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    Author: 
    राजु कुमार

    स्वच्छता को मुंह चिढ़ाता यूनियन कार्बाइड का कचरा

    .भोपाल गैस त्रासदी के तीन दशक बाद भी इस सवाल का जवाब न तो केंद्र सरकार के पास है और न ही राज्य सरकार के पास कि यूनियन कार्बाइड के कचरे का निष्पादन अभी तक क्यों नहीं हो पाया? इसके लिए दोषियों को सजा देने की मांग कर रहे स्थानीय रहवासियों एवं गैस पीड़ितों को अभी भी यहां के जहरीले कचरे का प्रभाव झेलना पड़ रहा है।

    कई सरकारी एवं गैर सरकारी अध्ययनों में यह साफ कहा जा रहा है कि इस जहरीले कचरे के कारण आसपास की मिट्टी एवं जल प्रदूषित हो गई है, पर निष्पादन के नाम पर अभी तक आश्वासन ही मिलता आया है। स्थानीय बच्चे यूनियन कार्बाइड के कचरे को डंप करने के लिए बनाए गए सोलर इंपोरेशन तालाब के बारे में यह जानते हैं कि यहां यूनियन कार्बाइड का कचरा डाला जाता था, पर उन्हें यह नहीं मालूम कि यह जहरीला है।

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    Source: 
    न्यूज नेशन, 03 दिसंबर 2014
    भोपाल में आज से 30 साल पूर्व 2-3 दिसंबर 1984 को जहरीली गैस का रिसाव हुआ। जिसके कारण हजारो लोगों को अपनी जान गवांनी पड़ी।
    इस खबर के स्रोत का लिंक: 

    http://www.newsnation.in

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    .देश के दक्षिणी राज्यों कर्नाटक, केरल, और तमिलनाडु में समुद्र तट पर हजारों गांवों पर इन दिनों सागर की अथाह लहरों का आतंक मंडरा रहा है। समुद्र की तेज लहरें तट को काट देती हैं और देखते-ही-देखते आबादी के स्थान पर नीले समुद्र का कब्जा हो जाता है। किनारे की बस्तियों में रहने वाले मछुआरे अपनी झोपड़ियां और पीछे कर लेते हैं।

    कुछ ही महीनों में वे कई किलोमीटर पीछे खिसक आए हैं। अब आगे समुद्र है और पीछे जाने को जगह नहीं बची है। कई जगह पर तो समुद्र में मिलने वाली छोटी-बड़ी नदियों को सागर का खारा पानी हड़प कर गया है, सो इलाके में पीने, खेती और अन्य उपयोग के लिए पानी का टोटा हो गया है।

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    Author: 
    ऐश्वर्या पंडित
    Source: 
    आज समाज, 09 दिसम्बर 2014
    . 2-3 दिसम्बर, 1984 की उस दुर्भाग्यपूर्ण रात को भोपाल में यूनियन कार्बाइड संयंत्र के आसपास के क्षेत्र में रह रहे हजारों लोगों को त्रासदी से प्रभावित हुए तीन दशक बीत चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद पीड़ितों व रोगियों को आज तक न्याय नहीं मिल पाया है। इस बात को समझने को प्रयास करने की कोई तुक नहीं है कि वॉरेन एंडरसन को कैसे और क्यों भाग जाने दिया गया।

    वॉरेन एंडरसन की मृत्यु हो चुकी है और उस पर कभी भी मुकदमा दायर नहीं किया जाएगा। भोपाल गैस त्रासदी का एक शर्मनाक पहलू जो शेष रह जाता है वो यह कि यह अब केवल ऐसी अखबार की कहानी रह गई है जो सक्रियतावादियों द्वारा समर्थित परिवारों द्वारा मोमबत्ती की रोशनी में निकाले गए विरोध जुलूस के माध्यम से समय-समय पर प्रकाशित होती रहती है।

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    Author: 
    कृष्ण गोपाल 'व्यास’
    Source: 
    जल चौपाल, 2013

