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    कावेरी विवाद का जिन्न फिर आया बाहरRuralWaterFri, 05/04/2018 - 18:59


    कावेरी नदीकावेरी नदी (फोटो साभार - विकिपीडिया)कावेरी विवाद का जिन्न एक बार फिर बाहर आता मालूम पड़ रहा है वजह है सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू करने के प्रति केन्द्र सरकार की उदासीनता। विगत दिनों जल विवाद पर तेवर तल्ख करते हुए कोर्ट ने केन्द्र सरकार को फटकार लगाया है। विवाद पर कड़ा रुख अख्तियार करते हुए यह आदेश दिया कि तमिलनाडु को तत्काल 2 टीएमसी पानी छोड़ा जाये। आदेश का पालन न होने पर कोर्ट ने कठोर कार्रवाई करने की भी चेतावनी दी है।

    मालूम हो कि कोर्ट ने फरवरी में कावेरी जल विवाद पर राज्यों के बीच जल बँटवारे के सम्बन्ध में फैसला सुनाया था। फैसले में प्रभावित राज्यों के बीच केन्द्र द्वारा जल बँटवारे के लिये एक स्कीम बनाने की बात कही गई थी। इसके लिये कोर्ट ने सरकार को एक माह का समय दिया था। अवधि के बीत जाने के बाद तमिलनाडु ने पिटीशन फाइल कर सुप्रीम कोर्ट से इस मामले में हस्तक्षेप करने का आग्रह किया था।

    इस मसले पर कोर्ट ने केन्द्र सरकार को 3 मई तक जवाब दाखिल करने का आदेश दिया था। पर सरकार ने इस दिशा में कोई पहल नहीं की। इस मामले की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने केन्द्र सरकार फटकार लगाया और 8 मई तक जवाब दाखिल करने को आदेश दिया है। हालांकि कोर्ट में सरकार का पक्ष रखते हुए भारत के अटॉर्नी जनरल के के. वेणुगोपाल ने स्कीम न बन पाने का कारण प्रधानमंत्री एवं मंत्रिमंडल के सहयोगियों के कर्नाटक चुनाव में व्यस्त होना बताया। उन्होंने मामले की सुनवाई के लिये कोर्ट से 12 मई के बाद की तारीख मुकर्रर करने की गुजारिश की लेकिन कोर्ट ने इनकार कर दिया।

    कोर्ट में तमिलनाडु का पक्ष रख रहे काउंसल शेखर नफडे ने कहा कि गर्मी बढ़ने के साथ ही तमिलनाडु में कावेरी जल बँटवारा को लेकर भी लोगों में रोष बढ़ रहा है इसलिये मसले को जल्द सुलझाया जाना चाहिए। नफडे द्वारा दिये गए तर्कों को सही ठहराते हुए कोर्ट ने केन्द्र से कहा कि वह अपनी जिम्मेवारी से भाग नहीं सकता और उसे जल बँटवारे लिये स्कीम बनानी ही होगी।

    मालूम हो कि कावेरी जल विवाद पर 16 फरवरी को फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने कहा था कि पानी पर किसी भी स्टेट का मालिकाना हक नहीं बनता है। जल देश की सम्पत्ति है। फैसला सुनते हुए कोर्ट ने कर्नाटक को बिलिगुंडलू डैम से तमिलनाडु को 177.25 टीएमसी पानी छोड़ने आदेश दिया था।

    बंगलुरु में पानी की माँग को देखते हुए कोर्ट ने तमिलनाडु के हिस्से से 14.75 टीएमसी पानी की कटौती कर दी थी वहीं कर्नाटक के हिस्से में इतने ही हिस्से की बढ़ोत्तरी का आदेश दिया था। कावेरी नदी कर्नाटक के कुर्ग जिले में स्थित ब्रम्हगिरी पर्वत से निकलती है और तमिलनाडु, केरल और पांडिचेरी होते हुए सागर में समा जाती है। कावेरी बेसिन में कर्नाटक का 32 हजार वर्ग किलोमीटर और तमिलनाडु का 44 हजार वर्ग किलोमीटर का इलाका आता है।

    सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कर्नाटक को 284.75 तमिलनाडु को 404.25 टीएमसी, केरल को 30 टीएमसी और पुदुचेरी को 7 टीएमसी पानी मिलेगा। कोर्ट का यह फैसला 15 साल के लिये लागू रहेगा। इस जल विवाद की शुरुआत 19 शताब्दी के अन्त में अंग्रेजी शासन के दौरान हुई। शताब्दी के अन्त में मद्रास प्रेसीडेंसी और मैसूर के राजा के बीच उपजे इस विवाद को 1924 में सुलझाया गया।

    लेकिन 1956 में तमिलनाडु और कर्नाटक के अलग हो जाने पर यह फिर सिर उठाने लगा और राज्यों के बीच कोई समझौता नहीं हो सका। इस विवाद ने और तूल पकड़ा जब केरल और पुदुचेरी भी इसमें शामिल हो गए। 1976 में चारों राज्यों के बीच समझौता हुआ लेकिन विवाद नहीं सुलझ पाया। अन्ततः विवाद के निपटारे के लिये केन्द्र सरकार ने 1990 में कावेरी जल विवाद ट्रिब्यूनल बनाया। ट्रिब्यूनल ने 2007 में फैसला सुनाया था लेकिन इसे न मानते हुए कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी।

    क्या है विवाद

    एक अनुमान के तहत कावेरी में 740 टीएमसी पानी इस्तेमाल के लिये उपलब्ध है जो नदी के एरिया में पड़ने वाले चारों राज्यों से इकठ्ठा होता है। विवाद की वजह है कर्नाटक और तमिलनाडु के इलाकों से नदी में डाले जाने वाली पानी और बँटवारे में मिलने वाले पानी की मात्रा में भिन्नता। उपलब्ध आँकड़े के अनुसार कर्नाटक नदी में 462 टीएमसी पानी डालता है जबकि उसे 270 टीएमसी पानी ही मिल पता था। तमिलनाडु 227 टीएमसी पानी डालता है जबकि उसे उपयोग के लिये 419 टीएमसी पानी मिलता था। केरल 51 टीएमसी पानी डालता है जबकि उसे 30 टीएमसी पानी इस्तेमाल के लिये मिलता था।

    कर्नाटक की आपत्ति यह थी कि नदी में ज्यादा पानी डालने के बाद भी उसे तमिलनाडु से काम पानी इस्तेमाल करने की इजाजत क्यों दी गई है। ट्रिब्यूनल ने भी अपने फैसले में तमिलनाडु को 192 टीएमसी पानी इस्तेमाल करने की इजाजत दी थी जो कर्नाटक से ज्यादा थी। इसी मुद्दे को लेकर तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल ने ट्रिब्यूनल के फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

    कावेरी फैक्ट फाइल

    कावेरी कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल से होते हुए पुदुचेरी के कराइकल के पास पहुँचकर समुद्र में मिल जाती है।

    नदी कुल 800 मीटर की दूरी तय करती है और कर्नाटक के कुर्ग इलाके से निकलती है जो पश्चिमी घाट में पड़ता है।

     

     

     

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    सावधान अब और भी घातक हो सकता है डेंगू RuralWaterMon, 05/07/2018 - 18:42


    एडीज एजिप्टीएडीज एजिप्टी (फोटो साभार - विकिपीडिया)यदि आपके पति डेंगू से ग्रसित हैं तो सावधान हो जाइए क्योंकि यह आपको भी प्रभावित कर सकता है। जी हाँ ऐसा सम्भव है। पिछले दिनों ब्रिटेन में जब डेंगू से ग्रसित इटैलियन आदमी के सीमेन का परीक्षण किया गया तो उसमें डेंगू के वायरस पाये गए। डेंगू के मरीज के सीमेन में इस बीमारी के वायरस पाये जाने की विश्व में यह पहली घटना है।

    यूरो-सर्विलांस नामक जर्नल में प्रकाशित रिपोर्ट में इस बात की पुष्टि की गई है। रिपोर्ट में बताया गया है कि डेंगू से प्रभावित आदमी के थाईलैंड दौरे से लौटने के बाद उसमें इस बीमारी के लक्षण पाये गए। प्रभावित व्यक्ति का इलाज 9 दिनों तक किये जाने के बाद भी जब बीमारी के लक्षण पूरी तरह नहीं गए तब उसके यूरिन और सीमेन का सैम्पल नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एलर्जी एंड इंफेक्शियस डिजीजेज (National Institute of Allergy and Infectious Diseases) में परीक्षण के लिये भेजा गया।

    इंस्टीट्यूट के वायरोलॉजी डिपार्टमेंट (Virology Department) में जब सीमेन का परीक्षण किया गया तो उसमें डेंगू के वायरस पाये गए। इतना ही नहीं प्रभावित के सीमेन में पाये जाने वाले कुल वायरस की संख्या 27 थी। इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने इस जानकारी के बाद जब और गम्भीरता से परीक्षण किया तो पाया कि सीमेन में वायरस कुल 37 दिनों तक कार्यशील अवस्था में रहे।

    वैज्ञानिकों ने डेंगू वायरस सम्बन्धी इस रहस्योद्घाटन के बाद इसकी तुलना जीका से की है। जीका भी डेंगू की तरह ही मच्छर के काटने से होता है। इस बीमारी से प्रभावित पुरुष के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाने पर महिलाएँ भी इससे प्रभावित हो जाती हैं। हाल में ही न्यू इंग्लैंड जर्नल फॉर मेडिसिन (New England Journal for Medicine) में प्रकाशित एक रिपोर्ट में इस बात की पुष्टि की गई है।

    रिपोर्ट में कहा गया है कि सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (center for disease control and prevention) से जुड़े वैज्ञानिकों ने इस बात का पता लगाने के लिये, जीका से प्रभावित 184 लोगों के सीमेन का सैम्पल इकट्ठा किया और उनमें कई पॉजिटिव पाये गए। जीका वायरस से प्रभावित महिलाओं के गर्भ में पल रहे बच्चे भी इस बीमारी की चपेट में आ जाते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि जीका की तरह डेंगू भी भविष्य में सेक्सुअली ट्रांस्मिटेड डिजीज (sexually transmitted diseases) की श्रेणी में आ सकता है।

    डेंगू के वायरस का वाहक मादा एडीज एजिप्टी (Aedes Aegypti) नामक मच्छर होती हैं। इन मच्छरों के काटने से लोग डेंगू वायरस से प्रभावित हो जाते हैं। भारत के लिये इस रिसर्च में सामने आये परिणाम दुखदायी हो सकते हैं।

    केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय (Central Health and Family Welfare Ministry) द्वारा जारी किये गए आँकड़े के अनुसार पिछले दस सालों में 2017 में डेंगू की चपेट में सबसे ज्यादा लोग आये। पिछले साल डेढ़ लाख से ज्यादा लोगों के प्रभावित होने के बाद भी इस बीमारी से होने वाली मौतों की संख्या 300 थी। डेंगू के वायरस चार प्रकार के होते हैं जिनकी कोडिंग एक से चार तक की संख्या में की गई है।

    भारत में ज्यादातर मामले डेंगू तीन और चार टाइप के होते हैं जो कि साधारणतः कम खतरनाक होते हैं। डेंगू वन टाइप सबसे ज्यादा खतरनाक होता है जिसमें खून की उल्टियाँ और हैमरेज तक होने की सम्भावना रहती है। डेंगू के सामान्य लक्षण हैं कमजोरी, बॉडी में रैशेज आना, कमर और शरीर के अन्य जोड़ों में दर्द, उल्टी आना, हृदय गति में अनियमितता आदि। डेंगू के केस अब सालों भर आते रहते हैं। हालांकि बरसात के मौसम में मच्छरों का प्रकोप बढ़ने के साथ ही इसके मरीजों की संख्या में तेजी से बढ़ोत्तरी हो जाती है।

    केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के ताजा आँकड़ों पर गौर करें तो पता चलता है कि 2018 में अब तक डेंगू के 5600 से ज्यादा मामले रिपोर्ट किये जा चुके हैं। अब तक तमिलनाडु में 1450 से ज्यादा मामले रिपोर्ट किये जा चुके हैं जो देश में सबसे ज्यादा है। डेंगू के बढ़ते केसेज का सम्बन्ध जलवायु परिवर्तन से भी है।

    प्राकृतिक संसाधनों के नित हो रहे दोहन और मानवजनित मशीनीकरण का असर लोगों के स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है। शहर तो शहर गाँवों का वातावरण भी दूषित होता जा रहा है। मौसम का मिजाज भी बिल्कुल अप्रत्याशित हो गया है जो विभिन्न रोगों के वायरस आदि को जन्म दे रहा है।

    विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization) भी मौसम में हो रहे बदलाव को रोगों के पनपने का कारण मानता है। डेंगू का वायरस इस बीमारी से प्रभावित लोगों के बोन मैरो को भी प्रभावित कर रहा है। यह लोगों की लाल और सफेद रक्त कणिका दोनों को ही प्रभावित करता है। इन रक्त कणिकाओं के प्रभावित होने से व्यक्ति का शरीर कमजोर हो जाता है प्लेटलेट्स (Platelets) की संख्या कम हो जाती है। इसी वजह से डेंगू से प्रभावित व्यक्ति की मौत तक हो जाती है।


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    Submitted by HARSHVARDHAN S… (not verified) on Mon, 05/07/2018 - 23:48

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    आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर और ब्लॉग बुलेटिनमें शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

    Submitted by AMIT KUMAR (not verified) on Tue, 05/08/2018 - 16:48

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    KOI BHI SIKYAT NHI SB SHI HAI

    Submitted by adv ydv (not verified) on Sun, 05/20/2018 - 21:04

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    जैव विविधता है भारत की धरोहर

    editorialSat, 06/09/2018 - 13:18


    अन्तरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस, 22 मई 2018 पर विशेष

    जैवविविधताजैवविविधता (फोटो साभार - आस्कआईआईटीयन्स)जिस तरह से आज पूरी दुनिया वैश्विक प्रदूषण से जूझ रही है और कृषि क्षेत्र में उत्पादन का संकट बढ़ रहा है, उससे जैवविविधता का महत्त्व बढ़ गया है। लिहाजा, हमें जैविक कृषि को बढ़ावा देने के साथ ही बची हुई प्रजातियों के संरक्षण की जरूरत है क्योंकि 50 से अधिक प्रजातियाँ प्रतिदिन विलुप्त होती जा रही हैं।यह भारत समेत पूरी दुनिया के लिये चिन्ता का विषय है। शायद इसीलिये नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस जर्नल (National Academy of Science Journal) में छपे शोध पत्र में धरती पर जैविक विनाश को लेकर आगाह किया गया है।

    करीब साढ़े चार अरब वर्ष की हो चुकी यह धरती अब तक पाँच महाविनाश देख चुकी है। विनाश के इस क्रम में लाखों जीवों और वनस्पितियों की प्रजातियाँ नष्ट हुईं। पाँचवाँ कहर जो पृथ्वी पर बरपा था उसने डायनासोर जैसे महाकाय प्राणी का भी अन्त कर दिया था। इस शोध पत्र में दावा किया गया है कि अब धरती छठे विनाश के दौर में प्रवेश कर चुकी है। इसका अन्त भयावह होगा क्योंकि अब पक्षियों से लेकर जिराफ तक हजारों जानवरों की प्रजातियों की संख्या कम होती जा रही है।

    वैज्ञानिकों ने जानवरों की घटती संख्या को वैश्विक महामारी करार देते हुए इसे छठे महाविनाश का हिस्सा बताया है। बीते पाँच महाविनाश प्राकृतिक घटना माने जाते रहे हैं लेकिन वैज्ञानिक छठे महाविनाश की वजह, बड़ी संख्या में जानवरों के भौगोलिक क्षेत्र छिन जाने और पारिस्थितिकी तंत्र का बिगड़ना बता रहे हैं।

    स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफसर पाल आर इहरीच और रोडोल्फो डिरजो नाम के जिन दो वैज्ञानिकों ने यह शोध तैयार किया है उनकी गणना पद्धति वही है जिसे इंटरनेशनल यूनियन ऑफ कंजर्वेशन ऑफ नेचर (International Union of Conservation of Nature) जैसी संस्था अपनाती है। इसकी रिपोर्ट के मुताबिक 41 हजार 415 पशु-पक्षियों और पेड़-पौधों की प्रजातियाँ खतरे में हैं।

    इहरीच और रोडोल्फो के शोध पत्र के मुताबिक धरती के 30 प्रतिशत कशेरूकीय प्राणी विलुप्त होने के कगार पर हैं। इनमें स्तनपायी, पक्षी, सरीसृप और उभयचर प्राणी शामिल हैं। इस ह्रास के क्रम में चीतों की संख्या 7000 और ओरांगउटांग 5000 ही बचे हैं। इससे पहले के हुए पाँच महाविनाश प्राकृतिक होने के कारण धीमी गति के थे परन्तु छठा विनाश मानव निर्मित है इसलिये इसकी गति बहुत तेज है। ऐसे में यदि तीसरा विश्व युद्ध होता है तो विनाश की गति तांडव का रूप ले सकती है।

    इस लिहाज से इस विनाश की चपेट में केवल जीव-जगत की प्रजातियाँ ही नहीं बल्कि अनेक मानव प्रजातियाँ, सभ्यताएँ और संस्कृतियाँ भी आएँगी। शोध पत्र की चेतावनी पर गम्भीर बहस और उसे रोकने के उपाय को अमल में लाया जाना जरूरी है। परन्तु जलवायु परिवर्तन को लेकर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के रवैए से ऐसा मालूम पड़ता है कि दुनिया के सभी महत्त्वपूर्ण देश शायद ही इसे गम्भीरता से लेंगे।

    छठा महाविनाश मानव निर्मित बताया जा रहा है इसलिये हम मानव का प्रकृति में हस्तक्षेप कितना है इसकी पड़ताल कर लेते हैं। एक समय था जब मनुष्य वन्य पशुओं के भय से गुफाओं और पेड़ों पर आश्रय ढूँढता फिरता था लेकिन ज्यो-ज्यों मानव प्रगति करता गया प्राणियों का स्वामी बनने की उसकी चाह बढ़ती गई। इसी चाहत का परिणाम है कि पशु असुरक्षित होते गए।

    वन्य जीव विशेषज्ञों ने ताजा आँकड़ों के आधार पर यह निष्कर्ष निकला है कि पिछली तीन शताब्दियों में मनुष्य ने अपने निजी हितों की रक्षा के लिये लगभग 200 जीव-जन्तुओं का अस्तित्व ही मिटा दिया। भारत में वर्तमान में करीब 140 जीव-जंतु संकटग्रस्त अवस्था में हैं। ये संकेत वन्य प्राणियों की सुरक्षा की गारंटी देने वाले राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य और चिड़ियाघरों की सम्पूर्ण व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं?

    आँकड़े बताते हैं कि पंचांग (कैलेण्डर) के शुरू होने से 18वीं सदी तक प्रत्येक 55 वर्षों में एक वन्य पशु की प्रजाति लुप्त होती रही। वहीं, 18वीं से 20वीं सदी के बीच प्रत्येक 18 माह में एक वन्य प्राणी की प्रजाति नष्ट हो रही है जिन्हें पैदा करना मनुष्य के बस की बात नहीं। वैज्ञानिक क्लोन पद्धति से डायनासोर को धरती पर फिर से अवतरित करने की कोशिश में जुटे हैं, लेकिन अभी इस प्रयोग में कामयाबी नहीं मिली है।

    क्लोन पद्धति से भेड़ का निर्माण कर लेने के बाद से वैज्ञानिक इस अहंकार में हैं कि वह लुप्त हो चुकी प्रजातियों को फिर से अस्तित्व में ले आएँगे। चीन ने क्लोन पद्धति से दो बन्दरों के निर्माण का दावा किया है। बावजूद इसके इतिहास गवाह है कि मनुष्य कभी प्रकृति से जीत नहीं पाया है। मनुष्य यदि अपनी वैज्ञानिक उपलब्धियों के अहंकार से बाहर नहीं निकला तो विनाश का आना लगभग तय है। प्रत्येक प्राणी का पारिस्थितिकी तंत्र, खाद्य शृंखला और जैवविविधता की दृष्टि से विशेष महत्त्व होता है जिसे कम करके नहीं आँका जाना चाहिए। क्योंकि इसी पारिस्थितिकी तंत्र और खाद्य शृंखला पर मनुष्य का अस्तित्व टिका है।

    भारत में फिरंगियों द्वारा किये गए निर्दोष प्राणियों के शिकार की फेहरिस्त भले ही लम्बी हो पर उनके संरक्षण की पैरवी भी उन्हीं ने की थी। 1907 में पहली बार सर माइकल कीन ने जंगलों को प्राणी अभयारण्य बनाए जाने पर विचार किया जिसे सर जॉन हिबेट ने इसे खारिज कर दिया था। फिर इआर स्टेवान्स ने 1916 में कालागढ़ के जंगल को प्राणी अभयारण्य में तब्दील करने का विचार रखा किन्तु कमिश्नर विन्डम के जबरदस्त विरोध के कारण मामला फिर ठंडे बस्ते में बन्द हो गया।

    1934 में गवर्नर सर माल्कम हैली ने कालागढ़ के जंगल को कानूनी संरक्षण देते हुए राष्ट्रीय प्राणी उद्यान बनाने की बात कही। हैली ने मेजर जिम कॉर्बेट से परामर्श करते हुए इसकी सीमाएँ निर्धारित की और 1935 में यूनाईटेड प्रोविंस (वर्तमान उत्तर-प्रदेश एवं उत्तराखंड) नेशनल पार्क एक्ट पारित हुआ और यह अभयारण्य भारत का पहला राष्ट्रीय वन्य प्राणी उद्यान बना। यह हैली के प्रयत्नों से बना था इसलिये इसका नाम ‘हैली नेशनल पार्क’ रखा गया। बाद में उत्तर प्रदेश सरकार ने जिम कॉर्बेट की याद में इसका नाम ‘कॉर्बेट नेशनल पार्क’ रख दिया। इस तरह से भारत में राष्ट्रीय उद्यानों की बुनियाद फिरंगियों ने रखी।

    भारत का आधिपत्य दुनिया के मात्र 2.4 प्रतिशत भू-भाग पर है। बावजूद इसके यह दुनिया की सभी ज्ञात प्रजातियों के सात से आठ प्रतिशत हिस्से का निवास स्थान है जिसमें पेड़-पौधों की 45 हजार और जीवों की 91 हजार प्रजातियाँ शामिल हैं। पेड़-पौधों और जीवों की प्रजातियों की संख्या भारत की जैवविविधता की दृष्टि से सम्पन्नता को दर्शाती है।

    खेती की बात करें तो कुछ दशकों से पैदावार बढ़ाने के लिये रसायनों के प्रयोग इतने बढ़ गए हैं कि कृषि आश्रित जैवविविधता को बड़ी हानि पहुँची है। आज हालात इतने बदतर हो गए हैं कि प्रतिदिन 50 से अधिक कृषि प्रजातियाँ नष्ट हो रही हैं। हरित क्रान्ति ने हमारी अनाज से सम्बन्धित जरूरतों की पूर्ति तो की पर रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाओं के प्रयोग ने भूमि की सेहत खराब कर दी। इसका प्रतिफल यह हुआ कि कई अनाज की प्रजातियाँ नष्ट हो गईं। अब फसल की उत्पादकता बढ़ाने के बहाने जीएम बीजों का प्रयोग भी जैवविविधता को नष्ट करने की प्रक्रिया को बढ़ा सकता है।

    वर्तमान में जिस रफ्तार से वनों की कटाई चल रही है उससे तय है कि 2125 तक जलावन की लकड़ी की भीषण समस्या पैदा होगी। आँकड़े बताते हैं कि प्रतिवर्ष करीब 33 करोड़ टन लकड़ी का इस्तेमाल ईंधन के रूप में होता है। देश की अधिकांश ग्रामीण आबादी ईंधन के लिये लकड़ी पर निर्भर है।

    केन्द्र सरकार की उज्ज्वला योजना ईंधन के लिये लकड़ी पर निर्भरता को कम करने के लिये एक कारगर उपाय साबित हो सकती है। इसके अलावा सरकार को वनों के निकट स्थित गाँवों में ईंधन की समस्या दूर करने के लिये गोबर गैस संयंत्र लगाने और प्रत्येक घर तक विद्युत कनेक्शन पहुँचाने पर भी बल देने की जरूरत है।

    पालतू पशु इन्हीं वनों में घास चरते हैं अतः यह ग्रामीणों को सस्ती दरों पर उपलब्ध कराई जानी चाहिए। घास की कटाई गाँव के मजदूरों से कराई जानी चाहिए ताकि गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करने वाले ग्रामीण और उनके परिवार के भरण-पोषण के लिये धन सुलभ हो सके। ऐसी उम्मीद की जा सकती है कि इन उपायों से बड़ी मात्रा में जैवविविधता का संरक्षण होगा।

    एक समय हमारे यहाँ चावल की अस्सी हजार किस्में थीं लेकिन अब इनमें से कितनी शेष रह गई हैं इसके आँकड़े कृषि विभाग के पास नहीं हैं। जिस तरह सिक्किम पूर्ण रूप से जैविक खेती करने वाला देश का पहला राज्य बन गया है इससे अन्य राज्यों को प्रेरणा लेने की जरूरत है। कृषि भूमि को बंजर होने से बचाने के लिये भी जैविक खेती को बढ़ावा देने की जरूरत है।

    मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़, देश के ऐसे राज्य हैं जहाँ सबसे अधिक वन और प्राणी संरक्षण स्थल हैं। प्रदेश के वनों का 11 फीसदी से अधिक क्षेत्र उद्यानों और अभयारण्यों के लिये सुरक्षित है। ये वन विंध्य-कैमूर पर्वत के अन्तिम छोर तक यानि दमोह से सागर तक, मुरैना में चंबल और कुँवारी नदियों के बीहड़ों से लेकर कूनो नदी के जंगल तक, शिवपुरी का पठारी क्षेत्र, नर्मदा के दक्षिण में पूर्वी सीमा से लेकर पश्चिमी सीमा बस्तर तक फैले हुए हैं।

    देश में सबसे ज्यादा वन और प्राणियों को संरक्षण देने का दावा करने वाले ये राज्य, वन संरक्षण अधिनियम 1980 का उल्लंघन भी धड़ल्ले से कर रहे हैं। साफ है कि जैवविविधता पर संकट गहराया हुआ है। जैवविविधता बनाए रखने के लिये जैविक खेती को भी बढ़ावा देना होगा जिससे कृषि सम्बन्धी जैवविविधता नष्ट न हो।

     

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    Submitted by Anil Kumar Agrawal (not verified) on Sun, 06/03/2018 - 23:05

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    Aaj jungle nahi laga sakte to bagan lagana jaruri hai.

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    मछलियों के बदले मिलेगा प्लास्टिकeditorialSat, 06/09/2018 - 14:54


    विश्व पर्यावरण दिवस, 05 जून, 2018 पर विशेष

    विश्व पर्यावरण दिवसविश्व पर्यावरण दिवसयह ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ हमारे लिये खास है क्योंकि इसकी मेजबानी इस बार भारत के कन्धों पर है। इस वर्ष का थीम ‘बीट प्लास्टिक पॉल्यूशन’ (Beat Plastic Pollution) पर आधारित है। इस थीम का मूल उद्देश्य सिंगल यूज्ड (Single Used) प्लास्टिक के इस्तेमाल को कम करना है जो समुद्री सतह पर प्लास्टिक कचरे के जमाव का मूल कारण है।संयुक्त राष्ट्र द्वारा सौंपी गई इस मेजबानी के कई मायने हैं जैसे पर्यावरण सम्बन्धी मसलों पर विश्व में भारत की बढ़ती पहुँच, देश में बढ़ता प्लास्टिक का इस्तेमाल और सिंगल यूज्ड प्लास्टिक के पुनर्चक्रण (recycling) में विश्व स्तर पर भारत का बढ़ता कद आदि।

    इस वर्ष के थीम पर आने से पहले भारत द्वारा विश्व स्तर पर पर्यावरण को सम्पोषित करने की पहल की चर्चा न करना बेमानी होगी। संयुक्त राष्ट्र द्वारा 5 जून, 1972 को स्विटजरलैंड में आयोजित पहले पर्यावरणीय सम्मेलन में मेजबान राष्ट्र के प्रधानमंत्री ‘ओलफ पाल्मे’ को छोड़कर वहाँ पहुँचने वाली एक मात्र राष्ट्राध्यक्ष इंदिरा गाँधी थीं और यही सम्मेलन विश्व पर्यावरण दिवस की नींव बना। सम्मेलन में इंदिरा गाँधी का जाना पर्यावरणीय मसलों पर भारत की सजगता को दर्शाता है।

    अब हम बात करते हैं ‘बीट प्लास्टिक पॉल्यूशन’ थीम की। क्या आपको मालूम है कि हर वर्ष 13 मिलियन टन प्लास्टिक समुद्र की सतह पर जमा हो रहा है। यह आँकड़ा इतना बड़ा है कि अगर इसी गति से समुद्र में प्लास्टिक कचरे का फैलाव होता रहा तो कुछ ही सालों में यह ‘बीच’ तक भी अपनी पहुँच बना लेगा। संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी आँकड़े के अनुसार प्रति मिनट एक ट्रक प्लास्टिक कचरा समुद्र में डम्प किया जाता है जिसका 50 प्रतिशत हिस्सा सिंगल यूज्ड प्लास्टिक होता है।

    समुद्री सतह में जमा होने वाले इन कचरों का प्रभाव समुद्र के पारिस्थितिकी पर पड़ रहा है। प्लास्टिक बायोडिग्रेडेबल नहीं होता इसीलिये यह हजारों वर्ष अपनी अवस्था में परिवर्तन किये बिना मौजूद रहता है। समुद्री जल की लवणीयता के कारण यह छोटे-छोटे टुकड़ों में बँट जाता है जिसे मछलियाँ या अन्य समुद्री जीव उन्हें आसानी से निगल लेते हैं। शोध बताते हैं कि समुद्री जीवों द्वारा निगला गया यह प्लास्टिक उनके प्रजनन क्षमता को प्रभावित करने के साथ ही उनकी जीवन प्रत्याशा को भी घटाता है।

    प्लास्टिक कचरा समुद्र की सतह पर उगने वाले विभिन्न प्रकार के शैवालों के लिये भी घातक है। यह सूर्य की किरणों को बाधित करता है जो शैवालों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। चूँकि, मनुष्य के आहार का एक अभिन्न हिस्सा समुद्री जीवों और अन्य प्रकार के समुद्री उत्पाद से मिलता है इसीलिये प्लास्टिक के हानिकारक प्रभाव से वह भी बच नहीं सकता है। इससे साफ है कि प्लास्टिक कचरे को समुद्र के सतह पर जमा होने से रोकना कितना महत्वपूर्ण है। यूनाइटेड नेशंस एनवायरनमेंट प्रोग्राम (UNEP) के अनुसार समुद्री प्रदूषण से प्रतिवर्ष 13 बिलियन अमेरिकी डॉलर का नुकसान हो रहा है।

    विश्व स्तर पर जारी किये गये आँकड़े बताते हैं कि वर्ष 2002 से 2016 के बीच दुनिया में प्लास्टिक के उत्पादन में 135 मिलियन मीट्रिक टन की बढ़ोत्तरी हुई है। वर्ष 2002 में प्लास्टिक का उत्पादन 200 मिलियन मीट्रिक टन था वह 2016 में बढ़कर 335 मिलियन मीट्रिक टन हो गया। विश्व के कुल प्लास्टिक उत्पादन का 23 प्रतिशत से अधिक हिस्सा चीन अकेले ही उत्पादित करता है। इस तरह चीन विश्व का सबसे बड़ा प्लास्टिक उत्पादक है।

    प्लास्टिक उत्पादन में भारत का स्थान चीन की तुलना में अभी काफी पीछे है। लेकिन फिक्की द्वारा जारी आंकड़े बताते हैं की पिछले कुछ वर्षों से प्लास्टिक उत्पादन में भारत प्रतिवर्ष 16 प्रतिशत की दर से वृद्धि कर रहा है। या यूँ कहें कि भारत विश्व में प्लास्टिक उत्पादन करने वाले अग्रणी राष्ट्रों की श्रेणी में शामिल होने की ओर अग्रसर है। इतना ही नहीं देश में प्लास्टिक के सामान की बढ़ती माँग को पूरा करने के लिये भारत को प्रतिवर्ष चीन से बड़ी मात्रा में इसका आयात भी करना पड़ता है।

    देश में प्लास्टिक की खपत के वर्तमान ट्रेंड से यह मालूम होता है कि यहाँ कुल प्लास्टिक उपभोग का 24 प्रतिशत हिस्सा पैकेजिंग के लिये इस्तेमाल होता है। वहीं 23 प्रतिशत हिस्सा कृषि क्षेत्र के जरूरी सामान या उपकरणों के निर्माण में, इलेक्ट्रॉनिक सामान के निर्माण में 16 प्रतिशत, घरेलू सामान के निर्माण में 10 प्रतिशत, निर्माण क्षेत्र में 8 प्रतिशत, ट्रांसपोर्ट में 4 प्रतिशत, फर्नीचर में एक प्रतिशत और अन्य जरूरी चीजों के निर्माण में 14 प्रतिशत हिस्से का इस्तेमाल होता है। ऊपर दिये गये आँकड़ों से साफ है कि प्लास्टिक की सबसे ज्यादा खपत पैकेजिंग क्षेत्र में है। पानी, अन्य पेय पदार्थ, खाद्य समाग्री, कॉस्मेटिक आदि की पैकेजिंग पूरी तरह ‘पेट’ (Polyethylene Terephthalate) जो सिंगल यूज्ड प्लास्टिक है पर निर्भर है। पेट प्लास्टिक का इस्तेमाल भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में तेजी से बढ़ रहा है जिसके कारण समुद्र तल में इसका जमाव तेजी से बढ़ता जा रहा है।

    वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के अनुसार अगर प्लास्टिक के इस्तेमाल में कमी नहीं की गई तो 2050 तक समुद्र में मछलियों से ज्यादा प्लास्टिक भर जाएगा। हालांकि, विश्व की तुलना में भारत में प्रतिवर्ष प्रति व्यक्ति प्लास्टिक का इस्तेमाल काफी कम है। भारत में यह आँकड़ा महज 11 किलोग्राम है वहीं विश्व में 28 किलोग्राम है। लेकिन भारत की जनसंख्या के बड़े आकार को देखते हुए यह आँकड़ा काफी बड़ा हो जाता है। इतना ही नहीं समुद्र तटीय क्षेत्रों में बसने वाली जनसंख्या के मामले में भी भारत का चीन के बाद दूसरा नम्बर है।

    भारत में कुल 18.75 करोड़ लोग तटीय क्षेत्र में निवास करते हैं वहीं चीन में यह 26.29 करोड़ है। इससे साफ है कि भारत का समुद्री कचरे में योगदान कम नहीं है। समूचे भारत में प्रतिवर्ष 56 लाख मीट्रिक टन प्लास्टिक कचरे का उत्पादन होता है जिसका एक बड़ा हिस्सा नदी-नालों के माध्यम से समुद्र में जाता है। अतः भारत को भी इस समस्या के प्रति सचेत होने की जरुरत है।

    समुद्र में बढ़ रहे प्लास्टिक के जमाव ने पूरे विश्व का ध्यान प्लास्टिक कचरे के प्रबन्धन की तरफ खींचा है। अमेरिका के कई राज्यों सहित विश्व के कई अग्रणी देशों ने सिंगल यूज्ड प्लास्टिक पर क्रमिक रूप से प्रतिबन्धित करना प्रारम्भ कर दिया है। भारत ने भी इस दिशा में प्रयास शुरू तो किया है लेकिन यहाँ कोई ठोस नियम नहीं है। नियम के तौर पर यह 50 माइक्रॉन से कम मोटाई वाले पॉलिथीन के इस्तेमाल पर प्रतिबन्ध लगाया गया है लेकिन यह नाकाफी साबित हो रहा है। विश्व में फ्रांस ऐसा पहला देश है जिसने 2016 में सिंगल यूज्ड प्लास्टिक को प्रतिबन्धित करने के साथ ही 2025 तक इस तरह के सभी इस्तेमाल को पूरी तरह बन्द करने का निर्णय लिया है। युगांडा ने तो 2008 में ही प्लास्टिक बैग्स के इस्तेमाल को पूरी तरह प्रतिबन्धित कर दिया था।

    जापान, यूरोप के कई देश, अमेरिका सहित भारत आदि ने इस समस्या से निपटने के लिये पेट प्लास्टिक के रीसाइक्लिंग पर जोर देना शुरू किया है। भारत ने इस दिशा में महत्त्वपूर्ण प्रगति किया है। सेंट्रल पॉल्यूशन बोर्ड द्वारा पिछले वर्ष जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार भारत देश में प्रतिवर्ष उत्पादित कुल सिंगल यूज्ड प्लास्टिक के 90 प्रतिशत हिस्से की रीसाइक्लिंग कर लेता है जो विश्व में सर्वाधिक है। सेंट्रल पॉल्यूशन बोर्ड के अनुसार कुल सिंगल यूज्ड प्लास्टिक का 65 प्रतिशत हिस्सा पंजीकृत कम्पनियों द्वारा, 15 प्रतिशत हिस्सा असंगठित क्षेत्र और 10 घरेलू उद्योग से जुड़े फर्म्स द्वारा रीसाइकिल किया जाता है। वहीं जापान में रीसाइक्लिंग का यह प्रतिशत 72, यूरोप में 43 और अमेरिका में 31 प्रतिशत है।

    भारत को विश्व पर्यावरण दिवस 2018 के लिये मिली मेजबानी की एक बड़ी वजह इसके पेट प्लास्टिक को रीसाइकिल करने की क्षमता भी है। इस वर्ष फरवरी में मेजबानी की घोषणा करते हुए संयुक्त राष्ट के अंडर सेक्रेटरी सह पर्यावरणीय शाखा के हेड एरिक सोल्हेम ने भारत के सिंगल यूज्ड प्लास्टिक के रीसाइकिल करने की क्षमता की प्रशंसा की थी। अतः यह कहना गलत नहीं होगा कि भारत को इस अवसर का भरपूर इस्तेमाल कर समुद्र की पारिस्थितिकी को अक्षुण्ण बनाये रखने में अग्रणी भूमिका निभानी चाहिए।

     

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    Submitted by maryrosie (not verified) on Wed, 07/11/2018 - 22:56

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    यह कुछ मूल्यवान युक्तियों के साथ एक महान छोटी पोस्ट है। मैं पूरी तरह सहमत हूँ। जिस तरह से आप जो चीजें करते हैं उसमें जुनून और सगाई लाते हैं, वे वास्तव में लाइव पर अपना दृष्टिकोण बदल सकते हैं।

    novel updates

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    बन्द करो गंगा पर बाँधों का निर्माण - स्वामी सानंद

    editorialSun, 07/01/2018 - 13:02


    स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंदस्वामी ज्ञानस्वरूप सानंदसाल 2005-06 में जैसे ही उत्तराखण्ड की सभी नदियों पर बाँध बनाने की सूचना फैली वैसे वरिष्ठ भू-वैज्ञानिक प्रो. जीडी अग्रवाल अब के स्वामी सानंद ने उत्तरकाशी के केदारघाट पर तम्बू गाड़ दिया था और इन्हें पर्यावरण विरोधी करार देते हुए इनके निर्माण को बन्द करने की माँग की थी।

    भारी जन समर्थन लिये अग्रवाल का यह अनशन एक माह तक चला और अन्ततोगत्वा लगभग एक दर्जन ऐसी निर्माणाधीन जलविद्युत परियोजनाएँ सरकार को बन्द करनी पड़ी। अब फिर पिछले एक सप्ताह से स्वामी सानंद हरिद्वार स्थित मातृसदन में चार सूत्री माँगों को लेकर अनशन पर बैठ गए हैं। कहा कि वे तब तक साँस नहीं लेंगे जब तक उनकी माँगों का निराकरण नहीं होगा। यही नहीं उन्होंने इस बाबत प्रधानमंत्री को भी चिट्ठी लिखी है।

    बता दें कि सरकार ने गंगा और उसकी सहायक नदियों पर फिर से बाँध बनाने की कवायद शुरू कर दी है। इधर स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद का कहना है कि चुनाव के वक्त पीएम नरेंद्र मोदी ने अपने को माँ गंगा का बेटा कहकर गंगा की रक्षा करने की बात कही थी। किन्तु गंगा संरक्षण विधेयक आज तक पारित नहीं हुआ है। इससे क्षुब्ध होकर प्रो. अग्रवाल 22 जून से गंगा की रक्षा के लिये हरिद्वार में अनशन पर बैठ गए हैं।

    प्रो. अग्रवाल मानते हैं कि पीएम मोदी के गंगा की रक्षा की बात कहने पर उन्हें खुशी हुई थी, किन्तु चार साल बाद भी गंगा की रक्षा करने की बजाय गंगा के स्वास्थ्य खराब करने का काम किया जा रहा है। उन्होंने पीएम को पत्र लिखकर यह माँग की है कि अलकनंदा नदी पर बनी विष्णुगाड़ पीपलकोटी बाँध, मन्दाकिनी नदी पर फाटा व्योंग, सिंगोली भटवाड़ी पर हो रहे निर्माण को बन्द किया जाये। उन्होंने बाँध और खनन के विरोध में उपवास शुरू कर दिया है और प्राण त्यागने तक इसे जारी रखने की चेतावनी भी दी है।

    गौरतलब है कि, स्वामी सानंद ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र प्रेषित कर यह सवाल उठाया है कि केन्द्र सरकार ने गंगा पर बाँध निर्माण और खनन के प्रबन्धन के लिये वर्ष 2014 में बनी कमेटी द्वारा रिपोर्ट सौंप दिये जाने के बाद भी उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया? यह पत्र उन्होंने प्रधानमंत्री को 24 फरवरी को भेजा था लेकिन प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) से कोई जवाब न मिलने पर स्वामी सानंद ने नाराजगी जताई।

    करोड़ों रुपए खर्च कर चलाए जा रहे नमामि गंगे जैसी योजनाओं पर भी इन्होंने सवाल उठाया है। उनका कहना है कि सरकार और सरकारी मण्डलियाँ (संस्थाएँ) गंगा जी व पर्यावरण का जानबूझकर अहित करने में जुटी हुई हैं। उनकी माँग है कि गंगा महासभा की ओर से प्रस्तावित अधिनियम ड्रॉफ्ट 2012 पर तुरन्त संसद में चर्चा हो या फिर इस विषय पर अध्यादेश लाकर इसे तुरन्त लागू किया जाये। इसके अलावा अलकनंदा, धौलीगंगा, नंदाकिनी, पिंडर, मंदाकिनी पर निर्माणाधीन व प्रस्तावित जल विद्युत परियोजनाओं को तुरन्त निरस्त किया जाये। इसके साथ ही इन्होंने विभिन्न परियोजनाओं की बली चढ़ने वाले दुर्लभ प्रजाति के पेड़ों की कटान पर रोक लगाने और नदियों में हो रहे अवैध खनन पर त्वरित प्रतिबन्ध लगाने की भी माँग की है। उनका कहना है कि उन्हें माँ गंगा के लिये यदि इस उपवास बाबत प्राण त्यागने पड़े तो उन्हें कोई मलाल नहीं है। वे कहते हैं कि प्रधानमंत्री ने गंगा को माँ कहा है इसलिये उन्हें भी माँ की रक्षा के लिये कड़े कदम उठाने चाहिए।

    आईआईटीयन्स फॉर होली गंगा का समर्थन

    इधर प्रोफेसर जी डी अग्रवाल के समर्थन में देश भर के आईआईटीयन्स एकत्र हो गए हैं। उन्होंने बाकायदा आईआईटीयन्स फॉर होली गंगा नाम से संगठन का निर्माण किया है। वे भी प्रो. अग्रवाल के समर्थन में देश भर में अभियान चलाएँगे। उन्होंने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा है कि सरकार आईआईटी कंसोर्टियम की सिफारिशों को लागू करे और गंगा नदी के प्राकृतिक प्रवाह को सुनिश्चित करे। इस हेतु प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जल संसाधन मंत्री नितिन गडकरी को हस्तक्षेप करने की आवश्यकता है। उन्होंने उत्तराखण्ड में गंगा और उसकी सहायक नदियों पर बन रही सभी पनबिजली और सुरंग परियोजनाओं के निर्माण को तत्काल बन्द करने की गुहार भी लगाई है।

    आईआईटीयन्स फॉर होली गंगा ने केन्द्र के एनडीए सरकार के चार साल के कार्यकाल के दौरान गंगा संरक्षण का काम अधूरा रहने पर असन्तोष प्रकट किया है। उन्होंने कहा कि पर्यावरण और वन मंत्रालय ने 2010 में सात भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आईआईटी) का एक कंसोर्टियम बनाया था। इस कंसोर्टियम को गंगा नदी बेसिन पर्यावरण प्रबन्धन योजना (जीआरबी ईएमपी) बनाने की जिम्मेदारी दी गई थी। इस कंसोर्टियम में आईआईटी बॉम्बे, दिल्ली, गुवाहाटी, कानपुर, खड़गपुर, मद्रास और रुड़की के लोग शामिल थे।

    भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों की ओर से तैयार और सरकार को सौंपी गई रिपोर्ट में गंगा नदी बेसिन पर्यावरण प्रबन्धन योजना (जीआरबी ईएमपी) को विकसित करने के लिये रणनीति, विभिन्न सूचनाएँ और उनके विश्लेषण के साथ सुझाव की विस्तृत चर्चा की गई है। रिपोर्ट में सबसे ज्यादा जोर गोमुख से ऋषिकेश तक ऊपरी गंगा नदी सेगमेंट के प्राकृतिक प्रवाह को सुनिश्चित करने पर दिया गया है।

    आईआईटीयन्स फॉर होली गंगा के अध्यक्ष यतिन्दर पाल सिंह सूरी ने केन्द्र सरकार से आईआईटी कंसोर्टियम की रिपोर्ट को सार्वजनिक कर इसे लागू करने की माँग भी की है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केन्द्र सरकार के चार साल पूरे हो गए हैं, लेकिन उत्तराखण्ड में पवित्र गंगा नदी के संरक्षण के लिये कोई सार्थक प्रयास नहीं दिख रहा, जो बेहद दुखदायी है। यहाँ तक कि प्रस्तावित गंगा अधिनियम भी अब तक नहीं बन पाया है।

    श्री सूरी ने बताया कि उत्तराखण्ड में गंगा नदी पर पनबिजली परियोजनाओं और सुरंगों के निर्माण की वजह से नदी के प्रवाह का बड़ा हिस्सा प्रभावित हो रहा है और फैलाव भी संकुचित होता जा रहा है। राजमार्ग और चारधाम यात्रा के लिये चार लेन की सड़कों का निर्माण हालात को और बिगाड़ रहा है। अब गोमुख से ऋषिकेश तक महज 294 किलोमीटर नदी का केवल छोटा हिस्सा प्राकृतिक और प्राचीन रूप में बहता है।

    आईआईटीयन्स फॉर होली गंगा के कार्यकारी सचिव एस के गुप्ता ने कहा कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केन्द्रीय जल संसाधन मंत्री नितिन गडकरी से सुप्रसिद्ध पर्यावरण वैज्ञानिक और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर के पर्यावरण विज्ञान के 86 वर्षीय पूर्व प्रोफेसर जी डी अग्रवाल (स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद) की माँग को मान लेने के लिये गुजारिश करते हैं।

    आईआईटीयन्स फॉर होली गंगा के कार्यकारी सदस्य पारितोष त्यागी का कहना है कि इस क्षेत्र की विभिन्न नदियों पर मौजूदा और प्रस्तावित जल विद्युत परियोजनाओं से नदी घाटी को होने वाली क्षति अपूरणीय होगी। उन्होंने कहा कि गंगा नदी के प्राकृतिक प्रवाह पर नियंत्रण बहुमूल्य पारिस्थितिकी तंत्र को नष्ट करने के साथ-साथ गंगाजल को भी प्रदूषित कर रहा है।

    स्वामी सानंद ने उपवास करने के पूर्व पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर कई महत्त्वपूर्ण सवाल खड़े किये हैं। उन्होंने कहा कि सन 2000-01 में टिहरी और अन्य बाँधों को लेकर मुरली मनोहर जोशी के नेतृत्व में एक कमेटी बनी थी, वे भी उस कमेटी के सदस्य थे। तब भी उन्होंने इन बाँधों के निर्माण पर सवाल उठाया था लेकिन कमेटी ने उस पर गौर नहीं किया तो उन्होंने इस्तीफा दे दिया था। वे कहते हैं कि वे तब से अब तक उन्हीं सवालों के साथ खड़े हैं। उनके अनुसार यदि कमेटी उनकी बात मान लेती तो उत्तराखण्ड में आज पर्यावरण का इतना विनाशकारी स्वरूप हमारे सामने नहीं होता।

    वर्ष 2001 में मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता में बनी कमेटी के समक्ष स्वामी सानंद द्वारा पत्र के माध्यम से उठाए गए सवालों को हम अक्षरशः प्रस्तुत कर रहे हैं।

    मुरली मनोहर जोशी समिति की रिपोर्ट हिन्दू समाज के विरुद्ध एवं षडयंत्र और दण्डनीय अपराध (डॉ. गुरूदास अग्रवाल, समिति सदस्य)

    (1) टिहरी बाँध के भूकम्प सम्बन्धी खतरों और गंगाजी की प्रदूषण नाशिनी क्षमता पर दुष्प्रभावों का आकलन कर बाँध निर्माण को आगे बढ़ाने या न बढ़ाने के बारे में अनुशंसा देने के लिये माननीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा अप्रैल 2001 में गठित इस समिति ने जनवरी 2002 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। उक्त रिपोर्ट की ‘सूचना का अधिकार अधिनियम’ (RTI) के अन्तर्गत प्राप्त प्रति में पेज सख्या 28, 29, 30 गायब हैं। पृष्ठ 26 पर समिति का सर्ग 7.0 ‘निष्कर्ष और अनुशंसा’ है, पृष्ठ 27 पर सर्ग 8.0 ‘आभार-प्रदर्शन’ और पृष्ठ 31 पर ‘सन्दर्भ’ (References) पृष्ठ 28, 29, 30 पर क्या था, पता नहीं। निम्न विचार और विवेचना इस अपूर्ण रिपोर्ट पर ही आधारित हैं पर पृष्ठ 27 पर ‘आभार-प्रदर्शन’ आ जाने से माना जा सकता है कि गायब पृष्ठों पर निष्कर्ष, अनुशंसा या अन्य कोई महत्त्वपूर्ण सामग्री नहीं रही होगी।

    (2) गंगाजल की प्रदूषणनाशिनी क्षमता के बारे में पृष्ठ 26 पर दिये निष्कर्ष बेहद अधूरे, अर्थहीन और हिन्दू समाज के लिये ही नहीं अपितु गंगा जी के लिये भी अपमानजनक है। जैसाकि नीचे देखा जा सकता हैः


    (क) पैरा 4 गंगाजल के विशिष्ट गुणों को मात्र आस्था और अप्रामाणिक के रूप में मानता है- नकारता नहीं तो स्वीकारता भी नहीं, जैसा कि पेज पर it is conceivable वाक्यांश से स्पष्ट है। निष्कर्ष के रूप में यह अर्थहीन है।


    (ख) पैरा 5 में गंगाजल, विशेषतया ऋषिकेश से ऊपर के गंगाजल की ‘प्रदूषण-क्षमता’ पर गहन और विशद वैज्ञानिक अध्ययन की तात्कालिक और त्वरित अध्ययन की अनुशंसा की गई है। पर ऐसे अध्ययन की स्पष्ट रूप रेखा न दिये जाने और ऐसे अध्ययन के निर्णायक निष्कर्ष मिलने तक बाँध पर आगे का काम रोक देने की बात न देने से यह अनुशंसा निपट अधूरी है। और इसमें NEERI Proposal की बात कहकर (जो Annexure के रूप में पेज 125 से 137 में दिया गया है) तो सारा गुड़-गोबर कर दिया है। NEERI के इस प्रस्ताव में अपने पेज 3 के अन्तिम पैरा में गंगाजल की विलक्षण प्रदूषणनाशिनी क्षमता को तो स्वीकारा गया है पर इस विलक्षण क्षमता के आकलन और अध्ययन के लिये आवश्यक वैज्ञानिक समझ/सामर्थ्य और मानसिक समर्पण दोनों ही के अभाव में लगभग 50 लाख लागत का यह प्रस्ताव अपने Scope of work में और विशेषतया Work Plan में बेहद अधकचरा है। इसमें प्रदूषणनाशिनी क्षमता क्या होती है और इसका आकलन या मापन कैसे किया जाएगा इसका कोई जिक्र नहीं। यह तो एक सामान्य जल-गुणवत्ता आकलन और जैविक अध्ययन का प्रस्ताव है और समिति के उद्देश्यों के लिये अर्थहीन है। रिपोर्ट से यह भी पता नहीं चलता कि यह अध्ययन हुआ भी या नहीं और इसके परिणाम मिले बिना समिति ने इस विषय में अपनी अनुशंसा क्या और किस आधार पर की।


    (ग) पैरा 7 की अन्तिम अनुशंसा जो कुछ थोड़ा सा ‘अविरल’ प्रवाह बनाए रखने के अर्थ में है उतनी ही अधूरी, अनिश्चय-भरी और अर्थहीन है जितनी पैरा 4, 5 की ऊपर विवेचित अनुशंसा हैं।


    (घ) सब मिलाकर पृष्ठ 26 के निष्कर्ष पूरी तरह अधूरे और अर्थहीन हैं और अनुशंसा का सच पूछें तो कोई है ही नहीं। रिपोर्ट हिन्दू समाज की आस्था और गंगा जी के प्रति अपमानजनक भी है क्योंकि वह गंगा जी को विशिष्ट स्थान न देकर उन्हें सामान्य नदियों के समकक्ष रखना चाहती है।

    (3) कमेटी की 28-04-01 की बैठक में गंगाजल की प्रदूषण-विनाशिनी क्षमता के प्रश्न पर विचार करने और इस विषय पर अपनी अनुशंसा देने के लिये एक उपसमिति गठित की गई थी। इस उपसमिति के सदस्यों की सूची तो रिपोर्ट में लगी है पर 29-04-01 को लगभग 7 घंटे तक चली इस उपसमिति के सत्र में हुई चर्चा या निष्कर्षों के बारे में कोई विवरण नहीं। सम्भवतः वे पृष्ठ हमें RTI के अन्तर्गत प्रति देते समय निकाल दिये गए या शायद सरकार को भी नहीं दिये गए (हमारी प्रति में पृष्ठ 87 के बाद पृष्ठ 93 के बीच 5 के बदले केवल 2 पृष्ठ हैं- तीन नदारद हैं)। मैं (गुरूदास अग्रवाल) इस उपसमिति का अध्यक्ष था और मैंने इसकी चर्चाओं के निष्कर्ष और अनुशंसा अपने हाथ से 30-04-01 को माननीय जोशी जी को सौंपा था - उन्हें रिपोर्ट में जाने क्यों सम्मिलित नहीं किया गया। मैं चाहुँगा कि माननीय जोशी जी मेरे हाथ से लिखे निष्कर्ष-अनुशंसा को मूल रूप में हिन्दू समाज के समक्ष प्रस्तुत कराएँ।

    (4) मेरी अध्यक्षता वाले उपसमूह का निष्कर्ष और मेरी अपनी स्पष्ट अनुशंसा थी कि गंगाजल की विलक्षण प्रदूषणनाशिनी क्षमता पर गहन अध्ययन और शोध का कार्य 6 मास के भीतर पूरा करा लिया जाये और ऐसे अध्ययन के स्पष्ट और निर्णायक परिणाम मिलने तक बाँध पर आगे का कार्य स्थगित कर दिया जाये। इस अनुशंसा का 30-04-01 की बैठक में श्री माशेलकर और ठाटे ने मुखर विरोध किया और ठाटे ने यह कहते हुए कि यदि काम एक मिनट के लिये भी बन्द करने की बात हों तो वह कमेटी पर काम नहीं करेंगे और अपना त्यागपत्र समिति के अध्यक्ष जोशी को सौंप दिया। इस पर श्री माशेलकर और माननीय जोशी जी ठाटे को मनाने में लग गए पर उनकी ‘ना मानूँ ना मानूँ’ जारी रही और अन्य सदस्य बस देखते रहे। जब इस तमाशे को चलते 45 मिनट हो गए तो इससे आजिज आकर कि यदि काम बन्द होने की स्थिति में ठाटे समिति में भाग लेने को तैयार नहीं तो काम न रोके जाने की स्थिति में मैं समिति के कार्य में भाग नहीं लूँगा। (यद्यपि इससे पहले मैंने ऐसा कभी नहीं कहा था, पर यदि काम आगे चलता रहे तो समिति की चर्चा चलाते रहना क्या हिन्दू समाज को धोखा देना, भुलावे में रखना नहीं था) कहते हुए मैंने अपना हाथ से लिखा तीन लाइन का सशर्त त्यागपत्र माननीय जोशी जी को सौंप दिया। जोशी जी का (और इस सारे तमाशे का) मन्तव्य स्पष्ट हो गया, जब मेरा त्यागपत्र हाथ में आते ही जोशी जी ने ‘अरे मुझे तो संसद की बैठक में जाना है’कहते हुए मीटिंग समाप्त कर बाहर चले गए उसके बाद मुझे उस त्यागपत्र की स्वीकृति/अस्वीकृति की कोई सूचना न मिलने और जोशी-माशेलकर-ठाटे तिकड़ी का खेल और अन्य सभी सदस्यों की असहायता देख लेने के बाद, उसके बाद की बैठकों में मेरे जाने का तो प्रश्न था ही नहीं। जहाँ तक मुझे ज्ञात हैं, समिति की ड्रॉफ्ट या अन्तिम रिपोर्ट मुझे दिखाने, उन पर मेरी राय या हस्ताक्षर लेने का कोई प्रयास नहीं किया गया (माशेलकर जैसे गंगा-विरोधी के होते, ऐसा भला होता भी क्यों कर!)। समिति की उपलब्ध रिपोर्ट न 30-04-2001 की बैठक में हुए इस तमाशे का जिक्र करती है न मेरे त्यागपत्र का जो स्वयं उन्होंने अपने हाथ में पकड़ा था। या तो वे इस सब का सत्य हिन्दू समाज के सामने प्रत्यक्ष रखें या हाथ में गंगा जल लेकर, गंगा जी की सौगन्ध खाकर मेरे त्याग पत्र की बात नकारें।

    (4) यदि श्री दिलीप बिस्वास, डॉ. आर. एन. सिंह, और डॉ. यू. के. चौधरी को छोड़ दिया जाये जो विषय के जानकार होते हुए भी अन्ततः डरपोक सरकारी कर्मचारी थे जिनके लिये माँ गंगा और हिन्दू समाज के हितों से कहीं पहले उनके अपने स्वार्थ (Career) आते थे, तो पूरी समिति में जल गुणवत्ता और गंगाजल की प्रदूषणनाशिनी क्षमता की बात समझने वाले केवल दो ही सदस्य थे - मैं और प्रोफेसर शिवा जी राव। हम दोनों के हस्ताक्षर रहित (और प्रो. शिवा जी राव की तो स्पष्ट असहमति लिखित में होते हुए) यह रिपोर्ट कैसी होगी आप स्वयं समझ सकते हैं।

