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    यह जो इक शहर है बेपानी शिमला...

    RuralWaterTue, 04/24/2018 - 18:45

    एक करोड़ लीटर पानी का सूखा टैंकएक करोड़ लीटर पानी का सूखा टैंकशिमला की ठंड, भारत में एक मुहावरे की तरह है। गर्मी में ठंड की बात हो, तो शिमला याद आता है। उत्तर के मैदानी इलाके में ठंड बढ़ जाये तो कहा जाता है कि शिमला की हवा चल गई। और-तो-और यदि ठंड में बर्फ का नजारा देखने की बात हो, तो भी शिमला का ही नाम लिया जाता है।

    अब यदि मैं शिमला का नाम एक ऐसे शहर के रूप में लूँ, जहाँ पानी की कमी है; जहाँ के नलों में तीसरे-चौथे दिन पानी आता है; जहाँ मार्च के अन्तिम सप्ताह में लू चलती है; तो आप क्या कहेंगे? या तो आप विश्वास नहीं करेंगे या आपके मन में बनी शिमला की छवि टूटेगी। किन्तु शिमला की ताजा स्थिति यही है।

    शिमला के आम आदमी से लेकर नगरनिगम, विधानसभा और राजभवन तक सोच रहे हैं कि जब मई-जून की तपिश सिर पर आएगी, तो शिमला नगर की जलापूर्ति का क्या होगा? इसे लेकर हिमाचल विधानसभा में बहस हुई। हिमाचल विधानसभा ने बीते मार्च अपने मंत्रियों, विधायकों और शासकीय अधिकारियों के लिये पानी पर एक विशेष संबोधन रखा।

    जिज्ञासा मुझे भी थी कि पानी-जंगल के प्रभामण्डल में जीने वाला शिमला, पानी के संकट वाला नगर कैसे हो गया? क्या इसका कारण, वाकई वैश्विक तापमान वृद्धि है अथवा स्थानीय कारण ज्यादा जिम्मेदार हैं? इस जिज्ञासा ने मुझे बताया कि शिमला की इस ठंड की वजह, शिमला की भौगोलिक पहाड़ी अवस्थिति तो है ही, सही समय पर पर्याप्त बर्फबारी, जंगल और 1600 मिलीमीटर वार्षिक वर्षा का औसत भी है। इस ठंड में जलग्रहण क्षेत्र के योगदान को भी नहीं भूलना चाहिए। क्या इसमें कोई गिरावट आई है?

    शिमला : जनसंख्या बढ़ी, वृद्धि दर घटी

    ऐसे तमाम सवालों के जवाब तलाशने के लिये, मैंने डिजिटल दुनिया को खंगालने की कोशिश की तो सिर मुंडाते ही ओले पड़े। पाया कि इण्डिया पापुलेशन नामक वेबसाइट के हिसाब से 1991 में शिमला की आबादी एक लाख, 29 हजार, 827 थी। 2011 की जनगणना के मुताबिक आबादी एक लाख, 69 हजार, 578 थी।

    वर्ष 2016 में शिमला की आबादी का आँकड़ा एक लाख, 94 हजार, 539 दिखाया गया है। औसत बढ़ोत्तरी 4221 प्रतिवर्ष दर्शाई गई है। इस हिसाब से इस वर्ष 2018 के अप्रैल महीने में शिमला की आबादी दो लाख के ऊपर हो जानी चाहिए। किन्तु शिमला नगर निगम की वेबसाइट बता रही है कि शिमला की आबादी अभी एक लाख, 74 हजार, 789 ही है। जाहिर है कि यह डिजिटल खोज भ्रामक है। सच तो शिमला जाकर ही समझा जा सकता है, सो विश्व जल दिवस - 22 मार्च, 2018 को गया। जो समझा, सो आपके साथ साझा कर रहा हूँ।

    स्थानीय पत्रकार, मेयर, डिप्टी मेयर आदि का कहना है कि शिमला नगर निगम का आँकड़ा दुरुस्त है। इस बीच शिमला नगर की जनसंख्या वृद्धि रफ्तार में कमी आई है। दूसरी ओर, शिमला की आती-जाती जनसंख्या बढ़ी है। पर्यटन विभाग के आँकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2017 में 33 लाख, 18 हजार, 829 पर्यटक शिमला आये।

    राजधानी होने के नाते अपने काम से आने वाले हिमाचलवासियों को संख्या को जोड़ लें, तो यह आँकड़ा और अधिक हो जाएगा। किन्तु यदि देखें तो आती-जाती जनसंख्या की वृद्धि दर में वर्ष 2001 के बाद से लगातार गिरावट आ रही है। बहुत सम्भव है कि शिमला का जलापूर्ति के स्रोत और तंत्र, वर्तमान आबादी के हिसाब से अपर्याप्त हों; इसलिये जलसंकट हो। अतः सबसे पहले मैंने यह जानने की कोशिश की कि शिमला की जलापूर्ति का स्रोत क्या है?

    क्या हैं जलापूर्ति स्रोत?

    शिमला, मात्र 35.34 वर्ग किलोमीटर में फैला छोटा सा नगर है। शिमला नगर से होकर कोई नदी नहीं बहती है। सतलुज नदी, शिमला नगर से करीब 21 किलोमीटर दूर बहती है। जिला शिमला में अवश्य गिरि और पब्बर नाम की नदियाँ हैं। ये दोनों यमुना की सहायक धाराएँ हैं। अश्विनी खड्ड नामक एक छोटी पहाड़ी नदी अवश्य दिखाई दी। उसमें मामूली प्रवाह भी दिखाई दिया। अश्विनी खड्ड के पानी का शोधन करके नगर को पानी भेजा जा रहा है।

    मुख्य जलस्रोत के नाम पर शिमला जलग्रहण वन्यजीव अभयारण्य देखने का मौका मिला। बताया गया कि 1020.32 हेक्टेयर में फैला यह अभयारण्य, हिमाचल के अन्य अभयारण्यों की तुलना में अधिक घना, सुरक्षित और वन्यजीव विविधता से भरपूर है। यहाँ प्रतिदिन मात्र 35 पर्यटकों को प्रवेश का नियम है। 1999 में इसे अभयारण्य के रूप में अधिसूचित किया गया। 2009 तक इस अभयारण्य का जिम्मा जंगल विभाग को दिया गया था। वर्ष 2011 में इस अभयारण्य को जंगल विभाग के वन्यजीव प्रकोष्ठ को सौंप दिया गया।

    गौर करने की बात है कि शिमला अभयारण्य के साथ जलग्रहण शब्द जुड़ा ही इसलिये, चूँकि शिमला के सिर पर बरसने वाले पानी को संजोने और शिमला को पानी पिलाने का मुख्य आधार, यह अभयारण्य क्षेत्र ही था। कभी इस अभयारण्य क्षेत्र में ताजे-निर्मल जल का स्रोत 25 प्रमुख पहाड़ी नाले थे। अभी इनकी संख्या 19 बताई गई। बताया गया कि 19 पहाड़ी नालों के पानी को टैंकों में रोककर आगे सियोग के एक बड़े हौज में एकत्र कर लिया जाता था। वहीं से आगे नगर तक पहुँचा दिया जाता था।

    टैंको को स्थानीय लोग, खुरली कहते हैं। स्थानीय इंजीनियर ने बताया कि इन खुरलियों को 1875 में अंग्रेजों द्वारा बनाया गया था। इन खुरलियों में पानी और मिट्टी-पत्ती आदि को अलग करने की सुन्दर प्रणाली मौजूद है। सभी 19 नालों को एक नम्बर दिया गया है।

    जंगलात के दस्तावेज के मुताबिक, पहाड़ी नाले, खुरली और हौज के सम्मिश्रण से बना यह तंत्र 1878 से शिमला नगर को पानी पिला रहा था। यह जानना दिलचस्प है कि यह पूरा तंत्र, पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बहाव को ध्यान में रखकर बनाया गया था। इसमें कोई बिजली नहीं लगती थी। मन में उठा प्रश्न था कि अब ऐसा क्या हो गया कि ऐसे सुन्दर तंत्र के बावजूद, पानी की आपूर्ति कम पड़ने लगी?

    क्यों कम पड़ रही जलापूर्ति?

    पहला कारण तो यह समझ में आया कि वर्ष 1878 में शिमला नगर की आबादी मात्र 16 हजार थी। आज, 10 गुना अधिक है। शिमला ने इस डेढ़ दशक में अपनी जलापूर्ति बढ़ाने के लिये जो कुछ मामूली काम किया, उसमें दूरदर्शिता के अभाव के चलते वह आज अपर्याप्त साबित हो रहा है।

    दूसरा, शिमला को पानी पिलाने का काम, पहले शहर में बनी कुछ बावड़ियाँ और कुएँ भी करते थे। श्री शांता कुमार के कार्यकाल में शिमला शहर में हैण्डपम्प लगने का काम बड़े पैमाने पर हुआ। हैण्डपम्पों की आवक ने कुएँ और बावड़ियों की जावक तय कर दी। इनका उपयोग नहीं रहा तो रख-रखाव भी नहीं हुआ।

    तीसरा और सबसे मुख्य कारण यह समझ में आया कि पिछली डेढ़ सदी से शिमला की जलापूर्ति का मुख्य स्रोत बने रहे 19 पहाड़ी नालों में से मात्र दो ही बारहमासी बचे हैं; शेष 17 स्रोत, अब अक्तूबर में ही सूख जाते हैं। इसी कारण, मार्च के महीने में हमें एक करोड़ लीटर की क्षमता के हौज में हमें एक लीटर पानी भी देखने को नहीं मिला। मैंने पूछा कि स्रोत सूखने के क्या कारण हैं?

    क्यों सूखे मुख्य जलस्रोत?

    शहर के डिप्टी मेयर श्री राकेश कुमार शर्मा का जवाब था कि एक तो बारिश कम हो रही है। पिछले साल 600-700 मिलीमीटर बारिश ही हुई। दूसरा, जो बर्फबारी, 15 दिसम्बर से 13 जनवरी के मध्य होती थी, वह अब फरवरी मध्य से अप्रैल मध्य तक हो रही है। एक बर्फबारी में दो-दो इंच बर्फ पड़े तो उसे सामान्य माना जाता है। बर्फबारी की परत की मोटाई भी अब कम हो गई है।

    अत्यन्त ठंडे तापमान के दौरान पड़ी बर्फ धीमे-धीमे पिघलती है; लिहाजा, उसका पानी धरती के पेट में ज्यादा बैठता है अर्थात रिचार्ज ज्यादा होता है। अब बर्फ, उस वक्त पड़ रही है, जब तापमान ज्यादा होता है। ऐसे समय की बर्फ बहकर चली जाती है। उसका पानी धरती के पेट में कम ही बैठ पाता है। दिसम्बर-जनवरी की बर्फ, कीड़ों को मारती है तो गर्म समय की बर्फ, नाजुक पौधों को नष्ट कर देती है।

    स्रोत सूखने का तीसरा कारण यह ज्ञात हुआ कि पहले जितने बड़े इलाके का पानी शिमला जलग्रहण वन्यजीव अभयारण्य क्षेत्र में आता था, राष्ट्रीय राजमार्ग उसके बीच में दीवार बनकर खड़ा हो गया है। राजमार्ग ने अभयारण्य के स्रोतों के जलग्रहण क्षेत्रफल को घटा दिया है। इस कारण भी स्रोतों में अब पर्याप्त पानी नहीं आ पाता। चौथा कारण, कुछ इलाकों में बढ़ता खनन भी है। पाँचवाँ, अश्विनी खड्ड जैसी नजदीकी धाराओं में पानी आये तो आये कहाँ से? इसे पानी देने वाले छोटे-छोटे स्रोतों का पानी भी उठाकर अन्यत्र उपयोग हो रहा है।

    जल संधारण क्षमता बढ़ाने के लिये प्राकृतिक स्रोतों की सफाई जरूरी होती है। वह हो नहीं रही; उलटा, सड़क किनारे की बावड़ियों को कूड़ा-मलबा से भर दिया गया है। जो अन्य चश्मे अथवा हुरडू यानी स्थानीय छोटे झरने हैं; शिमला शहर में ही परम्परागत तौर पर कई चश्मों के निशान मिलते हैं। शिमला जलापूर्ति संचालकों को अपने ऐसे स्रोतों के नाम तक याद नहीं हैं। क्या ऐसे स्रोतों पर क्या कोई काम हुआ है? उन्होंने इसका कोई जवाब नहीं दिया।

    कितनी शुद्ध जलापूर्ति?

