्तु पर्याप्त वर्षा वाले क्षेत्रों में भी भूजल पुनर्भरण कम होने का एक कारण भूमि पर वनस्पति आवरण में कमी होना भी है।

    यूँ तो भूजल के पुनर्भरण को प्रभावित करने वाले कारकों में अन्तः रिसाव के लिये पर्याप्त सतह की उपलब्धता, मिट्टी और चट्टानों की प्रकृति, दरारों और रंध्रों की मौजूदगी, जल की अच्छी संचालकता तथा भूजल स्रोत की भण्डारण क्षमता प्रमुख हैं परन्तु अन्तः रिसाव की क्रिया पर सीधा प्रभाव डालने के कारण वन और उनमें मौजूद वनस्पति आवरण भी इस मामले में अच्छी-खासी भूमिका निभाते हैं।

    वनों के धरातल पर पड़ा सड़ता-गलता जैविक द्रव्य पानी के तेज प्रवाह को रोकने और रिस-रिसकर जमीन की निचली परतों में समाने में बड़ा मददगार होता है। वृक्षों और शाक-घास आदि की जड़ें इस पानी को रिस-रिसकर धरती की निचली सतहों में जाने की राह आसान करती हैं।

    इस मामले में वृक्षों से कहीं अधिक चमत्कारिक भूमिका धरातल पर मौजूद घास-फूस, खर-पतवार आदि निभाते हैं जो वर्षाजल को क्षैतिज प्रवाह के रूप में ऊपर-ऊपर तेजी से बह जाने में कमी करके उसके अन्तः रिसाव का कारण बनते हैं। जल जब जैविक द्रव्य तथा वनस्पतियुक्त क्षेत्र से गुजरता है तो उसकी गति नंगी भूमि पर बहने की तुलना में काफी मन्द हो जाती है और जल को भूमि की निचली सतहों में प्रवेश करने के लिये अधिक समय मिल जाता है।

    वनभूमि की रंध्रता बढ़ाकर पानी सोखने की क्षमता कई गुना बढ़ाने में मिट्टी में रहने वाले केंचुए, कीड़े-मकोड़े और भूमिगत सुरंगें व बिल बनाकर रहने वाले अन्य जीव बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन जीवों द्वारा बनाए गए असंख्य भूमिगत छिद्रों नालियों व बिलों के कारण पानी सोखने के लिये उपलब्ध धरती की सतह सामान्य से कई गुना बढ़ जाती है। इन छिद्रों के कारण बने खोखले स्थानों में भी काफी मात्रा में पानी जमा हो जाता है और लम्बे समय तक धीरे-धीरे भीतर रिसता रहता है।

    सघन वनों में भूमि की ऊपरी सतह पर जैविक द्रव्य तथा ह्यूमस की मात्रा विरल वनों से काफी अधिक होती है जो रन्ध्र युक्त होने के कारण जल को सोख्ता कागज (blotting paper) जैसे पानी सोखने की अद्भुत क्षमता से युक्त होता है। ह्यूमस के कारण वनभूमि की ऊपरी सतह की पारगम्यता और जल को रोककर रखने की क्षमता काफी अधिक हो जाती है जिसके कारण यह जल धीरे-धीरे रिस-रिसकर भूमि की निचली सतहों में लम्बे समय तक जाता रहता है और भूजल भण्डारों को समृद्ध करता रहता है।

    भूजल स्तर पर वनस्पति आवरण का प्रभाव


    वनस्पति आवरण भूजल स्तर को कई तरीकों से प्रभावित करता है। इनमें से मुख्य प्रभाव निम्नानुसार हैं :-

    1. वनस्पति आवरण का छत्र वर्षाजल के कुछ भाग को सतही वाष्पन द्वारा वातावरण में लौटा देता है जबकि शेष जल वृक्षों/पौधों की शाखाओं व तने की सतह पर स्तम्भ प्रवाह की पतली धाराओं के रूप में बहते हुए या फिर छत्र से टपक-टपककर भूमि तक पहुँच जाता है।

    2. वन के धरातल पर गिरी पत्तियों, टहनियों, छाल, फल-फूल आदि का सूखता-सड़ता कचरा रंध्रयुक्त होने से नंगी जमीन के मुकाबले पानी को अधिक देर तक रोककर रखता है और उसका अन्तः रिसाव बढ़ाने में मदद करता है।

    3. वृक्षों की जड़ें अपारगम्य कड़क मिट्टियों में पानी के नीचे जाने के लिये रास्ता बना देती हैं जिससे भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा मिलता है।

    4. असन्तृप्त मिट्टी वाली जमीन में सोखे गये पानी में से पौधों की जड़ें वाष्पोत्सर्जन द्वारा पानी वापस खींचकर भूजल भण्डार तक पहुँच पाने वाले पानी की मात्रा घटा भी देती हैं।