    (5) यह रिपोर्ट और पूरा काण्ड, सर्व श्री जोशी जी/ माशेलकर/ ठाटे की तिकड़ी का माँ गंगा और हिन्दू समाज के विरूद्ध षडयंत्र और दण्डनीय अपराध है।

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    Submitted by Anonymous (not verified) on Wed, 07/11/2018 - 19:39

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    बहुत अच्छा, मुझे लगता है कि मुझे वह ज्ञान मिला जो मुझे चाहिए था। मैं आपकी पोस्ट में कुछ जानकारी देख और देखूंगा। धन्यवाद     fanfiction

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    जल भंडारण के आँकड़ों की कवायदeditorialThu, 07/19/2018 - 18:28

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    सैंड्रप

    भाखड़ा ब्यास प्रबंध बोर्डभाखड़ा ब्यास प्रबंध बोर्ड

    यह लेख भारत के विभिन्न जलाशयों में जल उपलब्धता के बारे में की जा रही रिपोर्टिंग के तरीके पर केन्द्रित है जिसमें पर्याप्त सुधार की आवश्यकता है। देश के जलाशयों के बारे में सरकार अथवा मीडिया द्वारा की जाने वाली रिपोर्ट, सेंट्रल वाटर कमीशन (Central Water Commission, CWC) द्वारा हर हफ्ते जारी की जाने वाली बुलेटिन पर आधारित होती है। इस रिपोर्ट में देश के महज 91 जलाशयों में जल की उपलब्धता की सूचना दी जाती है। वहीं राज्यों द्वारा जारी की जाने वाली रिपोर्ट से 3863 जलाशयों में उपलब्ध पानी के बारे में सूचना प्राप्त होती है।

    हालांकि राज्यों द्वारा जारी रिपोर्ट भी देश में जल उपलब्धता की पूरी तस्वीर नहीं पेश कर पाती। कारण है यह रिपोर्ट सिर्फ सतह के ऊपर उपलब्ध जल से सम्बन्धित होती है जिसमें, भूजल एक्वीफर्स, मिट्टी में नमी और बड़ी संख्या में छोटे जलाशयों में उपलब्ध जल से सम्बन्धित आँकड़े शामिल नहीं होते। फिर भी यहाँ यह कहना गलत नहीं होगा कि राज्यों द्वारा जारी की जाने वाली रिपोर्ट सीडब्ल्यूसी की रिपोर्ट की तुलना में ज्यादा सटीक सूचना देती है।

    केन्द्र सरकार

    सेंट्रल वाटर कमीशन, जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा कायाकल्प मंत्रालय (Ministry of Water Resource, River Development and Ganga Rejuvenation) के अन्तर्गत कार्य करता है। यह अपनी वेबसाइट पर साप्ताहिक रिपोर्ट जारी करता है। रिपोर्ट के साथ डिस्क्लेमर भी होता है जिसमें यह लिखा होता है कि दिये गये विवरण राज्यों और परियोजना अधिकारियों द्वारा उपलब्ध कराए गये विवरण पर आधारित हैं। सेंट्रल वाटर कमीशन द्वारा उपलब्ध कराया गया आँकड़ा 18 राज्यों और 12 नदी बेसिन क्षेत्र पर बने कुल 91 बड़े जलाशयों पर आधारित होता है। इन जलाशयों की जल-ग्रहण क्षमता 161.993 बिलियन क्यूबिक मीटर है। इसके अलावा सीडब्ल्यूसी की फ्लड मॉनिटरिंग और फोरकास्टिंग वेबसाइट, 60 इनफ्लो फोरकास्टिंग साइट्स को भी कवर करता है जो डैम और बाँधों से सम्बन्धित हैं। मानसून के समय ऐसी आशा की जाती है कि वेबसाइट पर हर घंटे का अपडेट उपलब्ध हो लेकिन अमूमन ऐसा हो नहीं पाता है।


    उत्तरी भारत

    हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान भाखड़ा व्यास प्रबन्ध बोर्ड, भाखड़ा, पोंग और पंडोह डैम के जल-ग्रहण, जल निकास और पानी के लेवल की प्रतिदिन निगरानी के लिये उत्तरदायी है। इन तीनों डैम की जल संग्रहण क्षमता 16.162 बिलियन क्यूबिक मीटर है जिसमें भाखड़ा 7551 एमसीएम, पोंग 8570 एमसीएम और पंडोह का हिस्सा 41 एमसीएम है। भाखड़ा और पोंग भी सीडब्ल्यूसी के साप्ताहिक बुलेटिन का हिस्सा हैं। इसके अलावा भाखड़ा और पोंग डैम में पानी के लेवल और उसे रिलीज करने सम्बन्धी तुलनात्मक आँकड़ा भी हर महीने सीडब्ल्यूसी द्वारा जारी किया जाता है।

    उत्तर प्रदेश

    यहाँ प्रदेश भर की 20 नदियों के कुल 81 स्थानों का आँकड़ा, टेबुलर बुलेटिन के रूप में प्रतिदिन डेली फ्लड बुलेटिन 2018के नाम से जारी किया जाता है। यह आँकड़ा सिंचाई एवं जल संसाधन विभाग जारी करता है। इस टेबल में बायीं तरफ जलाशयों में पानी की उपलब्धता से सम्बन्धित आँकड़ा भी होता है। उत्तर प्रदेश का फ्लड मैनेजमेंट इफॉर्मेशन सिस्टम सेंटर यही आँकड़ा अपने वेब पेज पर भी जारी करता है।

    पश्चिमी भारत

    राजस्थान-इस राज्य के जल संसाधन विभाग की वेबसाइट पर जल संग्रहण सम्बन्धी सूचना डाटा रूम सेक्शन पर उपलब्ध है लेकिन यह कार्यरत नहीं है।

    गुजरात-नर्मदा जल संसाधन और जल वितरण विभाग की वेबसाइट पर एक्सेल शीट में डाटा बैंक ऑप्शन के साथ 203 जलाशयों के जल-स्तर से सम्बन्धित आँकड़ा उपलब्ध है। इन सभी डैमों की कुल जल संग्रहण क्षमता 15,760.17 एमसीएम है। इसके अलावा इस वेबसाइट पर सरदार सरोवर प्रोजेक्ट के बारे में भी सूचना उपलब्ध है। इस प्रोजेक्ट की स्टोरेज क्षमता 9460 एमसीएम है। इस तरह गुजरात की कुल जल संग्रहण क्षमता 25.22 बीसीएम है जबकि वर्तमान में यह 20.33 बीसीएम है। गुजरात के सभी 204 जलाशयों में से 10 सीडब्ल्यूसी द्वारा जारी बुलेटिन की लिस्ट में शामिल हैं। इन दस जलाशयों की वर्तमान जल संग्रहण क्षमता 17.191 बीसीएम है। नर्मदा जल संसाधन और जल वितरण विभाग की वेबसाइट पर मौजूद एक्सेल शीट में इन 17 बड़े जलाशयों की कुल जल संग्रहण क्षमता 12932 एमसीएम है। इसी तरह इस वेबसाइट पर एक अलग पेज बनाया गया है जिस पर जिलों और स्कीम के अनुसार आँकड़े प्रतिशत में उपलब्ध हैं। यही सूचनाएँ राज्य के फ्लड कंट्रोल सेल पेज पर भी उपलब्ध हैं जिसे हर दिन अपडेट किया जाता है। इस वेबसाइट के आर्काइव पेज पर बहुत ज्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है।

    मध्य प्रदेश-यहाँ भी डेली रिजर्वायर बुलेटिन प्रदेश के जल संसाधन विभाग द्वारा प्रतिदिन जारी किया जाता है जो 168 जलाशयों में उपलब्ध जल की मात्रा पर आधारित होता है। इन सभी जलाशयों की जल संग्रहण क्षमता 36.415 बीसीएम है। सेंट्रल वाटर कमीशन द्वारा प्रतिदिन जारी किये जाने वाले आँकड़ों में इनमें से कुल 6 जलाशयों को शामिल किया जाता है। इन डैमों की कुल स्टोरेज क्षमता 27.318 बिलियन क्यूबिक मीटर है। इन जलाशयों में जल की उपलब्धता से सम्बंधित सूचना को प्रदेश के वेबसाइट पर रोज अपडेट किया जाता है।

    महाराष्ट्र-राज्य के जल संसाधन विभाग द्वारा जारी बुलेटिन में 140 बड़े, 274 मध्यम और 2849 छोटी परियोजनाओं से जुड़े आँकड़ों को शामिल किया जाता है। इन बड़ी, मध्यम और छोटी परियोजनाओं की जल संग्रहण क्षमता क्रमशः 29.13 बीसीएम, 5.40 बीसीएम और 6.34 बीसीएम है। वहीं इनकी कुल जल संग्रहण क्षमता 40.87 बीसीएम है। प्रदेश के जल संसाधन विभाग द्वारा जारी बुलेटिन में 103 बड़े जलाशयों के आँकड़े अलग-अलग जारी किये जाते हैं जबकि बाकी जलाशयों से सम्बन्धित आँकड़े क्षेत्रवार या समेकित रूप से जारी किये जाते हैं। सीडब्ल्यूसी की वेबसाइट पर महाराष्ट्र के 17 बड़े जलाशयों में पानी की उपलब्धता से सम्बन्धित आँकड़े जारी किये जाते हैं जिनकी जल संग्रहण क्षमता 14.073 बीसीएम है। प्रदेश की वेबसाइट पर एक अलग पेज बनाया गया है जिस पर राज्य के जलाशयों में वर्तमान समय में उपलब्ध जल के बारे में जानकारी दी जाती है। इस पेज को प्रवाह नाम दिया गया है जिस पर जलाशयों के रियल टाइम लोकेशन मैप और पानी के इस्तेमाल के बारे में भी ग्राफ के माध्यम से जानकारी दी जाती है।

    प्रवाहराज्य सरकारें
    गोवा-इस राज्य के जल संसाधन विभाग द्वारा हर वर्ष जून की पहली तारीख से 15 नदियों और 5 जलाशयों में जल की उपलब्धता के सम्बन्ध में जानकारी दी जाती है। जल छोड़ने और उसकी वर्तमान स्थिति की जानकारी देने के लिये वेबसाइट पर इन्फोग्राफिक्स का इस्तेमाल किया जाता है। ये आँकड़े प्रतिदिन जारी किये जाते हैं। राज्य के 5 जलाशयों की कुल जल संग्रहण क्षमता 300.85 एमसीएम है।


    तेलंगाना-प्रदेश के 8 जलाशयों में जल की उपलब्धता के बारे में हैदराबाद मेट्रोपोलिटन वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड प्रतिदिन आँकड़े जारी करता है जिनकी जल संग्रहण क्षमता 16.65 बीसीएम है। इनमें से केवल दो जलाशयों नागार्जुन सागर और श्रीशैलम में उपलब्ध पानी की जानकारी सीडब्ल्यूसी की वेबसाइट पर दी जाती है। इन दोनों जलाशयों की कुल जल संग्रहण क्षमता 15.13 बीसीएम है। इसके अलावा रिजर्वायर स्टोरेज मॉनिटरिंग सिस्टम नाम के वेब पेज पर राज्य के 59 बड़े और 73 मीडियम जलाशयों के बारे में भी जानकारी दी जाती है लेकिन उसे रोज अपडेट नहीं किया जाता। हैदराबाद मेट्रोपोलिटन वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड की साइट पर कृष्णा, गोदावरी और पेन्नार नदी बेसिन में स्थित बड़े, मध्यम और छोटे कुल 173 जलाशयों की लिस्टिंग की गई है। तेलंगाना वाटर रिसोर्स इन्फॉर्मेशन सिस्टम के अन्तर्गत हाइड्रोमेट डाटा में रिजर्वायर लेवल डाटा का विकल्प मौजूद है लेकिन यह तत्काल कारगर नहीं है। फिर भी यहाँ राज्य के जल संसाधन के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध है।

    आन्ध्र प्रदेश-राज्य के जल संसाधन विभाग द्वारा 28 बड़े और 65 मध्यम कोटि के जलाशयों के बारे में वेबसाइट के माध्यम से जानकारी उपलब्ध कराई जाती है। वेबसाइट पर इन जलाशयों की कुल जल संग्रहण क्षमता 23.1 बीसीएम बताई गई है जिसमें श्रीशैलम, नागार्जुन सागर और सोमसिला जलाशय भी शामिल हैं। इन तीनों जलाशयों की आन्ध्र प्रदेश में कुल जल संग्रहण क्षमता 17.12 बीसीएम है जिसे सीडब्ल्यूसी के बुलेटिन में भी इस्तेमाल किया जाता है। इस जानकारी को प्रदेश की वेबसाइट पर अपडेट नहीं किया गया है। इसी तरह आन्ध्र प्रदेश वाटर इन्फॉर्मेशन एंड मैनेजमेंट सिस्टम प्रदेश के 86 बड़े और मध्यम आकार के जलाशयों के बारे में सूचना जारी करता है जिनकी कुल जल संग्रहण क्षमता 27.23 बीसीएम है। ऐसा लगता है कि वेबसाइट को हमेशा अपडेट किया जाता है। यहाँ भी श्रीशैलम, नागार्जुन सागर और सोमसिला जलाशय की कुल जल संग्रहण क्षमता को शामिल किया गया है।

    कर्नाटक-राज्य के 13 जलाशयों की कुल जल संग्रहण क्षमता 23.4 बीसीएम है। इन जलाशयों में उपलब्ध जल की स्थिति की निगरानी कर्नाटक स्टेट नैचुरल डिजास्टर मॉनिटरिंग सेंटर द्वारा हर दिन की जाती है। केवल वाराही जलाशय को छोड़कर जिसकी जल संग्रहण क्षमता 228.54 एमसीएम है सभी 12 जलाशयों को सीडब्ल्यूसी की बुलेटिन में शामिल किया जाता है। सीडब्ल्यूसी की बुलेटिन में शामिल किये जाने वाले इन जलाशयों की जल संग्रहण क्षमता 19.4 बीसीएम है। वाणी विलास सागर और गेरुसोप्पा नामक दो जलाशयों की जल संग्रहण क्षमता को सीडब्ल्यूसी की बुलेटिन में शामिल किया जाता है जबकि इनके सम्बन्ध में कर्नाटक की वेबसाइट पर जानकारी उपलब्ध नहीं होती है। इन दोनों जलाशयों की कुल जल संग्रहण क्षमता 932 एमसीएम है।

    जलाशयों में जलस्तर की सूचनातमिलनाडु-राज्य के जल संसाधन विभाग की वेबसाइट पर एक लिंक उपलब्ध है जिस पर रोजाना यहाँ के 20 जलाशयों में जल की उपलब्धता से सम्बन्धित आँकड़े अपडेट किये जाते हैं। इन जलाशयों की जल संग्रहण क्षमता 5.97 बीसीएम है। इन जलाशयों में से 6 को सीडब्ल्यूसी द्वारा जारी बुलेटिन में शामिल किया जाता है जिनकी जल संग्रहण क्षमता 4.38 बीसीएम है। इसके अलावा वाटर रिसोर्सेज आर्गेनाईजेशन की वेबसाइट पर तमिलनाडु के जलाशयों की तस्वीर और मैप भी दिखते हैं।

    केरल-स्टेट लोड डिस्पैच सेंटर, केरल वेबसाइट प्रदेश के 16 जलाशयों के बारे में रोजाना जानकारी उपलब्ध कराता है। इन जलाशयों की जल संग्रहण क्षमता 3.45 बीसीएम है। सीडब्ल्यूसी की बुलेटिन में इनमें से केवल तीन जलाशयों को शामिल किया गया है जिनकी जल संग्रहण क्षमता 2.93 बीसीएम है। इन तीनों के अलावा तीन अन्य जलाशयों को भी सीडब्ल्यूसी की बुलेटिन में शामिल किया गया है जिनकी जल संग्रहण क्षमता 904 एमसीएम है। इन जलाशयों से सम्बन्धित डाटा केरल के स्टेट लोड डिस्पैच सेंटर द्वारा उपलब्ध नहीं कराया जाता है।

    ईस्ट इंडिया

    छत्तीसगढ़-राज्य के जल संसाधन विभाग की वेबसाइट के रिजर्वायर डाटा सेक्शन में 43 जलाशयों के बारे में प्रतिदिन जानकारी अपडेट की जाती है। इन जलाशयों की जल संग्रहण क्षमता 6.33 बीसीएम है। इनमें से केवल मिनीमाता बांगो और रविशंकर सागर जलाशयों से सम्बन्धित जानकारी सीडब्ल्यूसी की बुलेटिन में शामिल की जाती है। इन जलाशयों की जल संग्रहण क्षमता 3.66 बीसीएम है।

    झारखण्ड-राज्य के जल संसधान विभाग की वेबसाइट पर वाटर लेवल्स ऑफ रिजर्वायर सेक्शन में 46 जलाशयों की लिस्ट दी गई है। परन्तु इनके सम्बन्ध में जानकारी वहाँ उपलब्ध नहीं है इसीलिये नीचे दिये गये टेबल में इसे शामिल नहीं किया गया है। राज्य सरकार द्वारा प्रदेश के जलाशयों में पानी की स्थिति की जानकारी उपलब्ध कराने के लिये एक एप भी विकसित किया गया है लेकिन इसे एक्सेस करने की छूट केवल जल संसाधन विभाग के कर्मचारियों और ऑफिसर्स तक ही सीमित है।

    ओडिशा-जल संसाधन विभाग की वेबसाइट पर मानसून 2018 के नाम से एक वेबपेज बनाया गया है जहाँ राज्य के 7 बड़े जलाशयों में पानी की स्थिति के बारे में सूचना उपलब्ध होती है। इन सभी जलाशयों के सम्बन्ध में सीडब्ल्यूसी की वेबसाइट द्वारा भी जानकारी उपलब्ध कराई जाती है। इन जलाशयों की जल संग्रहण क्षमता 15.328 बीसीएम है।

    जलाशयों की स्थितिदक्षिण भारत
    बिहार-राज्य का जल संसाधन विभाग अपनी वेबसाइट पर प्रतिदिन 23 जलाशयों में जल उपलब्धता के सम्बन्ध में जानकारी अपडेट करता है। इन जलाशयों की कुल जल संग्रहण क्षमता 949.8 एमसीएम है।

    पश्चिम बंगाल-राज्य का इरीगेशन एंड वाटरवेज डिपार्टमेंट अपनी वेबसाइट पर 13 जलाशयों के जल-स्तर की रिपोर्ट प्रतिदिन जारी करता है। परन्तु वेबसाइट पर जारी इस रिपोर्ट में जलाशयों की जल संग्रहण क्षमता के बारे में कोई जानकारी नहीं दी जाती है। यह जानकारी हमारे लिये बेकार है क्योंकि यह रिपोर्ट जलाशयों की जल संग्रहण क्षमता पर आधारित है।
     

     

     

    उत्तर भारत

    सीडब्ल्यूसी बुलेटिन में शामिल जलाशयों के अतिरिक्त अन्य जलाशय

    क्रम

    राज्य/एजेंसी

    जलाशयों की संख्या

    भंडारण क्षमता (बीसीएम)

    जलाशयों की संख्या

    भंडारण क्षमता

    1.

    बीबीएम

    3

    16.162

    1

    0.041

    पश्चिम भारत

    2.

    गुजरात

    204

    20.33

    194

    3.14

    3.

    मध्य प्रदेश

    168

    36.415

    162

    9.10

    4.

    महाराष्ट्र

    3246

    40.87

    3229

    26.80

    5.

    गोवा

    5

    0.30

    5

    0.30

    दक्षिण भारत

    6.

    तेलंगाना

    8

    16.65

    6

    1.52

    7.

    आन्ध्र प्रदेश

    86

    27.23

    83

    10.11

    8.

    कर्नाटक

    13

    23.40

    1

    0.23

    9.

    तमिलनाडु

    20

    5.97

    14

    1.59

    10.

    केरल

    16

    3.54

    13

    0.61

    पूर्वी भारत

    11.

    छत्तीसगढ़

    43

    6.33

    41

    2.67

    12.

    उड़ीसा

    7

    15.33

    0

    0

    13.

    बिहार

    23

    0.95

    23

    0.95

    14.

    सीडब्ल्यूसी

    91

    161.99

    91

    161.99

    कुल

     

    3863

    219.05

    नोट- ऊपर दिये गये अधिकांश विवरण में जल संग्रहण क्षमता का मतलब जलाशयों में उपलब्ध वर्तमान जलस्तर से है। केवल उन्हीं केसेज में कुल जल संग्रहण क्षमता का जिक्र किया गया है   जिनके आँकड़े वेबसाइट पर उपलब्ध नहीं थे। जिन जलाशयों की जल संग्रहण क्षमता की जानकारी वेबसाइट पर नहीं दी गई है उन्हें ऊपर दिये गये टेबल में शामिल नहीं किया गया है।

     

     

    निष्कर्ष

    इन 12 राज्यों और उनकी बीबीएमबी वेबसाइट के माध्यम से 3863 जलाशयों में जल की उपलब्धता के सम्बन्ध में जानकारी जुटाई जा सकती है। सीडब्ल्यूसी की वेबसाइट पर जारी होने वाले साप्ताहिक बुलेटिन में सिर्फ 91 जलाशयों के सम्बन्ध में जानकारी होती है। जैसा कि पहले ही कहा गया है भारत में जल की उपलब्धता की यह पूरी तस्वीर नहीं है क्योंकि इसमें काफी सारे बड़े-छोटे जलाशयों, भूजल एक्वीफर और मिट्टी में उपलब्ध नमी को शामिल नहीं किया गया है। अतः हमें देश में पानी की उपलब्धता से सम्बन्धित वर्तमान सूचना तंत्र को और भी व्यापक बनाने की जरुरत है जिसमें ऊपर दिये गये सभी पानी के स्रोतों को शामिल किया जा सके। फिर भी राज्यों की वेबसाइट पर उपलब्ध 3863 जलाशयों से सम्बन्धित सूचना, सीडब्ल्यूसी की वेबसाइट पर उपलब्ध 91 जलाशयों पर आधारित साप्ताहिक रिपोर्ट की तुलना में देश में पानी की उपलब्धता की बेहतर तस्वीर पेश करती है। इस रिपोर्ट के माध्यम से हम आशा करते हैं कि मीडिया, पॉलिसी मेकर्स, सरकारी एजेंसियां और सीडब्ल्यूसी भी अब जल संग्रहण के बारे में ज्यादा विस्तृत जानकारी उपलब्ध करा पाएँगे।

    संकलन:हिमांशु ठक्कर, भीम सिंह रावत
    Email: bhim.sandrp@gmail.com

     

     

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    गंगा के उद्गम में हरे पेड़ों को बचाने की मुहिमeditorialSun, 07/22/2018 - 18:28


    रक्षा सूत्र आन्दोलनरक्षा सूत्र आन्दोलन“ऊँचाई पर पेड़ रहेंगे, नदी ग्लेशियर टिके रहेंगे।” “चाहे जो मजबूरी होगी, सड़क सुक्की, जसपुर, झाला ही रहेगी”के नारों के साथ 18 जुलाई, 2018 को भागीरथी के उद्गम में बसे सुक्की, जसपुर, पुराली, झाला के लोगों ने रैली निकालकर प्रसिद्ध गाँधीवादी और इन्दिरा गाँधी पर्यावरण पुरस्कार से सम्मानित राधा बहन, जसपुर की प्रधान मीना रौतेला, समाज सेविका हिमला डंगवाल के नेतृत्व में पेड़ों पर रक्षा-सूत्र बाँधे गए। इसकी अध्यक्षता सुक्की गाँव की मीना राणा ने की।

    राधा बहन ने कहा कि हिमालय क्षेत्र की जलवायु और मौसम में हो रहे परिवर्तन को नियंत्रित करने के लिये सघन वनों की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि सीमान्त क्षेत्रों में रह रहे लोगों की खुशहाली, आजीविका संवर्धन और पलायन रोकने के लिये पर्यावरण और विकास के बीच में सामंजस्य जरूरी है।

    इस दौरान सुक्की और जसपुर दो स्थानों पर हुई बैठक में जिला पंचायत के सदस्य जितेन्द्र सिंह राणा ,क्षेत्र पंचायत सदस्य धर्मेन्द्र सिंह राणा, झाला गाँव के पूर्व प्रधान विजय सिंह रौतैला, पूर्व प्रधान किशन सिंह, पूर्व प्रधान शुलोचना देवी, मोहन सिंह राणा, पूर्व प्रधान गोविन्द सिंह राणा आदि ने सुक्की-बैंड से जसपुर, झाला राष्ट्रीय राजमार्ग को यथावत रखने की माँग की है। इन्होंने सुक्की-बैंड से झाला तक प्रस्तावित ऑलवेदर रोड के निर्माण का विरोध करते हुए कहा कि यहाँ से हजारों देवदार जैसी दुर्लभ प्रजातियों पर खतरा है। इसके साथ ही यह क्षेत्र कस्तूरी मृग जैसे वन्य जीवों की अनेकों प्रजातियों का एक सुरक्षित स्थान है।


    पेड़ों को बचाने का प्रयासपेड़ों को बचाने का प्रयासयहाँ बहुत गहरे में बह रही भागीरथी नदी के आर- पार खड़ी चट्टानें और बड़े भूस्खलन का क्षेत्र बनता जा रहा है। इसलिये यह प्रस्तावित मार्ग जैव विविधता और पर्यावरण को भारी क्षति पहुँचाएगा। यहाँ लोगों का कहना है कि उन्होंने आजादी के बाद सीमान्त क्षेत्र तक सड़क पहुँचाने के लिये अपनी पुस्तैनी जमीन, चारागाह और जंगल निःशुल्क सरकार को दिये हैं। इस सम्बन्ध में लोगो ने केन्द्र सरकार से लेकर जिलाधिकारी उत्तरकाशी तक पत्र भेजा है।

    लोग यहाँ बहुत चिन्तित हैं कि उन्होंने वर्षों से अपनी पसीने की कमाई तथा बैंकों से कर्ज लेकर होटल, ढाबे, सेब के बगीचे तैयार किये हैं। यहाँ पर वे आलू, रामदाना राजमा सब्जियाँ उगाकर कमाई करते हैं। इसके कारण लोग यहाँ से पलायन नहीं करते हैं। ऑलवेदर रोड के नाम पर राष्ट्रीय राजमार्ग को चौड़ा करने से सुक्की, जसपुर, पुराली, झाला के लोग विकास की मुख्य धारा से अलग-थलग पड़ जाएँगे और उनके कृषि उत्पादों की ब्रिकी पर प्रभाव पड़ेगा। होटल पर्यटकों और तीर्थ-यात्रियों के बिना सुनसान हो जाएँगे।

    नैनीताल से सामाजिक कार्यकर्ता इस्लाम हुसैन ने कहा कि पर्यावरण की दृष्टि से सेब आदि पेड़ों के विकास व संरक्षण के लिये देवदार जैसे पेड़ सामने होने चाहिये। उन्होंने कहा कि पेड़-पौधों को जीवित प्राणियों की तरह जीने का अधिकार है। यह बात केवल हम नहीं बल्कि पिछले दिनों नैनीताल के उच्च न्यायालय ने भी कही है। इसलिये देवदार के पेड़ों की रक्षा के साथ वन्य जीवों की सुरक्षा का दायित्व भी राज्य सरकार का है। रक्षा सूत्र आन्दोलन के प्रेरक सुरेश भाई ने कहा कि स्थानीय लोग अपनी आजीविका की चिन्ता के साथ यहाँ सुक्की बैंड से जांगला तक हजारों देवदार के पेड़ों के कटान का विरोध करने लगे हैं। यहाँ ऑलवेदर रोड के नाम पर 6-7 हजार से अधिक पेड़ों को काटने के लिये चिन्हित किया गया है। यदि इनको काटा गया तो एक पेड़ दस छोटे-बड़े पेड़ों को नुकसान पहुँचाएगा इसका सीधा अर्थ है लगभग एक लाख वनस्पतियाँ प्रभावित होंगी। इसके अलावा वन्य जीवों का नुकसान है। इसका जायजा वन्य जीव संस्थान को भी लेना चाहिये। जिसकी रक्षा करना सरकार की जिम्मेदारी है।


    वृक्ष बचाने के लिये सामने आईं महिलाएँवृक्ष बचाने के लिये सामने आईं महिलाएँइन हरे देवदार के पेड़ों को बचाने के लिये लोग जसपुर से पुराली बगोरी, हर्षिल, मुखवा से जांगला तक नई ऑलवेदर रोड बनाने की माँग कर रहे हैं। यहाँ बहुत ही न्यूनतम पेड़ और ढालदार चट्टान है। इसके साथ ही इस नये स्थान पर कोई बर्फीले तूफान का भय नहीं है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जसपुर से झाला, धराली, जांगला तक बने गंगोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग को भी अधिकतम 7 मीटर तक चौड़ा करने से ही हजारों देवदार के पेड़ बचाये जा सकते हैं। इसके नजदीक गोमुख ग्लेशियर है। इस सम्बन्ध में हर्षिल की ग्राम प्रधान बसंती नेगी ने भी प्रधानमंत्री जी को पत्र भेजा है।

    यहाँ लोगों ने भविष्य में प्रसिद्ध पर्यावरणविद चंडी प्रसाद भट्ट, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल, वन्य जीव संस्थान, कॉमन कॉज के प्रतिनिधियों को बुलाने की पेशकश की है। इसके साथ ही स्थानीय लोगों और पर्यावरणविदों की माँग के अनुसार एक जन सुनवाई आयोजित करने की पहल भी की जा रही है। इस अवसर पर गाँव के लोग भारी संख्या में उपस्थित रहे, जिसमें सामाजिक कार्यकर्ता बी.वी. मार्थण्ड, महेन्द्र सिंह, नत्थी सिंह, विजय सिंह, सुन्दरा देवी, बिमला देवी, हेमा देवी, कमला देवी, रीता बहन, युद्धवीर सिंह आदि दर्जनों लोगों ने अपने विचार व्यक्त किये।

     

     

     

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    आईआईएम कोझिकोड और जल स्वावलम्बनeditorialWed, 07/25/2018 - 17:36

    Source
    द वाटर कैचर्स, 2017
    आईआईएम कोझिकोडकेरल का कोझिकोड सघन वर्षा का क्षेत्र है। साल में 300 मिलीमीटर से ज्यादा वर्षा होती है। लेकिन, कोझिकोड में नए जमाने की पढ़ाई करने के लिये बनाए गए व्यावसायिक संस्थान को फिर भी पानी की समस्या रहती थी। कोझिकोड आईआईएम को जब अपने कैम्पस में पानी की किल्लत दूर करने की जरूरत महसूस हुई तब उन्हें नए जमाने की कोई तकनीकी समझ नहीं आई। उन्होंने पानी बचाने के परम्परागत तरीकों को अपनाना ही बेहतर समझा।

    आईआईएम कोझिकोड कैम्पस में जल संरक्षण का पहला प्रयास साल 2000 में शुरू हुआ। उन्हें मालूम हो गया था कि किसी बाहरी स्रोत से उनकी पानी की जरूरतें पूरी नहीं होंगी इसीलिये इसे संस्थान के कैम्पस से ही पूरा करने का प्रयास शुरू किया गया। कैम्पस 96 एकड़ में फैला है।

    कैम्पस, कोझिकोड के ऐसे इलाके में बसा है जहाँ भूमि समतल नहीं है। यह एक पहाड़ी इलाका है। यहाँ चार सौ लोग स्थायी तौर पर रहते हैं और नियमित आने जाने वाले लोग अलग हैं। आदमी के अलावा यहाँ पेड़-पौधों और घास के मैदान को भी नियमित तौर पर पानी की जरूरत रहती थी ताकि कैम्पस की सुन्दरता में कोई कमी न रहे। कुल मिलाकर रोजाना करीब एक लाख लीटर पानी की जरूरत थी।

    पानी की कमी को पूरा करने के लिये जो योजना बनाई गई उसके तहत तय किया गया कि कैम्पस के पानी को ही रेनवाटर हार्वेस्टिंग तकनीक के जरिए रोका जाएगा। इसके साथ ही यह भी तय किया गया कि कैम्पस से निकलने वाले गन्दे पानी का शोधन करके उसे दोबारा इस्तेमाल करने लायक बनाया जाये। अब करीब डेढ़ दशक बाद आज आप आईआईएम कोझिकोड को देखेंगे तो महसूस करेंगे कि नए जमाने के व्यावसायिक भवनों को इसी तरह अपना पानी बचाना चाहिए।

    सम्भवत: आईआईएम कोझिकोड, केरल का पहला और इकलौता ऐसा संस्थान है जिसने इतने बड़े स्तर पर अपना पानी बचाने का काम किया है। बावजूद इसके यह नहीं कहा जा सकता कि आईआईएम अपना सारा पानी बचा लेता है। लेकिन यह जरूर है कि यहाँ दो तिहाई वर्षाजल संचयन आसानी से कर लिया जाता है। जहाँ यह कैम्पस बना है वहाँ का सारा पानी रोक पाना सम्भव भी नहीं है क्योंकि पहाड़ी से नीचे आने वाला कुछ पानी बहकर बाहर चला ही जाता है।

    केरल में बहुत से ऐसे शिक्षण संस्थान हैं जिनके पास बड़े कैम्पस हैं लेकिन वो अपना पानी पैदा नहीं करते हैं। आईआईएम कोझिकोड इस मामले में पूरी तरह से आत्मनिर्भर हो चुका है। उसने इसके उपाय किये। सबसे पहले वर्षाजल संचयन के लिये एक 1.5 एकड़ का तालाब बनाया। यह तालाब दोहरा फायदा देता है। इससे भूजल रिचार्ज होने के साथ-साथ फरवरी तक कैम्पस की पानी की जरूरतों को पूरा किया जाता है। जहाँ तक पहाड़ी से आने वाले पानी का सवाल है उसे सीधे कैम्पस तक नहीं लाया जा सकता था इसीलिये उस पानी को रोकने के उद्देश्य से आस-पास के इलाकों में वर्षाजल संचय करने की योजना बनाई गई। आसपास के कुछ एकड़ जमीन में यह पानी इकट्ठा होता है जो कैचमेंट एरिया की तरह काम करता है।

    इस कैचमेंट में इकट्ठा होने वाला पानी बड़े तालाब को रिचार्ज करने का काम करता है। तालाब ओवरफ्लो न हो जाये इसके लिये तालाब की मेड़बंदी की गई है। इसके बावजूद यह सम्भव नहीं है कि पहाड़ी इलाके से जब पानी नीचे की तरफ आता है तो सारा-का-सारा पानी रोक लिया जाये इसीलिये कैम्पस से बाहर जाने वाले पानी को एक नहर में भेज दिया जाता है। तालाब में जो पानी इकट्ठा होता है उसे एक पम्प के जरिए पहाड़ी पर बनाई गई टंकी में चढ़ाया जाता है। यही पानी घरेलू इस्तेमाल सहित पीने के लिये प्रयोग में लाया जाता है। चूँकि, कैम्पस बनने के साथ ही वर्षाजल संरक्षण की योजना भी बना ली गई थी इसीलिये छतों को इस प्रकार से बनाया गया है कि वर्षा के पानी के साथ पत्ते बहकर न आएँ।

    सवाल यह उठता है कि एक सरकारी संस्थान ने इतनी बुद्धिमानी का काम भला कैसे कर लिया? संस्थान के सिविल इंजीनियर राजीव वर्मा कहते हैं कि ये टीम वर्क का प्रभाव है। इसे आप सामूहिक सोच का परिणाम भी कह सकते हैं। उस वक्त हमारे जो डायरेक्टर थे उनका नाम अमरलाल कालरो था। वो एक खुले दिमाग के आदमी थे और नए विचारों का हमेशा स्वागत करते थे। हमें उस वक्त पानी मिलने की कहीं से कोई खास उम्मीद भी नहीं थी। इसलिये हमने वर्षाजल संरक्षण पर विचार किया और नतीजा आपके सामने है।

    उस वक्त जब पहाड़ी से नीचे आने वाले पानी के संरक्षण के बारे में विचार किया गया तो भूमि के कटाव का खतरा एक बड़ी समस्या थी क्योंकि वर्षाजल पहाड़ी से सीधे ढलान पर आता था। पहाड़ी की ऊँचाई करीब 80 मीटर है। आईआईएम के सभी भवन यहाँ तक कि स्टाफ क्वार्टर भी पहाड़ी पर ही हैं। कैम्पस में पहुँचने के लिये जो सड़कें बनाई गई थीं उससे भी मिट्टी के कटाव का खतरा पैदा हो गया था। इसीलिये वर्षाजल संरक्षण के काम में लगे लोगों ने पहाड़ी पर कंटूर लाइन बनाना शुरू किया। पहाड़ी पर जो खड्डे पहले से थे उन्हें सुधारा गया और कुछ नए खड्डे भी तैयार किये गए जो पानी को रोकने का काम करते थे।

    ऐसे कई अन्य प्रयोग किये गए जिससे बहते पानी को रोका जा सके और उसका साल भर इस्तेमाल किया जा सके। इसके अलावा कैम्पस में स्थित घास का मैदान एक ऐसी विशेषता है जो आज आईआईएम कोझिकोड की पहचान बन गया है। पहाड़ी पर बने इस कैम्पस का घास का मैदान आज लोगों के लिये आकर्षण का केन्द्र है। इस घास के मैदान को बनाने और बचाने की कहानी भी बड़ी सुझबूझ भरी है।

    कैम्पस में घास का मैदान बनाने के लिये जमीन पर पहले जूट की चटाई बिछाई गई और फिर घास की एक खास प्रजाति लगाई गई। जूट की चटाई बिछाने का मकसद ये था कि बारिश में मिट्टी के बहाव को रोका जा सके जिससे घास तथा मैदान दोनों सुरक्षित रहें। यह प्रयोग तो सफल रहा लेकिन एक समस्या थी। घास की जिस प्रजाति का चुनाव किया गया था गर्मियों में उसकी नियमित सिंचाई करनी पड़ती थी। महीने में दो बार। यह पानी का अतिरिक्त खर्च था जो कैम्पस की जरूरतों को पूरा करने में मुश्किल पैदा कर रहा था। इसीलिये घास की ऐसी प्रजाति लगाई गई जिसे गर्मियों में भी बहुत कम पानी की जरूरत पड़ती थी। समय के साथ जूट की चटाई जमीन में समा गई और आईआईएम कैम्पस एक हरे-भरे कैम्पस के रूप में जाना जाने लगा।

    सिर्फ 80 लाख रुपए की लागत से बनाई गई ये व्यवस्था आज केरल ही नहीं बल्कि पूरे देश के व्यावसायिक संस्थानों के लिये एक मिसाल है।

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    जहाँ चाह वहाँ राह

    editorialFri, 07/27/2018 - 18:30

    सौर ऊर्जादिल्ली सरकार ने, हाल ही में, किसानों की आय में तीन से पाँच गुना तक इजाफा करने के लिये मुख्यमंत्री किसान आय बढ़ोत्तरी योजना को मंजूरी दी है। इस अनूठी योजना के अन्तर्गत किसान के एक एकड़ खेत के अधिकतम एक तिहाई हिस्से पर सोलर पैनल लगाए जाएँगे और बिजली पैदा की जाएगी।

    सोलर पैनल लगाने वाली कम्पनी से दिल्ली सरकार का अनुबन्ध होगा और वह इस योजना के तहत पैदा होने वाली बिजली को चार रुपए प्रति यूनिट की दर से दिल्ली सरकार के विभिन्न विभागों के साथ ही आम जनता को भी बेचेगी। सोलर पैनल लगाने का पूरा खर्च कम्पनी द्वारा वहन किया जाएगा। किसानों को इस पर आने वाले खर्चे से पूर्णतः मुक्त रखा जाएगा।

    दिल्ली सरकार का मानना है कि एक एकड़ जमीन से किसान को हर साल बीस से तीस हजार रुपयों तक की आय होती है। जमीन के एक तिहाई हिस्से पर सोलर पैनल लगाने से किसान को होने वाले नुकसान की भरपाई सरकार उन्हें किराया देकर करेगी। इस योजना के तहत किसानों को सालाना एक लाख रुपया किराए के रूप में प्राप्त होगा।

    साफ है कि योजना किसानों के लिये घाटे का नहीं बल्कि फायदे का सौदा है। वे पहले की तरह ही अपनी जमीन के दो तिहाई हिस्से पर फसल उगाने के लिये स्वतंत्र होंगे। सरकार द्वारा जमीन के इस टुकड़े से होने वाली अनुमानित आय में सालाना मात्र दस हजार रुपए की कमी आएगी। इस तरह उन्हें तीस हजार की जगह एक लाख बीस हजार प्राप्त होंगे अर्थात आय में चार गुना बढ़ोत्तरी होगी।

    दिल्ली सरकार का मानना है कि चूँकि सोलर पैनल जमीन से साढ़े तीन मीटर की ऊँचाई पर लगाए जाएँगे इसलिये उनकी जमीन बेकार नहीं जाएगी। सोलर पैनल लगाने से खेती के काम में कोई खास व्यवधान नहीं आएगा और किसान जमीन के उस हिस्से से भी उत्पादन ले सकेंगे। इस तरह यह किसानों के लिये अतिरिक्त आय होगी जो अन्ततः उनकी सालाना आमदनी को बढ़ाएगी।

    ज्ञातव्य है कि मौजूदा समय में दिल्ली सरकार नौ रुपए प्रति यूनिट की दर से बिजली खरीदती है। और इसका बोझ अन्ततः दिल्ली की जनता को उठाना होता है। इस नई व्यवस्था के कारण लोगों को नौ रुपए की जगह चार रुपए प्रति यूनिट की दर से बिजली मिलेगी जिससे उन्हें प्रति यूनिट पाँच रुपए की बचत होगी। राज्य सरकार के सभी विभागों को भी इसी दर पर बिजली प्राप्त होगी जिससे सरकार को हर साल 400 से 500 करोड़ रुपए की बचत होगी।

    पिछले कई सालों से किसानों की आय बढ़ाने के लिये अनेक प्रयास किये जाते रहे हैं। खेती की लागत का हिसाब-किताब लगाया जाता रहा है। क्या जोड़ें और क्या घटाएँ पर खूब माथापच्ची होती रही है। न्यूनतम समर्थन मूल्य क्या हो इस विषय पर अर्थशास्त्री से लेकर मंत्रालय, नौकरशाही और जन-प्रतिनिधि शिद्दत से बहस करते रहे हैं पर सर्वमान्य लागत फार्मूला या देय समर्थन मूल्य हमेशा विवादास्पद ही रहा है।

    अनेक लोग पक्ष में तो अनेक विपक्ष में दलील देते रहे हैं। यह सही है कि किसानों को लाभ पहुँचाने के लिये अनेक उपाय सुझाए तथा लागू किये जाते रहे हैं। उन सब अवदानों के बावजूद किसान कभी कर्ज के चक्रव्यूह का भेदन नहीं कर पाता है। कर्ज माफी का फार्मूला भी सालाना कार्यक्रम बनता नजर आता है। सारी कसरत के बावजूद कोई भी प्रस्ताव या निर्णय किसान की न्यूनतम आय सुनिश्चित नहीं कर पाया है। उनके पलायन को भी कम नहीं कर पाया है। खेती से होते मोहभंग को कम नहीं कर पाया और माली हालत में अपेक्षित सुधार नहीं ला पाया है।

    लगता है कि दिल्ली सरकार ने एक साथ दो लक्ष्यों का सफलतापूर्वक भेदन किया है। महंगी बिजली का विकल्प खोजकर न केवल अपना खर्च कम किया है वरन दिल्ली की जनता से टैक्स के रूप में वसूले पैसों की भी चिन्ता की है। यह बहुत कम प्रकरणों में ही होता है। दूसरे, दिल्ली सरकार ने अपने राज्य के किसानों की सालाना आय को सुनिश्चित किया है। यह आय हर साल कम-से-कम एक लाख रुपए अवश्य होगी और उन्हें मानसून की बेरुखी के कारण होने वाले नुकसान से बचाएगी। पुख्ता रक्षा कवच उपलब्ध कराएगी और आत्महत्या के आँकड़े को कम करेगी।

    लगता है दिल्ली के मुख्यमंत्री किसान आय बढ़ोत्तरी योजना की अवधारणा भारत की परम्परागत खेती की उस मूल अवधारणा से प्रेरित है जिसमें मानसून पर निर्भर अनिश्चित खेती को सुनिश्चित आय देने वाले काम से जोड़ा जाता था। पहले ये काम पशुपालन हुआ करता था। अब समय बदल गया है। गोचर खत्म हो गए हैं। खेती में काम आने वाले जानवर अप्रासंगिक हो गए हैं। इसी वजह से सोलर पैनल के माध्यम से आय जुटाने का नया रास्ता इजाद किया गया है।

    एक बात और, दिल्ली सरकार की इस नवाचारी योजना ने खेती पर मानसून की बेरुखी से होने वाले खतरे पर चोट नहीं की है। अच्छा होता, इस योजना के साथ-साथ मानसून की बेरुखी पर चोट करने वाली योजना का भी आगाज होता। अर्थात ऐसी योजना, जिसके अन्तर्गत कम-से-कम खरीफ की फसल की शत-प्रतिशत सुरक्षा की बात, हर खेत को पानी की बात और निरापद खेती (आर्गेनिक खेती) से जोड़कर आगे बढ़ाई होती। लगता है, इस बिन्दु पर किसानों से सीधी बात होनी चाहिए। समाधान वहीं से निकलेगा। निरापद खेती का भी आगाज वहीं से होगा। असम्भव कुछ भी नहीं है। आइडिया कभी भी किसी के मोहताज नहीं रहे बस अन्दर से चाह होनी चाहिए। इसी कारण कहा जाता है, ‘जहाँ चाह वहाँ राह।’सम्भवतः इसी आधार पर दुष्यन्त आसमान में छेद करने के लिये जोर से पत्थर उछालने की पैरवी करते हैं।

    अन्त में कहा जा सकता है कि दिल्ली सरकार के किसान आय बढ़ोत्तरी योजना से किसानों की एक लाख रुपए सालाना आमदनी सुनिश्चित हुई है, सम्भवतः उत्पादन की चुनौती बाकी है।

     

     

     

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    उत्तर का “टांका” दक्षिण मेंeditorialFri, 07/27/2018 - 18:43

    Source
    द वाटर कैचर्स, 2017
    थुम्बे बाँध की वजह से नेत्रावती नदी और खारा हो गईउत्तर भारत के राजस्थान और गुजरात में टांका बहुत प्रचलित और प्राचीन नाम है। टांका भूजल संरक्षण का एक साधन है। लेकिन दक्षिण के किसी राज्य में टांका दिख जाये तो क्या आश्चर्य नहीं होगा? टांका अगर उस राज्य में दिखे जहाँ औसत 4000 मिलीलीटर सालाना वर्षा होती है तो आश्चर्य होना स्वाभाविक है। जब यह किसी पुराने गिरजाघर में दिख जाये तो उसके बारे में जानने की उत्सुकता बढ़ जाना लाजमी है। यह समझने की जरूरत बढ़ जाती है कि आखिर किसने और क्यों यहाँ टांका बनाया होगा?

    संत फिदलिस मठ, एक फ्रेंच चर्च मठ है जिसकी स्थापना 1526 में हुई थी। हालांकि अब ये मठ और इसमें बना चर्च उपयोग में नहीं है फिर भी हम जिस टांका की चर्चा कर रहे हैं वो इसी ईसाई मठ में है। इसे इस ईसाई मठ में बनाना इसलिये भी आश्चर्यजनक लगता है क्योंकि चर्च के बगल में ही नेत्रावती नदी बहती है। चर्च और मठ को यहाँ से अबाध जल मिल सकता था फिर उन्होंने उस तकनीक पर जल संरक्षण की योजना क्यों बनाई जो बहुत कम वर्षा वाले क्षेत्रों में बनाई जाती है?

    एक लाइन में जवाब चाहिए तो जवाब है खारा पानी। गर्मियों के मौसम में अक्सर ऐसा होता है कि समुद्र का पानी नदी के पानी को भी खारा कर देता है। सम्भवत: इसी कारण से उस समय टांका पद्धति को अपनाने की जरूरत महसूस की गई जब चर्च को पानी का कोई संकट नहीं था। हालांकि फादर ओथो कुछ और ही कारण बताते हैं। फादर ओथो का कहना है कि उस वक्त कुआँ मठ से बहुत नीचे था। जाहिर है, वहाँ से पानी खींचकर लाने में दिक्कत होती थी। सम्भवत: इसीलिये उन्होंने मीठे पानी के लिये टांका को चुना होगा।

    लेकिन फादर भी खारे पानी की समस्या से इनकार नहीं करते हैं। वो जिस कुएँ का जिक्र करते हैं उसमें जमा होने वाला पानी इस्तेमाल के लायक नहीं बचा है। मानसून के दिनों में भी उसका पानी काला ही रहता है। कुएँ के पानी की खराबी के लिये यहाँ नदी जल से होने वाली सिंचाई जिम्मेदार है। फादर कार्नालियस जो कि कभी इस चर्च के प्रमुख रहे हैं वो कहते हैं कि हम लोग गर्मियों के दिनों में नारियल के बागानों की सिंचाई के लिये नदी का पानी इस्तेमाल करते थे। उस वक्त गर्मियों में नदी का पानी खारा हो जाता था। यही पानी कुएँ में भी पहुँचता था और धीरे-धीरे कुएँ का पानी इस्तेमाल के लायक नहीं रहा।

    बहरहाल, चर्च में टांका का प्रवेश 1930 में हुआ जब चर्च की मरम्मत की जा रही थी। एक यूरोपीय पुजारी फादर सिम्फोरियन ने इसे डिजाइन किया था। जब चर्च का पुनर्निर्माण शुरू हुआ तो बरामदे में जो तहखाना था उसे ही टांका में परिवर्तित कर दिया गया। यह टांका 20 फुट लम्बा, नौ फुट चौड़ा और 12 फुट ऊँचा था। इस टांके में करीब 60,000 लीटर पानी इकट्ठा किया जा सकता है। दीवारों पर लगी लोहे की नालियों के जरिए छत का पानी इस टांका तक पहुँचाया जाता है। क्योंकि उस समय यहाँ बिजली की सुविधा उपलब्ध नहीं थी इसीलिये शौचालय और स्नानघर ऐसी जगह बनाए गए कि पानी को पम्प करने की जरूरत ही न पड़े। सत्तर अस्सी सालों बाद इतना बदलाव जरूर हुआ है कि अब पुरानी लोहे की पाइपों को पीवीसी पाइप से बदल दिया गया है लेकिन टांका अभी भी सही सलामत है और काम करता है।

    टांका में जो पानी इकट्ठा होता है उसका इस्तेमाल कैसे और किस रूप में किया जाता था इसकी बहुत जानकारी आज उपलब्ध नहीं है। फादर कार्नालिस कहते हैं कि इसका उपयोग पीने के अलावा बाकी दैनिक जरूरतों को पूरा करने के लिये किया जाता था। इसकी एक वजह ये भी थी कि छत के पानी को टांका में पहुँचाने से पहले उसके फिल्टर करने की कोई व्यवस्था नहीं थी। डाक्टर कार्नालिस अपने बीते दिनों को याद करते हुए कहते हैं कि मैं यहाँ छात्र रहा हूँ। जिन दिनों मैं यहाँ पढ़ता था हमें नहाने के लिये सिर्फ एक बाल्टी पानी दिया जाता था। हम बाल्टियों में पानी भरकर ले जाते थे।हालांकि अब मोटर लग गई है और बाल्टियों में पानी भरकर ले जाने की जरूरत नहीं है।

    लेकिन नेत्रावती के खारे पानी की समस्या सुधरने की बजाय बिगड़ती ही जा रही है। दशकों पहले नदी का पानी मार्च के बाद ही समुद्र का पानी नदी की तरफ आ जाता था और नदी का पानी खारा हो जाता था। लेकिन जब से थुम्बे बाँध बना है नदी का पानी कभी-कभी जनवरी से पहले भी खारा हो जाता है।

    चर्च में पीने और खाना बनाने के लिये पानी आसपास के दूसरे स्रोतों से लाया जाता है लेकिन वह भी बहुत विश्वसनीय नहीं है। इस बात की पूरी सम्भावना है कि भविष्य में पानी की समस्या और विकराल होगी। इस समस्या से निपटने के लिये चर्च ने एक और 25 हजार लीटर का अतिरिक्त टैंक बना लिया है। चर्च के पदाधिकारियों का कहना है कि जिस दिन हमें लगेगा कि अब पानी का कोई और स्रोत हमारे पास नहीं बचा हम वर्षाजल को इस टैंक की तरफ मोड़ देंगे।

    इन प्रयासों से उनके लिये सबसे बड़ा सबक यही है कि वर्षाजल की एक बूँद भी बर्बाद मत होने दो। अगर उस पानी को पीने के लिये नहीं सहेज सकते तो बाकी दूसरे कामों के लिये इस जल को संरक्षित करो। यह प्रयोग दूसरे लोग भी कर सकते हैं। वर्षाजल का इस्तेमाल भूजल और बिजली दोनों की बचत करेगा।

    मलनाड इलाके में टांका के जरिए वर्षाजल संरक्षण का यह सम्भवत: इकलौता उदाहरण है लेकिन इसे पूरे तटीय कर्नाटक में इस्तेमाल किया जा सकता है। मलनाड इलाके में पीने के पानी का जबरदस्त संकट रहता है। हर साल जिला प्रशासन पीने का पानी उपलब्ध कराने के लिये अच्छी खासी धनराशि खर्च करता है। बड़े औद्योगिक घराने, व्यावसायिक संस्थान चाहें तो बहुत कम खर्चे में अपने लिये मीठे पानी का इन्तजाम कर सकते हैं।

    अगर कोई 60 हजार लीटर का टांका बनाता है तो साल में 4 लाख से 6 लाख लीटर पानी इकट्ठा कर सकता है। भले ही वर्षा बहुत होती हो लेकिन पानी का संरक्षण न किया जाये तो वर्षाजल बहकर दूर समंदर में समा जाता है। इसके लिये जनता में भी जागरण पैदा करना चाहिए ताकि वो अपना पानी संरक्षित कर सके।

    अच्छी बात ये है कि जिला प्रशासन को भी अब ये बात महसूस हो रही है कि भले ही यह वर्षा क्षेत्र हो लेकिन पानी का संकट दूर करना है तो वर्षाजल को संरक्षित करने के अलावा और कोई उपाय नहीं है। अब गाँवों और विद्यालयों में सरकारी योजनाओं के तहत वर्षाजल संरक्षण की योजनाएँ लागू की जा रही हैं। आज के प्रयास निश्चित रूप से स्वागत योग्य हैं लेकिन दशकों पहले चर्च के उपाय की उपयोगिता को कम करके नहीं आँका जा सकता।


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    नमामि गंगे रोपेगी, ऑलवेदर रोड समाप्त करेगीRuralWaterFri, 03/09/2018 - 18:19


    चमोली-कर्णप्रयाग हाईवे पर विकास की बलि चढ़ते पेड़चमोली-कर्णप्रयाग हाईवे पर विकास की बलि चढ़ते पेड़सड़क बहुत चौड़ी होगी, चमकती हुई यह सड़क होगी, मोटर वाहन फर्राटे भरेंगे, कभी अवरोध नहीं होगा, ना ही मोटर दुर्घटना होगी, ना कभी भूस्खलन और आपदा के कारण सड़क बन्द रहेगी, वर्ष भर लोग चारों धार्मिक स्थलों का दीदार करते रहेंगे और पुण्य कमाएँगे। जहाँ-जहाँ से ऑलवेदर रोड जाएगी वहाँ-वहाँ स्थानीय लोगों को स्वरोजगार प्राप्त होगा।

    पड़ोसी दुश्मन राज्य अपनी सीमाओं तक आधुनिक सुविधाओं को जुटा चुका है, इसलिये ऑलवेदर रोड की नितान्त आवश्यकता है। ऐसी सुन्दर कल्पना और सुहावना सपना हमारे प्रधानमंत्री मोदी ही देख सकते हैं। अब वह ऑलवेदर रोड के रूप में साकार होने जा रही है। ऐसा ऑलवेदर रोड महापरियोजना से जुड़े राजनेता और अफसरान गाहे-बगाहे कहते फिरते दिखते हैं।

    उल्लेखनीय हो कि यहाँ ऑलवेदर रोड को लेकर एक दूसरा पक्ष भी सामने आ रहा है। लोगों का कहना है कि हमारे प्रधानमंत्री का यह भी सपना है कि गंगा को स्वच्छ और निर्मल बनाया जाये। इसलिये ‘नमामि गंगे परियोजना’ है।बताया जा रहा है कि नमामि गंगे परियोजना के तहत उत्तरकाशी से गंगोत्री तक 30 हजार हेक्टेयर में वृहद वृक्षारोपण होगा और इन्हीं क्षेत्रों से ऑलवेदर रोड गुजरेगी जहाँ हजारों पेड़ों का कटान होना तय हो चुका है।

    गफलत यह है कि पेड़ तुरन्त लगाएँगे भी और तुरन्त उनकी बलि ऑलवेदर रोड के लिये अन्य वृक्षों के साथ चढ़ जाएगी। बता दें कि ढालदार पहाड़ों पर एक पेड़ गिराने का अर्थ है 10 अन्य पेड़ों को खतरे में डालना। जहाँ-जहाँ से ऑलवेदर रोड गुजरेगी वहाँ-वहाँ के स्थानीय लोगों से बातचीत करने पर पता चला कि उनके लिये ऑलवेदर रोड जैसी परियोजना मौजूदा समय में चिन्ता का विषय बना हुआ है।

    श्रीनगर गढ़वाल में बद्रीनाथ हाइवे पर वर्षों पुराने स्वस्थ पेड़ों पर ऑलवेदर रोड योजना के तहत खूब आरिया चल रही हैं। जैसे-जैसे पेड़ों की कटाई आगे बढ़ रही है वैसे-वैसे श्रीनगर शहर की हालात निर्वस्त्र जैसी दिखने लग गई है।

    इस पर हेमवती नन्दन बहुगुणा केन्द्रीय विश्वविद्यालय श्रीनगर गढ़वाल में भूगोल विभागाध्यक्ष डॉ. मोहन पंवार ने कहा कि अभी तक ऑलवेदर रोड की जानकारी विशेषज्ञों को नहीं मिली है। वे चाहते हैं कि इस सड़क के चौड़ीकरण के लिये टिकाऊ डिजाइन यहाँ की भूगर्भिक संरचना के अनुसार बनाया जाय।हे.न.ब. केन्द्रीय विश्वविद्यालय श्रीनगर गढ़वाल में पर्वतीय शोध केन्द्र के नोडल अधिकारी डॉ. अरविन्द दरमोड़ा ने कहा कि जंगल बचाकर सड़क बनाने की नई तकनीकी पर विचार किया जाना चाहिए।

