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सबको, हमेशा, साफ पानी
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    विश्व जल निगरानी दिवस, 18 सितम्बर 2017 पर विशेष


    पानीपानीबीते दिनों संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुंतारेस ने सुरक्षा परिषद में कहा कि दुनिया में सभी क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता को लेकर तनाव बढ़ रहा है। संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य देशों में से एक चौथाई देश अपने पड़ोसियों के साथ नदियों या झीलों के पानी को साझा करते हैं। इसलिये यह जरूरी है कि राष्ट्र पानी के बँटवारे और दीर्घकालिक इस्तेमाल को सुनिश्चित करने के लिये सहयोग करें।

    यह इसलिये भी जरूरी है क्योंकि वर्ष 2050 तक समूची दुनिया में साफ पानी की माँग 40 फीसदी तक और बढ़ जाएगी। उन्होंने चेतावनी दी कि दुनिया की आबादी का एक चौथाई हिस्सा ऐसे देशों में रहेगा जहाँ साफ पानी की बार-बार कमी होगी। जलवायु परिवर्तन से पानी की किल्लत दिनों-दिन बढ़ती जा रही है, यह सबसे बड़ी चिन्ता का विषय है।

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    Author: 
    उमेश कुमार राय

    रामसागर तालाब में पसरी गन्दगीरामसागर तालाब में पसरी गन्दगीऐतिहासिक व धार्मिकों मान्यताओं से भरपूर गया शहर जितना पुराना है, उतने ही पुराने यहाँ के तालाब भी हैं। कभी गया को तालाबों का शहर भी कहा जाता था, लेकिन बीते छह से सात दशकों में गया के आधा दर्जन से अधिक तालाबों का अस्तित्व पूरी तरह खत्म हो चुका है।

    जहाँ कभी तालाब थे, वहाँ आज कंक्रीट के जंगल गुलजार हैं। इन्हीं में से एक नूतन नगर भी है। इसके बारे में कहा जाता है कि यहाँ पहले विशाल तालाब हुआ करता था। यहाँ अब एक छोटा- सा तालाब बचा है जिसे बिसार तालाब कहा जाता है। बिसार तालाब से आगे बढ़ने पर दिग्धी तालाब आता है। बताया जाता है कि दिग्धी तालाब जुड़वा था, जिसके एक हिस्से को भरकर कमिश्नरी दफ्तर बना दिया गया। इस तालाब का एक हिस्सा अब भी बचा हुआ है, लेकिन इसकी साफ-सफाई नहीं होती है, जिस कारण वहाँ गन्दगी का अम्बार लगा रहता है।

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    (2001 का अधिनियम संख्यांक 52)


    {29 सितम्बर, 2001}


    ऊर्जा के दक्षतापूर्ण उपयोग तथा उसके संरक्षण और उससे सम्बन्धित या उसके आनुषंगिक विषयों का उपबन्ध करने के लिये अधिनियम

    भारत गणराज्य के बावनवें वर्ष में संसद द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनयिमत हो:-

    अध्याय 1


    प्रारम्भिक


    1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ


    (1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम ऊर्जा संरक्षण अधिनियम, 2001 है।
    (2) इसका विस्तार जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय सम्पूर्ण भारत पर है।
    (3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे और इस अधिनियम के भिन्न-भिन्न उपबन्धों के लिये भिन्न-भिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी और ऐसे किसी उपबन्ध में इस अधिनियम के प्रारम्भ के प्रति निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस उपबन्ध के प्रवृत्त होने के प्रति निर्देश है।

    2. परिभाषाएँ


    इस अधिनियम में, जब तक कि सन्दर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

