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    कॉप 23कॉप 23बॉन में 6 नवम्बर से आगामी 17 नवम्बर तक चलने वाले जलवायु परिवर्तन सम्मेलन से पर्यावरण में हो रहे प्रदूषण और कार्बन उर्त्सजन को कम करने की दिशा में दुनिया को खासी उम्मीदें हैं। हो भी क्यों न क्योंकि पेरिस सम्मेलन में दुनिया के तकरीब 190 देशों ने वैश्विक तापमान बढ़ोत्तरी को दो डिग्री के नीचे हासिल करने पर सहमति व्यक्त की थी।

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    छत्तीसगढ़ में किसानों को भूजल के इस्तेमाल पर प्रतिबन्धछत्तीसगढ़ में किसानों को भूजल के इस्तेमाल पर प्रतिबन्ध05 नवम्बर को एक एजेंसी के हवाले से छपी एक खबर के मुताबिक, छत्तीसगढ़ राज्य सरकार ने रबी की फसलों के लिये भूजल के उपयोग पर प्रतिबन्ध लगा दिया है। राज्य सरकार ने छत्तीसगढ़ में धान की खेती पर प्रतिबन्ध का भी आदेश जारी कर दिया गया है। छत्तीसगढ़ किसान सभा इसका कड़ा विरोध कर रही है।

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    Author: 
    शुभू पटवा
    Source: 
    सर्वोदय प्रेस सर्विस, दिसम्बर 2017

    अनुपम मिश्रअनुपम मिश्रमुझे एक गीत की ये पंक्तियाँ याद आ रही हैं

    कहाँ गया उसे ढूँढो../
    सुलगती धूप में छाँव के जैसा/
    रेगिस्तान में गाँव के जैसा/
    मन के घाव पर मरहम जैसा था वो/
    कहाँ गया उसे ढूँढो...


    पर वह तो अदृश्य में खो गया है। एक ऐसे अदृश्य में, जहाँ रोशनी नहीं पहुँचती। जब तक था, सबको रोशनी दी। सबको रोशन किया।

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    Author: 
    उमेश कुमार राय

    बंगलुरु में चंदन की लकड़ी काटने के आरोप में गिरफ्तार युवकों को ले जाती पुलिसबंगलुरु में चंदन की लकड़ी काटने के आरोप में गिरफ्तार युवकों को ले जाती पुलिसपर्यावरण किसी भी सरकार के लिये कभी भी बहुत अहम नहीं रहा है। हर सरकार के लिये विकास प्राथमिकता रहा है। वह चाहे पर्यावरण की कीमत पर हो या दूसरी कीमतों पर।

    किसी निजी या सरकारी प्रोजेक्ट के लिये पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलाना और तालाबों को पाटना तो खैर आम बात है।

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    टिहरी बाँध की उँचाई बढ़ने से कुछ और गाँव डूब क्षेत्र में आएँगेटिहरी बाँध की उँचाई बढ़ने से कुछ और गाँव डूब क्षेत्र में आएँगेजिस पानी से एक सम्पूर्ण सभ्यता, संस्कृति जिन्दा थी, वही पानी उन लोगों को नसीब नहीं हो पा रहा है, जिसे उन्होंने देश के लिये कुर्बान किया था। ऐसी हालात उत्तराखण्ड के टिहरी बाँध विस्थापितों की बनी हुई है। वे अब पुनर्वास होकर नरक जैसी जिन्दगी जीने के लिये मजबूर हैं। जो सुहावने सपने उन्हें सरकारों ने टिहरी बाँध बनने पर दिखाई थी वे सभी सपने उनके सामने चकनाचूर हो गए हैं।

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    दक्षिण भारत में पेड़ों के साथ खड़े अप्पिको आन्दोलन के लोगदक्षिण भारत में पेड़ों के साथ खड़े अप्पिको आन्दोलन के लोगचिपको आन्दोलन की तरह दक्षिण भारत के अप्पिको आन्दोलन को अब तीन दशक से ज्यादा हो गए हैं। दक्षिण भारत में पर्यावरण के प्रति चेतना जगाने में इसका उल्लेखनीय योगदान है। देशी बीजों से लेकर वनों को बचाने का आन्दोलन लगातार कई रूपों में फैल रहा है।

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    प्रथम अनुपम व्याख्यानप्रथम अनुपम व्याख्यानश्री अनुपम मिश्र जी कागज से लेकर जमीन तक पानी की अनुपम इबारतें लिखने वाली शख्सियत थे। उनकी देह के पंचतत्वों में विलीन जाने की तिथि होने के कारण 19 दिसम्बर हम सभी पानी कार्यकर्ताओं तथा लेखकों के लिये खास स्मरण की तिथि है। किन्तु अनुपम सम्बन्ध में 22 दिसम्बर का भी कोई महत्त्व है; यह मुझे ज्ञात न था। मैं, श्री अनुपम मिश्र के जन्म की तिथि भी पाँच जून को ही जानता था। बाद में पता चला कि पाँच जून तो सिर्फ स्कूल में लिखा दी गई तिथि थी।

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    आर्सेनिकग्रस्त मरीजआर्सेनिकग्रस्त मरीजगंगा नदी घाटी में आर्सेनिक की मौजूदगी और भविष्य में इसकी क्या स्थिति रहेगी, इसको लेकर व्यापक स्तर पर शोध होने जा रहा है।

    इस शोध कार्य में भारत के चार संस्थानों के साथ ही यूके की भी चार संस्थाएँ हिस्सा लेंगी।

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    Author: 
    कुशाग्र राजेंद्र और नीरज कुमार

    चम्पारण के बीचोंबीच स्थित मोती झील, मनों की शृंखला का एक हिस्सा जो बाढ़ के दिनों में पानी के जलग्रहण का काम करती हैचम्पारण के बीचोंबीच स्थित मोती झील, मनों की शृंखला का एक हिस्सा जो बाढ़ के दिनों में पानी के जलग्रहण का काम करती हैहिमालय की तलहटी में बसा तराई और गंगा के बीच का मैदानी भाग सभ्यता के शुरुआत से ही अपनी कृषि उत्पादकता के लिये मशहूर रहा है। यहाँ नियमित रूप से आने वाली सालाना बाढ़ इसका आधार रही है। इन इलाकों के लिये नदियाँ और बाढ़ कोई नया नहीं है, बल्कि हरेक साल हिमालय से पानी का रेला थोड़े समय के लिये पूरे मैदानी क्षेत्रों में फैलता रहा है।

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    गंगागंगाअब यह एक स्थापित तथ्य है कि यदि गंगाजल में वर्षों रखने के बाद भी खराब न होने का विशेष रासायनिक गुण है, तो इसकी वजह है इसमें पाई जाने वाली एक अनन्य रचना। इस रचना को हम सभी ‘बैक्टीरियोफेज’ के नाम से जानते हैं।

    बैक्टीरियोफेज, हिमालय में जन्मा एक ऐसा विचित्र ढाँचा है कि जो न साँस लेता है, न भोजन करता है और न ही अपनी किसी प्रतिकृति का निर्माण करता है। बैक्टीरियोफेज, अपने मेजबान में घुसकर क्रिया करता है और उसकी यह नायाब मेजबान है, गंगा की सिल्ट।

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    विश्व आर्द्रभूमि दिवस 2 फरवरी 2018 पर विशेष


    लोकटक झीललोकटक झील2 फरवरी को दुनिया भर में विश्व आर्द्रभूमि (वेटलैंड्स) दिवस मनाया जाता है। सन 1971 में इसी दिन वेटलैंड्स को बचाने के लिये ईरान के रामसर में पहला सम्मेलन किया गया था। इसलिये इस सम्मेलन को रामसर सम्मेलन (कन्वेंशन) भी कहा जाता है।

    इस कन्वेंशन में एक अन्तरराष्ट्रीय समझौता किया गया था। इस समझौते की बुनियाद में विश्व भर की आर्द्रभूमि की सुरक्षा का संकल्प था।

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    विनम्र श्रद्धांजलि- (16 फरवरी 2018), डॉ. ध्रुव ज्योति घोष के जाने से ईस्ट कोलकाता वेटलैंड आज अनाथ हो गया।

    डॉ. ध्रुव ज्योति घोेषडॉ. ध्रुव ज्योति घोेषप्रकृति-पर्यावरण को लेकर कुछ लोगों के काम को देखकर अनायास ही यह ख्याल जेहन में कौंध जाता है कि उनका इस धरती पर आने का उद्देश्य ही यही रहा होगा।

    पानी को लेकर काम करने वाले अनुपम मिश्र के बारे में ऐसा ही कहा जा सकता है। कोलकाता में रह रहे एक और शख्स के काम को देखकर यही ख्याल आता है। वह शख्स थे डॉ. ध्रुवज्योति घोष।

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    कावेरी नदीकावेरी नदीप्रकृति ने जल से लेकर जंगल तक बिना किसी भेदभाव के अपनी सम्पदा मानव को दे दी थी और साथ ही अधिकार भी कि जो भी प्राकृतिक है वो तुम्हारा है। मनुष्य ने अपनी स्वार्थी प्रवृत्ति के चलते प्राकृतिक जल के बँटवारे कर डाले और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में लोग बरसों से पानी-पानी करते जल का बँटवारा करते आ रहे हैं। महासागरों का बँटवारा हो सकता है तो हमारे देश की कावेरी नदी को बाँटना कोई बड़ी बात नहीं लगती।

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    कीटनाशक का छिड़काव करता किसानकीटनाशक का छिड़काव करता किसानकीटनाशकों को लेकर एक फैसला, पंजाब के कृषि एवं कल्याण विभाग ने बीती 30 जनवरी को लिया; दूसरा फैसला, 06 फरवरी को उत्तर प्रदेश की कैबिनेट ने। उत्तर प्रदेश कैबिनेट ने कीट रोग नियंत्रण योजना को मंजूरी देते हुए जैविक कीटनाशकों और बीज शोधक रसायनों के उपयोग के खर्च का 75 प्रतिशत तथा लघु-सीमांत किसानों को कृषि रक्षा रसायनों, कृषि रक्षा यंत्रों तथा दाल, तिलहन व अनाजों के घरेलू भण्डार में काम आने वाली बखारों (ड्रमों) पर खर्च का 50 प्रतिशत अनुदान घोषित किया।

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    आर्सेनिकयुक्त पानी पीने को मजबूर बच्चेआर्सेनिकयुक्त पानी पीने को मजबूर बच्चे6 साल की पूर्णिमा वैरागी पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिलान्तर्गत बशीरहाट के मेरूदंडी गाँव में रहती है और पास के ही स्कूल में नियमित पढ़ने जाती है।

    खुशमिजाज पूर्णिमा इस बात से पूरी तरह अनजान है कि उसके शरीर में आर्सेनिक नाम का जानलेवा तत्व प्रवेश कर चुका है और अगर अभी से एहतियात नहीं बरती गई, तो वह आर्सेनिक से होने वाले कैंसर की चपेट में आ सकती है।

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    युद्ध और शांति के बीच जल - भाग चार

    RuralWaterSat, 04/21/2018 - 19:03


    (प्रख्यात पानी कार्यकर्ता श्री राजेन्द्र सिंह के वैश्विक जल अनुभवों पर आधारित एक शृंखला)
    इजराइली जल प्रबन्धन - दादागिरी भी, समझदारी भी

    इजराइल का जल प्रबन्धनइजराइल का जल प्रबन्धनइजराइल का फिलिस्तीन की पानी पर दादागिरी का वर्णन आप सुना चुके। इससे पहले कि आप इजराइल के पानी प्रबन्धन के बारे में बताएँ, बेहतर होगा कि वहाँ से जुड़े पानी का कोई और विवाद हो तो पाठकों के साथ शेयर करें?