    हिमाचल प्रदेश में सबसे ज्यादा पीलिया के रोगी, शिमला में पाये जाने का आँकड़ा है। फरवरी, 2016 में 9265 लोग पीलिया की चपेट में आये और 34 की मौत हुई। अश्विनी खड्ड स्थित जलशोधन संयंत्र से की जाने वाली जलापूर्ति में हेपटाइटस ई के वायरस की उपस्थिति मिलने पर दोषियों पर कार्रवाई भी हुई। हालांकि नगर निगम प्रतिनिधि कहते हैं कि अब पूरी सतर्कता है, किन्तु वर्ष 2017 में स्थानीय सरकारी चिकित्सा तंत्र ने बताया कि वर्ष 2016 की मौतों से शिमला जलतंत्र संचालकों ने कुछ नहीं सीखा।

    हमने अश्विनी खड्ड में बहता जो काला पानी देखा, उसे देखकर आप भी यही कहेंगे कि शिमला जलापूर्ति की गुणवत्ता अब गारंटीप्रूफ है। खुद शिमला नगर निगम द्वारा अप्रैल महीने में अश्विनी खड्ड के ट्यूबवेल नम्बर एक, दो, तीन, चार तथा शिमला काॅलेज के पास स्थित प्राकृतिक स्रोत से लिये नमूनों की जाँच रिपोर्ट कह रही है कि गुणवत्ता सन्तोषजनक नहीं है।

    कारण क्या है?

    शिमला शहर में 245 होटल हैं। शहर में पाॅली कचरा बहुत है। दुकानों-घरों के कचरे के कारण भी नालियाँ चोक रहती हैं। कचरा ढोते इंसानों को देखकर भी स्थानीय बाशिन्दों तथा पर्यटकों में संवेदना नहीं जगती। वे अपना कचरा यूँ ही बाहर फेंक देते हैं। यह सब कचरा प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जल के शोधन को मुश्किल बनाता है।

    प्राप्त जानकारी के मुताबिक, शिमला 45 एमएलडी सीवेज पैदा होता है। छह छोटे-छोटे संयंत्रों के बावजूद, सीवेज शोधन की वास्तविक क्षमता इसका दसवाँ हिस्सा ही है। जाहिर है कि शेष मल, बिना शोधन ही बहाया जा रहा है। मलियाना के सीवेज संयंत्र को लेकर शिकायत मिली। इससे भी जल शोधन और प्रबन्धन के खर्च की कीमत बढ़ रही है।

    कितनी महंगी जलापूर्ति?

    खर्च और आमदनी का चित्र देखिए। शिमला में 25 प्रतिशत जल कनेक्शन व्यावसायिक, 75 प्रतिशत घरेलू हैं। घरेलु उपभोक्ता से 12 रुपए और व्यावसायिक उपभोक्ता से 65 रुपए प्रति किलोलीटर वसूला जाता है; जबकि शिमला में जलापूर्ति की कीमत 100 रुपए प्रति किलो लीटर से कम नहीं पड़ती।

    जलापूर्ति खर्च बढ़ने की एक वजह यह भी है कि शिमला की पूरी जलापूर्ति, आज पूरी तरह पाइप और बिजली के जरिए पानी को उठाकर लाने की समझ पर आधारित है। अभी शिमला में 50 किलोमीटर दूर से पानी आता है। शोधन खर्च तो वजह है ही। शिमला की मेयर श्रीमती कुसुम सबलेट इस बात से तो चिन्तित दिखीं कि पानी प्रबन्धन में लगने वाली बिजली का बिल ही काफी आता है, किन्तु वह इस बात को लेकर निश्चिंत भी लगीं कि सतलुज नदी से पानी लाने की विश्व बैंक परियोजना के सम्पन्न होते ही शिमला में पानी की समस्या का समाधान हो जाएगा।

    उधार का पानी कब तक?

    दरअसल, शहरों की जेबों में पैसा है। इसलिये शहरों को दूसरे का और दूर का पानी लेने में डर नहीं लगता। शिमला भूल गया है कि हिमालयी इलाकों के 70 प्रतिशत चश्मे अब सूख चुके हैं। यदि ऐसे प्राकृतिक जलस्रोतों को जिन्दा करने के काम में नहीं लगा गया, तो पानी उधार देने वाला स्रोत भी कितना दिन चलेगा? हमें विश्व बैंक प्रायोजित ऐसी परियोजनाओं की हकीकत समझनी चाहिए। अपने सिर पर बरसे पानी को सहेजना चाहिए।

    हरियाली, पानी की माँ होती है; लिहाजा, हमें अपने जंगल और वनस्पतियों को बचाना चाहिए। कोई भी निर्माण करते वक्त जल निकासी तंत्र की सुरक्षा की अनदेखी नहीं करनी चाहिए। पहले से मौजूद जल संरक्षण ढाँचों को सुरक्षित रखना चाहिए। शिमला चाहे तो यह सब कर सकता है। अपने हर घर की छत को वर्षा के झरनों को संजोने वाली खुरली बना सकता है।

    शिमला, पूरे हिमाचल की राजधानी है। शिमला को याद रखना चाहिए कि यदि शहरों को अपना भविष्य सुरक्षित रखना है, तो उन्हें गाँवों का वर्तमान सुरक्षित करने बारे में सोचना होगा; नहीं तो चेतावनी स्पष्ट है।

    और कितने केपटाउन?

    आज एक केपटाउन की चर्चा है। केपटाउन को इसके जल संरक्षण तथा जल माँग कार्यक्रम के लिये वर्ष 2015 में सी 40 सिटी अवार्ड दिया गया था। वर्ष 2018 में उसके पानी का ढोल फूट गया है। दक्षिण अफ्रीका, दुनिया का धनी-मानी शहर है। किन्तु उसका पैसा भी कुछ नहीं कर पाया। कहा जा रहा है कि आने वाली जून-जुलाई में केपटाउन 'डे जीरो' श्रेणी का शहर हो जाएगा। 'डे जीरो' का मतलब है कि नलों में पानी की आपूर्ति बन्द है। टैंकरों के माध्यम से प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 25 लीटर की औसत से पानी पहुँचाया जा रहा है।

    विज्ञान पर्यावरण केन्द्र का आकलन है कि दुनिया के 200 शहर इसी स्थिति की ओर बढ़ रहे हैं। उसने बीजिंग, मैक्सिको, साना, नैरोबी, इस्तांबुल, साओ पाउलो, कराची, ब्युनस आयर्स और काबुल का नाम प्रमुखता से लिया है। विज्ञान पर्यावरण केन्द्र ने भारत के चेन्नई और बंगलुरु शहर को सावधान किया है। उसने कहा है कि यदि वे साझे भविष्य के लिये काम नहीं करेंगे, तो वे भी जल्द ही केपटाउन की स्थिति में पहुँच सकते हैं।

    गैरसैंण को राजधानी बनाने से पहले सोचें

    हमारे सभी नगर नियोजकों को समझना चाहिए कि सावधानी का यह सबक शिमला के लिये भी है, दिल्ली के लिये भी और उत्तराखण्ड के उस गैरसैंण के लिये भी, जिसे राजधानी बनाने को लेकर उत्तराखण्ड में राजनीति तो होती है, लेकिन गैरसैंण के जलसंकट को लेकर विधानसभा में कोई आवाज नहीं उठती। गौर कीजिए कि गैरसैंण की आबादी आज महज 12,000 है।

    इतनी छोटी सी आबादी के बावजूद, गैरसैंण को हासिल जलापूर्ति मात्र 27 लीटर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन है। कई नगरों में 17 लीटर प्रति व्यक्ति, प्रतिदिन जलापूर्ति का आँकड़ा बताया गया है। गैरसैंण समेत क्या ये सभी आज ही 'डे जीरो' की श्रेणी के नगर नहीं हैं? दैनिक हिंदुस्तान में 09 अप्रैल को छपी श्री बी. एस. नेगी की रिपोर्ट बता रही है कि उत्तराखण्ड के 92 में से 71 नगरों में आपूर्ति किये गए पानी की मात्रा, तय मानक से कम है। 19 नगरों में 50 लीटर प्रति व्यक्ति, प्रतिदिन से कम जलापूर्ति हो रही है।

    उत्तराखण्ड सरकार, नए नगर पंचायती इलाकों के लिये 900 करोड़ की विश्व बैंक परियोजना के बारे में सोच रही है। उत्तराखण्ड के गाँववासी दूर तक पैदल चलकर पानी लाने की अपनी विवशता के बारे में सोच रहे हैं। गैरसैंणवासी सोचें कि यदि कल को गैरसैंण राजधानी बन गई, तो बढ़ी आबादी के लिये पानी कहाँ से आएगा? ....तब आप गैरसैंण को किस श्रेणी में रखेंगे?
     