    वनस्पतियों और भूजल का पारस्परिक सम्बन्ध


    जल की मात्रा और गुणवत्ता दोनों ही किसी क्षेत्र विशेष में उगने वाली वनस्पतियों को प्रभावित भी करती हैं और उससे खुद भी प्रभावित होती है। आधुनिक वैज्ञानिक मानते हैं कि किसी क्षेत्र में भूजल का स्तर न केवल पानी की उपलब्धता बल्कि मिट्टी के विभिन्न स्तरों में मौजूद अलग-अलग खनिज व अन्य आवश्यक तत्वों के घुल जाने से जल की गुणवत्ता को भी प्रभावित करता है। खनिज आदि के घुल जाने से पानी की प्रकृति में होने वाला बदलाव यह तय करने में भूमिका निभाता है कि वह क्षेत्र किन पौधों के लिये अधिक अनुकूल है और वहाँ कौन से पेड़-पौधे अधिक संख्या में उगेंगे। इसी कारण हम देखते हैं कि नदियों के किनारे दलदली या काफी समय तक जलमग्न रहने वाली जमीनों पर कुछ अलग किस्म के पेड़-पौधे अधिक विकसित हो जाते हैं। इसी को आधार बनाकर समय-समय पर विद्वानों ने पौधों और भूजल के बीच सम्बन्ध स्थापित करने की कोशिशें की हैं और विशिष्ट प्रजातियों के वृक्षों, झाड़ियों आदि को देखकर भूजल के बारे में अनुमान लगाए गए हैं।

    प्राचीन भारत का भूजल विज्ञान-वराहमिहिर के अनुसार भूजल सूचक पौधे


    यद्यपि आधुनिक वैज्ञानिक इस विषय पर शोध कर रहे हैं परन्तु अभी तक किसी खास वृक्ष प्रजाति को देखकर भूजल की उपलब्धता की गहराई और उसकी गुणवत्ता की भविष्यवाणी कर पाने के कोई सटीक आधार नहीं खोजे जा सके हैं। प्राचीन भारत में यह विज्ञान अत्यन्त विकसित था। इसका प्रमाण छठी शताब्दी में सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक, महान विद्वान वराहमिहिर के प्रसिद्ध ग्रंथ वृहत्संहिता में मिलता है।

    इस ग्रंथ के एक खण्ड- ‘दकार्गलाध्याय’ में पौधों और जल के पारस्परिक सम्बन्ध पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है। दर्कागाल का अर्थ पानी की किल्लोल करती हुई धारा होता है। वृहत्संहिता में वृक्ष की प्रजाति को देखकर यहाँ तक अनुमान लगाए गए हैं कि उससे कितनी दूरी पर और कितनी गहराई पर कैसा और कितना पानी मिलेगा? वृहत्संहिता के दकार्गलाध्याय में वर्णन है कि जिस तरह मनुष्यों के अंगों में नाड़ी और शिराएँ होती हैं उसी तरह भूमि की सतह के नीचे भी जल की ऊँची-नीची शिराएँ हुआ करती हैं।

    भूमि की सतह के नीचे मौजूद इन जल शिराओं की स्थिति का ज्ञान होने से भूजल की प्रकृति और मात्रा का ज्ञान हो सकता है। वृहत्संहिता के इस अध्याय में भूमि पर खड़े अनेक वृक्षों की प्रजातियों के माध्यम से भूजल का पता लगाने के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई है जिसमें जमीन पर खड़े वृक्षों की प्रजाति अथवा अन्य वृक्षों के साथ सहजात उपस्थिति देखकर उस स्थान पर भूजल की गहराई और प्रकृति के बारे में विस्तृत अनुमान लगाए हैं।

    उदाहरण के लिये कहा गया है कि जामुन के वृक्ष से 2 पुरुष (15 फीट) नीचे, गूलर के वृक्ष से ढाई पुरुष (183/4फीट), बेर के वृक्ष से 3 पुरुष (221/2फीट), शोणाक इस प्रकार विभीतक (बहेड़ा) के वृक्ष से साढ़े पाँच पुरुष (411/1फीट) नीचे कोविदारक (सप्तपर्ण), वृक्ष के 5 पुरुष (371/2फीट) नीचे जल मिलता है। इसी प्रकार की गणना अन्य अनेक प्रजातियों की वनस्पतियों के बारे में की गई है।

    भारत में अनेक नगरों में स्वयं को दूसरों से अधिक स्मार्ट दिखाने की होड़ सी लगी हुई है। स्मार्ट सिटी योजना भारत सरकार द्वारा प्रारम्भ की गई है जिसमें चयनित 100 नगरों को आधुनिकतम सुविधाओं से लैस किया जाएगा। परन्तु हमें यह हमेशा याद रखना चाहिए कि सरकारी योजना कुछ भी हो, सबसे स्मार्ट सिटी या गाँव वही होंगे जो आने वाले दशकों में पानी के मामले में आत्मनिर्भर होंगे। अपने जलस्रोतों को रासायनिक उर्वरकों और जहरीले कीटनाशकों से विषाक्त कर उन्हें फिर पेयजल के भण्डार के रूप में उपयोग करना कितना स्मार्ट कहा जा सकता है, यह विचारणीय है।विभिन्न प्रकार के वृक्षों अथवा वृक्ष समूहों के समीप कितनी गहराई में कैसा पानी मिलेगा यह अनुमान लगाने के लिये जिन अतिरिक्त लक्षणों का उल्लेख बृहत्संहिता में मिलता है उसे देखकर इस बात में कोई सन्देह नहीं रह जाता कि वन और जल के रिश्ते का यह विज्ञान वराहमिहिर के काल में काफी उन्नत हो चला था। दुर्भाग्य से यह परम्परागत विशिष्ट ज्ञान सहेजकर रखा नहीं गया और समय के साथ इसका परीक्षण, परिमार्जन नहीं हो सका अतः यह उपयोगी और विलक्षण ज्ञान एक लुप्तप्रायः प्राचीन विद्या जैसा बनकर रह गया। आचार्य वराहमिहिर द्वारा वृक्षों को देखकर भूजल का ज्ञान कराने वाली दकार्गल विद्या को आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टि से देखने और बारीकी से अध्ययन करने की आवश्यकता है।