    हाँ, हैं न। इजराइल और जाॅर्डन के बीच पानी का विवाद बहुत पुराना है। यह विवाद, जाॅर्डन नदी के रेपेरियन राइट से जुड़ा है।अब आप देखिए कि लेबनान, सीरिया, जाॅर्डन, इजराइल और कुछ हिस्सा फिलिस्तीन का.. कायदे से जाॅर्डन नदी के पानी के उपयोग में इन सभी की हकदारी है। ताजे जल निकासी तंत्र की बात करें तो खासकर इजराइल, जाॅर्डन और फिलिस्तीन के लिये जाॅर्डन नदी का विशेष महत्त्व है। लेकिन वस्तुस्थिति यह है कि जाॅर्डन के पानी पर सबसे बड़ा कब्जा, इजराइल का है। इजराइल ने फिलिस्तीन के राष्ट्रीय प्राधिकरण को पानी देने से साफ-साफ मना कर रखा है। अब ऐसे में विवाद होगा कि नहीं?

    दरअसल, लोग भूल जाते हैं कि दुनिया के 195 देशों में से करीब-करीब 150 देश ऐसे हैं, जिनके बारे में यह नहीं कहा जा सकता कि वहाँ पानी का कोई संकट नहीं है। आप जड़ में जाएँगे तो पाएँगे कि पानी के संकट के कारण आई अस्थिरता ही आगे चलकर अन्य, सामाजिक, आर्थिक और सामरिक समस्याओं के रूप में उभरी हैं। आप नजर घुमाकर अपने ही देश में देख लीजिए। बांग्लादेश के हमारे पर्यावरण मित्र, फरक्का बाँध को लेकर अक्सर सवाल करते हैं। हम चीन द्वारा ब्रह्मपुत्र नदी की हरकतों पर सवाल उठाते हैं। नेपाल से आने वाली नदियों में बाँधों से अचानक छोड़े पानी के कारण तबाही पर चर्चा होती ही है। पाकिस्तान और हमारे बीच विवाद का एक मुद्दा, पानी भी है। है कि नहीं?

    देश के भीतर देखिए। सतलुज, कावेरी.. विवाद-ही-विवाद हैं। इन्हीं विवादों का जब राजनीतिक इस्तेमाल होता है, तो ये ही दो सत्ताओं के बीच की तनातनी की बुनियाद बन जाते हैं। आज चीन, रुस, अमेरिका जैसे देश रासायनिक हथियार को मुद्दा बनाकर सीरिया के पक्ष-विपक्ष भले ही खड़े दिखाई दे रहे हों; दुनिया को ऊपरी तौर पर भले ही लग रहा हो कि तीसरे विश्व युद्ध का कारण हथियारों की होड़ या वर्ग आधारित उन्माद है। किन्तु क्या आप इनकार कर सकते हैं कि आमने-सामने खड़े देशों में एक की नीयत, दूसरे देश के प्राकृतिक संसाधनों को हड़प लेने की नहीं है?

    आप जाॅर्डन-इजराइल विवाद के बारे में बता रहे थे।
    अरे हाँ, आप देखें कि इजराइल ने 156 मील लम्बी जाॅर्डन नदी पर क्या कर रखा है? उसने एक बाँध बना रखा है। यह बाँध, जाॅर्डन देश की ओर बहकर जाने वाले पानी को रोक देता है। इजराइल यह सब इसके बावजूद करता है, जबकि जाॅर्डन और उसके बीच पानी को लेकर 26 फरवरी, 2015 को हस्ताक्षरित एक औपचारिक द्विपक्षीय समझौता अभी अस्तित्व में है। इस समझौते के तहत पाइप लाइन के जरिए रेड सी को डेड सी से जोड़ने तथा एक्युबा गल्फ में खारे पानी को मीठा बनाने के एक संयंत्र को लेकर सहमति भी शामिल है। ताजा पानी मुहैया कराने तथा तेजी से सिकुड़ते डेड सी की दृष्टि से इस समझौते का महत्त्व है। आलोचना करने वालों का कहना है कि ऐसा कोई समझौता तब तक प्रभावी नहीं हो सकता, जब तक कि इजराइल द्वारा की जा रही पानी की चोरी रुक न जाये। इजराइल द्वारा की जा रही पानी की इस चोरी ने जाॅर्डन की खेती और उद्योग.. दोनों को नुकसान पहुँचाया है। जाॅर्डन के पास घरेलू उपयोग के लिये भी कोई अफरात पानी नहीं है। यहाँ भी वही हुआ? जाॅर्डन में भी लोगों ने पहले पानी के लिये संघर्ष किया और फिर अपना देश छोड़कर स्वीडन, फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड और बेल्जियम चले गए।

    हालांकि, जाॅर्डन के लोग यह भी महसूस करते हैं कि समझौते के बावजूद, जल संकट बरकरार रहने वाला है। वे मानते हैं कि इसका पहला कारण, जाॅर्डन में भी गर्मी तथा मौसमी बदलाव की बढ़ती प्रवृत्ति है। इसकी वजह से जाॅर्डन में भूमि कटाव और गाद में बढ़ोत्तरी हुई है। दूसरा वे मानते हैं कि यदि वे प्रदूषित पानी को साफ कर सकें, तो उनके पास उपयोगी पानी की उपलब्धता बढ़ सकती है। किन्तु उनके पास इसकी तकनीकी का अभाव है।

    वर्षाजल का उचित संचयन और प्रबन्धन वहाँ कारगर हो सकता है। किन्तु जाॅर्डन के इंजीनियर, छोटी परियोजनाओं में रुचि नहीं लेते। उनकी ज्यादा रुचि, नदी घाटी आधारित बड़ी बाँघ परियोजनाओं में रहती है। लोग आगे आएँ तो यह हो सकता है। किन्तु खुद के पानी प्रबन्धन के लिये उनमें प्रेरणा का अभाव है। जाॅर्डन में पानी पर सरकार का अधिकार है। लोगों के बीच पानी प्रबन्धन की स्वस्फूर्त प्रेरणा के अभाव के पीछे एक कारण यह भी दिखता है।

    सरकार और समाज के बीच पुल बने, तो प्रेरणा को जमीन पर उतारने में सफलता मिल सकती है। लेकिन मुझे तो वहाँ ऐसे उत्साही पानी कार्यकर्ताओं का भी अभाव ही दिखाई दिया। जाॅर्डन चाहे, तो इजराइल के पानी प्रबन्धन से सीख ले सकता है। किन्तु दो देशों के बीच विश्वास का अभाव यहाँ भी आड़े आता है।

    इजराइल की होशियारी देखिए कि जहाँ पराए पानी को हथियाने के मामले में वह दादागिरी से काम ले रहा है, वहीं अपने पानी के उपयोग के मामले में बेहद समझदारी से।

    इजराइल, जल संरक्षण तकनीकों के बारे में अपने नागरिकों को लगातार शिक्षित करता रहता है। विविध भूगोल तथा विविध आर्थिक परिस्थितियों के कारण भारत जैसे देश के लिये यह भले ही अनुचित हो, लेकिन इजराइल ने पानी के केन्द्रित और वास्तविक मूल्य आधारित प्रबन्धन को अपनाया है। इजराइल सरकार ने वहाँ जल नियंत्रकों की नियुक्ति की है।

    इजराइल ने खारे पानी को मीठा बनाने की तकनीक को बड़े पैमाने पर अपनाया है। हालांकि यह बेहद महंगी तकनीक है; फिर भी इजराइल ने इसे अपनाया है तो इसके पीछे एक कारण है। इजराइल जानता है कि उसके पास पानी का अपना एकमात्र बड़ा जलस्रोत, गलिली सागर (अन्य नाम: किनरेट लेक) है। उसके पास कोई अन्य स्थानीय विकल्प नहीं है। इजराइल की एक-तिहाई जलापूर्ति, गलिली सागर से ही होती है। खारे को मीठा बनाने की तकनीक के मामले में इजराइली संयंत्रों की खूबी यह है कि वे इतनी उम्दा ऊर्जा क्षमता व दक्षता के साथ संचालित किये जाते हैं कि खारे पानी को मीठा बनाने की इजराइली लागत, दुनिया के किसी भी दूसरे देश की तुलना में कम पड़ती है।

    गौर करने की बात है कि इजराइल में घरेलू जरूरत के पानी की माँग में से 60 प्रतिशत की पूर्ति, इस प्रक्रिया से मिले मीठे पानी से ही हो जाती है। जाॅर्डन नदी पर रोके पानी को वह पूरी तरह पेयजल की माँग पूरी करने के लिये सुरक्षित कर लेता है। फिलिस्तीन के पश्चिमी घाट के जलस्रोतों का इस्तेमाल वह कर ही रहा है।

    इजराइली जल प्रबन्धन की खूबी देखिए।
    इजराइल ने अपने देश में एक बार उपयोग किये जा चुके कुल पानी में से 80 प्रतिशत को पुनः शुद्ध करने तथा पुनरुपयोग की क्षमता हासिल कर ली है। इजराइल अपने समस्त सीवेज वाटर का उपचार करता है। वह ऐसे कुल उपचारित सीवेज जल में से 85 प्रतिशत का उपयोग खेती-बागवानी में करता है; 10 प्रतिशत का इस्तेमाल नदी प्रवाह को बनाए रखने व जंगलों की आग बुझाने के लिये करता है और 05 फीसदी को समुद्र में छोड़ देता है।

    इजराइल में उपचारित जल का कृषि में उपयोग इसलिये भी व्यावहारिक हो पाया है क्योंकि इजराइल में 270 किबुत्ज हैं।

    यह किबुत्ज क्या होता है?
    सामूहिक खेती आधारित बसावटों को इजराइल में 'किबुत्ज' कहते हैं। सामूहिक खेती आधारित बसावटों का यह चलन, इजराइल में अनोखा है। यह चलन, पुनर्चक्रित जल की आपूर्ति को व्यावहारिक बनाने में मददगार साबित हुआ है।

    इजराइल ने सिंचाई तकनीक के क्षेत्र में जो इनोवेशन किये हैं, उनकी खूबी सिर्फ यह नहीं है कि वे पानी की बर्बादी रोकते हैं अथवा कम पानी में फसल तैयार कर देते हैं; उनकी खूबी यह है कि वे फसल के उत्पादन की मात्रा व गुणवत्ता को भी सकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं। उनके ये नवाचार, ऐसे बीजों से भी सम्बन्ध रखते हैं, जो कि कम ताजे पानी में भी बेहतर उत्पाद दे पाते हैं। इजराइल ऐसे बीजों को तैयार करने वाला दुनिया का अग्रणी देश है।