    नंदप्रयाग- बद्रीनाथ हाईवे पर कटे हुए पेड़ों को लादते श्रमिकऑलवेदर रोड के कारण ऋषिकेश से बद्रीनाथ और रुद्रप्रयाग-गौरीकुण्ड मार्गों पर सरकारी आँकड़ों के अनुसार अब तक कुल 9105 पेड़ काटे जा चुके हैं। इसके अलावा 8939 और नए पेड़ ऋषिकेश बद्रीनाथ हाइवे पर चिन्हित किये गए हैं। जिसके कटान की स्वीकृति ऑनलाइन ली जा रही है। जबकि उत्तराखण्ड सरकार के अपर मुख्य सचिव (लोनिवि) ओम प्रकाश का दावा है कि इस परियोजना से लगभग 43 हजार पेड़ों का कटान होगा।तिलवाड़ा-गौरीकुण्ड मार्ग पर पीपल के पेड़ भी काट दिये गए हैं।

    होटल व्यावसायी जे.पी. नौटियाल ने कहा कि उनके होटल के आगे तीन पीपल के बड़े पेड़ यात्रा सीजन में देशी-विदेशी पर्यटकों को छाँव प्रदान करते थे। पीपल के पेड़ों के दोनों ओर गाड़ियाँ जा सकती थीं, उन्हें दुखः है कि इन पेड़ों की बलि भी ऑलवेदर रोड के कारण चढ़ गई। इसके अलावा उनका होटल भी 2-3 मीटर तक सड़क चौड़ीकरण की जद में आ चुका है, लेकिन उन्हें मुआवजे की राशि का अभी तक ठीक-ठीक पता नहीं है।

    बताया जा रहा है कि सड़क चौड़ीकरण से केदारनाथ हाइवे में रुद्रप्रयाग से लेकर फाटा तक तिलवाड़ा, रामपुर, सिल्ली, अगस्तमुनि, विजयनगर, गंगा नगर, बेड़ूबगड़, सौड़ी, गबनीगाँव, चन्द्रापुरी, भीरी, कुण्ड, काकड़ागाड़, सिमी, गुप्तकाशी, नाला, हयूनगाँव, नारायण कोटी, आदि स्थान आधे अथवा पूर्ण क्षतिग्रस्त हो सकते हैं। जबकि लोगों का विरोध देखकर रुद्रप्रयाग जिले के जिलाधिकारी मंगलेश घिल्डियाल को कहना पड़ा कि बस्तियों के आस-पास 24 मीटर के स्थान पर केवल 12 मीटर भूमि का अधिग्रहण होगा। लेकिन इसकी सच्चाई अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाई है।

    यहाँ फाटा में हार्डवेयर की दुकान चलाने वाले रघुवरशाह और गुप्तकाशी में कमल रावत का कहना है कि मुख्य मार्ग को छोड़कर नए स्थानों से प्रस्तावित सड़क का एलाइनमेंट भारी नुकसान का कारण बनेगा। केदारनाथ मार्ग पर काकड़ा गाड़ से सेमी होते हुए गुप्तकाशी तक के मार्ग को छोड़कर 10 किमी से अधिक सिंगोली के घने जंगलों के बीच से नया एलाइनमेंट लोहारा होकर गुप्तकाशी तक किया जाएगा। इसी तरह फाटा बाजार को छोड़कर मैखण्डा से खड़िया गाँव होते हुए नई रोड का निर्माण किया जाना है। फाटा और सेमी के लोग इससे बहुत आहत हैं। यदि ऐसा होता है तो इन गाँवों के लोगों का व्यापार और सड़क सुविधा बाधित होगी। इसके साथ ही फाटा के पास पौराणिक मन्दिर, जलस्रोत भी समाप्त हो जाएँगे इससे लोगों की आस्था को नुकसान पहुँचेगा।उनका कहना है कि जिस रोड पर वाहन चल रहे हैं उसी रोड पर सुविधा मजबूत की जानी चाहिए। नई जमीन का इस्तेमाल होने से लम्बी दूरी बढ़ेगी और चौड़ीपत्ती के जंगल भारी मात्रा में नष्ट होंगे। इसी प्रकार रुद्रप्रयाग, अगस्तमुनि दो अन्य ऐसे स्थान हैं जहाँ पर लोग सड़क चौड़ीकरण नहीं चाहते हैं।

    केदारनाथ हाईवे पर निर्ममता से काटा गया पीपल का पेड़इस सम्बन्ध में विश्व हिन्दू परिषद की कार्यकर्ता उमा जोशी का कहना है कि अगस्तमुनि बाजार को छोड़कर नए स्थान से यदि ऑलवेदर रोड बनाई गई तो वनों का बड़े पैमाने पर कटान होगा और यहाँ का बाजार सुनसान हो जाएगा।काकड़ा गाड़ में चाय की दुकान चलाने वाले वन पंचायत सरपंच दिनेश रावत का कहना है कि सरकार केवल डेंजर जोन का ट्रीटमेंट कर दें तो सड़कें ऑलवेदर हो जाएगी। उनकी चिन्ता है कि सड़क चौड़ीकरण से उनका होटल नहीं बच सकता है और वे बेरोजगार हों जाएँगे।

    इधर चार धामों में भूस्खलन व डेंजर जोन बेतरतीब निर्माण एवं अन्धाधुन्ध खनन कार्यों से पैदा हुए हैं। रुद्रप्रयाग जिले में रामपुर, सिल्ली सौड़ी बांसवाड़ा सेमी, कुंड, फाटा, बड़ासू आदि स्थानों में लगातार भूस्खलन वाले डेंजर जोन बने हुए हैं। बद्रीनाथ मार्ग पर देवप्रयाग, सिरोहबगड़, नन्दप्रयाग के पास मैठाणा, चमोली से पीपलकोटी के बीच 10 किमी सड़क और बिरही, गुलाबकोटी, हेलंग, हाथी पहाड़, पाण्डुकेश्वर, गोविन्दघाट, लामबगड़, विष्णु प्रयाग के निकट भी डेंजर जोन बने हुए हैं। इनके आस-पास से बाईपास के लिये भी कहीं से सड़क नहीं बन सकती है।

    गुप्तकाशी के आगे खुमेरा गाँव में सामाजिक कार्यकर्ता आत्माराम बहुगुणा और जिला पंचायत की पूर्व सदस्या उर्मिला बहुगुणा ने बताया कि केदारनाथ के लिये लगभग 23 हेली कम्पनियों को मिले लाइसेंस के कारण प्रदूषण बढ़ रहा है। गुप्तकाशी, नारायणकोटी, फाटा से जाने वाली हेली कम्पनियों के हेलीकाप्टर प्रतिदिन 28 बार उड़ान भरते हैं। इस तरह 23 कम्पनियों के हेलीकाप्टर कुल 644 बार उड़ान भरते हैं। इसके कारण हिमालय की बर्फ तेजी से पिघल रही है। इस तरह बढ़ रहे वायु प्रदूषण के कारण यहाँ पालतू और वन्य पशु खतरे में पड़ गए हैं। इस तरह न जाने कितने ही जानवरों की पहाड़ों से कूद कर मृत्यु हो चुकी है।

    मौजूदा समय में ऑलवेदर रोड के नाम पर बेहिचक सैकड़ों पेड़ कट रहे हैं। लोगों का कहना है कि बद्रीनाथ हाईवे के दोनों ओर कई ऐसे दूरस्थ गाँव हैं, जहाँ बीच में कुछ पेड़ों के आने से मोटर सड़क नहीं बन पा रही है। कई गाँवों की सड़कें आज भी 2013 की आपदा के बाद से नहीं सुधारी जा सकी है।

    गोपेश्वर के नगरपालिका अध्यक्ष संदीप रावत ने बताया कि सम्पूर्ण परियोजना को शुरू करने से पहले पहाड़ों की भूगर्भीय और भौगोलिक जाँच की जानी जरूरी थी। ताकि भविष्य में लामबगड़ और सिरोहबगड़ जैसे नए भूस्खलन जोन न बन सकें।उन्होंने ने कहा कि गौचर, नंदप्रयाग, कर्णप्रयाग, चमोली और पीपलकोटी में स्थानीय जनता की परिसम्पतियों पर क्षरण मूल्य लागू न किया जाय। निर्माण के दौरान मार्ग अवरुद्ध होने पर जनता को होने वाली परेशानी के हल को हाईवे पर मौजूदा वैकल्पिक मार्गों की व्यवस्था से की जाय। वन सम्पदा को होने वाले नुकसान के आँकड़ों को सार्वजनिक किया जाय, साथ ही योजना का निर्माण सुनिश्चित तरीके से हो, जिससे कम-से-कम वनस्पतियों को नुकसान हो, सड़क चौड़ीकरण शुरू होने से क्षेत्र के लोगों को होने वाले नुकसान की भरपाई के लिये योजना सुनिश्चित की जानी चाहिए। चारधाम यात्रा के दौरान तीर्थयात्रियों को निर्माण कार्यों से कोई दिक्कत न हो, इसके लिये यात्रा शुरू होने से पहले ही रोडमैप तैयार किया जाये और बद्रीनाथ हाईवे पर तीन धारा और जोशीमठ में पिकनिक स्पॉट जैसे प्राकृतिक स्थलों के साथ कोई छेड़-छाड़ न की जाय।

    ऑलवेदर रोड के लिये बलि देते पेड़चिपको आन्दोलन से जुड़े रहे मुरारी लाल ने कहा कि पहाड़ों में निर्माण कार्य का मलबा आपदा का कारण बन रहा है।उनका सुझाव है कि मलबा बंजर जमीन को आबाद कर सकता है, जिस पर वृक्षारोपण करके सड़क को भी टूटने से बचाया जा सकता है।डॉ. गीता शाह का मानना है कि पर्यावरण और विकास दोनों की चिन्ता साथ-साथ करनी चाहिए विकास की अन्धी दौड़ से पर्यावरण को खतरा न पहुँचे।उन्होने कहा कि इस दिशा में शोध व अध्ययन की आवश्यकता है। श्रीनगर, रुद्रप्रयाग से होते हुए कर्णप्रयाग, चमोली, पीपलकोटी, जोशीमठ तक टू लेन सड़क कुछ जगहों को छोड़कर सम्पूर्णतः बनी हुई है। यहाँ पर नन्दप्रयाग से चमोली पीपलकोटी के बीच ऐसे डेंजर जोन हैं जहाँ यात्रा सीजन में सड़कें टूटती रहती हैं। श्रीनगर से आगे भी सिरोहबगड़ एक बड़ा भूस्खलन क्षेत्र है जहाँ पर जान माल का खतरा बना रहता है। ऐसे डेंजर जोनों से गाड़ियों की आवाजाही रखने के लिये लगातार काम होता रहता है लेकिन हर बरसात में इनकी संवेदनशीलता कुछ ज्यादा ही बढ़ जाती है। इन स्थानों पर चौड़ी सड़क बनाना बहुत बड़ी चुनौती होगी।

    प्रधानमंत्री मोदी ने ऑलवेदर रोड बनाने की घोषणा उत्तराखण्ड विधानसभा चुनाव प्रचार के वक्त की थी। तब से अब तक यह चर्चा रही है कि पहाड़ों के दूरस्थ गाँव तक सड़क पहुँचाना अभी बाकी है। सीमान्त जनपद चमोली में उर्गम घाटी के लोग सन 2001 से सुरक्षित मोटर सड़क की माँग कर रहे हैं। यहाँ कल्प क्षेत्र विकास आन्दोलन के कारण सलना आदि गाँवों तक जो सड़क बनी है उस पर गुजरने वाले वाहन मौत के साये में चलते हैं।

    यहाँ पर सड़क की माँग करने वाले प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता और वर्तमान में ग्राम प्रधान लक्ष्मण सिंह नेगी कहते हैं कि यहाँ 3500 कि जनसंख्या वाले क्षेत्र में कोई पलायन नहीं है। वे अपने जंगल लगा रहे हैं और गाँव तक पहुँचने के लिये कठिन रास्तों के कारण दोनों ओर 35 किमी सड़क चाहते हैं।पिलखी गाँव निवासी बलवीर सिंह नेगी का कहना है कि चीन सीमा पर मलारी से आगे रोड बहुत चौड़ी है।वे कहते हैं कि बद्रीनाथ मार्ग पर भूस्खलन क्षेत्रों का ट्रीटमेंट हो जाय तो बाकी रोड टू लेन बनी हुई है।ग्रामीण नन्दन सिंह नेगी दुखीः होकर कहते हैं कि सड़कों पर डामरीकरण के बाद बार-बार केबिल बिछाने के नाम पर सड़कें टूटती रहती हैं। जिसके कारण डामर भी उखड़ते हैं और सरकारी धन का दुरुपयोग होता है।उनका कहना है कि डामरीकरण से पहले ही सड़कों के किनारों के काम सभी विभागों को सामंजस्य के साथ पूरे कर लेने चाहिए।महिला नेत्री कलावती और हेमा का कहना है कि जोशीमठ से होकर बद्रीनाथ जाने वाली सड़क को ही ऑलवेदर का हिस्सा मान लेना चाहिए। क्योंकि यहाँ सड़क पहले से ही चौड़ी है।

    जोशीमठ के लोग हेलंग-मरवाड़ी बाईपास बनाने का विरोध कर रहे हैं। जबकि वर्षों से बद्रीनाथ का रास्ता जोशीमठ से बना हुआ है। जोशीमठ में तीर्थयात्री नृसिंह मन्दिर का दर्शन करते हैं और यहाँ हजारों स्थानीय लोगों की आजीविका होटल, रेस्टोरेंट आदि से चलती हैै। दूसरा अद्भुत प्राकृतिक सौन्दर्य और सीमान्त क्षेत्र का यह मुख्य स्थान है। पत्रकार कमल नयन का कहना है कि सड़क निर्माण का मलबा सीधे अलकनंदा में उड़ेला जा रहा है। जबकि यहीं पर जोशीमठ और बद्रीनाथ के बीच आधा दर्जन से अधिक डेंजर जोन पाण्डुकेश्वर, गोविन्दघाट, लामबगड़, बलदौड़ा पुल आदि स्थानों पर देखे जा सकते हैं।

    चमोली से कर्णप्रयाग तक कटे हुए पेड़ों के ढेर मिल जाएँगेजहाँ वर्षों से निरन्तर भूस्खलन हैै। इसको सुधारने का जितना भी काम अभी हो रहा है, उससे ऊपरी हिस्से के जंगल और ग्लेशियर द्वारा बने मलबों के ढेर लगातार गिरते जा रहे हैं। यहाँ दोनों ओर की ट्रैफिक हरेक घंटे में रोकनी पड़ती है। लोगों का कहना है कि यहाँ 20 किमी के क्षेत्र में कहीं भी दो लेन सड़क नहीं बन सकती है।पीपलकोटी के राकेश शाह बताते हैं कि सड़क चौड़ी होगी, यातायात सुलभ हो जाएगी मगर सड़क के ऊपरी साइड की दुकानें हमेशा के लिये समाप्त इसलिये हो जाएगी कि उसके बाद ऊपरी हिस्से में कोई भूमि नहीं बचती है। सड़क चौड़ीकरण के नाम पर दो बार सर्वे हो चुका है लेकिन यह भी तय नहीं हुआ कि प्रभावित लोगों को मिलने वाले मुआवजे की व्यवस्था कैसी होगी?

    इस यात्रा मार्ग पर होटल व्यवसाय से जुड़े विवेक नेगी को चिन्ता है कि निर्माण कार्यों का मलबा नदी में गिराया जा रहा है जबकि नदी सूख रही है। अब तो नदी भी ऑलवेदर रोड के कारण मलबे के लिये उपयुक्त डम्पिंग यार्ड बन गया है।बताया कि इस मार्ग पर दुकान, ठेली, चाय का ढाबा चलाने वाले छोटे व्यवसायों को ऐसा कोई नोटिस नहीं आया कि सड़क चौड़ीकरण के कारण उनकों उक्त स्थान से हटना पड़ेगा।

    आम लोगों में दहशत भी फैला रही है, जबकि होना यह चाहिए कि इस दौरान जिला पंचायत की भूमि पर ऐसे व्यापारियों के लिये दुकानों की व्यवस्था करनी भी सरकार की जिम्मेदारी होनी चाहिए। उनका यह भी कहना है कि केवल दिल्ली में बैठकर सड़क चौड़ीकरण का गूगल मैप सामने रखकर के चारों धामों के जन जीवन पर संकट पैदा करने जैसी स्थिति बना रहे हैं। यहाँ सड़क किनारे होटल चलाने वाले व्यवसायी कहते हैं कि सीमा सड़क संगठन और कम्पनियों के काम करने का तरीका बिल्कुल भिन्न है। इसलिये राष्ट्रीय राजमार्ग विस्तारीकरण में प्रभावित परिवारों की अनदेखी भारी पड़ सकती है।पीपलकोटी में नाम ना छपवाने बाबत कुछ शिक्षिकाएँ कहती है कि पहाड़ों की भूगर्भिक स्थिति को बाहर की निर्माण कम्पनियाँ नजरअन्दाज कर देती हैं। वे निर्माण करते समय भारी विस्फोटों का इस्तेमाल करते हैं। पहाड़ों के जलस्रोत प्रदूषित हो रहे हैं और भूस्खलन की समस्या दिनों दिन बढ़ रही है।कहा कि तीर्थयात्रियों के लिये पहाड़ केवल सैरगाह बन रहा है जो ऑलवेदर रोड बनने के बाद और अधिक बढ़ जाएगा।उनका कहना है कि पीपलकोटी से चमोली राजमार्ग के बीच कुछ स्थानों पर सक्रिय बड़े भूस्खलनों की एक सूची है। अच्छा हो कि ऐसे खतरनाक जोन पहले आधुनिक तकनीकी से ठीक किये जाने चाहिए।

    बद्रीनाथ हाईवे

    ऑलवेदर सड़क परियोजना एक महत्वाकांक्षी काम है वे समझते हैं कि पर्यावरण के कारणों पर आपत्तियाँ होंगी लेकिन वे दिशा-निर्देशों का पालन करने के लिये अपनी पूरी कोशिश करेंगे। सभी मौसमों की सड़कों की परियोजना का निर्माण अन्तरराष्ट्रीय मानदंडों के सख्त पालन के साथ किया जा रहा है, ताकि उचित परिशोधन पर विशेष जोर दिया जा सके और उन्हें प्रतिरोधक बना दिया जा सके। अगले दो वर्षों में उत्तराखण्ड में 2019 तक लगभग 50,000 करोड़ रुपए की 70 सड़कों का निर्माण होगा। जिसमें चारधाम रोड परियोजना और भारतमाला योजना के अन्तर्गत मंजूरी दे दी गई हैं। उन्होंने ऑलवेदर सड़क परियोजनाओं पर सक्रिय रूप से काम करने की प्रशंसा की है, जो चार प्रसिद्ध हिमालयी तीर्थस्थलों को जोड़ती है। सभी मौसम सड़क परियोजनाओं से कुल 900 किमी में से 400 किमी के लिये काम किया जा रहा है...नितिन गडकरी, केन्द्रीय सड़क एवं परिवहन मंत्री।

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    गंगा गाद - बिहार में बाढ़ की आशंकाRuralWaterSat, 03/10/2018 - 18:40


    गंगागंगागंगा की पेट में इकट्ठा गाद को हटाने का इन्तजाम शीघ्र नहीं किया गया तो बिहार में बाढ़ की विभीषिका अधिक भयावह हो सकती है। यह चेतावनी गंगा की गाद की समस्या का अध्ययन करने के लिये केन्द्र सरकार द्वारा बनाई गई एक उच्चस्तरीय समिति की है जिसकी रिपोर्ट अगले महीने सौंपी जानी है।

    इस ग्यारह सदस्यीय समिति के सदस्य राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, पटना के प्राध्यापक डॉ. रामाकांत झा ने कहा कि गाद को हटाने के लिये पहली बार बड़ा प्रयास करना होगा, फिर ऐसे इन्तजाम करने होंगे कि गाद जमा होने के बजाय प्रवाहित हो जाये। अभी बिहार में गंगा की धारा में गाद के बड़े जमाव वाले ग्यारह स्थल चिन्हित किये गए हैं, जहाँ से गाद हटाने का प्रभाव समूचे बिहार पर होगा और जल-निकासी में आसानी होगी। साथ ही गंगा में राह बदलने और कई धाराओं में बँट जाने की प्रवृत्ति में कमी आएगी।

    गंगा में एकत्र गाद की भयावह समस्या का अध्ययन करने के लिये हाल के वर्षों में चार समितियाँ बनीं। लेकिन डॉ. झा बताते हैं कि सभी समितियों ने राष्ट्रीय बाढ़ आयोग के उन्हीं आँकड़ों के आधार पर अध्ययन किया जिसका संकलन बाढ़ आयोग ने 1980 में किया था।

    इसरो की सहायता से अद्यतन आँकड़ा संकलित करने का काम अभी चल रहा है। इसके लिये केन्द्र सरकार ने केन्द्रीय जल आयोग के पूर्व अध्यक्ष ए.बी. पंड्या के नेतृत्व में ग्यारह सदस्यीय समिति का गठन किया है। इस समिति में एनआईटी पटना के डॉ. रमाकर झा भी एक सदस्य हैं। समिति एक महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट देने वाली है।

    इसरो से मिले आँकड़ों के साथ ही डॉ. झा की टीम ने गंगा की धारा का सरजमीनी सर्वेक्षण भी किया है। उनके अध्ययन के दायरे में बक्सर से लेकर फरक्का तक की गंगा की धारा समेटी गई है। इस सर्वेक्षण में ग्यारह ऐसे स्थल चिन्हित किए गए हैं जहाँ सर्वाधिक गाद जमा है और उसे हटाया जा सकता है।

    मोटे तौर पर उन स्थलों पर अधिक गाद एकत्र है जहाँ गंगा से कोई सहायक नदी मिलती है। इनमें घाघरा, सोन, गंडक, कोसी और बुढ़ी गंडक के अलावा कई छोटी नदियों के संगम स्थल शामिल हैं। सबसे अधिक गाद घाघरा के गंगा से मिलन स्थल डोरीगंज-बबुरा और गंडक नदी के मिलन स्थल सोनपुर के पास जमा है।

    बड़ी मात्रा में गाद जमाव के अन्य स्थल मनेर, माहुली, राघोपुर दियरा, रानीतोल-मेकरा, सिमरिया-बरौनी, मुंगेर, भागलपुर के पहले नरकटिया-मकंदपुर, कहलगाँव के पास अंभिया-घोघा, कोसी के मिलन-स्थल बरारी और साहेबगंज के निकट मनिहारी आदि हैं।

    उल्लेखनीय है कि जल संसाधन, नदी विकास और गंगा पुनरुद्धार मंत्रालय ने जुलाई 2016 में गंगा के गाद विमुक्तिकरण के उपाय सुझाने के लिये चितले समिति का गठन किया था और भीमगौड़ा (उत्तराखण्ड) से फरक्का तक गंगा के गाद विमुक्तिकरण के लिये दिशा-निर्देश तैयार करने का जिम्मा सौंपा था।

    इस मसले पर हाल के दिनों में इस समिति ने सबसे विस्तृत अध्ययन किया था तथा गाद और बालू में अन्तर स्पष्ट करते हुए नदी की पारिस्थितिकी और पर्यावरणीय प्रवाह के लिये गाद विमुक्तिकरण की भूमिका पर विचार किया है।

    समिति ने इस मसले को विस्तृत अध्ययन के लिये किसी तकनीकी संस्थान को सौंप देने का सुझाव दिया था जो आकृति वैज्ञानिक (मॉरफोलॉजिकल) अध्ययन कर ठोस सुझाव दे सके। चितले समिति ने निर्धारित तीन महीने के समय के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी।

    चितले समिति ने कहा है कि कटाव, गाद संवहन और गादजमाव बेहद जटिल परिघटनाएँ हैं। गाद प्रबन्धन और नियंत्रण के लिये हर जगह एक ही उपाय नहीं किया जा सकता क्योंकि इस पर क्षेत्रीयता का प्रभाव बहुत अधिक होता है। स्थानीय कारण जैसे टोपोग्रॉफी, नदी नियंत्रण संरचनाएँ, मिट्टी व जल संरक्षण उपाय, वृक्षाच्छादन और तटीय क्षेत्र में भूमि के उपयोग के तौर-तरीकों का नदी के गाद पर अत्यधिक प्रभाव होता है।

    नदी नियंत्रण संरचनाएँ (जैसे जलाशय, बैराज और पुल आदि), भूमि संरक्षण उपायों और गाद नियंत्रण कार्यक्रमों से निम्न प्रवाह क्षेत्र में गाद का बहाव कम होता है और वह गाद उक्त संरचना के आसपास एकत्र हो जाता है। लेकिन अनियंत्रित ढंग से गाद निकालने से पारिस्थितिकी और पर्यावरणीय प्रवाह पर प्रतिकूल प्रभाव हो सकता है। इसलिये गाद विमुक्तिकरण कार्यों की योजना बनाने और निष्पादित करने में बेहतर सिद्धान्तों और दिशा-निर्देशों का पालन करना आवश्यक है।

    रिपोर्ट के अनुसार गंगा मुख्य नदी का गूगल अर्थ मानचित्र पर पैमाइश करने से पता चला कि नदी के दोनों पाट गतिशील सन्तुलन की स्थिति में हैं। गाद का जमाव मुख्य तौर पर भीमगौड़ा बैराज के नीचे और गंगा से विभिन्न सहायक नदियों के मिलन स्थल के आसपास है। निकासी मार्ग का संकरापन, बड़े पैमाने पर गाद का जमाव और इसके नकारात्मक प्रभाव मुख्य तौर पर घाघरा के संगम और उसके आगे के बहाव क्षेत्र में देखा गया। घाघरा के संगम के बाद नदी के बाढ़ क्षेत्र की चौड़ाई लगभग 12 से 15 किलोमीटर तक फैल जाती है।

    नदी में गाद संवहन के महत्त्व को स्वीकार करते हुए समिति ने कहा है कि गाद विमुक्तिकरण के लिये जलग्रहण क्षेत्र का उपचार और जल छाजन विकास के साथ-साथ कृषि की बेहतर पद्धतियों को अपनाना जरूरी है और नदी तट संरक्षण, कटावरोधक कार्य इत्यादि नदी में गाद का प्रवाह कम करते हैं और इन्हें समेकित ढंग से कराया जाना चाहिए। कटाव, गाद का स्थानान्तरण और गाद जमाव नदी की प्राकृतिक व्यवस्थाएँ हैं और नदी की गाद सन्तुलन की अवस्था को बनाए रखा जाना चाहिए।

    नदी की बाढ़ को फैलने के लिये पर्याप्त जगह मिलनी चाहिए, जिसमें वह बिना किसी अड़चन के प्रवाहित हो सके। गाद को दूर करने के बजाय गाद को बहने का रास्ता देना बेहतर उपाय है।

    बालू खनन के मामले में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के दिशा-निर्देशों का उल्लेख करते हुए समिति ने गंगा नदी के गाद विमुक्तिकरण के लिये स्पष्ट दिशा-निर्देश प्रस्तावित किये। उसने कहा कि गंगा नदी अपने जलविज्ञान, गाद और प्राकृतिक तल और तट के अनुरूप सन्तुलन हासिल करने का प्रयास करती है।

    बाढ़ को नियंत्रित करने के लिये पर्याप्त बाढ़ क्षेत्र और झीलें उपलब्ध होना आवश्यक है। बाढ़ क्षेत्र में किसी भी प्रकार का अतिक्रमण, झीलों के भरने या नदी से सम्पर्क टूटने से बचाना चाहिए बल्कि निकट की झीलों से गाद हटाकर उनकी भण्डारण क्षमता बढ़ानी चाहिए। झीलों से गाद हटाने में भी यह ध्यान रखना चाहिए कि गाद प्रवाह की निरन्तरता कायम रहे।

    चितले समिति ने स्पष्ट कहा कि ऊपरी बहाव क्षेत्र में बैराज, पुल जैसे निर्माण कार्यों के कारण गाद भरने लगता है और नदी रास्ता भटक जाती है। नदी प्रशिक्षण करना और निर्माण स्थल के पास बहाव के अतिरिक्त मार्ग बनाने का कार्य इस तरह से कराया जाना चाहिए जिसका अन्यत्र नदी की आकारिकी पर प्रभाव नहीं पड़े।

    ऑक्सबो झीलों के रूप में खाली हुए इलाके को भरने के बजाय इसका इस्तेमाल बाढ़ नियंत्रण के लिये किया जाना चाहिए। प्रवाह के संकुचन के कारण बड़ी मात्रा में गाद जमा हो रही हो तो चयनित धारा से गाद निकालकर उसे गहरा किया जा सकता है ताकि जल प्रवाह उससे होकर हो।

    निकाली गई गाद को ऐसे वैकल्पिक जगहों पर रखा जा सकता है जिससे तटों के कटाव रोकने में मदद मिलने वाली हो। ऐसे स्थिर प्रवाह के विकास पर ध्यान देना चाहिए जिससे ऊपरी प्रवाह या निम्न प्रवाह में प्रतिकूल प्रभाव नहीं हो। बैराज और वीयर के पास गाद की निरन्तरता बनाए रखने पर ध्यान देना चाहिए। तटबन्ध, ठोकर और नदी प्रशिक्षण कार्यों को बाढ़ क्षेत्र में अतिक्रमण नहीं करना चाहिए या झीलों और दूसरे पर्यावरणीय क्षेत्र को नदी से अलग नहीं करना चाहिए।

    सहायक नदियों के संगम के पास, खासकर अत्यधिक गाद लाने वाली नदियों के संगम क्षेत्र में गाद निकालना आवश्यक हो सकता है जिससे नदी के जल प्रवाह की कुशलता में बढ़ोत्तरी हो।

    फरक्का बैराज के सामने इकट्ठा गाद के बारे बार बार उठने वाले मुद्दों को ध्यान में रखते हुए समिति ने यह सुझाव दिया कि वहाँ बनी उथली जगहों के आसपास नदी प्रशिक्षण कार्य का ध्यान रखते हुए गाद हटाई जा सकती है। इस गाद से फरक्का फीडर नहर की फिर से ग्रेडिंग और बैराज के जलाशय तटबन्धों को मजबूत किया जा सकता है।

    आवश्यक अध्ययन के बाद सेडिमेंट स्लूइसिंग की पद्धति अपनाई जा सकती है ताकि ऊपरी प्रवाह और निम्न प्रवाह के बीच गाद के संवहन की निरन्तरता बनी रहे और बरसात के समय गाद अपने आप बहकर निकल जाये। गाद निकालने की प्रक्रिया में इसका खासतौर पर ध्यान रखना होगा कि बैराज की वर्तमान संरचना को कोई नुकसान न पहुँचे।

    ऊपरी प्रवाह क्षेत्र से आने वाली गाद के सुरक्षित ढंग से निम्न प्रवाह क्षेत्र में चले जाने के लिये बैराज में आवश्यक इन्तजाम करने के लिये समुचित अध्ययन कराना चाहिए। यह भी ध्यान रखना होगा कि इस तरह बैराज से आगे निकला गाद निम्न प्रवाह क्षेत्र में अत्यधिक कटाव या दूसरे आकारिक समस्या पैदा नहीं करे।

    चितले समिति ने यह चेतावनी भी दी कि गाद हटाने के लिये खनन गतिविधियों के कई प्रतिकूल प्रभाव हो सकते हैं जैसे कि नदी तल का नीचे जाना, तटों का कटाव, धारा का चौड़ा होना, नदी की धारा के जल के सतह की प्रवणता कम होना, नदी के आसपास भूजल की प्रवणता का कम होना, पुलों, पाइपलाइनों, जेटी, बैराज, वीयर, जैसे मानव निर्मित संरचनाओं की नींव कमजोर होना और इन सबका पर्यावरणीय प्रभाव।

    गाद निकालने की कोई योजना बनाने या कार्य निष्पादन करने में एहतियात बरतने के लिये समिति ने खासतौर से हिदायत दी और एहतियाती उपायों को सूचीबद्ध किया है। उसने कहा कि गंगा के गाद प्रबन्धन का अध्ययन करने का जिम्मा किसी एक संस्थान को दी जा सकती है जो गंगा के साथ ही उसकी सहायक नदियों के गाद प्रबन्धन का अध्ययन करेगी। इस अध्ययन रिपोर्ट को गंगा से जुड़ी किसी परियोजना के पर्यावरणीय मंजूरी के समय आधार दस्तावेज के तौर पर उपयोग किया जाएगा।

    बहरहाल, चितले समिति की सिफारिशों पर वर्तमान में कार्यरत ग्यारह सदस्यीय समिति क्या रूप अपनाती है, यह तो उसकी आखिरी रिपोर्ट आने के बाद पता चलेगा।

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    नाउम्मीद स्वामी सानंद, फिर गंगा अनशन की राह पर

    HindiSun, 03/11/2018 - 13:38

    स्वामी सानंदस्वामी सानंदस्वामी श्री ज्ञानस्वरूप सानंद को उम्मीद थी कि भारतीय जनता पार्टी जब केन्द्र की सत्ता में आयेगी, तो उनकी गंगा माँगें पूरी होंगी। अपना पिछला गंगा अनशन, उन्होने इसी आश्वासन पर तोड़ा था। यह आश्वासन तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष श्री राजनाथ सिंह द्वारा दिया गया था।

    20 दिसम्बर, 2013 को वृंदावन के एक भवन में पुरी के शंकराचार्य स्वामी श्री निश्चलानंद जी ने अपने हाथों से जल पिलाकर आश्वस्त किया था कि राजनाथ जी ने जो कहा है, वह होगा। किन्तु स्वामी जी व्यथित हैं कि वह आज तक नहीं हुआ।इसीलिये उन्होने प्रधानमंत्री के नाम एक खुला पत्र लिखा है और उसमें लिखी तीन अपेक्षाओं की पूर्ति न होने पर आमरण अनशन करते हुए देहत्याग के अपने निर्णय से प्रधानमंत्री जी को अवगत कराया है। प्रसिद्ध पानी कार्यकर्ता श्री राजेन्द्र सिंह ने इसे सही समय पर उठाया कदम बताते हुए देश-दुनिया के सभी गंगा प्रेमियों से इसके समर्थन की अपील की है।

    असह्य हो गई है अब गंगा उपेक्षा


    निजी बातचीत में स्वामी श्री ज्ञानस्वरूप सानंद ने कहा - ''शुरु-शुरु में तो लगा कि भाजपा की सरकार कुछ करेगी। गंगाजी का अलग मंत्रालय बनाया। उमाजी माँ धारी देवी के मंदिर को डुबोने वाले श्रीनगर बांध के विरुद्ध वह खुद अनशन पर बैठी थीं। निशंक उस वक्त मुख्यमंत्री थे। उनका आश्वासन था कि धारी देवी के मंदिर को बचाया जायेगा। उमाजी गंगा मंत्री बनी तो सोचा कि वह कुछ ज़रूर करेंगी। लेकिन धारी देवी की मूर्ति तो अभी भी 20-25 फीट गहरे पानी में डूबी हुई है। इस तरह करते भाजपा को तीन साल, नौ महीने तो बीत चुके; मैं और कितनी प्रतीक्षा करुं ? गंगा जी के हितों की जिस तरह उपेक्षा की जा रही है। इससे होने वाली असह्य पीड़ा के कारण तो मेरा जीवन ही एक यातना बनकर रह गया है। अब और नहीं सहा जाता।सरकार की प्राथमिकता और कार्यपद्धति देखते हुए मेरी अपेक्षा की मेरे जीवन में पूर्ण होने की संभावना नगण्य है। मैने, प्रधानमंत्री को एक खुला पत्र भेजकर अपनी व्यथा कह दी है। पत्र में अपनी तीन अपेक्षाएं भी लिख दी है।''

    24 जनवरी को उत्तराखण्ड की उत्तरकाशी से जारी एक खुले पत्र में स्वामी श्री सानंद ने प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र भाई मोदी को 'प्रिय छोटे भाई नरेन्द्र मोदी' लिखकर संबोधित किया है। अपने संबोधन में स्वामी जी ने लिखा है - ''2014 के लोकसभा चुनाव तक तो तुम भी स्वयं को माँ गंगाजी के समझदार, सबसे लाडले और माँ के प्रति समर्पित बेटा होने की बात करते थे; पर माँ के आशीर्वाद और प्रभु राम की कृपा से वह चुनाव जीतकर तो तुम अब माँ के कुछ लालची, विलासिता प्रिय बेटे-बेटियों के समूह में फंस गये हो....।''

    उन्होने लिखा है - ''माँ के रक्त के बल पर ही सूरमा बने तुम्हारी चाण्डाल चौकड़ी के कई सदस्यों की नज़र तो हर समय जैसे माँ के बचे-खुचे रक्त को चूस लेने पर ही लगी रहती है....।’’

    तीन अपेक्षाएं


    स्वामी सानंद द्वारा पत्र में प्रस्तुत तीन अपेक्षाए कुछ यूं हैं:

    अपेक्षा - एक :पहली अपेक्षा में अलकनंदा और मंदाकिनी को गंगा की बाजू बताते हुए स्वामी जी ने अपेक्षा की है कि प्रधानमंत्री जी इन दोनो बाजुओं में छेद करने वाली क्रमशः विष्णुगाड-पीपलकोटी परियोजना, फाटा-ब्यूंग तथा सिगोली-भटवारी परियोजनाओं पर चल रहे सभी निर्माण कार्यों को तुरंत बंद करायें।

    इन परियोजनाओं पर चल रहे सभी निर्माण कार्य तब तक बंद रहें, जब तक कि अपेक्षा - दो में उल्लिखित न्यायमूर्ति गिरधर मालवीय समिति द्वारा प्रस्तावित गंगाजी संरक्षण विधेयक पर संसद में विस्तृत चर्चा कर मत-विभाजन द्वारा गंगाजी के हित में निर्णय नहीं हो जाता तथा अपेक्षा - तीनमें अपेक्षित “गंगा भक्त परिषद” की भी सहमति नहीं हो जाती।

    अपेक्षा - दो :न्यायमूर्ति गिरधर मालवीय समिति के द्वारा प्रस्तावित गंगाजी संरक्षण विधेयक पर संसद में अविलम्ब विचार कर पारित करने की बजाय, उसे ठण्डे बस्ते में डालने के लिए प्रधानमंत्री जी का जो कोई भी नालायक सहयोगी या अधिकारी अपराधी हो, प्रधानमंत्री जी उसे तुरंत बर्खास्त करें और खुद भी इस अपराध का प्रायश्चित करें। प्रायश्चित स्वरूप, वह विधेयक को शीघ्रातिशीघ्र पारित व लागू करायें।

    विक्रम संवत् 2075 में गंगा संरक्षण विधेयक को क़ानून बनाकर लागू करने तक संसद अन्य कोई भी कार्य न करे; यहां तक कि श्रृद्धांजलि, शोक प्रस्ताव तथा प्रश्नकाल भी नहीं। स्वामी जी ने अपेक्षा की है कि सरकार और संसद के लिए माँ गंगाजी के संरक्षण से ऊपर अब कुछ भी न हो।

    अपेक्षा - तीन :राष्ट्रीय स्तर पर एक 'गंगा भक्त परिषद' का गठन हो। गंगाजी के विषय में किसी भी निर्माण या विकास कार्य को करने के लिए (गंगा संरक्षण विधेयक कानून ) के अंतर्गत स्वीकार्य होने के साथ-साथ गंगा भक्त परिषद की सहमति भी आवश्यक हो।

    इस 'गंगा भक्त परिषद' में सरकारी और गैर-सरकारी दोनो प्रकार के व्यक्ति, सदस्य हों। प्रत्येक सदस्य यह शपथ ले कि वह कुछ भी सोचते, कहते और करते समय गंगाजी के हितों का ध्यान रखेगा तथा उसका कोई भी बयान, सुझाव, प्रस्ताव, सहमति अथवा कार्य ऐसा नहीं होगा, जिससे माँ गंगाजी का रत्ती भर भी अहित होने की संभावना हो।

    अपेक्षाएं पूरी न हुईं तो आमरण अनशन करते हुए देहत्याग


    मूल पत्र की भाषा तनिक भिन्न है। मैने, सरलता की दृष्टि से यहां से तनिक परिवर्तन के साथ प्रस्तुत किया है। मूल भाषा पढें तो स्पष्ट होता है उक्त तीनों अपेक्षाएं, महज अपेक्षाएं नहीं एक गंगापुत्र सन्यासी द्वारा एक गंगापुत्र प्रधानमंत्री को दिए आदेश हैं। इनकी पूर्ति न होने पर स्वामी श्री सानंद ने आमरण अनशन करते हुए देहत्याग और देहत्याग करते हुए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र भाई को हत्या के लिए अपराधी के तौर पर दण्डित करने के लिए प्रार्थना का विकल्प पेश किया है।

    उन्होेने प्रधानमंत्री जी को अपने इस निर्णय से अवगत कराते हुए लिखा हुआ है कि यदि गंगा दशहरा ( 22 जून, 2018 ) तक तीनों अपेक्षायें पूर्ण नहीं हुई, तो वह आमरण उपवास करते हुए अपने प्राण त्याग देंगे। ऐसा करते हुए वह माँ गंगाजी को पृथ्वी पर लाने वाले महाराजा भगीरथ के वंशज शक्तिमान प्रभु राम से प्रार्थना करेंगे कि वह, गंगाभक्त बडे़ भाई की हत्या के अपराध में छोटे भाई प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी को समुचित दण्ड दे।

    कठिन उपवासों का इतिहास


    गौरतलब है कि सन्यास लेने से पूर्व डाॅ. गुरुदास अग्रवाल (जी डी ) के नाम से जाने वाले स्वामी श्री ज्ञानस्वरूप सानंद की पहचान, कभी आई. आई. टी., कानपुर के प्रोफेसर और केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य-सचिव के रूप में थी। फिलहाल, उनकी यह पहचान पुरानी पड़ चुकी है। अब उनकी पहचान, गंगाजी की अविरलता के लिए व्यक्तिगत संघर्ष करने वाली भारत की सबसे अग्रणी शख्सियत की हैं। उन्होने, सन्यासी का बाना भी अपने संघर्ष को गति देने के लिए ही धारण किया।

    स्वामी श्री ज्ञानस्वरूप सानंद गंगा मूल की भगीरथी, अलकनंदा और मंदाकिनी.. जैसी प्रमुख धाराओं की अविरलता सुनिश्चित करने के लिए पहले भी पांच बार लंबा अनशन कर चुके हैं।

    पहला अनशन : 13 जून, 2008 से लेकर 30 जून, 2008;
    दूसरा अनशन : 14 जनवरी, 2009 से 20 फरवरी, 2009;
    तीसरा अनशन : 20 जुलाई, 2010 से 22 अगस्त, 2010;
    चौथा अनशन : 14 जनवरी, 2012 से कई टुकड़ों में होता हुआ अप्रैल, 2012 तक और
    पांचवां अनशन : 13 जून, 2013 से 20 दिसंबर, 2013

    इन पांच अनशन में प्रत्येक, कठिन उपवास और धार्मिक, राजनीतिज्ञ और स्वयंसेवी जगत के गलियारों की एक अलग दास्तां समेटे हुए है। इस दास्तां से रुबरू होने के लिए आप 'हिंदी वाटर पोर्टल’ पर उपलब्ध 'स्वामी सानंद गंगा संकल्प संवाद’शीर्षकयुक्त एक लंबी श्रृंखला पढ़ सकते हैं।

    प्रधानमंत्री जी याद रखें, तो बेहतर


    यहां याद रखने की बात यह भी है कि यह स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद के अनशनों और उनके समर्थन में जुटे गंगा प्रेमी समुदाय का ही प्रताप था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार, गंगा के पर्यावरणीय प्रवाह के निर्धारण करने को लेकर, उच्च स्तरीय समिति गठित करने को विवश हुई। उसे गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करना पड़ा। राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण का गठन हुआ। उसमें 09 गैर सरकारी लोगों को बतौर गैर-सरकारी विशेषज्ञ सदस्य शामिल किया गया। भगीरथी मूल में गोमुख से लेकर नीचे 130 किलोमीटर तक एक भूगोल को 'इको सेंसिटिव ज़ोन' (Eco Sensitive Zone) यानी पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र घोषित किया गया। इस क्षेत्र में आने वाली तीन बड़ी विद्युत परियोजनाओं को बंद करने का आदेश दिया गया।

    यह बात और है कि ये सभी कदम मिलकर भी गंगाजी का कुछ भला नहीं कर सके। शासकीय घोषणाओं और आदेशों पर राजनीति तब भी हुई और अब भी हो रही है; बावजूद इसके, गंगा की अविरलता और निर्मलता की चाहत रखने वाले इन अनशनों को भूल नहीं सकते। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र भाई मोदी जी भी न भूलें तो बेहतर है।

    स्वामी सानंद द्वारा प्रधानमंत्री कोे लिखी गई चिट्ठी को पढ़ने के लिये क्लिक करें

    स्वामी सानंद गंगा संकल्प संवाद शृंखला : एक परिचय

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    खेतों से क्रोमियम को दूर भगाएगा बैक्टीरिया

    RuralWaterThu, 03/15/2018 - 14:01

    सुन्दरबनसुन्दरबनपश्चिम बंगाल का सुन्दरबन क्षेत्र रिहायश के लिहाज से दुर्गम इलाकों में एक है। यहाँ करीब 40 लाख लोग रहते हैं। पानी से घिरे इस क्षेत्र के लोगों के दरवाजे पर साल भर मुश्किलों का डेरा रहता है। इसके बावजूद मुश्किलों से जूझते हुए जीवन बिताते हैं।

    कभी मौसम की मार तो कभी आदमखोर बाघों के हमलों का उन्हें सामना करना पड़ता है।

    चूँकि लम्बे समय से ये लोग मुश्किलों से घिरे रहे हैं, इसलिये ये सब उनके लिये सामान्य बात हो गई है। लेकिन, पिछले कुछ वर्षों से उन्हें एक अलग तरह की समस्या से जूझना पड़ रहा है। इस समस्या ने खेती को बुरी तरह प्रभावित किया है जिससे किसान परेशान हैं। सरकार की तरफ से इस समस्या का अब तक कोई हल नहीं निकला है।

    सुन्दरबन के खेतों में पिछले कुछ वर्षों में क्रोमियम की मात्रा में बेतहाशा इजाफा हुआ है जिससे किसानी में दिक्कतें आ रही हैं। खेतों में उगाई जा रही फसलों खासकर चावल का निर्यात रुक गया है।

    सुन्दरबन में गोविंदभोग समेत कई तरह के महंगे चावल की खेती होती है। यहाँ उगने वाले इन उन्नत किस्म के चावलों का निर्यात दूसरे देशों में किया जाता है। यहाँ साल में दो बार धान की खेती होती है। सुन्दरबन में रहने वाले लोगों की रोजी-रोटी मुख्य रूप से खेती पर ही आधारित है। लोग खेती के साथ ही मछलीपालन भी करते हैं, लेकिन उससे कम आय होती है और साथ ही इसमें अनिश्चितता भी है। दूसरी बात यह है कि सुन्दरबन क्षेत्र में बाघों के हमले भी बढ़े हैं, जिससे मछलियाँ पकड़ने में किसान कतराते हैं।

    खेत में क्रोमियम की मात्रा इतनी बढ़ गई है कि चावल में भी क्रोमियम प्रवेश कर जा रहा है। इन्हें जब निर्यात किया जाता है, तो जाँच में क्रोमियम पाये जाने के कारण निर्यात में दिक्कत आ रही है।

    सुन्दरबन के किसान अनिल मिस्त्री ने कहा, ‘करीब एक दशक पूर्व सबसे पहले यह समस्या देखी गई थी। खेत की मिट्टी का रंग देखकर ही हमें समझ में आ गया था कि कोई अलग तत्व मिट्टी में आ गया है, लेकिन यह नहीं पता था कि इसमें क्रोमियम है।’

    खेत में उगने वाली फसल खासकर धान में क्रोमियम होने की जानकारी सबसे पहले साल 2009 में सामने आई थी। सुन्दरबन में उत्पादित चावल यूरोपियन यूनियन में भेजा जाता रहा है। सन 2009 में निर्यात से पहले जब इसकी जाँच की गई, तो पता चला कि इसमें भारी मात्रा में क्रोमियम है। यह तथ्य सामने आते ही उक्त चावल का निर्यात रोक दिया गया और उसी समय किसानों को भी पता चला कि फसल में क्रोमियम है।

    उल्लेखनीय है कि वर्ष 2009 में आइला तूफान ने सुन्दरबन में भारी तबाही मचाई थी। इस तूफान ने भारी जान-माल की क्षति पहुँचाई थी। साथ ही खेतों में नमकीन पानी भी घुस गया था जिससे किसान परेशान थे। आइला के तूफान से लोग सम्भल भी नहीं पाये थे कि चावल के निर्यात पर प्रतिबन्ध ने एक और बड़ा झटका दे दिया था।

    यहाँ यह भी बता दें कि क्रोमियम एक रसायन है जिसका इस्तेमाल लेदर फैक्टरियों में किया जाता है। क्रोमियम का इस्तेमाल खासतौर से लेदर को मांस से अलग करने व उसे रंगने में किया जाता है।

    क्रोमियम शरीर के लिये बेहद खतरनाक है। इससे साँस की बीमारी, चर्म रोग व प्रजनन से सम्बन्धित रोग भी हो सकते हैं।

    एक दशक पहले जब चावल में क्रोमियम की मात्रा बढ़ने के कारणों की जाँच शुरू हुई, तो पता चला कि दक्षिण 24 परगना जिले के बानतल्ला में हाल के वर्षों में काफी संख्या में लेदर फैक्टरियाँ खोली गई हैं। इन फैक्टरियों से निकलने वाली गन्दगी (जिसमें क्रोमियम भी होता है) नदी में बहा दी जा रही है, जो सुन्दरबन तक पहुँच रहा है और खेतों में अपना ठिकाना बना रहा है।

    जादवपुर विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ एनवायरन्मेंटल स्टडीज के प्रोफेसर व माइक्रोबायोलॉजिस्ट जयदीप मुखर्जी ने कहा, ‘इन फैक्टरियों से निकलने वाली गन्दगी में क्रोमियम भी शामिल होता है, जो नदियों के रास्ते सुन्दरबन डेल्टा में जमा हो रहा है और खेतों में पहुँचकर वहाँ की खेती पर असर डाल रहा है।’

    आश्चर्य की बात ये है कि लेदर फैक्टरियों से निकलने वाले इस कचरे को ठिकाने लगाने के लिये कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई है। इससे मिट्टी को तो नुकसान हो रहा है, सो हो ही रहा है, साथ ही इससे नदियों की सेहत पर बुरा असर हो रहा है जिसका दूरगामी परिणाम झेलना पड़ सकता है।

    पश्चिम बंगाल की नदियाँ वैसे ही कई तरह के प्रदूषण के बोझ से कराह रही हैं। हाल ही में आई एक रिपोर्ट में भी इसका खुलासा हुआ है। पश्चिम बंगाल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्य की दो दर्जन से अधिक नदियाँ गन्दी हैं।

    उक्त रिपोर्ट के लिये दो वर्ष पहले नमूने लिये गए थे और उनकी कई स्तरों पर जाँच की गई। रिपोर्ट के अनुसार भागीरथी व हुगली (गंगा नदी को पश्चिम बंगाल में इन्हीं दो नामों से जाना जाता है) बताया जाता है कि नदियों में प्रदूषण फैलाने वाले तत्वों की लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। रिपोर्ट में वर्ष 2014 में मिले आँकड़ों के साथ ताजा आँकड़ों का मिलान किया गया है जिसमें पाया गया कि नदियों में प्रदूषण फैलाने वाले तत्वों में बेतहाशा इजाफा हो रहा है।

    रिपोर्ट में यह भी पता चला है कि प्रदूषण की सबसे बड़ी वजह शहरों घरों से निकलने वाले गन्दे पानी को बिना ट्रीट किये नदियों में बहाना है।

    जादवपुर यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने अपने शोध से इस समस्या का समाधान खोज लिया हैबहरहाल, चूँकि यह लेख क्रोमियम के दुष्प्रभाव और उसके समाधान के उपायों से सम्बन्धित है, इसलिये हम नदियों के प्रदूषण पर विस्तार से चर्चा किसी और लेख मे करेंगे। यहाँ हम दोबारा क्रोमियम पर लौटते हैं।

    ऊपर बताया जा चुका है कि लेदर फैक्टरियों से निकलने वाली गन्दगी (जिसमें क्रोमियम भी है) सुन्दरबन डेल्टा में डिपोजिट हो रहा है और धीरे-धीरे खेतों में फैल रहा है। यहाँ दिक्कत यह है कि क्रोमियम को मिट्टी से अलग करने की कोई रासायनिक तकनीक नहीं है। खेतों की मिट्टी में समा रहे क्रोमियम को मिट्टी से निकालना करीब-करीब असम्भव है।

    लेकिन, जादवपुर यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने एक शोध कर इस समस्या का समाधान निकाल लिया है और अच्छी बात ये है कि इससे खेतों पर या खेत में उगने वाले अनाज के सेवन से लोगों पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ता है।

    शोधकर्ताओं व प्रोफेसरों ने एक ऐसी बैक्टीरिया की खोज कर ली है जो मिट्टी से क्रोमियम को खत्म करने में पूरी तरह सक्षम हैं। अच्छी बात ये है कि यह बैक्टीरिया पहले से ही मौजूद है लेकिन इसके बारे में वैज्ञानिकों व शोधार्थियों को पता नहीं था। इस शोध से यह भी पता चलता है प्रकृति में ऐसे तत्व मौजूद हैं, जो कई समस्याओं का समाधान कर सकते हैं, लेकिन किसी को इसकी जानकारी नहीं है।

    पूरे शोध में बड़ी भूमिका दो छात्रों की रही, जो इसी यूनिवर्सिटी में एमटेक कर रहे थे। इनमें से एक छात्र ने वर्ष 2013 में सुन्दरबन से मिट्टी का नमूना संग्रह किया था। इसके बाद वर्ष 2014 में एक अन्य छात्र ने भी मिट्टी का नमूना लिया। नमूने की जाँच की गई तो पता चला कि इसमें ऐसी बैक्टीरिया मौजूद है, जो क्रोमियम को मिट्टी से खत्म कर सकती है।

    जादवपुर यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ एनवायरन्मेंट स्टडीज के डायरेक्टर तरित रायचौधरी कहते हैं, ‘इस शोध से हमें पता चला है कि यही एक ऐसी बैक्टीरिया मौजूद है, जो खेतों से क्रोमियम निकाल सकती है।’

    यह महत्त्वपूर्ण शोध अभिषेक दत्ता, शायंती घोष, जयंत डी. चौधरी, ऋद्धि महानसरिया, मालंच रॉय, आशीष कुमार घोष, तरित रायचौधरी व जयदीप मुखर्जी ने संयुक्त रूप से किया है।

    शोध के अनुसार ये बैक्टीरिया 70 प्रतिशत तक क्रोमियम खत्म कर सकती है। शोध में शामिल प्रो जयदीप मुखर्जी ने कहा, ‘सबसे अच्छी बात यह है कि जिस बैक्टीरिया के बारे में पता लगाया गया है, वह एकदम स्वदेशी है और लम्बे समय से यहाँ की मिट्टी में मौजूद है।’

    मिट्टी से क्रोमियम हटाने के लिये करना यह होगा कि भारी संख्या में ये बैक्टीरिया तैयार करनी होगी और उन्हें खेतों में छोड़ देना होगा। ये बैक्टीरिया मिट्टी व फसल को नुकसान पहुँचाये बिना क्रोमियम हटा देगी।

    जयदीप मुखर्जी कहते हैं, ‘हम दो साल तक लैब में शोध कर इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि क्रोमियम हटाने की यह विधि किसी भी तरह के साइड इफेक्ट्स से परे है। चूँकि हमने यह प्रयोग बहुत छोटे पैमाने पर किया है, इसलिये इसके व्यावहारिक इस्तेमाल के लिये बड़े पैमाने पर काम करने की जरूरत है।’

    इसके लिये अच्छा खासा फंड के ही साथ ही संसाधन की भी दरकार होगी। इसके अलावा इसमें राज्य सरकार के सहयोग की भी आवश्यकता होगी। शोधकर्ताओं ने कहा कि वे इस विधि के जरिए क्रोमियम हटाने को लेकर बेहद गम्भीर हैं और चाहते हैं कि सरकार इसमें उनकी मदद करे।

    हालांकि, अभी यह आकलन नहीं किया जा सका है कि कितना खेत में कितनी बैक्टीरिया की जरूरत है। प्रो. चौधरी ने कहा कि अगर सरकार सहयोग देगी तो बड़े पैमाने पर काम किया जाएगा।
    उन्होंने कहा, ‘बड़े पैमाने पर प्रायोगिक तौर पर शोध करने के लिये सुन्दरबन में ऐसे प्लॉट का चयन करना होगा, जिसमें क्रोमियम मौजूद हो। इस प्लॉट में हम बैक्टीरिया डालकर धान की खेती कर देखेंगे और अगर प्रयोग सफल रहता है, तो इसका दायरा सुन्दरबन के उन सभी खेतों तक बढ़ाया जा सकता है, जहाँ क्रोमियम है।’

    शोधकर्ता जल्द ही इसको लेकर पश्चिम बंगाल सरकार को विस्तृत प्रस्ताव देंगे। प्रो. चौधरी ने कहा कि वह जल्द ही राज्य सरकार को पत्र लिखकर इसके बारे में बताया जाएगा और उनसे सहयोग की अपील की जाएगी।

    शोधकर्ताओ व विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि इस शोध के तर्ज पर ही और भी कई तरह के शोध कर नई चीजें सामने लाई जा सकती हैं, जो लोगों के लिये मददगार साबित होंगी।

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    नर्मदा की जान जंगलRuralWaterSun, 03/18/2018 - 18:53

    Source
    नर्मदा के प्राण हैं वन, नर्मदा संरक्षण पहल - 2017

    नर्मदा नदीनर्मदा नदीनर्मदा या हिमविहीन ऐसी ही किसी भी दूसरी नदी के लिये जंगल अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। सामान्य बोलचाल की भाषा में यदि कहा जाये कि जलग्रहण क्षेत्र के वनों में नर्मदा की जान बसती है और जंगल उसके प्राणदाता हैं तो अतिश्योक्ति न होगी। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या जंगल वास्तव में हिमविहीन नदियों के लिये प्राणदाता की भूमिका निभाते हैं? या यह केवल एक भावनात्मक वक्तव्य है?