    बाढ़ की तीव्रता नियंत्रण में वनों की भूमिका


    बाढ़ नियंत्रण में वनों की भूमिका को लेकर वैज्ञानिक समुदाय एकमत नहीं है। यद्यपि मानसून के दौरान होने वाली लम्बी और तेज बारिश के कारण आने वाली विकराल बाढ़ों पर वनों के होने-न-होने का कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता परन्तु हल्की बारिश में बाढ़ और जल आप्लावन को नियंत्रित करने में भी वनों की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। वन धरातल स्पंज की भाँति जल सोखकर पानी के बहाव को थाम लेता है अतः वनभूमि के जल से सन्तृप्त होने तक बाढ़ की भयावहता को कम करने में वन सीमित भूमिका अवश्य निभाते हैं। वैज्ञानिक मान्यता यह है कि एक बार भूमि के जल-सन्तृप्त हो चुकने के बाद आने वाली बाढ़ वन आवरण से प्रभावित नहीं होती।

    स्मार्ट सिटी के दौर में वनों द्वारा पेयजल स्रोतों का शुद्धिकरण


    यह स्मार्ट सिटी का दौर है। भारत में अनेक नगरों में स्वयं को दूसरों से अधिक स्मार्ट दिखाने की होड़ सी लगी हुई है। स्मार्ट सिटी योजना भारत सरकार द्वारा प्रारम्भ की गई है जिसमें चयनित 100 नगरों को आधुनिकतम सुविधाओं से लैस किया जाएगा। परन्तु हमें यह हमेशा याद रखना चाहिए कि सरकारी योजना कुछ भी हो, सबसे स्मार्ट सिटी या गाँव वही होंगे जो आने वाले दशकों में पानी के मामले में आत्मनिर्भर होंगे। अपने जलस्रोतों को रासायनिक उर्वरकों और जहरीले कीटनाशकों से विषाक्त कर उन्हें फिर पेयजल के भण्डार के रूप में उपयोग करना कितना स्मार्ट कहा जा सकता है, यह विचारणीय है। अतः लेखक का यह दृढ़ विचार है कि स्मार्ट सिटी की दौड़ में सबसे आगे उन्हीं नगरों को मौका मिलना चाहिए जो अपने पेयजल स्रोतों का स्मार्ट प्रबन्धन करने के लिये अग्रसर हों। कई पश्चिमी देशों की भाँति ही जलस्रोतों के जलग्रहण क्षेत्र में सघन वृक्षारोपण और घने प्राकृतिक वनों के माध्यम से अपने पेयजल स्रोतों को साफ रखना स्मार्ट सिटी का एक महत्त्वपूर्ण घटक हो सकता है।

    साफ पानी पैदा करने की वनों की क्षमता के बारे में ज्यादातर वैज्ञानिक सहमत हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका के ओरेगॉन राज्य के ‘पर्यावरण की दशा पर प्रतिवेदन - वर्ष 2000’ (State of Environment Report - 2000) में वैज्ञानिकों द्वारा किये गए गहन शोध के आधार पर बताया गया है कि राज्य में वनों से ढँकी हुई भूमि से आने वाले जल में से 50 प्रतिशत से अधिक उत्कृष्ट से उत्तम श्रेणी का पाया गया जबकि खेतों से होकर आने वाले जल में से 20 प्रतिशत से भी कम उत्तम गुणवत्ता का पाया गया।

    शहरी क्षेत्रों से आने वाले जल में तो अच्छी गुणवत्ता का प्रतिशत इससे भी कम पाया गया। यह स्थिति पूरे राज्य में पाई गई। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि पेयजल प्रदाय करने वाले जलस्रोतों के इर्द-गिर्द वनों के संरक्षण से पेयजल उपचारण पर अपेक्षाकृत काफी कम खर्च करना पड़ता है जिससे राज्य की काफी धनराशि की बचत होती है।

    इसी रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि राज्य में सम्पन्न किये गए अध्ययनों से इस बात के संकेत मिले हैं कि यदि जलस्रोतों के इर्द-गिर्द वन न हों तो यांत्रिक अथवा रासायनिक उपचार द्वारा जल के शुद्धिकरण पर किये जाने वाले व्यय में काफी अधिक बढ़ोत्तरी सम्भावित है। कई क्षेत्रों में किये गए अध्ययनों से स्पष्ट हुआ है कि भारी धातुओं और हानिकारक रासायनिक तत्वों के जलधाराओं में मिल जाने से जो प्रदूषण होता है उसे रोकने में वनों की विशेष भूमिका है। इन सभी प्रयोगों से वन बफर के कारण जल के शुद्धिकरण की पुष्टि होती है। इन प्रयोगों ने ये भी संकेत दिये हैं कि वन बफर के माध्यम से जलस्रोतों का शुद्धिकरण एक कम खर्चीला और अधिक सुविधाजनक तरीका है।

