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    Author: 
    श्रीपाद धर्माधिकारी
    Source: 
    सामयिक वार्ता, मार्च 2013
    हमारे देश में पानी के उपयोग की प्राथमिकताएं तय की गई हैं। इसमें आमतौर पर पहले नंबर पर पेयजल, दूसरे नंबर पर सिंचाई और तीसरे नंबर पर उद्योगों को रखा जाता है। हर राज्य की अपनी जलनीति होती है, जिसमें यह वरीयता क्रम स्पष्ट किया जाता है। इसके बावजूद हर राज्य में बुनियादी ज़रूरतों को नज़रअंदाज़ करके उद्योगों को और बड़े व्यापारिक प्रतिष्ठानों को पानी दिया जाता है। लेकिन महाराष्ट्र में तो इसे नीति का ही हिस्सा बना दिया गया। राज्य की 2003 की जल नीति में पानी के उपयोग की प्राथमिकताओं में पेयजल के बाद उद्योगों को रखा गया और खेती का नंबर उसके बाद कर दिया गया।पिछले साल का उत्तरार्ध महाराष्ट्र की राजनीति में काफी गरम रहा। सिंचाई योजनाओं में घोटाले और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप जल संसाधन विभाग पर लगे। उपमुख्यमंत्री अजित पवार के इस्तीफ़े और वापसी का नाटक हुआ। जले पर नमक छिड़कने की भूमिका राज्य सरकार की ही सालाना आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट ने निभाई। इस रिपोर्ट से पता चला कि पिछले दस सालों में राज्य के सिंचित क्षेत्र में केवल 0.1 फीसदी बढ़ोतरी हुई। यह तब हुआ जब इसी अवधि में प्रधानमंत्री ने विदर्भ के किसानों के लिए विशेष पैकेज दिया, जिसमें सिंचाई योजनाओं का प्रमुख स्थान था। इस रिपोर्ट से इस सवाल को बल मिला कि इन दस सालों में महाराष्ट्र में सिंचाई की मद में जो करीब 70,000 करोड़ रुपये खर्च हुए थे, वो कहां गए। माहौल इतना गरम हुआ कि मुख्यमंत्री को सिंचाई हालत पर श्वेतपत्र निकालने की घोषणा करनी पड़ी। पंद्रह दिन में निकलने वाला श्वेतपत्र कई महीनों बाद नवंबर के अंत में निकला। इस श्वेतपत्र का विश्लेषण इस लेख का मकसद नहीं है। लेकिन इसमें सिंचाई में कमी के जो कारण बताए गए हैं, उनमें से एक महत्वपूर्ण कारण की चर्चा यहां की गई है।

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    Source: 
    राज्यसभा टीवी, 04 मार्च 2013

    महाराष्ट्र में सूखे की वजह से एक ऐसा हाहाकार मचा हुआ है जो सुनाई नहीं दिखाई दे रहा है। खेत रेगिस्तान में बदल रहे हैं और लोग पानी की एक-एक बूंद को तरस रहे हैं। महाराष्ट्र इन दिनों महासूखे की चपेट में है। सूखे का हाल ये है कि राज्य के 34 ज़िलों में क्या इंसान और क्या जानवर, सभी पानी से लेकर भोजन तक को तरस रहे हैं।
    इस खबर के स्रोत का लिंक: 

    https://www.youtube.com

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    Author: 
    सच्चिदानंद सिन्हा
    Source: 
    सामयिक वार्ता, मार्च 2013

    एक बुनियादी बात ध्यान में रखना जरूरी है। शोषणमुक्त समाज में पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने की क्षमता गैरबराबर समाज से अधिक होती है, क्योंकि गैरबराबरी से ही दिखावे के लिए बेजरूरत तामझाम पर खर्च जरूरी होता है, और बाजार आश्रित पूंजीवादी समाज में तो बेजरूरी वस्तुओं के उत्पादन व उपभोग की भूमिका इतनी महत्वपूर्ण है कि इसे नियंत्रित करने से पूंजीवादी व्यवस्था ध्वस्त हो सकती है। इससे यह तो जरूर कहा जा सकता है कि प्रकृति से तालमेल बिठा कर चलने वाली कोई भी व्यवस्था समता के मूल्यों पर ही आधारित हो सकती है।

    पूंजीवादी तकनीक की मदद से दुनिया को स्वर्ग बनाने की जो कल्पना मार्क्सवाद ने की थी, वह व्यस्त हो गई है। पर्यावरण का संकट बुनियादी संकट है, लेकिन विकसित देशों को धरती गरम होने से बर्फ पिघलने से उत्तरी गोलार्ध में खनिजों के नए भंडारों के दोहन और व्यापार की संभावना दिखने लगी है। भारत जैसे देशों को विकास की एक अलग राह खोजना होगा जो प्रकृति के साथ सामंजस्य, गांव, खेती, छोटी इकाई और समानता व सहयोग पर आधारित हो। इसके लिए राष्ट्र-राज्य, फौज और बड़े उद्योगों के गठजोड़ को तोड़ना होगा। क्यूबा जैसे प्रयोगों से भी हम सीख सकते हैं। वैकल्पिक विकास के मॉडल की बात करना आज उसी तरह अर्थहीन है जैसे कभी यूटोपिया की बात करना समाजवादी आंदोलन के प्रारंभिक काल में था। कोई भी व्यवस्था सामने की हकीक़त के संदर्भ में ही बनती है, बनी-बनाई कल्पना के अनुरूप नहीं। ऐसे किसी भी मनचाहे ब्लूप्रिंट को लागू करने का प्रयास या तो धर्मांधता को जन्म देता है या तानाशाही को। आज चूंकि पर्यावरण का संकट विविध रूपों में हमारे अस्तित्व के लिए सर्वाधिक महत्व का बन गया है, इसलिए हमें समाज निर्माण की वैसी दिशा अपनानी होगी जो पर्यावरण के लिए कम से कम नुक़सानदेह हो।