    वैज्ञानिक तथ्यों के आलोक में यह स्पष्ट होता है कि जंगल सीधे-सीधे नर्मदा के प्रवाह को जितना प्रभावित नहीं करते उससे कहीं अधिक परोक्ष रूप से सहायक नदियों को प्रभावित करके करते हैं। वनों का घनत्व, वनस्पति प्रजातियों की संरचना और भूगर्भीय शैल संरचना नदियों के सन्दर्भ में महत्त्वपूर्ण हैं। हम पिछले अध्याय में बता चुके हैं कि वन नदियों में प्रवाह की मात्रा, उसकी निरन्तरता और गुणवत्ता, तीनों को प्रभावित करके तिहरा काम करते हैं और जलधाराओं को सबल, अविरल और निर्मल बनाते हैं।

    नर्मदा बेसिन में होने वाली कुल वर्षा का भविष्य तय करने में वन आवरण चमत्कारी काम करता है। जहाँ वन का घनत्व व स्वास्थ्य अच्छा होता है वहाँ जल का जमीन की सतह के नीचे बहाव अच्छा होने से नदियाँ सदानीरा और निर्मल बनी रहती हैं जबकि वन उजड़ जाने के बाद नदियाँ जल्दी ही सूख जाया करती हैं। इस अर्थ में विंध्य और सतपुड़ा पर्वतों व नर्मदा घाटी में मौजूद घने जंगलों को नर्मदा की जान कहना न केवल साहित्यिक व अलंकारिक दृष्टि से बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी बिल्कुल उपयुक्त है।

    जुगलबंदी नदियों की और वनों की


    जंगलों के रहने और नर्मदा के बहने के बीच की अदृश्य जुगलबंदी को समझने और नर्मदा व इसकी सहायक नदियों में प्रवाह की निरन्तरता तथा जल की गुणवत्ता बनाए रखने में वनों की भूमिका का वैज्ञानिक आधार समझना आवश्यक है। इस अध्याय में हम नर्मदा अंचल के जंगल, पानी, मिट्टी, जैवविविधता और जन-जीवन की पारस्परिक निर्भरता को वैज्ञानिक तथ्यों के आइने में देखने का एक संक्षिप्त प्रयास करेंगे।

    ‘सौन्दर्य की नदी नर्मदा’ के रचयिता श्री अमृतलाल वेगड़ तो जंगलों को एक अनूठी उपमा देते हुए कहते हैं कि जंगल बादलों के उतरने के हवाई अड्डे हैं।देखने में भी आता है कि जहाँ घने वन होते हैं वहाँ उनकी आर्द्रता से द्रवित होकर बादलों का बरसना अधिक होता है परन्तु वायुमण्डल के जल को खींचकर वर्षा कराने में वनों की भूमिका को लेकर वैज्ञानिक एकमत नहीं हैं।

    वनों की मौजूदगी और वर्षा की मात्रा में आमतौर पर सीधा-सीधा सम्बन्ध होने की मान्यता जनमानस में है परन्तु अधिक वनों के कारण अधिक वर्षा होना या वनों का नाश हो जाने के कारण वर्षा की मात्रा में कमी हो जाने की धारणा वैज्ञानिकों के समुदाय में लम्बे समय से बहस का कारण रही है। ली (1980) के अनुसार वनों की अधिकता वाले क्षेत्रों में आमतौर पर अधिक वर्षा होने के कारण आम धारणा बन गई है कि वर्षा को आकर्षित करके वन वर्षा की मात्रा में वृद्धि करते हैं, जिससे यह मान्यता भी बनी है कि वनों के कट जाने से वर्षा में कमी आ जाती है, परन्तु उनके अनुसार यह सार्वभौमिक सत्य नहीं है। वनों की उपस्थिति के कारण स्थानीय तौर पर वर्षा का वितरण भी कुछ सीमा तक प्रभावित होता है।

    बादलों को आकर्षित करके बारिश कराने और जल उपलब्ध कराने की क्षमता की दृष्टि से वनों को दो वर्गों में विभक्त किया जा सकता है- मेघ वन (cloud forest) तथा गैर-मेघ वन (non-cloud forest)। मेघ वन कुहरे या बादलों को रोककर वातावरण में मौजूद उस नमी को जमीन में सोखने में मददगार होते हैं जो अन्यथा वातावरण में ही रह जाती। इसके विपरीत गैर-मेघ वनों की भूमिका सामान्य तौर पर वर्षा से प्राप्त जल के प्रवाह को नियंत्रित करने तक ही सीमित रहती है। इस प्रकार मेघ वनों और गैर-मेघ वनों की जल उत्पादन सम्बन्धी क्षमताएँ अलग-अलग होती हैं नर्मदा अंचल के वनों में विशुद्ध रूप से मेघ वन जैसी स्थितियाँ प्रायः नहीं पाई जाती हैं।

    अमरकंटक व पचमढ़ी और इसके निकटवर्ती क्षेत्रों में वर्षा ऋतु में मेघ वन जैसी स्थितियाँ दिखती अवश्य हैं परन्तु वर्षा कराने में इनकी भूमिका के सम्बन्ध में नर्मदा पर वैज्ञानिक अध्ययनों का अभाव होने से अभी इतना ही कहा जा सकता है कि यहाँ पर्वतों की ऊँचाई कम होने के कारण बादलों को रोककर वर्षा कराने में इन वनों की भूमिका सीमित हैं परन्तु धरातल पर गिरे जल को सोखकर भूजल स्तर बढ़ाने में ये वन अति महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

    सबल धारा - नदियों में जल की मात्रा


    वैज्ञानिक अनुसन्धान से अब तक मिली जानकारी के आधार पर ठोस रूप से यह कह पाना कठिन है कि वनों के कारण नदियों में जल की मात्रा शुद्ध रूप से बढ़ती है या नहीं। सघन वन क्षेत्रों में अधिक बारिश को आधार मानें तो यह अनुमान होता है कि वनों के कारण नदियों में जल की कुल मात्रा नदी बेसिन के परिप्रेक्ष्य में कम या ज्यादा हो सकती है। परन्तु यह मात्रा भी अन्ततः किसी इलाके में होने वाली वर्षा की कुल मात्रा के ऊपर ही निर्भर करती है और कुल वर्षा से अधिक तो नहीं ही हो सकती जो क्षेत्र विशेष की जलवायु से अधिक प्रभावित होती है।

    वाष्प के रूप में मौजूद ये बारीक फुहारें वृक्षों के छत्र में पत्तियों के बीच जमे रहकर लम्बे अरसे तक नमी बनाए रखती हैं। भारतीय वन अनुसन्धान संस्थान, देहरादून में किये गये प्रयोगों से स्पष्ट हुआ है कि औसत घनत्व के वनों में लगभग 25 मिमी वर्षा प्रत्येक बार की बारिश में वृक्षों के छत्रों में अन्तावरोधित हो जाती है। वृक्षों के छत्र द्वारा जल के अन्तावरोधन की प्रक्रिया वन के घनत्व से प्रभावित होती है। यदि वन में वृक्षों का वितान सघन नहीं है तो अन्तावरोधन कम हो जाता है जबकि वृक्षों के सघन वितान होने की स्थिति में अन्तावरोधन बढ़ जाता है।इस अर्थ में हिमविहीन किसी नदी बेसिन में गिरने वाली वर्षा का कुल जल वह अधिकतम मात्रा है जो नदियों में आ सकती है। यद्यपि कुछ वैज्ञानिकों का मत यह भी है कि वनों के कारण काफी बड़ी मात्रा में जल वाष्पोत्स्वेदन (evapotranspiration) के माध्यम से वातावरण में वापस उड़ जाता है, अतः वन कट जाने से आस-पास की जलधाराओं में जल की उपलब्ध मात्रा में पहले तो आकस्मिक वृद्धि दिखाई देती है परन्तु यह आकस्मिक बाढ़ (flash floods) पैदा करके जल्दी ही चुक जाती है जबकि धीरे-धीरे चलने वाले प्रवाह की अवधि असामान्य रूप से घट जाती है।

    एंडरसन हूवर तथा रीन्हार्ट (1976) के अनुसार धरती पर पहुँचने वाले जल के भविष्य का निर्धारण करने में अन्य वनस्पतियों की तुलना में वन प्रमुख भूमिका निभाते हैं। परन्तु यह भी सच है कि वाष्पोत्स्वेदन द्वारा हवा में जल वाष्प मुक्त करने व भूमि की निचली सतहों में जल सोखकर भूजल बढ़ाने के वनों के प्राकृतिक गुण के कारण सैद्धान्तिक रूप से किसी भी क्षेत्र में वर्षा का समस्त जल नदियों में नहीं आ सकता। इसमें से कुछ-न-कुछ नीचे या ऊपर की दिशा में गमन करता ही है। इस अर्थ में नदियों में प्रवाह की मात्रा को एक सरल समीकरण से दिखना हो तो इसे कुछ निम्न अनुसार व्यक्त किया जा सकता है :-

    वर्षा में प्राप्त जल- (वाष्पोत्स्वेदन + भूजल पुनर्भरण) = नदियों के प्रवाह में उपलब्ध जल


    इस परिप्रेक्ष्य में यह अवश्य कहा जा सकता है कि नदियों में जल की मात्रा में उतार-चढ़ाव वनों के घनत्व से सीधे जुड़ा हुआ होता है और वन इस उतार-चढ़ाव को उसी तरह नियंत्रित कर जलधाराओं को सदानीरा और स्वस्थ बनाए रखते हैं जिस तरह इन्सुलिन हार्मोन का स्राव हमारे रक्त में शर्करा की मात्रा को नियंत्रित रखता है।

    अविरल धारा - नदियों में जल के प्रवाह की निरन्तरता


    नर्मदा के प्रवाह को निरन्तरता में अविरल बनाए रखने में नर्मदा अंचल के वनों की भूमिका बड़ी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यहाँ हिमालय से निकलने वाली नदियों की तरह बर्फीले हिमनदों (ग्लेशियरों) के पिघलने से लगातार जल प्राप्त नहीं होता और यहाँ जल आपूर्ति का एकमात्र स्रोत मानसूनी वर्षा है। अर्थात मानसूनी वर्षा के दौरान मिले पानी से ही यहाँ के नदी नालों को साल भर काम चलाना पड़ता है।

    नर्मदा और इसके अपवाह तंत्र में आने वाले सभी नदी-नालों को जल की सारी आपूर्ति मानसूनी वर्षा के समय केवल कुछ महीनों में ही होती है। मानसून के समय ये नदी-नाले भीषण उफान पर रहते हैं जबकि मानसून गुजर जाने के बाद इनमें से ज्यादातर लगभग पूरी तरह सूख जाते हैं। वर्षा के दौरान जलागम में आये जल का रिसाव धीरे-धीरे करके इन नदी-नालों को बारहमासी बनाए रखने में नर्मदा अंचल के वन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

    सतपुड़ा और विंध्य पर्वतमालाओं में फैले ये वन स्वयं तो पानी पैदा नहीं करते हैं परन्तु पानी के रिसाव को नियंत्रित करने में भगवान शंकर की जटाओं जैसी भूमिका निभाकर वर्षाजल को संचित करने और बाढ़ के रूप में व्यर्थ बहने से रोककर बाद में कई महीनों तक धीरे-धीरे मुक्त करते हुए अंचल की अनेक सरिताओं को सदानीरा बनाए रखने में जो भूमिका निभाते हैं वह पानी का उत्पादन करने से कम महत्त्वपूर्ण नहीं है।

    वर्षा से प्राप्त जल को भूमि में सोखने और जलधाराओं में प्रवाह बनाए रखने की भूमिका वन अपनी विशिष्ट संरचना के कारण ही निभा पाते हैं। जंगल एक विशाल शामियाने जैसी भूमिका निभाते हुए वर्षा के पानी की बौछार को अपने ऊपर झेल लेता है और बहते हुए पानी के वेग को कम करके उसे जमीन की निचली सतहों में उतारने में मदद करता है। वनों का यह गुण हिमविहीन नदियों के प्रवाह को मानसून के बाद भी निरन्तर जारी रखने में काम आता है। वर्षापूरित नर्मदा और उसकी सहायक नदियों के मामले में भी यह तथ्य अत्यन्त प्रासंगिक है।

    सबसे पहले तो वर्षाजल का काफी भाग वृक्षों के छत्र (Tree canopy) में अन्तावरोधित (Intercept) हो जाता है। वृक्षों के छत्र द्वारा अन्तावरोधन वर्षा के जल को व्यर्थ बह जाने से रोकने में काफी मददगार होता है। बादलों से लम्बी दूरी तय करके पूरी ताकत से धरती पर प्रहार करने को तत्पर वर्षा की बूँदें जब वृक्षों के पत्तों के रूप में मौजूद ढाल से टकराती हैं तो वे मंद फुहारों और छींटों में बदल जाती हैं और उनकी संहारक क्षमता बहुत कम हो जाती है।

    वाष्प के रूप में मौजूद ये बारीक फुहारें वृक्षों के छत्र में पत्तियों के बीच जमे रहकर लम्बे अरसे तक नमी बनाए रखती हैं। भारतीय वन अनुसन्धान संस्थान, देहरादून में किये गये प्रयोगों से स्पष्ट हुआ है कि औसत घनत्व के वनों में लगभग 25 मिमी वर्षा प्रत्येक बार की बारिश में वृक्षों के छत्रों में अन्तावरोधित हो जाती है। वृक्षों के छत्र द्वारा जल के अन्तावरोधन की प्रक्रिया वन के घनत्व से प्रभावित होती है। यदि वन में वृक्षों का वितान सघन नहीं है तो अन्तावरोधन कम हो जाता है जबकि वृक्षों के सघन वितान होने की स्थिति में अन्तावरोधन बढ़ जाता है।

    सघन वनों में वृक्षों के साथ-साथ जमीन पर उगी झाड़ियाँ, छोटे पौधे व घास आदि वन धरातल पर पानी की धारा के प्रवाह को तोड़कर तेजी से बहने में अवरोध पैदा करती हैं तथा पानी सोखने में मदद करती हैं। वन धरातल की वनस्पति जल के प्रवाह को नालियाँ बनाकर धारा में बहने देने की बजाय सतह पर परत के रूप में फैल जाने के लिये विवश कर देती है। इस प्रकार तेज बहती जलधारा के अवरुद्ध होकर पतली परत में फैल जाने से जल के अन्तः रिसाव के लिये अधिक बड़ी सतह और अधिक समय मिल जाता है।

    भूमि की सतह के नीचे-नीचे बहने वाली अदृश्य जलधाराओं के इस अधोसतहीय अपवाह के कारण ही वर्षा के बहुत समय बाद तक भी पानी रिस-रिसकर नदी-नालों में मिलता रहता है और धाराओं को अवरिल बनाता है। इसी कारण सघन वनक्षेत्रों से लगे हुए आबादी वाले इलाकों में भूजल स्तर बढ़ जाता है और नलकूपों तथा कुओं में कम गहराई पर ही लम्बे समय तक जल उपलब्ध रहता है। इस प्रकार वैज्ञानिक अनुसन्धानों से प्राप्त जानकारी के आलोक में हम यह निर्विवाद रूप से कह सकते हैं कि हिमविहीन नदियों में अविरल धारा बनाए रखने का सबसे व्यावहारिक, कारगर और प्राकृतिक नुस्खा घने वन ही हैं।नर्मदा अंचल में भी पहाड़ी सघन वनों से युक्त इलाकों में छोटी-छोटी जलधाराएँ लम्बे समय तक अविरल बहती रहतीं हैं जबकि वनविहीन क्षेत्रों में वर्षा में आने वाला जल भूमि में सोखे जाने की बजाय सतही जल के रूप में तेजी से बहकर चला जाता है और अधोसतहीय अपवाह नहीं हो पाने से बड़े नदी-नाले भी वर्षाऋतु समाप्त होने के बाद जल्दी ही सूख जाते हैं। किसी क्षेत्र के वन आवरण के घनत्व में जैसे-जैसे कमी आती जाती है उसी अनुपात में नदी-नालों में प्रवाह की अवधि घटती जाती है। इसी कारण नर्मदा अंचल के वनाच्छादित पूर्वी भाग में सहायक नदियों में पानी की उपलब्धता की मात्रा और अवधि वनविहीन पश्चिमी भाग की अपेक्षा काफी बेहतर है।

    चार माह की चाँदनी - असमय सूखती नदियों का दर्द


    नर्मदा अंचल में नदियों नालों के स्वास्थ्य के बारे में पूछताछ करने पर आमतौर पर एक मोटी बात उभरती है कि लगभग 25-30 वर्ष पहले यहाँ के नालों में प्रवाह लम्बे समय तक बना रहता था। घने वन प्रांतरों में बहने वाली अनेक सरिताओं में प्रवाह बारहमासी होता था जबकि अन्य बहुत सी नदियाँ मार्च-अप्रैल तक बहती रहती थीं। अब यह अवधि घट चली है और नवम्बर-दिसम्बर आते-आते अनेक नदियाँ प्रायः पूरी तरह सूख जाया करती हैं। इन असमय सूखती नदियों का दर्द व उनके दर्द का इलाज वनों के स्वास्थ्य और सघनता के आइने में देखने पर साफ हो जाता है।

    वन आवरण की सघनता और सरिताओं में जल की उपलब्धता की अवधि के बीच सम्बन्ध का आकलन करने के लिये मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के सघन वन आवरण वाले पचमढ़ी वन्य प्राणी अभयारण्य की तुलना पश्चिमी मध्य प्रदेश के अपेक्षाकृत वनविहीन जिले बड़वानी से की गई (श्रीवास्तव, 2007)। लगभग 300 किमी की दूरी पर बसे इन दोनों जिलों में चयनित अध्ययन क्षेत्र से वर्ष 2006 तथा 2007 के आँकड़ों का संकलन, वर्गीकरण और विश्लेषण किया गया।

    इस अध्ययन के लिये पचमढ़ी वन्य प्राणी अभयारण्य के पचमढ़ी परिक्षेत्र में दिनांक 1 मई से 15 मई की अवधि के बीच 116 स्थलों के लिये तथा बड़वानी जिले के वरला परिक्षेत्र में 22 स्थानों से संकलित सतही जल उपलब्धता की जानकारी का विश्लेषण व उनकी आपस में तुलना की गई। इस अध्ययन में पाया गया कि अच्छे सघन वन आवरण की अधिकता वाले पचमढ़ी अभयारण्य में वर्ष 2006 व 2007 में मई के सूखे महीने में भी 97 प्रतिशत से अधिक जलधाराओं में पानी मिला जबकि विरल वन आवरण वाले बड़वानी जिले के वरला क्षेत्र में मई 2006 में केवल 27 प्रतिशत तथा मई 2007 में केवल 18 प्रतिशत जलधाराओं में पानी मिला।

    यद्यपि इस अध्ययन में औसत वर्षा, तापमान, आर्द्रता और मिट्टी जैसे कारकों की भूमिका पर बहुत गहराई से दीर्घकालिक शोध नहीं किया जा सका और कई बिन्दु परीक्षण के लिये शेष रह गए, पर जितनी जानकारी मिल सकी उससे मोटे तौर पर इतना तो स्पष्ट हुआ ही कि जलधाराओं में प्रवाह की निरन्तरता पर वनों का सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इस अध्ययन के सम्बन्ध में लेखक की अन्य पुस्तक ‘पानी के लिये वन प्रबन्ध’ (2009) में जानकारी दी गई है।

    वैज्ञानिक शोध से यह भी स्पष्ट हुआ है कि सघन वन भूमि में सतही अपवाह तो कम होता है परन्तु वृक्षों की जड़ों के साथ भूमि की निचली सतहों में पहुँचे पानी के कारण अधोसतहीय अपवाह की मात्रा अधिक होती है। यह अपवाह काफी धीमी गति से और सतह के नीचे होने के कारण इसका वेग भी रुक जाता है और भूमि का क्षरण भी नहीं होता। इस प्रकार तेज बहती जलधारा के अवरुद्ध होकर पतली परत में फैल जाने से जल के अन्तःरिसाव (Infiltration) के लिये अधिक बड़ी सतह और अधिक समय मिल जाता है। इसके फलस्वरूप जमीन में पानी का अन्तःरिसाव बढ़ जाने से भूजल स्तर में तेजी से वृद्धि होती है।

    यही कारण है कि घने वनों से लगे गाँवों-बस्तियों में कुओं व नलकूपों आदि में भूजल स्तर अपेक्षाकृत काफी ऊँचा पाया जाता है। भूमि की सतह के नीचे-नीचे बहने वाली अदृश्य जलधाराओं के इस अधोसतहीय अपवाह के कारण ही वर्षा के बहुत समय बाद तक भी पानी रिस-रिसकर नदी-नालों में मिलता रहता है और धाराओं को अवरिल बनाता है। इसी कारण सघन वनक्षेत्रों से लगे हुए आबादी वाले इलाकों में भूजल स्तर बढ़ जाता है और नलकूपों तथा कुओं में कम गहराई पर ही लम्बे समय तक जल उपलब्ध रहता है। इस प्रकार वैज्ञानिक अनुसन्धानों से प्राप्त जानकारी के आलोक में हम यह निर्विवाद रूप से कह सकते हैं कि हिमविहीन नदियों में अविरल धारा बनाए रखने का सबसे व्यावहारिक, कारगर और प्राकृतिक नुस्खा घने वन ही हैं।

    निर्मल धारा - जंगल और नदियों में जल की गुणवत्ता


    नदियों में प्रवाह की निर्मलता का वनों के घनत्व से सीधा सम्बन्ध है। इस मामले में वैज्ञानिक प्रायः एकमत हैं कि वन आच्छादित पहाड़ी जलग्रहण क्षेत्र शुद्ध पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करने में बहुत मददगार होते हैं। शुद्ध जल एक महत्त्वपूर्ण वन उत्पाद हैं। सघन जलग्रहण क्षेत्रों से आती जल धाराओं का पानी खेतों और नगरीय क्षेत्रों से आते पानी की तुलना में काफी साफ होता है। वन एक प्राकृतिक छन्ने की तरह जल में घुली हुई गन्दगी को छानकर धारा को निर्मल बना देते हैं।

    नर्मदा के जल की गुणवत्ता बनाए रखने में नर्मदा अंचल के वनों द्वारा महत्त्वपूर्ण योगदान दिया जाता है। यह एक स्थापित तथ्य है कि उच्च गुणवत्ता के शुद्ध जल प्रदाय में वन महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। नर्मदा का जल आज भी यदि अन्य नदियों की तुलना में काफी स्वच्छ एवं निर्मल है तो इसका एक बड़ा कारण इसके जलग्रहण क्षेत्र के वन हैं। जल को शुद्ध करने की क्षमता वनों में अपने कई गुणों के कारण आती है। वनों की भूमि पर मौजूद जैविक द्रव्य (ह्यूमस) पानी को सोखकर नीच जाने में सहायता करता है और मिट्टी प्रदूषक तत्वों को सोख लेती है। इस प्रकार भूमि में नीचे जाने वाला जल छन-छनकर लगातार निर्मल और शुद्ध होता रहता है।

    अपने इसी गुण के कारण ही नदी तटीय क्षेत्रों में मौजूद वन एक सोख्ता बफर पट्टी जैसे काम करते हुए तलछट, पोषक तत्वों और विषैले प्रदूषक तत्वों को रोककर जलधाराओं के सतही प्रवाह में मिलने से बचाते हैं जिससे जल की गुणवत्ता में सुधार होता है। नदी तटीय क्षेत्रों में पाई जाने वाली वनस्पति जलधारा के प्रवाह को मन्द कर देती है और अवांछित तत्वों को धीरे-धीरे छानते हुए जल की गुणवत्ता सुधारने में काफी मदद करती है। जलधारा की तीव्रता में कमी आने के कारण पानी को जमीन के अन्दर रिसने के लिये पर्याप्त समय मिल जाता है और अवसाद के बारीक कणों का जमाव वनस्पति में ही हो जाता है।

    नदी तटीय वन बफर में पाई जाने वाली वनस्पति के कारण इन क्षेत्रों में कार्बनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ जाती है और सूक्ष्म जीवों, केचुओं व अन्य कृमियों के पनपने के लिये अनुकूल स्थितियाँ बन जाती हैं। इन कारणों से डी-नाइट्रीकरण तथा अन्य जैव रासायनिक प्रक्रियाएँ तेज हो जाती हैं जिससे मिट्टी भुरभुरी हो जाती है और भूमि में जल रिसाव की दर बढ़ जाती है। इन प्रक्रियाओं में जल की गुणवत्ता में प्राकृतिक रूप से ही काफी सुधार हो जाता है। जल की गुणवत्ता सुधारने में वनों की भूमिका को मुख्यतः पोषक तत्वों और हानिकारक रासायनिक कीटनाशकों की अधिकता पर नियंत्रण के रूप में समझा जा सकता है।

    जल में पोषक तत्वों की असामान्य अधिकता पर वनों का नियंत्रण


    पोषक तत्व जल की गुणवत्ता से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण कारक हैं। ये जलीय पारिस्थितिक तंत्र के अनिवार्य तत्व होते हैं परन्तु इनकी असामान्य रूप से अधिक मात्रा जलीय वातावरण में अनेक अवांछित बदलाव ला देती है जिनके कारण यह जल मानव के लिये उपयोग लायक नहीं रह जाता। खेतों में उपयोग होने वाले विभिन्न रासायनिक उर्वरक, मल तथा अपशिष्ट पदार्थ, जहरीले कीटनाशक इत्यादि वर्षा के जल के प्रवाह के साथ बह-बहकर जलधाराओं तथा तालाबों को प्रदूषित करते रहते हैं।

    प्रदूषण के कारण जल की गुणवत्ता बिगड़ती है और मानव जीवन तथा स्वास्थ्य को दुष्प्रभावित करती है। जहरीले पदार्थों के जलधाराओं में मिश्रित होने से दूषित जल पीने, तैरने, नहाने या संक्रमित मछलियाँ खाने पर मनुष्यों को अनेक बीमारियाँ हो सकती हैं। जॉनसन व अन्य द्वारा किये गए शोध से इस बात के संकेत मिले हैं कि नदी तटीय वन बफर अनेक प्रकार के प्रदूषक तथा विषैले तत्वों के प्रवाह को जल प्रवाह में जाने से रोक लेते हैं और उन्हें जमाकर मिट्टी या कार्बनिक पदार्थों में अवशोषित करा देते हैं अथवा सूक्ष्म जैविक प्रक्रियाओं या रासायनिक क्रियाओं द्वारा अन्य अहानिकारक तत्वों मे बदल देते हैं।जलधाराओं के किनारे मौजूद जंगल प्रदूषकों को सोखकर जलधारा के लिये एक विषपायी छन्ने या बफर का काम करते हैं। नदी तटीय वन बफर (Riparian forest buffer) नाइट्रोजन, फास्फोरस, कैल्शियम, पोटैशियम, सल्फर तथा मैग्नीशियम जैसे पोषक तत्वों की अपशिष्ट मात्रा को छानकर जलधाराओं में पहुँचने से पहले ही रोकने में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

    अधिकांश प्रदूषकों में नाइट्रोजन तत्व की मात्रा काफी अधिक होती है जो आमतौर पर खेतों से आने वाले पानी के साथ घुले हुए यूरिया जैसे रासायनिक उर्वरक के रूप में आता है। इसी प्रकार पानी के साथ बहकर आने वाले कार्बनिक पदार्थों में फास्फेट और मिट्टी के कणों पर सतह-शोषित (adsrobed) रूप में फास्फोरस रहता है।

    जलधाराओं में इन पोषक तत्वों की अत्यधिक मात्रा से यूट्रोफिकेशन (eutrophication) नामक क्रिया प्रारम्भ हो जाती है जिसमें ज्यादा पोषक तत्व प्राप्त होने से जलीय शैवालों तथा अन्य जलीय वनस्पतियों की मात्रा में बड़ी तेजी से वृद्धि होने लगती है। जब ऐसी जलीय वनस्पतियों की मात्रा में असामान्य वृद्धि होती है तो पानी में घुली ऑक्सीजन की खपत (Biological Oxygen Demand) में अप्रत्याशित वृद्धि हो जाती है और बुरी दिखने वाली शैवाल तथा सड़ते हुए कार्बनिक पदार्थों की तैरती हुई कालीन जैसी परतें बन जाती हैं जो जल की सतह को ढँक लेती हैं। इसके फलस्वरूप जल में अवांछनीय रंग और गन्ध पैदा हो जाते हैं, स्वाद बिगड़ जाता है और वह प्राणियों के उपयोग लायक नहीं रह जाता। हाल के वर्षों में यह स्थिति नर्मदा के किनारे भी कई क्षेत्रों में अक्सर दिखाई देने लगी है।

    वर्ष 2015 में नर्मदा के मध्य भाग में काफी क्षेत्रों में आश्चर्यजनक रूप से एजोला नामक जलीय फर्न की अप्रत्याशित बढ़त देखी गई। यह वृद्धि इतने बड़े पैमाने पर और इतने कम समय में हुई कि इसने मध्य नर्मदा उप-बेसिन के कई खण्डों में नर्मदा जल की सतह को लगभग पूरा का पूरा ढँक लिया। फतेहगढ़-जोगा के निकट एजोला की वृद्धि से पूरी नर्मदा किसी नदी की बजाय हरे फुटबॉल मैदान जैसी दिखाई दे रही थी जिसके चित्र समाचार पत्रों में भी छपे।

    यह स्थिति, शाहपुर, बुदनी, छीपानेर, नेमावर, किटी और आस-पास के क्षेत्रों में भयावह रूप में देखी गई जिसके कारण नौका चालन और मछली पकड़ने के लिये जाल फेंकना भी दुश्वार हो गया। यह सोचने और शोध का विषय है कि बाँधों के कारण ठहरे हुए पानी वाले खण्डों में जहाँ खेती से रासायनिक उर्वरकों की अपशिष्ट मात्रा जल में बढ़ रही है कहीं यह उसका सीधा परिणाम तो नहीं है? इस विषय पर निरन्तर शोध और अनुश्रवण किये बिना नर्मदा घाटी में बसे समाज का दीर्घकालिक कल्याण सुनिश्चित करना कठिन है।

    जल में विषैले पदार्थों के मिलने पर वनों की चौड़ी बागड़ द्वारा नियंत्रण
    प्रदूषण के कारण जल की गुणवत्ता बिगड़ती है और मानव जीवन तथा स्वास्थ्य को दुष्प्रभावित करती है। जहरीले पदार्थों के जलधाराओं में मिश्रित होने से दूषित जल पीने, तैरने, नहाने या संक्रमित मछलियाँ खाने पर मनुष्यों को अनेक बीमारियाँ हो सकती हैं। जॉनसन व अन्य (1984) द्वारा किये गए शोध से इस बात के संकेत मिले हैं कि नदी तटीय वन बफर अनेक प्रकार के प्रदूषक तथा विषैले तत्वों के प्रवाह को जल प्रवाह में जाने से रोक लेते हैं और उन्हें जमाकर मिट्टी या कार्बनिक पदार्थों में अवशोषित करा देते हैं अथवा सूक्ष्म जैविक प्रक्रियाओं या रासायनिक क्रियाओं द्वारा अन्य अहानिकारक तत्वों मे बदल देते हैं।

    लॉरसेन तथा उनके सहयोगियों (1984) ने पाया कि केवल दो फुट चौड़ी बफर पट्टी भी बीमारी पैदा करने वाले हानिकारक फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया (Faecal Coliform Bacteria) को 83 प्रतिशत तक रोक लेती है जबकि 7 फुट की बफर पट्टी तो लगभग 95 प्रतिशत फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया को पानी में जाने से रोकने में सक्षम है। यंग तथा उनके साथियों (1980) ने मिनीसोटा में आकलन किया कि 118 फीट चौड़ी बफर पट्टी से छनकर आने के बाद पानी में फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया की मात्रा इतनी कम हो जाती है कि वह जल मानव उपयोग के लायक हो जाता है। इस प्रकार हम पाते हैं कि नदी तटीय वन बफर जल की गुणवत्ता सुधारने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं।

    घने वनों में मौजूद वानस्पतिक बागड़ पोषक तत्वों को छानने में कारगर


    अमेरिकी कृषि विभाग के शोधकर्ताओं लॉरेन्स तथा उनके सहयोगियों (1984) ने टिफटन, जॉर्जिया में एक लम्बे अध्ययन में पाया कि पर्णपाती वन बफर खेतों से बहकर आने वाले नाइट्रोजन की मात्रा में 68 फीसदी तक कमी कर देते हैं। इसी प्रकार मेरीलैण्ड में चैसापीक खाड़ी में पश्चिमी किनारे पर पीटरजॉन तथा कौरल (1984) द्वारा किये गए प्रयोगों में पाया गया कि खेतों से बहकर आने वाली लगभग 89 प्रतिशत नाइट्रोजन तटीय बफर पट्टी के पहले 62 फीट में ही छनकर रुक जाती है।

    जॉर्डन तथा अन्य ने मेरीलैण्ड के पूर्वी समुद्री तट पर पाया कि खेतों से बहकर आने वाले नाइट्रेट्स की 95 प्रतिशत मात्रा तटीय बफर वनों द्वारा छानकर रोक ली जाती है। अध्ययनों से यह भी पुष्टि हुई है कि नदी तटीय वन हानिकारक नाइट्रेट को डी-नाइट्रीकरण की क्रिया द्वारा गैसीय नाइट्रोजन तथा नाइट्रस ऑक्साइड में बदलकर उन्हें वातावरण में मुक्त कर देते हैं और खेतों से बहकर आने वाले जल में से नाइट्रोजन की मात्रा में कमी करने में प्रभावी हैं।

    इसी प्रकार नदी तटीय वन बफर फॉस्फोरस के लिये भी महत्त्वपूर्ण सोख्ते (सिंक) का काम करते हैं क्योंकि अवसाद (मिट्टी के महीन कण) के साथ जुड़ा हुआ फास्फोरस बफर पट्टी में ही जमा हो जाता है जिसकी कुछ मात्रा पौधों के ऊतकों द्वारा सोख ली जाती है और काफी मात्रा मिट्टी में पाये जाने वाले सूक्ष्म जीवों द्वारा इस्तेमाल कर ली जाती है। उत्तरी कैरोलिना में कूपर तथा गिलियम (1987) द्वारा किये गए अध्ययन में पाया गया कि फास्फोरस की लगभग आधी मात्रा नदी तटीय वन बफर में शोषित हो जाती है।

    मेरीलैण्ड में पीटरजॉन तथा कौरल (1984) ने पाया कि पर्णपाती काष्ठीय वन बफर खेतों के पानी के साथ आने वाले फास्फोरस की मात्रा में 80 प्रतिशत तक की कमी कर देते हैं। भले ही अध्ययनों के अभाव के कारण हमें आँकड़ों के रूप में स्थानीय जानकारी न हो, नर्मदा अंचल के वन भी यहाँ की सरिताओं के लिये निश्चित रूप से इसी प्रकार की भूमिका लगातार अदा कर रहे हैं। आधुनिक खेती में रासायनिक उर्वरकों व घातक विषैले कीटनाशकों का व्यापक पैमाने पर प्रयोग होने के बावजूद नर्मदा का जल अभी भी अपेक्षाकृत साफ होने का एक प्रमुख कारण यहाँ के वन ही हैं।

    इस प्रश्न का कोई निश्चित उत्तर नहीं दिया जा सकता कि नदी तटीय वन बफर के रूप में घास या वृक्ष किसे अधिक प्राथमिकता दी जानी चाहिए क्योंकि अब तक किये गए अध्ययन भिन्न-भिन्न स्थानीय परिस्थितियों में किये गए होने के कारण सही तुलना सम्भव नहीं है परन्तु दोनों की अपनी-अपनी विशेषताएँ और उपयोग हैं। घास और वृक्ष दोनों के बफर पोषक तत्वों और तलछट को छान (फिल्टर) करके रोकने और जल में नाइट्रेट की मात्रा को घटाने में मदद करते हैं। वृक्ष बफर में डी-नाइट्रीकरण की दर तो अधिक होती है परन्तु इन्हें स्थापित करने में अधिक समय लगता है। इसके विपरीत घास बफर काफी जल्दी स्थापित किया जा सकता है और तलछट के बारीक कणों को रोकने और उन्हें जल प्रवाह से अलग करके जमा करने के लिये अधिक सतह उपलब्ध कराता है। वन बफर की संरचना चित्र 3.5 में दर्शाई गई है।

    भू-क्षरण व जलाशयों में अवसाद जमाव पर नियंत्रण में वनों की भूमिका


    नदियों के सन्दर्भ में वनों की एक महत्त्वपूर्ण भूमिका पानी के बहाव के कारण होने वाले मिट्टी के कटाव और भू-क्षरण को काबू में रखने की है। इस तरह के भू-क्षरण के फलस्वरूप जलाशयों में होने वाले अवसाद के जमाव (sedimentation) को नियंत्रित करने में वन बड़ी कारगर भूमिका निभाते हैं। अवसाद मिट्टी के वे कण हैं जो क्षरण से प्रभावित भूमियों (जैसे वन विहीन हो चुकी पहाड़ियाँ जुते हुए खेत, निर्माण क्षेत्र, वनों की कटाई वाले क्षेत्र तथा अपरदन प्रभावित नदी तट आदि) से उत्पन्न होकर जलधाराओं, झीलों व अन्य खुले जलस्रोतों में मिल जाते हैं।

    जलप्रवाह की तीव्रता को घटाकर भूमि का क्षरण रोकने में वनों की भूमिका बड़ी महत्त्वपूर्ण है। वन आच्छादित भूमि की पारगम्यता अधिक होने के कारण इस पर गिरने वाला वर्षा का जल ह्यूमस और जैविक द्रव्य के कचरे में सोखकर धीरे-धीरे भूमि में प्रवेश कर जाता है। इसके फलस्वरूप भूमि की सतह पर स्वतंत्र रूप से बहने के लिये अपेक्षाकृत कम पानी शेष बचता है। इस कारण वन अच्छादित भूमि पर प्राप्त होने वाले वर्षाजल का सतही अपवाह बहुत कम हो जाता है जिसके फलस्वरूप भूमि का क्षरण होने की क्रिया पर अंकुश लगता है।वन रहित क्षेत्रों में जल का सतही अपवाह धीरे-धीरे छोटी-छोटी नालियों का निर्माण कर देता है जो ढलवाँ क्षेत्रों में बड़ी नालियों व गली और होते-होते बीहड़ों का रूप धारण कर लेता है। ये सभी नालियाँ, गलियाँ व बीहड़ किसी-न-किसी नदी से जुड़े होते हैं। वनस्पति विहीन क्षेत्रों में वर्षा में आने वाले जल प्रवाह के साथ मिट्टी की ऊपरी सतह का नियमित रूप से क्षरण होता रहता है और उपजाऊ मिट्टी, रेत, कंकड़ व गाद (सिल्ट) आदि जलधारा के साथ बहते और जलाशयों में एकत्र होते रहते हैं। मिट्टी की ऊपरी सतह के क्षरित होकर बह जाने के कारण भूमि की उत्पादकता में कमी आने लगती है और भूमि धीरे-धीरे बंजर होती जाती है।

    जहाँ की भूमि पर वन आवरण होता है वहाँ पौधों की जड़ें मिट्टी को बाँधकर रखती हैं जिससे मिट्टी के क्षरण पर अंकुश लगता है। जलप्रवाह की तीव्रता को घटाकर भूमि का क्षरण रोकने में वनों की भूमिका बड़ी महत्त्वपूर्ण है। वन आच्छादित भूमि की पारगम्यता (permieability) अधिक होने के कारण इस पर गिरने वाला वर्षा का जल ह्यूमस और जैविक द्रव्य के कचरे में सोखकर धीरे-धीरे भूमि में प्रवेश कर जाता है। इसके फलस्वरूप भूमि की सतह पर स्वतंत्र रूप से बहने के लिये अपेक्षाकृत कम पानी शेष बचता है। इस कारण वन अच्छादित भूमि पर प्राप्त होने वाले वर्षाजल का सतही अपवाह बहुत कम हो जाता है जिसके फलस्वरूप भूमि का क्षरण होने की क्रिया पर अंकुश लगता है।

    जलधाराओं में अवसाद की अधिकता जल की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव डालने के साथ-साथ जलाशयों की जल भराव क्षमता में कमी करके उनकी उपयोगी आयु घटा देती है। कई अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि वन काफी प्रभावी तरीके से अवसाद छन्नी (sediment trap) का काम करते हैं।

    जलधाराओं के समीपवर्ती क्षेत्र में बड़े पैमाने पर खेती तथा तटीय वनों की दुर्दशा जलाशयों में अवसाद इकट्ठा होने की गति को तेजी से बढ़ा सकती है। तीव्र ढाल वाले क्षेत्रों में जब खेती या अन्य कारणों से जल में अवसाद की मात्रा तथा बहाव बढ़ जाता है तो जगह-जगह अवसाद के जमाव से छोटे-छोटे टापू बनने लगते हैं और जलधारा का प्रवाह बाधित होने लगता है। स्वस्थ नदी तटीय वन मिट्टी के क्षरण के माध्यम से आने वाले अवसाद को छानकर रोक लेते हैं और नदियों के कगारों को स्थायित्व देते हैं।

    स्वस्थ वनों से युक्त जलग्रहण क्षेत्रों में अन्य किसी भी प्रकार की वनस्पति आवरण की अपेक्षा सबसे कम गाद एकत्रित होती है। इसीलिये वनों को बहुधा जलाशयों में गाद की मात्रा नियंत्रित करने वाली कुदरती प्रणाली के रूप में देखा जाता है। इस सम्बन्ध में कुछ महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक प्रयोगों के निष्कर्ष वनों की महत्त्वपूर्ण भूमिका को स्पष्ट करते हैं।

    एरिजोना में विलसन (1967) ने पाया कि जलधारा के किनारे मौजूद घास के बफर रेत के कणों को बहुत कम दूरी (प्रारम्भ से लगभग 10 फीट तक) में ही रोक लेते हैं जबकि गाद के महीन कणों को हटाने के लिये लगभग 50 फीट चौड़ी बफर पट्टी आवश्यक है। वैज्ञानिकों ने यह भी पाया कि नदी तटीय घास बफर रेत जैसे बड़े कणों को रोकने में तो बहुत कारगर हैं परन्तु चिकनी मिट्टी के महीन कणों को रोकने में ये उतने प्रभावी नहीं हैं।

    जॉर्जिया में लिटिल रिवर के तटीय क्षेत्रों में किये गए कुछ अध्ययनों में लॉरेन्स तथा उनके सहयोगी वैज्ञानिकों (1986) ने पाया कि एक नदी तटीय वन में 311600 से 471000 पौंड प्रति एकड़ की मात्रा तक गाद प्रतिवर्ष लगभग पिछले 100 वर्षों में एकत्र हुआ है। उत्तरी कैरोलिना में कूपर व अन्य वैज्ञानिकों (1987) ने पाया कि उत्पादक कृषि क्षेत्रों में खेतों से आने वाली अवसाद का 84-90 प्रतिशत तक समीपवर्ती नदी तटीय पर्णपाती वनों द्वारा रोक लिया जाता है। उत्तरी कैरोलिना में ही पीडमॉन्ट इलाके में डेनियल्स तथा उनके सहयोगियों (1996) द्वारा अपने अध्ययन में पाया गया कि केवल घास अथवा घास-वन की तटीय छन्नी पट्टियाँ अवसाद को 60-90 प्रतिशत तक रोकने में समान रूप से प्रभावी हैं।

    ब्लैक्सबर्ग, वर्जिनिया डिलाहा तथा उनके साथी शोधकर्ताओं (1989) ने पाया कि 30 फीट चौड़ी ऑचर्ड घास की पट्टी जल के प्रवाह के साथ आये अवसाद तथा घुलनशील पदार्थों को 84 प्रतिशत तक कम कर देती है जबकि 15 फीट चौड़ी पट्टी से जलधारा में जाने वाले अवसाद की मात्रा 70 प्रतिशत तक कम हो जाती है। प्रयोगों में यह भी पाया गया है कि घास की बफर पट्टी की अवसाद को छानकर रोक लेने की क्षमता समय के साथ क्रमशः कम होती जाती है क्योंकि बफर पट्टी धीरे-धीरे जमा हुए अवसाद से भर जाती है।

    वर्जिनिया में डिलाहा तथा उनके सहयोगियों (1989) द्वारा अध्ययन में पाया गया कि घास की एक बफर पट्टी जो प्रारम्भ में 90 प्रतिशत तक अवसाद को रोक लेती थी, 6 बार के बाद केवल 5 प्रतिशत तक ही कारगर रही। गुरमेल सिंह, रामबाबू तथा उनके सहयोगियों (1992) द्वारा पाया गया कि 40 प्रतिशत से अधिक छत्र घनत्व वाले सघन वन क्षेत्रों में मिट्टी के ह्रास की औसत वार्षिक दर मात्र 0.9 से 1.3 टन प्रति एकड़ है जबकि 40 प्रतिशत से कम छत्र घनत्व वाले विरल वनों में मिट्टी के ह्रास की दर 2.2 से 8.9 टन प्रति एकड़ है।

    इस अध्ययन से पता चला कि जहाँ वन आवरण घना है वहाँ मिट्टी के कटाव की दर बहुत कम है और जहाँ वन आवरण नगण्य है वहाँ मिट्टी के कटाव की दर बहुत अधिक है। ऑस्बार्न तथा कौवेसिक (1993) ने पाया कि बफर पट्टी की अवसाद रोकने की क्षमता अवसाद के कणों के आकार और मात्रा, ढलान, वनस्पति का प्रकार और घनत्व, भूमि पर ह्यूमस तथा पत्तियों के कचरे की उपस्थिति या अनुपस्थिति, मिट्टी की संरचना, अधोसतहीय जल अपवाह तथा बाढ़ की आवृत्ति और तीव्रता पर निर्भर करती है।

    इन बातों को ध्यान में रखते हुए नदी तटीय वन बफर को ठीक से बनाया तथा लगातार रख-रखाव करके उनकी उपयोगिता को लम्बी अवधि तक बनाए रखा जा सकता है। नर्मदा पर बने बाँधों की शृंखला के साथ निर्मित जलाशयों के सन्दर्भ में भी अवसादन की समस्या को समय रहते गम्भीरता से लिये जाने की आवश्यकता है। इसके लिये गम्भीर रूप से भू-क्षरण प्रभावित जलागम क्षेत्रों का प्राथमिकता पर उपचार व निरन्तर रख-रखाव आवश्यक होगा।

    नदी के तटों का कटाव रोककर उन्हें स्थिर रखने में वनों की भूमिका


    पानी के बहाव के कारण होने वाले भू-क्षरण पर नियंत्रण की दृष्टि से वनों की एक अन्य भूमिका नदियों के कगारों को स्थायित्व देने में भी है। वनस्पतिविहीन कगारों की मिट्टी कट-कटकर नदियों में गिरने से मूल्यवान भूमि का क्षय होता है। वन आच्छादित कगारों पर नाना प्रकार की वनस्पतियों की जड़ें मिट्टी को बाँधे रखती हैं जिससे मिट्टी को अधिक स्थायित्व मिलता है।

    जलधाराओं के तटीय इलाकों में कगारों पर वनस्पति आवरण नष्ट हो जाने के फलस्वरूप भूमि का लगातार क्षरण होता रहता है जिससे नालियाँ और नालों के मुहाने बनने के साथ-साथ बीहड़ों का निर्माण होने लगता है। वन आच्छादित कगारों के कटाव का खतरा अपेक्षाकृत काफी कम रहता है।

    जलधारा के सीधे सम्पर्क में आ जाने की स्थिति में भी ऐसे इलाकों में वनविहीन क्षेत्रों की अपेक्षा कटाव की गति नहीं बढ़ने पाती। यद्यपि नर्मदा के कगार काफी बड़े क्षेत्र में चट्टानी और तरंगित हैं परन्तु बाकी क्षेत्रों में नदी के कगारों का कट-कटकर नर्मदा व उसकी सहायक नदियों में गिरना जारी है। वन की हरित पट्टी इस पर रोक लगाने में काफी कारगर हो सकती है।

    भूजल भण्डार और वन


    नर्मदा पदयात्री और साहित्यकार श्री वेगड़ द्वारा दी गई उपमा के अनुरूप जंगल बादलों के उतरने के हवाई अड्डे हों न हों, बारिश का पानी सोखने वाले विराट स्पंज तो हैं ही! वर्षा के दौरान धरती को मिलने वाले जल का भविष्य तय करने में वनों की बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका है। वर्षाजल को सोखकर भूजल भण्डार समृद्ध करने में वनों की भूमिका अमूल्य और अतुलनीय है। ऐसा उनकी अनूठी वानस्पतिक संरचना और जंगल की स्वस्थ मिट्टी के कारण सम्भव हो पाता है।

    वर्षाजल जब बड़े वेग के साथ वन आवरण से टकराता है तो सबसे पहले वृक्षों के छत्र से टकराकर उनका वेग कम होता है। इसके बाद वही जल वृक्षों के छत्र से छन-छन कर वनों के धरातल पर मौजूद छोटे पौधों, घास, खर-पतवार और सड़ी गली पत्तियों, शाखाओं, छाल, फल-फूल के जैविक द्रव्य की भुरभुरी सरंध्र परतों में किसी सूखे स्पंज की भाँति सोख लिया जाता है।

    वनभूमि की रंध्रता बढ़ाकर पानी सोखने की क्षमता कई गुना बढ़ाने में मिट्टी में रहने वाले केंचुए, कीड़े-मकोड़े और भूमिगत सुरंगें व बिल बनाकर रहने वाले अन्य जीव बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन जीवों द्वारा बनाए गए असंख्य भूमिगत छिद्रों नालियों व बिलों के कारण पानी सोखने के लिये उपलब्ध धरती की सतह सामान्य से कई गुना बढ़ जाती है। इन छिद्रों के कारण बने खोखले स्थानों में भी काफी मात्रा में पानी जमा हो जाता है और लम्बे समय तक धीरे-धीरे भीतर रिसता रहता है।वन आवरण यह भूमिका धरातल पर मौजूद जैविक द्रव्य और ह्यूमस के गद्देदार और स्पंजी कवच के कारण निभा पाता है। स्वस्थ और भरे-पूरे वनों में भूमि पर पत्तियों, शाखाओं, छाल, फल-फूल आदि के गिरते रहने के कारण धरातल पर काफी जैविक द्रव्य पाया जाता है जो भूतल और मिट्टी की ऊपरी सतह में पाये जाने वाले नाना प्रकार के जीवों की अनेक जैविक क्रियाओं द्वारा धीरे-धीरे सूक्ष्म जीवों का भोज्य पदार्थ बनता है और गर्मी तथा नमी के फलस्वरूप धीरे-धीरे सड़कर लम्बी अवधि में ह्यूमस बनाता है।

    भूमि की सतह पर पड़ा यह जैविक द्रव्य वर्षा की ऊँचाई से गिरने वाली ताकतवर बूँदों के धरती पर सीधे प्रहार में बाधा उत्पन्न करता है जिससे वर्षा के दौरान सीधे बादलों से आने वाली बूँदों तथा वृक्षों के ऊँचे छत्र से टपककर नीचे पहुँचने वाले पानी की तेज बूँदों की ऊर्जा कम हो जाती है और मिट्टी का कटाव करने की उनकी शक्ति घट जाती है। इस प्रकार स्वस्थ वनों में धरातल पर पाई जाने वाली जैविक द्रव्ययुक्त यह परत एक मोटे गद्देदार स्पंज की तरह रक्षात्मक आवरण या कवच का काम करती है और पानी की बूँदों को भूमि से सीधे टकराकर मिट्टी का क्षरण करने से रोकती है।

    वृक्षों के छत्र से छन-छनकर भूमि की सतह पर पहुँचने वाले जल को जैविक द्रव्य व ह्यूमस की सोख्ते जैसी रंध्रयुक्त सतह से गुजरना पड़ता है। इस अर्थ में वृक्षों का घना छत्र किसी हेलमेट जैसा काम करता है। जिससे टकराने से भूमि पर वर्षा बूँदों की चोट कम लगती है और जल का काफी भाग अवशोषित हो जाता है।

    भूजल स्रोतों का अत्यधिक दोहन होने और पुनर्भरण में कमी होने के कारण भूजल उपलब्धता का सन्तुलन बिगड़ जाता है और अनेक क्षेत्रों में समस्याएँ उत्पन्न होने लगती हैं। जहाँ पानी न होने के कारण या वर्षा की मात्रा में कमी के कारण पुनर्भरण न हो वहाँ तो इसे समझा जा सकता है परन्तु पर्याप्त वर्षा वाले क्षेत्रों में भी भूजल पुनर्भरण कम होने का एक कारण भूमि पर वनस्पति आवरण में कमी होना भी है।

    यूँ तो भूजल के पुनर्भरण को प्रभावित करने वाले कारकों में अन्तः रिसाव के लिये पर्याप्त सतह की उपलब्धता, मिट्टी और चट्टानों की प्रकृति, दरारों और रंध्रों की मौजूदगी, जल की अच्छी संचालकता तथा भूजल स्रोत की भण्डारण क्षमता प्रमुख हैं परन्तु अन्तः रिसाव की क्रिया पर सीधा प्रभाव डालने के कारण वन और उनमें मौजूद वनस्पति आवरण भी इस मामले में अच्छी-खासी भूमिका निभाते हैं।

    वनों के धरातल पर पड़ा सड़ता-गलता जैविक द्रव्य पानी के तेज प्रवाह को रोकने और रिस-रिसकर जमीन की निचली परतों में समाने में बड़ा मददगार होता है। वृक्षों और शाक-घास आदि की जड़ें इस पानी को रिस-रिसकर धरती की निचली सतहों में जाने की राह आसान करती हैं।

    इस मामले में वृक्षों से कहीं अधिक चमत्कारिक भूमिका धरातल पर मौजूद घास-फूस, खर-पतवार आदि निभाते हैं जो वर्षाजल को क्षैतिज प्रवाह के रूप में ऊपर-ऊपर तेजी से बह जाने में कमी करके उसके अन्तः रिसाव का कारण बनते हैं। जल जब जैविक द्रव्य तथा वनस्पतियुक्त क्षेत्र से गुजरता है तो उसकी गति नंगी भूमि पर बहने की तुलना में काफी मन्द हो जाती है और जल को भूमि की निचली सतहों में प्रवेश करने के लिये अधिक समय मिल जाता है।

    वनभूमि की रंध्रता बढ़ाकर पानी सोखने की क्षमता कई गुना बढ़ाने में मिट्टी में रहने वाले केंचुए, कीड़े-मकोड़े और भूमिगत सुरंगें व बिल बनाकर रहने वाले अन्य जीव बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन जीवों द्वारा बनाए गए असंख्य भूमिगत छिद्रों नालियों व बिलों के कारण पानी सोखने के लिये उपलब्ध धरती की सतह सामान्य से कई गुना बढ़ जाती है। इन छिद्रों के कारण बने खोखले स्थानों में भी काफी मात्रा में पानी जमा हो जाता है और लम्बे समय तक धीरे-धीरे भीतर रिसता रहता है।

    सघन वनों में भूमि की ऊपरी सतह पर जैविक द्रव्य तथा ह्यूमस की मात्रा विरल वनों से काफी अधिक होती है जो रन्ध्र युक्त होने के कारण जल को सोख्ता कागज (blotting paper) जैसे पानी सोखने की अद्भुत क्षमता से युक्त होता है। ह्यूमस के कारण वनभूमि की ऊपरी सतह की पारगम्यता और जल को रोककर रखने की क्षमता काफी अधिक हो जाती है जिसके कारण यह जल धीरे-धीरे रिस-रिसकर भूमि की निचली सतहों में लम्बे समय तक जाता रहता है और भूजल भण्डारों को समृद्ध करता रहता है।

    भूजल स्तर पर वनस्पति आवरण का प्रभाव


    वनस्पति आवरण भूजल स्तर को कई तरीकों से प्रभावित करता है। इनमें से मुख्य प्रभाव निम्नानुसार हैं :-

    1. वनस्पति आवरण का छत्र वर्षाजल के कुछ भाग को सतही वाष्पन द्वारा वातावरण में लौटा देता है जबकि शेष जल वृक्षों/पौधों की शाखाओं व तने की सतह पर स्तम्भ प्रवाह की पतली धाराओं के रूप में बहते हुए या फिर छत्र से टपक-टपककर भूमि तक पहुँच जाता है।

    2. वन के धरातल पर गिरी पत्तियों, टहनियों, छाल, फल-फूल आदि का सूखता-सड़ता कचरा रंध्रयुक्त होने से नंगी जमीन के मुकाबले पानी को अधिक देर तक रोककर रखता है और उसका अन्तः रिसाव बढ़ाने में मदद करता है।

    3. वृक्षों की जड़ें अपारगम्य कड़क मिट्टियों में पानी के नीचे जाने के लिये रास्ता बना देती हैं जिससे भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा मिलता है।

    4. असन्तृप्त मिट्टी वाली जमीन में सोखे गये पानी में से पौधों की जड़ें वाष्पोत्सर्जन द्वारा पानी वापस खींचकर भूजल भण्डार तक पहुँच पाने वाले पानी की मात्रा घटा भी देती हैं।

    वनस्पतियों और भूजल का पारस्परिक सम्बन्ध


    जल की मात्रा और गुणवत्ता दोनों ही किसी क्षेत्र विशेष में उगने वाली वनस्पतियों को प्रभावित भी करती हैं और उससे खुद भी प्रभावित होती है। आधुनिक वैज्ञानिक मानते हैं कि किसी क्षेत्र में भूजल का स्तर न केवल पानी की उपलब्धता बल्कि मिट्टी के विभिन्न स्तरों में मौजूद अलग-अलग खनिज व अन्य आवश्यक तत्वों के घुल जाने से जल की गुणवत्ता को भी प्रभावित करता है। खनिज आदि के घुल जाने से पानी की प्रकृति में होने वाला बदलाव यह तय करने में भूमिका निभाता है कि वह क्षेत्र किन पौधों के लिये अधिक अनुकूल है और वहाँ कौन से पेड़-पौधे अधिक संख्या में उगेंगे। इसी कारण हम देखते हैं कि नदियों के किनारे दलदली या काफी समय तक जलमग्न रहने वाली जमीनों पर कुछ अलग किस्म के पेड़-पौधे अधिक विकसित हो जाते हैं। इसी को आधार बनाकर समय-समय पर विद्वानों ने पौधों और भूजल के बीच सम्बन्ध स्थापित करने की कोशिशें की हैं और विशिष्ट प्रजातियों के वृक्षों, झाड़ियों आदि को देखकर भूजल के बारे में अनुमान लगाए गए हैं।

    प्राचीन भारत का भूजल विज्ञान-वराहमिहिर के अनुसार भूजल सूचक पौधे


    यद्यपि आधुनिक वैज्ञानिक इस विषय पर शोध कर रहे हैं परन्तु अभी तक किसी खास वृक्ष प्रजाति को देखकर भूजल की उपलब्धता की गहराई और उसकी गुणवत्ता की भविष्यवाणी कर पाने के कोई सटीक आधार नहीं खोजे जा सके हैं। प्राचीन भारत में यह विज्ञान अत्यन्त विकसित था। इसका प्रमाण छठी शताब्दी में सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक, महान विद्वान वराहमिहिर के प्रसिद्ध ग्रंथ वृहत्संहिता में मिलता है।