    इकावारिया और लॉकमेन (1999) ने अध्ययनों के आधार पर दावा किया है कि न्यूयॉर्क शहर के जलग्रहण क्षेत्र के उपचार और सुप्रबन्धन पर यदि एक अरब अमेरिकी डॉलर का व्यय किया जाये तो अगले दस वर्षों में शहर के जल उपचारण के लिये बनाए जाने वाले संयंत्रों पर आने वाले खर्च में लगभग 4 से 6 अरब अमेरिकी डॉलर की बचत की जा सकती है। वर्ष 2002 में अमेरिका में 27 जल प्रदाय संस्थानों पर किये गए अध्ययन में पाया गया कि खुले में जलस्रोतों से पेयजल प्रदाय करने में उपचारण व्यय का जलग्रहण क्षेत्रों में वनों की मौजूदगी में सीधा सम्बन्ध है। अमेरिकन वॉटर वर्क्स एसोसिएशन द्वारा कराए गए इस अध्ययन में पाया गया कि जलस्रोत के जलागम में वन आवरण में प्रत्येक 10 प्रतिशत वृद्धि होने पर (60 प्रतिशत तक) उपचारण लागत में लगभग 20 प्रतिशत तक कमी आ जाती है। इस अध्ययन के निष्कर्ष तालिका 3.1 में दिये गए हैं।

     

    तालिका 3.1


    वनों से जल उपचारण खर्च में कम

    जलागम क्षेत्र में वनों का प्रतिशत

    रासायनिक उपचारण व्यय प्रति मि. गैलन (यू.एस. डॉलर)

    उपचारण व्यय में कमी का प्रतिशत

    10

    $ 115

    19

    20

    $ 93

    20

    30

    $ 73

    21

    40

    $ 58

    21

    50

    $ 46

    21

    60

    $ 37

    19

    स्रोत : Opflow, Vol-30, No. 5, May 2004, American Waterworks Association

     

    कई वैज्ञानिकों ने अध्ययनों में यह पाया है कि जलाशयों के जलग्रहण क्षेत्र में अच्छे और सुप्रबन्धित वन होने पर जलाशयों के जल उपचार पर बहुत कम व्यय करना पड़ता है। जल के शुद्धिकरण में वनों की महत्त्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए अनेक देशों में महानगरपालिकाएँ अब जल उपचारण पर अपने खर्चे कम करने के लिये पेयजल स्रोत के जलग्रहण क्षेत्र में वन आवरण बढ़ाने के उपायों पर काम कर रही हैं।

    लागत-लाभ की दृष्टि से विकासशील देशों के लिये पेयजल स्रोतों की शुद्धि के लिये यांत्रिक अथवा रासायनिक पद्धतियाँ अपनाने की बजाय पेयजल स्रोतों के निकट वन बफर अधिक कारगर साबित हो सकते हैं क्योंकि इनमें प्रदूषक तत्वों को पौधों के ऊतक सोख लेते हैं या मिट्टी में पाये जाने वाले सूक्ष्म जीव उन्हें हानि रहित तत्वों में बदल देते हैं। इस प्रकार बहुत कम खर्च में जनता को पीने का साफ पानी उपलब्ध कराने की व्यवस्था हो सकती है।

    सौभाग्य से इस पुस्तक के लेखक को वर्ष 2014 में संयुक्त राज्य अमेरिका में न्यूयॉर्क महानगर की पेयजल शुद्धिकरण के लिये वनों के प्रबन्धन का जनभागीदारी आधारित मॉडल देखने और वहाँ के लोगों से प्रत्यक्ष चर्चा का अवसर मिला। अमेरिका के कैट्सकिल और डेलावायर जलाशयों से न्यूयॉर्क महानगर को जल प्रदाय करने के लिये इन जलाशयों के जलग्रहण क्षेत्रों में ‘वाटरशेड एग्रीकल्चर काउन्सिल’ व इसके साथ जुड़ी अनेक संस्थाएँ व लोग मिलकर इन जलाशयों के जल को साफ रखने के लिये जलग्रहण क्षेत्र के वनों को सुप्रबन्धित करते हैं।

    यह अनुकरणीय उदाहरण अन्य कई देशों ने भी अपनाना प्रारम्भ कर दिया है जिसके फलस्वरूप अब सियोल, टोक्यो, बीजिंग, म्यूनिख, सिडनी, मेलबॉर्न, स्टॉकहोम, साल्वाडोर आदि महानगरों में पेयजल शुद्धिकरण तंत्र में रासायनिक और यांत्रिक विधियों के साथ-साथ वन प्रबंधन के घटक पर भी ध्यान देना शुरू किया गया है।

    इन्दौर महानगर को नर्मदा जल भेजने वाले इलाकों के खेतों की पड़ताल


    विगत कुछ दशकों में खेती में विषैले रासायनिक कीटनाशकों के उपयोग की मात्रा अन्य सभी क्षेत्रों की भाँति ही नर्मदा घाटी में भी क्रमशः बढ़ती ही गई है। खेतों में डाली जा रही उर्वरकों व घातक रासायनिक कीटनाशकों की इस मात्रा में से काफी मात्रा वर्षा के पानी और मिट्टी के साथ मिलकर नदी-नालों के माध्यम से होते हुए नर्मदा में पहुँचती है और पानी को खराब करती है।

    इसी सिलसिले में इन्दौर महानगर को नर्मदा जल भेजने वाले खरगौन जिले के ‘जलूद इनटेक वेल’ के जलागम क्षेत्र में पड़ने वाले इलाकों के खेतों में रासायनिक उर्वरकों व कीटनाशकों के उपयोग का स्तर ज्ञात करने के लिये वन विभाग द्वारा वर्ष 2014 में खरगोन जिले की बड़वाह व महेश्वर तहसीलों के 136 गाँवों में एक प्रारम्भिक पड़ताल की गई। इन्दौर के पेयजल की गुणवत्ता को खराब करने की क्षमता रखने वाले इस अंचल में वन विभाग विभाग बड़वाह द्वारा विभाग के सैकड़ों मैदानी कर्मचारियों की मदद से कराए गए।