    इजराइल का जलापूर्ति प्रबन्धन सीखने लायक है। इजराइल ने पानी पाइपलाइनों की लीकेज रोकने के बेहतरीन प्रबन्ध किये हैं। इजराइल ने पानी को प्रबन्धन की दृष्टि से तीन श्रेणियों में बाँटा है - ए, बी और सी। वर्षाजल और नदियों के बहते जल को ‘ए’ श्रेणी में रखा है। नगरों को आपूर्ति किये जा रहे ताजे जल यानी नदी जल की पाइप अलग हैं और इनका रंग भी अलग। ये नीले रंग की हैं। खेती में उपयोग के लिये भेजे जा रहे पुनर्चक्रित जल की पाइपों का रंग भूरा है। उद्योग के पुनर्चक्रित पानी को उपयोग के लिये उद्योगों को ही भेजा जाता है। उद्योग को जाने वाले पुनर्चक्रित जल की पाइपों का रंग, लाल रखा गया है।

    कह सकते हैं कि इजराइल, दुनिया का ऐसा देश है, जिसने पानी के लिये अपना प्रबन्धन कौशल, इंजीनियरिंग, संसाधन तथा सामरिक व सांस्कृतिक शक्ति.. सब कुछ समर्पित भाव से झोंक दिया है।

    उसके इस समर्पण का ही परिणाम है कि कुल इजराइली भूगोल में से 60 प्रतिशत के मरुभूमि होने तथा 1948 की तुलना में आज 10 गुना आबादी हो जाने के बावजूद, इजराइल के पास आज उसकी जरूरत से इतना ज्यादा पानी है कि वह अपने पड़ोसियों को पानी बेचता है। निःसन्देह, इसमें दादागिरी से हासिल दूसरे के पानी का भी योगदान है, किन्तु इजराइली पानी प्रबन्धन का योगदान भी कम नहीं। हमें यह भूलना नहीं चाहिए कि पानी की तकनीकी बेचने का इजराइली व्यापार भी आज करीब 2.2 अरब डाॅलर प्रतिवर्ष का है।

    अब आप पूछेंगे कि क्या भारत में ऐसा हो सकता है।...

    जी, मैं पूछने ही वाला था।
    ...तो मैं कहूँगा कि इजराइल ऐसा कर पा रहा है क्योंकि मलिन जल को उपचारित करते हुए वह शुद्धता के उच्चतम मानकों की अनदेखी नहीं करता है। इस बारे में वहाँ अनुशासन है। पानी प्रबन्धन के ज्ञान को जमीन पर उतारने की इजराइली प्रक्रिया और तंत्र... जितना मैंने जाना है, भ्रष्टाचार में डूबे हुए नहीं हैं; वरना पानी प्रबन्धन का भारतीय ज्ञानतंत्र, कम अनूठा नहीं है। भारत की कई कम्पनियों ने इजराइल के पानी प्रबन्धन में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है।

    यदि भारत अपने पानी की नीति और नीयत.. दोनों को भ्रष्टाचार से मुक्त करने की ठान ले, तो भारत का पानी प्रबन्धन, दुनिया को राह दिखाने वाला बन सकता है। यह प्यासे को पानी पिलाने का ही काम नहीं, दुनिया में अमन और शान्ति बहाल करने का भी काम होगा। भारत की सरकार और समाज को इस बारे में संजीदगी से सोचना चाहिए।........

    आगे की बातचीत शृंखला को पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें

    युद्ध और शान्ति के बीच जल

    युद्ध और शान्ति के बीच जल - भाग दो

    युद्ध और शान्ति के बीच जल - भाग तीन

     

     

     

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    बंगाल की नदियों का अस्तित्व खतरे में

    RuralWaterTue, 04/24/2018 - 18:41

    गंगा में ऐसे कई पावर प्लांट कूड़ा डालते हैंगंगा में ऐसे कई पावर प्लांट कूड़ा डालते हैंमानव सभ्यता के विकास में नदियों का बड़ा योगदान है। कमोबेश सभी सभ्यताएँ नदियों के किनारे ही विकसित हुईं हैं। वजह है जीवन के लिये जल सबसे जरूरी तत्व है और नदियों को जल के अकूत स्रोत के रूप में देखा गया।

    भारत में शायद ही कोई राज्य है, जिससे होकर नदियाँ न गुजरती हों। बंगाल की खाड़ी से सटे पश्चिम बंगाल को तो ‘नदीमातृक’ नाम से नवाजा गया है।‘नदीमातृक’ यानी जिसकी माता नदियाँ हों। मतलब कि वह भूखण्ड जिसकी देखभाल नदियाँ करती हों।

    पश्चिम बंगाल में नदियों का जाल बिछा हुआ है। मोटे तौर पर 80 से अधिक छोटी-बड़ी नदियाँ बंगाल से होकर बहती हैं। इनमें से प्रमुख नदियों की संख्या करीब 19 है जिनके नाम बांसलोई, पगला, मयुराक्षी, अजय, जालंगी, चुर्नी, दामोदर, द्वारकेश्वर, कंसाई, भागीरथी, पद्मा, तिस्ता, महानंद, तोरषा आदि हैं। कई नदियों के साथ पौराणिक कथाएँ भी जुड़ी हुई हैं।

    वहीं, जलाशयों की बात करें, तो यहाँ 4296 जलाशय व तालाब हैं। इस लिहाज से देखा जाये, तो पानी के मामले में पश्चिम बंगाल समृद्ध रहा है। लेकिन, हाल के वर्षों में इन जलस्रोतों पर संकट बढ़ा है, जो राज्य की चिन्ता का सबब है। पहले जलाशयों पर ही संकट थे, लेकिन अब नदियाँ भी सुरक्षित नहीं रहीं।

    देखभाल नहीं होने के कारण कई नदियाँ तो सूखने के कगार पर पहुँच गई हैं। पश्चिम बंगाल के कोलकाता शहर के बीचों-बीच बहने वाली आदि गंगा जिसे गंगा नदी का मूल स्रोत कहा जाता है, लगभग खत्म ही हो चुकी है।

    हाल ही में ‘पश्चिम बंगाल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड’ (Pollution Control Board West Bengal) द्वारा जारी एक रिपोर्ट में राज्य में नदियों की स्थिति को लेकर गहरी चिन्ता व्यक्त की गई है। रिपोर्ट में बताया गया है कि किस तरह नदियों के अस्तित्व पर संकट मँडरा रहा है और अगर वक्त रहते जरूरी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले दिनों में दिक्कतें बढ़ेंगी।

    रिपोर्ट के अनुसार पश्चिम बंगाल की नदियों में प्रदूषण का स्तर सामान्य से काफी अधिक है। कभी पीने के उपयोग में लाया जाने वाला नदियों का जल इतना खराब हो चुका है कि वह स्नान करने के योग्य भी नहीं है। राज्य में नदियों के जल की इस स्थिति की प्रमुख वजह है शहरी नालों और औद्योगिक कचरों का नदियों में निकास। गौरतलब है कि किसी भी नदी के पानी की गुणवत्ता का निर्धारण उसमें मौजूद भौतिक, रासायनिक, बायोलॉजिकल व उसकी सुन्दरता के आधार पर किया जाता है। ये तत्व ही बताते हैं कि कोई नदी कितनी सेहतमन्द है।

    पश्चिम बंगाल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड व नेशनल वाटर मॉनीटरिंग प्रोग्राम (National Water Monitoring Program) के अधीन केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (Central Pollution Control Board) द्वारा संयुक्त रूप से पश्चिम बंगाल की नदियों पर गहन निगरानी रखी गई ताकि प्रदूषण के बारे में पुख्ता जानकारी मिल सके। निगरानी का उद्देश्य प्रदूषण को नियंत्रण में लाने के लिये जरूरी कदम उठाना भी था। जाँच में दूसरी नदियों के साथ ही गंगा व भागीरथी को भी शामिल किया गया था। रिपोर्ट बताती है कि धार्मिक महत्त्व रखने वाली इन दोनों नदियों का पानी इतना गन्दा हो चुका है कि उससे नहाया भी नहीं जा सकता।

    गंगा पश्चिम बंगाल की प्रमुख नदी है। यह झारखण्ड के रास्ते पश्चिम बंगाल में प्रवेश करती है। आगे चलकर गंगा नदी का नाम हुगली हो जाता है। पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता हुगली नदी के किनारे ही बसा हुआ है। वहीं, भागीरथी नदी मुर्शिदाबाद जिले के मीठापुर गाँव में गंगा से कटकर निकलती है। यह दक्षिण की तरफ बहती हुई सागरद्वीप के पास बंगाल की खाड़ी में समा जाती है।

    उल्लेखनीय है कि गंगा-भागीरथी में जगह-जगह सात नदियाँ मिलती हैं। रिपोर्ट के अनुसार बहरमपुर, पालता व गार्डनरीच स्टेशन के समीप भागीरथी-गंगा में कोलीफॉर्म बैक्टीरिया की मात्रा सामान्य से अधिक है। गार्डनरीच में गंगा में कोलीफॉर्म की मात्रा 2.40 लाख और बहरमपुर में 1.10 लाख पाई गई है। वहीं, नदी के पानी में अन्य बैक्टीरिया भी अधिक मात्रा में पाये गए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि नदी के पानी का इस्तेमाल पीने के लिये करना खतरनाक हो सकता है।

    टीन ने उत्तर बंगाल की चार नदियों महानंदा, तीस्ता, कालजनी व करोला के पानी की भी जाँच की तो पाया कि इन नदियों के पानी में भी बैक्टीरिया की संख्या सामान्य से अधिक है। इन नदियों का पानी इस्तेमाल के लायक नहीं है।

    उत्तर बंगाल की नदी महानंदा में कोलीफॉर्म की मात्रा 14 हजार व तिस्ता में कोलीफॉर्म की मात्रा 7000 रिकॉर्ड की गई है। करोला नदी में 14000 कोलीफॉर्म मिला है। बताया जा रहा है कि उत्तर बंगाल की नदियों में वर्ष 2014 की तुलना में कोलीफॉर्म की मात्रा में काफी इजाफा हुआ है।

    इसी तरह दक्षिण बंगाल की नदियों के पानी की भी जाँच की गई। जाँच में टीम ने पाया कि दक्षिण बंगाल की नदियों का पानी भी इस्तेमाल योग्य नहीं है। खासकर दामोदर, बराकर, कंसाई व द्वारका नदियों में कोलीफॉर्म की मात्रा सामान्य से अधिक है। दामोदर नदी में आसनसोल के निकट 90 हजार कोलीफॉर्म पाई गई है। वहीं, बराकर नदी में कोलीफॉर्म की मात्रा 17 हजार मिली है।

    यहाँ यह भी बता दें कि ऊपर जिन नदियों का जिक्र किया गया है, उनमें से अधिकतर नदियों में गन्दा सीवेज डाला जाता है और यही वजह है कि इनमें हानिकारक तत्वों की मात्रा सामान्य से अधिक पाई गई है। कोलीफॉर्म मानव मल में पाया जाता है इसलिये नदियों के पानी में इसके बढ़ने का मुख्य कारण सीवेज ही है।