    इस ग्रंथ के एक खण्ड- ‘दकार्गलाध्याय’ में पौधों और जल के पारस्परिक सम्बन्ध पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है। दर्कागाल का अर्थ पानी की किल्लोल करती हुई धारा होता है। वृहत्संहिता में वृक्ष की प्रजाति को देखकर यहाँ तक अनुमान लगाए गए हैं कि उससे कितनी दूरी पर और कितनी गहराई पर कैसा और कितना पानी मिलेगा? वृहत्संहिता के दकार्गलाध्याय में वर्णन है कि जिस तरह मनुष्यों के अंगों में नाड़ी और शिराएँ होती हैं उसी तरह भूमि की सतह के नीचे भी जल की ऊँची-नीची शिराएँ हुआ करती हैं।

    भूमि की सतह के नीचे मौजूद इन जल शिराओं की स्थिति का ज्ञान होने से भूजल की प्रकृति और मात्रा का ज्ञान हो सकता है। वृहत्संहिता के इस अध्याय में भूमि पर खड़े अनेक वृक्षों की प्रजातियों के माध्यम से भूजल का पता लगाने के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई है जिसमें जमीन पर खड़े वृक्षों की प्रजाति अथवा अन्य वृक्षों के साथ सहजात उपस्थिति देखकर उस स्थान पर भूजल की गहराई और प्रकृति के बारे में विस्तृत अनुमान लगाए हैं।

    उदाहरण के लिये कहा गया है कि जामुन के वृक्ष से 2 पुरुष (15 फीट) नीचे, गूलर के वृक्ष से ढाई पुरुष (183/4फीट), बेर के वृक्ष से 3 पुरुष (221/2फीट), शोणाक इस प्रकार विभीतक (बहेड़ा) के वृक्ष से साढ़े पाँच पुरुष (411/1फीट) नीचे कोविदारक (सप्तपर्ण), वृक्ष के 5 पुरुष (371/2फीट) नीचे जल मिलता है। इसी प्रकार की गणना अन्य अनेक प्रजातियों की वनस्पतियों के बारे में की गई है।

    भारत में अनेक नगरों में स्वयं को दूसरों से अधिक स्मार्ट दिखाने की होड़ सी लगी हुई है। स्मार्ट सिटी योजना भारत सरकार द्वारा प्रारम्भ की गई है जिसमें चयनित 100 नगरों को आधुनिकतम सुविधाओं से लैस किया जाएगा। परन्तु हमें यह हमेशा याद रखना चाहिए कि सरकारी योजना कुछ भी हो, सबसे स्मार्ट सिटी या गाँव वही होंगे जो आने वाले दशकों में पानी के मामले में आत्मनिर्भर होंगे। अपने जलस्रोतों को रासायनिक उर्वरकों और जहरीले कीटनाशकों से विषाक्त कर उन्हें फिर पेयजल के भण्डार के रूप में उपयोग करना कितना स्मार्ट कहा जा सकता है, यह विचारणीय है।विभिन्न प्रकार के वृक्षों अथवा वृक्ष समूहों के समीप कितनी गहराई में कैसा पानी मिलेगा यह अनुमान लगाने के लिये जिन अतिरिक्त लक्षणों का उल्लेख बृहत्संहिता में मिलता है उसे देखकर इस बात में कोई सन्देह नहीं रह जाता कि वन और जल के रिश्ते का यह विज्ञान वराहमिहिर के काल में काफी उन्नत हो चला था। दुर्भाग्य से यह परम्परागत विशिष्ट ज्ञान सहेजकर रखा नहीं गया और समय के साथ इसका परीक्षण, परिमार्जन नहीं हो सका अतः यह उपयोगी और विलक्षण ज्ञान एक लुप्तप्रायः प्राचीन विद्या जैसा बनकर रह गया। आचार्य वराहमिहिर द्वारा वृक्षों को देखकर भूजल का ज्ञान कराने वाली दकार्गल विद्या को आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टि से देखने और बारीकी से अध्ययन करने की आवश्यकता है।

    बाढ़ की तीव्रता नियंत्रण में वनों की भूमिका


    बाढ़ नियंत्रण में वनों की भूमिका को लेकर वैज्ञानिक समुदाय एकमत नहीं है। यद्यपि मानसून के दौरान होने वाली लम्बी और तेज बारिश के कारण आने वाली विकराल बाढ़ों पर वनों के होने-न-होने का कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता परन्तु हल्की बारिश में बाढ़ और जल आप्लावन को नियंत्रित करने में भी वनों की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। वन धरातल स्पंज की भाँति जल सोखकर पानी के बहाव को थाम लेता है अतः वनभूमि के जल से सन्तृप्त होने तक बाढ़ की भयावहता को कम करने में वन सीमित भूमिका अवश्य निभाते हैं। वैज्ञानिक मान्यता यह है कि एक बार भूमि के जल-सन्तृप्त हो चुकने के बाद आने वाली बाढ़ वन आवरण से प्रभावित नहीं होती।

    स्मार्ट सिटी के दौर में वनों द्वारा पेयजल स्रोतों का शुद्धिकरण


    यह स्मार्ट सिटी का दौर है। भारत में अनेक नगरों में स्वयं को दूसरों से अधिक स्मार्ट दिखाने की होड़ सी लगी हुई है। स्मार्ट सिटी योजना भारत सरकार द्वारा प्रारम्भ की गई है जिसमें चयनित 100 नगरों को आधुनिकतम सुविधाओं से लैस किया जाएगा। परन्तु हमें यह हमेशा याद रखना चाहिए कि सरकारी योजना कुछ भी हो, सबसे स्मार्ट सिटी या गाँव वही होंगे जो आने वाले दशकों में पानी के मामले में आत्मनिर्भर होंगे। अपने जलस्रोतों को रासायनिक उर्वरकों और जहरीले कीटनाशकों से विषाक्त कर उन्हें फिर पेयजल के भण्डार के रूप में उपयोग करना कितना स्मार्ट कहा जा सकता है, यह विचारणीय है। अतः लेखक का यह दृढ़ विचार है कि स्मार्ट सिटी की दौड़ में सबसे आगे उन्हीं नगरों को मौका मिलना चाहिए जो अपने पेयजल स्रोतों का स्मार्ट प्रबन्धन करने के लिये अग्रसर हों। कई पश्चिमी देशों की भाँति ही जलस्रोतों के जलग्रहण क्षेत्र में सघन वृक्षारोपण और घने प्राकृतिक वनों के माध्यम से अपने पेयजल स्रोतों को साफ रखना स्मार्ट सिटी का एक महत्त्वपूर्ण घटक हो सकता है।

    साफ पानी पैदा करने की वनों की क्षमता के बारे में ज्यादातर वैज्ञानिक सहमत हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका के ओरेगॉन राज्य के ‘पर्यावरण की दशा पर प्रतिवेदन - वर्ष 2000’ (State of Environment Report - 2000) में वैज्ञानिकों द्वारा किये गए गहन शोध के आधार पर बताया गया है कि राज्य में वनों से ढँकी हुई भूमि से आने वाले जल में से 50 प्रतिशत से अधिक उत्कृष्ट से उत्तम श्रेणी का पाया गया जबकि खेतों से होकर आने वाले जल में से 20 प्रतिशत से भी कम उत्तम गुणवत्ता का पाया गया।

    शहरी क्षेत्रों से आने वाले जल में तो अच्छी गुणवत्ता का प्रतिशत इससे भी कम पाया गया। यह स्थिति पूरे राज्य में पाई गई। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि पेयजल प्रदाय करने वाले जलस्रोतों के इर्द-गिर्द वनों के संरक्षण से पेयजल उपचारण पर अपेक्षाकृत काफी कम खर्च करना पड़ता है जिससे राज्य की काफी धनराशि की बचत होती है।

    इसी रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि राज्य में सम्पन्न किये गए अध्ययनों से इस बात के संकेत मिले हैं कि यदि जलस्रोतों के इर्द-गिर्द वन न हों तो यांत्रिक अथवा रासायनिक उपचार द्वारा जल के शुद्धिकरण पर किये जाने वाले व्यय में काफी अधिक बढ़ोत्तरी सम्भावित है। कई क्षेत्रों में किये गए अध्ययनों से स्पष्ट हुआ है कि भारी धातुओं और हानिकारक रासायनिक तत्वों के जलधाराओं में मिल जाने से जो प्रदूषण होता है उसे रोकने में वनों की विशेष भूमिका है। इन सभी प्रयोगों से वन बफर के कारण जल के शुद्धिकरण की पुष्टि होती है। इन प्रयोगों ने ये भी संकेत दिये हैं कि वन बफर के माध्यम से जलस्रोतों का शुद्धिकरण एक कम खर्चीला और अधिक सुविधाजनक तरीका है।

    इकावारिया और लॉकमेन (1999) ने अध्ययनों के आधार पर दावा किया है कि न्यूयॉर्क शहर के जलग्रहण क्षेत्र के उपचार और सुप्रबन्धन पर यदि एक अरब अमेरिकी डॉलर का व्यय किया जाये तो अगले दस वर्षों में शहर के जल उपचारण के लिये बनाए जाने वाले संयंत्रों पर आने वाले खर्च में लगभग 4 से 6 अरब अमेरिकी डॉलर की बचत की जा सकती है। वर्ष 2002 में अमेरिका में 27 जल प्रदाय संस्थानों पर किये गए अध्ययन में पाया गया कि खुले में जलस्रोतों से पेयजल प्रदाय करने में उपचारण व्यय का जलग्रहण क्षेत्रों में वनों की मौजूदगी में सीधा सम्बन्ध है। अमेरिकन वॉटर वर्क्स एसोसिएशन द्वारा कराए गए इस अध्ययन में पाया गया कि जलस्रोत के जलागम में वन आवरण में प्रत्येक 10 प्रतिशत वृद्धि होने पर (60 प्रतिशत तक) उपचारण लागत में लगभग 20 प्रतिशत तक कमी आ जाती है। इस अध्ययन के निष्कर्ष तालिका 3.1 में दिये गए हैं।

     

    तालिका 3.1


    वनों से जल उपचारण खर्च में कम

    जलागम क्षेत्र में वनों का प्रतिशत

    रासायनिक उपचारण व्यय प्रति मि. गैलन (यू.एस. डॉलर)

    उपचारण व्यय में कमी का प्रतिशत

    10

    $ 115

    19

    20

    $ 93

    20

    30

    $ 73

    21

    40

    $ 58

    21

    50

    $ 46

    21

    60

    $ 37

    19

    स्रोत : Opflow, Vol-30, No. 5, May 2004, American Waterworks Association

     

    कई वैज्ञानिकों ने अध्ययनों में यह पाया है कि जलाशयों के जलग्रहण क्षेत्र में अच्छे और सुप्रबन्धित वन होने पर जलाशयों के जल उपचार पर बहुत कम व्यय करना पड़ता है। जल के शुद्धिकरण में वनों की महत्त्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए अनेक देशों में महानगरपालिकाएँ अब जल उपचारण पर अपने खर्चे कम करने के लिये पेयजल स्रोत के जलग्रहण क्षेत्र में वन आवरण बढ़ाने के उपायों पर काम कर रही हैं।

    लागत-लाभ की दृष्टि से विकासशील देशों के लिये पेयजल स्रोतों की शुद्धि के लिये यांत्रिक अथवा रासायनिक पद्धतियाँ अपनाने की बजाय पेयजल स्रोतों के निकट वन बफर अधिक कारगर साबित हो सकते हैं क्योंकि इनमें प्रदूषक तत्वों को पौधों के ऊतक सोख लेते हैं या मिट्टी में पाये जाने वाले सूक्ष्म जीव उन्हें हानि रहित तत्वों में बदल देते हैं। इस प्रकार बहुत कम खर्च में जनता को पीने का साफ पानी उपलब्ध कराने की व्यवस्था हो सकती है।

    सौभाग्य से इस पुस्तक के लेखक को वर्ष 2014 में संयुक्त राज्य अमेरिका में न्यूयॉर्क महानगर की पेयजल शुद्धिकरण के लिये वनों के प्रबन्धन का जनभागीदारी आधारित मॉडल देखने और वहाँ के लोगों से प्रत्यक्ष चर्चा का अवसर मिला। अमेरिका के कैट्सकिल और डेलावायर जलाशयों से न्यूयॉर्क महानगर को जल प्रदाय करने के लिये इन जलाशयों के जलग्रहण क्षेत्रों में ‘वाटरशेड एग्रीकल्चर काउन्सिल’ व इसके साथ जुड़ी अनेक संस्थाएँ व लोग मिलकर इन जलाशयों के जल को साफ रखने के लिये जलग्रहण क्षेत्र के वनों को सुप्रबन्धित करते हैं।

    यह अनुकरणीय उदाहरण अन्य कई देशों ने भी अपनाना प्रारम्भ कर दिया है जिसके फलस्वरूप अब सियोल, टोक्यो, बीजिंग, म्यूनिख, सिडनी, मेलबॉर्न, स्टॉकहोम, साल्वाडोर आदि महानगरों में पेयजल शुद्धिकरण तंत्र में रासायनिक और यांत्रिक विधियों के साथ-साथ वन प्रबंधन के घटक पर भी ध्यान देना शुरू किया गया है।

    इन्दौर महानगर को नर्मदा जल भेजने वाले इलाकों के खेतों की पड़ताल


    विगत कुछ दशकों में खेती में विषैले रासायनिक कीटनाशकों के उपयोग की मात्रा अन्य सभी क्षेत्रों की भाँति ही नर्मदा घाटी में भी क्रमशः बढ़ती ही गई है। खेतों में डाली जा रही उर्वरकों व घातक रासायनिक कीटनाशकों की इस मात्रा में से काफी मात्रा वर्षा के पानी और मिट्टी के साथ मिलकर नदी-नालों के माध्यम से होते हुए नर्मदा में पहुँचती है और पानी को खराब करती है।

    इसी सिलसिले में इन्दौर महानगर को नर्मदा जल भेजने वाले खरगौन जिले के ‘जलूद इनटेक वेल’ के जलागम क्षेत्र में पड़ने वाले इलाकों के खेतों में रासायनिक उर्वरकों व कीटनाशकों के उपयोग का स्तर ज्ञात करने के लिये वन विभाग द्वारा वर्ष 2014 में खरगोन जिले की बड़वाह व महेश्वर तहसीलों के 136 गाँवों में एक प्रारम्भिक पड़ताल की गई। इन्दौर के पेयजल की गुणवत्ता को खराब करने की क्षमता रखने वाले इस अंचल में वन विभाग विभाग बड़वाह द्वारा विभाग के सैकड़ों मैदानी कर्मचारियों की मदद से कराए गए।

    वर्षा से प्राप्त जल को भूमि में सोखने और जलधाराओं में प्रवाह बनाए रखने की भूमिका वन अपनी विशिष्ट संरचना के कारण ही निभा पाते हैं। जंगल एक विशाल शामियाने जैसी भूमिका निभाते हुए वर्षा के पानी की बौछार को अपने ऊपर झेल लेता है और बहते हुए पानी के वेग को कम करके उसे जमीन की निचली सतहों में उतारने में मदद करता है। वनों का यह गुण हिमविहीन नदियों के प्रवाह को मानसून के बाद भी निरन्तर जारी रखने में काम आता है। वर्षापूरित नर्मदा और उसकी सहायक नदियों के मामले में भी यह तथ्य अत्यन्त प्रासंगिक है।इस अध्ययन में वनमण्डल के 6 वन परिक्षेत्रों बड़वाह, काटकूट, सनावद, मण्डलेश्वर, पाडल्या और बलवाड़ा के 136 गाँवों में किसानों से व्यक्तिगत साक्षात्कार, घर-घर सर्वेक्षण, समूह चर्चाओं, खाद, विक्रेताओं के यहाँ की गई पूछताछ एवं अन्य स्रोतों से प्राप्त विवरण के आधार पर इस बात का मोटा आकलन करने का प्रयास किया गया कि इन्दौर महानगर के जल प्रदाय से जुड़े क्षेत्र में वनों की दशा कैसी है और जल की गुणवत्ता का क्या हाल है? इस सर्वेक्षण में 136 गाँवों में 45,261.859 हेक्टेयर भूमि पर की जा रही खेती में प्रतिवर्ष औसतन लगभग 5,667 टन यूरिया, 4,110 टन डी.ए.पी., 2,812 टन पोटाश, 3,288 टन सुपर फास्फेट और 735 टन एन.पी.के. जैसे रासायनिक उर्वरकों तथा 1,64,265 लीटर खतरनाक कीटनाशकों व खरपतवार नाशकों का उपयोग किया जाना पाया गया।

    सर्वेक्षण क्षेत्र में उपयोग किये जा रहे घातक विषैले कीटनाशकों में मोनोक्रोटोफॉस, क्लोरोपाइरीफॉस, पोलो, बेगासस, स्पार्क, होस्टेथियॉन, रोगोर और कान्फीडोर जैसे घातक कीटनाशक सम्मिलित हैं। इसमें से कितनी मात्रा में फसलों में सीधी खपत होती है और कितनी मिट्टी में रहकर बाद में नालों के जरिए पानी के साथ नर्मदा में पहुँचती है, इसका बारीक अध्ययन अवश्य किया जाना चाहिए।

    यदि इस क्षेत्र के खेतों में उर्वरकों व कीटनाशकों की उपयोग की जा रही इस बड़ी मात्रा का 10 प्रतिशत भी मिट्टी में अवशिष्ट के तौर पर बचा रहकर नालों-नदियों के अपवाह तंत्र में घुसकर नर्मदा के जल में मिल रहा हो तो इन्दौर जैसे महानगर को इसकी तुरन्त गहराई से जाँच पड़ताल करनी चाहिए वरना इसके दुष्प्रभावों का पता चलने तक काफी देर हो चुकी होगी। इस प्रारम्भिक सर्वेक्षण से मिली जानकारी इस बात के ठोस संकेत देती है कि बिना समुचित उपचारण के नर्मदा के जल का मानव उपयोग निरापद नहीं है।

    इस दृष्टि से वन विभाग द्वारा इन्दौर तथा बड़वाह वनमण्डलों की कार्य आयोजना में वन प्रबन्धन के माध्यम से इन्दौर महानगर की पेयजल व्यवस्था के शुद्धिकरण का घटक पहली बार सम्मिलित किया गया है और क्षेत्र के वनों को बचाने के लिये उद्योग जगत की मदद से गाँवों को वन समितियों को ‘पारिस्थितिक सेवाओं के लिये भुगतान’ (Payment for Ecosystem Service-PES) की व्यवस्था पहली बार लागू की गई है। विभागीय कार्य आयोजना में वन प्रबन्धन के माध्यम से इन्दौर महानगर की पेयजल व्यवस्था के शुद्धिकरण का घटक जोड़ा जाना एक दूरगामी कदम है परन्तु इसका समुचित क्रियान्वयन ही इसके लाभ सुनिश्चित कर सकेगा।

    नर्मदा अंचल के वन नर्मदा के जल की गुणवत्ता बनाए रखने में जो मूल्यवान सहयोग करते हैं उसे ध्यान में रखते हुए मध्य प्रदेश के इन्दौर, भोपाल व जबलपुर जैसे बड़े नगरों तथा अन्य अनेक नगरों सहित गुजरात के कुछ भागों को पेयजल का प्रदाय करने वाले जलग्रहण क्षेत्रों में वनों का संरक्षण, उपचार और सुप्रबन्धन करके इन शहरों के पेयजल के उपचारण के लिये बनाए जाने वाले संयंत्रों पर आने वाले खर्च में भारी बचत की जा सकती है। इसके विपरीत यदि नगरीय प्रदाय वाले जलस्रोतों के इर्द-गिर्द वन समाप्त हो जाएँ तो यांत्रिक अथवा रासायनिक उपचार द्वारा जल के शुद्धिकरण पर किये जाने वाले व्यय में काफी अधिक बढ़ोत्तरी सम्भावित है। स्मार्ट सिटी बनाने की भागमभाग में नर्मदा जल का उपयोग करने वाले नगरों को इस विषय पर गम्भीरता से सोचना चाहिए।

    निष्कर्ष - हाथ कंगन को आरसी क्या?


    इस अध्याय में दिये गए वैज्ञानिक विवरण से स्पष्ट है कि जंगल के रहने और नर्मदा के बहने के बीच चोली-दामन का सम्बन्ध है और वनों को नर्मदा के प्राण कहने से हमारा आशय क्या है? इस सम्बन्ध के बारे में यही कहा जा सकता है कि प्रत्यक्षं किं प्रमाणम्? हाथ कंगन को आरसी क्या? नर्मदा अंचल की नदियों में जल की मात्रा तथा पूरे वर्ष भर जमा रखने और उसका धीरे-धीरे वितरण तय करने के साथ-साथ उसे उच्च गुणवत्ता का शुद्ध जल बनाए रखने में यहाँ के वन महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। नर्मदा और इसकी सहायक नदियों के इर्द-गिर्द पाये जाने वाले विभिन्न प्रकार के वनों की जल उत्पादन और उसके शुद्धिकरण की क्षमता काफी अधिक है।

    इस नजरिए से नर्मदा अंचल के वनों में पाई जाने वाली प्रमुख वृक्ष प्रजातियों की वाष्पोत्सर्जन दरों तथा मुख्य वन प्रकार की वाष्पोत्स्वेदन क्षमता की जानकारी एकत्रित करने के लिये वैज्ञानिक शोध बहुत आवश्यक है। इसी प्रकार मिट्टी के कटाव और जलाशयों में अवसादन रोकने में विभिन्न प्रकार के वनों की भूमिका पर नर्मदा घाटी के स्थानीय सन्दर्भों में वैज्ञानिक जानकारी संकलित करना जरूरी है। किस प्रकार के वनों के होने से बाँधों में गाद की मात्रा में कितनी कमी सम्भव है? कौन सी प्रजातियाँ वन भूजल के पुनर्भरण में अधिक सहायक होते हैं? इस तरह के विविध विषयों पर अनुसन्धान की आवश्यकता है ताकि उचित कदम समय रहते उठाए जा सकें और हमारे बाँध लम्बे समय तक कारगर बने रहें दीर्घायु हो सकें।

    इस अध्याय में हमने अपनी चर्चा को प्रमुखतः जंगल और पानी से जुड़े वैज्ञानिक अनुसन्धानों पर केन्द्रित रखा है, लेकिन इसके अन्य विविध आयाम तथा सामाजिक-आर्थिक सरोकार भी हैं जो पूरी व्यवस्था को प्रभावित करते हैं और उन्हें समझे बिना बात पूरी नहीं हो सकती। इस पुस्तक के चंद पन्नों में हम इस बहु-आयामी विषय की पूरी थाह लेने का दावा तो नहीं कर सकते, हाँ यह प्रयास अवश्य है कि इस बारे में हमारी समझ बढ़ने और जागने तक कैसे भी जंगल बने रहें ताकि नर्मदा बहती रहे।

    माँ नर्मद के प्राण तो बसते हैं जंगलों में…


    हम नर्मदा नदी को बड़े अपनेपन से माँ कहते हैं और उसी रूप में पूजते हैं। परन्तु हमें यह हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि नर्मदा में जल गंगा-यमुना जैसी नदियों की भाँति हिमालय के बर्फीले हिमनदों के पिघलने से नहीं आता। नर्मदा घाटी में होने वाली मानसूनी वर्षा का पानी विंध्याचल और सतपुड़ा की पर्वतमालाओं में फैले वन किसी विशालकाय स्पंज की तरह सोख लेते हैं। पहाड़ों द्वारा सोखा गया बारिश का यही पानी घने वनक्षेत्रों से धीरे-धीरे रिस-रिसकर वर्ष भर नदियों में आता रहता है और सतत जल आपूर्ति बनाए रखने में बड़ी मदद करता है। इस अर्थ में नर्मदांचल के वन नर्मदा व इसकी सहायक नदियों के लिये हृदय और धमनियों की तरह काम आते हैं। इसी महत्त्वपूर्ण तथ्य को रेखांकित करता हुआ गीत।

    पर्वत नहीं बर्फीले, मैकल के अंचलों में;
    माँ नर्मदा के प्राण, तो बसते हैं जंगलों में।
    ये विन्ध्य सतपुड़ा के वन, शिव की जटाएँ हैं;
    हरियाली और जल की, अनमोल छटाएँ हैं।
    नदियों का वेग थाम के, पानी सहेजते हैं;
    भूगर्भ के भण्डार में वन, जल को भेजते हैं।
    छन्नों की तरह, नदियों से रोकते हैं मल को;
    खेतों का जहर पीकर, करते हैं साफ जल को।
    धाराएँ करते निर्मल, दो-चार ही पलों में;
    माँ नर्मदा के प्राण, तो बसते हैं जंगलों में।

    मैकलसुता के मायके में, साल की बहारें;
    बाकी जगह हैं फैलीं, सागौन की कतारें।
    मिश्रित वनों की, अपनी रंगीनियाँ न्यारी हैं;
    मन मोह लेने वाली, छवियाँ बड़ी प्यारी हैं।
    धानी कहीं है घास, कहीं फूल लाल-पीले;
    कहीं ऊँचे वृक्ष पसरे, सब दृश्य हैं रंगीले।
    कहीं डिग न जाय धारा, दुनिया की हलचलों में;
    माँ नर्मदा के प्राण तो बसते हैं जंगलों में।

    रहती हैं सदानीरा, नदियाँ हरे वनों से;
    सरिताओं में जल बहता है, वनों के भरोसे।
    वन तो हैं असलियत में, पानी के कारखाने;
    ये बात पूरी सच है, कोई माने या न माने।
    जंगल जहाँ घना है, पानी वहाँ बना है;
    प्रत्यक्ष दीखता है, फिर किससे पूछना है।
    बर्बाद वक्त क्यों करें, बेकार अटकलों में;
    माँ नर्मदा के प्राण, तो बसते हैं जंगलों में।

    इन जंगलों के कारण, रहती यहाँ नमी है;
    शहरों को मिलता पानी, खेतों की तर जमीं है।
    वन मिट गए तो, नर्मदा में जल नहीं बहेगा;
    वन के बिना प्रवाह ये, अविरल नहीं रहेगा।
    सूखा अधिक पड़ेगा, धरती रहेगी प्यासी;
    बाधित विकास होगा, धरती रहेगी प्यासी;
    बाधित विकास होगा, छा जाएगी उदासी।
    नदियों में जल न होगा, तो आएगा क्या नलों में;
    माँ नर्मदा के प्राण, तो बसते हैं जंगलों में।
    पर्वत नहीं बर्फीले, मैकल के अंचलों में;
    माँ नर्मदा के प्राण, तो बसते हैं जंगलों में।


    प्रवाह की पवित्रता में ही नर्मदा की सार्थकता


    नर्मदा को बाँधना ही नहीं उसकी पवित्रता और उसके प्रवाह को बचाए रखना भी जरूरी है। प्रवाह शिथिल हो गया तो बन्धन अर्थहीन हो जाएँगे। अनादिकाल से यह बहती रही और मध्य प्रदेश के एक बड़े भू-भाग की प्राणवाहिनी बनी रही। इसके तट पर धर्म, अर्थ, काल और मोक्ष के सभी पुरुषार्थ उपलब्ध हुए हैं। केवल अर्थ के लिये इसका जल धर्म नष्ट नहीं होना चाहिए। जलधर्म नष्ट नहीं हो इसके लिये जरूरी है कि कछार का मूल स्वरूप नष्ट नहीं हो। -महेश श्रीवास्तव, प्रणाम मध्य प्रदेश

    जंगल और नदी की जुगलबन्दी


    कभी नर्मदा तट पर दंडकारण्य जैसे घने जंगलों की भरमार थी। इन्हीं जंगलों के कारण वैदिक आर्य तो नर्मदा तक पहुँचे ही नहीं। कहाँ गए वे अरण्य? अगर बचे-खुचे वन भी कट गए तो नदियाँ बहना बन्द कर देंगी। धरती श्री हीन हो जाएगी। जंगल और नदी की जुगलबंदी के कारण ही नदियों में बारहों माह पानी रहता है। अगर यह जुगलबंदी टूट गई तो नदियों में कंकड़-पत्थर के सिवा और कुछ न रहेगा। क्या हम ऐसी नदियाँ चाहते हैं? -अमृतलाल वेगड़

    नदी हमेशा नई रहती है, बहा पानी लौटकर नहीं आता, जंगल नदी के पालक पिता और उसकी आत्मा होते हैं जो हर क्षण नदी को जन्म देते रहते हैं। आत्मा ही कमजोर हो गई तो आत्मजा कैसे सशक्त रहेगी? बिजली कैसे बनेगी और सिंचाई कैसे होगी? नर्मदा घाटी विकास योजनाओं की सफलता और जीवन के लिये नर्मदा का स्वस्थ जीवन और नर्मदा के स्वस्थ जीवन के लिये जंगलों का मस्त जीवन जरूरी है।-महेश श्रीवास्तव, प्रणाम मध्य प्रदेश

    हम वन-विनाश के कगार पर खड़े हैं।… नर्मदा मेकलसुता है तो वनसुता भी है। वन ही वर्षा के पानी को रोककर रखता है (हर पेड़ एक छोटा-मोटा चेकडैम है) ताकि पानी जमीन के अन्दर जाये और गाढ़े समय में भूजल के रूप में हमारी सहायता करे। अगर वन नहीं रहेंगे तो नर्मदा भूखी-प्यासी रह जाएगी और एक दिन दम तोड़ देगी। -अमृतलाल वेगड़

    नर्मदा और उसकी सहायक नदियों में जलागमन पहाड़ों के भीतर संचित वर्षाजल के माध्यम से ही होता है और पहाड़ों में पर्याप्त जल संचय में वनों की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका है। अतः हम कह सकते हैं कि जीवनदायिनी नर्मदा और उसकी सहायक नदियों के जीवनदाता ये वन ही हैं। वन कम होंगे तो पहाड़ों में जल संग्रह कम होगा। परिणाम नर्मदा की कई सहायक नदियों को देखकर समझा जा सकता है जो मानसून के तीन चार महीनों बाद ही सूख जाती हैं। वन समाप्त हुए तो नर्मदा भी सदानीरा कैसे रह सकेगी। वनस्पति आवरण को सुरक्षित रखना और विकसित करना एक महत्त्वपूर्ण उपाय है। जीवनदायिनी के जीवनदाता को स्वस्थ जीवन देना बेहद जरूरी है। -महेश श्रीवास्तव, वरदा नर्मदा

    वन के वंदनवार से बूँदों की मनुहार


    घने जंगल में पानी की बूँदें पहले वृक्षों की पत्तियों तथा तनों, डालियों, झाड़ियों आदि से टकराती हैं। इस टकराहट से इन बूँदों का आकार और गति कम होती है। जमीन पर इन बूँदों को सीधे पहुँचने के पहले अनेक ‘बेरीकेट्स’ का सामना करना पड़ता है। वृक्ष की पत्तियों से मुलाकात करती हुई जब ये बूँदें नीचे धरती पर पहुँचती हैं, तो घास के तिनके इनके स्वागत में हाथ में वंदनवार लिये खड़े होते हैं। यानी यहाँ भी एकदम सीधे मिट्टी से इनका सम्पर्क नहीं हो पाता है। ...बरसात की ये बूँदें अहिस्ता-अहिस्ता जमीन में समाती जाती हैं। यदि जंगल घना है जो बरसात कितनी ही तेज क्यों न हो बूँदें तो अपनी गति इन अवरोधों के बहाने कम करती हुई मिट्टी के कणों के सामने बड़ी अदब से पेश आती हैं। जब मिट्टी से इन बूँदों का सम्पर्क होता है तो जमीन की ऊपरी सतह पर मौजूद घास, बेलें और झाड़ियों की जड़ें इन्हें बहने से रोकते हुए जमीन के भीतर जाने की मनुहार करती हैं। बूँदें ये मनुहार स्वीकार करती हुई बड़े पेड़ों की जड़ों के आस-पास से होती हुई, जमीन के भीतर… और भीतर समाती जाती हैं। नीचे गई बूँदें काफी समय बाद तक तलहटी के खेतों में नमी बनाए रखती हैं। यही बूँदें आस-पास के कुओं में जाकर वहाँ के जलस्तर को ऊपर उठा देती हैं। -क्रांति चतुर्वेदी, बूँदों की मनुहार

    यदि वृक्ष नहीं बचे, जंगल नहीं बचा तो नर्मदा कहाँ से बचेगी और नर्मदा ही नहीं बची या तन्वंगी होकर रह गई तो परियोजनाएँ कैसे चलेंगी। नर्मदा घाटी योजनाओं की पूर्णता तभी धरती को हिरण्यमयी बना सकेंगी जब सारी घाटी हरीतिमा से ढँकी होगी। -महेश श्रीवास्तव, प्रणाम मध्य प्रदेश

    वनों की प्रबन्धन योजनाओं में जल संरक्षण पर ध्यान दिया जाय


    जल उत्पादकता बढ़ाने वाला एक महत्त्वपूर्ण कारक है और नदी नालों में जल के प्रवाह की निरन्तरता बनाए रखकर सिंचाई, पेयजल और उद्योग के लिये जल उपलब्ध कराने में वन महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अतः वनों और चारागाहों के प्रबन्धन में जल संरक्षण एक प्रमुख उद्देश्य होना चाहिए। जल संरक्षण वनों की प्रबन्धन योजनाओं/कार्य आयोजनाओं का प्रमुख अंग होना चाहिए और इसके लिये पर्याप्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराए जाने चाहिए। -राष्ट्रीय वन आयोग (2006)

    बेशक वरदा, प्राणदा है नर्मदा। किन्तु प्राणियों को प्राण और जीवन को गान देने वाली नदी का प्रवाह घटा और दोहन बढ़ा है, जंगल कटे और प्राणी बढ़े हैं। विभूषित नदी दूषित हो रही है। प्राणदा के प्राणों पर बन आई है। हमें यह जानना होगा कि नर्मदा है तो हम हैं और वन हैं तो नर्मदा है। नर्मदा है तो अन्न है, धन है, प्रकाश है, जीवन है। -महेश श्रीवास्तव, वरदा नर्मदा

    नर्मदा ‘न मृता तेन नर्मदा’ के विशेषण से विभूषित रहे इसके उपाय हमें करना और इसी क्षण से प्राणप्रण से करना है। हमारे होने के लिये नर्मदा का अपने वैभव में होना जरूरी है। -महेश श्रीवास्तव, वरदा नर्मदा

     

    पारिस्थितिक सेवाओं के लिये भुगतान


    जलूद से उद्वहन करके वांचू प्वाइन्ट होते हुए इन्दौर महानगर को प्रदाय किये जा रहे के पेयजल के प्राकृतिक शुद्धिकरण में बड़वाह और इन्दौर वनमण्डल के वन प्राकृतिक रूप से काफी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। चोरल घाट के जंगलों और विंध्य पहाड़ियों के दक्षिणी ढलानों में मौजूद वन इन्दौर की पेयजल व्यवस्था के प्राकृतिक शुद्धिकरण के नजरिए से महत्त्वपूर्ण हैं। अतः इन वनों को बचाने में इन्दौर उद्योग जगत को जोड़ने के प्रयास वन विभाग द्वारा किये गए। इसके अन्तर्गत वर्ष 2015 में बड़वाह वनमण्डल के 2 गाँवों में वन समितियों को वन सुरक्षा के एवज में इन्दौर के उद्योग जगत से जुड़ी 2 कम्पनियों साइन्टेक इको फाउंडेशन द्वारा रु. 227040 तथा आर्टिसन एग्रोटेक प्रा.लि. द्वारा रु. 211700 के अग्रिम चेक देकर वन समितियों के ग्रामीणों को पारिस्थितिक सेवाओं के लिये भुगतान (Payment for Ecosystem Service-PES) करने की व्यवस्था प्रायोगिक तौर पर पहली बार लागू की गई है। इस तरह के प्रयोग बड़े पैमाने पर और संस्थागत तौर पर ‘कारपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी’ के अन्तर्गत करने की आवश्यकता है।

     

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    नर्मदा अंचल के वन एवं वन्य जैवविविधताRuralWaterMon, 03/19/2018 - 18:01

    Source
    नर्मदा के प्राण हैं वन, नर्मदा संरक्षण पहल - 2017

    नर्मदा नदीनर्मदा नदीनर्मदा अंचल के वनों और नदियों के प्रवाह के बीच नाजुक रिश्ते के बारे में जानकारी दे चुकने के बाद नर्मदा अंचल के वनों और वन्य जैव विविधता के बारे में संक्षिप्त जानकारी देना प्रासंगिक होगा। यहाँ कैसे जंगल हैं और उनमें वन्य जैवविविधता कैसी है इसी विषय पर संक्षिप्त जानकारी आगे दी गई है। प्राचीन भारतीय साहित्य में नर्मदा को बड़ा महत्त्व दिया गया है। कूर्म पुराण, मत्स्य पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण, वामन पुराण, नारद पुराण तथा भागवत पुराण आदि में नर्मदा के बारे में विवरण के साथ ही इसके अंचल में पाये जाने वाले वनों की शोभा भी बखानी गई है।

    प्रसिद्ध स्कंद पुराण के पूरी तरह नर्मदा को ही समर्पित रेवा खण्ड में नर्मदा की उत्पत्ति, अमरकंटक के वनों, ओंकार पर्वत शूलभेद आदि क्षेत्रों के बारे में जानकारी के साथ-साथ पृथ्वी पर पड़े प्रलयकारी सूखे और अकाल के युगों में भी नर्मदा के अक्षय रहने का विवरण मिलता है। नर्मदा पुराण में भी नर्मदा अंचल के वनों की शोभा बताई गई है। इसी तरह कई अन्य प्राचीन धर्म ग्रंथों व अन्य साहित्य में उपलब्ध रोचक विवरणों से नर्मदा अंचल के वनों की प्राचीन दशा पर भी प्रकाश पड़ता है।

    स्कंद पुराण के रेवा खण्ड में तथा नर्मदा पुराण के द्वितीय अध्याय में विवरण है कि पाण्डव द्रौपदी के साथ उत्तम काम्यक वन में ब्राम्हणों सहित निवास करते हुए विंध्याचल पर्वत की ओर गए जो कि चम्पा, कनेर, नागकेशर, पुन्ना-सुल्ताना, चम्पा, मौरसरी, बकुल, दाड़िम (अनार), कचनार, पुष्पित धवल-कहू, बिल्व, केतकी, कदम्ब, आम्र, मधूक, नीम, नींबू, जम्वीर, तेन्दू, नारियल, कपित्थ (कैथा), खजूर पनस (कटहल) आदि नाना प्रकार के वृक्षों एवं गुल्म लताओं से युक्त पुष्पित फल से परिपूरित कुबेर के चैत्ररथ के समान था।

    इसी आख्यान में ऋषि आश्रम की जैवविविधता का वर्णन करते हुए उल्लेख है कि वह अनेक सुन्दर जलाशयों से पूर्ण था, कुमुदनी से मंडित और नील, पीत, श्वेत, लाल कमलों से आच्छादित एवं हंस के कारण्डव, चकवा, चकवी, आड़ि, काक, बगुलों की पंक्ति एवं कोकिल आदि से सुशोभित था। सिंह, बाघ, शूकर, हाथी, विशालकाय वन भैंसे, सुरभि, सारंग, भालू आदि जानवरों से युक्त था। कोक, मयूर और नाना प्रकार के पशुओं से सुशोभित हो रहा था।

    इस तरह की बाधाओं से मुक्त और अतीव उत्कृष्ट सत्व गुण के कारण परम सुन्दर प्रतीत होता था। भूख-प्यास जैसी बाधाएँ वहाँ नहीं सताया करती थीं। वह वन परम सुन्दर एवं सभी तरह की व्याधियों से रहित था। उस आश्रम के वन में स्वाभाविक बैर भी नाम मात्र को नहीं था और कुरंग (हिरन) के बच्चे बड़े ही स्नेह से सिंहनी के स्तन को पीया करते थे, मार्जार (बिल्ली) और मूषक दोनों परस्पर में उन्मुख होकर अवलेहन किया करते थे। सिंहनी के पुत्रों से वह स्नेह करते और मयूर एवं सर्प भी एक दूसरे के साथ बड़े ही स्नेह से रहते। उस परमोत्तम एवं अतीव सुन्दर विपिन को देखकर पाण्डु के पुत्रों ने उसमें प्रवेश किया था।

    मत्स्य पुराण में विवरण आता है कि कलिंग देश से पिछले पश्चिमी अर्ध भाग में अमरकण्टक पर्वत में प्रकटी नर्मदा तीनों लोकों में अतीव मनोरम और रमणीय है। इसी पुराण में अन्यत्र कहा गया है कि नर्मदा के तट पर कपिला नामक महानदी है जो अर्जुन के वृक्षों से ढँकी हुई है तथा खदिर वृक्षों से सुशोभित है। यह कपिला नदी माधवी अमरबेल और अन्य लताओं से भी सुशोभित गरजने वाले सिंह, व्याघ्र आदि हिंसक तथा शृंगाल वानर आदि जीवों से और सुन्दर पक्षिओं से नित्य ही शब्दायमान रहती है। इस प्रकार पुराणों और अन्य प्राचीन ग्रंथों में नर्मदा के विषय में उपलब्ध विवरण से इस अंचल के वनों की रमणीयता और विविधता का पता चलता है।

    नर्मदा अंचल में वनों की किस्में तथा उनका विस्तार


    नर्मदा जलागम में आने वाले जिलों में असंख्य वनस्पतियों तथा प्राणियों की विविधता से युक्त मनोहारी छटा वाले वन हैं। नर्मदा बेसिन के कुल भू-भाग में 32,483.29 वर्ग किमी क्षेत्र में वन है जो पूरे बेसिन के कुल क्षेत्रफल का 32.88 प्रतिशत भाग है। इन वनों को कई प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है। एक प्रकार का वर्गीकरण तो वैधानिक आधार पर है जबकि दूसरी विधि में वनों में पाई जाने वाली मुख्य प्रजातियों के आधार पर वनों का वर्गीकरण किया जाता है।

    वैधानिक वर्गीकरण की दृष्टि से वनों के दो प्रमुख वर्ग हैं- आरक्षित वन तथा संरक्षित वन। भारतीय वन अधिनियम 1927 के अन्तर्गत आरक्षित घोषित किये गए वनों में अपेक्षाकृत कठोर कानून लागू होते हैं और इनमें बिना अनुमति प्रवेश, वृक्ष कटाई, आग लगाना, पशु चराई, पत्थरों की खुदाई या खेती के लिये जंगलों की सफाई जैसी गतिविधियाँ प्रतिबन्धित रहती हैं। संरक्षित वनों में भी शासन का नियंत्रण रहता है पर इनसे सम्बन्धित कानून थोड़े लचीले हैं। इन दोनों श्रेणियों के बाहर भी कुछ अवर्गीकृत वन भी हैं।

    वनों के वर्गीकरण की दूसरी विधि में मुख्य प्रजातियों के आधार पर नर्मदा जलागम के वनों को तीन प्रमुख वर्गों में बाँटा जा सकता है- साल वन, सागौन वन तथा मिश्रित वन। जिन वनों में साल प्रजाति के वृक्षों की अधिकता होती है उन्हें साल वनों की श्रेणी में, जिन वनों में सागौन प्रजाति के वृक्षों की अधिकता होती है उन्हें सागौन वनों की श्रेणी में तथा ऐसे वन जिनमें विविध वृक्ष प्रजातियों व अन्य वनस्पतियों का मिश्रण रहता है उन्हें मिश्रित वन की श्रेणी में रखा जाता है।

    नर्मदा अंचल में साल वन अमरकंटक, डिंडोरी तथा मण्डला के अतिरिक्त पचमढ़ी में भी पाये जाते हैं और एक मोटे अनुमान के अनुसार पूरे नर्मदा जलागम क्षेत्र में आने वाले वनों का लगभग 10 प्रतिशत साल वनों का है। सागौन वन यहाँ का एक प्रमुख वन प्रकार है और एक मोटे अनुमान के अनुसार नर्मदा जलागम में आने वाले कुल वनक्षेत्र का लगभग 35-40 प्रतिशत भाग इसी वर्ग का है। प्रमुख वृक्ष प्रजातियों की अधिकता के आधार पर नर्मदा के तीसरे प्रकार के वनों-मिश्रित वनों को भी सलई वन, खैर-सिस्सू वन, अंजन वन जैसे उप-प्रकारों में बाँटा जाता है। नर्मदा जलागम में आने वाले कुल वनक्षेत्र का लगभग आधा भाग विभिन्न प्रकार के मिश्रित वनों से आच्छादित है। इन तीन प्रकार के वनों में मिलने वाली वनस्पतियों का विवरण तथा नर्मदा अंचल में भौगोलिक वितरण आगे बताया गया है।

    साल वन (Sal Forest)


    नर्मदा अंचल में पाये जाने वाले तीन मुख्य वन प्रकारों में से एक, सदा हरे रहने वाले साल वन हैं। नर्मदा अंचल में ये साल वन केवल मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ राज्य के कुछ भागों में मिलते हैं। किसी वन क्षेत्र में साल, जिसका वैज्ञानिक नाम शोरिया रोबस्टा (Shorea robusta) है, के वृक्षों का आयतन कुल वृक्षों के 20 प्रतिशत से अधिक होने पर उसे तकनीकी तौर पर साल वन कहा जाता है। साल वृक्ष की प्रमुखता वाले इन वनों में साल के वृक्ष आमतौर पर बीज से पैदा होकर सघन अवस्था में पाये जाते हैं जिसमें 60-90 प्रतिशत तक उच्च वितान (Top canopy) 26-40 मीटर ऊँचे साल के वृक्षों का होता है।

    गर्मी के प्रारम्भिक समय में 5-15 दिनों के लिये साल के पत्ते झड़ जाते हैं पर इस अवधि को छोड़कर साल वृक्ष सदाहरित ही रहता है जिसके कारण ये वन काफी आर्द्र व ठंडे रहते हैं। घने उच्च वितान के साल वनों में मध्य वितान (Middle canopy) तथा अधोवितान अन्य वनों की अपेक्षा कम विकसित होते हैं व झाड़ियाँ और गुल्म आंशिक रूप से सदाहरित होते हैं। साल वनों में बाँस आमतौर पर शुष्क भागों के खुले हिस्सों को छोड़कर अन्दरूनी भागों में नहीं मिलता है। मध्य प्रदेश के साल वनों की गुणवत्ता श्रेणी द्वितीय तथा तृतीय है और इनमें प्राकृतिक पुनरुत्पादन पर्याप्त है।

    नर्मदा अंचल में साल के वन प्रमुखतः दक्षिण-पूर्वी व मध्य भाग में तथा छत्तीसगढ़ के उत्तरी पश्चिमी भाग में नर्मदा के दक्षिणी ओर पाये जाते हैं। नर्मदा अंचल के कुल वन क्षेत्र का लगभग 10 प्रतिशत साल वन हैं। ये वन प्रमुखता से अनूपपुर (पुराने शहडोल जिले का भाग), मण्डला, डिंडोरी, होशंगाबाद, छिन्दवाड़ा, बालाघाट आदि जिलों में पाये जाते हैं।

    नर्मदा के उद्गम के निकट मैकल पर्वत श्रेणी साल के वन कुछ हिस्सों में पाये जात हैें। यहाँ के साल वन तृतीय से चतुर्थ-ब श्रेणी के हैं। बालाघाट जिले में साल वन कान्हा राष्ट्रीय उद्यान से लगी हुई बैहर तहसील के उत्तरी भागों तक सीमित हैं। नरसिंहपुर जिले में भी बहुत हल्के किस्म के साल वन खैरी क्षेत्र में मिलते हैं जिनमें साल कुल संनिधि का लगभग तीन चौथाई है।

    यहाँ साल वन पठारी भूमि पर, नालों से दूर, अच्छी तरह अपवाहित क्षेत्रों में मिलते हैं। इस क्षेत्र में साल के वृक्ष आमतौर पर चतुर्थ श्रेणी की गुणवत्ता के हैं जिनमें मध्यम गोलाई वाले साल वृक्ष कम हैं और अधिकांश विकृत हैं। ये वन लगभग मध्य वयस्क हैं। होशंगाबाद में साल वन नागद्वारी नदी के जलग्रहण क्षेत्र में पचमढ़ी के दक्षिण-पश्चिम में तथा कुछ अन्य स्थानों पर सीमित है जिनमें से अधिकांश भाग वर्तमान में सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान का हिस्सा है। यह प्रायद्वीप में साल की धुर पश्चिमी सीमा है। नर्मदा अंचल में उपरोक्त क्षेत्रों को छोड़कर मध्य प्रदेश में साल के वन अन्यत्र नहीं पाये जाते हैं।

    सागौन वन (Teak Forests)


    सागौन वृक्ष जिसका वैज्ञानिक नाम टेक्टोना ग्रैन्डिस (Tectona grandis) है, नर्मदा अंचल के वनों की एक प्रमुख प्रजाति है। यह डिप्टेरोकारपेसी वानस्पतिक कुल (Family Dipterocarpaceae) का सदस्य है। सागौन के लिये मध्य प्रदेश की मिट्टी, पानी और जलवायु बहुत उपयुक्त है जिसके कारण इस प्रजाति का मध्य प्रदेश में व्यापक प्राकृतिक फैलाव है।

    सागौन लगभग 80-100 वर्षों में परिपक्व होने वाला वृक्ष है। इसके विशालकाय रोएँदार पत्तों, ऊँचे-मोटे तनों और विशिष्ट प्रकार के छत्र के कारण इसे दूर से ही आसानी से पहचाना जा सकता है। इसकी लकड़ी भवन निर्माण और फर्नीचर आदि बनाने में बहुत अच्छी मानी जाती है और काफी ऊँची कीमत पर बिकती है। इस वृक्ष प्रजाति की अधिकता को देखते हुए कुछ लोग मध्य प्रदेश को सागौन प्रदेश या ‘टीक स्टेट’ (Teak State) भी कहते हैं। वैसे तो सागौन के वृक्ष नर्मदा अंचल के काफी हिस्सों में फैले हैं परन्तु जहाँ-जहाँ वनों में इस प्रजाति के वृक्षों का आयतन 20 प्रतिशत से अधिक होता है उन्हें तकनीकी तौर पर ‘सागौन वन’ कहा जाता है।

    इस प्रकार के वनों में प्रमुख प्रजाति सागौन ही होती है जो कि बहुत अच्छी विकसित अवस्था में पाई जाती है। इन वनों में पर्णपाती प्रजातियों की प्रमुखता है। सागौन वनों में जहाँ हल्दू वृक्ष की अधिकता वाले खण्ड पाये जाते हैं वे अपेक्षाकृत शुष्क दशाओं के संकेत देते हैं। साजा, बीजा, लेण्डिया, धावड़ा, तेन्दू तथा शीशम इस प्रकार के वनों में अक्सर मिलते हैं। बाँस इनमें हमेशा नहीं मिलता परन्तु जहाँ मिलता है वहाँ अधिकांशतः देशी बाँस है, यद्यपि पश्चिमी भाग के कुछ क्षेत्रों में कटंग बाँस भी मिलता है। नर्मदा जलग्रहण क्षेत्र में मौजूद कुल वनों का लगभग 35-40 प्रतिशत सागौन वनों से आच्छादित है।

    मिश्रित वन (Mixed Forest)


    जैसा कि नाम से स्वतः स्पष्ट है साल या सागौन की प्रमुखता वाले दो वन प्रकारों से भिन्न मिश्रित वनों में विविध वनस्पति प्रजातियों का मिश्रण रहता है तथा कुछ अपवादों को छोड़कर साल या सागौन वनों की भाँति कोई एक वृक्ष प्रजाति अन्य प्रजातियों पर हावी नहीं होती। मिश्रित वन पर्यावरण की दृष्टि से अधिक उपयोगी और जैवविविधता से भरपूर होते हैं। इनके अतिरिक्त मिट्टी की विशेषता जिसे मृदीय चरमावस्था कहते हैं, के कारण छोटे-छोटे खण्डों में अंजन, सलई, पलाश, खैर, सिस्सू, करधई, बाँस इत्यादि की अधिकता वाले वन क्षेत्र आंचलिक रूप से भी पाये जाते हैं। नर्मदा अंचल में पाये जाने वाले वन प्रकारों में से सागौन और साल वनों की श्रेणी से इतर सभी प्रकार के वनों को मिश्रित वनों की श्रेणी में रखा जा सकता है।

    अच्छे मिश्रित वनों में इतनी विविधता और तरह-तरह की इतनी प्रजातियों का मिश्रण होता है कि किसी प्रजाति विशेष या स्थान विशेष को लेकर इनके बारे में सारी बात एक साथ कहना बड़ा कठिन है। प्रजातिगत विशेषताओं के कारण अलग-अलग स्थानों में मिश्रित वन अलग-अलग प्रकार के विविधतापूर्ण वनस्पति मिश्रण प्रस्तुत करते हैं।

    प्रकृति में विविध छटाएँ बिखेरते हुए मिश्रित वन न केवल देखने में हर प्रकार से सुन्दरता प्रस्तुत करते हैं बल्कि एक जटिल पारिस्थितिक तंत्र का निर्माण भी करते हैं जिसमें एक-दूसरे पर निर्भर अनेक प्रजातियों के जीव-जन्तुओं, पेड़-पौधों और सूक्ष्म जीवों का सम्मिश्रण होता है तथा परस्पर पूरक खाद्य शृंखलाएँ होती हैं। नर्मदा अंचल के जिलों में आने वाले मिश्रित वनों का विस्तृत विवरण उन जिलों के जिला गजेटियर और सम्बन्धित वन मण्डलों की कार्य आयोजनाओं में देखा जा सकता है। हम इस विषय पर यहाँ बहुत विस्तार में जाने के बजाय केवल इतना ही विवरण देना चाहेंगे जिससे इनके बारे में पाठक को मोटा-मोटा आभास हो जाये।

    बनावट तथा घनत्व की दृष्टि से मिश्रित वन बड़े बेतरतीब हैं और जहाँ मिट्टी की गहराई थोड़ी अधिक है वहाँ वृक्षों की बहुत अच्छी बढ़त देखने में आती है। आमतौर पर ये वन चतुर्थ (ब) स्थल गुणवत्ता के हैं परन्तु नालों के आस-पास और सघन घाटियों में जहाँ अच्छी मिट्टी भी मिल जाती है, कुछ बेहतर किस्म के मिश्रित वन भी मिलते हैं जिन्हें चतुर्थ (अ) श्रेणी में रखा जा सकता है। मिश्रित वनों में साज, सलई तथा खैर इत्यादि के वृक्ष काफी संख्या में पाये जाते हैं। पश्चिमी निमाड़ के खरगौन तथा बड़वानी जिलों में जहाँ वनों का घनत्व काफी कम हो गया है इधर-उधर बिखरे हुए वृक्षों वाले मिश्रित वन मिलते हैं। उथली मिट्टी वाले अत्यधिक सूखे क्षेत्रों में भी इनका अच्छा विकास देखने में आता है।

    निमाड़ में खरगौन, भीकनगाँव, पीपलझोपा, बिस्टान, चिरिया, तितरान्या आदि इलाकों में मिश्रित वनों के क्षेत्र वन अतिक्रमण की समस्या के कारण काफी बुरी दशा में हैं। इसी प्रकार की दशा बड़वानी जिले में पाटी बोकराटा, निवाली, धनोरा व पानसेमल में तथा धार जिले के कुक्षी, डही क्षेत्रों में तथा अलीराजपुर जिले के सोण्डवा, ककराना, मथवाड़, शकरजा आदि क्षेत्रों में भी है।

    इस प्रकार के मिश्रित वनों में सागौन नहीं होता या कम होता है तथा झिंगन, रोहन, कुल्लू, गलगल तथा पांगरा का अनुपात अपेक्षाकृत अधिक होता है। यहाँ अधोवन में खैर जैसी कंटीली प्रजातियों का प्रतिशत अधिक है। घटिया किस्म के बाँस केवल कुछ अप्रवेश्य तंग बेहड़ों में ही होते हैं, जहाँ वे फैल गए हैं। प्रतिवर्ष आग लगने से प्राकृतिक पुनरुत्पादन बहुत कम होता है। पिछले कुछ दशकों में मिट्टी का बहुत अधिक क्षरण होने से इन वनों में पुनरुत्पादन की सम्भावनाएँ भी कम हो रही हैं।

    नर्मदा अंचल के वनों की जैवविविधता


    नर्मदा अंचल जैवविविधता की दृष्टि से करोड़ों वर्षों से अत्यन्त समृद्ध रहा है। उस समय की सुखद पुरा जलवायु के कारण यहाँ रहने वाले नाना प्रकार के जीवाश्म मिले हैं जिनसे यहाँ की प्राचीन जैवविविधता की पुष्टि होती है। नर्मदा अंचल के आज के वन भी न केवल जैवविविधता की दृष्टि से समृद्ध हैं बल्कि कुछ मायनों में अद्वितीय भी हैं। यह क्षेत्र भारत में साल के वनों की दक्षिणी सीमा बनाता है। और यहाँ साल व सागौन के वन यहाँ एक साथ मिलते हैं अतः दोनों प्रकार के वनों की जैवविविधता यहाँ मिलती है। इसी प्रकार मिश्रित वनों में भी तरह-तरह की वनस्पतियाँ और जीव-जन्तु पाये जाते हैं।

    इस अंचल में विशेषकर सतपुड़ा पर्वत श्रेणी के वनों में वन्य जैवविविधता की भरमार है। यह पूरा क्षेत्र प्राकृतिक सौन्दर्य, वनस्पतियों, वन्य प्राणियों और खनिजों की अपार सम्पदा से भरा पड़ा है। जैविक विविधता से परिपूर्ण सतपुड़ा तथा विंध्य पर्वत शृंखलाओं के पहाड़ नर्मदा घाटी को न केवल प्राकृतिक ऐश्वर्य बल्कि समृद्धि और पर्यावरणीय सुरक्षा भी प्रदान करते हैं। वन्य जन्तुओं की दृष्टि से भी यह पूरा अंचल काफी समृद्ध है।

    नर्मदा के रहस्यमय अतीत की पुरा जैवविविधता


    नर्मदा धरती की प्राचीनतम नदियों में से एक है। इसका अतीत बड़ा रहस्यमय है। यहाँ जीवन के क्रमिक विकास की पटकथा करोड़ों वर्षों की अवधि में लिखे जाने के दौरान जैवविविधता के अनेक रूप समय-समय पर प्रगट और विलुप्त हुए। नर्मदा घाटी में करोड़ों वर्ष पुरानी वनस्पतियों और जन्तुओं के जीवाश्म बड़ी संख्या में मिले हैं जिनसे यहाँ की पुरा जलवायु और तत्कालीन जैवविविधता का पता चलता है।

    लगभग 6 करोड़ वर्ष पूर्व इस क्षेत्र में अनेक भूकम्पों तथा भूगर्भीय उथल-पुथल के कारण पृथ्वी की सतह पर पिघले हुए गर्म लावा की सपाट परतें बिछ गईं और झील तथा जलाशयों के बीच की वनस्पतियों को खनिज पदार्थों से युक्त भूचालिक राख ने ढँक लिया। लाखों वर्षों में इन जन्तुओं तथा वनस्पतियों का पाषाणीकरण हो गया तथा लावा की परतों के बीच दब गए वृक्षों के तने फल-फूल, बीज, लताएँ व पत्तियाँ सबके सब ज्यों-के-त्यों कठोर होकर जीवाश्मों में परिवर्तित हो गए।