    वर्षा से प्राप्त जल को भूमि में सोखने और जलधाराओं में प्रवाह बनाए रखने की भूमिका वन अपनी विशिष्ट संरचना के कारण ही निभा पाते हैं। जंगल एक विशाल शामियाने जैसी भूमिका निभाते हुए वर्षा के पानी की बौछार को अपने ऊपर झेल लेता है और बहते हुए पानी के वेग को कम करके उसे जमीन की निचली सतहों में उतारने में मदद करता है। वनों का यह गुण हिमविहीन नदियों के प्रवाह को मानसून के बाद भी निरन्तर जारी रखने में काम आता है। वर्षापूरित नर्मदा और उसकी सहायक नदियों के मामले में भी यह तथ्य अत्यन्त प्रासंगिक है।इस अध्ययन में वनमण्डल के 6 वन परिक्षेत्रों बड़वाह, काटकूट, सनावद, मण्डलेश्वर, पाडल्या और बलवाड़ा के 136 गाँवों में किसानों से व्यक्तिगत साक्षात्कार, घर-घर सर्वेक्षण, समूह चर्चाओं, खाद, विक्रेताओं के यहाँ की गई पूछताछ एवं अन्य स्रोतों से प्राप्त विवरण के आधार पर इस बात का मोटा आकलन करने का प्रयास किया गया कि इन्दौर महानगर के जल प्रदाय से जुड़े क्षेत्र में वनों की दशा कैसी है और जल की गुणवत्ता का क्या हाल है? इस सर्वेक्षण में 136 गाँवों में 45,261.859 हेक्टेयर भूमि पर की जा रही खेती में प्रतिवर्ष औसतन लगभग 5,667 टन यूरिया, 4,110 टन डी.ए.पी., 2,812 टन पोटाश, 3,288 टन सुपर फास्फेट और 735 टन एन.पी.के. जैसे रासायनिक उर्वरकों तथा 1,64,265 लीटर खतरनाक कीटनाशकों व खरपतवार नाशकों का उपयोग किया जाना पाया गया।

    सर्वेक्षण क्षेत्र में उपयोग किये जा रहे घातक विषैले कीटनाशकों में मोनोक्रोटोफॉस, क्लोरोपाइरीफॉस, पोलो, बेगासस, स्पार्क, होस्टेथियॉन, रोगोर और कान्फीडोर जैसे घातक कीटनाशक सम्मिलित हैं। इसमें से कितनी मात्रा में फसलों में सीधी खपत होती है और कितनी मिट्टी में रहकर बाद में नालों के जरिए पानी के साथ नर्मदा में पहुँचती है, इसका बारीक अध्ययन अवश्य किया जाना चाहिए।

    यदि इस क्षेत्र के खेतों में उर्वरकों व कीटनाशकों की उपयोग की जा रही इस बड़ी मात्रा का 10 प्रतिशत भी मिट्टी में अवशिष्ट के तौर पर बचा रहकर नालों-नदियों के अपवाह तंत्र में घुसकर नर्मदा के जल में मिल रहा हो तो इन्दौर जैसे महानगर को इसकी तुरन्त गहराई से जाँच पड़ताल करनी चाहिए वरना इसके दुष्प्रभावों का पता चलने तक काफी देर हो चुकी होगी। इस प्रारम्भिक सर्वेक्षण से मिली जानकारी इस बात के ठोस संकेत देती है कि बिना समुचित उपचारण के नर्मदा के जल का मानव उपयोग निरापद नहीं है।

    इस दृष्टि से वन विभाग द्वारा इन्दौर तथा बड़वाह वनमण्डलों की कार्य आयोजना में वन प्रबन्धन के माध्यम से इन्दौर महानगर की पेयजल व्यवस्था के शुद्धिकरण का घटक पहली बार सम्मिलित किया गया है और क्षेत्र के वनों को बचाने के लिये उद्योग जगत की मदद से गाँवों को वन समितियों को ‘पारिस्थितिक सेवाओं के लिये भुगतान’ (Payment for Ecosystem Service-PES) की व्यवस्था पहली बार लागू की गई है। विभागीय कार्य आयोजना में वन प्रबन्धन के माध्यम से इन्दौर महानगर की पेयजल व्यवस्था के शुद्धिकरण का घटक जोड़ा जाना एक दूरगामी कदम है परन्तु इसका समुचित क्रियान्वयन ही इसके लाभ सुनिश्चित कर सकेगा।

    नर्मदा अंचल के वन नर्मदा के जल की गुणवत्ता बनाए रखने में जो मूल्यवान सहयोग करते हैं उसे ध्यान में रखते हुए मध्य प्रदेश के इन्दौर, भोपाल व जबलपुर जैसे बड़े नगरों तथा अन्य अनेक नगरों सहित गुजरात के कुछ भागों को पेयजल का प्रदाय करने वाले जलग्रहण क्षेत्रों में वनों का संरक्षण, उपचार और सुप्रबन्धन करके इन शहरों के पेयजल के उपचारण के लिये बनाए जाने वाले संयंत्रों पर आने वाले खर्च में भारी बचत की जा सकती है। इसके विपरीत यदि नगरीय प्रदाय वाले जलस्रोतों के इर्द-गिर्द वन समाप्त हो जाएँ तो यांत्रिक अथवा रासायनिक उपचार द्वारा जल के शुद्धिकरण पर किये जाने वाले व्यय में काफी अधिक बढ़ोत्तरी सम्भावित है। स्मार्ट सिटी बनाने की भागमभाग में नर्मदा जल का उपयोग करने वाले नगरों को इस विषय पर गम्भीरता से सोचना चाहिए।

    निष्कर्ष - हाथ कंगन को आरसी क्या?