    जाँच रिपोर्ट वर्ष 2015 में लिये गए आँकड़ों के आधार पर तैयार की गई है। गंगा नदी में गन्दगी के सवाल पर पश्चिम बंगाल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के चेयरमैन कल्याण रुद्र कहते हैं, ‘गंगा नदी का पानी तो कहीं भी नहाने लायक नहीं है। चाहे वह हरिद्वार हो या गंगासागर।’

    नदियों पर काम करने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि राज्य सरकार की लापरवाही नदियों की दुर्दशा का कारण है। उनका कहना है कि सीवेज को बिना ट्रीट किये नदियों में गिराना, नदियों के लिये जहर है। इससे न केवल नदियों का पानी प्रदूषित होगा बल्कि भूजल भी प्रदूषित करेगा। चूँकि यहाँ पीने के लिये भूजल का इस्तेमाल अधिक होता है, इसलिये यह सीधे तौर पर राज्य के आम जनजीवन को प्रभावित करेगा।

    नदियों का गन्दा होना पश्चिम बंगाल के लिये चिन्ता की बात है क्योंकि साल-दर-साल यहाँ प्रति व्यक्ति पानी खपत बढ़ रही है जबकि पानी की उपलब्धता कम होती जा रही है। अगर हम आँकड़ा देखें तो बेहद भयावह तस्वीर बनती है। दार्जिलिंग में सन 1951 में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता 18355 क्यूबिक मीटर थी जो वर्ष 2011 में घटकर महज 4568 क्यूबिक मीटर पर आ गई। इसी तरह जलपाईगुड़ी की बात करें तो यहाँ सन 1951 में प्रति व्यक्ति 22881 क्यूबिक मीटर पानी था जो वर्ष 2011में घटकर 4824 क्यूबिक मीटर पर आ गया है। उत्तर बंगाल के दूसरे जिलों में भी यही हाल है। विगत 60 सालों में पानी की उपलब्धता 5 गुनी कम हो गई है।

    पश्चिम बंगाल में पानी की उपलब्धता का आँकड़ा देखें तो सन 1951 में यहाँ प्रति व्यक्ति 4023 क्यूबिक मीटर पानी उपलब्ध था जो वर्ष 2011 में घटकर 1159 क्यूबिक मीटर पर आ गया। अगर किसी जगह प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता 1000 से 1700 क्यूबिक मीटर हो, तो उसे ‘वाटर स्ट्रेस्ड’ क्षेत्र कहा जाता है। वर्ष 2011 के आँकड़ों के अनुसार पश्चिम बंगाल के 7 जिले ‘वाटर स्ट्रेस्ड’ हैं और 6 जिले जलसंकट से जूझ रहे हैं। वहीं चार जिलों में प्रति व्यक्ति 500 क्यूबिक मीटर से कम पानी पाया गया, जो जल की उपलब्धता के लिहाज से खतरनाक स्थिति में है।

    पश्चिम बंगाल में जितने भी जलस्रोत हैं, उनकी तुलना में नदियों से सबसे ज्यादा पानी मिलता है। नदियों से पश्चिम बंगाल को हर साल 694.30 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी मिलता है, इसलिये जल संकट की मौजूदा हालत को देखते हुए नदियों को बचाया जाना बहुत जरूरी है। नदियों का संरक्षण सम्भावित जल संकट से निबटने में कारगर साबित हो सकता है।

    विशेषज्ञों ने भी नदियों को संरक्षित व प्रदूषणमुक्त रखने की सलाह दी है। नदियाँ न केवल पानी का उम्दा स्रोत हैं बल्कि ये भूजल को रिचार्ज करने में भी अहम भूमिका निभाती हैं। अतः नदियों को किसी भी सूरत में बचाया जाना चाहिए। विशेषज्ञों ने सीवेज से निकलने वाले गन्दे पानी को ट्रीट करने के बाद ही नदियों में बहाने की मुखालफत करते हुए इनके कैचमेंट एरिया को दुरुस्त करने की बात कही है।

    रिपोर्ट में लिखा गया है, ‘इस मुद्दे पर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा होनी चाहिए। जनसंख्या में इजाफा होने से पानी की खपत बढ़ी है। ऐसे में जो भी जलस्रोत हैं उन्हें संरक्षित करने की आवश्यकता है।’

    पारम्परिक जलस्रोतों की संरक्षण पर चर्चा करते हुए रिपोर्ट में इन्हें आर्थिक रूप से सस्ता व पर्यावरणीय लिहाज से स्थायी समाधान बताया गया है। उक्त रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ऐसे खाद्य पदार्थों की खेती की जानी चाहिए जिसमें पानी की जरूरत कम हो और उत्पादन अधिक किया जाये। मसलन 15 क्विंटल धान उगाने में जितना पानी खर्च होता है, उतने पानी में 36 क्विंटल गेहूँ व 20 क्विंटल दाल उगाई जा सकती है। अतः सिंचाई में भी पानी का न्यायोचित इस्तेमाल होना चाहिए। विशेषज्ञों की राय है कि पश्चिम बंगाल को प्राथमिकता में रखते हुए जल्द-से-जल्द एक अलग जलनीति तैयार कर उस पर गम्भीरता से काम करना चाहिए।

    गन्दगी के अलावा नदियों में गाद भी एक बड़ी समस्या है। इसके लिये भी जरूरी कदम उठाने की आवश्यकता है। इस बीच खबर है कि केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय देश भर की प्रमुख नदियों के संरक्षण के लिये योजना तैयार करने जा रहा है। नदियों के संरक्षण के लिये प्लान तैयार करने की जिम्मेवारी इण्डियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी को दी जाएगी। पता चला है कि गंगा नदी पर खास फोकस देते हुए पश्चिम बंगाल समेत बिहार, यूपी व अन्य राज्यों में गंगा के कैचमेंट एरिया का ट्रीटमेंट किया जाएगा।

    हालांकि ऐसी योजनाएँ कितनी कारगर होंगी, इस पर विशेषज्ञों को सन्देह है। साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रीवर्स एंड पीपल (सैंड्रप) के हिमांशु ठक्कर कहते हैं, ‘सीवेज के ट्रीटमेंट के लिये विकेन्द्रीकृत सीवर ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित करने की जरूरत है।’उन्होंने आगे कहा कि नदियों के संरक्षण के लिये इसके सभी साझेदारों को योजना में शामिल किया जाना चाहिए।

    विशेषज्ञों का कहना है कि नदियों के संरक्षण की बात ठीक है, लेकिन नदी जल को प्रभावित करने वाली नदियों को जोड़ने की योजना, रीवरफ्रंट डेवलपमेंट जैसी तमाम योजनाओं पर भी विचार किया जाना चाहिए क्योंकि ये योजनाएँ नदियों पर नकारात्मक असर डालती हैं।

     

     

     

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    यह जो इक शहर है बेपानी शिमला...

    RuralWaterTue, 04/24/2018 - 18:45

    एक करोड़ लीटर पानी का सूखा टैंकएक करोड़ लीटर पानी का सूखा टैंकशिमला की ठंड, भारत में एक मुहावरे की तरह है। गर्मी में ठंड की बात हो, तो शिमला याद आता है। उत्तर के मैदानी इलाके में ठंड बढ़ जाये तो कहा जाता है कि शिमला की हवा चल गई। और-तो-और यदि ठंड में बर्फ का नजारा देखने की बात हो, तो भी शिमला का ही नाम लिया जाता है।

    अब यदि मैं शिमला का नाम एक ऐसे शहर के रूप में लूँ, जहाँ पानी की कमी है; जहाँ के नलों में तीसरे-चौथे दिन पानी आता है; जहाँ मार्च के अन्तिम सप्ताह में लू चलती है; तो आप क्या कहेंगे? या तो आप विश्वास नहीं करेंगे या आपके मन में बनी शिमला की छवि टूटेगी। किन्तु शिमला की ताजा स्थिति यही है।

    शिमला के आम आदमी से लेकर नगरनिगम, विधानसभा और राजभवन तक सोच रहे हैं कि जब मई-जून की तपिश सिर पर आएगी, तो शिमला नगर की जलापूर्ति का क्या होगा? इसे लेकर हिमाचल विधानसभा में बहस हुई। हिमाचल विधानसभा ने बीते मार्च अपने मंत्रियों, विधायकों और शासकीय अधिकारियों के लिये पानी पर एक विशेष संबोधन रखा।

    जिज्ञासा मुझे भी थी कि पानी-जंगल के प्रभामण्डल में जीने वाला शिमला, पानी के संकट वाला नगर कैसे हो गया? क्या इसका कारण, वाकई वैश्विक तापमान वृद्धि है अथवा स्थानीय कारण ज्यादा जिम्मेदार हैं? इस जिज्ञासा ने मुझे बताया कि शिमला की इस ठंड की वजह, शिमला की भौगोलिक पहाड़ी अवस्थिति तो है ही, सही समय पर पर्याप्त बर्फबारी, जंगल और 1600 मिलीमीटर वार्षिक वर्षा का औसत भी है। इस ठंड में जलग्रहण क्षेत्र के योगदान को भी नहीं भूलना चाहिए। क्या इसमें कोई गिरावट आई है?

    शिमला : जनसंख्या बढ़ी, वृद्धि दर घटी

    ऐसे तमाम सवालों के जवाब तलाशने के लिये, मैंने डिजिटल दुनिया को खंगालने की कोशिश की तो सिर मुंडाते ही ओले पड़े। पाया कि इण्डिया पापुलेशन नामक वेबसाइट के हिसाब से 1991 में शिमला की आबादी एक लाख, 29 हजार, 827 थी। 2011 की जनगणना के मुताबिक आबादी एक लाख, 69 हजार, 578 थी।

    वर्ष 2016 में शिमला की आबादी का आँकड़ा एक लाख, 94 हजार, 539 दिखाया गया है। औसत बढ़ोत्तरी 4221 प्रतिवर्ष दर्शाई गई है। इस हिसाब से इस वर्ष 2018 के अप्रैल महीने में शिमला की आबादी दो लाख के ऊपर हो जानी चाहिए। किन्तु शिमला नगर निगम की वेबसाइट बता रही है कि शिमला की आबादी अभी एक लाख, 74 हजार, 789 ही है। जाहिर है कि यह डिजिटल खोज भ्रामक है। सच तो शिमला जाकर ही समझा जा सकता है, सो विश्व जल दिवस - 22 मार्च, 2018 को गया। जो समझा, सो आपके साथ साझा कर रहा हूँ।

    स्थानीय पत्रकार, मेयर, डिप्टी मेयर आदि का कहना है कि शिमला नगर निगम का आँकड़ा दुरुस्त है। इस बीच शिमला नगर की जनसंख्या वृद्धि रफ्तार में कमी आई है। दूसरी ओर, शिमला की आती-जाती जनसंख्या बढ़ी है। पर्यटन विभाग के आँकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2017 में 33 लाख, 18 हजार, 829 पर्यटक शिमला आये।

    राजधानी होने के नाते अपने काम से आने वाले हिमाचलवासियों को संख्या को जोड़ लें, तो यह आँकड़ा और अधिक हो जाएगा। किन्तु यदि देखें तो आती-जाती जनसंख्या की वृद्धि दर में वर्ष 2001 के बाद से लगातार गिरावट आ रही है। बहुत सम्भव है कि शिमला का जलापूर्ति के स्रोत और तंत्र, वर्तमान आबादी के हिसाब से अपर्याप्त हों; इसलिये जलसंकट हो। अतः सबसे पहले मैंने यह जानने की कोशिश की कि शिमला की जलापूर्ति का स्रोत क्या है?