    तत्कालीन वनों में पाई जाने वाली वनस्पतियों के जीवाश्मों की बहुतायत डिंडोरी जिले के शाहपुरा के निकट घुघुवा गाँव में पाई गई है जहाँ मध्य प्रदेश शासन द्वारा एक जीवाश्म राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना की गई है। इसी प्रकार घुघुवा में पाये गए पुष्पधारी पौधों के अनेक जीवाश्मों से कहीं अधिक पुराने अनावृतबीजी प्रजातियों के विशालकाय वृक्षों व अन्य वनस्पतियों के जीवाश्मों का जखीरा धार जिले में मनावर-जीराबाद के आस-पास के कई गाँवों में मिला है।

    नर्मदा घाटी में पाये गए जन्तु जीवाश्मों में हाथी, घोड़े, हिप्पोपोटेमस व जंगली भैंसे के जीवाश्म के साथ-साथ सीहोर जिले के हथनौरा गाँव में पाये गए प्राचीन मानव के कपाल के अवशेष भी हैं। हथनौरा में नर्मदा के तट पर खुदाई से प्राप्त हुए मानव के कपाल का नाम ‘नर्मदा-कपाल’ अर्थात ‘नर्मदा-स्कलकैप’ रखा गया है तथा इस प्राचीन मानव को ‘नर्मदा मानव’ का नाम दिया गया है जिसे वैज्ञानिक मानव पूर्वज होमो इरेक्टस नर्मदेन्सिस (Homo erectus narmadensis) कहते हैं। हथनौरा के पास ही में ग्राम धांसी में नर्मदा के उत्तरी तट से प्राचीनतम विलुप्त हाथी (स्टेगोडॉन) के दोनों दाँत तथा ऊपरी जबड़े के अंश का जीवाश्म भी मिला है।

    नरसिंहपुर नगर से 9 किमी दूर नर्मदा और शेर नदी के संगम के निकट भी प्राचीनतम पशुओं के अस्थि-जीवाश्म भारी संख्या में मिलने के साथ-साथ एक हाथी के मस्तक का जीवाश्म भी मिला है। जबलपुर के समीप नर्मदा की सहायिका गौर नदी के तट पर स्टेगोसॉरस नामक विशालकाय डायनोसोर के पीठ के एक काँटे का पाषाण में परिवर्तित खण्ड पाया गया है। जबलपुर में ही राजासॉरस नर्मदेन्सिस डायनोसोर के ऊपरी जबड़े का एक हिस्सा भी पाया गया था।

    कुछ वर्ष पहले धार जिले में कुक्षी के निकट डायनोसोर के 104 अंडों के जीवाश्म पाये गए हैं जिन्हें 40-90 फुट आकार के शाकभक्षी सॉरोपोड के अंडे माना जा रहा है। धार जिले में ही लगभग 8 करोड़ साल पुराने सॉरोपोड की दो बड़ी फीमर हड्डियाँ भी पाई गई हैं। नर्मदा घाटी की परतदार चट्टानों के समग्र संग्रह में पिछले 1.7 अरब वर्ष से लेकर कुछ हजार वर्ष पहले तक के जीवों के अवशेष मिलते हैं। यहाँ वनस्पतियों में समुद्री, स्वच्छ जलीय और थलीय वनस्पतियाँ, आवृतबीजी-अनावृतबीजी, पुष्पधारी-पुष्परहित पौधे, झाड़ी से लेकर गगनचुम्बी अनावृतबीजी, शंकुधारी वृक्षों के जीवाश्म मिलते हैं।

    नर्मदा अंचल में साल वन अमरकंटक, डिंडोरी तथा मण्डला के अतिरिक्त पचमढ़ी में भी पाये जाते हैं और एक मोटे अनुमान के अनुसार पूरे नर्मदा जलागम क्षेत्र में आने वाले वनों का लगभग 10 प्रतिशत साल वनों का है। सागौन वन यहाँ का एक प्रमुख वन प्रकार है और एक मोटे अनुमान के अनुसार नर्मदा जलागम में आने वाले कुल वनक्षेत्र का लगभग 35-40 प्रतिशत भाग इसी वर्ग का है। प्रमुख वृक्ष प्रजातियों की अधिकता के आधार पर नर्मदा के तीसरे प्रकार के वनों-मिश्रित वनों को भी सलई वन, खैर-सिस्सू वन, अंजन वन जैसे उप-प्रकारों में बाँटा जाता है।

    जन्तुओं में समुद्री सीपी-शंख, जमीनी कीड़े-मकोड़ों से लेकर अनेक वन्य प्राणियों सहित दैत्याकार डायनासोरों के अनेक जीवाश्म भी मिले हैं। जीवाश्मों की इन खोजों से इस बात की पुष्टि होती है कि इस क्षेत्र में करोड़ों वर्ष पूर्व इन वनों में विशाल सरीसृपों का राज था। उपरोक्त पौराणिक तथा प्रागैतिहासिक विवरण से इन वनों के विविध पहलुओं पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। धार जिले में विभिन्न प्रकार की शार्क मछलियों के 5000 से अधिक दन्त जीवाश्मों का मिलना भी इस इलाके के रहस्यमय और रोमांचक अतीत पर प्रकाश डालता है। ये सभी जीवाश्म यहाँ की पुरा जैवविविधता के प्रमाण हैं। नर्मदा घाटी के विविध जीवाश्मों पर अधिक जानकारी के लिये लेखक की अन्य दुर्लभ, संग्रहणीय पुस्तक ‘प्रकृति के रहस्य खोलते नर्मदा घाटी के जीवाश्म, (2011)’पढ़ी जा सकती है जिसमें नर्मदा घाटी में पाये गए आज की वनस्पतियों और प्राणियों के लाखों-करोड़ों वर्ष पुराने जीवाश्मों पर नामचीन वैज्ञानिकों द्वारा शोधपरक मौलिक लेख प्रस्तुत किये गए हैं।

    नर्मदा अंचल की वानस्पतिक विविधता


    नर्मदा अंचल के वन विविध प्रकार की वनस्पतियों से आच्छादित हैं। इनमें अनेक औषधीय प्रजातियाँ भी सम्मिलित हैं। विन्ध्य तथा सतपुड़ा पर्वत श्रेणी के वनों में अनेक प्रकार की औषधीय वनस्पतियाँ मिलती हैं। विश्व प्रकृति निधि द्वारा संवेदनशील पारिस्थितिक अंचलों के वर्गीकरण में नर्मदा घाटी शुष्क पर्णपाती वन (Narmada Valley Dry Deciduous Forest) को एक विशिष्ट पहचान देते हुए इको रीजन कोड क्रं. IM 0207 आवंटित किया गया है। यह क्षेत्र रोजर्स और पवार (1988) द्वारा दिये गए जैविक-भू वर्गीकरण (Bio geographic classification) के जैवीय अंचल (Biotic province) 6E- सेंट्रल हाईलैण्ड्स (6E-Central Highlands) से मिलता जुलता है।

    नर्मदा का उद्गम स्थल अमरकंटक तो अपनी प्रचुर और विशिष्ट वानस्पतिक जैवविविधता के लिये विख्यात है ही, नर्मदा बेसिन के मध्य में स्थित पचमढ़ी का पठार व छिंदवाड़ा जिले की पातालकोट घाटी भी समृद्ध वानस्पतिक विविधता के लिये जानी जाती है। अमरकंटक के वनों में अनेक प्रकार के औषधीय पौधों की भरमार है। यहाँ अन्य अनेक किस्म के वृक्षों, लताओं, कंद मूल, फल, फूल व नाना प्रकार के औषधीय पौधों के साथ-साथ परम्परागत भारतीय तथा चीनी उपचार पद्धति के अन्तर्गत नेत्र उपचार में अत्यन्त लाभदायक गुल-बकावली (Hedychiaum coronarium) का प्रसिद्ध पौधा भी मिलता है जिसके अर्क को आँखों के रोगों में, विशेषकर मोतियाबिन्द के इलाज में काफी प्रभावशाली बताया जाता है।

    पचमढ़ी और छिंदवाड़ा में देलाखारी के पास पाया जाने वाला साल वन यहाँ की उल्लेखनीय विशेषता है। इस क्षेत्र की एक अन्य विशेषता यह है कि यहाँ मध्य प्रदेश के प्रमुख वन प्रकारों में से दो, साल तथा सागौन दोनों का मिलन स्थल निर्मित होता है। साल की विशेष उल्लेखनीय उपस्थिति के साथ-साथ पचमढ़ी क्षेत्र से लगभग 1200 वनस्पति प्रजातियाँ दर्ज की गई हैं जिनमें से कुछ प्रजातियों की प्रकृति हिमालय पर्वत की वनस्पतियों जैसी है जबकि कुछ अन्य पश्चिमी घाट के वनों जैसी। पचमढ़ी की वनस्पति में कुछ ऐसे विशिष्ट पौधे भी हैं जिनके वानस्पतिक कुल में वही एक प्रजाति है।

    यहाँ पर कई दुर्लभ प्रकार के आर्किड्स, टेरीडोफाइट्स तथा औषधीय पौधे मिलते हैं। जीवित जीवाश्म कहे जाने वाले पौधे साइलोटम न्यूडम (Psilotum nudum) के प्राकृतिक अवस्था में मध्य प्रदेश में मिलने का एकमात्र स्थान यही है। ट्री फर्न साइथिया जाइजेन्टिआ (Cyathea gigantea) व अन्य कई दुर्लभ फर्न प्रजातियाँ भी यहाँ मिलती हैं। यहाँ दुलर्भ बाँस प्रजाति बेम्बूसा पॉलीमार्फा (Bambusa polymorpha) भी बोरी के वनों में पाई जाने वाली विशेषता है।

    छिंदवाड़ा जिले में स्थित पातालकोट घाटी जैवविविधता की दृष्टि से नर्मदा घाटी का दूसरा अति समृद्ध क्षेत्र है। पठार की ऊँचाई से 300-400 मीटर गहराई में बसी हुई पातालकोट घाटी से नर्मदा की सहायक दूधी नदी निकलती है। यहाँ भारिया आदिम जनजाति के लोग रहते हैं। यहाँ साल, सागौन और मिश्रित तीनों प्रकार के वन पाये जाते हैं जिनमें 83 वानस्पतिक कुलों की 265 से अधिक औषधीय प्रजातियाँ मिलती हैं। इनमें से कई प्रजातियों के औषधीय गुणों पर अभी शोध भी नहीं हुई है। इस प्रकार नर्मदा अंचल के वनों में ज्ञात से कहीं अधिक संख्या में अज्ञात जड़ी-बूटियाँ पाई जाती हैं।

    सतपुड़ा पर्वत श्रेणी की वन्य जैवविविधता सतपुड़ा पर्वत श्रेणी के वन न केवल जैवविविधता की दृष्टि से काफी समृद्ध हैं बल्कि कुछ मायनों में अद्वितीय भी हैं। उदाहरण के लिये भारत में साल (Shorea robusta) के सदाबहार वनों की दक्षिणी सीमा और सागौन (Tectona grandis) के वन यहाँ एक साथ मिलते हैं। ये वन हिमालय और पश्चिमी घाट के बीच में स्थित जैवविविधता से परिपूर्ण गलियारे जैसे हैं।

    यहाँ अचानकमार से पेंच तक तथा सतपुड़ा-बोरी से मेलघाट तक फैले बाघ के 2 बड़े रहवास क्षेत्रों का भाग पड़ता है जिनमें अनेक प्रकार के दुर्लभ वन्यप्राणी और वनस्पतियाँ आज भी पाये जाते हैं। इन वनों में पाये जाने वाले अनेक औषधीय पौधे आज भी गाँवों की परम्परागत चिकित्सा पद्धति का महत्त्वपूर्ण अंग हैं। इस प्रकार नर्मदा अंचल और विशेषकर इसका पूर्वी भाग अभी भी अपनी वानस्पतिक जैवविविधता की दृष्टि से काफी समृद्ध कहा जा सकता है।

    नर्मदा अंचल की वन्यप्राणी विविधता


    इस क्षेत्र में स्तनधारी वर्ग के वन्य प्राणियों की 76 प्रजातियाँ पाई जाती हैं जिनमें बाघ, गौर (भारतीय बॉयसन), जंगली कृष्णमृग आदि सम्मिलित हैं। यहाँ 276 प्रजातियों के पक्षी भी मिलते हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ सरीसृपों, कीटों व अन्य जलीय व स्थलीय प्राणियों की प्रचुर विविधता है। विश्व प्रकृति निधि ने इस पारिस्थितिक अंचल को संकटापन्न की श्रेणी में रखा है। सतपुड़ा पर्वत श्रेणी के पूर्वी और मध्य खण्ड के वनों में वन्य जैवविविधता की भरमार है। इस अंचल को बाघ संरक्षण की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण क्षेत्र माना गया है। यह पूरा क्षेत्र प्राकृतिक सौन्दर्य, वनस्पतियों, वन्य प्राणियों और खनिजों अपार सम्पदा से भरा पड़ा है। जैविक विविधता से परिपूर्ण विंध्याचल और सतपुड़ा पर्वत शृंखला के पहाड़ नर्मदा घाटी को न केवल प्राकृतिक ऐश्वर्य बल्कि समृद्धि और पर्यावरणीय सुरक्षा भी प्रदान करते हैं।

    वन्य जैवविविधता के संरक्षण के लिये स्थापित किये गए नर्मदा अंचल के कुल 12 वन्य प्राणी संरक्षण क्षेत्रों में से गुजरात के शूलपाणेश्वर अभयारण्य को छोड़कर शेष 11 मध्य प्रदेश में पड़ते हैं। मध्य प्रदेश में पड़ने वाले इन संरक्षित क्षेत्रों का क्षेत्रफल 5418.27 वर्ग किमी है जो नर्मदा बेसिन के कुल क्षेत्रफल का लगभग 5.5 प्रतिशत तथा प्रदेश के समस्त संरक्षित क्षेत्रों के कुल क्षेत्रफल का लगभग 30.2 प्रतिशत है। जैवविविधता के संरक्षण को मजबूती देने के लिये शासन द्वारा कुछ वर्ष पहले मध्य प्रदेश जैवविविधता बोर्ड का गठन किया गया है जो इस विषय पर कार्यरत है।

    नीर नर्मदा का…


    नर्मदा का नीर नर्मदा घाटी के वासियों के लिये अमृत जैसा है। नर्मदांचल के वन यहाँ की नदियों को साफ रखने में फेफड़ों व गुर्दों जैसे अन्दरूनी छन्नों सा काम करते हैं। अनगिनत खेतों व कारखानों से बहकर आने वाले जहरीले रसायनों को छानने और मिट्टी का कटाव रोककर जलाशयों में जाने वाले गाद पर अंकुश लगाने में भी नर्मदा घाटी के वनों की चमत्कारी भूमिका है। इसलिये नर्मदांचल में वनों का होना न होना इस पवित्र नदी के प्रवाह की निरन्तरता और जल की गुणवत्ता से सीधे-सीधे जुड़ा हुआ मुद्दा है। इन वनों के कमजोर होने से यदि नदियों के प्रवाह में कमी आ जाती है तो नर्मदा घाटी में विकास की राह में बड़े अवरोध पैदा हो जाएँगे। अपनी नदियों को न केवल जिन्दा बल्कि स्वस्थ भी रखना हो तो हमें नर्मदा घाटी के तार-तार होते वन आवरण को बचाना ही पड़ेगा। इसी मुद्दे की ओर ध्यान खींचता गीत।

    कंकर में बसे शंकर, बूँदों में बसा जीवन;
    भारत की कर्धनी सा है, शरीर नर्मदा का।
    पानी न इसे समझो, ये बहती जिन्दगी है;
    जीवन की धार जैसा, है नीर नर्मदा का।।

    बूँदों की बाँध गठरी, हरियाली की चादर में;
    जंगल खड़े हैं, झरनों और नदियों के आदर में।
    बर्फीले हिमनदों का, मिलता नहीं सहारा;
    है पर्वतों के जंगलों से, नर्मदा की धारा।
    दक्षिण दिशा में, सतपुड़ा पर्वत की छटाएँ हैं।
    उत्तर दिशा में विंध्य है, प्राचीर नर्मदा का।
    पानी न इसे समझो, ये बहती जिन्दगी है;
    जीवन की धार जैसा, है नीर नर्मदा का।।

    खेतों से रसायन भी, नदियों में जा रहे हैं;
    निर्मल प्रवाह को, जहरीला बना रहे हैं।
    शहरों का मल भी, नालों से नदियों में जा रहा है;
    आस्था का असर भी नदियों को मैला बना रहा है।
    श्रद्धा भी पड़ रही है, नर्मदा के लिये भारी;
    अब हो चला प्रदूषण, गम्भीर नर्मदा का।
    पानी न इसे समझो, ये बहती जिन्दगी है;
    जीवन की धार जैसा, है नीर नर्मदा का।।

    हैं नर्मदा की सखियाँ, वनवासी अंचलों में;
    इन सबके प्राण बसते हैं, पर्वत में जंगलों में।
    जंगल मिटे तो, नदियों का जीना मुहाल होगा;
    काँपेगी रूह सबकी, ऐसा वो हाल होगा।
    नदियों को जिलाना हो तो, जंगल को बचाएँ हम;
    अब तार-तार हो चला, ये चीर नर्मदा का।
    पानी न इसे समझो, ये बहती जिन्दगी है;
    जीवन की धार जैसा, है नीर नर्मदा का।।

    कंकर में बसे शंकर, बूँदों में बसा जीवन;
    भारत की कर्धनी सा है, शरीर नर्मदा का।
    पानी न इसे समझो, ये बहती जिन्दगी है;
    जीवन की धार जैसा, है नीर नर्मदा का।।


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    प्रख्यात पानी कार्यकर्ता राजेन्द्र सिंह के वैश्विक जल अनुभवों पर आधारित एक शृंखला

    विश्व जल दिवस, 22 मार्च 2018 पर विशेष


    यह दावा अक्सर सुनाई पड़ जाता है कि तीसरा विश्व युद्ध, पानी को लेकर होगा। मुझे हमेशा यह जानने की उत्सुकता रही कि इस बारे में दुनिया के अन्य देशों से मिलने वाले संकेत क्या हैं? मेरे मन के कुछेक सवालों का उत्तर जानने का एक मौका हाल ही में मेरे हाथ लग गया। प्रख्यात पानी कार्यकर्ता राजेन्द्र सिंह, पिछले करीब ढाई वर्ष से एक वैश्विक जलयात्रा पर हैं। इस यात्रा के तहत वह अब तक करीब 40 देशों की यात्रा कर चुके हैं। यात्रा को 'वर्ल्ड पीस वाटर वाॅक' का नाम दिया गया है। मैंने राजेन्द्र सिंह से निवेदन किया और वह मेरी जिज्ञासा के सन्दर्भ में अपने वैश्विक अनुभवों को साझा करें और वह राजी भी हो गए। मैंने, दिनांक 07 मार्च, 2018 को सुबह नौ बजे से गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान के कमरा नम्बर 103 में उनसे लम्बी बातचीत की। प्रस्तुत हैं राजेन्द्र सिंह जी से हुई बातचीत के कुछ महत्त्वपूर्ण अंश
    जलपुरुष राजेन्द्र सिंह के साथ लेखक अरुण तिवारीजलपुरुष राजेन्द्र सिंह के साथ लेखक अरुण तिवारीइस वक्त जो मुद्दे अन्तरराष्ट्रीय तनाव की सबसे बड़ी वजह बनते दिखाई दे रहे हैं, वे हैं - आतंकवाद, सीमा विवाद और आर्थिक तनातनी। निःसन्देह, सम्प्रदायिक मुद्दों को भी उभारने की कोशिशें भी साथ-साथ चल रही हैं। स्वयं को राष्ट्रवादी कहने वाली ताकतें अपनी सत्ता को निवासी-प्रवासी, शिया-सुन्नी, हिन्दू-मुसलमान जैसे मसलों के उभार पर टिकाने की कोशिश कर रही हैं। ऐसे में यह कथन कि तीसरा विश्व युद्ध, पानी को लेकर होगा; आगे चलकर कितना सही साबित होगा?

    पूरी दुनिया में वाटर वार की यह जो बात लोग कह रहे हैं; यह निराधार नहीं है। पानी के कारण अन्तरराष्ट्रीय विवाद बढ़ रहे हैं। विस्थापन, तनाव और अशान्ति के दृश्य तेजी से उभर रहे हैं। ये दृश्य, काफी गम्भीर और दर्द भरे हैं। पिछले कुछ वर्षों में पानी के संकट के कारण खासकर, मध्य एशिया और अफ्रीका के देशों से विस्थापन करने वालों की तादाद बढ़ी है।

    विस्थापित परिवारों ने खासकर यूरोप के जर्मनी, स्वीडन, बेल्जियम पुर्तगाल, इंग्लैंड, फ्रांस, नीदरलैंड, डेनमार्क, इटली और स्विटजरलैंड के नगरों की ओर रुख किया है। अकेले वर्ष 2015 में मध्य एशिया और अफ्रीका के देशों से करीब 05 लाख लोग, अकेले यूरोप के नगरों में गए हैं। जर्मनी की ओर रुख करने वालों की संख्या ही करीब एक लाख है। जर्मनी, टर्की विस्थापितों का सबसे बड़ा अड्डा बन चुका है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, यूरोप के नगरों की ओर हुए यह अब तक के सबसे बड़े विस्थापन का आँकड़ा है।

    गौर करने की बात है कि एक विस्थापित व्यक्ति, रिफ्यूजी का दर्जा हासिल करने के बाद ही सम्बन्धित देश में शासकीय कृपा के अधिकारी बनता है। अन्तरराष्ट्रीय स्थितियाँ ऐसी हैं कि विस्थापितों को रिफ्यूजी का दर्जा हासिल करने के लिये कई-कई साल लम्बी जद्दोजहद करनी पड़ रही है। परिणाम यह है कि जहाँ एक ओर विस्थापित परिवार, भूख, बीमारी और बेरोजगारी से जूझने को मजबूर हैं, वहीं दूसरी ओर जिन इलाकों में वे विस्थापित हो रहे हैं; वहाँ कानून-व्यवस्था की समस्याएँ खड़ी हो रही हैं। सांस्कृतिक तालमेल न बनने से भी समस्याएँ हैं।

    यूरोप के नगरों के मेयर चिन्तित हैं कि उनके नगरों का भविष्य क्या होगा? विस्थापित चिन्तित हैं कि उनका भविष्य क्या होगा? पानी की कमी के नए शिकार वाले इलाकों को लेकर भावी उजाड़ की आशंका से चिन्तित हैं। 17 मार्च को ब्राजील की राजधानी में एकत्र होने वाले पानी कार्यकर्ता चिन्तित हैं कि अर्जेंटीना, ब्राजील, पैराग्वे, उरुग्वे जैसे देशों ने 04 लाख, 60 हजार वर्ग मील में फैले बहुत बड़े भूजल भण्डार के उपयोग का मालिकाना अगले 100 साल के लिये कोका कोला और स्विस नेस्ले कम्पनी को सौंपने का समझौता कर लिया है। भूजल भण्डार की बिक्री का यह दुनिया में अपने तरह का पहला और सबसे बड़ा समझौता है। इस समझौते ने चौतरफा भिन्न समुदायों और देशों के बीच तनाव और अशान्ति बढ़ा दी है।

    आप देखिए कि 20 अक्टूबर, 2015 को टर्की के अंकारा में बम ब्लास्ट हुआ। 22 मार्च को दुनिया भर में अन्तरराष्ट्रीय जल दिवस मनाया जाता है। 22 मार्च, 2016 को जब बेल्जियम के नगरों में वाटर कन्वेंशन हो रहा था, तो बेल्जियम के ब्रूसेल्स में विस्फोट हुआ। शान्ति प्रयासों को चोट पहुँचाने की कोशिश की गई। उसमें कई लोग मारे गए। 19 दिसम्बर, 2016 को बर्लिन की क्रिश्चियन मार्किट में हुए विस्फोट में 12 लोग मारे गए और 56 घायल हुए। यूरोपियन यूनियन ने जाँच के लिये विस्थापित परिवारों को तलब किया। ऐसा होने पर मूल स्थानीय नागरिक, विस्थापितों को शक की निगाह से देखेंगे ही। शक हो, तो कोई किसी को कैसे सहयोग कर सकता है?

    विस्थापितों को शरण देने के मसले पर यूरोप में भेदभाव पैदा हो गया है। पोलैंड और हंगरी ने किसी भी विस्थापित को अपने यहाँ शरण देने से इनकार कर दिया है। चेक रिपब्लिक ने सिर्फ 12 विस्थापितों को लेेने के साथ ही रोक लगा दी। यूरोपियन कमीशन ने इन तीनों के खिलाफ का कानूनी कार्रवाई शुरू कर दिया है। ब्रूसेल्स और इसकी पूर्वी राजधानी के बीच, वर्ष 2015 के शुरू में ही सीरियाई विस्थपितों को लेकर लम्बी जंग चल चुकी है।

    इटली और ग्रीक जैसे तथाकथित फ्रंटलाइन देश, अपने उत्तरी पड़ोसी फ्रांस और आॅस्ट्रेलिया को लेकर असहज व्यवहार कर रहे हैं। कभी टर्की और जर्मनी अच्छे सम्बन्धी थे। जर्मनी, विदेशी पर्यटकों को टर्की भेजता था। आज दोनों के बीच तनाव दिखाई दे रहा है। यूरोप के देश अब राय ले रहे हैं कि विस्थापितों को उनके देश वापस कैसे भेजा जाये। अफ्रीका से आने वाले विस्थापितों का संकट ज्यादा बढ़ गया है। तनाव और अशान्ति होगी ही।

    इस तनाव और अशान्ति के मूल में पानी ही है। यह बात साबित करने के लिये आपके पास क्या तथ्य हैं?
    यह साबित करने के लिये मेरे पास तथ्य-ही-तथ्य हैं। दक्षिण अफ्रीका के नगर केपटाउन के गम्भीर हो चुके जल संकट के बारे में आपने अखबारों में पढ़ा ही होगा। संयुक्त अरब अमीरात के पानी के भयावह संकट के बारे में भी खबरें छप रही हैं।

    संयुक्त राष्ट्र संघ की विश्व जल विकास रिपोर्ट में आप जल्द ही पढ़ेंगे कि दुनिया के 3.6 अरब लोग यानी आधी आबादी ऐसी है, जो हर साल में कम-से-कम एक महीने पानी के लिये तरस जाती है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि पानी के लिये तरसने वाली ऐसी आबादी की संख्या वर्ष 2050 तक 5.7 अरब पहुँच सकती है। 2050 तक दुनिया के पाँच अरब से ज्यादा लोग के रिहायशी इलाकों में पानी पीने योग्य नहीं होगा। मैं सबसे पहले यहाँ सीरिया के बारे में कुछ तथ्य रखूँगा।

    आगे की बातचीत शृंखला को पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें

    युद्ध और शान्ति के बीच जल - भाग दो

    युद्ध और शान्ति के बीच जल - भाग तीन

    युद्ध और शांति के बीच जल - भाग चार

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    जलसंकट के भंवर में भारत

    RuralWaterWed, 03/21/2018 - 12:56

    जल संकटजल संकटलिओनार्दो दा विंची की एक उक्ति है-
    पानी पूरी प्रकृति की संचालक शक्ति है।

    लिओनार्दो कोई वैज्ञानिक नहीं थे। न ही वह कोई पर्यावरण विशेषज्ञ थे। वह पानी को लेकर काम करने वाले एक्सपर्ट भी नहीं थे।

    वह इटली के विश्व विख्यात चित्रकार थे। उन्हें इतालवी नवजागरण का महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर माना जाता है।

    लिओनार्दो का पानी से उतना ही सम्बन्ध था, जितना आम लोगों का होता है। मतलब नहाने-धोने व खाने-पीने का। हाँ, उनका पानी से एक और सम्बन्ध था। वह पेंटिंग्स करते थे तो रंगों को पानी में घोलकर कैनवास पर एक मायावी संसार रच देते थे।

    यानी कि कैनवास पर सजने वाली उनकी बहुरंगी दुनिया में पानी एक महत्त्वपूर्ण तत्व था। इसके बिना उनकी पेंटिंग्स पूरी नहीं होती थी।

    यह दीगर बात है कि उनकी पेंटिंग्स में प्रकृति का जितना कुछ चित्रण हुआ था, उसमें पानी की मौजूदगी नहीं के बराबर रही। ‘अर्नो वैली’ नाम की उनकी एक पेंटिंग, जो उन्होंने 21 साल की उम्र में बनाई थी में पेड़-पौधों के साथ पानी भी दिख जाता है। उनकी बाकी पेंटिंग्स में पानी का चित्रण शायद ही हो।

    उनकी पेंटिंग्स में पानी की गैर-मौजूदगी के बावजूद इस बात को भला कौन झुठला सकता है कि पानी बिना वह कैनवास पर एक लकीर भी नहीं खींच पाते।

    सम्भव है कि वहीं से उनमें यह विचार आया होगा कि पानी ही प्रकृति की संचालक शक्ति है।

    यह एक अवैज्ञानिक व्यक्ति का मानना था जिसने न तो पानी को लेकर कोई शोध किया था और न ही जीवन विज्ञान की पढ़ाई की थी। लेकिन, पानी को लेकर उनका विचार विज्ञान की धरातल पर भी खरा उतरता है।

    सचमुच, पानी के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है। प्यास बुझाने से लेकर तमाम तरह की जरूरतें पूरी करने में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से पानी की भूमिका होती है। पूरे ब्रह्मांड का वजूद ही पानी पर टिका हुआ है।

    हम-आप और पशु-पक्षी जिस ऑक्सीजन के सहारे जिन्दा रहते हैं, वह ऑक्सीजन भी हमें पानी से मिलता है। पेड़-पौधे जैव रासायनिक प्रक्रिया से पानी में मौजूद हाइड्रोजन व ऑक्सीजन को लेकर ऑक्सीजन का निर्माण करते हैं।

    हम लोग रोज जो कुछ खाते हैं, वे अनाज से ही तैयार किये जाते हैं। अनाज खेत में ही उगाया जाता है और पानी बिना तो अनाज उग ही नहीं सकता है। जैसे हमें भोजन की जरूरत पड़ती है उसी तरह फसलों को पानी की जरूरत पड़ती है। सूखा पड़ने पर फसलें बर्बाद हो जाती हैं।

    अपने देश में तो हाल के वर्षों में बुन्देलखण्ड, मराठवाड़ा समेत कई इलाकों में सूखे के चलते फसल खराब हो चुकी है और रोजी-रोटी के लिये किसानों का शहरों की तरफ पलायन बढ़ा है।

    खेती के साथ ही मौसम में बदलाव भी पानी पर निर्भर है। पानी की उपलब्धता और उसकी हरकत से मौसम में बदलाव आता है। पानी वाष्प बनकर न केवल तापमान में फेरबदल करता है बल्कि हवा के बनने में भी मददगार होता है। पानी की वजह से ही मौसम में वैसी तब्दीली आती है, जो मानव जीवन के लिये जरूरी है।

    मछली समेत दूसरे जलीय जीवों के लिये पानी जीवनरेखा है। रोचक तथ्य यह है कि ये जलीय जीव पानी के बिना जी नहीं पाते हैं और पानी मिलता है तो उसकी सफाई भी प्राकृतिक तरीके से कर दिया करते हैं।

    पानी की किल्लत और अकाल (सूखा) ने बार-बार साबित किया है कि पानी का समुचित प्रबन्धन बेहद अहम है। दुनिया के इतिहास में अब तक 150 से ज्यादा बार सूखा पड़ चुका है जिसमें करोड़ों लोगों की मौत हो चुकी है।

    ईसा पूर्व 26 में रोम में भीषण अकाल पड़ा था जिसमें 20 हजार लोगों की मौत हुई थी। सन 1097 में फ्रांस में आये अकाल ने 10 हजार लोगों को मौत की नींद सुला दी थी।

    यही नहीं, रूस में सन 1601-03 में रूस में आये अकाल ने करीब 20 लाख लोगों की जान ले ली थी।

    चीन ने तो कई बार अकाल का सामना किया। इतिहास बताता है कि सन 1810 से 1849 के बीच चीन में चार बार सूखा पड़ा था जिसने 4.5 करोड़ लोगों की जिन्दगी छीन ली थी।

    इसी तरह सन 1850 से 1873 तक चीन में पड़े अकाल ने 6 करोड़ लोगों की जिन्दगी छीन ली थी। इसके बाद सन 1901 और सन 1911 में आये अकाल में 2.5 करोड़ लोगों को मौत हो गई थी।

    उत्तर कोरिया में 1996 में आये अकाल में 2 लाख से अधिक लोगों की जान गई थी।

    सूखा व अकाल ने भारत को बख्श दिया था, ऐसा नहीं है। सन 1344 से लेकर अब तक डेढ़ दर्जन से अधिक बार भारत सूखे का सामना कर चुका है। इनमें से सबसे भयावह अकाल सन 1896-1902 व सन 1943 में आया था जिनमें एक करोड़ से अधिक लोगों की मौत हो गई थी।

    ये तो खैर हुई इतिहास की बातें। अब सवाल उठता है कि इन घटनाओं से हमनें क्या सीख ली है। शायद कुछ भी नहीं। पिछले दो-तीन दशकों में हमने पानी को बचाने की जगह उसे बर्बाद ही किया है।

    संयुक्त राष्ट्र ने पानी की बर्बादी से उभरने वाले संकट को महसूस करते हुए 25 साल पहले यानी वर्ष 1992 में हर साल 22 मार्च को अन्तरराष्ट्रीय जल दिवस मनाने का निर्णय लिया था।

    इसके अन्तर्गत हर साल अलग-अलग थीम के साथ अन्तरराष्ट्रीय जल दिवस मनाया जाता है। इस साल का थीम है- पानी के लिए प्रकृति।

    इससे पहले वर्ष 2017 में ‘पानी क्यों बर्बाद करें’, वर्ष 2016 में ‘बेहतर पानी, बेहतर काम’, वर्ष 2015 में ‘पानी व दीर्घकालिक विकास’ और वर्ष 2014 में ‘पानी व ऊर्जा’ के थीम पर अन्तरराष्ट्रीय जल दिवस का पालन किया गया था।

    अन्तरराष्ट्रीय जल दिवस पालन करने का मुख्य उद्देश्य पानी को लेकर लोगों को जागरूक करना था ताकि पानी की बर्बादी रोकी जा सके। साथ ही यह भी लक्ष्य था कि हर व्यक्ति तक साफ पानी की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके।

    भारत के सन्दर्भ में अगर देखें, तो पानी से सम्बन्धित तमाम तरह की समस्याएँ अभी भी मुँह बाये खड़ी हैं। करोड़ों लोग जहाँ साफ पानी से वंचित हैं, तो वहीं एक बड़ी आबादी गन्दा पानी पीकर बीमार हो रही है।

    दूसरी तरफ, एक बड़े तबके तक पानी पहुँच ही नहीं रहा है। इन सबके बीच मौसम की अपनी गति है, जो कभी सूखा लेकर आती है तो कभी बाढ़। दोनों ही कारणों का सबसे ज्यादा असर गरीब लोगों पर पड़ रहा है।

    द वाटर प्रोजेक्ट नामक संस्था की वेबसाइट पर छपे एक लेख के अनुसार भारत के करीब 10 करोड़ घरों में रहने वाले बच्चों को पानी नहीं मिल पाता है और हर दो में से एक बच्चा कुपोषण का शिकार है।

    एक अनुमान के अनुसार देश की 7.6 करोड़ आबादी साफ पानी की पहुँच से दूर है। सरकारी आँकड़ों की मानें तो वर्ष 2013 तक देश की महज 30 प्रतिशत ग्रामीण आबादी को साफ पानी मिल पाता था।

    वहीं, वाटरएड की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत उन देशों की सूची में शामिल है, जहाँ रहने वाली एक बड़ी आबादी को साफ पानी नहीं मिलता है।

    पानी की किल्लत को लेकर एशियन डेवलपमेंट बैंक (एडीबी) ने भी चिन्ता जाहिर की है। एडीबी के अनुमान के मुताबिक वर्ष 2030 तक जल की कमी 50 प्रतिशत तक पहुँच जाएगी।

    केन्द्र सरकार के आँकड़े भी बताते हैं कि भारत में जलसंकट विकराल रूप ले सकता है। केन्द्रीय जल संसाधन मंत्रालय के अनुसार भारत को साल में 1100 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी की जरूरत पड़ती है।

    मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2025 तक पानी की जरूरत 1200 बिलियन क्यूबिक मीटर और वर्ष 2050 तक 1447 बिलियन क्यूबिक मीटर के आँकड़े को छू लेगा। यानी वर्ष 2050 तक भारत के लोगों की प्यास बुझाने के लिये 1447 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी की जरूरत पड़ेगी क्योंकि तब तक देश की आबादी बढ़कर 140 करोड़ पर पहुँच जाएगी।

    सवाल यह है कि भारत 1447 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी की व्यवस्था कैसे करेगा।

    दो वर्ष पहले यही महीना था जब महाराष्ट्र के लातूर में जलसंकट गहरा गया था। खेत में सिंचाई के लिये तो दूर लोगों को पीने के पानी के लाले पड़ गए थे। समस्या इतनी विकराल हो गई थी कि केन्द्र को वाटर ट्रेन भेजनी पड़ी थी।

    लातूर में जलसंकट की मुख्य रूप से दो वजहें थीं - पहली वजह थी कमजोर मानसून और दूसरी वजह थी भूजल का बेइन्तहा दोहन। बुन्देलखण्ड को भी ऐसी ही समस्या से जूझना पड़ा था।अनुमान है कि वर्ष 2030 तक 40 फीसदी आबादी को पीने का पानी नहीं मिल पाएगा। इसका मतलब है कि भूजल का और ज्यादा दोहन किया जाएगा।

    ग्राउंड वाटर रिसोर्सेज असेसमेंट की मानें, तो भारत के हर छठवें भूजल स्रोत का क्षमता से अधिक दोहन किया जा रहा है। ऐसे में और अधिक दोहन किये जाने से भूजल स्तर और भी नीचे जाएगा।

    जलस्तर नीचे जाने से एक्वीफर में मौजूद हानिकारक तत्व मसलन आर्सेनिक और फ्लोराइड पानी के साथ बाहर आएँगे जिसे पीकर लोग बीमार पड़ेंगे।

    जलसंकट होने की सूरत में सबसे पहले लोग पीने के पानी का जुगाड़ करेंगे, फिर सिंचाई के लिये पानी की तरफ ध्यान देंगे। इससे प्रत्यक्ष तौर पर खेती पर असर पड़ेगा जिससे उत्पादन घटेगा।

    विश्व बैंक ने एक आकलन कर जलसंकट से सकल घरेलू उत्पाद पर पड़ने वाले असर को रेखांकित किया है।

    विश्व बैंक ने कहा है कि जलसंकट बढ़ने से वर्ष 2050 तक मध्य अफ्रीका व पूर्वी एशिया का विकास दर 6 प्रतिशत तक घट सकता है।

    विश्व बैंक की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जलसंकट बढ़ने से झड़प की घटनाएँ भी बढ़ेंगी और साथ ही खाद्यान्न के दाम में इजाफा होगा जिससे लोगों को आर्थिक मोर्चे पर भी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।

    इस सम्बन्ध में विश्व बैंक के अध्यक्ष जिम योंग किम ने कहा है, ‘जलसंकट आर्थिक विकास व स्थायित्व के लिये बड़ा खतरा है और जलवायु परिवर्तन समस्या को और बढ़ा रहा है।’

    इस संकट के मद्देनजर केन्द्र सरकार की ओर से कुछेक कदम जरूर उठाए गए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर उसका असर देखने को नहीं मिल रहा है। वर्ष 2013 में केन्द्र सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में जलापूर्ति के लिये 166000 करोड़ रुपए खर्च करने की योजना बनाई थी, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में अब भी जलसंकट बरकरार है।

    पिछले साल नवम्बर में केन्द्र सरकार ने अगले तीन महीने में सिंचाई परियोजनाओं पर 80 हजार करोड़ रुपए खर्च करने की घोषणा की थी। इस योजना का जमीन पर आना अभी बाकी है।

    इन सबके बीच कहीं-कहीं लोगों ने खुद पहल कर अपने और अपने आसपास की आबादी के लिये पानी की उपलब्धता सुनिश्चित की है और लोग उनसे प्रेरित भी हो रहे हैं। लेकिन, भारत जैसे विशाल देश में सरकार की सक्रिय भूमिका के बिना जलसंकट से मुक्ति सम्भव नहीं है।

    जलसंकट के सन्दर्भ में आज से करीब 16 साल पहले डेवलपमेंट रिसर्च एंड कम्युनिकेशंस ग्रुप ने वाटर पॉलिसी एंड एक्शन प्लान 2020 तैयार किया था। इसमें जलसंकट से निपटने के लिये कई उपाय सुझाए गए थे। मसलन मौजूदा जलस्रोतों का समुचित प्रबन्धन, नदियों व जलाशयों का रख-रखाव, पानी की रिसाइकिलिंग व दोबारा इस्तेमाल, पानी की उपलब्धता और भविष्य में उसकी जरूरतों से सम्बन्धित ताजातरीन डेटा संग्रह, सतही व भूजल का प्रबन्धन आदि।

    उक्त रिपोर्ट में पानी के घरेलू इस्तेमाल के लिये भी कई तरह के सुझाव दिये गए हैं, जिन्हें अमल में लाकर बेहतर जल प्रबन्धन किया जा सकता है।

    इन सबके अलावा जो सबसे अहम बात है, वो यह है कि आम लोगों को खुद भी जागरूक होना होगा। उन्हें यह महसूस करना होगा कि पानी का इस्तेमाल वे ही कर रहे हैं, इसलिये इसका प्रबन्धन भी वे खुद करें और ईमानदारी से करें, ताकि इसकी बर्बादी न हो।

    इसके अलावा बारिश के पानी को संग्रह कर उसका इस्तेमाल करने के लिये भी पहल करनी होगी, तभी जलसंकट से निपटा जा सकता है।

    पानी हमें जीवन देता है, तो इसे बचाना भी हमारा दायित्व है।

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    जल के लिये प्रकृति के आधार पर समाधान (Solution based on nature for water)

    RuralWaterThu, 03/22/2018 - 13:40

    विश्व जल दिवस, 22 मार्च 2018 पर विशेष


    हम अपने परम्परागत जलस्रोत को भूलाते जा रहे हैंहम अपने परम्परागत जलस्रोत को भूलाते जा रहे हैंजल संकट का स्थायी तथा सहज समाधान केवल-और-केवल प्रकृति ही कर सकती है। प्रकृति ने हजारों सालों से पानी की सुगम उपलब्धता ही नहीं, पर्याप्तता बनाए रखी है। हमारा तत्कालीन समाज सदियों से प्रकृति के संग्रहित पानी का बुद्धिमत्ता और प्राकृतिक नीति-नियमों के अनुसार ही कम-से-कम जरूरत का पानी लेता रहा। उसने बारिश के संग्रहित पानी का दोहन तो किया लेकिन लालच में आकर अंधाधुंध शोषण नहीं किया।

    प्रकृति ने हमें जीवित रखने के लिये पर्याप्त पानी दिया है लेकिन वह कभी भी मनुष्य को उसके शोषण की अनुमति नहीं देती। करीब पचास साल पहले जब से समाज ने पानी को अपने सीमित हितों के लिये अंधाधुंध खर्च कर पीढ़ियों से चले आ रहे समाज स्वीकृत प्राकृतिक नीति-नियमों की अनदेखी करना प्रारम्भ किया है, तभी से पानी की समस्या बढ़ती गई है। समाज ने यदि अब भी प्रकृति के आधार पर समाधान करने का प्रयास नहीं किया तो आने वाली पीढ़ी कभी पानी से लबालब जलस्रोतों को देख भी नहीं सकेगी।

    इधर के कुछ सालों में हम पानी के मामले में सबसे ज्यादा घाटे में रहे हैं। कई जगहों पर लोग बाल्टी-बाल्टी पानी को मोहताज हैं तो कहीं पानी की कमी से खेती तक नहीं हो पा रही है। भूजल भण्डार तेजी से खत्म होता जा रहा है। कुछ फीट खोदने पर जहाँ पानी मिल जाया करता था, आज वहाँ आठ सौ से बारह सौ फीट तक खोदने पर भी धूल उड़ती नजर आती रहती है। सदानीरा नदियाँ अब दिसम्बर तक भी नहीं बहतीं। ताल-तलैया सूखते जा रहे हैं। कुएँ-कुण्डियाँ अब बचे नहीं या कम हो गए हैं।

    बारिश का पानी नदी-नालों में बह जाता है और हम जमीन में पानी ढूँढते रह जाते हैं। लोग पानी के लिये जान के दुश्मन हुए जा रहे हैं। पानी के लिये पड़ोसी देश और पड़ोसी राज्य आपस में लड़ रहे हैं। कहा जाने लगा है कि तीसरा विश्वयुद्ध पानी के लिये हो सकता है।

    पानी को किसी भी प्रयोगशाला में नहीं बनाया जा सकता। जल ही जीवन का आधार है। जल के बिना जीवन की कल्पना बेमानी ही है। कैसे सम्भव है कि पानी के बिना कोई समाज अपना अस्तित्व बचाए रख सकता है। पानी जीवन की अनिवार्यता है। पानी के बिना जीवन की धड़कन थम जाती है। प्यास दुनिया की सबसे बड़ी विडम्बना है और भारत के लिये तो और भी ज्यादा बड़ी।

    जिस देश में कभी 'पग-पग नीर'की उक्ति कही जाती रही हो, वहाँ अब पानी की यह कंगाली हमें बहुत शर्मिन्दा करती है। कहा जाता है कि जल है तो कल है पर अब इसे एक सवाल की तरह देखा जाना चाहिए कि जल ही नहीं होगा तो कल कैसा? जीवन जल से ही सम्भव है, यह हमारे समाज के लिये एक बड़ा सवाल है और बड़ा खतरा भी। पर्यावरण की समझ रखने वाले लोगों को यह सवाल बड़े स्तर पर चिन्तित कर रहा है।

    आज के समाज से पानी क्यों दूर होता चला गया, इसकी भी बड़ी रोचक कहानी है। ठीक उसी तरह जैसे सेठ के पास अकूत सम्पत्ति हो और उसी के बेटों को अपनी रोटी कमाने तक के लिये हाड़तोड़ मजदूरी करना पड़े। ठीक यही बात हमारे समाज पर भी लागू होती है कि कैसे हमने इधर कुछ ही सालों में पानी के अकूत भण्डारों को गँवा दिया और अब प्यास भर पानी के लिये भी सरकारों के भरोसे मोहताज होते जा रहे हैं।

    प्रकृति ने हमें पानी का अनमोल खजाना सौंपा था, लेकिन हम ही सदुपयोग नहीं कर पाये। हमने दोहन की जगह शोषण करना आरम्भ कर दिया। हमने उत्पादन और मुनाफे की होड़ में धरती की छाती में गहरे-से-गहरे छेद कर हजारों सालों में संग्रहित सारा पानी उलीच लिया। नलों में पानी क्या आया, कुएँ-कुण्डियाँ पाट दीं। ताल-तलैया की जमीनों पर अतिक्रमण कर लिया। नदियों का मीठा पानी पाइप लाइनों से शहरों तक भेजा। बारिश का पानी नदियों तक पहुँचाने वाले जंगल चन्द रुपयों के लालच में काटे जाने लगे।

    अब हर साल सूखा और जल संकट जैसे हमारी नियति में शामिल होते जा रहे हैं। साल-दर-साल बारिश के आँकड़े कम-से-कमतर होते जा रहे हैं। इस साल भी लगातार पाँचवें साल देश के कई हिस्सों में सूखा पड़ा है। इस साल भी 15 फीसदी से कम बारिश हुई है। 60 करोड़ किसान सूखे की मार से विचलित हैं।

    देश के 20 करोड़ छोटे किसान खेती के लिये मानसून पर निर्भर होते हैं। कमजोर मानसून का प्रभाव देश की 60 फीसदी आबादी पर पड़ता है। जमीनी पानी लगातार गहरा होता जा रहा है। साल-दर-साल भूजल स्तर 3.2 फीसदी तक घट रहा है। तमाम जलस्रोतों के सूखने के साथ ही सदानीरा नदियों में भी अब पानी की कमी नजर आने लगी है।

    नर्मदा जैसी नदियों में भी अब पानी की कमी हो जाती है। नदियों के कायाकल्प और उन्हें जिन्दा करने की कोशिशों पर अरबों रुपए खर्च होने के बाद भी कोई खास बदलाव कहीं नजर नहीं आता बल्कि वे और ज्यादा गन्दी होकर सिकुड़ती जा रही हैं।

    संकट इसलिये भयावह होता जा रहा है कि बारिश कम होने लगी है। जमीनी पानी का भण्डार कम होता जा रहा है। बारिश का पानी जमीनी पानी के भण्डार तक पहुँचकर उसे बढ़ा नहीं पा रहा। धरती लगातार गरम होती जा रही है। उसका बुखार बढ़ता ही जा रहा है। इसके प्रभाव से कई पर्यावरणीय बदलाव हो रहे हैं। मौसम मनमाने तरीके से बदलने लगा है।

    मौसम का अब न तो कोई निश्चित समय रहता है और न ही उसकी तीव्रता का कोई निर्धारित मापदण्ड। कभी कुछ इलाकों में जमकर बारिश होती है तो कहीं बिलकुल नहीं। देश के कुछ हिस्सों में बाढ़ तो ठीक उसी समय बाकी इलाके में सूखा। ओजोन परत में क्षरण का खतरा मँडराने लगा है। खेती में किसानों को नए-नए संकटों का सामना करना पड़ रहा है।

    पेड़-पौधे लगातार कम होते जा रहे हैं। साल-दर-साल जंगल कम होते जा रहे हैं, जबकि नदियों तक पानी पहुँचाने में इन्हीं जंगलों का बड़ा योगदान होता है। जंगल कम होने तथा जंगलों में जलस्रोत सूखने का सीधा असर वन्य प्राणियों पर पड़ रहा है। गर्मी शुरू होते ही पानी के लिये वे जंगल से गाँवों और बस्तियों की तरफ आने लगते हैं। जंगलों के पोखर, नदी-नाले सूख जाने से उनके सामने पीने के पानी का संकट खड़ा हो जाता है। वन्य प्राणियों की तादाद घटने के पीछे भी वन्य प्राणी विशेषज्ञ जल संकट को बड़ा कारण मानते हैं।

    इससे जैवविविधता को भी बड़ा संकट है। नर्मदा में कुछ सालों पहले तक 70 से ज्यादा प्रजातियों की मछलियाँ हुआ करती थीं, लेकिन मप्र में इस पर जगह-जगह बाँध बन जाने से अब महज 40 प्रजातियों तक ही सिमट गई है।

    बाँध बन जाने से नर्मदा में कई जगह पानी काफी छिछला हो गया है तो कई जगह नगरीय निकायों का सीवेज का पानी मिलते रहने से नदी का पानी इतना प्रदूषित हो गया है कि इनमें मछलियाँ और अन्य जलीय जीव नहीं पनप पा रहे हैं। मप्र में राज्य मछली का दर्जा प्राप्त महाशीर मछली अब नर्मदा के पानी से लुप्त हो चली है। नदियाँ सूख रही हैं तो इसका असर जलीय जीवों की प्रजातियों के अस्तित्व पर इसका प्रभाव पड़ रहा है।

    हजारों सालों से संग्रहित धरती का भूजल भण्डार अब चूकने की कगार पर है। कई जगह जमीनी पानी का जल स्तर 600 से एक हजार फीट तक गहरा चला गया है। धरती की छाती में छेद-पर-छेद करते हुए खेतों में लगातार ट्यूबवेल किये गए। खेती में पानी के लिये ट्यूबवेल को ही एकमात्र संसाधन मान लिया गया।

    कुएँ और तालाब के परम्परागत स्रोत बिसरा दिये गए। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि हजारों सालों से जमीन के भीतर रिसकर इकट्ठा होने वाला भूजल भण्डार का पानी अंधाधुंध तरीके से उलीच लिया गया। बाद के दिनों में किसी ने भी जमीन के भीतर पानी रिसाने के बारे में न कभी गम्भीरता से सोचा और न ही कभी कोई ठोस काम जमीन पर हुआ।

    बैंक खाते की तरह पूर्वजों का सहेजा पानी तो हमने इस्तेमाल कर लिया लेकिन हम उस खाते में कुछ भी जमा नहीं कर सके। इसलिये धीरे-धीरे वह पानी भी अब खत्म होने की कगार पर पहुँच गया है। अब किसानों पर पानी के लिये होने वाले खर्च का कर्ज इतना बढ़ गया है कि कई जगह आत्महत्याओं के मामले सामने आ रहे हैं। न ट्यूबवेल में पानी आ रहा, न फसलें ले पा रहे हैं, उल्टे कर्ज पर ब्याज बढ़ता जा रहा है।

    पानी की कमी का असर मनुष्य के स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है। पानी की कमी से कई इलाकों में लोगों को प्रदूषित पानी पीना पड़ता है। इससे उन्हें कई तरह की बीमारियाँ हो रही हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आँकड़े बताते हैं कि भारत में 9.7 करोड़ लोगों को पीने का साफ पानी नहीं मिल पा रहा है। खासतौर पर ग्रामीण इलाकों में हालत बहुत चिन्ताजनक है।

    देश में करीब 70 फीसदी लोग प्रदूषित पानी पीने को मजबूर हैं। प्रदूषित पानी में कई जगह फ्लोराइड, आर्सेनिक और नाइट्रेट जैसे घातक तत्व भी शामिल हैं। स्वास्थ्य बजट का बड़ा हिस्सा करीब 80 फीसदी केवल जलजनित बीमारियों के लिये ही खर्च करना पड़ रहा है। हर साल करीब छह लाख से ज्यादा लोग पेट और संक्रमण की बीमारियों से ग्रस्त होकर दम तोड़ देते हैं। दस फीसदी पाँच साल की उम्र से छोटे बच्चे डायरिया दस्त से पीड़ित होकर मर जाते हैं।

    देश में प्रतिव्यक्ति जल की उपलब्धता प्रति व्यक्ति एक हजार घन मीटर है, जबकि 1951 में यह तीन से चार हजार घन मीटर हुआ करती थी। यह जानना भी रोचक है कि 1951 से अब तक 65 सालों में जल संसाधन जुटाने के नाम पर खरबों रुपए का सरकारी धन भी खर्च हो चुका है और नतीजा यह कि पानी अब पहले के मुकाबले चौथाई ही रह गया। ऐसा क्यों हुआ, यह सब जानते हैं।

    प्रकृति हमें हमेशा से ही सब कुछ देती रही है। साँस लेने के लिये हवा, पीने के लिये पानी, खाने के लिये पेड़-पौधे। उसकी इन अनमोल नेमतों का हमारे पूर्वज हजारों सालों से समझदारीपूर्वक उपयोग करते रहे हैं। प्रकृति का आवश्यक उपयोग भर ही दोहन करने से वे कई पीढ़ियों तक इसका लाभ लेते रहे लेकिन इधर के सालों में मनुष्य के लालच ने सारी सीमाएँ तोड़ते हुए इनके दोहन की जगह इनका शोषण करना प्रारम्भ कर दिया। इससे प्रकृति के नीति-नियम टूट गए. प्रकृति चाहती है उसके संसाधनों का हमारा समाज दोहन करे लेकिन कुछ नीति-नियमों और आचार संहिता में रहते हुए।

    जब हम इन नियमों से परे जाकर दोहन की जगह शोषण करने लगते हैं तो फिर हमारे समाज को ऐसे ही कई संकटों का सामना करना पड़ता है। जल संकट इसका एक बड़ा रूप है लेकिन इससे कई बातें जुड़ती हैं। ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन, जंगल का घटना, जैवविविधता और वन्य प्राणियों की तादाद में कमी, खेती के संकट और सेहत पर असर आदि कई रूपों में सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय संकटों का सामना करना पड़ रहा है। आने वाले कुछ सालों में ये खतरे हमारे सामने और भी बड़ी चुनौतियों के रूप में दिखने लगेंगे।

    पानी का मनमाना, अंधाधुंध और बेतरतीब दोहन ही नहीं हुआ है, हमने पानी को बाजार के उत्पाद की तरह व्यापार का हिस्सा बना लिया। बोतलबन्द पानी का व्यापार साल-दर-साल 15 से 20 फीसदी की दर से बढ़ रहा है। अब हमें सिखाया जा रहा है कि शुद्ध और साफ पानी यानी बोतल का पानी। समाज में प्यासे को पानी पिलाना हमेशा से पुण्य और सामाजिक जिम्मेदारी रही है।

    गर्मियों में कई स्थानों पर प्याऊ लगाई जाती थी। पर कुछ व्यवसायी मानसिकता के लोगों ने इसे भी बाजार में ला खड़ा किया है। जब हम किसी वस्तु को बाजार में ले आते हैं तो फिर हमेशा उसे मुनाफे के गणित से ही जोड़कर देखा जाता है। तालाबों और नदियों के प्रवाह क्षेत्र को तहस-नहस कर अतिक्रमण किये। रेत खनन करते हुए व्यापारी खनन माफिया बन बैठे।

    प्राकृतिक नदी तंत्र को समझे बिना थोड़ी-सी बिजली या पानी के लिये बाँधना शुरू किया। बड़े बाँधों ने इनके पर्यावरणीय सरोकारों को नुकसान ही पहुँचाया है। नदियों का पानी पाइप लाइनों से पचास से डेढ़ सौ किमी तक पहुँचा दिया। नदी के आसपास जंगल बचे नहीं।

    अपने पारम्परिक व प्राकृतिक संसाधनों और पानी सहेजने की तकनीकों, तरीकों को भुला दिया गया। स्थानीय रिवायतों को बिसरा दिया और लोगों के परम्परागत ज्ञान और समझ को हाशिए पर धकेल दिया। पढ़े-लिखे लोगों ने समझा कि उन्हें अपढ़ और अनपढ़ों के अर्जित ज्ञान से कोई सरोकार नहीं और उनके किताबी ज्ञान की बराबरी वे कैसे कर सकते हैं।

    जबकि समाज का परम्परागत ज्ञान कई पीढ़ियों के अनुभव से छन-छनकर लोगों के पास तक पहुँचा था। समाज में पानी बचाने, सहेजने और उसके समझ की कई ऐसी तकनीकें मौजूद रही हैं, जो अधुनातन तकनीकी ज्ञान के मुकाबले आज भी मार्के की बात कहती है।