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    Author: 
    कुमार प्रशांत
    Source: 
    नेशनल दुनिया, 25 अप्रैल 2013
    आधुनिक सभ्यता में रची-बसी हमारी जीवनशैली बिजली के बिना सांस भी नहीं ले सकती है। रोशनी और पावर की प्यास और पानी की प्यास के बीच चुनाव जैसा कुछ बचा ही नहीं है। जालना में लोहे के कारखाने कुकुरमुत्तों की तरह उगे हैं और ये सारे नगर के पानी को जरूरत से ज्यादा पीते हैं। इनकी पानी भी रोका नहीं जा सकता है क्योंकि अगर ये उद्योग बंद हुए तो इनमें काम कर रहे 50 हजार से ज्यादा कामगार न केवल बेरोजगार हो जाएंगे बल्कि अपने गांव-नगर पहुंच कर पानी की ज्यादा मांग भी करेंगे।अकाल... सूखा... बाढ़...महामारी... आदि-आदि सब पहले कुछ खास प्रांतों की किस्मत में लिखे होते थे। जबसे सबकी समझ में यह आ गया है कि ये सब बेहिसाब कमाई के प्राकृतिक अवसर होते हैं, तब से ये जहां चाहें वहां आ जाते हैं। इन दिनों सूखा महाराष्ट्र में डेरा डाले हुए है। महाराष्ट्र सरकार इस मेहमान से बेहद चिंतित है। मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण अपना एक माह का वेतन सूखा राहत कोष में दे रहे हैं। मंत्रियों से भी ऐसा ही करने को कह रहे हैं। लेकिन मंत्रियों में कोई उत्साह नहीं दिखा। मंत्रियों की तरफ से बता दिया गया है कि हम अपना वेतन दे-देकर तो इस सूखे का मुकाबला नहीं कर सकते हैं। उपमुख्यमंत्री अजित पवार तो मंत्रियों से भी आगे निकल गए। केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार के भतीजे अजित पवार ने तो जो मुंह में आया बोल दिया। कह दिया कि वे पेशाब कर-कर के भी सूखी नदियों को नहीं भर सकते हैं। सूखे से घिरे महाराष्ट्र में यह बयान सूबे की राजनीति में तूफान बरपा गया है।

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    Source: 
    राज्यसभा टीवी

    भारत की सभी नदियां गंगा परिवार की नदी हैं इन सारी नदियों के स्वास्थ्य का विचार करना जरूरी है। नदी को समग्रता से समझने की जरूरत है। नदी कोई दो किनारे के बीच बहने वाला जल नहीं है वह अपने संपूर्ण जल ग्रहण के साथ एक इकाई है, जो उसका कैचमेंट एरिया है उस कैचमेंट एरिया और जलग्रहण के साथ एक इकाई है। लोग आजकल नदी को वाटरबॉडी के नाम से पुकारते हैं।
    इस खबर के स्रोत का लिंक: 

    https://www.youtube.com

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    Author: 
    राजीव चन्देल
    1. चौतरफा संकट से जूझ रहे हैं पॉवर प्लांट से विस्थापित परिवार
    2. मेजा उर्जा निगम प्रा. लि. को दी गई चेतावनी


    विस्थापन सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी है, क्योंकि इसमें शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार की यातनाएँ दी जाती है। विस्थापन का दर्द इन परिवारों की बेबसी व परेशानी को देखकर आसानी से समझा जा सकता है। दरअसल सवाल सिर्फ हैंडपंपों से निकल रहे प्रदूषित पानी का ही नहीं है। बुनियादी बात है पॉवर प्लांट अधिकारियों के झूठे वायदे की, जो अब विस्थापित परिवारों के लिए भारी पड़ रहा है। ज़मीन अधिगृहीत करते समय सैकड़ों सपने दिखाए गए थे। लेकिन इस मौजा से विस्थापित दर्जनों परिवारों का हाल तो और भी बुरा है।इलाहाबाद। अपने घर व ज़मीन से विस्थापित हुए इन परिवारों को अब बिजली उत्पादन के विकास की बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है। जिला प्रशासन व प्लांट मैनेजरों के कोरे आश्वासन से सैकड़ों परिवारों का भविष्य दाँव पर लग गया है। मेजा उर्जा निगम प्रा. लि. ने विस्थापन एवं पुर्नवास नीति का पालन नहीं किया। किसानों से ज़मीन लेकर उनके परिवार को जंगल में ला पटका। पुनर्वास के नाम पर एक-एक परिवार को केवल 150 वर्ग मी0 रिहायशी भूमि पट्टा के रूप में दी गई और पेयजल के लिए चार हैंडपंप लगाकर फ़ुरसत पा लिया गया। इनमें दो खराब हो गए हैं। बाकी बचे दोनों हैंडपंपों से आर्सेनिक युक्त पानी निकल रहा है, जो पीने लायक ही नहीं हैं। दूषित पानी से यहां गंभीर बीमारी का खतरा मंडरा रहा है। अपने जल, जंगल व ज़मीन से बेदखल किए गए इन किसान परिवारों का कहना है कि ज़मीन अधिग्रहण के वक्त प्लांट के मैनेजरों ने जल निगम की तर्ज पर पाइप लाइन से शुद्ध पेयजल आपूर्ति का वायदा किया था। लेकिन उन्हें पीने के पानी के लिए अब आन्दोलन करना पड़ रहा है।