    क्या हैं जलापूर्ति स्रोत?

    शिमला, मात्र 35.34 वर्ग किलोमीटर में फैला छोटा सा नगर है। शिमला नगर से होकर कोई नदी नहीं बहती है। सतलुज नदी, शिमला नगर से करीब 21 किलोमीटर दूर बहती है। जिला शिमला में अवश्य गिरि और पब्बर नाम की नदियाँ हैं। ये दोनों यमुना की सहायक धाराएँ हैं। अश्विनी खड्ड नामक एक छोटी पहाड़ी नदी अवश्य दिखाई दी। उसमें मामूली प्रवाह भी दिखाई दिया। अश्विनी खड्ड के पानी का शोधन करके नगर को पानी भेजा जा रहा है।

    मुख्य जलस्रोत के नाम पर शिमला जलग्रहण वन्यजीव अभयारण्य देखने का मौका मिला। बताया गया कि 1020.32 हेक्टेयर में फैला यह अभयारण्य, हिमाचल के अन्य अभयारण्यों की तुलना में अधिक घना, सुरक्षित और वन्यजीव विविधता से भरपूर है। यहाँ प्रतिदिन मात्र 35 पर्यटकों को प्रवेश का नियम है। 1999 में इसे अभयारण्य के रूप में अधिसूचित किया गया। 2009 तक इस अभयारण्य का जिम्मा जंगल विभाग को दिया गया था। वर्ष 2011 में इस अभयारण्य को जंगल विभाग के वन्यजीव प्रकोष्ठ को सौंप दिया गया।

    गौर करने की बात है कि शिमला अभयारण्य के साथ जलग्रहण शब्द जुड़ा ही इसलिये, चूँकि शिमला के सिर पर बरसने वाले पानी को संजोने और शिमला को पानी पिलाने का मुख्य आधार, यह अभयारण्य क्षेत्र ही था। कभी इस अभयारण्य क्षेत्र में ताजे-निर्मल जल का स्रोत 25 प्रमुख पहाड़ी नाले थे। अभी इनकी संख्या 19 बताई गई। बताया गया कि 19 पहाड़ी नालों के पानी को टैंकों में रोककर आगे सियोग के एक बड़े हौज में एकत्र कर लिया जाता था। वहीं से आगे नगर तक पहुँचा दिया जाता था।

    टैंको को स्थानीय लोग, खुरली कहते हैं। स्थानीय इंजीनियर ने बताया कि इन खुरलियों को 1875 में अंग्रेजों द्वारा बनाया गया था। इन खुरलियों में पानी और मिट्टी-पत्ती आदि को अलग करने की सुन्दर प्रणाली मौजूद है। सभी 19 नालों को एक नम्बर दिया गया है।

    जंगलात के दस्तावेज के मुताबिक, पहाड़ी नाले, खुरली और हौज के सम्मिश्रण से बना यह तंत्र 1878 से शिमला नगर को पानी पिला रहा था। यह जानना दिलचस्प है कि यह पूरा तंत्र, पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बहाव को ध्यान में रखकर बनाया गया था। इसमें कोई बिजली नहीं लगती थी। मन में उठा प्रश्न था कि अब ऐसा क्या हो गया कि ऐसे सुन्दर तंत्र के बावजूद, पानी की आपूर्ति कम पड़ने लगी?

    क्यों कम पड़ रही जलापूर्ति?

    पहला कारण तो यह समझ में आया कि वर्ष 1878 में शिमला नगर की आबादी मात्र 16 हजार थी। आज, 10 गुना अधिक है। शिमला ने इस डेढ़ दशक में अपनी जलापूर्ति बढ़ाने के लिये जो कुछ मामूली काम किया, उसमें दूरदर्शिता के अभाव के चलते वह आज अपर्याप्त साबित हो रहा है।

    दूसरा, शिमला को पानी पिलाने का काम, पहले शहर में बनी कुछ बावड़ियाँ और कुएँ भी करते थे। श्री शांता कुमार के कार्यकाल में शिमला शहर में हैण्डपम्प लगने का काम बड़े पैमाने पर हुआ। हैण्डपम्पों की आवक ने कुएँ और बावड़ियों की जावक तय कर दी। इनका उपयोग नहीं रहा तो रख-रखाव भी नहीं हुआ।

    तीसरा और सबसे मुख्य कारण यह समझ में आया कि पिछली डेढ़ सदी से शिमला की जलापूर्ति का मुख्य स्रोत बने रहे 19 पहाड़ी नालों में से मात्र दो ही बारहमासी बचे हैं; शेष 17 स्रोत, अब अक्तूबर में ही सूख जाते हैं। इसी कारण, मार्च के महीने में हमें एक करोड़ लीटर की क्षमता के हौज में हमें एक लीटर पानी भी देखने को नहीं मिला। मैंने पूछा कि स्रोत सूखने के क्या कारण हैं?

    क्यों सूखे मुख्य जलस्रोत?

    शहर के डिप्टी मेयर श्री राकेश कुमार शर्मा का जवाब था कि एक तो बारिश कम हो रही है। पिछले साल 600-700 मिलीमीटर बारिश ही हुई। दूसरा, जो बर्फबारी, 15 दिसम्बर से 13 जनवरी के मध्य होती थी, वह अब फरवरी मध्य से अप्रैल मध्य तक हो रही है। एक बर्फबारी में दो-दो इंच बर्फ पड़े तो उसे सामान्य माना जाता है। बर्फबारी की परत की मोटाई भी अब कम हो गई है।

    अत्यन्त ठंडे तापमान के दौरान पड़ी बर्फ धीमे-धीमे पिघलती है; लिहाजा, उसका पानी धरती के पेट में ज्यादा बैठता है अर्थात रिचार्ज ज्यादा होता है। अब बर्फ, उस वक्त पड़ रही है, जब तापमान ज्यादा होता है। ऐसे समय की बर्फ बहकर चली जाती है। उसका पानी धरती के पेट में कम ही बैठ पाता है। दिसम्बर-जनवरी की बर्फ, कीड़ों को मारती है तो गर्म समय की बर्फ, नाजुक पौधों को नष्ट कर देती है।

    स्रोत सूखने का तीसरा कारण यह ज्ञात हुआ कि पहले जितने बड़े इलाके का पानी शिमला जलग्रहण वन्यजीव अभयारण्य क्षेत्र में आता था, राष्ट्रीय राजमार्ग उसके बीच में दीवार बनकर खड़ा हो गया है। राजमार्ग ने अभयारण्य के स्रोतों के जलग्रहण क्षेत्रफल को घटा दिया है। इस कारण भी स्रोतों में अब पर्याप्त पानी नहीं आ पाता। चौथा कारण, कुछ इलाकों में बढ़ता खनन भी है। पाँचवाँ, अश्विनी खड्ड जैसी नजदीकी धाराओं में पानी आये तो आये कहाँ से? इसे पानी देने वाले छोटे-छोटे स्रोतों का पानी भी उठाकर अन्यत्र उपयोग हो रहा है।

    जल संधारण क्षमता बढ़ाने के लिये प्राकृतिक स्रोतों की सफाई जरूरी होती है। वह हो नहीं रही; उलटा, सड़क किनारे की बावड़ियों को कूड़ा-मलबा से भर दिया गया है। जो अन्य चश्मे अथवा हुरडू यानी स्थानीय छोटे झरने हैं; शिमला शहर में ही परम्परागत तौर पर कई चश्मों के निशान मिलते हैं। शिमला जलापूर्ति संचालकों को अपने ऐसे स्रोतों के नाम तक याद नहीं हैं। क्या ऐसे स्रोतों पर क्या कोई काम हुआ है? उन्होंने इसका कोई जवाब नहीं दिया।

    कितनी शुद्ध जलापूर्ति?

    हिमाचल प्रदेश में सबसे ज्यादा पीलिया के रोगी, शिमला में पाये जाने का आँकड़ा है। फरवरी, 2016 में 9265 लोग पीलिया की चपेट में आये और 34 की मौत हुई। अश्विनी खड्ड स्थित जलशोधन संयंत्र से की जाने वाली जलापूर्ति में हेपटाइटस ई के वायरस की उपस्थिति मिलने पर दोषियों पर कार्रवाई भी हुई। हालांकि नगर निगम प्रतिनिधि कहते हैं कि अब पूरी सतर्कता है, किन्तु वर्ष 2017 में स्थानीय सरकारी चिकित्सा तंत्र ने बताया कि वर्ष 2016 की मौतों से शिमला जलतंत्र संचालकों ने कुछ नहीं सीखा।

    हमने अश्विनी खड्ड में बहता जो काला पानी देखा, उसे देखकर आप भी यही कहेंगे कि शिमला जलापूर्ति की गुणवत्ता अब गारंटीप्रूफ है। खुद शिमला नगर निगम द्वारा अप्रैल महीने में अश्विनी खड्ड के ट्यूबवेल नम्बर एक, दो, तीन, चार तथा शिमला काॅलेज के पास स्थित प्राकृतिक स्रोत से लिये नमूनों की जाँच रिपोर्ट कह रही है कि गुणवत्ता सन्तोषजनक नहीं है।

    कारण क्या है?

    शिमला शहर में 245 होटल हैं। शहर में पाॅली कचरा बहुत है। दुकानों-घरों के कचरे के कारण भी नालियाँ चोक रहती हैं। कचरा ढोते इंसानों को देखकर भी स्थानीय बाशिन्दों तथा पर्यटकों में संवेदना नहीं जगती। वे अपना कचरा यूँ ही बाहर फेंक देते हैं। यह सब कचरा प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जल के शोधन को मुश्किल बनाता है।

    प्राप्त जानकारी के मुताबिक, शिमला 45 एमएलडी सीवेज पैदा होता है। छह छोटे-छोटे संयंत्रों के बावजूद, सीवेज शोधन की वास्तविक क्षमता इसका दसवाँ हिस्सा ही है। जाहिर है कि शेष मल, बिना शोधन ही बहाया जा रहा है। मलियाना के सीवेज संयंत्र को लेकर शिकायत मिली। इससे भी जल शोधन और प्रबन्धन के खर्च की कीमत बढ़ रही है।

    कितनी महंगी जलापूर्ति?