    समाज और सरकारों ने व्यक्ति की बुनियादी जरूरत और जिन्दगी के लिये सबसे अहम होने के बाद भी पानी को कभी अपनी प्राथमिकता सूची में पहले नम्बर पर नहीं रखा। हमेशा इसके लिये शार्ट कट के रास्ते ही अमल में लाये गए। कभी इन पर समग्र और दूरगामी परिणामों को सोचते हुए निर्णय नहीं लिये गए। प्राकृतिक संसाधनों के पर्यावरणीय हितों की लम्बे समय तक लगातार अनदेखी की जाती रही। जल संकट का सामना करने के लिये दूर स्थित नदियों से पाइप लाइनों में पानी मँगवाया या धरती का सीना छलनी कर बोरिंग से हजारों साल से जमा हो रहे पानी के खजाने को उलीच डाला।

    ग्लोबल वार्मिंग की वजह से ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। ग्लेशियर पानी के पारम्परिक स्रोत रहे हैं और हिमालय से आने वाली गंगा सहित अन्य नदियाँ इन पर निर्भर हैं। सिर्फ नदियाँ ही नहीं इन पर आश्रित करीब 40 करोड़ से ज्यादा लोगों के पानी पर भी इसका बुरा असर पड़ सकता है। ग्लोबल वार्मिंग का सबसे बड़ा खतरा बारिश पर होगा। बारिश की अनिश्चितता और भी बढ़ सकती है। यह जुड़ी है सीधे तौर पर हमारी खेती से। किसानों की आर्थिक दशा पहले ही खराब है और खेती अब फायदे का सौदा नहीं रहकर लगातार घाटे का सौदा होती जा रही है।

    मध्य प्रदेश के मालवा जैसे पानीदार इलाके के शहरों और कस्बों में पीने का पानी तक नर्मदा से आ रहा है। यहाँ के उद्योगों को चलाने के लिये जरूरी पानी भी सवा सौ किमी दूर नर्मदा से आ रहा है। क्षिप्रा में कुम्भ स्नान के लिये भी नर्मदा का पानी क्षिप्रा में डाला जा रहा है। उधर पानी सहेजने के कुछ छोटे और खरे उपाय जैसे स्थानीय पारम्परिक जलस्रोतों को संरक्षित करने, बरसाती पानी के ज्यादा-से-ज्यादा उपयोग और इसमें संरचनाओं का निर्माण। नदी-नालों में छोटे बंधान और तालाब बनाने आदि में अब समाज और सरकार दोनों का विश्वास नहीं बचा।

    समाज को हमने कभी जल साक्षर नहीं बनाया। नई पीढ़ी के लोगों का पानी के मामले में ज्ञान बहुत थोड़ा और सतही है। उन्हें नए समय की तकनीकों और किताबी ज्ञान का बोध तो है पर जीवन के लिये सबसे जरूरी पानी के इस्तेमाल और जरूरी खास जानकारी नहीं है। मसलन पानी कहाँ से आता है। पानी क्यों कम से कमतर होता जा रहा है। जमीनी पानी कैसे खत्म होता जा रहा है। बरसाती पानी को जमीन में रिसाना क्यों जरूरी है।

    बरसाती पानी को कैसे सहेजा जा सकता है। नदियों और तालाबों के खत्म होते जाने के दुष्परिणाम क्या होंगे। इनके पानी के मनमाने दोहन का क्या और कितना बुरा असर पड़ेगा। हमें इन मुद्दों पर समझ बढ़ानी होगी। जल-जंगल और जमीन के आपसी सम्बन्धों को समझने की नए सिरे से कोशिश करनी होगी।

    अकेले बड़ी लागत की योजनाएँ बना लेने या पानी के लिये हमेशा नदियों और जमीनी पानी पर निर्भर रहने भर से जल संकट का निदान सम्भव नहीं है। इस पर समूची दृष्टि से सोचने और शिद्दत से, पूरी गम्भीरता से सोच-समझ कर परम्परागत अनुभवजन्य ज्ञान को भी जोड़ते हुए इस पर काम करने की महती जरूरत है।

    पानी के प्राकृतिक तौर-तरीकों को समझकर प्रकृति में ही इसका समाधान ढूँढने की कोशिश करनी होगी। बारिश के पानी के साथ प्राकृतिक जल संरचनाओं को सहेजने पर जोर देना होगा। जलस्रोतों और खासकर नदियों के अंधाधुंध दोहन की प्रवृत्ति को रोकना होगा। रेत खनन में भू-वैज्ञानिक समझ को बढ़ाना होगा। छोटी नदी परियोजनाओं पर जोर देकर भूजल भण्डार बढ़ाने की तकनीकें जमीनी स्तर पर अमल में आएँ। जंगलों और पेड़-पौधों को संरक्षित कर जल प्रदूषण पर कठोर कार्यवाही की जाये तो प्रकृति की नेमत का पानी हमें बरसों बरस तक लगातार मिलता रहेगा। जल संकट का प्राकृतिक समाधान ही बेहतर विकल्प है।

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    केप टाउन का जलसंकट भारत के लिये भी सबक

    RuralWaterThu, 03/22/2018 - 17:36

    पानी के लिये कतार में खड़े केप टाउनवासीपानी के लिये कतार में खड़े केप टाउनवासीदक्षिण अफ्रीका की राजधानी केप टाउन बन्दरगाह, बाग-बगीचों व पर्वत शृंखलाओं के लिये मशहूर है।

    यह एक खूबसूरत टूरिस्ट स्पॉट भी है, जो दुनिया भर के लोगों को अपनी ओर खींचता है।

    यहाँ पहले जनजातियाँ रहा करती थीं। इस क्षेत्र में यूरोपियनों की घुसपैठ 1652 में हुई। चूँकि यह जलमार्ग से भी जुड़ता था, इसलिये इसे व्यापारिक केन्द्र के रूप में भी विकसित किया जाने लगा और धीरे-धीरे यह शहर दुनिया के सबसे सुन्दर शहरों में शुमार हो गया।

    पर्यटकों का यह पसन्दीदा स्पॉट इन दिनों भयावह जल संकट से जूझ रहा है और हालात ये हैं कि लोग वहाँ से पलायन तक करने लगे हैं। जो वहाँ पर हैं, वे लम्बी कतारों में लगकर पीने लायक पानी ले रहे हैं।

    पानी की घोर किल्लत को देखते हुए स्थानीय प्रशासन वहाँ पानी की सप्लाई पूरी तरह बन्द करना चाहता है, जिससे संकट और विकराल रूप ले लेगा।

    फिलहाल वहाँ रहने वाले लोग नहाते वक्त शरीर पर पड़ने वाले पानी को बचा लेते हैं और उसका शौचालय में इस्तेमाल कर रहे हैं। हाथ धोने के लिये पानी की जगह हैंड सेनिटाइजर प्रयोग में लाया जा रहा है।

    प्रशासन ने लोगों से अपील की है कि वे महज 90 सेकेंड में ही नहाने का कार्यक्रम खत्म करें और जितना हो सके पानी बचाएँ।

    बताया जाता है कि पानी की किल्लत के मद्देनजर सरकार ने अप्रैल में पानी की सप्लाई बन्द कर देने की घोषणा की थी। लेकिन, लोगों में पानी के इस्तेमाल को लेकर जागरुकता बढ़ने के बाद अब जुलाई में पानी की सप्लाई रोकने का निर्णय लिया गया है।

    पानी की सप्लाई रोकने के दिन को तकनीकी भाषा में डे जीरो कहा जाता है। ‘डे जीरो’ के दौरान नलों में पानी की सप्लाई पूरी तरह बन्द कर दी जाती है।

    इमरजेंसी सेवाएँ देने वाले डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के फ्रेश वाटर मैनेजर क्रिस्टिन कोल्विन कहते हैं कि वह स्थिति भयावह होगी, जब लोग नल की टोटी खोलेंगे और उससे एक बूँद पानी नहीं गिरेगा।

    पता चला है कि पाइप से पानी की सप्लाई करने की जगह केप टाउन प्रशासन शहर में पानी संग्रह के लिये 200 जल संग्रह केन्द्र बनाएगा और सुनिश्चित करेगा कि लोगों को कम-से-कम 25 लीटर पानी मिले।

    मीडिया रपटों के अनुसार, फिलहाल केप टाउन का स्थानीय प्रशासन प्रति व्यक्ति रोज 50 लीटर पानी मुहैया करा रहा है। पानी के साथ ही कई तरह की हिदायतें भी दी जा रही हैं, ताकि पानी का बेहतर तरीके से इस्तेमाल किया जाये।

    प्रशासन की तरफ से जारी दिशा-निर्देश में कहा गया है कि 50 लीटर पानी में से 10 लीटर कपड़े की सफाई के लिये 10 लीटर पानी नहाने के लिये, 9 लीटर बाथरूम में डालने के लिये, 2 लीटर मुँह व हाथ धोने के लिये, 1 लीटर घरेलू जानवरों के लिये, 5 लीटर घर की सफाई, 1 लीटर खाना बनाने के लिये, 3 लीटर पीने के लिये और बाकी पानी भोजन पकाने से पहले धोने के लिये इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

    इस जल संकट ने कुछ लोगों को बचा-बचाकर पानी इस्तेमाल करने का हुनर सिखा दिया है।

    सीएनएन की एक रिपोर्ट के अनुसार, केप टाउन में छुट्टियाँ मना रहे यूके निवासी ए. कोय आलू उबालने के बाद बचे हुए पानी को सम्भालकर रखते हैं ताकि दूसरी जगह उसका इस्तेमाल किया जा सके। कई स्थानीय निवासी पानी का कई बार इस्तेमाल कर रहे हैं।

    स्थानीय निवासी एनी वर्विस्त ने सीएनएन को बताया कि वह नल का पानी हाथ धोने में प्रयोग करती हैं और उसी पानी को पौधे में डालती हैं। नल का पानी बिल्कुल भी पीने लायक नहीं है।वर्विस्त बताती हैं, ‘हालांकि वे (प्रशासन) कहते हैं कि पानी ठीक है, लेकिन बच्चे पानी पीने के बाद पेट में दर्द की शिकायत करते हैं।’

    वर्विस्त समेत अन्य लोग न्यूलैंड्स स्प्रिंग से पानी लाते हैं। स्थानीय निवासी बताते हैं कि नल के पानी का स्वाद अजीब है, जिस कारण वह स्प्रिंग के पानी को तरजीह देते हैं।

    चूँकि स्प्रिंग पानी का नया स्रोत बन गया है, इसलिये यहाँ भी लोगों की खूब भीड़ हो रही है। भीड़ को देखते हुए प्रशासन के पदाधिकारियों की वहाँ तैनाती की गई है, जो कतारों को व्यवस्थित कर रखते हैं ताकि झड़प की नौबत न आये।

    केप टाउन प्रशासन अगले महीने तक स्प्रिंग की धार को स्वीमिंग पुल की तरफ मोड़ने की योजना बना रहा है, ताकि लोगों को तुरन्त पानी मिल जाये।

    हालांकि, मीडिया रिपोर्ट यह भी बता रही है कि इस संकट की घड़ी में कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो पानी को बचाने के लिये कोई जतन नहीं कर रहे हैं।

    केपटाउन के मेयर पैट्रिक डी लिली ने सीएनएन को बताया कि जलसंकट से जूझने के बावजूद यहाँ के निवासियों ने पानी का बेहताशा इस्तेमाल करना नहीं छोड़ा है। अभी भी यहाँ 86 मिलियन लीटर पानी का इस्तेमाल हो रहा है, जो लक्ष्य से अधिक है।

    पैट्रिक डी लिली ने आगे कहा, ‘यह अविश्वसनीय है कि ज्यादातर लोग अब भी पानी को लेकर संजीदा नहीं हैं और वे हमें डे जीरो की ओर धकेल रहे हैं।

    जल संकट की सम्भावित वजहें


    विश्व के आकर्षक शहरों में एक केप टाउन इन दिनों जलसंकट से जूझ रहा है, तो सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्या हो गया कि यह नौबत आ गई।

    सीएनएन के अनुसार, सदी के सबसे प्रभावशाली सूखे ने केप टाउन को अपनी जद में ले लिया है, जिससे जलसंकट बढ़ गया है। वहीं, यहाँ की जनसंख्या 40 लाख पर पहुँच गई है और दिनोंदिन बढ़ती ही जा रही है। इन दो वजहों के अलावा तीसरी बड़ी वजह जलवायु परिवर्तन है।

    केप टाउन शहर पर जल संकट का खतरा मँडरा रहा हैनेशनल जियोग्राफिक की रिपोर्ट में बताया गया है कि केप टाउन की जमीन पहाड़ी है जो गर्म समुद्री पानी से होकर आने वाली हवाओं को रोकती है। इससे बारिश होती है। बारिश ही नदियों को पानीदार बनाता है और भूजल स्तर को बरकरार रखता है।

    यहाँ स्वीमिंग पूल और आलीशान होटल गुलजार हैं, जहाँ पानी का खूब इस्तेमाल होता है।

    नेशनल जियोग्राफिक की उक्त रिपोर्ट के अनुसार पिछले दो दशकों में केप टाउन में पानी बचाने के लिये कई सराहनीय कदम उठाए गए और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी सराहना भी की गई।

    लेकिन, कुछ गलतियाँ भी हुईं। केप टाउन के प्रशासन को लगा कि यहाँ बारिश उसी तरह होगी, जिस तरह पूर्व में हुआ करती थी। प्रशासन ने पुरानी समस्याओं को सुलझा लिया, लेकिन आने वाली दिक्कतों पर ध्यान नहीं दिया, जिसका परिणाम आज देखने को मिल रहा है।

    बारिश नहीं होने के कारण रिजर्वायर का जलस्तर तेजी से गिरने लगा, जिससे आज केप टाउन जलसंकट के चक्रव्यूह में बुरी तरह घिर चुका है।

    द गार्जियन में आई एक रिपोर्ट में कहा गया है कि एक दशक पहले केप टाउन को आगाह किया गया था कि बढ़ती आबादी व जलवायु परिवर्तन की वजह से मौसम गर्म होगा और सर्दियों में बारिश औसत से कम हो जाएगी। इससे जलस्रोतों में पानी की कमी हो जाएगी।

    इस गम्भीर चेतावनी की पूरी तरह अनदेखी कर दी गई।

    बताया जाता है कि केप टाउन में पानी की सप्लाई पास के रिजर्वायर से होती है। पिछले कुछ सालों में देखा जा रहा है कि रिजर्वायर का जलस्तर काफी नीचे चला गया है, लेकिन एहतियाती कदम नहीं उठाया गया।

    पलायन शुरू, आर्थिक संकट बढ़ने का अन्देशा


    केप टाउन में जलसंकट से लोगों में खौफ भी बढ़ गया है। लोगों को लग रहा है कि डे जीरो उन्हें बूँद-बूँद के लिये तरसने को विवश कर देगा, इसलिये मुश्किल भरे दिन आये, इससे पहले लोग केप टाउन छोड़ देना चाहते हैं। जिनके पास पैसा और संसाधन है, वे केप टाउन छोड़ भी रहे हैं।

    सीएनएन ने एक स्थानीय व्यक्ति के हवाले से लिखा है कि जो लोग समर्थ हैं, वे केप टाउन से बाहर जा रहे हैं। असल में ऐसा करने के पीछे एक विचार यह भी है कि इससे शहर पर बोझ कुछ कम हो जाएगा। हाँ, जिनके पास पैसे नहीं हैं, वे यहीं रहने को विवश हैं।

    बताया जा रहा है कि केप टाउन में अब बोतलबन्द पानी की भी किल्लत होने लगी है। जिन स्टोरों में बोतलबन्द पानी मिलता है, उनका स्टॉक तुरन्त खत्म हो जा रहा है।

    लोग स्टोर खुलने से पहले ही कतारों में लग जाते हैं ताकि बोतलबन्द पानी खरीदकर पी सकें।

    स्थानीय लोगों का कहना है कि ऐसी स्थिति केप टाउन में पहले कभी नहीं देखी गई और यह आने वाली भयावहता का मजबूत संकेत है।

    मीडिया रपटों में प्रशासन के हवाले से कहा जा रहा है कि डे जीरो के कारण आर्थिक बोझ बढ़ सकता है। द गार्जियन ने डिप्टी मेयर के हवाले से लिखा है कि शहर का बजट 40 बिलियन रियाद है। ऐसे में डे जीरो लागू करने से आर्थिक मोर्चे पर दिक्कत आ सकती है।

    डिप्टी मेयर ने द गार्जियन को बताया है कि उनके लिये बड़ी चिन्ता यह है कि कहीं यहाँ की अर्थव्यवस्था औंधे मुँह न गिर जाये।

    डिप्टी मेयर के अनुसार अर्थव्यवस्था पर असर का संकेत दिख रहा है, लेकिन यह किस पैमाने पर असर डालेगा, वह इस पर निर्भर है कि संकट कब तक जारी रहता है।

    दूसरे शहरों में भी हो सकती है पानी की किल्लत


    केपटाउन में गहराया जल संकट केवल वहीं तक महदूद रहेगा, ऐसा मानना बेवकूफी है। केप टाउन के अलावा भी कई ऐसे शहर हैं, जहाँ आज नहीं तो कल पानी की किल्लत बढ़ेगी।

    कई शहरों में इसके संकेत दिखने भी लगे हैं। करीब दो करोड़ की आबादी वाले मैक्सिको शहर में दिन में एक नीयत वक्त पर ही पानी आता है। वहीं जिनके घरों में नल लगा है, उनके नलों में हफ्ते में कुछ घंटों लिये ही पानी की सप्लाई होती है।

    मेलबॉर्न प्रशासन ने पिछले साल कहा था कि एक दशक के बाद शहर में पानी की कमी हो जाएगी।

    जकार्ता भी जलसंकट से जूझ रहा है।


    नेशनल जियोग्राफिक की रिपोर्ट बताती है कि केप टाउन की तरह ही ब्राजील के साओ पालो में भी रिजर्वायर का जलस्तर नीचे जा रहा है।

    वर्ष 2015 में साओ पालो के रिजर्वायर का जलस्तर इतना नीचे चला गया था कि पाइप से मिट्टी निकलने लगी थी।

    पानी की किल्लत के मद्देनजर पानी का ट्रक भेजा गया था जिसकी लूट हो गई थी। वहाँ स्थिति भयावहता की ओर जा रही थी, लेकिन गनीमत थी कि अचानक बारिश हो गई।

    इन शहरों के अलावा लॉस एंजेलिस (अमेरिका), कराची (पाकिस्तान), नैरोबी (केन्या), ब्रिसबेन (ऑस्ट्रेलिया) समेत करीब दो दर्जन शहरों में जलसंकट का खतरा मँडरा रहा है।

    क्या है समाधान


    हालांकि मौजूदा संकट का समाधान तो बचा-बचाकर पानी के इस्तेमाल में ही है, लेकिन भविष्य में इस तरह की समस्याओं से दो-चार न होना पड़े, इसके लिये कुछ कदम जरूर उठाए जाने चाहिए।

    सबसे पहले तो पानी के बेतहाशा इस्तेमाल को रोकने की जरूरत है, ताकि पानी की बर्बादी न हो। दीर्घावधि समाधान के लिये समुद्री जल से नमक हटाने वाले प्लांट लगाने होंगे।

    हालांकि, प्लांट लगाने में अच्छी खासी पूँजी लगेगी और सम्भवतः इसी वजह से केप टाउन में अब तक ऐसा प्लांट स्थापित नहीं हो सका।

    दूसरी बात यह है कि प्रशासन के लोग यह भी मानते हैं कि बारिश अगर सामान्य होने लगी, तो यह प्लांट की कोई उपयोगिता नहीं रहेगी और उल्टे रख-रखाव पर लाखों रुपए खर्च हो जाएँगे।

    लेकिन, मौसम की अनिश्चितता को देखते हुए इस तरह की व्यवस्था जरूरी हो गई है। इसके अलावा भूजल स्तर को बरकरार रखने के लिये भी पहलकदमी करनी होगी।

    केप टाउन का जलसंकट भारत के लिये भी सबक है, क्योंकि यहाँ भी कई क्षेत्रों में हाल के वर्षों में सूखे का कहर बरपा है।

    यहाँ भी पानी की बेतहाशा बर्बादी हो रही है। अगर इसी तरह पानी की बर्बादी होती रही, तो वह दिन दूर नहीं जब भारत में भी कई केप टाउन तैयार हो जाएँगे।

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    युद्ध और शान्ति के बीच जल - भाग दो

    RuralWaterFri, 03/23/2018 - 14:38

    (प्रख्यात पानी कार्यकर्ता राजेन्द्र सिंह के वैश्विक जल अनुभवों पर आधारित एक शृंखला)

    सीरिया, दुष्काल के चंगुल में


    जल संकटजल संकट20 से 25 अक्टूबर, 2015 को टर्की के अंकारा में संयुक्त राष्ट्र संघ का एक सम्मेलन था। यह सम्मेलन, रेगिस्तान भूमि के फैलते दायरे को नियंत्रित करने पर राय-मशविरे के लिये बुलाया गया था। चूँकि, अलवर, राजस्थान के ग्रामीणों के साथ मिलकर तरुण भारत संघ इस विषय में कुछ सफल कर पाया है; लिहाजा, मुझे वहाँ की नोट स्पीकर के तौर पर आमंत्रित किया गया था।मेरे भाषण के बाद सीरिया के एक वरिष्ठ अधिकारी मेरे पास आये और बोले - ''आपकी बात मेरे दिल के करीब है। किन्तु आपने अपने भाषण में सीरिया का नाम नहीं लिया। मैं चाहता हूँ कि आप मेरे देश आएँ।''

    मैं तो दुनिया की धरती और पानी देखने ही निकला था। मैंने हाँ कर दी।

    दुनिया के नक्शे के हिसाब से सीरिया दुनिया के मध्य-पूर्व में स्थित है। सीरिया की एक सीमा पर लेबनान, पूर्व में इराक, पश्चिम में मध्यान्ह सागर, उत्तर में टर्की, दक्षिण में जाॅर्डन और दक्षिण-पूर्व में इसराइल देश है। अब आप देखिए कि सीरिया की सभ्यता और खेती कितनी पुरानी है! सीरिया, सदियों से कृषि प्रधान राष्ट्र रहा है। आज सीरिया, अपने ही... खासकर खेतिहर नागरिकों से खाली होता देश है।

    आज की बात करें तो सीरिया आज पश्चिमी एशिया में स्थित एक ऐसे देश के रूप में जाना जाता है, जो लम्बे समय से गृह युद्ध में फँसा हुआ है। पिछले साढ़े चार सालों के सैन्य युद्ध में सीरिया के तकरीबन ढाई लाख लोग मारे जा चुके हैं। मुझे बताया गया कि एक करोड़ से ज्यादा लोग दर-बदर हो गए हैं। इस दर-बदर आबादी में से मात्र 10 प्रतिशत यानी करीब 10 लाख लोगों को ही यूरोप आदि देशों में सुरक्षित शरण मिल पाई है। मैंने यह समझने की कोशिश की कि यह क्यों हुआ? लोग उजड़े तो उजड़े क्यों?

    सामान्य तौर पर बताया जाता है कि सीरिया में उपद्रव की शुरुआत मार्च, 2011 में एक लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शन से हुई थी। सुरक्षा बलों द्वारा प्रदर्शनकारियों पर दागी गोलियों से हुईं मौतों को लेकर भड़के लोगों ने सीरिया के राष्ट्रपति के इस्तीफे की माँग को लेकर देशव्यापी प्रदर्शन किया था। उसी प्रदर्शन को दबाने की कोशिशें, सीरिया को गृह युद्ध के हालात में घसीट लाई। मीडिया में तो यही प्रोजेक्ट किया गया कि सीरिया से लोगों के पलायन का मूल कारण, गृह युद्ध के हालात हैं।

    सीरिया के गृह युद्ध को आज शिया-सुन्नी मुद्दे रूप दे दिया गया है। लेकिन मैं आपको बताऊँ कि सीरिया के नागरिकों के व्यापक विस्थापन की सबसे पहली और बुनियादी वजह यह नहीं है; बुनियादी वजह है - पानी की कमी। पानी की भयानक कमी की वजह से सीरिया के गाँवों के लोग उजड़कर, सीरिया के नगरों में आये; दूसरे देशों में गए। सीरिया के गाँवों में आये संकट ने नगरों में अफरा-तफरी मचा दी। इससे गृह युद्ध के हालात बने।

    यही सच्चाई है। आप देखिए कि आज, सीरिया की करीब 70 प्रतिशत आबादी पीने के पानी की कमी से जूझ रही है। जब पीने को पानी ही पर्याप्त नहीं, तो खेती कहाँ से हो? आज, सीरिया के करीब 20 लाख से ज्यादा लोग अपनी भूख का इन्तजाम नहीं कर पा रहे हैं। लगभग इतने ही यानी सीरिया में करीब 20 लाख बच्चे ऐसे हैं, जो स्कूल से बाहर हैं। हर पाँच में से चौथा आदमी, गरीब है। 15 अलग-अलग जगह विस्थापित लोगों में से चार लाख तो ऐसे हैं कि जो जीवन सुरक्षा के बुनियादी साधनों से महरूम हैं। यह सब क्यों हुआ? पानी की कमी की वजह से ही तो। विस्थापन की असली वजह यह है।

    आप समझ लें कि पलायन और विस्थापन.. दो अलग-अलग स्थितियाँ होती हैं। पलायन होता है कि आप कमाने अथवा किसी अन्य मकसद से अपने मूल स्थान से दूसरे स्थान पर चले जरूर जाते हैं, लेकिन आपका अपने मूल स्थान पर आना-जाना बना रहता है। विस्थापन - वह स्थिति है कि जब पूरा परिवार का परिवार ही अपनी जड़ों से उजड़ जाएँ। जड़ों के प्रति संवेदनहीनता भी कभी-कभी विस्थापन कराती है, किन्तु विस्थापन अक्सर मजबूरी में ही होता है अथवा जबरन किया गया अथवा कराया गया होता है। इसीलिये बाँधों के निर्माण के कारण उजड़ने को विस्थापन कहते हैं, पलायन नहीं। सीरिया से विस्थापन हुआ।

    आपने जानने की कोशिश की कि सीरिया में पानी की भयानक कमी का क्या कारण है?
    हाँ, मैंने जानने की कोशिश की। मुझे वहाँ इफरेटिस (Euphrates) नदी को देखने को कहा गया। इफरेटिस को सीरिया में 'ददाद' कहते हैं। इफरेटिस- पश्चिम एशिया की सबसे लम्बी नदी है। मेसोपोटामिया सभ्यता से सम्बद्ध होने के कारण, यह एक ऐतिहासिक महत्त्व की नदी भी है। मैंने, इफरेटिस के टर्की स्थित स्रोत से यात्रा शुरू की। देखा कि टर्की ने इफरेटिस नदी पर अतातुर्क नाम का एक बहुत बड़ा बाँध बनाया है। इस बाँध ने इफरेटिस के पानी को पूरी तरह बाँध रखा था। अतातुर्क बाँध के आगे इफरेटिस नदी, एक तरह से खत्म ही दिखाई दी।

    मुझे बताया गया कि सीरिया के बहुत बड़ी आबादी को अपनी खेती, मछली और रोजमर्रा की जरूरत के पानी के लिये, सदियों से इफरेटिस नदी का ही सहारा रहा है। मैंने खेत देखे; लोगों से बातचीत की तो पता चला कि नदी क्या बँधी, नदी किनारे के सीरियाई भू-भाग की खेती भी उजड़ी और लोग भी। हजार-दो हजार नहीं, लाखों की आबादी उजड़ी। उजड़ने वाले बगदाद गए; लेबनान गए; फिर ग्रीस, ग्रीस से टर्की गए।

    टर्की से होते हुए जर्मनी, यू के, स्वीडन, नीदरलैंड, आॅस्ट्रिया, बेल्जियम और यूरोप के देशों तक पहुँचे। अकेले जर्मनी में पहुँचे विस्थापितों की संख्या करीब साढ़े 12 लाख हैं, फ्रांस और यू के में पाँच-पाँच लाख। स्वीडन में चार लाख तो बेल्जियम में ढाई लाख के करीब लोग आये हैं। आॅस्टिया में पहुँचने वालों की संख्या भी लाखों में है और यूरोप के 20 देशों में तो एक बहुत बड़ी आबादी पहुँची है। एक देश से उजड़कर बसने वालों की तादाद पूरी दुनिया में तेजी से बढ़ रही है।

    गौर करने की बात है कि विस्थापित आबादी, सबसे ज्यादा यूरोप के नगरों में ही पहुँची है। इससे नगरों में बेचैनी बढ़ी है। मैंने जब पता किया कि विस्थापितों के एक स्थान से दूसरे स्थान भटकने के क्या कारण हैं? तो पता चला कि स्थानीय नागरिकों से तालमेल न बैठ पाना अथवा भूख का इन्तजाम न हो पाना तो था ही; रिफ्यूजी का दर्जा मिलने में होने वाली देरी और मुश्किल भी इसका एक प्रमुख कारण था।

    क्या आपको किसी विस्थापित परिवार से मिलने का मौका मिला?
    दिक्कत तो जरूर हुई, लेकिन हालात को समझने के लिये पिछले कुछ समय से मैं खुद चार विस्थापित परिवारों को लगातार ट्रैक कर रहा हूँ। खलील, अलाह, अहमद और यामीन। खलील और यामीन - फिलहाल, यूके डालटिंगटाॅन में हैं। अलाह और अहमद - यूके के टस्काॅन में हैं। इन चारों के परिवारों को तीन साल बाद रिफ्यूजी घोषित किया गया था।

    खलील - सीरिया के बास्ते अही बियर कस्बे से आया है। खलील के विस्थापन से पूर्व, उसके कस्बे की आबादी एक लाख से ज्यादा थी; अब वहाँ 7000 ही बचे हैं। खलील के साथ-साथ इसके सात भाई और तीन बहनों को भी उजड़ना पड़ा। सारा परिवार बिखर गया। आइमान - जर्मनी में, कासिम, सलीम और सेमल - लेबनान में, जलाल - नार्वे में तो खलील और यामीन - यूके में हैं। 65 वर्ष की बहन इवा - सीरिया में पड़ी है। 54 साल की फातिमा और 44 साल की इमान तथा इनके परिवार लेबनान में हैं।

    इस परिवार को सामने रखकर आप कल्पना कीजिए कि उजड़ने का दर्द कितना बड़ा और अपूर्णनीय हो सकता है। क्या कोई मदद... कितना ही बड़ा मुआवजा इस दर्द की भरपाई कर सकता है? नहीं। पहली बार जब मैं खलील से मिला तो उसके परिवार के भटकने की कहानी सुनकर और उनके रहन-सहन के हालात देखकर मेरी खुद की आँखें नम हो गईं। खलील ने बताया कि अपने कस्बे से उजड़कर जब लेबनान पहुँचा तो कैसे वहाँ उसकी पत्नी इका, दो बेटे और एक बेटी.. सभी बीमार पड़ गए थे; कैसे उनका मरने जैसा हाल हो गया था। लोग, उससे और उसके परिवार से नफरत करते थे। इसलिये उसे लेबनान छोड़ना पड़ा।

    2017 में रिफ्यूजी घोषित होने के बाद से खलील और उसका परिवार यूके डालटिंगटाॅन में है। पता चला कि सुसी और सेक नामक दम्पत्ति ने यहाँ इनकी बहुत सेवा की है। अब वह वहाँ सुमाखा काॅलेज में सब्जियाँ बेचने उगाने का काम करता है। चार दिन पहले मिला, तो गले मिलकर खुशी से नाचने लगा।

    अहमद - यामीन का बेटा है। यामीन, सीरिया की राजधानी का रहने वाला है। वहाँ से उजड़ने के बाद अब यूके डालटिंगटाॅन में है। वहीं पर नौवीं कक्षा में पढ़ता है।

    अलाह - दोराह का रहने वाला है। अलाह को 2014 में ही घर छोड़ना पड़ा। पहले वह लेबनान गया; फिर करीब डेढ़ साल तुर्की में रहा। मल्टी बेस अपरलैंड में रहने के बाद अलाह करीब पाँच महीने तक डोम्सडोनिया में रहा। फिर फ्रांस के कैलेट शहर के जांगल में तीन दिन रहने के बाद अब वह टस्काॅन में है।

    यामीन भी टस्काॅन में है। मैं आपको किस-किस के उजाड़ की कहानी बताऊँ? उजड़ने वाले परिवारों से मिलिए तो एहसास होता है कि पानी, भगवान का दिया कितना महत्त्वपूर्ण उपहार है! हमारी हवस और नासमझ करतूतों के कारण हमने पानी को उजाड़ और युद्ध का औजार बना दिया है। पानी, प्रकृति की अनोखी नियामत है। कोई इसे अपना निजी कैसे बता सकता है? अन्याय होगा तो तनाव और अशान्ति होगी ही।

    अब देखिए कि सीरिया और इराक के हक का पानी न देने वाले टर्की का क्या हाल है।

     

    इफरेटिस नदी पर कुछ अतिरिक्त जानकारी


    इफरेटिस नदी को ग्रीक सभ्यता के समय की मूल पर्सियन भाषा में उफरातू (Ufratu) नाम से पुकारा जाता था। इसे, सुमेरी भाषा में बुरान्नुआ (Buranuna) अक्काडी में पुरात्तु (Purattu) अरबी में अल-फुरत  (Al Furat) हैं। इफरेटिस नदी को टर्की में फिरात (Firat) था सीरिया (Euphrates) पेरात (Perat) से सम्बोधित किया जाता है। अरमीनियाई उच्चारण - येपरात (Yeprat) है।


    इफरेटिस - पश्चिम टर्की से उत्पन्न होती है। वह इसके बाद सीरिया और इराक से गुजरती है। करीब 145 से 195 किलोमीटर लम्बा शत्त अल अरब, इफरेटिस और टिगरिस नदी को पर्सियन गल्फ से मिलाता है। इफरेटिस नदी 3000 किलोमीटर की अपनी विशाल यात्रा में टर्की के 1230 किलोमीटर, सीरिया के 710 किलोमीटर और इराक के 1060 किलोमीटर लम्बे भू-भाग से होकर गुजरती है। इफरेटिस का जलग्रहण कितना विशाल है, इसका अन्दाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि इसके बेसिन में टर्की, सीरिया और इराक के अलावा सउदी अरब, कुवैत और ईरान भी आते हैं। वर्षा और ग्लेशियर पर आधारित होने के कारण विशेषकर अप्रैल से मई के बीच इफरेटिस में पानी बढ़ जाता है। सजुर, बालिख और खबर - सीरिया की तीन ऐसी नदियाँ हैं, जो इफरेटिस में मिलती हैं। कारा सु और मूरत नामक नदियाँ भी इफरेटिस की सहायक धाराएँ हैं।


    इफरेटिस के यात्रा भू-भाग में पहाड़ भी हैं, मरुस्थल भी, ओक के जंगल भी, चारागाह भी तो खेती की समृद्ध भूमि भी। आपको जानकर खुशी होगी कि इफरेटिस नदी में मछलियों की करीब 34 प्रजातियों का खजाना रहता है।


    इस नदी पर कई बाँध-बैराज हैं - इराक के हिंदिया बाँध, हादिथा बाँध और रामादी बैराज। इराक अपनी कई नहरों और झीलों के लिये इफरेटिस से ही पानी लेता है। सीरिया का तबका बाँध 1973 में बनकर पूरा हुआ। इसके बाद इफरेटिस नदी पर क्रमशः बांथ बाँध और तिशरिन नामक दो बाँध तथा इसकी सहायक धाराओं और उपधाराओं पर तीन छोटे बाँध बनाए। इफरेटिस पर टर्की का पहला बाँध - केबन बाँध 1974 में पूरा हुआ। दक्षिण-पश्चिम अंतोलिया परियोजना - टर्की द्वारा इफरेटिस और टिगरिस नदी बेसिन में करीब 22 बाँध बनाकर, 19 जलविद्युत परियोजनाओं को चलाने और करीब 17 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को सिंचित करने तथा पेयजल उपलब्ध कराने की योजना है। इस परियोजना के तहत टर्की ने अतातुर्क नामक एक ऐसा बाँध बनाया है, जो इफरेटिस में पीछे से आने वाले सारे पानी को रोकने की क्षमता रखता है। अतातुर्क बाँध की ऊँचाई - 184 मीटर और लम्बाई 1,820 मीटर बताई गई है।


    अब देखिए कि इन बाँध, बैराजों ने मिलकर क्या किया? इफरेटिस के प्रवाह में 1970 में सीरिया और टर्की में बाँध निर्माण का कार्य शुरू होने के बाद से नाटकीय परिवर्तन आया। 1990 से पहले हिट नामक स्थान पर अधिकतम प्रवाह मात्रा जहाँ 7,510 क्युबिक मीटर प्रति सेकेंड थी, 1990 के बाद यह मात्र 2,514 क्यूबिक मीटर प्रति सेकेंड पाई गई; जबकि न्यूनतम प्रवाह मात्रा 55 क्यूबिक मीटर प्रति सेकेंड से घटने की बजाय, बढ़कर 58 क्यूबिक मीटर प्रति सेकेंड हुई है। गौर करने की बात है कि 1990 के बाद हिट नामक स्थान पर इफरेटिस के सामान्य प्रवाह में भी 356 क्यूबिक मीटर प्रति सेकेंड प्रतिवर्ष की गिरावट दर्ज हुई है। इसी तरह बाँध-बैराजों ने टिगरिस नदी के प्रवाह को भी दुष्प्रभावित किया।


    विकिपीडिया पर दर्ज वर्ष 2016 का आँकड़ा यह है कि टर्की की दक्षिण-पश्चिम अंतोलिया परियोजना की वजह से 382 गाँवों के दो लाख लोग विस्थापित हुए। सबसे अधिक करीब 55, 300 लोगों का विस्थापन, अकेले अतातुर्क बाँध की वजह से हुआ। असाद झील में आई बाढ़ के कारण करीब 4000 हजार परिवारों को जबरन हटाया गया। सर्वे बताता है कि विस्थापित लोगों में से अधिकांश को न तो पर्याप्त मुआवजा मिला और न ही कोई स्थायी ठिकाना।


    टर्की ने वर्ष 1984 में सीरिया को यह घोषणा की थी कि वह सीरिया के लिये इफरेटिस नदी में कम-से-कम 500 क्यूबिक मीटर प्रति सेकेंड अथवा 16 क्यूबिक किलोमीटर प्रति वर्ष की दर से पानी छोड़ेगा। 1987 में दोनो देशों के बीच संधि भी हुई। 1987 में सीरिया और इराक के बीच भी संधि हुई। उसके अनुसार, सीरिया को टर्की द्वारा छोड़े कुल पानी 60 प्रतिशत इराक में जाने देना था। जल बँटवारे को लेकर 2008 में एक संयुक्त त्रिदेशीय समिति बनी। 03 सितम्बर, 2009 को तीनों देशों के बीच पुनः सहमति हुई। लेकिन टर्की ने मूल नदी जल बँटवारा संधि (1987) का उल्लंघन करते हुए 15 अप्रैल, 2014 के बाद से इफरेटिस नदी के प्रवाह में कटौती करनी शुरू की और अपनी दादागीरी जारी रखते हुए 16 मई, 2014 को सीरिया और इराक के हिस्से का पानी छोड़ना पूरी तरह बन्द कर दिया।)

     

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    युद्ध और शान्ति के बीच जल

    युद्ध और शान्ति के बीच जल - भाग तीन

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    बजट में खेतीबाड़ी पर फोकस किसानों में आयेगी खुशहालीHindiFri, 03/23/2018 - 14:52

    Source
    अमर उजाला, 23 मार्च 2018

    उत्तराखण्ड के बजट में कृषि और पानी पर भी ध्यान दिया गयाउत्तराखण्ड के बजट में कृषि और पानी पर भी ध्यान दिया गयापाँच वर्षों के भीतर किसानों की आय दोगुनी करने के लिये सरकार ने आम बजट में कृषि और औद्यानिकी क्षेत्र पर फोकस किया है। प्रदेश के किसानों की तरक्की और कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिये बजट में नई योजनाओं की घोषणा की गई। उत्तराखंड को ऑर्गेनिक और हर्बल स्टेट बनाने के लिये 1500 करोड़ का प्रावधान किया गया। साथ ही कृषि के लिये 966.68 करोड़ एवं औद्यानिकी के लिये 311.23 करोड़ का अनुमानित बजट का प्रावधान सरकार ने किया है।पर्वतीय क्षेत्रों में ‘पर ड्रॉप-मोर क्रॉप’ के तहत किसानों को बेहतर सिंचाई की सुविधा दी जायेगी। इसके लिये बजट में 20 करोड़ की व्यवस्था की गई।

    2022 तक किसानों की आय डबल करने के लक्ष्य को पूरा करने के लिये सरकार ने वर्ष 2018-19 के बजट में खेती-बाड़ी को प्राथमिकता दी है। पहाड़ों में परती, बंजर भूमि, ग्राम पंचायतों की भूमि पर कृषिकरण कर किसानों की आमदनी बढ़ाने पर जोर है। पर्वतीय क्षेत्रों के 700 हेक्टेयर क्षेत्र में परम्परागत फसलों मंडुवा, सावां, गहथ, काला भट्ट, धान, मक्का, गेहूँ और मसूर आदि फसल के बीजों का उत्पादन करने कार्यक्रम चलेगा। साथ ही एकीकृत आदर्श कृषि ग्राम योजना के तहत प्रत्येक विकासखंड में एक गाँव को गोद लेकर मॉडल विलेज के रूप में विकसित किया जायेगा। कलस्टर आधारित योजना में चयनित गाँवों में कृषि, उद्यान, सब्जी, जड़ी-बूटी, पशुपालन, मशरूम पालन, मधुमक्खी पालन, डेरी रेशम, फल संरक्षण, प्रोसेसिंग कलेक्शन सेंटर आदि योजनाओं पर काम होगा।

    पशुपालन और मत्स्य पालन पर जोर


    सरकार ने बजट में पशुपालन व मत्स्य पालन के माध्यम से किसानों की आय बढ़ाने का फोकस किया है। पशुधन की क्षति-पूर्ति के लिये सरकार ने ‘पशुधन बीमा योजना’ शुरू की है। जिसमें एक पशुपालक के पाँच पशुओं या 50 छोटे पशुओं का बीमा किया जा रहा है। प्रदेश में इस वर्ष 12654 पशुओं का बीमा किया गया। डेयरी विभाग की ओर से ग्राम स्तर पर गठित 4060 दुग्ध सहकारी समितियों के 51750 दुग्ध उत्पादक सदस्यों द्वारा 180271 लीटर प्रतिदिन दुग्ध उत्पादन किया जा रहा है। जिसमें 46.87 लाख का दुग्ध मूल्य भुगतान प्रतिदिन हो रहा है। ‘गंगा गाय महिला डेरी योजना’ के तहत दुग्ध सहकारी समितियों की महिला सदस्यों को गाय खरीदने के लिये सहायता राशि दी जा रही है। बजट में गंगा गाय महिला डेरी योजना के अन्तर्गत 2000 महिला दुग्ध उत्पादकों को लाभान्वित करने का प्रावधान किया है।

    बढ़ायेंगे मत्स्य पालकों की आय


    सोलर पावर सपोर्ट सिस्टम की स्थापना कर मत्स्य पालन पर विद्युत पर हो रहे व्यय को कम कर मत्स्य पालकों की आय में वृद्धि दर्ज कराई जायेगी। मत्स्य प्रसंस्करण को विस्तारित करने के लिये वित्त मंत्री प्रकाश मंत्री ने मोबाइल फिश आउटलेट की स्थापना करने का प्रावधान किया है।

    5000 प्राकृतिक जलस्रोतों को दिया जायेगा पुनर्जीवन


    बजट में पेयजल विभाग के लिये 862.84 करोड़ की व्यवस्था की गई है। राज्य सरकार ने 2022 तक 5000 समस्याग्रस्त प्राकृतिक जलस्रोतों को पुनर्जीवित करने और उनकी क्षमता को बढ़ाने का लक्ष्य तय किया है।

    522 बस्तियों का पेयजल सुविधा उपलब्ध कराने की योजना थी। इसमें लक्ष्य के सापेक्ष जनवरी 2018 तक 401 बस्तियों में सुविधा पहुँचा दी गई है, शेष 121 बस्तियों को संतृप्त किये जाने की कार्रवाई गतिमान है। 1334 ग्रामीण पेयजल योजनाओं के जीर्णोद्धार एवं सुदृढ़ीकरण के लक्ष्य के सापेक्ष 1273 योजनाओं के जीर्णोद्धार एवं सुदृढ़ीकरण का कार्य जनवरी 2018 तक पूरा कर लिया गया है और शेष योजनाओं पर काम चल रहा है। नगरीय पेयजल के अन्तर्गत 35 योजनाओं के सापेक्ष जनवरी 2018 तक 25 नगरीय पेयजल योजनाएँ और चार जलोत्सारण योजनाएँ पूरी कर ली गई हैं।

    कृषिविश्व बैंक, केन्द्र सरकार और राज्य सरकार के बीच लगभग 975 करोड़ की योजना का अनुबन्ध हो चुका है और डीपीआर बनाई जा रही है। सभी नगरीय क्षेत्रों को सीवरेज से जोड़ने आच्छादित किये जाने के प्रयासों के अन्तर्गत हरिद्वार, ऋषिकेश, तपोवन, मसूरी एवं देहरादून में जलोत्सारण सुविधा के पूर्ण आच्छादन हेतु लगभग 840.00 करोड़ का प्रस्ताव केन्द्र सरकार को भेजा गया, जिस पर जर्मनी की वित्तीय संस्था केएफडब्ल्यू से हरिद्वार, ऋषिकेश और तपोवन के लिये वित्त पोषण की सहमति बन गई है।

    सिंचाई विभाग के लिये प्रावधान


    1. सिंचाई विभाग के अन्तर्गत सौंग बाँध परियोजना के लिये 40 करोड़ की व्यवस्था।
    2. नैनीताल झील के पुनर्जीवीकरण के लिये पाँच करोड़ की व्यवस्था
    3. हरिद्वार और उत्तरकाशी में फ्लोड जोनिंग के लिये दो करोड़ की व्यवस्था
    4. केन्द्र से 1 हजार करोड़ की बाह्य सहायतित परियोजनाओं पर शीघ्र स्वीकृति सम्भावित

    नये जलाशयों का होगा निर्माण


    सिंचाई विभाग प्रदेश में नये जलाशयों का निर्माण कर पेयजल की समस्या का समाधान करेगा। नाबार्ड की योजना के अन्तर्गत प्रदेश में सूर्यधार, कोलीढेक और थरकोट में जलाशयों के निर्माण की स्वीकृति प्राप्त हो चुकी है। इससे जल संरक्षण और भूमिगत जलस्तर को नीचे जाने से रोकने में मदद मिलेगी। इस बात का उल्लेख प्रदेश के वित्त मंत्री प्रकाश पंत ने बजट भाषण में किया। उन्होंने जलागम, सिंचाई, लघु सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण के लिये बजट में 520.29 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में कहा कि कोसी नदी पर बैराज के निर्माण से अल्मोड़ा शहर में पेयजल सम्बन्धी समस्या का समाधान हो चुका है। मुख्यमंत्री के निर्देश पर गैरसैंण में झील का निर्माण किया जा रहा है। नैनीताल झील के साथ-साथ प्रदेश की अन्य नदियों और झीलों का पुनर्जीवीकरण किया जायेगा। उन्होंने कहा कि जलागम विभाग के अन्तर्गत ‘प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना-समेकित जलागम प्रबन्ध कार्यक्रम’ के अन्तर्गत 1511 ग्राम पंचायतों के 2992 राजस्व गाँव लाभान्वित हो रहे हैं। इसके साथ ही विश्व बैंक वित्त पोषित उत्तराखंड विकेन्द्रीकृत जलागम विकास परियोजना-2 (ग्राम्या-2) के अन्तर्गत 1055 राजस्व गाँव लाभान्वित हो रहे हैं।

    गाँव का विकास, बजट में खास


    भराड़ीसैण। पर्वतीय क्षेत्रों में स्वरोजगार को बढ़ावा देकर पलायन रोकने के लिये सरकार ने बजट में गाँव के विकास पर फोकस किया है। प्रदेश के 1374 गाँवों को 1000 दिन के भीतर गरीबी मुक्त करने का लक्ष्य है। ग्राम्य विकास के लिये 2293 करोड़ रुपये बजट का प्रावधान किया गया। ग्रामीण महिलाओं की आजीविका बढ़ाने के लिये सघन विकास खण्ड रणनीति बनाई जायेगी। इसके लिया आगामी वित्तीय वर्ष में 106 करोड़ रुपये का बजट लक्ष्य रखा गया। पलायन की समस्या के समाधान के लिये सरकार ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नये अवसर प्रदान करेगी। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत आगामी आठ से 10 वर्षों में महिलाओं को आजीविका बढ़ाने की दिशा में सरकार काम करेगी। 2020 तक हर गाँव को सड़कों से जोड़ने के लिये सरकार ने प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के कार्यों में तेजी लाने को 30 करोड़ बजट का प्रावधान किया। शहरी क्षेत्रों से सटे गाँवों में हर प्रकार की सुविधाएँ देने के लिये श्यामा प्रसाद मुखर्जी रूरबन मिशन योजना में चयनित किया जायेगा। इसके लिये 20 करोड़ प्रस्तावित है। अन्त्योदय मिशन के माध्यम से राज्य के 1374 गाँवों को 2019 तक गरीबी मुक्त घोषित किया जायेगा।

    पहाड़ से मैदान, किसान से मजदूर तक का बजट : सीएम


    “मुझे खुशी है कि वित्तमंत्री ने एक ऐसा ऐतिहासिक और समावेशी बजट पेश किया है, जिसमें पहाड़ से मैदान तक, किसान से मजदूर तक, पर्यटन से पलायन रोकने तक सभी मुद्दों और तबकों का ध्यान रखा गया है। युवाओं को रोजगार देने, स्वरोजगार को बढ़ावा देने और महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण के प्रति हम गम्भीर हैं, इसका स्पष्ट रोडमैप भी बजट में दिखता है।”विधानसभा में पेश बजट पर मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए यह बात कही।

    मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र ने कहा कि पहली बार राज्य के इतिहास में आम जनता की राय और सुझावों को लेकर बजट बनाया गया है। बजट के लिये लोगों की राय लेने के मकसद से ‘आपका बजट’ कार्यक्रम शुरू किया गया, जिसके लिये उत्तरकाशी के गंगनानी में किसानों से लेकर पिथौरागढ़ में महिलाओं से सैकड़ों सुझाव मिले। देहरादून में छात्रों ने सुझाव दिये तो पंतनगर में उद्यमियों की राय जानी गई। सोशल मीडिया और ईमेल के जरिये भी बजट पर लोगों की राय माँगी गई थी। सीएम ने कहा कि जनता ने हमें 2000 से ज्यादा सुझाव बजट बनाने के लिये दिये। इन सुझावों में से अधिकतर सुझावों को बजट में शामिल किया गया है और जो सुझाव शामिल नहीं हो सके उन पर भविष्य में काम किया जायेगा। उन्होंने एक स्वस्थ समावेशी बजट पेश करने के लिये वित्तमंत्री को बधाई भी दी। साथ ही यह भरोसा भी दिलाया कि सरकार बजट में जो भी संकल्प लेकर चल रही है, उसको जमीन पर उतारने का भरसक प्रयास किया जायेगा। बजट के माध्यम से सरकार ने आउटकम बेस्ड परफॉर्मेंस को बढ़ावा दिया है।

    आशा कार्यकरमियों/ए.एन.एम. के लिये दुर्घटना बीमा योजना, सरकारी सार्वजनिक भवनों को दिव्यांगों के लिये सुगम बनाने, कामकाजी महिलाओं के लिये क्रेच योजना को मजबूत करना, जैविक कृषि को प्रोत्साहित करने, कलस्टर आधारित खेती को बढ़ावा देने, हार्टी टूरिज्म जैसी कई योजनाएँ इस बजट में शामिल की गई हैं, जो जनभावना के अनुरूप हैं और राज्य के समग्र विकास में बड़ा योगदान देंगी। बजट के केन्द्र में खेती, किसान, उद्यान, जैविक कृषि, जड़ी-बूटी, कृषि, होम-स्टे जैसे क्षेत्रों को स्थान दिया गया है जो प्रदेश के सर्वांगीण विकास के लिये मील का पत्थर साबित होंगी। बजट में राजकीय विद्यालयों में बुक बैंक, जनपदों में आईसीयू/ट्रॉमा/ब्लड बैंक की स्थापना का प्रावधान स्वागत योग्य है। जनता की भावनाओं के अनुरूप गैरसैंण में प्रथम बार आयोजित पूर्ण बजट सत्र का यह बजट एक नये प्रगतिशील, समृद्ध उत्तराखंड का मार्ग प्रशस्त करेगा।

    700 करोड़ की बागवानी विकास परियोजना दो सत्रों में पूरी होगी


    विश्व बैंक सहायतित 700 करोड़ की एकीकृत बागवानी विकास परियोजना को प्रदेश में दो चरणों में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया। औद्यानिकी फसलों पर पोस्ट हार्वेस्टिंग को कम करने के लिये सरकार कोल्ड चेन योजना को बढ़ावा देगी। इससे किसानों को मार्केटिंग सुविधा के साथ स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा। नर्सरी स्थापना, फल-सब्जी, मसाला, पुष्प उत्पादन के क्षेत्र बढ़ाकर संरक्षित खेती के लिये किसानों को प्रोत्साहित किया जायेगा। उद्यान विभाग के चयनित उद्यानों को सरकार हार्टि टूरिज्म के रूप में विकसित करेगी। पहले चरण में पंडित दीनदयाल उपाध्याय उद्यान चौबटिया व राजकीय उद्यान धनोल्टी को प्रस्ताव तैयार किया गया।

    सगंध पौधों की खेती


    सगंध पौधों की सफल खेती के लिये आगामी वित्त में कलस्टर आधारित सगंध खेती का बजट में प्रावधान किया गया। इससे किसानों की आय बढ़ने के साथ भूमि क्षरण, प्राकृतिक जलस्रोत रिचार्ज होंगे। 800 हेक्टेयर क्षेत्र में सगंध खेती कर 3000 हजार किसानों को जोड़ने का लक्ष्य है। पौड़ी के पीड़ा गाँव में सगंध फार्मिंग का मॉडल एरोमा कलस्टर शुरू किया गया।

    खेती-किसानी के लिये अन्य प्रावधान


    1. मौसम आधारित फसल बीमा योजना में शामिल होंगे व्यावसायिक फसलें
    2. हार्टि टूरिज्म के रूप में विकसित होंगे औद्यानिक उद्यान
    3. 800 हेक्टेयर क्षेत्र में सगंध खेती कर 3000 किसानों को जोड़ने का लक्ष्य
    4. प्रत्येक विकासखण्ड में आईएमए विलेज नाम से विकसित होगा आदर्श गाँव
    5. 3.16 लाख हेक्टेयर बंजर भूमि को खेती-बाड़ी के अधीन लाने का लक्ष्य
    6. आधुनिक कृषि के लिये 300 फार्म मशीनरी बैंक स्थापित होंगे।
    7. गंगा गाय महिला डेरी योजना में 2000 महिला दुग्ध उत्पादकों को मिलेगा लाभ

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    Submitted by Kisanhelp (not verified) on Thu, 04/05/2018 - 23:31

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    अब गन्ना एवं चीनी आयुक्त ने भी माना कि कोरॉजन के प्रयोग से गन्ना किसानों को होगा नुकसानPrimary tabsView(active tab)EditTrackVisitors Submitted by kisanhelp on 5 April, 2018 - 17:45अब गन्ना एवं चीनी आयुक्त ने भी माना कि कोरॉजन के प्रयोग से गन्ना किसानों को होगा नुकसानकिसान हेल्प के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ.आर.के. सिंह ने जो बात 4अक्टूबर 2015 को अपने के किसान जागरूपता अभियान में कही आज वही बात उत्तर प्रदेश के गन्ना एवं चीनी आयुक्त श्री संजय आर. भूसरेड्डी ने कही । डॉ.आर.के. सिंह ने कोराजन को जीवन और जमीन दोनों के लिए घातक बताया था ।उन्होंने कोराजन से होने वाले नुकसान तथा कुछ किसानों के प्रत्यक्ष प्रमाण भी दिय जिन्होंने अपनी जमीन को सुधारने के लिए डॉ.आर.के.सिंह से सलाह ली और कोराजन के दुष्प्रभाव से बचाया । किसान अपनी फसल में कोरॉजन कीटनाशक के प्रयोग से बचें, कोरॉजन कीटनाशक के अधिक प्रयोग से किसानों को आर्थिक नुकसान के साथ-साथ मृदा स्वास्थ्य को भी नुकसान होगा।' यह सलाह उत्तर प्रदेश के गन्ना एवं चीनी आयुक्त संजय आर. भूसरेड्डी ने गन्ना किसानों को दी है।उन्होंने आगे बताया, 'विभिन्न संस्थानों की वैज्ञानिक रिपोर्ट के अनुसार कोरॉजन कीटनाशक का इस्तेमाल केवल दीमक एवं कंसुआ और टॉप बोरर नियंत्रित करने के लिए किया जा सकता है। ऐसे में कंपनी को गलत प्रचार के लिए नोटिस दिया जाएगा।'उन्होंने बताया, 'कोरॉजन कीटनाशक कंपनी DuPont विभिन्न प्रचार माध्यमों से गन्ने की फसल के अधिक पैदावार के सम्बन्ध में झूठा प्रचार कर रही है। ऐसे में गन्ने की फसल में लगने वाले कीटों में नियंत्रण के लिए अत्यधिक कीटनाशकों के असंतुलित प्रयोग से किसान बचें।'भूसरेड्डी ने गन्ना किसानों को सलाह देते हुए कहा, 'कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार फसल वर्ष में एक ही बार कोरॉजन का प्रयोग फसल में करना बेधक कीटों पर नियंत्रण के लिए काफी है क्योंकि इस कीटनाशक का प्रभाव काफी समय तक रहता है। ऐसे में किसानों को इसका अधिक प्रयोग नहीं करना चाहिए।'उन्होंने कहा, 'यह कीटनाशक काफी घातक श्रेणी का रसायन है, जिसका फसल की मिट्टी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।' बता दें कि किसानों को कोरॉजन कीटनाशक को प्रचार के जरिए बताया जा रहा है कि कोरॉजन के प्रयोग से गन्ना अधिक मोटा और लंबा होता है और यह लगातार बढ़ता रहता है। कोरॉजन एक महंगा कीटनाशक है।भूसरेड्डी ने गन्ना किसानों को सलाह देते हुए कहा, 'कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार फसल वर्ष में एक ही बार कोरॉजन का प्रयोग फसल में करना बेधक कीटों पर नियंत्रण के लिए काफी है क्योंकि इस कीटनाशक का प्रभाव काफी समय तक रहता है। ऐसे में किसानों को इसका अधिक प्रयोग नहीं करना चाहिए।'उन्होंने कहा, 'यह कीटनाशक काफी घातक श्रेणी का रसायन है, जिसका फसल की मिट्टी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।' बता दें कि किसानों को कोरॉजन कीटनाशक को प्रचार के जरिए बताया जा रहा है कि कोरॉजन के प्रयोग से गन्ना अधिक मोटा और लंबा होता है और यह लगातार बढ़ता रहता है। कोरॉजन एक महंगा कीटनाशक है।डॉ.आर.के. सिंह ने गन्ना एवं चीनी आयुक्त संजय आर. भूसरेड्डी को धन्यवाद दिया उन्होंने कहा यह मुहीम हम 2015 से प्रयास कर रहें हैं आपने हमारी मुहिम को तेजी दी है हमें आशा है कि किसान अब कोराजन जैसी कम्पनी के गलत प्रभाव से बचेंगे। साथ ही उन्होंने सरकार से कोराजन पर तत्काल प्रतिबन्ध की बात कही ।अब गन्ना एवं चीनी आयुक्त ने भी माना कि कोरॉजन के प्रयोग से गन्ना किसानों को होगा नुकसानhttp://goo.gl/zdpSrm