    (क) “प्रत्यायित ऊर्जा सम्परीक्षक” से 1{ऐसा सम्परीक्षक अभिप्रेत है जिसके पास धारा 13 की उपधारा (2) के खण्ड (त) के उपबन्धों के अनुसार प्रत्यायित ऊर्जा सम्परीक्षक अभिप्रेत है};
    (ख) “अपील अधिकरण” से 1{धारा 30 में निर्दिष्ट, ऊर्जा संरक्षण अपील अधिकरण अभिप्रेत है;
    1{(ग) “भवन” से धारा 14 के खण्ड (त) और धारा 15 के खण्ड (क) के अधीन ऊर्जा संरक्षण निर्माण संहिता से सम्बन्धित नियमों के अधिसूचित किये जाने के पश्चात ऐसी कोई संरचना या परिनिर्माण अथवा संरचना या परिनिर्माण का भाग अभिप्रेत है और जिसके अन्तर्गत कोई विद्यमान संरचना या परिनिर्माण अथवा संरचना या परिनिर्माण का भाग भी है जिसमें 100 किलोवाट (के डब्ल्यू) का संयोजित भार या 120 किलोवाट ऐम्पियर (केवीए) और उससे अधिक की माँग संविदा है तथा जिसका वाणिज्यिक प्रयोजनों के लिये उपयोग किया जाता है या उपयोग किये जाने के लिये आशयित है;

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    Author: 
    राजेन्द्र हरदेनिया
    Source: 
    समाज, प्रकृति और विज्ञान (समाज का प्रकृति एजेंडा), माधवराव सप्रे स्मृति समाचारपत्र संग्रहालय, भोपाल, 2017

    थाली में जहरथाली में जहरभारत कृषि प्रधान देश है। देश की बहुत बड़ी आबादी की रोजी रोटी खेती के सहारे है। एक मान्यता जो सच्चाई पर आधारित है कि कृषि देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। समाज में खेती का क्या दर्जा था, इस बारे में पुराने जमाने में एक कहावत प्रचलित थी-

    “उत्तम खेती, मध्यम बान,
    अधम चाकरी, भीख निदान”


    इस कहावत में उस दौर में खेती के प्रति सामाजिक नजरिए की झलक मिलती है। इसमें खेती को सबसे ऊँचा दर्जा दिया गया है। इस कहावत की यहाँ चर्चा का उद्देश्य समाज विज्ञान की नजर से सामाजिक विश्लेषण करना नहीं है।

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    Source: 
    राइजिंग टू द काल, 2014

    अनुवाद - संजय तिवारी

    .बुन्देलों का इतिहास मुठभेड़ और मुकाबलों से भरा रहा है। अपनी समृद्धि को बचाने के लिये वो सदियों बाहरी आक्रमणकारियों से लड़ते भिड़ते रहे हैं। आजादी के बाद भले ही उनको अब बाहरी आक्रमणकारियों से लड़ने की जरूरत न हो लेकिन अब उनकी लड़ाई अपनी समृद्धि को पाने के लिये जारी है। सूखे का भयावह शिकार बन चुके बुन्देलखण्ड की यह लड़ाई उनकी अपनी परम्पराओं को पाने की लड़ाई है। उनकी अपनी प्रकृति और पर्यावरण ही उनके लिये आक्रांता बन गये हैं लेकिन अब बुन्देले इस आपदा से निपटने के लिये भी कमर कसकर तैयार हैं।

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    Author: 
    डॉ. कपूरमल जैन
    Source: 
    समाज, प्रकृति और विज्ञान (समाज का प्रकृति एजेंडा), माधवराव सप्रे स्मृति समाचारपत्र संग्रहालय, भोपाल, 2017

    ग्लोबल वार्मिंगग्लोबल वार्मिंगजब भी हमारे शरीर का ताप बढ़ता है, हम कहते हैं कि हमें बुखार आ गया। ठीक इसी तरह जब धरती का ताप बढ़ता है तो हम कहते हैं कि इसे बुखार आ गया है। यह सुनने में कुछ अजीब लगता है। लेकिन, यह सच है। अतः मन में स्वाभाविक ही प्रश्न उठता है कि आखिर धरती को कैसे आता है बुखार?