    खर्च और आमदनी का चित्र देखिए। शिमला में 25 प्रतिशत जल कनेक्शन व्यावसायिक, 75 प्रतिशत घरेलू हैं। घरेलु उपभोक्ता से 12 रुपए और व्यावसायिक उपभोक्ता से 65 रुपए प्रति किलोलीटर वसूला जाता है; जबकि शिमला में जलापूर्ति की कीमत 100 रुपए प्रति किलो लीटर से कम नहीं पड़ती।

    जलापूर्ति खर्च बढ़ने की एक वजह यह भी है कि शिमला की पूरी जलापूर्ति, आज पूरी तरह पाइप और बिजली के जरिए पानी को उठाकर लाने की समझ पर आधारित है। अभी शिमला में 50 किलोमीटर दूर से पानी आता है। शोधन खर्च तो वजह है ही। शिमला की मेयर श्रीमती कुसुम सबलेट इस बात से तो चिन्तित दिखीं कि पानी प्रबन्धन में लगने वाली बिजली का बिल ही काफी आता है, किन्तु वह इस बात को लेकर निश्चिंत भी लगीं कि सतलुज नदी से पानी लाने की विश्व बैंक परियोजना के सम्पन्न होते ही शिमला में पानी की समस्या का समाधान हो जाएगा।

    उधार का पानी कब तक?

    दरअसल, शहरों की जेबों में पैसा है। इसलिये शहरों को दूसरे का और दूर का पानी लेने में डर नहीं लगता। शिमला भूल गया है कि हिमालयी इलाकों के 70 प्रतिशत चश्मे अब सूख चुके हैं। यदि ऐसे प्राकृतिक जलस्रोतों को जिन्दा करने के काम में नहीं लगा गया, तो पानी उधार देने वाला स्रोत भी कितना दिन चलेगा? हमें विश्व बैंक प्रायोजित ऐसी परियोजनाओं की हकीकत समझनी चाहिए। अपने सिर पर बरसे पानी को सहेजना चाहिए।

    हरियाली, पानी की माँ होती है; लिहाजा, हमें अपने जंगल और वनस्पतियों को बचाना चाहिए। कोई भी निर्माण करते वक्त जल निकासी तंत्र की सुरक्षा की अनदेखी नहीं करनी चाहिए। पहले से मौजूद जल संरक्षण ढाँचों को सुरक्षित रखना चाहिए। शिमला चाहे तो यह सब कर सकता है। अपने हर घर की छत को वर्षा के झरनों को संजोने वाली खुरली बना सकता है।

    शिमला, पूरे हिमाचल की राजधानी है। शिमला को याद रखना चाहिए कि यदि शहरों को अपना भविष्य सुरक्षित रखना है, तो उन्हें गाँवों का वर्तमान सुरक्षित करने बारे में सोचना होगा; नहीं तो चेतावनी स्पष्ट है।

    और कितने केपटाउन?

    आज एक केपटाउन की चर्चा है। केपटाउन को इसके जल संरक्षण तथा जल माँग कार्यक्रम के लिये वर्ष 2015 में सी 40 सिटी अवार्ड दिया गया था। वर्ष 2018 में उसके पानी का ढोल फूट गया है। दक्षिण अफ्रीका, दुनिया का धनी-मानी शहर है। किन्तु उसका पैसा भी कुछ नहीं कर पाया। कहा जा रहा है कि आने वाली जून-जुलाई में केपटाउन 'डे जीरो' श्रेणी का शहर हो जाएगा। 'डे जीरो' का मतलब है कि नलों में पानी की आपूर्ति बन्द है। टैंकरों के माध्यम से प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 25 लीटर की औसत से पानी पहुँचाया जा रहा है।

    विज्ञान पर्यावरण केन्द्र का आकलन है कि दुनिया के 200 शहर इसी स्थिति की ओर बढ़ रहे हैं। उसने बीजिंग, मैक्सिको, साना, नैरोबी, इस्तांबुल, साओ पाउलो, कराची, ब्युनस आयर्स और काबुल का नाम प्रमुखता से लिया है। विज्ञान पर्यावरण केन्द्र ने भारत के चेन्नई और बंगलुरु शहर को सावधान किया है। उसने कहा है कि यदि वे साझे भविष्य के लिये काम नहीं करेंगे, तो वे भी जल्द ही केपटाउन की स्थिति में पहुँच सकते हैं।

    गैरसैंण को राजधानी बनाने से पहले सोचें

    हमारे सभी नगर नियोजकों को समझना चाहिए कि सावधानी का यह सबक शिमला के लिये भी है, दिल्ली के लिये भी और उत्तराखण्ड के उस गैरसैंण के लिये भी, जिसे राजधानी बनाने को लेकर उत्तराखण्ड में राजनीति तो होती है, लेकिन गैरसैंण के जलसंकट को लेकर विधानसभा में कोई आवाज नहीं उठती। गौर कीजिए कि गैरसैंण की आबादी आज महज 12,000 है।

    इतनी छोटी सी आबादी के बावजूद, गैरसैंण को हासिल जलापूर्ति मात्र 27 लीटर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन है। कई नगरों में 17 लीटर प्रति व्यक्ति, प्रतिदिन जलापूर्ति का आँकड़ा बताया गया है। गैरसैंण समेत क्या ये सभी आज ही 'डे जीरो' की श्रेणी के नगर नहीं हैं? दैनिक हिंदुस्तान में 09 अप्रैल को छपी श्री बी. एस. नेगी की रिपोर्ट बता रही है कि उत्तराखण्ड के 92 में से 71 नगरों में आपूर्ति किये गए पानी की मात्रा, तय मानक से कम है। 19 नगरों में 50 लीटर प्रति व्यक्ति, प्रतिदिन से कम जलापूर्ति हो रही है।

    उत्तराखण्ड सरकार, नए नगर पंचायती इलाकों के लिये 900 करोड़ की विश्व बैंक परियोजना के बारे में सोच रही है। उत्तराखण्ड के गाँववासी दूर तक पैदल चलकर पानी लाने की अपनी विवशता के बारे में सोच रहे हैं। गैरसैंणवासी सोचें कि यदि कल को गैरसैंण राजधानी बन गई, तो बढ़ी आबादी के लिये पानी कहाँ से आएगा? ....तब आप गैरसैंण को किस श्रेणी में रखेंगे?
     

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    हरा समाधान खरा समाधान

    RuralWaterWed, 04/25/2018 - 17:17


    ग्रीन बसग्रीन बसप्रकृति से हरीतिमा का गायब होते जाना और नीले आकाश का कालिमा से ढँकते जाना, वर्तमान शताब्दी की सबसे बड़ी मानवजनित प्राकृतिक चुनौती है। निःसन्देह जब दशकों पहले दुनिया को इस प्राकृतिक असहजता की सुगबुगाहटों का अनुभव होने लगा था, तभी से धीरे-धीरे राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय स्तरों पर जागरूक कदम उठाए जाने लगे थे, नीतियाँ बनने सँवरने लगीं थीं।

    समय-समय पर इनमें संशोधनों की विभिन्न प्रक्रियाओं का दौर आज भी जारी है। पर समस्या वही ढाक के तीन पात की तरह सुलझने का नाम नहीं लेती या कि सुलझ तो सकती है, पर उलझाए रखने वालों की संख्या ज्यादा है और आनुपातिक तौर पर जन-जागरुकता का दृष्टिकोण रखने वाले भी बहुत कम है।

    किसी भी विषय के प्रति जागरुकता की सफलता व्यक्ति से लेकर विश्व तक उसकी सही पैरवी पर निर्भर करती है। ग्लोबल वार्मिंग और वायु प्रदूषण को रोकने के लिये जब 2017 में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण परिवर्तन सम्मेलन में भारत सहित विश्व के 19 देशों अर्जेंटीना, ब्राजील, कनाडा, चीन, डेनमार्क, मिस्र, फिनलैंड, फ्रांस, इंडोनेशिया, इटली, मोरक्को, मोजांबिक, नीदरलैंड्स, पराग्वे, फिलीपींस, स्वीडन, ब्रिटेन और उरुग्वे ने जैविक ईंधन के उपयोग को लेकर एकजुटता का परिचय दिया, तब लगा कि घोषणापत्र में 2050 तक विश्व को कोयले के इस्तेमाल से मुक्त करने की प्रतिज्ञा सचमुच रंग लाएगी। लेकिन सच तो यह है कि अक्सर ऐसे सम्मेलनों और घोषणापत्रों की सच्चाई कागजों की खूबसूरती बनकर रह जाती है और विफलताएँ लोगों को एक कोने में लाकर बैठा देती हैं।

    ऐसी ही कुछ कागजी सच्चाइयाँ हमारे देश में भी नजर आती हैं। हमारे यहाँ सम्बन्धित विषयों के समय और दिवस आने पर लोगों के साथ सरकारें भी ऐसे मुद्दों के प्रति काफी सचेत दिखने लगती हैं और बैनरों, रैलियों, भाषणों, गोष्ठियों के साथ ही सम्मेलनों के दौर शुरू हो जाते हैं। उनका यह तथाकथित जोश हमें दिग्भ्रमित करने में ऐसे कामयाब हो जाता है, मानो कल तक ही सारी समस्याओं का समाधान हो जाएगा। लेकिन हकीकत कभी बदलती नहीं हैं, कुछ समय के लिये मनोरंजित अवश्य हो लिया जाता है। ऐसे कार्यक्रमों के दौरान हुई हलचलें सिर्फ वैचारिक एवं पर्यावरणीय सड़ांध छोड़ जाती हैं और सभी तरह के प्रदूषणों का स्तर बढ़ जाता है।

    ऐसा नहीं है कि भारत में प्रदूषण को रोकने के लिये उपाय, कार्ययोजनाएँ और नीतियाँ न बनाई गई हों। सब कुछ मानदण्डों के तहत निर्धारित किया गया है। 1976 में बनी पर्यावरण नीति के तहत भी वाहनों से होने वाले प्रदूषण को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करने के लिये भारत सरकार द्वारा समय-समय पर अनेक कानून बनाए गए हैं।

    वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981 और पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986, राष्ट्रीय पर्यावरण नीति, 2004 में विशेष रूप से प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में वायु की गुणवत्ता और वायु प्रदूषण का नियंत्रण के तथ्यों को सम्मिलित किया गया है। इन अधिनियमों के अनुसार केन्द्र व राज्य सरकार दोनों को वायु प्रदूषण से होने वाले प्रभावों का सामना करने के लिये कुछ विशिष्ट शक्तियाँ प्रदान की गई हैं।

    इन कानूनों के आलोक में विभिन्न स्तरों पर प्रदूषण नियंत्रण हेतु प्रयास व प्रयोग किये जाते रहते हैं, परन्तु सफलता का प्रतिशत आशानुरूप नहीं होता। इस असफलता की जड़ में जाने पर प्रत्येक स्तर पर कार्यान्वयन की परिशुद्धता में कमी और जन-उदासीनता इसके मूल कारण नजर आते हैं।

    ऐसे अनेक प्रयोगों की बानगियाँ समय-समय पर भारत में दिखती रहती हैं, जिनमें प्रदूषण से मुक्ति के लिये कुछ हरे समाधान सुझाए जाते हैं। जैसे महाराष्ट्र के नागपुर शहर में फैलते वायु प्रदूषण को कम करने के उद्देश्य से 2016 से ग्रीन बसें संचालित की गईं जो एक हरा और खरा समाधान साबित हो सकता था। लेकिन प्रयास सही मायनों में सफल नहीं हो पाया क्योंकि इसे लोगों का पर्याप्त सहयोग नहीं मिल सका। ये ग्रीन बसें अभी भी शहर की सड़कों पर दौड़ रही हैं, परन्तु सिर्फ रस्म अदायगी के तौर पर।