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    एक थीं गौरा देवीHindiMon, 03/26/2018 - 17:12

    Source
    अपना उत्तराखंड

    चिपको आन्दोलन की 45वीं वर्षगाँठ पर विशेष


    चिपको आंदोलन की जननी गौरा देवीचिपको आंदोलन की जननी गौरा देवीउत्तराखंड को जन आन्दोलनों की धरती भी कहा जा सकता है, उत्तराखंड के लोग अपने जल-जंगल, जमीन और बुनियादी हक-हकूकों के लिये और उनकी रक्षा के लिये हमेशा से ही जागरुक रहे हैं। चाहे 1921 का कुली बेगार आन्दोलन, 1930 का तिलाड़ी आन्दोलन हो या 1974 का चिपको आन्दोलन, या 1984 का नशा नहीं रोजगार दो आन्दोलन या 1994 का उत्तराखंड राज्य प्राप्ति आन्दोलन, अपने हक-हकूकों के लिये उत्तराखंड की जनता और खास तौर पर मातृ शक्ति ने आन्दोलन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। चिपको आंदोलन की जननी गौरा देवी के बारे में बता रहे हैं शेखर पाठक।

    जनवरी 1974 में जब अस्कोट-आराकोट अभियान की रूपरेखा तैयार हुई थी, तो हमारे मन में सबसे ज्यादा कौतूहल चिपको आन्दोलन और उसके कार्यकर्ताओं के बारे में जानने का था।

    1973 के मध्य से जब अल्मोड़ा में विश्वविद्यालय स्थापना, पानी के संकट तथा जागेश्वर मूर्ति चोरी संबंधी आन्दोलन चल रहे थे; गोपेश्वर, मंडल और फाटा की दिल्ली-लखनऊ के अखबारों के जरिये पहुँचने वाली खबरें छात्र युवाओं को आन्दोलित करती थीं लेकिन तब न तो विस्तार से जानकारी मिलती थी, न ही उस क्षेत्र में हमारे कोई सम्पर्क थे।

    हम लोग कुमाऊँ के सर्वोदयी कार्यकर्ताओं को भी नहीं जानते थे। सरला बहन का जिक्र सुना भर था, भेंट उनसे भी नहीं थी। हममें से अनेक भावुक युवा इस हलचल से एक गौरव-सा महसूस करते थे पर प्रेरणा के स्रोतों के बावत ज्यादा जानते न थे। तब सिर्फ सुन्दरलाल बहुगुणा, कुंवर प्रसून तथा प्रताप शिखर से शमशेर बिष्ट और मेरी मुलाकात हुई थी।

    1974 के अस्कोट आराकोट अभियान के समय हमारी मुलाकात चमोली के चिपको कार्यकर्ताओं में शिशुपाल सिंह कुँवर तथा केदार सिंह रावत से ही हो पाई थी। अगले 10 सालों में हम लोग उत्तराखंड के छोटे-बड़े आन्दोलनों से जुड़े किसी व्यक्ति से अपरिचित नहीं रहे, पर किसी से अगर प्रत्यक्ष मुलाकात नहीं हो सकी तो वह रैणी की गौरा देवी थीं।

    दसौली ग्राम स्वराज्य संघ द्वारा आयोजित चिपको पर्यावरण शिविरों में भी उनसे मिलने का मौका नहीं मिला। 1984 के अस्कोट-आराकोट अभियान के समय उनसे मुलाकात हो सकी और यह मुलाकात हमारे मन से कभी उतरी नहीं।

    गौरा शिखर पर 12 जून 1984 को कुँवारी पास को पार करते हुए जब हम- गोविन्द पन्त ‘राजू’, कमल जोशी और मैं उड़ते हुए से ढाक तपोवन पहुँचे थे तो गौरा देवी एक पर्वत शिखर की तरह हमारे मन में थीं कि उन तक पहुँचना है। ढाक तपोवन में चिपको आन्दोलन के कर्मठ कार्यकर्ता हयात सिंह ने हमारे लिये आधार शिविर का काम किया। उन्होंने 1970 की अलकनन्दा बाढ़ से चिपको आन्दोलन और उसके बाद का हाल आशा और उदासी के मिले-जुले स्वर में बताया।

    13 जून 1984 को हम तीनों और पौखाल के रमेश गैरोला तपोवन-मलारी मोटर मार्ग में चलने लगे। कुछ आगे से नन्दादेवी अभ्यारण्य से आ रही ऋषिगंगा तथा नीती, ऊँटाधूरा तथा जयन्ती धूरा से आ रही धौली नदी का संगम ऋषि प्रयाग नजर आया। ऋषिगंगा के आर-पार दो मुख्य गाँव हैं- रैंणी वल्ला और रैणी पल्ला।

    आस-पास और भी गाँव हैं। जैसे- पैंग, वनचैरा, मुरुन्डा, जुवाग्वाड़, जुगसू आदि। ये सभी ग्रामसभा रैंणी के अन्तर्गत हैं। कुछ आगे लाटा गाँव है। इनमें ज्यादातर राणा या रावत जाति के तोल्छा (भोटिया) रहते हैं। लगभग 150 मवासे और 500 की जनसंख्या। ऋषि गंगा-धौली गंगा संगम के पास एक ऊँची दीवार की तरह बैठी साद (मलवा) इन नदियों के नाजुक जलग्रहण क्षेत्रों का मिजाज बताती थी। गौरा देवी का गाँव रैंणी वल्ला है।

    आगे बढ़े तो राशन के दुकानदार रामसिंह रावत ने आवाज लगाई कि किस रैणी जाना है? ‘गौरा देवी जी से मिलना है’ सुनकर उन्होंने बताया कि वे ऊपर रहती हैं। एक लड़का पल्ला रैणी भेजकर हमने सभापति गबरसिंह रावत से भी बैठक में आने का आग्रह कर लिया। सेब, खुबानी और आड़ू के पेड़ों के अगल-बगल से कुछेक घरों के आँगनों से होकर हम सभी, जो अब 10-15 हो गए थे, गौरा देवी के आँगन में पहुँचे। मुझे तवाघाट (जिला पिथौरागढ़) के ऊपर बसे खेला गाँव की याद एकाएक आई। संगम के ऊपर वैसी ही उदासी और आरपार फैली हुई अत्यन्त कमजोर भूगर्भिक संरचना नजर आई।

    छोटा-सा लिन्टर वाला मकान। लिन्टर की सीढ़ियाँ उतरकर एक माँ आँगन में आई। वह गौरा देवी ही थीं। हम सबका प्रणाम उन्होंने बहुत ही आत्मीय मुस्कान के साथ स्वीकार किया, जैसे प्रवास से बेटे घर आये हों। हम सब उन्हें ऐसे देख रहे थे जैसे कोई मिथक एकाएक यथार्थ हो गया हो। वही मुद्रा जो वर्षों पहले अनुपम मिश्र द्वारा खींची फोटो में देखी थी।

    कानों में मुनड़े, सिर पर मुन्याणा (शॉल) रखा हुआ, गले में मूँग की माला, काला आँगड़ा और गाँती, चाबियों का लटकता गुच्छा और कपड़ों में लगी चाँदी की आलपिन। गेहुएँ रंग वाले चेहरे में फैली मुस्कान और कभी-कभार नजर आता ऊपर की पंक्ति के टूटे दाँत का खाली स्थान। अत्यधिक मातृत्व वाला चेहरा। स्वर भी बहुत आत्मीय, साथ ही अधिकारपूर्ण। तो गौरा देवी कोई पर्वत शिखर नहीं, एक प्यारी-सी पहाड़ी माँ थीं। वे इन्तजाम में लग गईं। जब उनको रमेश ने बताया कि पांगू से अस्कोट, मुनस्यारी, कर्मी, बदियाकोट, बलाण, रामणी, कुंवारीखाल तथा ढाक तपोवन हो कर पहुंचे हैं ये लोग, तो वे हमें गौर से देख के कहने लगीं कि यह तो दिल्ली से भी ज्यादा दूर हुआ! तख्त पर अपने हाथ से बना कालीन बिछाया।

    हम सभी को बिठाया। बात करने का कोई संकेत नहीं। गोविन्द तथा कमल इस बीच हमारे अभियान, चिपको आन्दोलन, पहाड़ों के हालात तथा नशाबन्दी आदि पर बातें करने लगे तो वे सभा की तैयारी में लग गईं। इधर-उधर बच्चे दौड़ाये। महिला मंगल दल के सदस्यों को बुला भेजा। फलों और चाय के बाद खाने की तैयारी भी होने लगी। हमने बताया कि हम खाकर आये हैं तो कुछ नाश्ता बनने लगा। हमने बातचीत के लिए आग्रह किया। बातचीत के बीच ही महिलाओं-पुरुषों का इकट्ठा होना शुरू हो गया।

    अपनी जिन्दगी वे बताने लगीं कि कितना कठिन है यहाँ का जीवन और फिर कुछ समय के लिए वे अपनी ही जिन्दगी में डूब गईं। यह अपनी जिन्दगी के मार्फत वहाँ की आम महिलाओं तथा अपने समाज से हमारा परिचय कराना भी था।

    गौरा देवी लाता गाँव में जन्मी थीं, जो नन्दादेवी अभ्यारण्य के मार्ग का अन्तिम गाँव है। उन्होंने अपनी उम्र 59 वर्ष बताई। इस हिसाब से वे 1925 में जन्मी हो सकती हैं। 12 साल की उम्र में रैंणी के नैनसिंह तथा हीरादेवी के बेटे मेहरबान सिंह से उनका विवाह हुआ। पशुपालन, ऊनी कारोबार और संक्षिप्त-सी खेती थी उनकी। रैणी भोटिया (तोल्छा) लोगों का बारोमासी (साल भर आबाद रहने वाला) गाँव था। भारत-तिब्बत व्यापार के खुले होने के कारण दूरस्थ होने के बावजूद रैणी मुख्य धारा से कटा हुआ नहीं था और तिजारत का कुछ न कुछ लाभ यह गाँव भी पाता रहा था।

    जब गौरा देवी 22 साल की थीं और एकमात्र छोटा बेटा चन्द्रसिंह लगभग ढाई साल का, तब उनके पति का देहान्त हो गया। जनजातीय समाज में भी विधवा को कितनी ही विडम्बनाओं में जीना पड़ता है। गौरा देवी ने भी संकट झेले। हल जोतने के लिए किसी और पुरुष की खुशामद से लेकर नन्हें बेटे और बूढ़े सास-ससुर की देख-रेख तक हर काम उन्हें करना होता था। फिर सास-ससुर भी चल बसे। गौरा माँ ने बेटे चन्द्र सिंह को अपने पैरों पर खड़ा होने लायक बना दिया। इस समय तक तिब्बत व्यापार बन्द हो चुका था।

    जोशीमठ से आगे सड़क आने लगी थी। सेना तथा भारत तिब्बत सीमा पुलिस का यहां आगमन हो गया था। स्थानीय अर्थ व्यवस्था का पारम्परिक ताना बाना तो ध्वस्त हो ही गया था, कम शिक्षा के कारण आरक्षण का लाभ भी नहीं मिल पा रहा था। चन्द्रसिंह ने खेती, ऊनी कारोबार, मजदूरी और छोटी-मोटी ठेकेदारी के जरिये अपना जीवन संघर्ष जारी रखा। इसी बीच गौरा देवी की बहू भी आ गई और फिर नाती-पोते हो गये। परिवार से बाहर गाँव के कामों में शिरकत का मौका जब भी मिला उसे उन्होंने निभाया। बाद में महिला मंगल दल की अध्यक्षा भी वे बनीं।

    पारिवारिक संकट तो उन्होंने कितने सारे झेले और सुलझाये थे, आज उन्हें एक सामुदायिक जिम्मेदारी निभानी थी। कठिन परीक्षा का समय था। खाना बना रही या कपड़े धो रही महिलाएँ इकट्ठी हो गईं। गौरा देवी के साथ 27 महिलाएँ तथा बेटियां देखते-देखते जंगल की ओर चल पड़ीं। आशंका तथा आत्मविश्वास साथ-साथ चल रहे थे। होठों पर कोई गीत न था। शायद कुछ महिलाएँ अपने मन में भगवती नन्दा को याद कर रही हों। रास्ते से जा रहे मजदूरों को बताया कि वे जंगल की रक्षा के लिये जा रही हैं।

    1972 में गौरा देवी रैणी महिला मंगल दल की अध्यक्षा बनीं। नवम्बर 1973 में और उसके बाद गोविंद सिंह रावत, चंडी प्रसाद भट्ट, वासवानन्द नौटियाल, हयात सिंह तथा कई दर्जन छात्र उस क्षेत्र में आये। रैणी तथा आस-पास के गाँवों में अनेक सभाएँ हुई। जनवरी 1974 में रैंणी जंगल के 2451 पेड़ों की निलामी की बोली देहरादून में लगने वाली थी।

    मण्डल और फाटा की सफलता ने आन्दोलनकारियों में आत्म-विश्वास बढ़ाया था। वहाँ अपनी बात रखने की कोशिश में गये चंडी प्रसाद भट्ट अन्त में ठेकेदार के मुन्शी से कह आये कि अपने ठेकेदार को बता देना कि उसे चिपको आन्दोलन का मुकाबला करना पड़ेगा। उधर गोविन्द सिंह रावत ने ‘आ गया है लाल निशान, ठेकेदारो सावधान’ पर्चा क्षेत्र में स्वयं जाकर बाँटा। अन्ततः मण्डल और फाटा की तरह रैंणी में भी प्रतिरोध का नया रूप प्रकट हुआ।

    15 तथा 24 मार्च 1974 को जोशीमठ में तथा 23 मार्च को गोपेश्वर में रैंणी जंगल के कटान के विरुद्ध प्रदर्शन हुए। आन्दोलनकारी गाँव-गाँव घूमे, जगह-जगह सभाएँ हुईं लेकिन प्रशासन, वन विभाग तथा ठेकेदार की मिलीभगत से अन्ततः जंगल काटने आये हिमाचली मजदूर रैणी पहुँच गये। जो दिन यानी 26 मार्च 1974 जंगल कटान के लिये तय हुआ था, वही दिन उन खेतों के मुआवजे को बाँटने के लिये भी तय हुआ, जो 1962 के बाद सड़क बनने से कट गये थे।

    सीमान्ती गाँवों की गरीबी और गर्दिश ने मलारी, लाता तथा रैणी के लोगों को मुआवजा लेने के लिए जाने को बाध्य किया। पूरे एक दशक बाद भुगतान की बारी आयी थी। सभी पुरुष चमोली चले गये।

    26 मार्च 1974 को रैणी के जंगल में जाने से मजदूरों को रोकने के लिए न तो गाँव के पुरुष थे न कोई और। हयात सिंह कटान के लिए मजदूरों के पहुँचने की सूचना दसौली ग्राम स्वराज्य संघ को देने गोपेश्वर गये। गोविन्द सिंह रावत अकेले पड़ गये और उन पर खुफिया विभाग की निरंतर नजर थी।

    चंडी प्रसाद भट्ट तथा दसौली ग्राम स्वराज्य संघ के कार्यकर्ताओं को वन विभाग के बड़े अधिकारियों ने अपने नियोजित कार्यक्रमों के तहत गोपेश्वर में अटका दिया था। मजदूरों के आने की सूचना उन तक नहीं पहुंचने दी। ऐसे में किसी को जंगल बचने की क्या उम्मीद होती! किसी के मन के किसी कोने में भी शायद यह विचार नहीं आया होगा कि पहाड़ों में जिन्दा रहने की समग्र लड़ाई लड़ रही महिलाएं ही अन्ततः रैणी का जंगल बचायेंगी।

    26 मार्च 1974 की ठंडी सुबह को मजदूर जोशीमठ से बस द्वारा और वन विभाग के कर्मचारी जीप द्वारा रैणी की ओर चले। रैणी से पहले ही सब उतर गये और चुपचाप ऋषिगंगा के किनारे-किनारे फर, सुरई तथा देवदारु आदि के जंगल की ओर बढ़ने लगे। एक लड़की ने यह हलचल देख ली। वह महिला मंगल दल की अध्यक्षा गौरा देवी के पास गई। ‘चिपको’ शब्द सुनकर मुँह छिपाकर हँसने वाली गौरा देवी गम्भीर थी। पारिवारिक संकट तो उन्होंने कितने सारे झेले और सुलझाये थे, आज उन्हें एक सामुदायिक जिम्मेदारी निभानी थी। कठिन परीक्षा का समय था। खाना बना रही या कपड़े धो रही महिलाएँ इकट्ठी हो गईं।

    गौरा देवी के साथ 27 महिलाएँ तथा बेटियां देखते-देखते जंगल की ओर चल पड़ीं। गौरा देवी के साथ घट्टी देवी, भादी देवी, बिदुली देवी, डूका देवी, बाटी देवी, गौमती देवी, मूसी देवी, नौरती देवी, मालमती देवी, उमा देवी, हरकी देवी, बाली देवी, फगुणी देवी, मंता देवी, फली देवी, चन्द्री देवी, जूठी देवी, रुप्सा देवी, चिलाड़ी देवी, इंद्री देवी आदि ही नहीं बच्चियाँ- पार्वती, मेंथुली, रमोती, बाली, कल्पति, झड़ी और रुद्रा- भी गम्भीर थीं। आशंका तथा आत्मविश्वास साथ-साथ चल रहे थे। होठों पर कोई गीत न था। शायद कुछ महिलाएँ अपने मन में भगवती नन्दा को याद कर रही हों। रास्ते से जा रहे मजदूरों को बताया कि वे जंगल की रक्षा के लिये जा रही हैं। मजदूरों को रुकने के लिये कहा। उन्होंने कहा कि खाना बना है ऊपर। तो उनका बोझ वहीं रखवा लिया गया। माँ-बहनों और बच्चों का यह दल मजदूरों के पास पहुँच गया। वे खाना बना रहे थे। कुछ कुल्हाड़ियों को परख रहे थे। ठेकेदार तथा वन विभाग के कारिन्दे (इनमें से कुछ सुबह से ही शराब पिये हुए थे) कटान की रूपरेखा बना रहे थे।

    सभी अवाक थे। यह कल्पना ही नहीं की गई थी कि उनका जंगल काटने इस तरह लोग आयेंगे। महिलाओं ने मजदूरों और कारिन्दों से कहा कि खाकर के चले जाओ। कारिन्दों ने डराने धमकाने का प्रयास शुरू कर दिया। महिलाएँ झुकने के लिये तैयार नहीं थीं। डेड़-दो घंटे बाद जब वन विभाग के कारिन्दों ने मजदूरों से कहा कि अब कटान शुरू कर दो। महिलाओं ने पुनः मजदूरों को वापस जाने की सलाह दी। 50 से अधिक कारिन्दों-मजदूरों से गौरा देवी तथा साथियों ने अत्यन्त विनीत स्वर में कहा कि- ‘यह जंगल भाइयो, हमारा मायका है। इससे हमें जड़ी-बूटी, सब्जी, फल, लकड़ी मिलती है। जंगल काटोगे तो बाढ़ आयेगी। हमारे बगड़ बह जायेंगे। खेती नष्ट हो जायेगी। खाना खा लो और फिर हमारे साथ चलो। जब हमारे मर्द आ जायेंगे तो फैसला होगा।’

    मजदूर असमंजस में थे। पर ठेकेदार और जंगलात के आदमी उन्हें डराने-धमकाने लगे। काम में रुकावट डालने पर गिरफ्तार करने की धमकी के बाद इनमें से एक ने बंदूक भी महिलाओं को डराने के लिये निकाल ली। महिलाओं में दहशत तो नहीं फैली पर तुरन्त कोई भाव भी प्रकट नहीं हुआ। उन सबके भीतर छुपा रौद्र रूप तब गौरा देवी के मार्फत प्रकट हुआ, जब बन्दूक का निशाना उनकी ओर साधा गया। अपनी छाती खोलकर उन्होंने कहा-‘‘मारो गोली और काट लो हमारा मायका।’’ गौरा की गरजती आवाज सुनकर मजदूरों में भगदड़ मच गई। गौरा को और अधिक बोलने और ललकारने की जरूरत नहीं पड़ी। मजदूर नीचे को खिसकने लगे। मजदूरों की दूसरी टोली, जो राशन लेकर ऊपर को आ रही थी, को भी रोक लिया गया। अन्ततः सभी नीचे चले गये।

    ऋषिगंगा के किनारे जो सिमेंट का पुल एक नाले में डाला गया था, उसे भी महिलाओं ने उखाड़ दिया ताकि फिर कोई जंगल की ओर न जा सके। सड़क और जंगल को मिलाने वाली पगडंडी पर महिलाएँ रुकी रहीं। ठेकेदार के आदमियों ने गौरा देवी को फिर डराने-धमकाने की कोशिश की। बल्कि उनके मुँह पर थूक तक दिया लेकिन गौरा देवी के भीतर की माँ उनको नियंत्रित किये थीं। वे चुप रहीं। उसी जगह सब बैठे रहे। धीरे-धीरे सभी नीचे उतर गये। ऋषिगंगा यह सब देख रही थी। वह नदी भी इस खबर को अपने बहाव के साथ पूरे गढ़वाल में ले जाना चाहती होगी।

    अगली सुबह रैणी के पुरुष ही नहीं, गोविन्द सिंह रावत, चंडी प्रसाद भट्ट और हयात सिंह भी आ गये। रैणी की महिलाओं का मायका बच गया और प्रतिरोध की सौम्यता और गरिमा भी बनी रही। 27 मार्च 1974 को रैणी में सभा हुई, फिर 31 मार्च को। इस बीच बारी-बारी से जंगल की निगरानी की गई। मजदूरों को समझाया-बुझाया गया।

    3 तथा 5 अप्रैल 1974 को भी प्रदर्शन हुए। 6 अप्रैल को डी.एफ.ओ. से वार्ता हुई। 7 तथा 11 अप्रैल को पुनः प्रदर्शन हुए। पूरे तंत्र पर इतना भारी दबाव पड़ा कि मुख्यमंत्री हेमवतीनन्दन बहुगुणा की सरकार ने डॉ. वीरेन्द्र कुमार की अध्यक्षता में रैणी जाँच कमेटी बिठाई और जाँच के बाद रैणी के जंगल के साथ-साथ अलकनन्दा में बायीं ओर से मिलने वाली समस्त नदियों-ऋषिगंगा, पाताल गंगा, गरुण गंगा, विरही और नन्दाकिनी- के जल ग्रहण क्षेत्रों तथा कुँवारी पर्वत के जंगलों की सुरक्षा की बात उभरकर सामने आई और सरकार को इस हेतु निर्णय लेने पड़े। रैंणी सीमान्त के एक चुप गाँव से दुनिया का एक चर्चित गाँव हो गया और गौरा देवी चिपको आन्दोलन और इसमें महिलाओं की निर्णायक भागीदारी की प्रतीक बन गईं।

    यह सवाल उठना भी स्वाभाविक है कि और भी महिलाओं ने वनान्दोलन में हिस्सेदारी की तो गौरा देवी की ही इतनी चर्चा क्यों? इसका श्रेय चमोली के सर्वोदयी तथा साम्यवादी कार्यकर्ताओं को है। साथ ही गौरा देवी के व्यक्तित्व तथा उस ऐतिहासिक सुअवसर को भी, जिसमें वे असाधारण निर्णय लेने में नहीं चूकीं। कोई दशौली ग्राम स्वराज्य मण्डल पर यह आरोप लगाये कि उसने महिलाओं का इस्तेमाल किया तो यह सिर्फ पूर्वाग्रह ही कहा जायेगा।

    रैणी 1984 में पौने पाँच बजे हमारी सभा शुरू हुई। 1974 के रैंणी आन्दोलन में शामिल हरकी देवी, उमा देवी, रुपसा देवी, इन्द्री देवी, बाली देवी, गौमा देवी, बसन्ती देवी आदि सभा में आ गईं। सभापति जी के साथ गाँव के अनेक बच्चे और बुजुर्ग भी जमा हो गये। गौरा देवी ने सूत्रवत् बात की और कहा-‘‘हम कुछ और नहीं सोचते। जब जंगल रहेगा तो हम रहेंगे और जब हम सब एक होंगे तो जंगल बचेगा, बगड़ बचेगा। जंगल ही हमारा रोजगार है, जिन्दगी है, मायका है। आज तिजारत नहीं रही। भेड़ पालन घट गया है। ऊपर को नेशनल पार्क (नन्दा देवी अभयारण्य) बन रहा है। बाघ ने पैंग के उम्मेद सिंह की 22 बकरियाँ एक ही दिन में मार दीं। आखिर हमारी हिफाजत भी तो होनी चाहिये।’’

    सभापति जी बोले कि विष्णुप्रयाग परियोजना बंद हो रही है। छोटा मोटा रोजगार भी चला जायेगा। ऊपर नेशनल पार्क बन रहा है। हमारे हक-हकूक खत्म हो रहे हैं। उन्होंने चिपको आन्दोलन की खामियाँ भी गिनाई और कहा कि सरकार के हर चीज में टाँग अड़ाने से सब बिगड़ा है। रोजगार की समस्या विकराल थी क्योंकि यहा का भोटिया समाज नौकरियों में अधिक न जा सका था।

    कुछ बातें औरों ने भी रखीं। हम बस, सुनते जा रहे थे। उन सबकी सरलता, पारदर्शिता और अहंकार रहित मानसिकता का स्पर्श लगातार मिल रहा था। सभा समाप्त हो गई। उनका रुकने का आग्रह हम स्वीकार न कर सके। विदा लेते हुए सभी को प्रणाम किया। सबने अत्यन्त मोहक विदाई दी।

    गौरा देवी ने हम तीनों के हाथ एक-एक कर अपने हाथों में लिये। उन्हें चूमा और अपनी आँखों तथा माथे से लगाया। वे अभी भी मुस्कुरा रहीं थीं और हम सभी भीतर तक लहरा गये थे उनकी ममता का स्पर्श पाकर। धीरे-धीरे सड़क में उतरते, ऊपर को देखते थे। ऊपर से गौरा माता अपनी बहिनों के साथ हाथ हिला रही थीं। हम तपोवन की ओर चल दिये। इतनी-सी मुलाकात हुई थी हमारी गौरा देवी से। बिना इसके उनके व्यक्तित्व की भीतरी संरचना को हम नहीं समझ पाते

    गौरा देवी और चिपको आन्दोलन


    गौरा देवी चिपको आन्दोलन की सर्वाधिक सुपरिचित महिला रहीं। इस पर भी उनकी पारिवारिक या गाँव की दिक्कतें घटी नहीं। चिपको को महिलाओं का आन्दोलन बताया गया पर यह केवल महिलाओं का कितना था? अपनी ही संपदा से वंचित लोगों ने अपना प्राकृतिक अधिकार पाने के लिए चिपको आन्दोलन शुरू किया था। इसके पीछे जंगलों की हिफाजत और इस्तेमाल का सहज दर्शन था।

    चिपको आन्दोलन में तरह-तरह के लोगों ने स्थायी-अस्थायी हिस्सेदारी की थी। महिलाओं ने इस आन्दोलन को ग्रामीण आधार और स्त्री-सुलभ संयम दिया तो छात्र-युवाओं ने इसे आक्रामकता और शहरी-कस्बाती रूप दिया। जिला चमोली में मण्डल, फाटा, गोपेश्वर, रैणी और बाद में डूँगरी-पैन्तोली, भ्यूंढार, बछेर से नन्दीसैण तक; उधर टिहरी की हैंवलघाटी में अडवाणी सहित अनेक स्थानों और बडियारगढ़ आदि क्षेत्रों तथा अल्मोड़ा में जनोटी-पालड़ी, ध्याड़ी, चांचरीधार (द्वाराहाट) के प्रत्यक्ष प्रतिरोधों में ही नहीं बल्कि नैनीताल तथा नरेन्द्रनगर में जंगलों की नीलामियों के विरोध में भी महिलाओं और युवाओं की असाधारण हिस्सेदारी रही।

    दूसरी ओर सर्वोदयी कार्यकर्ताओं के साथ अनेक राजनैतिक कार्यकर्ताओं का भी योगदान रहा। वे जन भावना और चिपको की चेतना के खिलाफ जा भी नहीं सकते थे। जोशीमठ क्षेत्र में तो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का महत्वपूर्ण योगदान था, जैसे उत्तरकाशी के लगभग विस्मृत बयाली (उत्तरकाशी) के आन्दोलन में था।

    इसी तरह कुमाऊँ में उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी तथा उससे जुड़े लोगों ने आन्दोलन को एक अलग रूप दिया। नेतृत्व में सर्वोदयी या गैर राजनीतिक (किसी भी प्रचलित राजनीतिक दल से न जुड़े हुए) व्यक्ति भी उभरे तो यह इस आन्दोलन की एक स्वाभाविक प्रक्रिया थी। अन्ततः सभी की हिस्सेदारी का प्रयास सफल हुआ। चिपको में मतभेद, विभाजन और विखंडन का दौर तो बहुत बाद में गलतफहमियों, पुरस्कारों और 1980 के वन बिल के बाद शुरू हुआ।

    यह सवाल उठना भी स्वाभाविक है कि और भी महिलाओं ने वनान्दोलन में हिस्सेदारी की तो गौरा देवी की ही इतनी चर्चा क्यों? इसका श्रेय चमोली के सर्वोदयी तथा साम्यवादी कार्यकर्ताओं को है। साथ ही गौरा देवी के व्यक्तित्व तथा उस ऐतिहासिक सुअवसर को भी, जिसमें वे असाधारण निर्णय लेने में नहीं चूकीं। कोई दशौली ग्राम स्वराज्य मण्डल पर यह आरोप लगाये कि उसने महिलाओं का इस्तेमाल किया तो यह सिर्फ पूर्वाग्रह ही कहा जायेगा।

    यदि चमोली की तीस महिलाएँ एक साथ ‘वृक्षमित्र’ पुरस्कार लेने दिल्ली गई तो इससे उनकी हैसियत ही नहीं सामुहिकता भी पता चलती है। महिलाओं की स्थिति सबसे संगठित और संतोषजनक (यद्यपि यह भी पर्याप्त नहीं कही जा सकती है) चमोली जिले में ही नजर आती है क्योंकि आन्दोलन और बाद के शिविरों में भी इतनी संगठित सामूहिकता कहीं और नहीं दिखती थी। लेकिन अपने मंगल दल के अलावा महिलाओं को व्यापक नेतृत्व नहीं दिया गया।

    यह नहीं कहा जाना चाहिये कि इस हेतु महिलाओं के पास पर्याप्त समय नहीं था। अब वे जंगल के अलावा और विषयों पर भी सोचने-बोलने लगीं थीं। उन्हें अपने परिवार के पुरुषों से आन्दोलन या महिला मंगल दल में हिस्सेदारी हेतु भी लड़ना पड़ा था। इसके उदाहरण उत्तराखंड में सर्वत्र मिलते हैं।

    चमोली में अनेक जगह महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका प्रकट हुई लेकिन नेतृत्व को झपटने या अग्रिम पंक्ति में आने की कोशिश करना- यह पहाड़ी महिलाओं के लिए संभव नहीं था पर अनेक बार तात्कालिक रूप से उन्होंने अपना नेतृत्व किया। रैणी, डूँगरी-पैन्तोली, बछेर ही नहीं चांचरीधार तथा जनोटी-पालड़ी इसके उदाहरण हैं।

    पुरुष नेतृत्व में महिलाओं की हिस्सेदारी या उनके नाम से इसे जोड़ने की होड़ थी। लेकिन यह सबको आश्चर्यजनक लगेगा कि राइटलाइवलीहुड पुरस्कार लेते हुए सुन्दरलाल बहुगुणा तथा इन्दु टिकेकर ने जो व्याख्यान दिये गये थे (हिन्दी रूप चिपको सूचना केन्द्र, सिल्यारा द्वारा प्रकाशित) उनमें गौरा देवी तो दूर चिपको की किसी महिला का भी नाम नहीं लिया गया था।

    गौरा देवी अपने जीवन के अन्तिम वर्षों में गुर्दे और पेशाब की बीमारी से परेशान रहीं। पक्षाघात भी हुआ। पर किसी से उन्हें मदद नहीं मिली या बहुत कम मिली। यह अवश्य सोचनीय है। यद्यपि चंडी प्रसाद भट्ट खबर मिलते ही गौरादेवी की मृत्यु के दो सप्ताह पहले उनसे मिलने जोशीमठ गये थे, जहां तब गौरादेवी का इलाज चल रहा था।

    4 जुलाई 1991 की सुबह तपोवन में गौरादेवी की मृत्यु हुई। इसी तरह की स्थिति चिपको आन्दोलन के पुराने कार्यकर्ता केदार सिंह रावत की असमय मृत्यु के बाद उनके परिवार के साथ भी हुई थी। सुदेशा देवी तथा धनश्याम शैलानी को भी कम कष्ट नहीं झेलने पड़े थे। आखिर किसी को आन्दोलनों में शामिल होने का मूल्य तो नहीं दिया जा रहा था। यह काम चिपको संगठन का था। जब वह खुद फैला और गहराया नहीं, मजबूत तथा एक नहीं रह सका, तब ऐसी मानवीय स्थितियों से निपटने का तरीका कैसे विकसित होता? पर अपने अपने स्तर पर संवेदना और संगठन बने भी रहे।

    उत्तराखंड के गाँवों में अपने हक-हकूक बचाने के, अपने पहाड़ों को बनाये रखने के जो ईमानदार प्रतिरोध होंगे वे ही संगठित होकर चिपको की परम्परा को आगे बढ़ायेंगे। किसी आन्दोलन का सबसे बड़ा दुर्भाग्य उसका जनता की नजरों से गिरना है। चिपको आन्दोलन भी किंचित इसका शिकार हुआ है। उत्तराखंड की सामाजिक शक्तियाँ और वर्तमान उदासी का परिदृश्य शायद चिपको को रूपान्तरित होकर पुनः प्रकट होने में मदद देगा।

    चिपको की महिलाओं को और गौरा देवी को पढ़े-लिखे लोग ‘अनपढ़’ कहते हैं। यह कोई नहीं बताता कि पढ़े-लिखे होने का क्या अभिप्राय है? क्या स्कूल न जा पाने के कारण वे ‘अनपढ़’ कहलाएँ? क्या अपने परिवेश को समझ चुकीं और उसकी सुरक्षा हेतु प्रतिरोध की अनिवार्यता सिद्ध कर चुकीं महिलाएँ किसी मायने में अनपढ़ हैं? क्या वे स्कूल-कालेजों की पढ़ी होतीं तो ऐसे निर्णय लेतीं? गौरा देवी की बात करते हुए कोई उन सच्चाइयों को नहीं देखता जो स्वतः दिखाई देती हैं और जिनसे उनका कद और ऊँचा हो जाता है।

    12 साल की उम्र में गौरा देवी का विवाह हो गया था और वे 22 साल में विधवा हो गईं थीं। सिर्फ 10 साल का वैवाहिक जीवन रहा उनका! एक पहाड़ी विधवा के सारे संकट उन्हें झेलने पड़े पर इन्हीं संकटों ने उनके भीतर निर्णय लेने की क्षमता विकसित की। वे गाँव के कामों में दिलचस्पी रखने वाली गाँव की बुजुर्ग महिलाओं में एक थीं। एक नैसर्गिक नेतृत्व का गुण उनमें था, जो कठिन परिस्थितियों में निखरता गया। अतः 26 मार्च 1974 को जो उन्होंने किया उसे वे कैसे नहीं करतीं? यह बहुत सहज प्रक्रिया थी। यही नही वे बद्रीनाथ मन्दिर बचाओ अभियान में सक्रिय रही थीं और पर्यावरण शिविरों में भी।

    चिपको आन्दोलन ने यदि उन सभी व्यक्तियों, समूहों को अपने साथ बनाये रखा होता, जो इसकी रचना प्रक्रिया बढ़ाने में योगदान देते रहे थे, तो न सिर्फ गौरा देवी की बल्कि चिपको आन्दोलन की प्रेरणा ज्यादा फैलती और खुद गौरा देवी का गाँव उन परिवर्तनों को अंगीकार करता जो उसके लिए जरूरी हैं।

    कोई भी आन्दोलन सिर्फ एक जंगल को कटने से बचा ले जाय पर गाँव की मूलभूत जरूरतों को टाल जाय या किसी तरह के आर्थिक क्रिया-कलाप विकसित न करे तो टूटन होगी ही। आखिर हरेक व्यक्ति बुद्ध की तरह तो सड़क में नहीं आया है। चिपको की और गौरा देवी की असली परम्परा को आखिर कौन बनाये रखेंगे? देश-विदेश में घूमने वाले चिपको नेता-कार्यकर्ता? या चिपको पर अधूरे और झूठे ‘शोध’ पत्र पढ़ने वाले विशेषज्ञ? या अभी भी अनिर्णय के चौराहे पर खड़ा जंगलात विभाग? या इधर-उधर से पर्याप्त धन लेकर ‘जनबल’ बढ़ाने वाली संस्थाएँ? नहीं, कदापि नहीं।

    चिपको को सबसे ज्यादा वे स्थितियाँ बनाये रखेंगी जो बदली नहीं हैं और मौजूदा राजनीति जिन्हें बदलने का प्रयास करने नहीं जा रही है। स्वयं गौरादेवी का परिवेश तरह-तरह से नष्ट किया जा रहा है। ऋषि गंगा तथा धौली घाटी में जिस तरह जंगलों पर दबाव है; जिस तरह जल विद्युत परियोजनाओं के नाम पर पूरी घाटी तहस-नहस की जा चुकी है और नन्दादेवी नेशनल पार्क में ग्रामीणों के अधिकार लील लिये गये है; मन्दाकिनी घाटी में विद्युत परियोजना के विरोध में संघर्षरत सुशीला भंडारी को दो माह तक जेल में रखा गया; गंगाधर नौटियाल को गिरफ्तार किया गया और पिंडर, गोरी घाटी तथा अन्यत्र जन सुनवाई नहीं होने दी गई; उससे हम एक समाज और सरकार के रूप में न सिर्फ कृतघ्न सिद्ध हो गये हैं बल्कि पर्वतवासी का सामान्य गुस्सा भी प्रकट नहीं कर सके हैं। वहां के ग्रामीण अवश्य अभी भी आत्म समर्पण से इन्कार कर रहे हैं। रैणी तथा फाटा जैसे चिपको आन्दोलन के पुराने संघर्ष स्थानों पर सबसे जटिल स्थिति बना दी गई है।

    इसलिए उत्तराखंड के गाँवों में अपने हक-हकूक बचाने के, अपने पहाड़ों को बनाये रखने के जो ईमानदार प्रतिरोध होंगे वे ही संगठित होकर चिपको की परम्परा को आगे बढ़ायेंगे। किसी आन्दोलन का सबसे बड़ा दुर्भाग्य उसका जनता की नजरों से गिरना है। चिपको आन्दोलन भी किंचित इसका शिकार हुआ है।

    उत्तराखंड की सामाजिक शक्तियाँ और वर्तमान उदासी का परिदृश्य शायद चिपको को रूपान्तरित होकर पुनः प्रकट होने में मदद देगा। यह उम्मीद सिर्फ इसलिये है कि हमारे समाज और पर्यावरण के विरोधाभास अपनी जगह पर हैं और चिपको की अधिकांश टहनियां अभी भी हरी हैं। उनमें रचना और संघर्ष के फूल खिलने चाहिये।


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    प्रदूषण के विरुद्ध सार्थक पहल है ग्रीन बजटRuralWaterFri, 03/30/2018 - 11:58

    Source
    सर्वोदय प्रेस सर्विस, मार्च 2018

    ग्रीन बजटग्रीन बजटयह जगजाहिर है कि पिछले दो-तीन दशक से दिल्ली में सरकार की उपेक्षा एवं लापरवाही के कारण प्रदूषण बड़ी समस्या बनी हुई है। दिल्ली का प्रदूषण विश्वव्यापी चिन्ता का विषय बन चला है। कई अन्तरराष्ट्रीय विशेषज्ञ यहाँ तक कह चुके हैं कि दिल्ली रहने लायक शहर नहीं रह गया है।

    जाहिर है, प्रदूषण के गहराते संकट के मद्देनजर सरकारी उपायों के बेअसर होने के बाद पहले राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण और सुप्रीम कोर्ट ने डीजल से चलने वाले वाहनों को इस समस्या का एक सबसे प्रमुख कारक माना है। लेकिन क्या डीजल से चलने वाले वाहन अचानक दिल्ली की समस्या बन गए हैं?

    काफी समय पहले दिल्ली में सार्वजनिक बसों और ऑटोरिक्शा को डीजल के बजाय सीएनजी से चलाना इसीलिये अनिवार्य किया गया था कि प्रदूषण पर काबू पाया जा सके। लेकिन उसके बाद डीजल से चलने वाली कारों की तादाद बढ़ती गई और इस पर गौर करना किसी को जरूरी नहीं लगा। जब इससे मुश्किल बढ़ने लगी है तो फिर सरकार सक्रिय दिखाई दी और उसने एक घोषणा सम और विषम नम्बरों वाली कारों को अलग-अलग दिन चलाने के रूप में की। लेकिन इसके भी व्यावहारिकता पर सवाल उठने लगे हैं।

    सवाल यह भी है कि क्या कुछ तात्कालिक कदम उठा कर दिल्ली में प्रदूषण की समस्या से पार पाया जा सकता है? लेकिन यहाँ मुख्य प्रश्न बढ़ते प्रदूषण के मूल कारणों की पहचान और उनकी रोकथाम सम्बन्धी नीतियों पर अमल से जुड़े हैं। दिल्ली में वाहन के प्रदूषण की ही समस्या नहीं है, हर साल ठंड के मौसम में जब हवा में घुले प्रदूषक तत्त्वों की वजह से जन-जीवन पर गहरा असर पड़ने लगता है, स्मॉग फॉग यानी धुआँ युक्त कोहरा जानलेवा बनने लगता है, तब सरकारी हलचल शुरू होती है।

    विडम्बना यह है कि जब तक कोई समस्या बेलगाम नहीं हो जाती, तब तक समाज से लेकर सरकारों तक को इस पर गौर करना जरूरी नहीं लगता। दिल्ली में प्रदूषण और इससे पैदा मुश्किलों से निपटने के उपायों पर लगातार बातें होती रही हैं और विभिन्न संगठन अनेक सुझाव दे चुके हैं। लेकिन उन्हें लेकर कोई ठोस पहल अभी तक सामने नहीं आई है। हर बार पानी सिर से ऊपर चले जाने के बाद कोई तात्कालिक घोषणा होती है और फिर कुछ समय बाद सब पहले जैसा चलने लगता है।

    पिछले पाँच सालों के दौरान दिल्ली में वाहनों की तादाद में 97 फीसद बढ़ोतरी हो गई। इनमें अकेले डीजल से चलने वाली गाड़ियों की तादाद तीस प्रतिशत बढ़ी। कभी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद डीजल से चलने वाली नई गाड़ियों का पंजीकरण रोक दिया जाता है, लेकिन सवाल है कि पहले से जितने वाहन हैं और फिर नई खरीदी जाने वाली गाड़ियाँ आबोहवा में क्या कोई असर नहीं डालेंगी? इस गम्भीर समस्या के निदान की ओर यदि दिल्ली सरकार जागी है तो इसे केजरीवाल सरकार की पहली सूझबूझ पूर्ण पहल कही जाएगी।

    जाहिर है, दिल्ली की जिम्मेदारी सम्भाल रही सरकार का यह सबसे बड़ा फर्ज भी है कि वह प्रदूषण पर काबू करके इस शहर को रहने लायक बनाए। इसी को ध्यान में रखकर ग्रीन बजट में दिल्ली सरकार के चार विभागों पर्यावरण, ट्रांसपोर्ट, पावर और पीडब्ल्यूडी से जुड़ी 26 योजनाओं को शामिल किया गया है और इनके जरिए प्रदूषण नियंत्रण का अभियान शुरू किया जा रहा है।

    सरकार ने प्रस्ताव किया है कि जो लोग सीएनजी फिटेड कार खरीदेंगे उन्हें रजिस्ट्रेशन चार्ज में 50 प्रतिशत की छूट मिलेगी। दिल्ली के रेस्तराँ अगर कोयले वाले तंदूर की जगह इलेक्ट्रिक या गैस तंदूर काम में लाते हैं तो सरकार उन्हें प्रति तंदूर 5 हजार रुपए तक की सब्सिडी देगी। 10 केवीए या इससे अधिक क्षमता के डीजल जेनरेटर की जगह इलेक्ट्रिक जेनरेटर का इस्तेमाल करने पर सरकार की तरफ से इसके लिये 30 हजार रुपए तक की सब्सिडी दी जाएगी।

    प्रदूषण के चिन्ताजनक स्तर तक बढ़ने के मद्देनजर राज्य सरकारों की ओर से कई घोषणाएँ सामने आती रहती हैं। हाल ही में दिल्ली सरकार ने वर्ष 2018-19 के अपने बजट को ‘ग्रीन बजट’ का रूप देकर नई एवं सार्थक पहल की है। पहली बार देश की किसी सरकार ने प्रदूषण की जानलेवा समस्या पर अपने बजट में आर्थिक प्रावधान किये हैं, प्रदूषण को नियंत्रित करने का मन बनाया है। हर समय किसी-न-किसी विवाद को खड़ा करके अपनी शक्ति को व्यर्थ करने वाली दिल्ली सरकार की पर्यावरण के प्रति जागरुकता एवं प्रदूषण मुक्ति की दिशा में कदम बढ़ाना, एक नई सुबह की आहट है।इंडस्ट्रियल एरिया में पाइप्ड नेचुरल गैस का इस्तेमाल करने पर एक लाख रुपए तक की मदद सरकार की ओर से मिलेगी। दिल्ली देश का पहला ऐसा राज्य बनने जा रहा है, जहाँ जनवरी से लेकर दिसम्बर तक पूरे साल प्रदूषण का रीयल टाइम डेटा जुटाया जाएगा। सरकार ने एक हजार लो फ्लोर इलेक्ट्रिक बसें लाने का लक्ष्य भी रखा है। शहर में हरित इलाके बढ़ाए जाएँगे। इलेक्ट्रिक व्हीकल पॉलिसी भी बनाई जा रही है।

    दिल्ली सरकार ने प्रदूषण से लड़ने की जो इच्छाशक्ति दिखाई है, वह देश के अन्य राज्यों की सरकारों के लिये एक मिसाल है। दिल्ली सरकार को अपनी इन योजनाओं पर अमल में दृढ़ता दिखानी होगी, हालांकि शहरवासियों के सहयोग से इसे एक आन्दोलन का रूप भी दिया जा सकता है। दिल्ली सरकार की इस सार्थक पहल में केन्द्र सरकार एवं दिल्ली के उपराज्यपाल को भी सहयोगी बनना चाहिए।

    दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण से जुड़ी कुछ मूलभूत समस्याएँ मसलन आवास, यातायात, पानी, बिजली इत्यादि भी उत्पन्न हुई। नगर में वाणिज्य, उद्योग, गैर-कानूनी बस्तियों, अनियोजित आवास आदि का प्रबन्ध मुश्किल हो गया। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली का प्रदूषण के मामले में विश्व में चौथा स्थान है। दिल्ली में 30 प्रतिशत वायु प्रदूषण औद्योगिक इकाइयों के कारण है, जबकि 70 प्रतिशत वाहनों के कारण है।

    खुले स्थान और हरे क्षेत्र की कमी के कारण यहाँ की हवा साँस और फेफड़े से सम्बन्धित बीमारियों को बढ़ाती है। प्रदूषण का स्तर दिल्ली में अधिक होने के कारण इससे होने वाली मौतें और बीमारियाँ स्वास्थ्य पर गम्भीर संकट को दर्शाती है। इस समस्या से छुटकारा पाना सरल नहीं है।

    हमें दिल्ली को प्रदूषण मुक्त करना है तो एक-एक व्यक्ति को उसके लिये सजग होना होगा। जो दिखता है वह सब नाशवान है। शाश्वत तो केवल वही है जो दिखता नहीं। जो नाशवान है उसे हम स्थायी नहीं कर सकते पर उसे शुद्ध तो रख सकते हैं। प्रकृति ने जो हमें पर्यावरण दिया है और हवा, जल, सूर्य जिसे रोज नया जीवन देते हैं, उसे हम प्रदूषित नहीं करें।

    इस क्षेत्र में सरकार, न्यायालय स्वायत्त संस्थाएँ और पर्यावरण चिन्तक आगे आए हैं। इनके साझा सहयोग से प्रदूषण की मात्रा में कुछ कमी तो आई है परन्तु इसके लिये आम जनता के रचनात्मक सहयोग की सबसे अधिक आवश्यकता है। तभी हम दिल्ली को प्रदूषण मुक्त कर सकेंगे। दिल्ली सरकार की पहल से पहले हमें स्वयं से शुरुआत करनी होगी।

    Comments

    Submitted by Sumant das (not verified) on Fri, 04/20/2018 - 20:12

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    Sir, I want to do a job, which I do not like, I am inappropriate.plz sir call me

    Submitted by Sumant das (not verified) on Sat, 04/21/2018 - 06:24

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    राजस्थान की परम्परागत तकनीक RuralWaterSat, 03/31/2018 - 14:21

    Source
    ग्राविस, जोधपुर, 2006


    राजस्थान की परम्परागत जल संरक्षण प्रणाली टांकाराजस्थान की परम्परागत जल संरक्षण प्रणाली टांकाराजस्थान विविधताओं से परिपूर्ण एक ऐसा राज्य है, जहाँ एक तरफ रेगिस्तान है तो दूसरी तरफ ऊँचे-ऊँचे पहाड़ और घने जंगल हैं। यहाँ पर गरीबी अपनी चरम सीमा पर है तो महंगे शहर भी देखने को मिलते हैं। यहाँ विभिन्न प्रकार की भूमि जैसे चारागाह, गोचर, औरण, अभयारण्य आदि भी विद्यमान है। हमारी लोक संस्कृति हमारी ग्रामीण और जनजातीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती है।

    जनजातीय और ग्रामीण लोग चाहे गाँव में निवास करते हों या जंगल में, या फिर वर्ष भर एक जगह से दूसरी जगह पर घूमते रहते हों, उनके पास प्रतिभा की कोई कमी नहीं होती। उनके लिये तो कला भी जिन्दगी का एक आम हिस्सा है। अपनी निपुणता और रचनात्मकता के सहारे ही वे अपने साधारण से जीवन को बहुरंगी और सजीव बनाने में सफल रहते हैं।

    थार रेगिस्तान 0.60 मिलियन वर्ग किलोमीटर मे फैला हुआ, संसार का सबसे अधिक सघन, अद्वितीय एवं रुक्ष प्राकृतवास है। कर्क रेखा के समानान्तर, भारतवर्ष के चार प्रदेशों में फैले थार क्षेत्र का 68.8 प्रतिशत भाग राजस्थान में स्थित है। थार के करीब 60 प्रतिशत हिस्से पर कम या ज्यादा खेती की जाती है और करीब 30 प्रतिशत हिस्से पर वनस्पतियाँ है, जो मुख्यतः चारागाह के रूप में ही काम में आती हैं।

    वर्षा की अनियमितता इस तथ्य से प्रतीत होती है कि कुछ इलाकों में वर्षा की मात्रा औसतन 120 मिमी. से भी कम है। हर दस वर्ष में चार वर्ष सूखे गुजरते हैं। इससे खेती प्रायः मुश्किल हो जाती है। अधिकांश हिस्से में 4 से 5 महीनों तक तेज हवाएँ चलती हैं और गर्मियों में रेतीले तुफान बहुत आम बात है। पर इस इलाके में मौजूद हरियाली भले ही वह कितनी भी कम क्यों न हों, विविधता भरी है। यहाँ करीब 700 किस्म के पेड़ पौधे पाये जाते हैं, जिनमें से 107 किस्म की घास होती है, इनमें प्रतिकूल जलवायु में भी जीवित रहने की क्षमता रहती है।

    यहाँ की ज्यादातर पैदावार पौष्टिकता और लवणों से भरी है। इसके साथ ही थार क्षेत्र में सबसे उन्नत किस्म के पशु मिलते हैं, उत्तर भारत में श्रेष्ठ किस्म के बैल यहीं से जाते हैं और देश की 50 प्रतिशत ऊन का उत्पादन यहीं होता है। थार क्षेत्र की खेती एवं जमीन का उपयोग पूर्णतः वर्षा पर ही निर्भर है। वर्षा अच्छी हुई तो फसल एवं चारा पर्याप्त मात्रा में मिल जाता है तथा वर्षाजल को नाड़ियों (तालाब), बेरियों, कुंडियों या टांकों मे संचित कर लिया जाता है।

    राजस्थान में पानी की कमी का वृत्तान्त धार्मिक आख्यान के साथ पुराने लोकाख्यानों में भी उपलब्ध है। राजस्थान के सुप्रसिद्ध लोक काव्य ‘ढोला मारु रा दूहा’ में मारवाड़ निन्दा प्रकरण के अन्तर्गत मालवणी अपने पिता को सम्बोधित करती हुई कहती है –

    बाबा न देइसी मारुवाँ वर, कुँआरी रहेसी।
    हाथि कचोजउ सिर घड़उ, सीचति य मरेसि।।


    हे पिता। मुझे मारु देश (राजस्थान) में मत ब्याहना, चाहे कुँआरी रह जाऊँ। वहाँ हाथों में कटोरा (जिससे घड़े में पानी भरी जाता है) और सिर पर घड़ा रखकर पानी ढोते-ढोते ही मर जाऊँगी। यह काव्यांश बतलाता है कि पानी की घोर कमी और इसकी पूर्ति हेतु कठिन परिश्रम राजस्थान की जनता की दारुण नियति थी। यहाँ नायिका उससे बचने के लिये कुँवारी ही मरने को तैयार है, पर उसे राजस्थान जैसे जल की कमी वाले क्षेत्र में जीवन व्यतीत करना गवारा नहीं। वस्तुतः यह तथ्य भी है कि हमारे यहाँ पानी बहुत गहरे में पाया जाता है।

    पानी की न्यूनता के समाधान का नियोजन यहाँ के निवासियों के द्वारा पहले से ही आँका हुआ था। वर्षा की विफलता तथा निरन्तर सूखा पड़ने का सामना करने के लिये प्रत्येक गाँव में नाड़ियाँ, छोटे-बड़े तालाब बनाए जाते थे। उनसे जलग्रहण क्षेत्र की प्रतिरक्षा की जाती थी। वर्षा से पूर्व नाड़ियों को खोदकर उनकी संग्रहणशीलता को बढ़ाया जाता था।

    हमारे गाँवों में खेती के अलग-अलग चरण ऋतुओं में आने वाले बदलावों पर ही आश्रित हैं। खेतों की जुताई, बुवाई, कटाई और अनाज निकालना तथा गोदामों में भरना ये सारे काम एक रस्म और जश्न मय माहौल में किये जाते हैं। इस तरह वार्षिक चक्र के सारे चरण बरसात, शरद, शिशिर, हेमन्त, बसन्त या गर्मी इन सभी ऋतुओं का त्योहार के रूप में स्वागत किया जाता है और उत्सव मनाया जाता है। समय आने पर ये सभी परम्पराएँ और शिल्प एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के हाथों में चले जाते हैं।

    उत्तम खेती जो हरवड़ा (हल चलाने से उत्तम खेती होगी)
    मध्यम खेती जो संगराहा (साथ-साथ काम करने से मध्यम खेती)
    बीज बुढ़के तिनके ताहा (बीज भी डूब जाएँगे जो तीसरे को काम दिया)
    जो पूछे हरवाहा कहा (हल चलाने वाले ने कहा)

    परम्परागत ज्ञान सामान्यतया एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक मौखिक रूप से संचारित होता रहा है। इसका उपयोग भी सामान्यतया सीमित क्षेत्र, अंचल विशेष तक ही सीमित रहा है। सही अर्थों में देखा जाये तो यह ज्ञान परिवारों के मध्य मे ही सिमट कर रह गया है। मनुष्य जाति के विकास के साथ-साथ मनुष्य ने भूख-प्यास को शान्त करने के लिये पेड़ों के फल तथा पत्ते खाते-खाते, खेती करना तथा जल को संचय करना सीखा।

    कई विफलताओं के बाद उसने इस प्रक्रिया में सफलता हासिल की होगी और अपने बौद्धिक कौशल को आगे बढ़ाया होगा। अनादिकाल से वह अपने बुद्धिबल के सहारे धीरे-धीरे उन्नति कर आज इस अवस्था में पहुँचा है। किन्तु हम आज उस पुराने और पारम्परिक ज्ञान, जो अत्यन्त बहुमूल्य एवं उपयोगी है को बहुत पीछे छोड़कर निरन्तर आगे निकलने की चेष्टा में लगे हैं।

    प्राचीन तकनीक किसी भी रूप में वर्तमान से कम नहीं आँकी जा सकती है। जरुरत सिर्फ प्रचार-प्रसार, संरक्षण, संवर्धन, शोध और मार्गदर्शन की है। हमारी समृद्ध लोक परम्पराओं को पुनः जीवित कर उनका संरक्षण एवं विस्तार करने के साथ-साथ आधुनिक पद्धतियों के साथ उनका सामंजस्य स्थापित किया जाये। यह भी सम्भव है कि गुणियों को संगठित कर उनमें आत्मविश्वास जागृत कर इस ज्ञान को संरक्षित करने के प्रयास किये जाएँ।

    स्वामी दयानन्द सरस्वती ने कहा था कि यदि लोगों को शक्ति बोध हो तो धरती पर स्वर्ग उतर सकता है।इस सांसारिक ज्ञान और बौद्धिक सम्पदा के खजाने को एक करने की आज अत्यन्त आवश्यकता है। थार में लोगों ने जल की हर बूँद का बहुत ही व्यवस्थित उपयोग करने वाली आस्थाएँ विकसित की और लोक जीवन की इन्हीं मान्यताओं ने इस कठिन प्रदेश में जीवन को चलाया, समृद्ध किया और प्रकृति पर भी जरुरत से ज्यादा दबाव नहीं पड़ा।

    आज के परिदृश्य में वर्तमान विद्यालयी पाठ्यक्रम व सीमित पढ़े-लिखे लोग, पा