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    हरा समाधान खरा समाधान

    RuralWaterWed, 04/25/2018 - 17:17


    ग्रीन बसग्रीन बसप्रकृति से हरीतिमा का गायब होते जाना और नीले आकाश का कालिमा से ढँकते जाना, वर्तमान शताब्दी की सबसे बड़ी मानवजनित प्राकृतिक चुनौती है। निःसन्देह जब दशकों पहले दुनिया को इस प्राकृतिक असहजता की सुगबुगाहटों का अनुभव होने लगा था, तभी से धीरे-धीरे राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय स्तरों पर जागरूक कदम उठाए जाने लगे थे, नीतियाँ बनने सँवरने लगीं थीं।

    समय-समय पर इनमें संशोधनों की विभिन्न प्रक्रियाओं का दौर आज भी जारी है। पर समस्या वही ढाक के तीन पात की तरह सुलझने का नाम नहीं लेती या कि सुलझ तो सकती है, पर उलझाए रखने वालों की संख्या ज्यादा है और आनुपातिक तौर पर जन-जागरुकता का दृष्टिकोण रखने वाले भी बहुत कम है।

    किसी भी विषय के प्रति जागरुकता की सफलता व्यक्ति से लेकर विश्व तक उसकी सही पैरवी पर निर्भर करती है। ग्लोबल वार्मिंग और वायु प्रदूषण को रोकने के लिये जब 2017 में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण परिवर्तन सम्मेलन में भारत सहित विश्व के 19 देशों अर्जेंटीना, ब्राजील, कनाडा, चीन, डेनमार्क, मिस्र, फिनलैंड, फ्रांस, इंडोनेशिया, इटली, मोरक्को, मोजांबिक, नीदरलैंड्स, पराग्वे, फिलीपींस, स्वीडन, ब्रिटेन और उरुग्वे ने जैविक ईंधन के उपयोग को लेकर एकजुटता का परिचय दिया, तब लगा कि घोषणापत्र में 2050 तक विश्व को कोयले के इस्तेमाल से मुक्त करने की प्रतिज्ञा सचमुच रंग लाएगी। लेकिन सच तो यह है कि अक्सर ऐसे सम्मेलनों और घोषणापत्रों की सच्चाई कागजों की खूबसूरती बनकर रह जाती है और विफलताएँ लोगों को एक कोने में लाकर बैठा देती हैं।

    ऐसी ही कुछ कागजी सच्चाइयाँ हमारे देश में भी नजर आती हैं। हमारे यहाँ सम्बन्धित विषयों के समय और दिवस आने पर लोगों के साथ सरकारें भी ऐसे मुद्दों के प्रति काफी सचेत दिखने लगती हैं और बैनरों, रैलियों, भाषणों, गोष्ठियों के साथ ही सम्मेलनों के दौर शुरू हो जाते हैं। उनका यह तथाकथित जोश हमें दिग्भ्रमित करने में ऐसे कामयाब हो जाता है, मानो कल तक ही सारी समस्याओं का समाधान हो जाएगा। लेकिन हकीकत कभी बदलती नहीं हैं, कुछ समय के लिये मनोरंजित अवश्य हो लिया जाता है। ऐसे कार्यक्रमों के दौरान हुई हलचलें सिर्फ वैचारिक एवं पर्यावरणीय सड़ांध छोड़ जाती हैं और सभी तरह के प्रदूषणों का स्तर बढ़ जाता है।

    ऐसा नहीं है कि भारत में प्रदूषण को रोकने के लिये उपाय, कार्ययोजनाएँ और नीतियाँ न बनाई गई हों। सब कुछ मानदण्डों के तहत निर्धारित किया गया है। 1976 में बनी पर्यावरण नीति के तहत भी वाहनों से होने वाले प्रदूषण को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करने के लिये भारत सरकार द्वारा समय-समय पर अनेक कानून बनाए गए हैं।

    वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981 और पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986, राष्ट्रीय पर्यावरण नीति, 2004 में विशेष रूप से प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में वायु की गुणवत्ता और वायु प्रदूषण का नियंत्रण के तथ्यों को सम्मिलित किया गया है। इन अधिनियमों के अनुसार केन्द्र व राज्य सरकार दोनों को वायु प्रदूषण से होने वाले प्रभावों का सामना करने के लिये कुछ विशिष्ट शक्तियाँ प्रदान की गई हैं।

    इन कानूनों के आलोक में विभिन्न स्तरों पर प्रदूषण नियंत्रण हेतु प्रयास व प्रयोग किये जाते रहते हैं, परन्तु सफलता का प्रतिशत आशानुरूप नहीं होता। इस असफलता की जड़ में जाने पर प्रत्येक स्तर पर कार्यान्वयन की परिशुद्धता में कमी और जन-उदासीनता इसके मूल कारण नजर आते हैं।

    ऐसे अनेक प्रयोगों की बानगियाँ समय-समय पर भारत में दिखती रहती हैं, जिनमें प्रदूषण से मुक्ति के लिये कुछ हरे समाधान सुझाए जाते हैं। जैसे महाराष्ट्र के नागपुर शहर में फैलते वायु प्रदूषण को कम करने के उद्देश्य से 2016 से ग्रीन बसें संचालित की गईं जो एक हरा और खरा समाधान साबित हो सकता था। लेकिन प्रयास सही मायनों में सफल नहीं हो पाया क्योंकि इसे लोगों का पर्याप्त सहयोग नहीं मिल सका। ये ग्रीन बसें अभी भी शहर की सड़कों पर दौड़ रही हैं, परन्तु सिर्फ रस्म अदायगी के तौर पर।

    क्लीन एनर्जी इन्वेस्टमेंट्स के लिये विश्व में अपनी पहचान बना चुकी स्वीडन की स्कानिया कम्पनी द्वारा निर्मित इन उच्चतम वातानुकूलित ग्रीन बसों में ईंधन के रूप में एथेनॉल का प्रयोग किया जाता है। इस बस सर्विस के एक कर्मचारी के अनुसार बसों में लगभग समस्त आधुनिक सुविधाएँ उपलब्ध हैं, जैसे ऑटोमेटिक ट्रांसमिशन (जिसमें क्लच और गियर नहीं होता है) जीपीएस प्रणाली, सीसीटीवी कैमरा, स्टाप आने से पहले ध्वनि के माध्यम से पूर्वसूचना, चालक सीट पर माइक्रोप्रोसेसर मॉनीटर। इसके अलावा बसों में चालक वीडियो कॉल सुविधा द्वारा सीधे नियंत्रण कक्ष से जुड़ सकते हैं। इनकी सीटें बेहद आरामदायक हैं और दिव्यांगों के लिये इनमें विशेष सीटों का प्रबन्ध है। स्टाप पर रुकने के बाद बुजुर्गों के चढ़ने व उतरने के लिये लो फ्लोर की सुविधा भी है।

    आमतौर पर देखा गया है कि अधिकांश लोगों में नए प्रयोगों या बदलाव को स्वीकार करने के प्रति अरुचि होती है। जैसे नागपुर में पर्यावरण अनुकूल बसों को बारे में लोग मानते हैं कि ये किसी खिलौने की तरह हैं, जो सिर्फ प्रयोगशालाओं तक ठीक हैं व्यावहारिक स्तर पर उतनी खरी नहीं हैं। भले ही इन बसों ने नागपुर को जैवईंधन आधारित पब्लिक ट्रांसपोर्ट वाला पहला भारतीय शहर बना दिया, परन्तु शहर के लोगों की उदासीनता के कारण यह प्रयोग परवान नहीं चढ़ सका।

    इसी तरह जुलाई 2017 में भारत की जानी मानी ऑटो कम्पनी, टाटा मोटर्स ने देश की पहली बायो-मीथेन इंजन (5.7 एसजीआई और 3.8 एसजीआई) से लैस बसें बनाईं और दावा किया गया कि ये देश के शहरों को साफ रखने में सकारात्मक योगदान दे पाएँगी। इनके चुनिन्दा मॉडलों का प्रदर्शन एक ऊर्जा उत्सव के दौरान हुआ पर उसके समाप्त होते ही सब कुछ किसी सपने की तरह विलुप्त हो गया। इस प्रयास से एक सकारात्मक सोच की जीत हुई, परन्तु व्यावहारिकता तब आस लगाए खड़ी है।

    इन्हीं प्रयासों की शृंखला में भारत की वैज्ञानिक बिरादरी जैव ईंधन का विकल्प ढूढ़ने में व्यस्त हैं। ऑटोमोबाइल उद्योग, इलेक्ट्रिक और जैवईंधन से चलने वाले वाहनों की प्रौद्योगिकी विकसित करने में लगी हुई है। सरकार देश की सार्वजनिक यातायात प्रणाली में नीतिगत स्तरों पर इन शोधों और प्रौद्योगिकियों को लागू करने के लिये प्रतिबद्ध हैं। यह अलग बात है कि सामान्य लोग इन तीनों के मध्य घूम रहे विकल्पों और नीतियों को स्वीकार कर पाने के प्रति सशंकित हैं।

    प्रचलित ईंधन के विकल्पों के तौर पर सीएनजी, बायोडीजल और एथेनॉल के प्रयोग में इजाफा हो रहा है लेकिन वैश्विक स्तर पर इनकी भागीदारी मात्र 8.5 प्रतिशत है। इसी तरह भारत में जैव ईंधन की मौजूदा उत्पादन क्षमता सिर्फ 12 लाख टन आँकी गई है पर यह इसकी माँग के अनुसार नाकाफी है।

    देश में जीवाश्म ईंधनों की मौजूदा जरूरत का मात्र 20% भाग ही यहाँ उत्पन्न किया जाता है शेष भाग की आपूर्ति के लिये हमें आयात पर निर्भर रहना पड़ता है। इस आयात पर भारत को प्रति वर्ष छह लाख करोड़ रुपए से अधिक मूल्य की विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है। देश में निरन्तर बढ़ रही पेट्रोलियम पदार्थों की खपत से अन्दाजा लगाया गया है कि तेल का भण्डार अगले 40 से 50 सालों में समाप्त हो सकता है। इस दृष्टिकोण से अब जैवईंधन के उत्पादन पर जोर दिया जाने लगा है।

    भारत में जैवईंधन के रूप में बायो डीजल और एथेनॉल के नाम सामने आते हैं। दो दशकों पहले वैज्ञानिकों ने रतनजोत (जट्रोफा), सोयाबीन अथवा कनोला आदि से प्राप्त किये गए वनस्पति तेलों एवं जन्तुवसाओं द्वारा बायोडीजल के उत्पादन की प्रक्रिया विकसित की है। इससे प्राप्त बायोडीजल का उपयोग आधुनिक डीजल वाहनों में या तो सीधे तौर पर अथवा जीवाश्म डीजल के साथ किसी सुनिश्चित अनुपात में मिलाकर किया जा रहा है। सबसे बड़ी बात यह है कि इसके लिये वाहन में किसी भी परिवर्तन की आवश्यकता नहीं होती है।

    जैवईंधन का दूसरा प्रचलित होता जा रहा विकल्प एथेनॉल है। इसकी सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इसका उत्पादन किसी भी पौधे में पाये जाने वाले स्टार्च से किण्वन द्वारा सरलता से किया जा सकता है। अभी तक इसके लिये गन्ना को सर्वाधिक उपयुक्त एवं सस्ती फसल के रूप में उपयोगी समझा गया है।

    प्रारम्भ में जिन हरी बसों का जिक्र किया गया है, उनमें प्रयुक्त एथेनॉल को विशेष रूप से गन्ने से ही तैयार किया जाता है। गन्ने के अलावा भी दूसरे विकल्पों की खोज में वैज्ञानिक निरन्तर लगे हैं। तकनीशियनों का कहना है कि एथेनॉल को उसके विशुद्ध रूप में वाहनों में प्रयोग में नहीं लाया जा सकता है, बल्कि इसके लिये वाहनों के इंजन में परिवर्तन करने पड़ते हैं, क्योंकि यह वाहन में लगे रबर और प्लास्टिक के कलपुर्जों को नुकसान पहुँचता है।

    इस तरह एथेनॉल और बायोडीजल, उद्योग जगत, सरकार और लोगों के बीच चर्चा का विषय है। इनके प्रयोग के प्रति लोगों में जागरुकता बढ़ी है। यह जरूर है कि किसी भी परिवर्तन को अपनाने के लिये लोगों को समय की आवश्यकता होती है। अतः इनको पेट्रोल और डीजल के स्थान पर उपयोग में लाने में लोगों को परेशानी हो रही है। गाँवों में इनको अपनाने में अधिक मुश्किल है क्योंकि वहाँ लोगों में जागरुकता की कमी है। फिर भी मेट्रो शहरों और कुछ बड़े शहरों में वाहनों में जैवईंधन के इस्तेमाल को लेकर हिचक मिटती सी दिखने लगी है। लोग इनका उपयोग कर पाने के लिये स्वयं को अभ्यस्त करने लगे हैं।