    आज के औद्योगिक दौर में कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसों की मात्रा लगातार बढ़ रही है और इसके कारण धरती के औसत ताप में लगातार वृद्धि हो रही है। यह धरती के बुखार का संकेत है। इससे निकट भविष्य में जलवायु परिवर्तन का खतरा मँडराने लगा है। इसे लेकर विश्व के तमाम देश चिन्तित हैं। हमें टिकाऊ विकास के लिये तकनीकी समाधानों के साथ ऐसा कुछ करना होगा जो लोगों की मानसिकता को बदलकर उसे ईको-फ्रेंडली (प्रकृति-मित्र) बना सके, ताकि पृथ्वी सुरक्षित रह सके।

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    Author: 
    चण्डी प्रसाद भट्ट
    Source: 
    समाज, प्रकृति और विज्ञान (समाज का प्रकृति एजेंडा), माधवराव सप्रे स्मृति समाचारपत्र संग्रहालय, भोपाल, 2017

    जंगलजंगलसतत एवं सन्तुलित विकास के लिये प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षणोन्मुखी उपयोग आवश्यक होता है। लेकिन वर्तमान सदी में औद्योगिक विकास ने जहाँ इस तथ्य की अनदेखी करते हुए संसाधनों का अविवेकपूर्ण ढंग से अधिकाधिक दोहन किया और संरक्षण की दिशा में कोई व्यावहारिक परिणाममूलक कार्य योजना प्रस्तुत नहीं की, वहीं उपभोक्तावाद को चरम पर पहुँचाकर संरक्षणवादी विचार को ही विलुप्तप्राय कर दिया। इसका परिणाम हमारे सामने पारिस्थितिकीय एवं पर्यावरणी असन्तुलन के रूप में आया है। इससे प्राकृतिक संसाधन लगातार सिकुड़ते चले गए हैं और मनुष्य सहित समूचे प्राणी-जगत की आजीविका और जीवनशैली बुरी तरह प्रभावित हो गई है।

    इस कारण यह पृथ्वी जो सृष्टि की सर्वोत्कृष्ट कृति है और जिसके बारे में कहा जाता है कि उसमें अपने बच्चों के भरण-पोषण की असीमित क्षमता विद्यमान है, की उत्कृष्टता और क्षमता पर भी प्रश्नचिन्ह लगने लगे हैं।

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    Author: 
    चन्द्रशेखर तिवारी

    जगमोहन सिंह रावतजगमोहन सिंह रावतउत्तरकाशी जनपद के भटवाड़ी विकासखण्ड का एक गाँव है बार्सू। प्रकृति की नैसर्गिक सुन्दरता के बीच स्थित यह गाँव उत्तरकाशी से तकरीबन 44 कि.मी. दूर है। गंगोत्री राजमार्ग में भटवाड़ी से कुछ ही आगे एक मोटर सड़क बार्सू गाँव को जाती है जहाँ से 9 कि.मी. की दूरी तय करके इस गाँव में आसानी से पहुँचा जा सकता है।

    समुद्र सतह से लगभग 4000 मी.की ऊँचाई पर पसरे दियारा बुग्याल की तलहटी में बसे बार्सू गाँव (2300 मी.) को प्रकृति ने सुन्दरता और संसाधनिक समृद्धता का उपहार दिल खोलकर दिया है। बार्सू गाँव को भू-आकृति विज्ञान की नजर से देखें तो प्रथम दृष्टि में प्रतीत होता है कि यहाँ की भौगोलिक संरचना के निर्माण में स्थानीय छोटी-छोटी हिमानियों और जलधाराओं की भूमिका रही है।

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    (2001 का अधिनियम संख्यांक 53)


    {30 अक्तूबर, 2001}


    पौधा किस्म, कृषकों और पौधा संवर्धकों के अधिकारों के संरक्षण के लिये प्रभावी प्रणाली स्थापित करने और पौधों की नई किस्मों के विकास को प्रोत्साहित करने हेतु उपबन्ध करने के लिये अधिनियम