    इस अध्याय में दिये गए वैज्ञानिक विवरण से स्पष्ट है कि जंगल के रहने और नर्मदा के बहने के बीच चोली-दामन का सम्बन्ध है और वनों को नर्मदा के प्राण कहने से हमारा आशय क्या है? इस सम्बन्ध के बारे में यही कहा जा सकता है कि प्रत्यक्षं किं प्रमाणम्? हाथ कंगन को आरसी क्या? नर्मदा अंचल की नदियों में जल की मात्रा तथा पूरे वर्ष भर जमा रखने और उसका धीरे-धीरे वितरण तय करने के साथ-साथ उसे उच्च गुणवत्ता का शुद्ध जल बनाए रखने में यहाँ के वन महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। नर्मदा और इसकी सहायक नदियों के इर्द-गिर्द पाये जाने वाले विभिन्न प्रकार के वनों की जल उत्पादन और उसके शुद्धिकरण की क्षमता काफी अधिक है।

    इस नजरिए से नर्मदा अंचल के वनों में पाई जाने वाली प्रमुख वृक्ष प्रजातियों की वाष्पोत्सर्जन दरों तथा मुख्य वन प्रकार की वाष्पोत्स्वेदन क्षमता की जानकारी एकत्रित करने के लिये वैज्ञानिक शोध बहुत आवश्यक है। इसी प्रकार मिट्टी के कटाव और जलाशयों में अवसादन रोकने में विभिन्न प्रकार के वनों की भूमिका पर नर्मदा घाटी के स्थानीय सन्दर्भों में वैज्ञानिक जानकारी संकलित करना जरूरी है। किस प्रकार के वनों के होने से बाँधों में गाद की मात्रा में कितनी कमी सम्भव है? कौन सी प्रजातियाँ वन भूजल के पुनर्भरण में अधिक सहायक होते हैं? इस तरह के विविध विषयों पर अनुसन्धान की आवश्यकता है ताकि उचित कदम समय रहते उठाए जा सकें और हमारे बाँध लम्बे समय तक कारगर बने रहें दीर्घायु हो सकें।

    इस अध्याय में हमने अपनी चर्चा को प्रमुखतः जंगल और पानी से जुड़े वैज्ञानिक अनुसन्धानों पर केन्द्रित रखा है, लेकिन इसके अन्य विविध आयाम तथा सामाजिक-आर्थिक सरोकार भी हैं जो पूरी व्यवस्था को प्रभावित करते हैं और उन्हें समझे बिना बात पूरी नहीं हो सकती। इस पुस्तक के चंद पन्नों में हम इस बहु-आयामी विषय की पूरी थाह लेने का दावा तो नहीं कर सकते, हाँ यह प्रयास अवश्य है कि इस बारे में हमारी समझ बढ़ने और जागने तक कैसे भी जंगल बने रहें ताकि नर्मदा बहती रहे।

    माँ नर्मद के प्राण तो बसते हैं जंगलों में…


    हम नर्मदा नदी को बड़े अपनेपन से माँ कहते हैं और उसी रूप में पूजते हैं। परन्तु हमें यह हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि नर्मदा में जल गंगा-यमुना जैसी नदियों की भाँति हिमालय के बर्फीले हिमनदों के पिघलने से नहीं आता। नर्मदा घाटी में होने वाली मानसूनी वर्षा का पानी विंध्याचल और सतपुड़ा की पर्वतमालाओं में फैले वन किसी विशालकाय स्पंज की तरह सोख लेते हैं। पहाड़ों द्वारा सोखा गया बारिश का यही पानी घने वनक्षेत्रों से धीरे-धीरे रिस-रिसकर वर्ष भर नदियों में आता रहता है और सतत जल आपूर्ति बनाए रखने में बड़ी मदद करता है। इस अर्थ में नर्मदांचल के वन नर्मदा व इसकी सहायक नदियों के लिये हृदय और धमनियों की तरह काम आते हैं। इसी महत्त्वपूर्ण तथ्य को रेखांकित करता हुआ गीत।

    पर्वत नहीं बर्फीले, मैकल के अंचलों में;
    माँ नर्मदा के प्राण, तो बसते हैं जंगलों में।
    ये विन्ध्य सतपुड़ा के वन, शिव की जटाएँ हैं;
    हरियाली और जल की, अनमोल छटाएँ हैं।
    नदियों का वेग थाम के, पानी सहेजते हैं;
    भूगर्भ के भण्डार में वन, जल को भेजते हैं।
    छन्नों की तरह, नदियों से रोकते हैं मल को;
    खेतों का जहर पीकर, करते हैं साफ जल को।
    धाराएँ करते निर्मल, दो-चार ही पलों में;
    माँ नर्मदा के प्राण, तो बसते हैं जंगलों में।

    मैकलसुता के मायके में, साल की बहारें;
    बाकी जगह हैं फैलीं, सागौन की कतारें।
    मिश्रित वनों की, अपनी रंगीनियाँ न्यारी हैं;
    मन मोह लेने वाली, छवियाँ बड़ी प्यारी हैं।
    धानी कहीं है घास, कहीं फूल लाल-पीले;
    कहीं ऊँचे वृक्ष पसरे, सब दृश्य हैं रंगीले।
    कहीं डिग न जाय धारा, दुनिया की हलचलों में;
    माँ नर्मदा के प्राण तो बसते हैं जंगलों में।