    यही कारण है कि अब जैवईंधन के उत्पादन की दिशा में भी महत्त्वपूर्ण कदम उठने लगे हैं। वैश्विक स्तर पर बायो डीजल के उत्पादन, बाजार में खपत और उपयोग के आधार पर अनुमान लगाया गया है कि वर्ष 2021 तक विश्व में जैवईंधन का उत्पादन 65.7 बिलियन गैलन प्रति वर्ष के स्तर पर पहुँच जाएगा। यह बात सामने आ रही है कि बायो डीजल अपनी कार्बन तटस्थता के गुण के कारण काफी लोकप्रिय हो रहा है।

    10-12 अप्रैल, 2018 के बीच नई दिल्ली में आयोजित हुई अन्तरराष्ट्रीय ऊर्जा फोरम की 16वीं मंत्रिस्तरीय बैठक में वैश्‍विक ऊर्जा की आपूर्ति और खपत में हो रहे बड़े बदलाव पर गहन विचार-विमर्श किया गया। भारत सहित 72 सदस्य देशों को मिलाकर वर्ष 1991 में गठित इस फोरम में बायोडीजल और एथेनॉल के उपयोग को वायु प्रदूषण से निपटने के हरे समाधान के तौर पर विश्लेषित किया गया।

    कुछ समय से देश में एक और मुद्दा बार-बार सामने आ रहा है कि शीघ्र ही सरकारी स्तर पर नई जैवईंधन नीति तैयार की जाएगी। देश के उन क्षेत्रों में जहाँ बंजर जमीन पर पारम्परिक फसलों की खेती सम्भव नहीं है, वहाँ बायो डीजल देने वाली फसलें उगाने की भी तैयारी है। सरकार की 2022 तक जीवाश्म ईंधन के आयात पर निर्भरता को 10 प्रतिशत कम करने के लक्ष्य में जैवईंधन की भूमिका अहम हो सकती है। इसके साथ ही पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय वर्ष 2022 तक 5 प्रतिशत बायोडीजल मिश्रण की योजना बना रहा है। इससे उद्योग जगत को लगभग 27,000 करोड़ रुपए के व्यवसाय के साथ ही 6.75 अरब लीटर जैवईंधन की माँग पैदा होने की आशा है।

    हालांकि सदियों से चले आ रहे जीवाश्म ईंधन के प्रयोग को कम करना अपने आप में बड़ी चुनौती है, क्योंकि तकनीकी स्तर पर देश की परिवहन व्यवस्था में बड़े बदलाव की जरूरत होगी जो किसी भी तरह से आसान काम नहीं है। इसके अलावा सरकार और तमाम ऑटोमोबाइल कम्पनियों पर पड़ने वाला आर्थिक दबाव भी एक बड़ा अवरोध है। निश्चित रूप से एथेनॉल और बायोडीजल एक हरा और खरा समाधान बन सकते हैं, बस उसे सरकारी औद्योगिक और व्यक्तिगत स्तर पर जागरुकता और एक दृढ़ संकल्प के साथ अपनाने की जरुरत है।

     

     

     

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    जीवन में जहर घोलता पानी RuralWaterSun, 04/29/2018 - 17:31


    फ्लोरोसिस से पीड़ित कालीबाईफ्लोरोसिस से पीड़ित कालीबाईहाल में जल-गुणवत्ता के मुद्दे पर हुई एक कॉन्फ्रेंस में हैदराबाद जाना हुआ। जहाँ नलगौंडा से कुछ बच्चे और बुजुर्ग भी आए थे। उनमें से कई दिव्यांग थे, वजह फ्लोरोसिस नामक बीमारी। पानी में फ्लोराइड की अधिक मौजूदगी से फ्लोरोसिस बीमारी होती है। तेलंगाना के पूरे नालगौंडा जिले के भूजल में फ्लोराइड है।

    भारत की सुजला धरती कुछ आधुनिक पढ़े-लिखों की वजह से कालापानी में बदलती जा रही है। दूध-दही जैसी पानी वाली नदियां जहर का परनाला बन गई हैं। हम नारा लगाते हैं, जल ही जीवन है। हाँ, जरूर! पर अच्छा और साफ पानी ही जीवन है। इसके उलट, प्रदूषित और जहरीला पानी जानलेवा है। आज तो जहां जाइये, ज्यादातर जगहें ‘केपटाउन’ हो गई हैं। पानी मौजूद नहीं है। और कहीं है भी तो, पीने लायक नहीं। देश के दस करोड़ से ज्यादा लोग पानी से होने वाली बीमारियों के शिकार हैं। देश में जगह-जगह बन रहे ‘कालियादह’ में से कुछ का जिक्र यहाँ जरूरी है, जहां स्थिति बहुत बुरी और बेकाबू हो चुकी है।

    मालवा ‘देश’ की कैंसर राजधानी

    पंजाब का मालवा यानी पंजाब का दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र ‘देश’ की कैंसर राजधानी बन चला है। बठिंडा, फरीदकोट, फिरोज़पुर, लुधियाना और मोगा इलाके में कैंसर की भयावहता का अंदाज़ा इस बात से होता है कि बठिंडा से बीकानेर जाने वाली एक ट्रेन को लोग कैंसर-ट्रेन बोलने लगे हैं।

    रोज़ाना रात को बठिंडा से छूटने वाली बीकानेर पैंसेजर ट्रेन में सैकड़ों की संख्या में कैंसर मरीज़ होते हैं। ये जा रहे होते हैं ‘आचार्य तुलसी रीज़नल कैंसर ट्रीटमेंट और रिसर्च सेंटर’। बीकानेर का यह अस्पताल उन चुनिंदा अस्पतालों में से है जहां हर कैंसर का इलाज बेहद किफायती है। जैन-समाज के एक ट्रस्ट द्वारा धर्मार्थ चलाए जा रहे इस अस्पताल में इलाज के साथ ही जांचें और रुकना-खाना भी बेहद सस्ता है।

    पंजाब का मालवा कैंसर-राजधानी कैसे बन चला है, ये जानना ज़रूरी है। पेस्टीसाइड, इनसेक्टीसाइड और रासायनिक उर्वरकों का मनमाना उपयोग ने खेती को जहरीला कर दिया है। एक रिसर्च बताती है कि मालवा के इलाके में इंसानी खून में पेस्टीसाइड हैं। इस इलाके के पानी में पेस्टीसाइड के साथ ही यूरेनियम और आर्सेनिक भी मौजूद है। गिनती के गांवों में साफ़ पानी पीने को मिल पा रहा है। सरकारों की लापरवाही के कारण हानिकारक पानी पीने को लोग मजबूर हैं, जिससे कैंसर बढ़ता जा रहा है।

    दिल्ली एनसीआरः कैंसर की नई राजधानी बनने को तैयार

    दिल्ली एनसीआर के औद्योगिक शहर फरीदाबाद, गुरुग्राम, मेरठ, नोएडा और गाजियाबाद के भूजल के बारे में खतरनाक रिपोर्टें आती रहती हैं। हालिया एक रिपोर्ट के मुताबिक गाजियाबाद के भूमिगत जल में सीसा, कैडमियम, ज़िंक, क्रोमियम, आयरन और निकल जैसी भारी धातुएं हैं। इनकी मात्रा भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा निर्धारित सीमा से अधिक पाई गई है।

    जुडावनपुर बरारी गाँव के ब्रजकिशोर सिंह की तलहथी में फफोला अब दोनों हाथों में हो गया हैजुडावनपुर बरारी गाँव के ब्रजकिशोर सिंह की तलहथी में फफोला अब दोनों हाथों में हो गया हैअसम की कॉटन कॉलेज स्टेट यूनिवर्सिटी और आईआईटी-दिल्ली के शोधकर्ताओं ने क्षेत्र में जलगुणवत्ता और स्वास्थ्य संबंधी खतरों का मूल्यांकन किया और निष्कर्ष निकाला कि भारी धातुओं के भूमि में रिसाव के कारण भूमिगत जल की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है और स्वास्थ्य संबंधी खतरे बढ़ रहे हैं। भूजल में पाए गए सीसा एवं कैडमियम की मात्रा बच्चों के लिए हानिकारक साबित हो सकती है।

    प्रदूषित जल पीने से डायरिया और पेट के कैंसर जैसे खतरनाक रोग होने का खतरा हो सकता है। एक अनुमान के अनुसार प्रदूषित भूमिगत जल से हमारे देश में प्रतिवर्ष लगभग 15 लाख बच्चे मर जाते हैं। भूमिगत जल के एक बार प्रदूषित हो जाने के बाद उसको वापस साफ करने में कई दशक लग सकते हैं।

    झाबुआ, मध्य प्रदेश

    लगभग डेढ़ दशक पहले झाबुआ जिले के मियाटी गांव के तोलसिंह का ब्याह जुलवानियां की कालीबाई से हुआ। मियाटी की आबोहवा में जाने क्या घुला हुआ था कि काली दिन-ब-दिन कमजोर होती चली गईं। 38 की उम्र आते-आते वह निशक्त हो गईं। हड्डियां ऐसी हो गईं जैसे वह कभी भी झर से झड़कर बिखर जाएंगी। उसके पैर टेढ़े-मेढ़े हो गए और उसके लिए दो कदम चलना भी पहाड़ जैसा हो गया था।

    बेटा, भूरसिंह पैदा हुआ। काली खुश थी कि बेटा बुढ़ापे का सहारा बनेगा लेकिन वह तो जवान होने से पहले ही बूढ़ा हो गया। भूर के हाथ-पैर बचपन से बेकार होने लगे। कालीबाई ने अपनी तबियत दुरुस्त करने के लिए डॉक्टर, वैद्य, नीम, हकीम सबके चक्कर लगाए, लेकिन सब बेकार। गांव में कालीबाई कोई इकलौती नहीं जिसको यह रोग लगा हो। यह तो रेेंगते, लुढ़कते और लड़खड़ाते हुए लोगों का गांव है।

    कई अध्ययनों से बाद में पता चला कि गांव के भूजल में फ्लोराइड है, जो शरीर की हड्डियों को सीधा नुकसान पहुंचा रहा है। यह समस्या झाबुआ सहित आसपास के जिलों में हजार के करीब गांवों में फैली हुई है।

    बक्सर, बिहारः पसरा कैंसर

    धर्मेन्द्र की उम्र 21 साल भी नहीं हुई थी। उसके कई अंगों में कैंसर फैल गया था। कैंसर का पता चलने के करीब चार महीने बाद कोलकाता के पीजीआई अस्पताल में उसकी मृत्यु हो गई। उसकी माँ मीना देवी के सिर पर बालों के बीच करीब दो साल से एक फोड़ा हो गया है। जिसमें खून झलक रहा है। हाथ और पैर के नाखून पीले पड़ कर गिर रहे हैं। पिता रामकुमार यादव स्वयं लगातार सरदर्द, शरीरदर्द से परेशान हैं।

    बक्सर जिले का ‘तिलक राय का हाता’ धर्मेन्द्र का गांव है। आर्सेनिक प्रभावित गांव के रूप में सर्वेक्षण हुआ है। इसकी रिपोर्ट 2015 में प्रकाशित हुई है। यहाँ के अधिकांश निवासियों में आर्सेनिकोसिस के लक्षण दिखते हैं। आर्सेनिकोसिस के लक्षण त्वचा, हथेली और पैर के तलवे पर पहले दिखते हैं। चमड़ी का रंग बदल जाता है। सफेद छींटे जैसे दाग हो जाते हैं। तलवों में काँटे जैसे निकल जाते हैं। हथेली में चमड़े के नीचे काँटेदार स्थल बनने से तली खुरदुरी हो जाती है। अान्तरिक अंगों पर असर बाद में दिखता है। यह असर कैंसर की शक्ल में होता है। आँत, लीवर, फेफड़े व दूसरे अंगों में कैंसर के मरीज मिले हैं। पेयजल में आर्सेनिक होने की वजह से बिहार के काफी गाँवों में कैंसर पसरा हुआ है।

    यही हाल देश के बड़े हिस्से में है। इस गर्मी तो यह संकट और भी गहराने वाला है। भारतीय मौसम विभाग के मुताबिक इस साल भी रिकॉर्ड तोड़ गर्मी होने वाली है। बढ़ती गर्मी जल उपलब्धता के साथ ही गुणवत्ता की समस्या भी बढ़ाता है। डिजिटल इंडिया जैसे नारों में क्या इतना दम है कि प्रदूषित जल से होने वाली बीमारियों और मौतों को रोक पाएंगे?