    यह आवश्यक समझा जाता है कि कृषकों के, नई पौधा किस्मों के विकास के लिये पौधा आनुवंशिक साधनों के संरक्षण, सुधार और उनको उपलब्ध कराने में किसी भी समय किये गए उनके योगदान के सम्बन्ध में अधिकारों को मान्यता दी जाये और उनका संरक्षण किया जाये;

    और देश में त्वरित कृषि विकास के लिये यह आवश्यक है कि नई पौधा किस्मों के विकास के लिये सार्वजनिक और निजी दोनों ही सेक्टरों में अनुसन्धान और विकास के लिये विनिधान को प्रोत्साहित करने हेतु पौधा संवर्धकों के अधिकारों का संरक्षण किया जाये;

    और ऐसे संरक्षण से देश में बीज उद्योग की वृद्धि सुकर होगी जिससे कृषकों को उच्च क्वालिटी के बीज और पौधा रोपण सामग्री की उपलब्धता सुनिश्चित होगी;

    और पूर्वोक्त उद्देश्यों को प्रभावी बनाने के लिये कृषकों और पौधा संवर्धकों के अधिकारों के संरक्षण के लिये उपाय करना आवश्यक है;

    और भारत, जिसने बौद्धिक सम्पदा अधिकारों के व्यापार सम्बन्धी पहलुओं से सम्बन्धित करार का अनुसमर्थन कर दिया है, अन्य बातों के साथ-साथ, पौधा किस्मों के संरक्षण से सम्बन्धित उक्त करार के भाग 2 के अनुच्छेद 27 के उपपैरा (ख) को प्रभावी बनाने के लिये उपबन्ध करता है;

    भारत गणराज्य के बावनवें वर्ष में संसद द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनयिमत हो:-

    अध्याय 1


    प्रारम्भिक


    1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ


    (1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम पौधा किस्म और कृषक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 2001 है।
    (2) इसका विस्तार सम्पूर्ण भारत पर है।

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    दिल्ली में पटाखों पर प्रतिबन्धदिल्ली में पटाखों पर प्रतिबन्धसर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में इस साल दीपावली के ऐन मौके पर पटाखों की बिक्री पर जो पाबन्दी लगाई है, उससे तमाम लोग साँस लेने में राहत महसूस कर सकते हैं, लेकिन इसका दूसरा व्यावहारिक पक्ष यह भी है कि कई व्यापारियों से लेकर पटाखा उत्पादक निर्माताओं को आजीविका का संकट भी खड़ा हो सकता है। यह सही है कि देश की राजधानी दिल्ली दुनिया के अधिक प्रदूषित शहरों में से एक है।

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    पानीपानीसमाचार कह रहे हैं कि अभी चौमासा बीता भी नहीं कि देश के कई हिस्सों से पानी की कमी को लेकर रुदन शुरू हो गया है। देश के कई बड़े तालाब व झीलों ने अभी से पानी की कमी के संकेत देने शुरू कर दिये हैं। हकीकत यह है कि पानी को लेकर रुदन चौमासे से पहले भी था, चौमासे के दौरान भी और अब आगे यह चौमासे के बाद भी जारी रहने वाला है। यह अब बारहमासी क्रम है; मगर क्यों? आइए, सोचें।

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    (2003 का अधिनियम संख्यांक 17)


    {30 जनवरी, 2003}


    भारत के राज्य क्षेत्रीय सागर-खण्ड, महाद्वीपीय मग्नतट भूमि, अनन्य आर्थिक क्षेत्र और अन्य सामुद्रिक क्षेत्र में खनिज स्रोतों के विकास और विनियमन का तथा उससे सम्बन्धित या उसके आनुषंगिक विषयों का उपबन्ध करने के लिये अधिनियम

    भारत गणराज्य के तिरपनवें वर्ष में संसद द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनयिमत हो:-

    अध्याय 1


    प्रारम्भिक


    1. संक्षिप्त नाम और प्रारम्भ


    (1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम अपतट क्षेत्र खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 2002 है।