    क्लीन एनर्जी इन्वेस्टमेंट्स के लिये विश्व में अपनी पहचान बना चुकी स्वीडन की स्कानिया कम्पनी द्वारा निर्मित इन उच्चतम वातानुकूलित ग्रीन बसों में ईंधन के रूप में एथेनॉल का प्रयोग किया जाता है। इस बस सर्विस के एक कर्मचारी के अनुसार बसों में लगभग समस्त आधुनिक सुविधाएँ उपलब्ध हैं, जैसे ऑटोमेटिक ट्रांसमिशन (जिसमें क्लच और गियर नहीं होता है) जीपीएस प्रणाली, सीसीटीवी कैमरा, स्टाप आने से पहले ध्वनि के माध्यम से पूर्वसूचना, चालक सीट पर माइक्रोप्रोसेसर मॉनीटर। इसके अलावा बसों में चालक वीडियो कॉल सुविधा द्वारा सीधे नियंत्रण कक्ष से जुड़ सकते हैं। इनकी सीटें बेहद आरामदायक हैं और दिव्यांगों के लिये इनमें विशेष सीटों का प्रबन्ध है। स्टाप पर रुकने के बाद बुजुर्गों के चढ़ने व उतरने के लिये लो फ्लोर की सुविधा भी है।

    आमतौर पर देखा गया है कि अधिकांश लोगों में नए प्रयोगों या बदलाव को स्वीकार करने के प्रति अरुचि होती है। जैसे नागपुर में पर्यावरण अनुकूल बसों को बारे में लोग मानते हैं कि ये किसी खिलौने की तरह हैं, जो सिर्फ प्रयोगशालाओं तक ठीक हैं व्यावहारिक स्तर पर उतनी खरी नहीं हैं। भले ही इन बसों ने नागपुर को जैवईंधन आधारित पब्लिक ट्रांसपोर्ट वाला पहला भारतीय शहर बना दिया, परन्तु शहर के लोगों की उदासीनता के कारण यह प्रयोग परवान नहीं चढ़ सका।

    इसी तरह जुलाई 2017 में भारत की जानी मानी ऑटो कम्पनी, टाटा मोटर्स ने देश की पहली बायो-मीथेन इंजन (5.7 एसजीआई और 3.8 एसजीआई) से लैस बसें बनाईं और दावा किया गया कि ये देश के शहरों को साफ रखने में सकारात्मक योगदान दे पाएँगी। इनके चुनिन्दा मॉडलों का प्रदर्शन एक ऊर्जा उत्सव के दौरान हुआ पर उसके समाप्त होते ही सब कुछ किसी सपने की तरह विलुप्त हो गया। इस प्रयास से एक सकारात्मक सोच की जीत हुई, परन्तु व्यावहारिकता तब आस लगाए खड़ी है।

    इन्हीं प्रयासों की शृंखला में भारत की वैज्ञानिक बिरादरी जैव ईंधन का विकल्प ढूढ़ने में व्यस्त हैं। ऑटोमोबाइल उद्योग, इलेक्ट्रिक और जैवईंधन से चलने वाले वाहनों की प्रौद्योगिकी विकसित करने में लगी हुई है। सरकार देश की सार्वजनिक यातायात प्रणाली में नीतिगत स्तरों पर इन शोधों और प्रौद्योगिकियों को लागू करने के लिये प्रतिबद्ध हैं। यह अलग बात है कि सामान्य लोग इन तीनों के मध्य घूम रहे विकल्पों और नीतियों को स्वीकार कर पाने के प्रति सशंकित हैं।

    प्रचलित ईंधन के विकल्पों के तौर पर सीएनजी, बायोडीजल और एथेनॉल के प्रयोग में इजाफा हो रहा है लेकिन वैश्विक स्तर पर इनकी भागीदारी मात्र 8.5 प्रतिशत है। इसी तरह भारत में जैव ईंधन की मौजूदा उत्पादन क्षमता सिर्फ 12 लाख टन आँकी गई है पर यह इसकी माँग के अनुसार नाकाफी है।

    देश में जीवाश्म ईंधनों की मौजूदा जरूरत का मात्र 20% भाग ही यहाँ उत्पन्न किया जाता है शेष भाग की आपूर्ति के लिये हमें आयात पर निर्भर रहना पड़ता है। इस आयात पर भारत को प्रति वर्ष छह लाख करोड़ रुपए से अधिक मूल्य की विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है। देश में निरन्तर बढ़ रही पेट्रोलियम पदार्थों की खपत से अन्दाजा लगाया गया है कि तेल का भण्डार अगले 40 से 50 सालों में समाप्त हो सकता है। इस दृष्टिकोण से अब जैवईंधन के उत्पादन पर जोर दिया जाने लगा है।

    भारत में जैवईंधन के रूप में बायो डीजल और एथेनॉल के नाम सामने आते हैं। दो दशकों पहले वैज्ञानिकों ने रतनजोत (जट्रोफा), सोयाबीन अथवा कनोला आदि से प्राप्त किये गए वनस्पति तेलों एवं जन्तुवसाओं द्वारा बायोडीजल के उत्पादन की प्रक्रिया विकसित की है। इससे प्राप्त बायोडीजल का उपयोग आधुनिक डीजल वाहनों में या तो सीधे तौर पर अथवा जीवाश्म डीजल के साथ किसी सुनिश्चित अनुपात में मिलाकर किया जा रहा है। सबसे बड़ी बात यह है कि इसके लिये वाहन में किसी भी परिवर्तन की आवश्यकता नहीं होती है।

    जैवईंधन का दूसरा प्रचलित होता जा रहा विकल्प एथेनॉल है। इसकी सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इसका उत्पादन किसी भी पौधे में पाये जाने वाले स्टार्च से किण्वन द्वारा सरलता से किया जा सकता है। अभी तक इसके लिये गन्ना को सर्वाधिक उपयुक्त एवं सस्ती फसल के रूप में उपयोगी समझा गया है।

    प्रारम्भ में जिन हरी बसों का जिक्र किया गया है, उनमें प्रयुक्त एथेनॉल को विशेष रूप से गन्ने से ही तैयार किया जाता है। गन्ने के अलावा भी दूसरे विकल्पों की खोज में वैज्ञानिक निरन्तर लगे हैं। तकनीशियनों का कहना है कि एथेनॉल को उसके विशुद्ध रूप में वाहनों में प्रयोग में नहीं लाया जा सकता है, बल्कि इसके लिये वाहनों के इंजन में परिवर्तन करने पड़ते हैं, क्योंकि यह वाहन में लगे रबर और प्लास्टिक के कलपुर्जों को नुकसान पहुँचता है।

    इस तरह एथेनॉल और बायोडीजल, उद्योग जगत, सरकार और लोगों के बीच चर्चा का विषय है। इनके प्रयोग के प्रति लोगों में जागरुकता बढ़ी है। यह जरूर है कि किसी भी परिवर्तन को अपनाने के लिये लोगों को समय की आवश्यकता होती है। अतः इनको पेट्रोल और डीजल के स्थान पर उपयोग में लाने में लोगों को परेशानी हो रही है। गाँवों में इनको अपनाने में अधिक मुश्किल है क्योंकि वहाँ लोगों में जागरुकता की कमी है। फिर भी मेट्रो शहरों और कुछ बड़े शहरों में वाहनों में जैवईंधन के इस्तेमाल को लेकर हिचक मिटती सी दिखने लगी है। लोग इनका उपयोग कर पाने के लिये स्वयं को अभ्यस्त करने लगे हैं।

    यही कारण है कि अब जैवईंधन के उत्पादन की दिशा में भी महत्त्वपूर्ण कदम उठने लगे हैं। वैश्विक स्तर पर बायो डीजल के उत्पादन, बाजार में खपत और उपयोग के आधार पर अनुमान लगाया गया है कि वर्ष 2021 तक विश्व में जैवईंधन का उत्पादन 65.7 बिलियन गैलन प्रति वर्ष के स्तर पर पहुँच जाएगा। यह बात सामने आ रही है कि बायो डीजल अपनी कार्बन तटस्थता के गुण के कारण काफी लोकप्रिय हो रहा है।

    10-12 अप्रैल, 2018 के बीच नई दिल्ली में आयोजित हुई अन्तरराष्ट्रीय ऊर्जा फोरम की 16वीं मंत्रिस्तरीय बैठक में वैश्‍विक ऊर्जा की आपूर्ति और खपत में हो रहे बड़े बदलाव पर गहन विचार-विमर्श किया गया। भारत सहित 72 सदस्य देशों को मिलाकर वर्ष 1991 में गठित इस फोरम में बायोडीजल और एथेनॉल के उपयोग को वायु प्रदूषण से निपटने के हरे समाधान के तौर पर विश्लेषित किया गया।

    कुछ समय से देश में एक और मुद्दा बार-बार सामने आ रहा है कि शीघ्र ही सरकारी स्तर पर नई जैवईंधन नीति तैयार की जाएगी। देश के उन क्षेत्रों में जहाँ बंजर जमीन पर पारम्परिक फसलों की खेती सम्भव नहीं है, वहाँ बायो डीजल देने वाली फसलें उगाने की भी तैयारी है। सरकार की 2022 तक जीवाश्म ईंधन के आयात पर निर्भरता को 10 प्रतिशत कम करने के लक्ष्य में जैवईंधन की भूमिका अहम हो सकती है। इसके साथ ही पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय वर्ष 2022 तक 5 प्रतिशत बायोडीजल मिश्रण की योजना बना रहा है। इससे उद्योग जगत को लगभग 27,000 करोड़ रुपए के व्यवसाय के साथ ही 6.75 अरब लीटर जैवईंधन की माँग पैदा होने की आशा है।

    हालांकि सदियों से चले आ रहे जीवाश्म ईंधन के प्रयोग को कम करना अपने आप में बड़ी चुनौती है, क्योंकि तकनीकी स्तर पर देश की परिवहन व्यवस्था में बड़े बदलाव की जरूरत होगी जो किसी भी तरह से आसान काम नहीं है। इसके अलावा सरकार और तमाम ऑटोमोबाइल कम्पनियों पर पड़ने वाला आर्थिक दबाव भी एक बड़ा अवरोध है। निश्चित रूप से एथेनॉल और बायोडीजल एक हरा और खरा समाधान बन सकते हैं, बस उसे सरकारी औद्योगिक और व्यक्तिगत स्तर पर जागरुकता और एक दृढ़ संकल्प के साथ अपनाने की जरुरत है।

     

     

     

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    जीवन में जहर घोलता पानी RuralWaterSun, 04/29/2018 - 17:31


    फ्लोरोसिस से पीड़ित कालीबाईफ्लोरोसिस से पीड़ित कालीबाईहाल में जल-गुणवत्ता के मुद्दे पर हुई एक कॉन्फ्रेंस में हैदराबाद जाना हुआ। जहाँ नलगौंडा से कुछ बच्चे और बुजुर्ग भी आए थे। उनमें से कई दिव्यांग थे, वजह फ्लोरोसिस नामक बीमारी। पानी में फ्लोराइड की अधिक मौजूदगी से फ्लोरोसिस बीमारी होती है। तेलंगाना के पूरे नालगौंडा जिले के भूजल में फ्लोराइड है।