    समस्या का धंधा और खेल

    लापरवाही और बदमाशी का हाल रहा तो भारत के किसी हिस्से का पानी पीने लायक नहीं रह जाएगा। गिरती जलगुणवत्ता की समस्या से कुछेक करोड़ों बनाने में लगे हुए हैं। बीमारियों का भय हर घर में वाटर-फिल्टर की अनिवार्यता सुनिश्चित कर चुका है। हजारों करोड़ों के वाटर-फिल्टर के व्यवसाय का फरेब भी दिलचस्प है। ज्यादातर वाटर-फिल्टर लाभदायक तत्वों को भी निकाल देते है जो शरीर के लिए जरूरी हैं, जैसे आइरन, मैग्नीशियम, कैल्शियम और सोडियम।

    खुदाबख्शपल्ली गाँव की 22 वर्षीय रजिता के दोनों पैर इस बीमारी की चपेट में हैंहकीकत में ऐसा है कि यदि पानी में कोई खतरनाक रसायन नहीं है और टीडीएस की मात्रा सही है तो आरओ या वाटर-फिल्टर लगाने की जरूरत नहीं है। ऐसे में आरओ का पानी पी रहे हैं तो सेहत को फायदे की बजाय नुकसान होगा क्योंकि वह जल में मौजूद लाभदायक तत्व भी निकाल देगा।

    आरओ या वाटर-फिल्टर लगाने के पहले हमें पता होना चाहिए कि हम जिस से स्रोत पानी पी रहे हैं, क्या उस पानी में कोई गड़बड़ी है। गड़बड़ी है तो कौन सा रसायन पानी में है, उसको कौन से तरीके से ठीक किया जा सकता है।आरओ या वाटर-फिल्टर बेचने वालेे एजेंट इन किसी भी पहलू पर बात नहीं करना चाहते। सिर्फ टीडीएस को दिखा-दिखा कर फिल्टर बेचे जा रहे हैं। दरअसल आरओ या वाटर-फिल्टर को बेचे जाने के पीछे वैज्ञानिक पहलू के बजाय विज्ञापन ज्यादा हावी है।
     

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    भीतरकणिका एक अनूठी आर्द्रभूमिeditorialTue, 07/31/2018 - 14:57

    Source
    विज्ञान प्रगति, जून, 2018

    भीतरकणिका आर्द्रभूमिबढ़ती आबादी की आवश्यकता पूर्ति के लिये होने वाली गतिविधियों से वन्य प्राणियों के प्राकृतिक वासस्थल लगातार सिमटते जा रहे हैं। फलस्वरूप दुनिया के पटल से अनेक प्रकार के सूक्ष्म व बड़े जीव-जन्तु लुप्त हो चुके हैं, कुछ लुप्तता के कगार पर हैं तथा कुछ संकटापन्न स्थिति में हैं।

    भले ही सामान्य तौर पर यह दिखाई न दे किन्तु हर जीव-जन्तु की पर्यावरण चक्र में अपनी अलग भूमिका होती है। एक जन्तु के लोपन का दूसरे पर प्रभाव तो होता ही है। सभी प्रकार के जीव-जन्तु बचे रहें इनको बचाए रखने के लिये दुनिया भर के देशों में अनेक प्रकार के कानून लागू हैं फिर भी उनकी संख्या लगातार कम हो रही है।

    वन्य जन्तुओं को संरक्षण प्रदान करने के लिये दुनिया के कोने-कोने में भिन्न स्थानों व परिवेश को दृष्टिगत रखते हुए अनेक अभयारण्य, पार्क व प्रक्षेत्र स्थापित हैं। इसमें विभिन्न प्रकार के स्थलीय, जलीय जीवों, व पक्षियों से लेकर सूक्ष्मजीवियों को कुछ हद तक आश्रय मिला है जिनमें वे अपनी प्रकृति के अनुसार रहते हैं।

    भारत में ऐसे अनेक संरक्षण क्षेत्र हैं। इनमें बंगाल की खाड़ी में ओड़िशा के तहत केन्द्रपाड़ा जिले में मौजूद भीतरकणिका नमभूमि क्षेत्र एक अनूठा नम क्षेत्र है जो स्तलीय, जलीय व सागर तटीय क्षेत्र को मिलाकर बना है। इस नम क्षेत्र के तहत ताजे पानी की नदी धाराएँ, तालाब, पंकीय (कीचड़ युक्त) क्षेत्र, ज्वारीय बैकवाटर्स, मैंग्रोव, रेतीले तट, छोटे व बड़ी खाड़ियाँ व बड़े टापू आदि आते हैं। अपनी विभिन्न व अनूठी जलीय व स्थलीय संरचना के कारण भीतरकणिका नम क्षेत्र अनेक प्रकार के सूक्ष्मजीवियों से लेकर कशेरुकी व अकशेरुकी प्राणियों का प्राकृतवास है। विशिष्ट बनावट जलीय वनस्पतियों और वन्य जन्तुओं की बहुलता से कुछ लोग इसे भारत का ‘मिनी अमेजन’ भी कहते हैं।

    विविधता भरे इस नम क्षेत्र के विभिन्न हिस्सों में विभिन्न माह के अनुसार अलग-अलग समय में भिन्न गतिविधियाँ देखने को मिलती हैं। इस नमक्षेत्र के अन्तरंग भाग (कोर-जोन) को राष्ट्रीय उद्यान का स्थान प्राप्त है। ग्रीष्म ऋतु आते ही इसका मध्य भाग बग्गहना अनेकों प्रकार के देशी व विदेशी पक्षियों का बसेरा बनने लगता है। हजारों पक्षी यहाँ आकर सहवास करते हैं, घोंसले बनाते हैं, अण्डे देते हैं और चूजों के निकलने तक उनको सेते हैं, उनका पालन-पोषण करते हैं।

    अगस्त/सितम्बर में जैसे ही नन्हें पक्षी आत्मनिर्भर होने को होते हैं यहाँ से फुर्र हो जाते हैं। इसी नमक्षेत्र का दूसरे भाग, जिसके तहत बंगाल की खाड़ी का रेतीला तट आता है, में भी एक अन्य गतिविधि देखने को मिलती है। नवम्बर आते ही इसका रेतीला तट दुर्लभ प्रजाति के ओलिव रिडले कछुओं से पटने लगता है।

    बंगाल की खाड़ी हिन्द महासागर के विभिन्न हिस्सों से लाखों की संख्या में यह कछुए इस सुनसान तट पर सहवास करते हैं, रेत के अन्दर अण्डे देते हैं, उनकों सेते हैं व अण्डों से बच्चों के निकलने से पहले वापस समुद्र में अपने पुराने ठिकानों को चल देते हैं। इस नमभूमि का तीसरा क्षेत्र जो ‘भीतरकणिका अभयारण्य’ कहलाता है।

    भीतरकणिका में कुछ अनछुए मैंग्रोवमुख्य रूप से यह नमकीन पानी में मिलने वाले दुर्लभ किस्म के मगरमच्छों की संरक्षणगाह है जिसमें फरवरी से मई के बीच उनका सहवासकाल चलता है। इसे बाद वे अण्डे देते हैं जिनमें से 70 से 80 दिनों के बाद यानी मई से जुलाई के मध्य अण्डों से बच्चे निकलने शुरू होते हैं। वर्षा ऋतु समाप्त होेने के बाद नन्हें बच्चों को जीवन के कठिन दौर से गुजरना होता है। परभक्षी उन्हें भोजन बनाने की ताक में रहते हैं, किन्तु इनमें से जो बच जाते हैं वे यहाँ राज करते हैं। अगस्त में इस अभयारण्य का प्रवेश द्वार खुलता है।

    अभयारण्य से रामसर क्षेत्र तक

    भीतरकणिका नम क्षेत्र बंगाल की खाड़ी में समाहित होने वाली दो प्रमुख नदियों वैतरणी एवं ब्राह्मणी तथा स्थानीय नदी धमारा के मुहाने पर स्थित है। यद्यपि यह एक नम क्षेत्र है किन्तु इसमें दो अभयारण्य व एक राष्ट्रीय उद्यान निहित हैं।

    बीसवीं सदी के सातवें दशक तक ओड़िशा का कणिका क्षेत्र बड़ी जमीदारों की शिकार स्थली थी। जमीदारों के उन्मूलन के बाद इसे राज्य में शामिल कर दिया गया। इसके बाद यहाँ चारों दिशाओं से अतिक्रमण होने लगा और इसमें मौजूद मगरमच्छ तेजी से मारे जाने लगे। यह देखते हुए मगरमच्छों पर एक अध्ययन किया गया था जिससे ज्ञात हुआ कि इस डेल्टा तंत्र में प्राकृतिक रूप से चमड़े के लिये शिकार किये जाने वाले मौजूद नमकीन पानी में मिलने वाले मगरमच्छों की संख्या काफी कम हो गई है। रपट में चिन्ता व्यक्त की गई कि यदि उनका निरन्तर शिकार जारी रहा तो यह दुर्लभ कछुए दुनिया के पटल से ही लुप्त हो सकते हैं।

    इस बात को दृष्टिगत रखते हुए राज्य सरकार ने अप्रैल, 1975 में कणिका क्षेत्र के 672 वर्ग किमी. में भूभाग को ‘भीतरकणिका’ नाम से अभयारण्य बनाने का निर्णय लिया ताकि मगरमच्छों की यह शरणगाह संरक्षित हो सके। तदुपरान्त इससे सटे तटीय हिस्से ‘गहीरमाथा’, जो दूर-दराज से ओलिव रिडले प्रजाति के लाखों कछुओं के अण्डे देने की पसंदीदा जगह थी, को कच्छप अभयारण्य में बदल दिया गया। तब इसकी सीमा चारों ओर से खुली थी और कछुओं के अण्डे देने से लेकर उनके बच्चों के निकलने के लिये यह क्षेत्र बेहद असुरक्षित था। लाखों कछुए मौत का शिकार हो जाते थे।

    इन खास प्रजाति के कछुओं के जीवनचक्र को सुरक्षित व संरक्षित करनेे के लिये राज्य सरकार ने सितम्बर 1997 में 1435 वर्ग किमी. में फैले इस निर्जन क्षेत्र को गहीरमाथा कच्छप अभयारण्य घोषित किया। तदुपरान्त भीतरकणिका अभयारण्य के मध्यवर्ती भाग, जिसमें दुर्लभ मैंग्रोव हैं, के 145 वर्ग किमी, क्षेत्र को 1998 को ‘भीतरकणिका राष्ट्रीय उद्यान’ का दर्जा दिया गया।