    अध्याय तीन


    .बघेलखण्ड अंचल की लोक संस्कृति में जल विज्ञान और प्रकृति को समझने के लिए हम लोग सतना जिले के उचेहरा ब्लाक के ग्राम पिथौराबाद गए। बघेलखण्ड अंचल में हमारे सम्पर्क सूत्र तथा अध्ययन के सहयोगी थे सर्जना सामाजिक सांस्कृतिक एवं साहित्यिक मंच के अध्यक्ष और बघेली लोक संस्कृति के मर्मज्ञ बाबूलाल दाहिया। उन्होंने पिथौराबाद की चौपाल में क्षेत्रीय संयोजक का दायित्व संभाला और चौपाल में छूटी जानकारियों को भेजने का काम जारी रखा तथा जानकारियों से सम्बन्धित शंकाओं का समाधान किया। जी.पी. सिंह, अरुण त्यागी और मदनकान्त पाठक ने अतिरिक्त जानकारियां उपलब्ध कराईं।

    पिथौराबाद की चौपाल में सतना, रीवा और सीधी जिलों के अनेक ग्रामों के प्रबुद्ध बुजुर्ग, अनुभवी किसान, पानी पर काम करने वाले समाजसेवी, पानी का कष्ट भोगने वाले नागरिक, महिलाएं तथा पंचायत राज व्यवस्था के सदस्य सम्मिलित हुए।

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    Author: 
    कुबूल अहमद
    Source: 
    लोकस्वामी, दिसम्बर 2014
    .भगत सिंह अपनी जिन्दगी बचाने के लिए अपनी जमीन-जायदाद सब कुछ बेच चुके हैं, लेकिन उनकी सेहत सुधरने के बजाय दिनोंदिन और बिगड़ती जा रही है। कभी शरीर से हट्टे-कट्टे रहे भगत अब इतना कमजोर हो चुके हैं कि उनके लिये बिस्तर से उठ पाना तो दूर, किसी से बात तक कर पानी मुश्किल हो रहा है। हर नए शख्स के चेहरे को वह एकटक देखते ही रहते हैं। उनके परिजन किसी तरह इलाज तो करा रहे हैं, लेकिन उन्होंने भी अब भगत के बचने की उम्मीद छोड़ दी है।

    बिस्तर पर पड़े इस शख्स को मौत किसी भी वक्त अपने आगोश में ले सकती है। उन्हें मुँह का कैंसर है, जो अन्तिम चरण में पहुँच चुका है। यहाँ एक और शख्स हैं हरिचंद्र, जिनके गले के कैंसर का इलाज उनकी बहन करा रही हैं। भगत-हरिचंद्र उत्तर प्रदेश स्थित ग्रेटर नोएडा के सादेपुर गाँव के रहने वाले हैं। यह दिल्ली से महज तीस किमी दूरी पर स्थित है।

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    Author: 
    सत्येन्द्र सिंह
    Source: 
    लोकस्वामी, दिसम्बर 2014
    ग्रेटर नोएडा का मामला न तो पहला है और न ही अन्तिम। यह पूँजीवादी विकास मॉडल का नतीजा है। यह पहले ही पंजाब में हरित क्रान्ति के नाम पर कैंसर ला चुका है।

    .उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्ध नगर जिले के गाँवों में जिस प्रकार कैंसर जैसी स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएँ सामने आ रही हैं, वैसी घटनाएँ पंजाब में पिछले करीब दो दशक से देखी जा रही हैं। विभिन्न संगठनों की पहल के बाद उम्मीद थी कि हालत में सुधार आएगा, लेकिन स्थिति सुधरने के बावजूद बिगड़ती ही जा रही है।

    अब पंजाब के मालवा क्षेत्र में प्रतिदिन एक आदमी कैंसर और हेपटाइटिस सी की चपेट में आ रहा है, जबकि सरकार और कम्पनियों की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। समझा जा सकता है कि देश के अन्य हिस्सों में भी ऐसा हो सकता है।

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    Author: 
    कृष्ण गोपाल 'व्यास’
    .महात्मा गांधी मानते थे कि गाँवों की सेवा करने से ही सच्चे अर्थों में ग्राम स्वराज की स्थापना होगी। उनकी कल्पना का गाँव ऐसा आदर्श गाँव था जो अपनी महत्वपूर्ण जरूरतों के मामले में आत्मनिर्भर हो। इतना आत्मनिर्भर होगा कि वह अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिये पड़ोसियों पर भी निर्भर नहीं होगा। यदि कुछ जरूरतें, जिनके लिये सहयोग अनिवार्य है, बच रहतीं हैं, तो वह पड़ोसियों की मदद लेगा। गाँव में अपनी खुद की व्यवस्थाएँ होंगी।