    (2) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे।

    2. संघ के नियंत्रण की समीचीनता के बारे में घोषणा


    यह घोषित किया जाता है कि लोकहित में यह समीचीन है कि संघ को, अपतट क्षेत्रों में खानों के विनियमन और खनिजों के विकास को, इसमें इसके पश्चात दी गई सीमा तक अपने नियंत्रण में ले लेना चाहिए।

    3. लागू होना


    (1) यह अधिनियम अपतट क्षेत्रों में सभी खनिजों को जिनके अन्तर्गत खनिज तेलों और उससे सम्बन्धित हाइड्रोकार्बनों के सिवाय, परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962 (1962 का 33) की धारा 2 की उपधारा (1) के खण्ड (छ) के अधीन अधिसूचना द्वारा विहित कोई खनिज भी है, लागू होगा।

    (2) इस अधिनियम में अन्यथा उपबन्धित के सिवाय, इस अधिनियम के उपबन्ध अपतट क्षेत्रों में तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अतिरिक्त होंगे न कि उसके अल्पीकरण में।

    4. परिभाषाएँ


    इस अधिनियम में, जब तक कि सन्दर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

    (क) “प्रशासनिक प्राधिकारी” से इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिये केन्द्रीय सरकार द्वारा राजपत्र में अधिसूचित कोई प्राधिकारी अभिप्रेत है;

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    (2003 का अधिनियम संख्यांक 18)


    (5 फरवरी, 2003)


    जैवविविधता के संरक्षण, इसके अवयवों के सतत उपयोग और जैव संसाधनों, ज्ञान के उपयोग से उद्भूत फायदों से उचित और साम्यापूर्ण हिस्सा बँटाने और उससे सम्बन्धित या उसके आनुषंगिक विषयों का उपबन्ध करने के लिये अधिनियम

    भारत जैवविविधता और उससे सम्बन्धित सहबद्ध पारम्परिक और समसामयिक ज्ञान पद्धति में समृद्ध है:

    और भारत 5 जून, 1992 को रियो डी जेनेरो में हस्ताक्षर किये गए जैवविविधता से सम्बन्धित संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन मे एक पक्षकार हैः

    और उक्त कन्वेशन 29 दिसम्बर, 1993 को प्रवृत्त हुआः

    और उक्त कन्वेशन में राज्यों के अपने जैव संसाधनों पर सम्प्रभु अधिकारों की पुनः अभिपुष्टि की गई हैः और उक्त कन्वेशन का मुख्य उद्देश्य जैवविविधता का संरक्षण, इसके अवयवों का सतत उपयोग और आनुवंशिक संसाधनों के उपयोग से उद्भूत फायदों में उचित और साम्यापूर्ण हिस्सा बँटाना हैः

    और आनुवांषिक संसाधनों के संरक्षण, सतत उपयोग और उनके उपयोग से उद्भूत फायदे में साम्यापूर्ण हिस्सा बँटाने और उक्त कन्वेशन को प्रभावी करने के लिये भी उपबन्ध करना आवश्यक समझा गया हैः

    भारत गणराज्य के तिरपनवें वर्ष में संसद द्वारा निम्नलिखत रूप में यह अधिनियमित हो:-

    अध्याय 1


    प्रारम्भिक


    1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ


    (1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम जैवविविधता अधिनियम, 2002 है।
    (2) इसका विस्तार सम्पूर्ण भारत पर है।
    (3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे।

    परन्तु इस अधिनियम के भिन्न-भिन्न उपबन्धों के लिये भिन्न-भिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी और ऐसे किसी उपबन्ध में इस अधिनियम के प्रारम्भ के प्रति किसी निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस उपबन्ध के प्रवर्तन में आने के प्रति निर्देश है।

    2. परिभाषाएँ

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    Source: 
    इण्डिया वाटर पोर्टल (हिन्दी)