    रहती हैं सदानीरा, नदियाँ हरे वनों से;
    सरिताओं में जल बहता है, वनों के भरोसे।
    वन तो हैं असलियत में, पानी के कारखाने;
    ये बात पूरी सच है, कोई माने या न माने।
    जंगल जहाँ घना है, पानी वहाँ बना है;
    प्रत्यक्ष दीखता है, फिर किससे पूछना है।
    बर्बाद वक्त क्यों करें, बेकार अटकलों में;
    माँ नर्मदा के प्राण, तो बसते हैं जंगलों में।

    इन जंगलों के कारण, रहती यहाँ नमी है;
    शहरों को मिलता पानी, खेतों की तर जमीं है।
    वन मिट गए तो, नर्मदा में जल नहीं बहेगा;
    वन के बिना प्रवाह ये, अविरल नहीं रहेगा।
    सूखा अधिक पड़ेगा, धरती रहेगी प्यासी;
    बाधित विकास होगा, धरती रहेगी प्यासी;
    बाधित विकास होगा, छा जाएगी उदासी।
    नदियों में जल न होगा, तो आएगा क्या नलों में;
    माँ नर्मदा के प्राण, तो बसते हैं जंगलों में।
    पर्वत नहीं बर्फीले, मैकल के अंचलों में;
    माँ नर्मदा के प्राण, तो बसते हैं जंगलों में।


    प्रवाह की पवित्रता में ही नर्मदा की सार्थकता


    नर्मदा को बाँधना ही नहीं उसकी पवित्रता और उसके प्रवाह को बचाए रखना भी जरूरी है। प्रवाह शिथिल हो गया तो बन्धन अर्थहीन हो जाएँगे। अनादिकाल से यह बहती रही और मध्य प्रदेश के एक बड़े भू-भाग की प्राणवाहिनी बनी रही। इसके तट पर धर्म, अर्थ, काल और मोक्ष के सभी पुरुषार्थ उपलब्ध हुए हैं। केवल अर्थ के लिये इसका जल धर्म नष्ट नहीं होना चाहिए। जलधर्म नष्ट नहीं हो इसके लिये जरूरी है कि कछार का मूल स्वरूप नष्ट नहीं हो। -महेश श्रीवास्तव, प्रणाम मध्य प्रदेश

    जंगल और नदी की जुगलबन्दी


    कभी नर्मदा तट पर दंडकारण्य जैसे घने जंगलों की भरमार थी। इन्हीं जंगलों के कारण वैदिक आर्य तो नर्मदा तक पहुँचे ही नहीं। कहाँ गए वे अरण्य? अगर बचे-खुचे वन भी कट गए तो नदियाँ बहना बन्द कर देंगी। धरती श्री हीन हो जाएगी। जंगल और नदी की जुगलबंदी के कारण ही नदियों में बारहों माह पानी रहता है। अगर यह जुगलबंदी टूट गई तो नदियों में कंकड़-पत्थर के सिवा और कुछ न रहेगा। क्या हम ऐसी नदियाँ चाहते हैं? -अमृतलाल वेगड़

    नदी हमेशा नई रहती है, बहा पानी लौटकर नहीं आता, जंगल नदी के पालक पिता और उसकी आत्मा होते हैं जो हर क्षण नदी को जन्म देते रहते हैं। आत्मा ही कमजोर हो गई तो आत्मजा कैसे सशक्त रहेगी? बिजली कैसे बनेगी और सिंचाई कैसे होगी? नर्मदा घाटी विकास योजनाओं की सफलता और जीवन के लिये नर्मदा का स्वस्थ जीवन और नर्मदा के स्वस्थ जीवन के लिये जंगलों का मस्त जीवन जरूरी है।-महेश श्रीवास्तव, प्रणाम मध्य प्रदेश

    हम वन-विनाश के कगार पर खड़े हैं।… नर्मदा मेकलसुता है तो वनसुता भी है। वन ही वर्षा के पानी को रोककर रखता है (हर पेड़ एक छोटा-मोटा चेकडैम है) ताकि पानी जमीन के अन्दर जाये और गाढ़े समय में भूजल के रूप में हमारी सहायता करे। अगर वन नहीं रहेंगे तो नर्मदा भूखी-प्यासी रह जाएगी और एक दिन दम तोड़ देगी। -अमृतलाल वेगड़

    नर्मदा और उसकी सहायक नदियों में जलागमन पहाड़ों के भीतर संचित वर्षाजल के माध्यम से ही होता है और पहाड़ों में पर्याप्त जल संचय में वनों की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका है। अतः हम कह सकते हैं कि जीवनदायिनी नर्मदा और उसकी सहायक नदियों के जीवनदाता ये वन ही हैं। वन कम होंगे तो पहाड़ों में जल संग्रह कम होगा। परिणाम नर्मदा की कई सहायक नदियों को देखकर समझा जा सकता है जो मानसून के तीन चार महीनों बाद ही सूख जाती हैं। वन समाप्त हुए तो नर्मदा भी सदानीरा कैसे रह सकेगी। वनस्पति आवरण को सुरक्षित रखना और विकसित करना एक महत्त्वपूर्ण उपाय है। जीवनदायिनी के जीवनदाता को स्वस्थ जीवन देना बेहद जरूरी है। -महेश श्रीवास्तव, वरदा नर्मदा