     

     

    अपनी अभिन्न व अनूठी जलीय व स्थलीय संरचना के कारण भीतरकणिका नम क्षेत्र अनेक प्रकार के सूक्ष्मजीवियों से लेकर कशेरुकी व अकशेरुकी प्राणियों का प्राकृतवास है। विशिष्ट बनावट जलीय वनस्पतियों और वन्य जन्तुओं की बहुलता से कुछ लोग इसे भारत का मिनी ‘अमेजन’ भी कहते हैं।

    इसके उपरान्त भारत सरकार के वन एवं पर्यावरण विभाग ने भी इन तीनों संरक्षणगाहों के लगभग 2672 वर्ग किमी, क्षेत्रफल को मिलाकर वैश्विक स्तर का रामसर नमस्थल घोषित करवाने के प्रयास किये जिसे 2002 में रामसर स्थल की मान्यता प्रदान कर दी। भीतरकणिका नमक्षेत्र आज भारत के 26 विशिष्ट रामसर नमक्षेत्रों में से एक है।

    इस नमक्षेत्र के लगभग 500 वर्ग किमी. में 58 प्रजातियों के मैंग्रोव वृक्षों की प्रजातियाँ मिलती हैं और सुन्दरवन के बाद यह भारत का दूसरा सबसे बड़ा मैंग्रोव क्षेत्र है। जैवविविधता से परिपूर्ण इस अनूठे क्षेत्र को अब यूनेस्को विश्व विरासत स्थल की सूची में शामिल कराने का प्रयास किये जा रहे हैं।

    भीतरकणिका अभयारण्य

    कहने को तो भीतरकणिका अभयारण्य में की प्रकार के जीव-जन्तुओं को संरक्षण मिला है किन्तु मुख्य रूप से यह खारे पानी के मगरमच्छों (क्रोकोडायलस पोरोसस crocodylus porosus) का संरक्षणगाह है। सन 1970 से पूर्व अभयारण्य बनने से पहले यहाँ पर इन मगरमच्छों का चमड़े के लिये शिकार आम था। इसी चिन्ता को देखते हुए इन मगरमच्छों को बचाने व उनकी जनसंख्या को बढ़ाने व उनके पुनर्वासन के लिये एक परियोजना लागू की गई ताकि मगरमच्छों के अण्डे व बच्चे जंगली जानवरों के शिकार से बच सकें व इनके बड़ा होने पर इनको अभयारण्य के विभिन्न भागों में छोड़ा जा सके।

    परियोजना के तहत इस अभयारण्य के आन्तरिक भाग डंगमाल में एक हैचरी स्थापित की गई जिसने अपनी भूमिका को बखूबी से निभाया है। हैचरी में इन मगरमच्छों के अण्डों को विभिन्न इलाकों से एकत्रित कर उनको कृत्रिम वातावरण में सेंका जाता है और उनके थोड़े बड़ा होने पर इन नदियों के डेल्टा तंत्र में छोड़ दिया जाता है। परियोजनान्तर्गत इसके संरक्षण के लिये कई दूसरे कदम भी उठाए गए।

    अभयारण्य बनने से यहाँ पर संकटग्रस्त प्रजाति के मगरमच्छों (क्रोकोडायलस पोरोसस) की संख्या धीरे-धीरे बढ़ने लगी। 1975 में उनकी संख्या जो 300 से भी कम हो गई थी वर्तमान में 1500 के आस-पास है। यह मगरमच्छ इस क्षेत्र व नदी अपवाह तंत्र में प्रवास करते हैं जो दक्षिण पूर्व एशिया में मगरमच्छों का सबसे बड़ा अभयारण्य है।

    यहाँ पर 7 मीटर तक लम्बाई वाले विशालकाय मगरमच्छ भी देखे गए हैं। फरवरी से अप्रैल के मध्य यह सहवास करते हैं। उसके बाद एक मादा रेत के अन्दर औसतन 40-45 अण्डे देती है। इनसे तीन माह से भी कम समय में बच्चे निकल जाते हैं। यद्यपि मादा अण्डे देने वाले स्थान के निकट ही होती है लेकिन शत्रु भी कम नहीं होते हैं जो अण्डों व जब बच्चे छोटे होते हैं उनको चट कर जाते हैं। इस संघर्ष में जो बच जाते हैं वह यहाँ पूरी जिन्दगी राज करते हैं। मगरमच्छों को शीतकाल में नदियों के किनारे या मुहाने पर आराम करते या धूप सेंकते, विचरण या शिकार करते देखा जा सकता है।

    इस संरक्षित क्षेत्र के अलग-अलग भाग में अनेक प्रकार के सरीसृप, पक्षी, उभयचर, मछलियों से लेकर दूसरे बड़े स्तनपाई जलचर व स्थलीय जानवर मिलते हैं। सरीसृपों में 9 प्रकार की छिपकलियाँ व 14 प्रकार के सर्पों की पहचान की जा चुकी हैं जिनमें अजगर, किंग कोबरा, रसल वाइपर सामान्य रूप से पाये जाते हैं। इसे अतिरिक्त स्तनपाई जन्तुओं की 26 प्रजातियों में सांभर, चीतल, चितकबरा हिरन, जंगली सुअर, हाइना, सियार, जंगली बिल्ली व डॉल्फिनें मिलती हैं। 15 प्रकार की मछलियाँ, कई प्रकार के मेंढक व कछुए आदि भी यहाँ पर पाये गए हैं। यह जन्तु आमतौर पर पूरे क्षेत्र में दिखते हैं किन्तु इनकी सबसे अधिक संख्या डंगमाल में रहती है।

    गहीरमाथा कच्छप अभयारण्य

    यह अभयारण्य बंगाल की खाड़ी में भीतरकणिका नम क्षेत्र के पूर्वी भाग, जहाँ पर नदियों का एस्चुरीन क्षेत्र (Estuarine zone) समाप्त हो जाता है, से आगे रेतीले तट के रूप में है। नवम्बर से मार्च के मध्य यह तट दक्षिण पूर्व एशिया के सागरीय क्षेत्रों से ओलिव रिडले प्रजाति के प्रवासी कछुओं से पटा होता है जो यहाँ पर प्रवास व सहवास करते हैं। सहवास के कुछ समय के बाद मादाएँ रेत के अन्दर अण्डे देती हैं व इसके बाद उनकों दबा देती है। अण्डे देने का यह क्रम और एक दो बार भी जारी रहता है।

    अण्डे देने के उपरान्त यह कछुए समुद्र में चले जाते हैं। अण्डे देने के लगभग 50 से 60 दिनों में अण्डों से बच्चे निकलने लगते हैं जो निकलते ही समुद्र का रुख करते हैं। इनमें से अधिकांश जीवन के प्रथम संघर्ष में ही मारे जाते हैं। अण्डों से निकलते ही चारों ओर से भोजन की तलाश में बैठे दूसरे परभक्षी जन्तु जैसे आवारा कुत्ते, सिआर, पक्षी उन पर हमला करने की प्रतीक्षा में रहते हैं और उनके बाहर निकलने पर उन पर टूट पड़ते हैं किन्तु जो सागर में प्रवेश कर जाते हैं वे 16 साल के बाद युवा होे पर कछुओं की इस परम्परा को आगे बढ़ाते हैं।

    भीतरकणिका का मुख्य आकर्षण चितकबरा हिरणनवम्बर से मार्च के मध्य तक सहवास, अण्डे देने, अण्डों से बच्चों के निकलने व उनके सागर से लौटने के साथ ही इन कछुओं का अनूठा चक्र पूर्ण होता है। प्रवासी कछुए, उनके बच्चों के अपने मूल गन्तव्यों को लौटने से यह क्षेत्र अगले 8 माह तक वीरान नजर आता है और 7-8 माह के सन्नाटे के बाद यह विलक्षण चक्र फिर से आरम्भ होता है।

    यह कछुए अण्डमान निकोबार द्वीप होते हुए श्रीलंका, पाक जलडमरूमध्य व म्यामांर तट से आते हैं। दुनिया में इस प्रजाति के कछुओं का अण्डे देने का यह सबसे बड़ा सागरीय तट है। इस तट पर कछुओं के प्रवास, सहवास, अण्डे देने में कोई व्यवधान न हो इसके लिये ही गहीरमाथा कच्छप अभयारण्य की स्थापना की गई। इसका 1408 वर्ग किमी, क्षेत्र सागरीय व 27 वर्ग किमी, क्षेत्रफल संरक्षित वन्य क्षेत्र है में अाता है।

    अभयारण्य के पूर्व में अकाकुला है जो इस कच्छप अभयारण्य का एक सुनसान तटीय कोना है वहीं पश्चिम में इस तट का केन्द्रीय स्थान हवालीखाटी है। डंगमाल के दूसरी ओर वैतरणी नदी की ओर कुछ और टापू हैं जिनमें कालीभंजडिया सबसे बड़ा है।

    भीतरकणिका राष्ट्रीय उद्यान

    इस नम क्षेत्र के तहत तीसरी संरक्षणगाह भीतरकणिका राष्ट्रीय उद्यान के रूप में जानी जाती है। यहाँ पर अनुछुए मैंग्रोव हैं। इस हिस्से में इसकी अनेक किस्मों को संरक्षण मिला है। मैन्ग्रोव का तात्पर्य ऐसी वृक्ष वनस्पतियों से है जो सागर तट पर ही मिलती हैं और नमकीन जल में उत्पन्न व विकसित होती हैं। उद्यान के आन्तरिक भाग के सुरक्षित व शान्त होने से यह स्थान पक्षियों की पसन्दीदा जगह है। हर साल ग्रीष्मकाल में यहाँ हजारों पक्षियों का जमावड़ा लगता है, जहाँ वे निश्चिन्तता के साथ घोसलें बनाकर अण्डे देते हैं, सेते हैं और उनका पालन पोषण कर बच्चों को आत्मनिर्भर बनाते हैं। मैंग्रोव के मध्य भोजन की प्रचुरता भी उनको यहाँ खींचती है।

    वैसे तो पूरे नम क्षेत्र में पक्षी देखने को मिलते हैं किन्तु ज्यादातर पक्षी डंगमाल से करीब 8 किमी. की दूरी पर बग्गहना क्षेत्र को ही अपना प्रवास बनाना पसन्द करते हैं।

    लगभग 4 हेक्टेयर में फैला कटोरेनुमा क्षेत्र किसी भी बाहरी शोर व प्रदूषणमुक्त है। यहाँ पर जून से लेकर सितम्बर के मध्य हजारों देशी व विदेशी पक्षी प्रजनन करते हैं। यहाँ पर चारों ओर पक्षियों का सैलाब दिखता है जिनकी संख्या 1 लाख तक जा पहुँचती है। इस दौरान पक्षियों के कलरव से यहाँ का वातावरण गुंजायमान मिलता है। इस पूरे क्षेत्र में 215 प्रकार की पक्षी प्रजातियाँ देखी व दर्ज की जा चुकी हैं। यहाँ अाने वाले पक्षियों में आधे दर्जन से अधिक प्रकार की किंगफिशर, नाइट हेरोन, पेलिकन गूज, ब्राह्मनी डक आदि पक्षी प्रजातियाँ प्रमुख रूप हैं। सारीबन एक अन्य ऐसा स्तान है यहाँ भी पक्षियों की भारी तादाद रहती है।