    हिमालयी क्षेत्र सदियों से पानी, पहाड़ों, नदियों, जलवायु, जैवविविधता एवं वृहत्त सांस्कृतिक विविधता का मूल रहा है। लेकिन गंगा-यमुना नदियों का उद्गम स्थल उत्तराखण्ड, जो समस्त उत्तर भारत को सिंचता है, आज खुद प्यासा है।

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    वायु प्रदूषणवायु प्रदूषणलांसेट मेडिकल जर्नल की रिपोर्ट को मानें तो भारत की आबो-हवा इतनी दूषित हो गई है कि सर्वाधिक मौतों का कारण बन रही है। इस रिपोर्ट के मुताबिक 2015 में भारत में करीब 25 लाख लोगों की मौत प्रदूषण जनित बीमारियों की वजह से हुई है। विश्व के अन्य किसी देश में इतनी मौतें प्रदूषण के कारण नहीं हुई है।

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    Author: 
    अमरनाथ

    बाढ़ तो उतर गई लेकिन संकट नहींबाढ़ तो उतर गई लेकिन संकट नहींबिहार में बाढ़ के बाद जलजनित बीमारियों की महामारी फैलने की हालत है। हर दूसरे घर में कोई-न-कोई बीमार है। लेकिन स्वास्थ्य और स्वच्छता के इन्तजाम कहीं नजर नहीं आते। इस बार बाढ़ के दौरान बचाव और राहत के इन्तजामों में सरकार की घोर विफलता उजागर हुई। बाढ़ पूर्व तैयारी कागजों में सीमटी नजर आई तो बाढ़ के बाद सरकारी सहायता और मुआवजा देने में सहज मानवीय संवेदना के बजाय कागजी खानापूरी का जोर है।

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    (2005 का अधिनियम संख्यांक 24)


    (23 दिसम्बर 2005)


    तटीय क्षेत्रों में तटीय जलकृषि से सम्बन्धित क्रियाकलापों का विनियमन करने के लिये तटीय जलकृषि प्राधिकरण की स्थापना और उससे सम्बन्धित या उसके आनुषंगिक विषयों का उपबन्ध करने के लिये अधिनियम

    भारत गणराज्य के छप्पनवें वर्ष में संसद द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित होः-

    अध्याय 1


    प्रारम्भिक


    1. संक्षिप्त नाम और प्रारम्भ


    (1) इस अधिनियम का संक्षिप्त का नाम तटीय जलकृषि प्राधिकरण अधिनियम, 2005 है।

    (2) धारा 27 के उपबन्ध तुरन्त प्रवृत्त होंगे और इस अधिनियम के शेष उपबन्ध उस तारीख को प्रवृत्त होंगे जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे।

    2. परिभाषाएँ


    (1) इस अधिनियम में जब तक कि सन्दर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

    (क) ‘‘प्राधिकरण’’ से धारा 4 की उपधारा (1) के अधीन स्थापित तटीय जलकृषि प्राधिकरण अभिप्रेत है;
    (ख) ‘अध्यक्ष’ से प्राधिकरण का अध्यक्ष अभिप्रेत है;
    (ग) ‘तटीय जलकृषि’ से तटीय क्षेत्रों में, तालों, बाड़ों और अहातों में नियंत्रित या अन्यथा दशाओं के अधीन लवणीय या खारे जल में श्रिम्प (चिंगर), झींगा, मछली या किसी अन्य जलीय जीव का पालन करना अभिप्रेत है; किन्तु इसके अन्तर्गत ताजा जल में जलकृषि नहीं है;
    (घ) ‘तटीय क्षेत्र’ से ऐसा क्षेत्र अभिप्रेत है जो भारत सरकार के पर्यावरण और वन मंत्रालय (पर्यावरण, वन और वन्यजीव विभाग) की अधिसूचना सं. का. आ. 114 (अ), तारीख 19 फरवरी, 1991 में तत्समय तट विनियमन जोन के रूप में घोषित किया गया है और इसके अन्तर्गत ऐसा अन्य क्षेत्रों भी है जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट करे;
    (ङ) ‘सदस्य’ से धारा 4 की उपधारा (3) के अधीन नियुक्त प्राधिकरण का सदस्य अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत अध्यक्ष और सदस्य-सचिव भी है;
    (च) ‘विहित’ से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है; और