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    Author: 
    राजीव चन्देल
    1. दरिया हमारे भाई हैं, क्योंकि वे हमारी प्यास बुझाते हैं। नदियां हमारी नौकाओं का परिवहन करती हैं और हमारे बच्चों का पेट भरती हैं।
    2. ‘‘बिना जानवरों के मनुष्य का अस्तित्व ही क्या है? जिस दिन पशु नहीं रहेंगे, उस दिन मनुष्य अपनी आत्मा के भयानक एकाकीपन में घुटकर मर जाएगा। जो कुछ पशुओं के साथ होता है वह जल्द ही मनुष्य के साथ भी गुजरेगा। सभी चीजें एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं।


    मेजा वन रेंज के अधिकारियों के लिए दुर्लभ काले हिरणों की मौत से शायद कोई फर्क नहीं पड़ता। पिछले महीने कुत्तों की शिकार बनीं दो गर्भवती हिरणों की मौत के बाद भी वन विभाग नहीं जागा। ग्रामीणों के काफी हो-हल्ला मचाने पर वन रेंज का एक दरोगा मौके पर पहुंचा और मारी गई हिरण के शव को उठाकर चला गया। उसके बाद उधर कोई अधिकारी झांकने नहीं गया। काले हिरण मर रहे हैं। वन विभाग के अधिकारी आँख मूंदे हुए हैं। काश ये बोल पाते तो खुद के उपर हो रहे जुल्म के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करते। तब काले हिरणों इलाके में राजनैतिक मुद्दा बन सकते। तब शायद सरकारें इस ओर थोड़ा ध्यान देतीं। 1854 में जब गोरे लोग अमरीका में रेड इंडियनों से ज़मीन खरीदने का समझौता कर रहे थे तब सिएटल के एक रेड इंडियन नेता ने गोरों पर उपरोक्त टिप्पणी की थी। यह जैव विविधता व पर्यावरण को समझने के लिए सबसे अच्छा वक्तव्य है। इलाहाबाद के मेजा-कोरांव अंचल में बनाए जा रहे पॉवर प्लांट के कारण उपजे त्रिविध मानवीय संकट व जैव विविधता पर आसन्न खतरे को देखकर उस रेड इंडियन की याद आती है, जिसकी भविष्यवाणी आज पूरे दुनिया में सच साबित हो रही है। बिजली विकास के लिए लगाए जा रहे कारखाने, अधाधुंध अवैध खनन, बाजार पैदा होने की लालच में रात-दिन बनाई जा रहीं दुकानों व बढ़ते आवागमन के शोर-गुल से यहां दुर्लभ काले हिरणों को जिस तरह से अपनी जान गँवानी पड़ रही है, उसे देखकर लगता है कि मनुष्यों व जानवरों के बीच सदियों का सहअस्तित्व जीवन बड़े ही दर्दनाक ढंग से समाप्त होने की कगार पर पहुंच गया है। शायद यह मानवीय जगत के लिए काफी भयावह होगा। उस रेड इंडियन ने दुनिया को इसी भयनाक परिणाम के लिए ही तो चेताया था।

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    Author: 
    सुरेश भाई
    Source: 
    जनसत्ता रविवारी, 05 मई 2013
    उत्तराखंड हिमालय, गंगा-यमुना जैसी पवित्र नदियों और उनकी सैकड़ों सदानीरा जलधाराओं के कारण पूरे विश्व में जलभंडार के रूप में प्रसिद्ध है। मगर तथाकथित विकास और समृद्धि के झूठे दंभ से ग्रस्त राज्य सरकारें गंगा और उसकी धाराओं के प्राकृतिक सनातन प्रवाह को बांधों से बाधित कर रही हैं। इनसे इन नदियों का अस्तित्व खतरे में है। इसके चलते राज्य की वर्षापोषित और हिमपोषित तमाम नदियों पर संकट छा गया है। जहां वर्षापोषित कोसी, रामगंगा, जलकुर आदि नदियों का पानी निरंतर सूख रहा है वहीं भागीरथी, यमुना, अलकनंदा, भिलंगना, सरयू, महाकाली, मंदाकिनी आदि हिमपोषित नदियों पर सुरंग बांधों का खतरा है।उत्तराखंड समेत सभी हिमालयी राज्यों में सुरंग आधारित जल विद्युत परियोजनाओं के कारण नदियों का प्राकृतिक स्वरूप बिगड़ गया है। ढालदार पहाड़ियों पर बसे गाँवों के नीचे बांधों की सुरंग बनाई जा रही है। जहां-जहां ऐसे बांध बन रहे हैं, लोग सवाल उठा रहे हैं। इन बांधों के निर्माण के लिए निजी कंपनियों के अलावा एनटीपीसी और एनएचपीसी जैसी कमाऊ कंपनियों को बुलाया जा रहा है। राज्य सरकार ऊर्जा प्रदेश का सपना भी इन्हीं के सहारे देख रही है। ऊर्जा प्रदेश बनाने के लिए पारंपरिक जल संस्कृति और संरक्षण जैसी बातों को बिल्कुल भुला दिया गया है। निजी क्षेत्र के हितों को ध्यान में रख कर नीति बनाई जा रही है। निजी क्षेत्र के प्रति सरकारी लगाव के पीछे दुनिया की वैश्विक ताक़तों का दबाव है। इसे विकास का मुख्य आधार मान कर स्थानीय लोगों की आजीविका की मांग कुचली जा रही है। बांध बनाने वाली व्यवस्था ने इस दिशा में संवादहीनता पैदा कर दी है। वह लोगों की उपेक्षा कर रही है। उत्तराखंड में जहां-जहां सुरंगी बांध बन रहे हैं, वहां लोगों की दुविधा यह भी है कि टिहरी जैसा विशालकाय बांध तो नहीं बन रहा है, जिसके कारण उन्हें विस्थापन की मार झेलनी पड़ सकती है। इसलिए कुछ लोग पुनर्वास की मांग करते भी दिखाई दे रहे हैं।