    भारत की सुजला धरती कुछ आधुनिक पढ़े-लिखों की वजह से कालापानी में बदलती जा रही है। दूध-दही जैसी पानी वाली नदियां जहर का परनाला बन गई हैं। हम नारा लगाते हैं, जल ही जीवन है। हाँ, जरूर! पर अच्छा और साफ पानी ही जीवन है। इसके उलट, प्रदूषित और जहरीला पानी जानलेवा है। आज तो जहां जाइये, ज्यादातर जगहें ‘केपटाउन’ हो गई हैं। पानी मौजूद नहीं है। और कहीं है भी तो, पीने लायक नहीं। देश के दस करोड़ से ज्यादा लोग पानी से होने वाली बीमारियों के शिकार हैं। देश में जगह-जगह बन रहे ‘कालियादह’ में से कुछ का जिक्र यहाँ जरूरी है, जहां स्थिति बहुत बुरी और बेकाबू हो चुकी है।

    मालवा ‘देश’ की कैंसर राजधानी

    पंजाब का मालवा यानी पंजाब का दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र ‘देश’ की कैंसर राजधानी बन चला है। बठिंडा, फरीदकोट, फिरोज़पुर, लुधियाना और मोगा इलाके में कैंसर की भयावहता का अंदाज़ा इस बात से होता है कि बठिंडा से बीकानेर जाने वाली एक ट्रेन को लोग कैंसर-ट्रेन बोलने लगे हैं।

    रोज़ाना रात को बठिंडा से छूटने वाली बीकानेर पैंसेजर ट्रेन में सैकड़ों की संख्या में कैंसर मरीज़ होते हैं। ये जा रहे होते हैं ‘आचार्य तुलसी रीज़नल कैंसर ट्रीटमेंट और रिसर्च सेंटर’। बीकानेर का यह अस्पताल उन चुनिंदा अस्पतालों में से है जहां हर कैंसर का इलाज बेहद किफायती है। जैन-समाज के एक ट्रस्ट द्वारा धर्मार्थ चलाए जा रहे इस अस्पताल में इलाज के साथ ही जांचें और रुकना-खाना भी बेहद सस्ता है।

    पंजाब का मालवा कैंसर-राजधानी कैसे बन चला है, ये जानना ज़रूरी है। पेस्टीसाइड, इनसेक्टीसाइड और रासायनिक उर्वरकों का मनमाना उपयोग ने खेती को जहरीला कर दिया है। एक रिसर्च बताती है कि मालवा के इलाके में इंसानी खून में पेस्टीसाइड हैं। इस इलाके के पानी में पेस्टीसाइड के साथ ही यूरेनियम और आर्सेनिक भी मौजूद है। गिनती के गांवों में साफ़ पानी पीने को मिल पा रहा है। सरकारों की लापरवाही के कारण हानिकारक पानी पीने को लोग मजबूर हैं, जिससे कैंसर बढ़ता जा रहा है।

    दिल्ली एनसीआरः कैंसर की नई राजधानी बनने को तैयार

    दिल्ली एनसीआर के औद्योगिक शहर फरीदाबाद, गुरुग्राम, मेरठ, नोएडा और गाजियाबाद के भूजल के बारे में खतरनाक रिपोर्टें आती रहती हैं। हालिया एक रिपोर्ट के मुताबिक गाजियाबाद के भूमिगत जल में सीसा, कैडमियम, ज़िंक, क्रोमियम, आयरन और निकल जैसी भारी धातुएं हैं। इनकी मात्रा भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा निर्धारित सीमा से अधिक पाई गई है।

    जुडावनपुर बरारी गाँव के ब्रजकिशोर सिंह की तलहथी में फफोला अब दोनों हाथों में हो गया हैजुडावनपुर बरारी गाँव के ब्रजकिशोर सिंह की तलहथी में फफोला अब दोनों हाथों में हो गया हैअसम की कॉटन कॉलेज स्टेट यूनिवर्सिटी और आईआईटी-दिल्ली के शोधकर्ताओं ने क्षेत्र में जलगुणवत्ता और स्वास्थ्य संबंधी खतरों का मूल्यांकन किया और निष्कर्ष निकाला कि भारी धातुओं के भूमि में रिसाव के कारण भूमिगत जल की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है और स्वास्थ्य संबंधी खतरे बढ़ रहे हैं। भूजल में पाए गए सीसा एवं कैडमियम की मात्रा बच्चों के लिए हानिकारक साबित हो सकती है।

    प्रदूषित जल पीने से डायरिया और पेट के कैंसर जैसे खतरनाक रोग होने का खतरा हो सकता है। एक अनुमान के अनुसार प्रदूषित भूमिगत जल से हमारे देश में प्रतिवर्ष लगभग 15 लाख बच्चे मर जाते हैं। भूमिगत जल के एक बार प्रदूषित हो जाने के बाद उसको वापस साफ करने में कई दशक लग सकते हैं।

    झाबुआ, मध्य प्रदेश

    लगभग डेढ़ दशक पहले झाबुआ जिले के मियाटी गांव के तोलसिंह का ब्याह जुलवानियां की कालीबाई से हुआ। मियाटी की आबोहवा में जाने क्या घुला हुआ था कि काली दिन-ब-दिन कमजोर होती चली गईं। 38 की उम्र आते-आते वह निशक्त हो गईं। हड्डियां ऐसी हो गईं जैसे वह कभी भी झर से झड़कर बिखर जाएंगी। उसके पैर टेढ़े-मेढ़े हो गए और उसके लिए दो कदम चलना भी पहाड़ जैसा हो गया था।

    बेटा, भूरसिंह पैदा हुआ। काली खुश थी कि बेटा बुढ़ापे का सहारा बनेगा लेकिन वह तो जवान होने से पहले ही बूढ़ा हो गया। भूर के हाथ-पैर बचपन से बेकार होने लगे। कालीबाई ने अपनी तबियत दुरुस्त करने के लिए डॉक्टर, वैद्य, नीम, हकीम सबके चक्कर लगाए, लेकिन सब बेकार। गांव में कालीबाई कोई इकलौती नहीं जिसको यह रोग लगा हो। यह तो रेेंगते, लुढ़कते और लड़खड़ाते हुए लोगों का गांव है।

    कई अध्ययनों से बाद में पता चला कि गांव के भूजल में फ्लोराइड है, जो शरीर की हड्डियों को सीधा नुकसान पहुंचा रहा है। यह समस्या झाबुआ सहित आसपास के जिलों में हजार के करीब गांवों में फैली हुई है।

    बक्सर, बिहारः पसरा कैंसर

    धर्मेन्द्र की उम्र 21 साल भी नहीं हुई थी। उसके कई अंगों में कैंसर फैल गया था। कैंसर का पता चलने के करीब चार महीने बाद कोलकाता के पीजीआई अस्पताल में उसकी मृत्यु हो गई। उसकी माँ मीना देवी के सिर पर बालों के बीच करीब दो साल से एक फोड़ा हो गया है। जिसमें खून झलक रहा है। हाथ और पैर के नाखून पीले पड़ कर गिर रहे हैं। पिता रामकुमार यादव स्वयं लगातार सरदर्द, शरीरदर्द से परेशान हैं।

    बक्सर जिले का ‘तिलक राय का हाता’ धर्मेन्द्र का गांव है। आर्सेनिक प्रभावित गांव के रूप में सर्वेक्षण हुआ है। इसकी रिपोर्ट 2015 में प्रकाशित हुई है। यहाँ के अधिकांश निवासियों में आर्सेनिकोसिस के लक्षण दिखते हैं। आर्सेनिकोसिस के लक्षण त्वचा, हथेली और पैर के तलवे पर पहले दिखते हैं। चमड़ी का रंग बदल जाता है। सफेद छींटे जैसे दाग हो जाते हैं। तलवों में काँटे जैसे निकल जाते हैं। हथेली में चमड़े के नीचे काँटेदार स्थल बनने से तली खुरदुरी हो जाती है। अान्तरिक अंगों पर असर बाद में दिखता है। यह असर कैंसर की शक्ल में होता है। आँत, लीवर, फेफड़े व दूसरे अंगों में कैंसर के मरीज मिले हैं। पेयजल में आर्सेनिक होने की वजह से बिहार के काफी गाँवों में कैंसर पसरा हुआ है।

    यही हाल देश के बड़े हिस्से में है। इस गर्मी तो यह संकट और भी गहराने वाला है। भारतीय मौसम विभाग के मुताबिक इस साल भी रिकॉर्ड तोड़ गर्मी होने वाली है। बढ़ती गर्मी जल उपलब्धता के साथ ही गुणवत्ता की समस्या भी बढ़ाता है। डिजिटल इंडिया जैसे नारों में क्या इतना दम है कि प्रदूषित जल से होने वाली बीमारियों और मौतों को रोक पाएंगे?

    समस्या का धंधा और खेल

    लापरवाही और बदमाशी का हाल रहा तो भारत के किसी हिस्से का पानी पीने लायक नहीं रह जाएगा। गिरती जलगुणवत्ता की समस्या से कुछेक करोड़ों बनाने में लगे हुए हैं। बीमारियों का भय हर घर में वाटर-फिल्टर की अनिवार्यता सुनिश्चित कर चुका है। हजारों करोड़ों के वाटर-फिल्टर के व्यवसाय का फरेब भी दिलचस्प है। ज्यादातर वाटर-फिल्टर लाभदायक तत्वों को भी निकाल देते है जो शरीर के लिए जरूरी हैं, जैसे आइरन, मैग्नीशियम, कैल्शियम और सोडियम।

    खुदाबख्शपल्ली गाँव की 22 वर्षीय रजिता के दोनों पैर इस बीमारी की चपेट में हैंहकीकत में ऐसा है कि यदि पानी में कोई खतरनाक रसायन नहीं है और टीडीएस की मात्रा सही है तो आरओ या वाटर-फिल्टर लगाने की जरूरत नहीं है। ऐसे में आरओ का पानी पी रहे हैं तो सेहत को फायदे की बजाय नुकसान होगा क्योंकि वह जल में मौजूद लाभदायक तत्व भी निकाल देगा।

    आरओ या वाटर-फिल्टर लगाने के पहले हमें पता होना चाहिए कि हम जिस से स्रोत पानी पी रहे हैं, क्या उस पानी में कोई गड़बड़ी है। गड़बड़ी है तो कौन सा रसायन पानी में है, उसको कौन से तरीके से ठीक किया जा सकता है।आरओ या वाटर-फिल्टर बेचने वालेे एजेंट इन किसी भी पहलू पर बात नहीं करना चाहते। सिर्फ टीडीएस को दिखा-दिखा कर फिल्टर बेचे जा रहे हैं। दरअसल आरओ या वाटर-फिल्टर को बेचे जाने के पीछे वैज्ञानिक पहलू के बजाय विज्ञापन ज्यादा हावी है।
     

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