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    (2005 का अधिनियम संख्यांक 42)


    05 सितम्बर, 2005


    देश के ग्रामीण क्षेत्रों में गृहस्थियों की आजीविका की सुरक्षा को, प्रत्येक गृहस्थी को, जिसके वयस्क सदस्य अकुशल शारीरिक कार्य करने के लिये स्वेच्छा से आगे आते हैं, प्रत्येक वित्तीय वर्ष में कम-से-कम सौ दिनों का गारंटीकृत मजदूरी नियोजन उपलब्ध कराकर, वर्धित करने तथा उससे संसक्त या उसके आनुषंगिक विषयों का उपबन्ध करने के लिये अधिनियम

    भारत गणराज्य के छप्पनवें वर्ष में संसद द्वारा निम्नलिखित रूप में अधिनियमित होः-

    अध्याय 1


    प्रारम्भिक


    1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ


    (1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम 1(महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) 2005 है।
    (2) इसका विस्तार2***सम्पूर्ण भारत पर है।
    (3) यह उस तारीख 3-4को प्रवृत्त होगा जिसे केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे; और विभिन्न राज्यों या किसी राज्य में विभिन्न क्षेत्रों के लिये विभिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी तथा ऐसे किसी उपबन्ध में, इस अधिनियम के प्रारम्भ के प्रति किसी निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह, यथास्थिति, ऐसे राज्य या ऐसे क्षेत्र में उस उपबन्ध के प्रवृत्त होने के प्रति निर्देश हैः

    परन्तु यह अधिनियम उस सम्पूर्ण राज्यक्षेत्र, को जिस पर इसका विस्तार है, इस अधिनियम के अधिनियमन की तारीख से पाँच वर्ष की कालावधि के भीतर लागू होगा।

    2. परिभाषाएँ


    इस अधिनियम में जब तक कि सन्दर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

    (क) ‘वयस्क’ से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जिसने अठारह वर्ष की आयु पूरी कर ली है;
    (ख) ‘आवेदक’ से किसी गृहस्थी का प्रमुख या उसके अन्य वयस्क सदस्यों में से कोई अभिप्रेत है,जिसने स्कीम के अधीन नियोजन के लिये आवेदन किया है;
    (ग) ‘ब्लाक’ से किसी जिले के भीतर कोई सामुदायिक विकास क्षेत्रों अभिप्रेत है, जिसमें ग्राम पंचायतों का एक समूह है;

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    कॉप 23कॉप 23बॉन में 6 नवम्बर से आगामी 17 नवम्बर तक चलने वाले जलवायु परिवर्तन सम्मेलन से पर्यावरण में हो रहे प्रदूषण और कार्बन उर्त्सजन को कम करने की दिशा में दुनिया को खासी उम्मीदें हैं। हो भी क्यों न क्योंकि पेरिस सम्मेलन में दुनिया के तकरीब 190 देशों ने वैश्विक तापमान बढ़ोत्तरी को दो डिग्री के नीचे हासिल करने पर सहमति व्यक्त की थी।

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    छत्तीसगढ़ में किसानों को भूजल के इस्तेमाल पर प्रतिबन्धछत्तीसगढ़ में किसानों को भूजल के इस्तेमाल पर प्रतिबन्ध05 नवम्बर को एक एजेंसी के हवाले से छपी एक खबर के मुताबिक, छत्तीसगढ़ राज्य सरकार ने रबी की फसलों के लिये भूजल के उपयोग पर प्रतिबन्ध लगा दिया है। राज्य सरकार ने छत्तीसगढ़ में धान की खेती पर प्रतिबन्ध का भी आदेश जारी कर दिया गया है। छत्तीसगढ़ किसान सभा इसका कड़ा विरोध कर रही है।

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