    मानवीय दबाव

    इस पूरे नम क्षेत्र की परिधि में लगभग 300 तक गाँव आते हैं जिनकी आबादी लगातार बढ़ रही है। यहाँ के ग्रामीण चारा व ईंधन के लिये इसी क्षेत्र पर निर्भर हैं। इस परिधि में हो रहे खेती के प्रसार, बढ़ते तालाबों में मछली पालन के प्रचलन से मैंग्रोव कम हो रहे हैं। आस-पास के गाँवों में आबादी यहाँ के मैंग्रोव के वृक्षों को घर बनाने, बाड़े बनाने व ईंधन के लिये इनको चोरी छिपे काटती रही है। बढ़ते प्राउन उत्पादन के तालाबों के बनने से प्रवासी पक्षियों का आना कम हुआ है।

    भीतरकणिका अभयारण्य मुख्य रूप से खारे पानी के मगरमच्छों (क्रोकोडायलस पोरोसस) का संरक्षणगाह हैमगरमच्छों की बढ़ती आबादी के कारण कभी मगरमच्छ भोजन की तलाश में अपनी सीमा से बाहर आकर मनुष्य पर हमला करते हैं वहीं कई बार ग्रामीण अभयारण्य क्षेत्र में मछली के शिकार के कारण मगरम्छों का निवाला बन जाते हैं। साल में इस प्रकार की तीन से चार घटनाएँ यहाँ औसतन होती हैं।

    दूसरी ओर प्रतिबन्धित क्षेत्र में मछली पकड़ने के कारण कई कछुए मछली के जालों में फँस कर मारे जाते हैं खासतौर पर यंत्रीकृत नौकाओं में वृद्धि होने के बाद से यह दर बढ़ रही है। निकटवर्ती पराद्वीप बन्दरगाह में स्थापित रासायनिक फैक्टरियों का जल भी परोक्ष रूप में यहाँ के जल जीवन को प्रभावित करता रहा है। समीप में धमारा में नए बन्दरगाह एवं रेलवे स्टेशन के बनने से इस शान्त क्षेत्र में मानवीय गतिविधियाँ बढ़ी हैं।

    पर्यटन महत्त्व

    भीतरकणिका की विशिष्टता को देखने को देश-विदेश के हजारों पर्यटक, वन्य जन्तु प्रेमी, अध्येता, शोधार्थी, स्कूली छात्र यहाँ आते हैं। यहाँ आने के दो प्रवेश द्वार हैं। भुवनेश्वर से कटक राजनगर होते हुए या भद्रक से चाँदबाली होते हुए। दोनों रास्तों का अपना-अपना आकर्षण है। भद्रक से चाँदबाली लगभग 60 किमी, दूर है। इस नमक्षेेत्र का ज्यादातर भाग जलीय क्षेत्र में आता है इसलिये राजनगर से गुप्ती व चाँदबाली से आगे खोला तक का सफर मोटर नौका से ही होता है। सामान्यतः यहाँ घूमने को दो दिन चाहिए तथा अन्दर जाने के लिये प्रवेश पास लेना होता है।

    मैंग्रोव के बीच से नौका से गुजरने का अद्भुत अनुभव होता है जहाँ हम उस जमीनी अनुभव से अवगत होते हैं कि मैंग्रोव के जलीय हिस्से में वन्य जीव जन्तुओं के अधिवास के लिये कैसा वातावरण चाहिये व पक्षी कैसे वातावरण को पसन्द करते हैं। बाहरी दुनिया का किसी भी तरह का शोर यहाँ आने नहीं पाता है। बीच-बीच में पक्षियों की चहचाहट से ही वातावरण की नीरवता टूटती है।

    यह क्षेत्र मोबाइल सिग्नल की पहुँच से दूर है। दोनों ओर से डंगमाल तक आने में लगभग ढाई से तीन घंटे लग जाते हैं। इसके अन्दर आवास के लिये टापुओं अकाकुला, हवालीखाटी, डंगमाल व गुप्ती में वन विभाग के विश्रामगृह है। डंगमाल में ही इन मगरमच्छों के हैचरी रियरिंग कॉम्पलैक्स में इन मगरमच्छों के बारे में जानकारी मिलती है। पक्षियों को देखने के लिये दूर वॉच टावर बने हैं।

    मानसूनी वर्षा के पूर्व यह क्षेत्र मई से लेकर अगस्त तक बन्द रहता है। यहाँ आने का उचित समय सितम्बर से मार्च रहता है। वन्य-जन्तुओं की जिन्दगी में कोई व्यवधान न हो इसलिये यहाँ आने वाले पर्यटकों को कड़े नियमों का पालन करना होता है।

    श्रीललित कोटीयाल, स्वतंत्र विज्ञान लेखक
    गुरु भवन, पौड़ी गढ़नाल 246001 (उत्तराखण्ड)

    मो.: 09412413720;
    ई-मेलः cmgpauri@rediffmail.com

     

     

     

     

     

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    झील-तालाबों बिन कैसे रहेंगे हमeditorialTue, 07/31/2018 - 17:16

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    विज्ञान प्रगति, जून, 2018

    बेलंदूर झीलदेश की आईटी राजधानी कहे जाने वाले बंगलुुरु में पिछले दिनों एक दृश्य ने शहरवासियों समेत पूरे देश को चिन्ता में डाला है। यहाँ की बेल्लनदर (बेलंदूर) झील में आग लगने की घटनाएँ हुईं। ऐसा नजारा इस झील में कई बार उपस्थित हो चुका है। एक अन्य झील येमलूर में भी ऐसी ही घटना हुई थी।

    झील से उठते धुएँ से शरहवासियों का जीना दूभर हो गया था। उस झील से भी गहरा धुआँ निकलने और छिटपुट आग लगने की घटनाओं के समाचार मिले थे। यही नहीं, इसी शहर की एक अन्य झील उल्सूर में एक ही दिन में हजारों मछलियों की मौत भयानक प्रदूषण की वजह से हो गई थी। झील में यह प्रदूषण नजदीक स्थित एक बाँध में आई दरार से रिसते पानी के जरिए फैला था। इस प्रदूषित पानी के मिलने से उल्सूर झील के पानी में अॉक्सीजन की मात्रा खतरनाक ढंग से कम हो गई, जिससे इसमें मौजूद जल-जीवों के लिये साँस लेना मुश्किल हो गया और वे मर गए।

    बंगलुरु की झीलों की घटनाएँ ऊपर से छोटी अवश्य दिखती हैं पर ये घटनाएँ असल में उन जलस्रोतों की उपेक्षा दर्शाती हैं जो सदियों से हमारे बीच रहे हैं और पानी ही नहीं, जमीन को उपजाऊ बनाने और जलवायु परिवर्तन में उनकी एक निश्चित भूमिका है। कभी शहर-कस्बों की शान कहे जाने वाले तालाब, बावड़ी, झील और वेटलैंड कहे जाने वाले ऐसे ज्यादातर जलस्रोत लोगों की लापरवाही और सरकारी उपेक्षा के कारण दम तोड़ रहे हैं।

    पिछले साल इससे सम्बन्धित एक आँकड़ा उत्तर प्रदेश के बारे में आया था, जहाँ आरटीआई से मिली सूचना में बताया गया कि बीते 60-70 वर्षों में 45 हजार तालाबों-झीलों पर अवैध कब्जा करके उनका वजूद ही खत्म कर दिया गया। आरटीआई सेे पता चला कि अकेले उत्तर प्रदेश में ही एक लाख 11 हजार 968 तालाबों पर अतिक्रमण करके लोगों ने जमीन पर तरह-तरह के निर्माण करके उनके अस्तित्व के लिये खतरा पैदा कर दिया, हालांकि इनमें से 66,561 तालाबों को बाद में कब्जे से मुक्त कराया गया। पर क्या कर्नाटक, क्या दिल्ली और क्या मध्य प्रदेश-हर जगह तालाब-झील रूपी जमीनों पर कब्जे की होड़ चलती रही है।

    झीलों की नगरी का बुरा हाल

    एक वक्त था, जब आईटी सिटी के रूप में विख्यात कर्नाटक की राजधानी बंगलुरु को बेहतरीन आबोहवा के सन्दर्भ में भी जाना जाता था। इस शहर को ‘झीलों की नगरी’ की पदवी दी गई थी, लेकिन आज हकीकत यह है कि बंगलुरु मरती हुई झीलों का सहर बन गया है। पिछले सदी में यहाँ एक दूसरे से जुड़ी करीब 400 झीलें-तालाब आदि थे जो औद्योगिकीकरण और शहरीकरण के कारण लगभग खत्म हो गए हैं।

    तीन-चार वर्ष पहले यहाँ करीब 15-20 झीलें या वेटलैंड्स (नम क्षेत्रों) को पुर्जीवित करने का अभियान चलाया गया था लेकिन उसके बाद भी यहाँ की झीलें सूख गई हैं। श्रीनगर (जम्मू-कश्मीर) की प्रख्यात डल झील को हालांकि आज भी खूबसूरत माना जाता है, लेकिन सच्चाई यह है कि चार दशक पहले यह 30 वर्ग किलोमीटर इलाके में फैली हुई थी। बाद में यह विकास कार्यों, शिकारों की मौजूदगी व उनसे छोड़े जाने वाले प्रदूषण और गाद व कचरे की समस्या के कारण सिकुड़कर आधी रह गई। यह हाल तब है जब इसकी सार-सम्भाल के लिये अब करीब सालाना 900 करोड़ रुपए खर्च किये जाते हैं।

    क्यों सिकुड़ रही झीलें

    सिर्फ भारत में ही नहीं, पूरी दुनिया में झीलें कचरे और प्रदूषण की मार से सिकुड़ रही हैं। वर्ष 2007 में राजस्थान की राजधानी जयपुर में आयोजित 12वें विश्व झील सम्मेलन में दुनिया के 40 से ज्यादा देशों के विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों ने झीलों के अतिक्रमण, उनमें बढ़ती गाद और पानी की निकासी आदि समस्याओं पर विचार किया था। सम्मेलन में उपस्थित विशेषज्ञों ने एकमत से कहा था कि पृथ्वी की आँखें कहलाने वाली झीलें अर्थात वेटलैंड्स बचाकर ही मानव जीवन का संरक्षण हो सकता है।

    उल्लेखनीय है कि फिलहाल हमारे देश में 2700 प्राकृतिक और 65 हजार मानवनिर्मित छोटी-बड़ी झीलें हैं। लेकिन इनमें से ज्यादातर शहरीकरण के कारण प्रदूषण और कचरे की मार झेल रही हैं। इससे उनके खत्म हो जाने का खतरा है। विज्ञानियों का कहना है कि हमारी धरती पर नम क्षेत्रों यानी वेटलैंड्स शहरीकरण के कारण हुए हमले भी पानी की कमी और प्राकृतिक आपदाओं के लिये जिम्मेदार हैं।

    झीलों, दलदली इलाकों और विशाल तालाबों आदि नम क्षेत्रों को विज्ञान की भाषा में ‘वेटलैंड्स’ कहा जाता है। वेटलैंड्स न सिर्फ अपने भीतर पानी की विशाल मात्रा सहेजते हैं, बल्कि जरूरत पड़ने पर आस-पास की शुष्क जमीन के लिये पानी भी छोड़ते हैं। यहाँ तक की वातावरण की नमी कायम रखने में भी वेटलैंड सहायक साबित होते हैं। इसके अलावा ये जमा हो चुकी गन्दगी को छानते हैं और अनेक जलीय तथा पशु व पक्षी प्रजातियों के लिये भोजन उपलब्ध कराते हैं। गन्दगी को अपने भीतर समा लेने और उसका संशोधन करने के लिहाज से वेटलैंड आस-पास के पर्यावरण के लिये फेफड़े का काम करते हैं।