    अपनी जरूरत की चीजें और अनाज को पैदा करने का इन्तजाम, अपना स्कूल, सभा भवन, खेलकूद का मैदान, नाटकशाला, पानी का इन्तजाम, अपना वाटरवर्क्स, कुओं, तालाबों पर अधिकार और पशुओं की जरूरतों को पूरा करने के लिये फाजिल जमीन होगी।

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    Author: 
    ओ.पी. जोशी
    Source: 
    सर्वोदय प्रेस सर्विस, दिसंबर 2014
    .केंद्र की नई सरकार में पर्यावरण की अनदेखी तो मन्त्रिमण्डल गठन से ही प्रारम्भ हो गई थी जब कोई पूर्णकालीन पर्यावरण व वन मन्त्री नहीं बनाया गया। प्रकाश जावड़ेकर को वन व पर्यावरण मन्त्रालय के साथ सूचना व प्रसारण दिया गया था। इसके बाद निर्धारित समय में सर्वोच्च न्यायालय में मन्त्रालय ने उत्तराखण्ड की जलविद्युत परियोजनाओं से जैव विविधता पर पड़ रहे प्रभाव की रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की। यह रिपोर्ट 10 अक्टूबर 2014 को न्यायालय में प्रस्तुत की जानी थी। इस लेटलतीफी से नाराज होकर न्यायालय ने सरकार से कहा कि वह कुम्भकर्ण जैसा व्यवहार कर रही है।

    पिछली यूपीए सरकार में पर्यावरण सम्बन्धित काफी कठोर नियम कानून बनाए थे, जिससे कई उद्योगपति एवं औद्योगिक घराने नाराज थे। यह दलील दी जा रही थी कि कठोर नियम कानून से देश में पूँजी निवेश एवं आर्थिक विकास पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा।

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    .कलम और तलवार दोनों के समान धनी महाराज छत्रसाल ने सन् 1907 में जब छतरपुर शहर की स्थापना की थी तो यह वेनिस की तरह हुआ करता थ। चारों तरफ घने जंगलों वाली पहाड़ियों और बारिश के दिनों में वहाँ से बहकर आने वाले पानी की हर बूँद को सहजेने वाले तालाब, तालाबों के बीच से सड़क व उसके किनारे बस्तियाँ।

    सन् 1908 में ही इस शहर को नगरपलिका का दर्जा मिल गया था। आसपास के एक दर्जन जिले बेहद पिछड़े थे से व्यापार, खरीदारी, सुरक्षित आवास जैसे सभी कारणों के लिए लोग यहाँ आकर बसने लगे।

    आजादी मिलने के बाद तो यहाँ का बाशिन्दा होना गर्व की बात कहा जाने लगा। लेकिन इस शहरीय विस्तार के बीच धीरे-धीरे यहाँ की खूबसूरती, नैसर्गिकता और पर्यावरण में सेंध लगने लगी।

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    Author: 
    शशांक द्विवेदी
    Source: 
    प्रजातन्त्र लाइव, 19 दिसम्बर 2014
    .पिछले दिनों जलवायु परिवर्तन और कार्बन उत्सर्जन को लेकर पेरू की राजधानी लीमा में 190 देशों के प्रतिनिधि पर्यावरण के बदलाव पर चर्चा करने के लिए एकत्र हुए थे।

    12 दिनों तक चलने वाले इस शिखर सम्मलेन का आयोजन यूनाइटेड नेशन फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (यूएनएफसीसीसी) द्वारा किया गया था जिसमें दुनिया भर के 12,500 राजनीतिज्ञ, राजनयिक, जलवायु कार्यकर्ता और पत्रकारों ने भाग लिया। लेकिन यह सम्मलेन रस्म अदायगी का एक और सम्मलेन बनकर रह गया जिसमें कोई ठोस निष्कर्ष नहीं निकला।

    इस शिखर सम्मेलन का उद्देश्य नई जलवायु परिवर्तन सन्धि के लिए मसौदा तैयार करना था, ताकि 2015 में पेरिस में होने वाली वार्ता में सभी देश सन्धि पर हस्ताक्षर कर सकें।