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    सामुदायिक स्तर पर सबसे पहले वह काम करें, जो अल्पकालिक हो, समुदाय ने खुद तय किया हो और उसे सीधे सकारात्मक लाभ देता हो। हो सकता है कि नदी प्रदूषण के कारण हैंडपम्प के पानी में चढ़ आई बदबू और फ्लोरोसिस का इलाज पहला काम बन जाये। हो सकता है कि नदी की बीमारी ने किसी गांव को बेरोजगार कर दिया हो, उसे रोज़गार देना पहली जरूरत हो। इस पहले काम को किसी भी हालत में असफल नहीं देना है। इसकी तैयारी चाकचौबंद रहे। इसके बाद हम देखेंगे कि काम का प्रवाह इतनी तेजी से बह निकलेगा कि उसे संभालने के लिए हमें कई ईमानदार हाथों को अपनी भूमिका में लाना पड़ेगा।सरकार जब करेगी, तब करेगी... आइए! हम अपनी नदी की एक निर्मल कथा खुद लिखें। उसकी कार्ययोजना बनाएं भी और उसे क्रियान्वित भी खुद ही करें। हां! सिद्धांत न कभी खुद भूलें और न अन्य किसी को भूलने दें। नदी निर्मलता एक दीर्घकालिक काम है। ऐसे दीर्धकालिक कामों की कार्ययोजना के चार चरण की मांग करती हैं: समझना, समझाना, रचना और सत्याग्रह। हो सकता है कि कभी कोई आपात मांग सत्याग्रह को पहले नंबर पर ले आए या कभी कोई तात्कालिक लक्ष्य इस क्रम को उलट-पलट दे; लेकिन सामान्य क्रम यही है।

    समझना


    ....तो कार्ययोजना का सबसे पहला काम है अक्सर जाकर अपनी नदी का हालचाल पूछने का। यह काम अनायास करते रहें। अखबार में फोटो छपवाने या प्रोजेक्ट रिपोर्ट में यूसी लगाने के लिए नहीं, नदी से आत्मीय रिश्ते बनाने के लिए। यह काम नदी और उसके समाज में उतरे बगैर नहीं हो सकता। नदी और उसके किनारे के समाज के स्वभाव व आपसी रिश्ते को भी ठीक-ठीक समझकर ही आगे बढ़ना चाहिए। नदी जब तक सेहतमंद रही, उसकी सेहत का राज क्या था? यह समझना भी बेहद जरूरी है। ठीक से कागज़ पर चिन्हित कर लें कि नदी को कौन-कौन, कितना, कहां-कहां और किस तरीके व वजह से प्रदूषित कर रहा है। नदी, खेती, धरती, पेयजल, सेहत, आमदनी, समाज और संस्कार पर प्रदूषण के प्रभावों को एक बार खुद जाकर ठीक आंखों से देख-समझ लें।

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    Author: 
    विमल भाई
    Source: 
    माटू जनसंगठन

    बरगी बांध से विस्थापन के बाद बड़े किसान भी अब मज़दूर बन गए हैं। अब इस परियोजना के कारण उनकी स्थिति और भी खराब होने वाली है। यह परियोजना ना केवल तीन गाँवों के जीवन-मरण का प्रश्न है। वरन् प्रस्तावित परियोजना के 30 किलोमीटर के दायरे आने वाले सभी गाँवों के इंसानों-जीव-जतुंओं और पर्यावरण के भविष्य पर भी प्रश्नचिन्ह लगाती है। प्रश्न सामने है कि जबलपुर के रहने वाले 22 लाख लोग जब विकिरण युक्त पानी पिएंगे तब क्या होगा? तो क्या मध्य प्रदेश राज्य में पंजाब की तरह कैंसर ट्रेन चलेगी? अभी भोपाल गैस कांड से पीड़ितों की संख्या काबू में नहीं आ रहा है तो क्या जबलपुर को दूसरा भोपाल बनाने की तैयारी है।

    पहले डूब अब धोखे से उजाड़ आज लगभग 13 साल हुए जब चुटका गांव बरगी बांध में डूबा था। 69 मीटर ऊंचा और 5.4 किलोमीटर लंबा बांध यह मध्य प्रदेश में नर्मदा पर बने 5 विशालकाय बांधों में से एक है जिसमें घोषणा से ज्यादा 60 गांव डूबे थे। बैठे-बैठे लोगों के जल-जंगल-ज़मीन, गांव, खेत डूब गए। बाद में सरकार से लड़-लड़ कर थोड़ी ज़मीन मिली। ज्यादातर लोगों ने जंगल और दूसरी सरकारी जमीनों पर कब्ज़े किए जिस पर बहुत समय बाद जमीनों के पट्टे मिल पाए। बड़े-बड़े किसान आज मज़दूर बने हैं। चुटका भी उन्हीं गाँवों में से एक है जिसे लोगों ने अपनी ताकत से खड़ा किया है, वरना 4000 रु. प्रति एकड़ मिले मुआवज़े में कौन सा घर बना पाते? कौन सी ज़मीन ख़रीद पाते?