    वन के वंदनवार से बूँदों की मनुहार


    घने जंगल में पानी की बूँदें पहले वृक्षों की पत्तियों तथा तनों, डालियों, झाड़ियों आदि से टकराती हैं। इस टकराहट से इन बूँदों का आकार और गति कम होती है। जमीन पर इन बूँदों को सीधे पहुँचने के पहले अनेक ‘बेरीकेट्स’ का सामना करना पड़ता है। वृक्ष की पत्तियों से मुलाकात करती हुई जब ये बूँदें नीचे धरती पर पहुँचती हैं, तो घास के तिनके इनके स्वागत में हाथ में वंदनवार लिये खड़े होते हैं। यानी यहाँ भी एकदम सीधे मिट्टी से इनका सम्पर्क नहीं हो पाता है। ...बरसात की ये बूँदें अहिस्ता-अहिस्ता जमीन में समाती जाती हैं। यदि जंगल घना है जो बरसात कितनी ही तेज क्यों न हो बूँदें तो अपनी गति इन अवरोधों के बहाने कम करती हुई मिट्टी के कणों के सामने बड़ी अदब से पेश आती हैं। जब मिट्टी से इन बूँदों का सम्पर्क होता है तो जमीन की ऊपरी सतह पर मौजूद घास, बेलें और झाड़ियों की जड़ें इन्हें बहने से रोकते हुए जमीन के भीतर जाने की मनुहार करती हैं। बूँदें ये मनुहार स्वीकार करती हुई बड़े पेड़ों की जड़ों के आस-पास से होती हुई, जमीन के भीतर… और भीतर समाती जाती हैं। नीचे गई बूँदें काफी समय बाद तक तलहटी के खेतों में नमी बनाए रखती हैं। यही बूँदें आस-पास के कुओं में जाकर वहाँ के जलस्तर को ऊपर उठा देती हैं। -क्रांति चतुर्वेदी, बूँदों की मनुहार

    यदि वृक्ष नहीं बचे, जंगल नहीं बचा तो नर्मदा कहाँ से बचेगी और नर्मदा ही नहीं बची या तन्वंगी होकर रह गई तो परियोजनाएँ कैसे चलेंगी। नर्मदा घाटी योजनाओं की पूर्णता तभी धरती को हिरण्यमयी बना सकेंगी जब सारी घाटी हरीतिमा से ढँकी होगी। -महेश श्रीवास्तव, प्रणाम मध्य प्रदेश

    वनों की प्रबन्धन योजनाओं में जल संरक्षण पर ध्यान दिया जाय


    जल उत्पादकता बढ़ाने वाला एक महत्त्वपूर्ण कारक है और नदी नालों में जल के प्रवाह की निरन्तरता बनाए रखकर सिंचाई, पेयजल और उद्योग के लिये जल उपलब्ध कराने में वन महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अतः वनों और चारागाहों के प्रबन्धन में जल संरक्षण एक प्रमुख उद्देश्य होना चाहिए। जल संरक्षण वनों की प्रबन्धन योजनाओं/कार्य आयोजनाओं का प्रमुख अंग होना चाहिए और इसके लिये पर्याप्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराए जाने चाहिए। -राष्ट्रीय वन आयोग (2006)

    बेशक वरदा, प्राणदा है नर्मदा। किन्तु प्राणियों को प्राण और जीवन को गान देने वाली नदी का प्रवाह घटा और दोहन बढ़ा है, जंगल कटे और प्राणी बढ़े हैं। विभूषित नदी दूषित हो रही है। प्राणदा के प्राणों पर बन आई है। हमें यह जानना होगा कि नर्मदा है तो हम हैं और वन हैं तो नर्मदा है। नर्मदा है तो अन्न है, धन है, प्रकाश है, जीवन है। -महेश श्रीवास्तव, वरदा नर्मदा

    नर्मदा ‘न मृता तेन नर्मदा’ के विशेषण से विभूषित रहे इसके उपाय हमें करना और इसी क्षण से प्राणप्रण से करना है। हमारे होने के लिये नर्मदा का अपने वैभव में होना जरूरी है। -महेश श्रीवास्तव, वरदा नर्मदा

     

    पारिस्थितिक सेवाओं के लिये भुगतान


    जलूद से उद्वहन करके वांचू प्वाइन्ट होते हुए इन्दौर महानगर को प्रदाय किये जा रहे के पेयजल के प्राकृतिक शुद्धिकरण में बड़वाह और इन्दौर वनमण्डल के वन प्राकृतिक रूप से काफी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। चोरल घाट के जंगलों और विंध्य पहाड़ियों के दक्षिणी ढलानों में मौजूद वन इन्दौर की पेयजल व्यवस्था के प्राकृतिक शुद्धिकरण के नजरिए से महत्त्वपूर्ण हैं। अतः इन वनों को बचाने में इन्दौर उद्योग जगत को जोड़ने के प्रयास वन विभाग द्वारा किये गए। इसके अन्तर्गत वर्ष 2015 में बड़वाह वनमण्डल के 2 गाँवों में वन समितियों को वन सुरक्षा के एवज में इन्दौर के उद्योग जगत से जुड़ी 2 कम्पनियों साइन्टेक इको फाउंडेशन द्वारा रु. 227040 तथा आर्टिसन एग्रोटेक प्रा.लि. द्वारा रु. 211700 के अग्रिम चेक देकर वन समितियों के ग्रामीणों को पारिस्थितिक सेवाओं के लिये भुगतान (Payment for Ecosystem Service-PES) करने की व्यवस्था प्रायोगिक तौर पर पहली बार लागू की गई है। इस तरह के प्रयोग बड़े पैमाने पर और संस्थागत तौर पर ‘कारपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी’ के अन्तर्गत करने की आवश्यकता है।

     

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