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    Author: 
    अनुपम मिश्र
    Source: 
    तहलका
    जब हम अपने देश की नदियों – गंगा, यमुना, नर्मदा और ब्रह्मपुत्र और इनके किनारे गुजर-बसर करने वाले करोड़ों जिन्दगियों के बारे में सोचें तो यह भी सोचें कि किस तरह कुछ मुट्ठी भर राजनेता बीते तीन-चार दशकों से उनकी ज़िन्दगी तय या बरबाद कर रहे हैं। ये नदियाँ कई लाख वर्षों से सदानीरा बह रही हैं लेकिन इधर कुछ सालों से विकास की अन्धाधुन्ध दौड़ में लगा समाज इन्हें नष्ट करने में लगा है। नदियों के बढ़ते प्रदूषण और इनके खत्म होने की कहानी पर आधारित अनुपम मिश्र जी का यह लेख।

    .देश की तीन नदियाँ- गंगा, यमुना और नर्मदा अपने किनारे करोड़ों जिन्दगियों को आश्रय देती हैं। उन्हें पीने का पानी, खेतों की सिंचाई से लेकर उनके मल तक धोने का काम करती हैं। मैं इस पंक्ति के साथ मुट्ठी भर राजनेता भी जोड़ना चाहूँगा। जब भी हम इन तीन नदियों और करोड़ों जिन्दगियों के बारे में सोचें तो यह भी सोचें कि किस तरह कुछ मुट्ठी भर राजनेता पिछले चार दशकों से उनकी जिन्दगी तय या बरबाद कर रहे हैं।

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    Author: 
    पुष्यमित्र
    .कचहरिया डीह बिहार के नवादा जिले का एक बदनसीब टोला है। रजौली प्रखण्ड के हरदिया पंचायत में स्थित इस गाँव को आस-पास के लोग विकलांगों की बस्ती कहते हैं।

    71 घरों वाले इस छोटे से टोले के सौ के करीब जवान लड़के-लड़कियाँ चलने-फिरने से लाचार हैं। उनकी हड्डियाँ धनुषाकार हो गई हैं। यह सब तीन दशक पहले शुरू हुआ जब अचानक इस बस्ती के भूजल में फ्लोराइड की मात्रा तय सीमा से काफी अधिक हो गई और बस्ती स्केलेटल फ्लोरोसिस के भीषण प्रकोप का शिकार हो गया।

    हालाँकि मीडिया में लगातार यहाँ की परिस्थितियों पर खबरें आने से एक फायदा तो यह हुआ कि सरकार का ध्यान इस ओर गया और यहाँ वाटर ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित हो गया। मगर देखरेख के अभाव में पिछले दिनों वह चार माह से खराब पड़ा था, महज दस दिन पहले यह ठीक हुआ है।

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    Author: 
    राॅबिन शाॅ पुष्प
    Source: 
    परिषद साक्ष्य, नदियों की आग, सितंबर 2004
    .जब कोई अपने शहर से दूर रहता है, तो अपने शहर को पुकारता है। परंतु इस शीला को क्या हो गया... ‘ओ बारौनी, आमार डाक शोनो रे...’ पटना में एमए करते समय, उसके उसने छात्रावास से एक खत लिखा था - ‘मुंगेर शहर नहीं है। वहां के दिन, शवयात्रा से लौटे लोगों की तरह इतने अधिक उदास और टूटे हुए होते हैं, कि वे और ज्यादा उदास हो ही नहीं सकते... मुंगेर शहर नहीं, एक दार्शनिक है... अकेला, उदास, चुप-चुप और इसे कभी भूला नहीं जा सकता है, कम से कम अपने अस्वीकृत क्षणों में तो नहीं....’