    आज इन्हीं चुटका निवासियों पर फिर “चुटका मध्य प्रदेश परमाणु विद्युत परियोजना” के रूप में एक विस्थापन का नया खतरा सामने है। इस परियोजना से मुख्य रूप से तीन गाँव विस्थापित होंगे। बीजाडांडी, नारायण गंज (मंडला) तथा घंसौर (सिवनी) विकासखंड के लगभग 54 गाँव विकिरण से प्रभावित होंगे। 1400 मेगावाट बिजली बनाने हेतु बरगी जलाशय से पानी लिया जाएगा एवं पुनः उस पानी को जलाशय में छोड़ा जाएगा जिससे पानी प्रदूषित होंगा और मनुष्यों सहित इस पर आश्रित सभी जैविक घटकों का जीवन खतरे में पड़ जाएगा।

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    Author: 
    अभिषेक श्रीवास्तव
    डोंगरकिन्ही, जिला बीड मुख्यालय से 32 किलोमीटर दूर बालाघाट की पहाड़ियों के बीच बसी यह जगह सूखे से सर्वाधिक प्रभावित पाटोदा तालुके में आती है। यहां किसी जमाने में खूब पानी रहा होगा। इसका पता रास्ते में पड़ा वन्य-जीव क्षेत्र का वह बोर्ड देता है जिस पर मोर और हिरन की तस्वीर बनी है। फिलहाल, यहां न तो मोर है न हिरन। सूखे की आहट से किन्हीं और इलाके में जा चुके हैं। जो बचा है, वह बमुश्किल एक दर्जन दुकानों का बेतरतीब बाजार है। पूरे गांव में भयावह सन्नाटा है। सूखा ज़मीन पर ही नहीं लोगों के आंखों में भी दिखता है। इस साल होली पर जब एक स्वयंभू संत ने हजारों लीटर रंगीन पानी से अपने भक्तों पर आशीर्वाद का रस बरसाया, तब उनकी चौतरफा निंदा हुई थी। शिवसेना और राष्ट्रीवादी कांग्रेस पार्टी समेत सभी ने इस कृत्य को महाराष्ट्र के सूखे का मज़ाक बताया था और मुंबई के आश्रम में पानी के टैंकों का जाना भी बंद करवा दिया था। अब जबकि महाराष्ट्र में सिविल निर्माण कार्य 2010-11 पर कैग की रिपोर्ट आई है और सिंचाई घोटाले पर कोल्हापुर के कलेक्टर का बहुप्रचारित बयान सार्वजनिक हो चुका है, इसमें नामजद गोपीनाथ मुंडे से लेकर अजित पवार तक सभी पार्टियों के नेताओं द्वारा इस स्वयंभू संत की आलोचना खुद मज़ाक से ज्यादा नहीं लगती। बीते एक महीने के दौरान किसी ने भी सूखे से जूझ रही मराठवाड़ा की जनता का पक्ष जानने की कोशिश नहीं की, जहां के ढाबों और सार्वजनिक भवनों की दीवारों पर पहले से कहीं ज्यादा संख्या में तमाम स्वयंभू संतों के पोस्टर चमचमा रहे हैं।

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    Author: 
    सुसान फ्रिंकेल
    Source: 
    गांधी मार्ग, मई-जून 2013
    आज पूरी दुनिया, नई, पुरानी, पढ़ी-लिखी, अनपढ़ दुनिया भी इन्हीं प्लास्टिक की थैलियों को लेकर एक अंतहीन यात्रा पर निकल पड़ी है। छोटे-बड़े बाजार, देशी-विदेशी दुकानें हमारे हाथों में प्लास्टिक की थैली थमा देती हैं। हम इन थैलियों को लेकर घर आते हैं। कुछ घरों में ये आते ही कचरे में फेंक दी जाती हैं तो कुछ साधारण घरों में कुछ दिन लपेट कर संभाल कर रख दी जाती हैं, फिर किसी और दिन कचरे में डालने के लिए। इस तरह आज नहीं तो कल कचरे में फिका गई इन थैलियों को फिर हवा ले उड़ती है, एक और अंतहीन यात्रा पर। फिर यह हल्का कचरा जमीन पर उड़ते हुए, नदी नालों में पहुंच कर बहने लगता है।पिछले दिनों देश की सबसे बड़ी अदालत ने कहा कि हमारा देश प्लास्टिक के एक टाईम बम पर बैठा है। यह टिक-टिक कर रहा है, कब फट जाएगा, कहा नहीं जा सकता। हर दिन पूरा देश कोई 9000 टन कचरा फेंक रहा है! उसने इस पर भी आश्चर्य प्रकट किया है कि जब देश के चार बड़े शहर- दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता ही इस बारे में कुछ कदम नहीं उठा रहे तो और छोटे तथा मध्यम शहरों की नगरपालिकाओं से क्या उम्मीद की जाए? कोई नब्बे बरस पहले हमारी दुनिया में प्लास्टिक नाम की कोई चीज नहीं थी। आज शहर में, गांव में, आसपास, दूर-दूर जहां भी देखो प्लास्टिक ही प्लास्टिक अटा पड़ा है। गरीब, अमीर, अगड़ी-पिछड़ी पूरी दुनिया प्लास्टिकमय हो चुकी है। सचमुच यह तो अब कण-कण में व्याप्त है - शायद भगवान से भी ज्यादा! मुझे पहली बार जब यह बात समझ में आई तो मैंने सोचा कि क्यों न मैं एक प्रयोग करके देखूं- क्या मैं अपना कोई एक दिन बिना प्लास्टिक छूए बिता सकूंगी। खूब सोच समझ कर मैंने यह संकल्प लिया था। दिन शुरू हुआ। नतीजा आपको क्या बताऊं, आपको तो पता चल ही गया होगा। मैं अपने उस दिन के कुछ ही क्षण बिता पाई थी कि प्लास्टिक ने मुझे छू लिया था!