    मगर उस दिन, शीला अपने शहर को भूल गयी थी। मैं भूल गया था। मुंगेर के तमाम लोग भूल गये थे। ओ बारौनी, आमार डाक शोनो रे... ओ तोइयलो शोधागार। और हर पुकार, प्रतिध्वनि की तरह वापस लौट आयी था। बरौनी, पत्थर का बुत। एक सख्त ऐब्स्ट्रैक्ट चेहरा।

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    .इन दिनों किसानों की मुसीबतें कम होने के बजाय बढ़ती जा रही हैं। एक तरफ किसानोें को धान का समर्थन मूल्य भी नहीं मिल रहा है, बोनस नहीं मिल रहा है। दूसरी तरफ गेहूँ के लिए खाद और खासतौर से यूरिया की किल्लत से किसान परेशान हैं। मध्य प्रदेश में तो कई जगह यूरिया को पुलिस निगरानी में वितरित किया जा रहा है।

    केन्द्रीय खाद्य मन्त्रालय ने राज्य सरकारों को निर्देश जारी कर दिया है कि इस साल गेहूँ व धान पर न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बोनस की घोषणा न करें। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान की सरकारें पिछले वर्षों में 100 से 200 रु. प्रति क्विण्टल का बोनस देती रही हैं। अब उन्हें भविष्य में ऐसा नहीं करने को कहा गया है। यदि वे ऐसा करती हैं तो केन्द्र इन राज्यों में खाद्यान्न खरीदी के काम को रोक देगा।

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    Author: 
    कुमार कृष्णन
    1. मुंगेर के खैरा गाँव में फ्लोराइड युक्त जल की समस्या पर मुख्यमन्त्री गम्भीर और कहा सिर्फ सरकार की नौकरी नहीं कीजिए, बल्कि भगवान से भी डरिए

    2. 5 मार्च 2015 तक योजना पूरा करने के निर्देश मुख्य सचिव फिर 5 जनवरी को पटना में खैरा की स्थिति की करेंगे समीक्षा

    .नक्सल प्रभावित हवेली खड़गपुर प्रखण्ड का खैरा गाँव फ्लोराइड युक्त जल के सेवन से हो रही विकलांगता के कारण सुर्खियों में है। लगभग साढ़े चार वर्ष पूर्व सूबे के तत्कालीन मुख्यमन्त्री नीतीश कुमार खुद खैरा गाँव पहुँच गए। पूर्वी रमनकाबाद पंचायत का खैरा गाँव फ्लोराइड की चपेट में है। इस गाँव के लोगों के लिए जल जीवन नहीं मौत है। दूषित जल के सेवन से कर्इ अपंग हो गए, तो कर्इ असमय ही काल के गाल में समा गए। तत्कालीन मुख्यमन्त्री नीतीश कुमार ने ग्रामीणों को फ्लोराइड के अभिशाप से मुक्ति दिलाने के लिए 5 जून 2010 को विश्वास यात्रा के क्रम में करोड़ों की राशि से जलापूर्ति योजना का शिलान्यास किया।

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    .वैसे तो नोएडा की पहचान एक उभरते हुए विकसित इलाके के तौर पर है लेकिन यहाँ के कई गाँव वहाँ रच-बस चुकी कैंसर की बीमारी के कारण जाने जाते हैं। अच्छेजा गाँव में बीते पाँच साल में दस लोग इस असाध्य बीमारी से असामयिक काल के गाल में समा चुके हैं। अब अच्छेजा व ऐसे ही कई गाँवों में लोग अपना रोटी-बेटी का नाता भी नहीं रखते हैं। दिल्ली से सटे पश्चिम उत्तर प्रदेश का दोआब इलाका, गंगा-यमुना नदी द्वारा सदियों से बहाकर लाई मिट्टी से विकसित हुआ था। यहाँ की मिट्टी इतनी उपजाऊ थी कि पूरे देश का पेट भरने लायक अन्न उगाने की क्षमता थी।

    अब प्रकृति इंसान की जरूरत तो पूरा कर सकती है, लेकिन लालच को नहीं। और ज्यादा फसल के लालच में यहाँ अन्धाधुन्ध खाद व कीटनाशकों का जो प्रयोग शुरू हुआ कि अब यहाँ पाताल से, नदी, से जोहड़ से, खेत से, हवा से हवा-पानी नहीं मौत बरसती हैं। बागपत से लेकर ग्रेटर नोएडा तक के लगभग 160 गाँवों में हर साल सैकड़ों लोग कैंसर से मर रहे हैं। सबसे ज्यादा लोगों को लीवर व आँत का कैंसर हुआ है।