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    Author: 
    मिलिंद बोकील
    Source: 
    गांधी मार्ग, मई-जून 2013
    1984 में चंद्रपुर-गडचिरोली में ‘जंगल बचाव-मानव बचाव’ आंदोलन शुरू हुआ। आंध्रप्रदेश में गोदावरी नदी पर इंचमपल्ली में तथा पास के बस्तर जिले में इंद्रावती नदी पर भोपालपट्टनम् में बांध बनाने की योजना थी। इस क्षेत्र में वैनगंगा और इंद्रावती ये मुख्य नदियां हैं; दोनों गोदावरी की उपनदियां। इंद्रावती महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ के बीच की सीमारेखा है, तो वैनगंगा चंद्रपुर और गडचिरोली जिलों के बीच की सीमारेखा है। दोनों प्रकल्प महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और आंध्रप्रदेश की सीमा पर थे; फिर भी गडचिरोली जिले का काफी जंगल और आदिवासी क्षेत्र डूबने वाला था। 27 अप्रैल 2011। गांव मेंढा, तहसील धानोरा, जिला गडचिरोली के बाहर का मैदान। समय दोपहर साढ़े बारह था। चिलचिलाती धूप। तपी हुई जमीन। ऊपर चमकता आसमान। मैदान में बड़ा-सा शामियाना खड़ा है। सभा चल रही है। मंच पर नेताओं और अफसरों का हुजूम। दिल्ली से केंद्रीय वनमंत्री आए हैं। उनके साथ योजना आयोग की सचिव भी। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री भी तीन काबीना मंत्रियों- वनमंत्री तथा आदिवासी विकास मंत्री- के साथ बिराजे हैं। तीन स्थानीय विधायक भी मौजूद हैं। जिला परिषद के अध्यक्ष भी। वन तथा राजस्व विभाग के वरिष्ठ अफसरों की तो पूरी पलटन ही हाजिर है। उनके सामने जिला स्तर के अफसर बौने लग रहे हैं। क्यों इकट्ठा हुए हैं ये सब? दिल्ली और मुंबई की सरकारें मेंढा-लेखा गांव में आई हैं, मेंढा की ग्रामसभा को उनके जंगल में पैदा होने वाले बांस की बिक्री का अधिकार सुपुर्द करने के लिए। दो साल पहले ही 2006 के वन अधिकार कानून ने मेंढा को उसके 1800 हेक्टेयर वन-जमीन पर स्वामित्व-अधिकार दिया था। महाराष्ट्र के राज्यपाल ने खुद आकर उस अधिकार का कागज गांव को सौंपा था।

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    जल, जंगल, ज़मीन और जीवन बचाओ की इस रैली में रंगबिरंगी पोशाकों में महिलाएं रैली की अगली पंक्ति में चल रही थीं। सुंदर क्यारी सी सजी उनकी टोली आकर्षण का केंद्र थी, जिसमें बुजुर्ग महिलाओं से लेकर स्कूली बच्चियां भी शामिल थीं। एक पिता अपने छोटे बेटे को लेकर आया था जिसकी वह अंगुली पकड़कर जुलूस में चल रहा था। साथ में उनके बेटा भी मुट्ठी बांध कर हवा में हाथ नारा लगा रहा था। रैली में आदिवासी खुद चंदा करके अपने गाँवों के ट्रेक्टर-ट्राली से आए थे, जैसे नर्मदा स्नान करने जाते हैं।इन दिनों सतपुड़ा के जंगलों के आदिवासी आंदोलित हैं। इसकी एक झलक होशंगाबाद में जब दिखाई दी तब आदिवासियों के जोशीले नारों से यहां की गलियाँ गूँज उठीं। दूरदराज के गाँवों से सैकड़ों की तादाद में यहां आकर आदिवासियों ने जता दिया कि शेर पालने के नाम पर उनकी रोजी-रोटी पर लगाई जा रही रोक उन्हें मंज़ूर नहीं है। इसका पूरी ताकत से विरोध किया जाएगा। इस जुलूस का फौरी असर यह हुआ कि कलेक्टर को अपने लोहे के गेट खोलकर आदिवासियों को बातचीत के लिए बुलाना पड़ा और अब खबर आई है कि मुख्यमंत्री ने भी कहा है कि अगर स्थानीय लोग प्रस्तावित कानून का विरोध कर रहे हैं तो इस पर विचार किया जाएगा। और जरूरत पड़ी तो इसे बदला जाएगा। मध्य प्रदेश के होशंगाबाद में गत 3 मई को नर्मदा किनारे से जब आदिवासियों की रैली शुरू हुई और छोटी गलियों व सड़क से होती हुई कलेक्टर कार्यालय पहुंची। इतनी बड़ी संख्या में ग्रामीणों को देखकर शहरवासी भौचक्के रह गए। वे अपने मकानों और दुकानों से आदिवासियों को देखने बाहर निकल आए।

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    Author: 
    प्रसून लतांत
    Source: 
    जनसत्ता रविवारी, 19 मई 2013
    यों भारत में इतनी बारिश होती है कि अगर उसका कारगर ढंग से रखरखाव किया जाए तो पानी के लिए कहीं भटकना नहीं पड़ेगा। लेकिन कुप्रबंधन, उदासीन नौकरशाही और जनप्रतिनिधियों में इच्छाशक्ति की कमी ने पूरे देश में जल संकट पैदा कर दिया है। पेयजल का व्यवसायीकरण होने से भी स्थिति विषम बनी हुई है। पानी की कहानी बयान कर रहे हैं प्रसून लतांत।

    पानी के लिए सामने खड़ी समस्याओं के लिए हम और हमारी सरकारें भी पूरी तरह जिम्मेवार हैं। हमने अपने पूर्वजों के अनुभव और उनके तौर-तरीकों को पिछड़ा बता कर बड़े-छोटे बांध और तटबंध बनाने के नाम पर नदियों के प्रवाह से खिलवाड़ किया और उसमें कारखाने का रासायनिक डाल कर उसे प्रदूषित किया। बाकि बचे झील-तालाबों और कुओं में मिट्टी डाल उस पर दुकानें बना लीं। इन सब कारणों से अब धरती के ऊपरी सतह पर उपलब्ध पानी के ज्यादातर स्रोत सूख रहे हैं। देश की ज्यादातर नदियां सूख रही हैं। इसके कारण खेतों की सिंचाई नहीं हो पा रही है। पीने के पानी की किल्लत देश के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में लगातार बढ़ रही है।पानी के बढ़ते संकट के कारण सभी के आंखों में पानी उतरने लगा है। पानी का सवाल अकेली दिल्ली या देश के किसी एक राज्य और उसकी राजधानी और उनके जिलों भर का मामला नहीं है, यह देश दुनिया में व्याप गया है। नमक से कहीं ज्यादा जरूरी इस प्राकृतिक साधन पर खतरे मंडरा रहे हैं। इस साधन को सहेजने, संवारने और बरतने वाले आम आदमी का हक इस पर से टूटता जा रहा है और इसे हड़पने वाली कंपनियां दिनोंदिन मालामाल होती जा रही हैं और ऐसे में केवल सरकार है, जिससे उम्मीद की जाती है तो वह भी इसका कारगर हल खोजने के बदले कहीं तमाशबीन तो कहीं शोषकों के खेल में भागीदार बन कर लोगों के संकट को बढ़ा रही है। इन सभी कारणों से आम आदमी का भरोसा टूटा है और उनके आंदोलन शुरू हो गए हैं। इसी के साथ पानी से जुड़े सभी पुराने सरोकार और इस पर आधारित संस्कृति का ताना-बाना भी छिन्न-भिन्न हो गया है, जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकेगी और कभी होगी तो उसमें काफी समय लग जाएगा।

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    अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस (22 मई) पर विशेष


    दरअसल हमने अपने लालच इतने बढ़ा लिए हैं कि हर चीज कम पड़ गई है सिवाय गेहूं और कपड़ों के! इस बार मराठा सूखे में पानी का टोटा रहा, लेकिन रोटी की कोई कमी आज भी नहीं है।’’ कभी रोटियां कम पड़ जाती थीं, पेट भरने के लिए। अब बोरे कम पड़ गये हैं अनाज भरने के लिए। कभी कपड़े कम पड़ जाते थे, तन ढकने के लिए। अब कपड़े हैं, पर हम तन ढँकना नहीं चाहते।’’ दिलचस्प है कि कीमतें फिर भी कम नहीं होती। खैर! यह काल्पनिक बात नहीं कि धरती, पानी, हवा, जंगल, बारिश, खनिज, मांस, मवेशी... कुदरत की सारी नियामतें अब इंसानों को कम पड़ने लगी हैं। इंसानों ने भी तय कर लिया है कि कुदरत की सारी नियामतें सिर्फ और सिर्फ इंसानों के लिए है।

    औरों को क्या कहूं, पहले मैं दिल्ली के जिस मकान में रहता था, वह मकान छोटा था, लेकिन उसका दिल बहुत बड़ा था। क्योंकि वह मकान नहीं, घर था। उस में चींटी से लेकर चिड़िया तक सभी के रहने की जगह थी। अब मकान थोड़ा बड़ा हो गया है। धरती से हटकर आसमां हो गया है। लेकिन इसमें अब इंसान के अलावा किसी के लिए और कोई जगह नहीं है। मंज़िलें बढ़ी हैं; लेकिन साथ-साथ रोशनदानों पर बंदिशें भी। मेरी बेटी गौरैया का घोसला देखने को तरस गई है। कबूतर की बीट से नीचे वालों को भी घिन आने लगी है। चूहे, तिलचट्टे, मच्छर और दीमक ज़रूर कभी-कभी अनाधिकार घुसपैठ कर बैठते हैं। उनका खात्मा करने का आइडिया ‘हिट’ हो गया है। हमने ऐसे तमाम हालात पैदा करने शुरू कर दिए हैं कि यह दुनिया..दुनिया के दोस्तों के लिए ही नो एंट्री जोन में तब्दील हो जाए। ऐसे में जैव विविधता बचे, तो बचे कैसे? ग़ौरतलब है कि अब इंसानों की गिनती, दुनिया की दूसरी कृतियों के दुश्मनों में होने लगी है। खल्क खुदा का! जैव विविधता इंसानी शिकंजे में!!