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    Author: 
    कृष्ण गोपाल 'व्यास’
    .सारी दुनिया में अधिकांश बीमारियाँ अशुद्ध पानी पीने के कारण होती हैं। इस बात को ध्यान में रखकर भारत सरकार ने पीने के पानी की शुद्धता के मापदण्ड (¼ Indian Standard Drinking Water Specification (BIS 10500 : 2009) तय किए हैं। इन मापदण्डों की कुल संख्या 34 है। उनमें पानी के भौतिक गुण, रासायनिक गुण और बैक्टेरालाजिकल गुण सम्मिलित है। पानी सप्लाई करने वाली संस्था का दायित्व है कि वह उनका सख्ती से पालन करे।

    समाज का दायित्व है कि वह दूषित पानी का उपयोग नहीं करे। अनेक बार संस्थाएँ मुख्य रसायनों की जाँच को अपने कर्तव्यों की इतिश्री मान लेती हैं जबकि बहुत ही कम मात्रा में मिलने वाले रसायन अधिक गम्भीर बीमारी का सबब् होते हैं। जरूरी है कि पानी की जाँच कराने वाले संस्थानों को पानी के सभी 34 मानकों की पूरी जाँच कराना चाहिए। इस जाँच में एक भी मानक नहीं छूटना चाहिए। जाँच हमेशा विश्वसनीय तथा प्रतिष्ठित प्रयोगशाला में कराना चाहिए।

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    Source: 
    परिषद साक्ष्य, नदियों की आग, सितंबर 2004
    (यहाँ जो दस्तावेज दिया जा रहा है, वह सरकार के आंकड़ों पर आधारित है, इस आलेख का उद्देश्य मात्र भारतीय नदीजोड़ योजना से परिचय कराने का है। इसमें भारतीय नदीजोड़ योजना से पड़ने वाले प्रभावों के बारे में भी सरकार का कथन ही दिया गया है। )

    .भारत में नदियों को जोड़ने का विचार, जो बहुत दिनों से शांत पड़ा था, खासकर 2002 के कावेरी विवाद एवं उसी वर्ष देशभर के विभिन्न हिस्सों में पड़े सूखे के कारण एक बार फिर चर्चा में आ गया है। एक जनहित याचिका के जवाब में उच्चतम न्यायालय ने इच्छा जतायी है कि भारत में नदियों को जोड़ने की परियोजना आगे बढ़ायी जा सकती है।

    प्रधानमन्त्री ने परियोजना के अमलीकरण के तौर-तरीके पर विचार करने के लिए एक कार्यदल के गठन की घोषणा की एवं घोषित किया कि इस काम को ‘युद्ध गति’ से आगे बढ़ाया जाएगा। सरकार द्वारा इसे भावी जल समस्या के स्थायी हल के प्रयास के तौर पर प्रस्तुत किया गया। इस निर्णय पर बहुत गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है एवं इस पर आगे बढ़ने से पहले सरकार द्वारा बहुत सावधानीपूर्वक पुनर्विचार की आवश्यकता है।

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    Author: 
    सौरभ राय
    Source: 
    यथावत, जनवरी 2015
    कहा जरूर जाता था कि भारत की आत्मा गाँव में बसती है। पर गाँव ही सबसे उपेक्षित रहे। बार-बार गाँव की धरती और किसान के नाम पर वोट माँगे गए। पर धरातल पर कुछ हुआ नहीं। गाँव और किसान पिछड़ते चले गए। अब गाँवों को आदर्श बनाने की शुरुआत हुई है। सांसद आदर्श ग्राम योजना का हश्र क्या होगा, भविष्य ही बताएगा। पर उसका क्या स्वरूप हो सकता है, यह जानना जरूरी है। यथावत संवाददाता ने प्रधानमन्त्री मोदी द्वारा गोद लिए गए गाँव की वर्तमान स्थिति का जायजा लिया। जब जयापुर ‘आदर्श गाँव’ घोषित हो जाएगा, तब उस परिवर्तन पर भी हमारी नजर रहेगी।

    .प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने 15 अगस्त को लालकिले की प्राचीर से अपने प्रथम सम्बोधन में ‘सांसद आदर्श ग्राम जना’की बात कही थी। तब ऐसा लगा कि महात्मा गाँधी के ग्राम स्वराज की अवधारणा अब मूर्त रूप लेगी। इस बात के संकेत दिए गए कि अगर यह महात्वाकांक्षी योजना सफल रही तो निश्चित रूप से भारत में ग्राम स्वराज का नया मॉडल प्रस्तुत होगा।

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