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  • 05/22/13--21:58: उद्गम शेष
  • Author: 
    विमल भाई
    Source: 
    माटू जनसंगठन
    अधिसूचना में जहां बड़े बांधों पर पूरी तरह से रोक की बात है वहीं 25 मेगावाट से छोटे बांधों को पूरी तरह से हरी झंडी देने का प्रयास है। अस्सीगंगा में 4 जविप निर्माणाधीन हैं जो 10 मेगावाट से छोटी हैं। जिनमें एशियाई विकास बैंक द्वारा पोषित निमार्णाधीन कल्दीगाड व नाबार्ड द्वारा पोषित अस्सी गंगा चरण एक व दो जविप भी है। उत्तरकाशी में भागीरथीगंगा को मिलने वाली अस्सीगंगा की घाटी पर्यटन की दृष्टि से ना केवल सुंदर है वरन् घाटी के लोगो को स्थायी रोज़गार दिलाने में भी सक्षम है।पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की ताजी अधिसूचना के अनुसार गौमुख से उत्तरकाशी तक भागीरथीगंगा के लगभग 100 किलोमीटर लम्बे 4179.59 वर्ग किलोमीटर के संपूर्ण जल संरक्षण क्षेत्र को भागीरथीगंगा के पर्यावरणीय प्रवाह और परिस्थितिकी को बनाए रखने के लिए पारिस्थितिकीय और पर्यावरणीय दृष्टि से पारिस्थितिकी संवेदनशील क्षेत्र घोषित किया गया है। इसके साथ ही उत्तराखंड में खासकर उत्तरकाशी के इस क्षेत्र में फिर से धरने प्रर्दशन चालू हो गए।

    पूर्व के जी.डी. अग्रवाल और वर्तमान में स्वामी सानंद के उपवास से आस्था के नाम पर बांध रोकने के प्रयासों पर यह पक्की मोहर है। उत्तराखंड सरकार ने नवंबर 2008 पाला-मनेरी व केन्द्र सरकार ने 2010 में लोहारीनाग-पाला बांध रोका था। यह जानते हुए भी कि केन्द्र की कांग्रेस सरकार और राज्य की बीजेपी सरकार के ही द्वारा यह बांध रुके हैं। स्थानीय स्तर पर बांध समर्थन में आंदोलन करके वोट बटोरने की खूब कोशिशें चली हैं। राजनीतिक दलों ने चाहे वह कांग्रेस हो या बीजेपी पिछले लोकसभा, विधानसभा और नगर निगम चुनावों में इसका भरपूर राजनीतिक फायदा उठाया।

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    Source: 
    यू-ट्यूब

    आज हम पानी के परंपरागत जल स्रोत कुएँ, बावड़ियां, टांके, झालरे, जोहड़, नाड़ियां, बेरियों, तालाब और जलाशयों जैसे पानी के स्रोत को बिसरा चुके हैं। जो अभी भी हमारे लिए जल संग्रहण का काम कर रहे हैं और लोगों के लिए लाइफ लाइन साबित हो सकते हैं।
    इस खबर के स्रोत का लिंक: 

    https://www.youtube.com

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    Author: 
    राजीव चन्देल
    इंडिया टीवी इलाहाबाद के पत्रकार इमरान लईक ने आउटर पर बेरोजगार किशोरों की पलटन; रिपोटर्रों की भाषा में अवैध वेंडर द्वारा बेचे जा रहे बोतल बंद पानी पर एक शानदार एक्सक्लूसिव खबर शूट की है। फेसबुक पर इसी स्टोरी का एक मुखड़ा व उसकी तीन-चार फोटो भी नजर आयी। यह खबर हमें यह बताती है कि तमाम लड़के जो बोतलबंद पानी इस समय यात्रियों को पिला रहे हैं, वह पेप्सी का एक्वाफिना नहीं है और न ही कोक का केनली।

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    Author: 
    संतोश सारंग
    Source: 
    चरखा फीचर्स
    दरभंगा नगर निगम ने शहरवासियों को मकान में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाने पर होल्डिंग टैक्स में 5 फीसदी की छुट देने की घोषणा की है। ये कुछ सरकारी प्रयास हैं पर्यावरण के बिगड़ते मिज़ाज़ को काबू में करने और धरती को बचाने की। परंतु, यह प्रयास उस वक्त तक सफल नहीं होगा जबतक आमजन इसके प्रति जागरूक नहीं होते हैं। जरूरत है कि हम भी इको फ्रेंडली बनें। केवल कांफ्रेंस हॉल में ही इस पर विचारने से सफलता पाने की उम्मीद बेमानी होगा, बल्कि खेत-खलिहानों में भी धरती बचाने के लिए चौपाल लगानी होगी।बिहार में शीशम के पेड़ अब बहुत कम दिखाई देते हैं। मृत जानवरों को खाकर वातावरण को शुद्ध करनेवाले गिद्ध भी आकाश में मंडराते नहीं दिखते। वैशाली के बरैला झील, दरभंगा के कुशेश्वरस्थान झील व बेगूसराय के कांवर झील में प्रवासी प्रक्षियों का आना भी कम हो गया है। कठखोदी, बगेरी, लुक्खी की प्रजाति भी विलुप्त होने के कगार पर है। कोयल की कूक व घरों के मुंडेर पर कौओं की कर्कश आवाज भी मद्धिम पड़ गयी है। फसल में पटवन के समय जमीन से निकलने वाला घुरघुरा और उसे अपना निवाला बनाने वाला बगुला भी नजर से ओझल होता जा रहा है। भेंगरिया, तेतारी जैसे उपयोगी घास खोजने से नहीं मिलते हैं। पेड़ों पर पहले जैसे घोंसले नहीं देख बच्चे उदास हो जाते हैं। यह भयावह तस्वीर है, उस बिहार प्रांत की जिसकी लाइफ लाइन है खेती व पशुपालन। कहने का अर्थ है कि पारिस्थितिकी तंत्र व फसल चक्र को नियंत्रित व संरक्षित करने वाले ये सारे कारक नष्ट क्यों हो रहे हैं? इसपर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।

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