    वेटलैंड्स भूजल को संरक्षित करने में अहम भूमिका निभाते हैंध्यान रहे कि तालाब या झील के रूप में मौजूद वेटलैंड प्रायः जलीय वनस्पतियों, कुछ वृक्ष प्रजातियों, जलीय घासों और कमल पुष्पों जैसी लम्बी नाल रखने वाली विशेष वनस्पतियों से घिरे होते हैं, इसलिये कई बार मैदानी इलाकों में आने वाली बाढ़ की रफ्तार इनकी मौजूदगी में मन्द पड़ जाती है और बाढ़ का पानी वेटलैंड में ठहरकर कुछ समय बाद धीमी गति से आगे बढ़ता है। इससे बाढ़ की संहारक क्षमता खत्म हो जाती है। बाढ़ की मन्द गति के कारण भूक्षरण भी नहीं हो पाता है। वेटलैंड भारी मात्रा में पानी अपने में सोख लेते हैं, इसलिये आस-पास के क्षेत्रों में लगाई गई फसलों में पानी जरूरत से ज्यादा नहीं जमा हो पाता है।

    वेटलैंड्स भूजल को किस मात्रा में और धरती की कितनी अतल गहराई पर संरक्षित करने में अहम भूमिका निभाते हैं, इसका एक प्रमाण वर्ष 1999 में गंगा बेसिन के उत्तरी इलाकों में तेल की खोज के लिये बनाए गए ड्रिलिंग कूपों के जरिए मिला था। गंगा बेसिन के इस क्षेत्र में उत्तर प्रदेश के लाल कुआँ (काशीपुर) पूरनपुर (पीलीभीत) तथा बिहार के गनौली-रक्सौल आदि स्थानों को चिन्हित किया गया, जहाँ हिमालय की तलहटी व तराई-भांभर बेल्ट के लगभग 70 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में करीब दो हजार मीटर की गहराई पर पानी के अपार भण्डार होने का पता चला।

    इस भण्डार की जानकारी मिलने पर केन्द्रीय भूजल परिषद ने ‘डीप ड्रिलिंग फॉर ग्राउंड वाटर एक्सप्लोसेशन इन गंगा बेसिन’ विषय पर आयोजित एक संगोष्ठी में साफ किया था कि जब गंगा बेसिन इलाके में पेयजल का संकट गहराने लगेगा, तो ऐसे में यही भूजल काम आएगा। योजना बनाई गई कि इन इलाकों में फ्लोइंग कूप बनाए जाएँ, जिनसे बड़े पैमाने पर पानी मिल सकेगा, साथ ही ऊर्जा की भारी बचत होगी।

    यह भूजल गंगा बेसिन के अलावा उत्तर प्रदेश, बिहार सहित राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली परिक्षेत्र का पेयजल संकट दूर करने में खास भूमिका निभा सकता है। इससे सम्बन्धित एक बड़ा उदाहरण मिसीसिपी नदी से सटा हुआ रिपैरियन वेटलैंड है, जो एकाध दशक पहले तक बाढ़ के पानी की विशाल मात्रा 60 दिनों तक रोके रखता था। जब उसका बड़ा हिस्सा निर्माण गतिविधियों की चपेट में आया तो वह वेटलैंड मुश्किल से 12 दिनों तक ही बाढ़ का पानी रोक पाया।

    खतरे तरह-तरह के

    सवाल यह है कि क्या ये वेटलैंड्स आगे बचे रहेंगे। लगातार बढ़ती आबादी के चलते उत्पन्न आवासीय संकट के समाधान के लिये प्रायः लोगों की नजर ऐसी ही वेटलैंड्स पर जाती है, जो ऊपरी तौर पर अनुपयोगी प्रतीत होते हैं। देश में दिल्ली, मुम्बई, चेन्नई, बंगलुरु और कोलकाता जैसे बड़े शहर बड़ी तेजी से हुए आवासीय निर्माणों की वजह से वेटलैंड्स गँवा चुके हैं।

    दिल्ली के इर्द-गिर्द अनेक गाँवों में कभी तालाब रूपी वेटलैंट्स की भरमार हुआ करती थी, लेकिन जब ये गाँव राजधानी के सम्पर्क में आकर शहरीकरण का हिस्सा बने, तो वेटलैंड्स से हाथ धो बैठे। कोलकाता से कुछ ही दूरी पर सुन्दरवन मुहाने के इलाके के दलदलों पर निर्माण-माफिया का डाका ही पड़ चुका है। इस मुहाने के दलदली क्षेत्रों में निर्माण कार्य सन 1953 से जारी है।

    जब हॉलैंड के विशेषज्ञों की देख-रेख में यहाँ कोलकाता के उपनगरों की स्थापना का काम शुरू हुआ था। मुम्बई, चेन्नई और बंगलुरु के दलदली इलाके की मिट्टी से पाटकर किस तरह रातोंरात गगनचुम्बी इमारतों में तब्दील कर दिये गए, यह कहानी हर कोई जानता है। बंगलुरु व उसके आस-पास के तालाबों व झीलों के गायब होने का एक कारण मैसूर-बंगलुरु के बीच बनाया गया वह सुपर एक्सप्रेस-वे है, जो इन तालाबों को पी गया है।

    उल्लेखनीय है कि दुनिया झीलों, तालाबों और दलदली भूमि के संरक्षण के लिये एक अन्तरराष्ट्रीय समझौते पर हस्ताक्षर कर चुकी है। सन 1975 में लागू किये गए रामसर समझौता-1971 के तहत पूरी दुनिया में 500 ऐसे दलदली इलाकों को पूर्ण संरक्षण के लिये चिन्हित किया गया था, जिसमें से 16 दलदली क्षेत्र हमारे देश में थे।

    समझौते में भारत के अलावा अमेरिका के एवरग्लेड्सस चेसपियक खाड़ी तथा ओकफेनोकी क्षेत्रों के दलदलों को बनाए रखने की सख्त हिदायत दी गई थी। समझौते को पूरे हुए 40 साल से ज्यादा हो चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद पूरी दुनिया में वेटलैंड्स बचाने को लेकर कोई खास सुगबुगाहट देखने को नहीं मिली।

    हमारे देश में कुछ साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने बेकार हो गए या काम में नहीं लाये जा रहे तालाबों का अधिग्रहण कर उन्हें मिट्टी से पाटने और उन पर मकान बनाने आदि की गतिविधियों पर एक फैसले के तहत रोक लगाकर पर्यावरण संरक्षण के विषय में अपनी इसी सजगता का परिचय दिया था। इस फैसले से आनेे वाली पीढ़ियों के लिये प्रकृति के तोहफों के बचे रहने की सम्भावना बरकरार रहती है और यह उम्मीद जागती है कि सूखे तालाबों को पुनर्जीवन मिलेगा और उनके सतत संरक्षण का प्रयास होगा। बहरहाल, यह उम्मीद तो कायम है कि इच्छाशक्ति के बलबूते इन्हें न सिर्फ बचाया जा सकता है, बल्कि जो तालाब या झीलें खत्म हो चुकी हैं, उन्हें फिर से जीवित किया जा सकता है।

    डल झील की खूबसूरती में भी लगे दाग

    धरती की जन्नत कहे जाने वाले कश्मीर में श्रीनगर स्थित डल झील इस खूबसूरत जगह का जैसे प्राण है। कश्मीर की कल्पना डल झील के बगैर नहीं हो सकती। कश्मीर पहुँचने वाला हर पर्यटक डल झील देखना चाहता है, उसमें तैरते शिकारों (हाउसबोट्स) में ठहरना चाहता है। पर डल की खूबसूरती पर भी कचरे और अन्य प्रदूषण की मार पड़ती रही है।

    दावा है कि 4 दशक पहले इस झील का विस्तार श्रीनगर के 30 वर्ग किलोमीटर के दायरे में था, लेकिन इसके आस-पास हुए विकास कार्यों, झील में शिकारों की मौजूदगी, झील में लगातार जमा होने वाली गाद व गन्दगी और जलीय वनस्पतियों (खरपतवार-वीड्स आदि) के कारण इसका क्षेत्रफल आधा रह गया। इसके बावजूद डल झील की साफ-सफाई आसान नहीं है। वैसे तो कहा जाता रहा है कि इस झील में मौजूद मछलियाँ इसमें आने वाली गन्दगी को साफ करती रहती हैं, लेकिन प्रदूषण इतना ज्यादा है कि सिर्फ मछलियों के बल पर झील साफ करना आसान नहीं रह गया है।

    इस झील में लगभग 25 प्रजातियों की खरपतवार (वीड्स और वाटर प्लांट्स) पाई जाती हैं। झील की अहम मछली-ग्रास कार्प इन सभी प्रजातियों की खरपतवार को नहीं खाती है। बल्कि ये मछलियाँ सिर्फ नरम खरतपतवार (सॉफ्ट वीड्स) को ही अपना आहार बनाती हैं। ऐसे में काफी ज्यादा मात्रा में खरपतवार झील में ही जमा रह जाती हैं। हालांकि सफाई अभियानों के जरिए हर साल करीब 6500 मीट्रिक टन वीड्स को झील से निकाल लिया जाता है, लेकिन तब भी काफी खरपतवार इसमें बची रह जाती है।

    उल्लेखनीय है कि शिकारों (हाउसबो्टस) से निकलने वाली गन्दगी और खरपतवार की समस्या से निपटने के लिये राज्य सरकार ने वर्ष 2004 में विशेष अभियान के तहत चीन से खास प्रजाति की मछली यानी ग्रास कार्प को मँगाया था। ग्रास कार्प का एक ब्रीडिंग सेंटर भी कश्मीर में बनाया गया था।

    ग्रास कार्प की खूबी यह है कि यह अपने भोजन के लिये मुख्य रूप से झीलों और तालाबों में मौजूद जलीय वनस्पतियों और खरपतवार पर निर्भर होती हैं। अध्ययनों में स्पष्ट हुआ है कि अमेरिका और यूरोप में ग्रास कार्प की सहायता से कई झीलों की गन्दगी को हमेशा के लिये खत्म कर दिया गया। लेकिन डल झील की गन्दगी और खरपतवार इतनी ज्यादा है कि ग्रास कार्प के अलावा मशीनों और शिकारों की मदद लेने के बाद भी झील पूरी तरह साफ नहीं हो पाती है।

    सम्भवतः इसकी एक बड़ी वजह इस झील में मौजूद 1500 से ज्यादा शिकारें हैं जो पर्यटकों का आकर्षण का केन्द्र होते हैं और जिनसे यहाँ के हजारों लोगों की रोजी रोटी चलती है। यही वजह है कि इनसे निकलने वाली गन्दगी में हर साल करीब 900 करोड़ के खर्च और तमाम प्रयासों के बावजूद कोई कमी नहीं लाई जा सकी है। हालांकि वर्ष 2013 में डल झील की साफ-सफाई का एक जिम्मा सीएसआईआर ने भी उठाने का निर्णय लिया था। सीएसआईआर ने इसके लिये मौजूद सभी उन्नत तकनीकों का सहारा लेना शुरू किया है। सीएसआईआर की कोशिशों का असर डल झील पर दिखना शुरू हो गया है।

    श्री अभिषेक कुमार सिंह
    आई-201, इरवो पाम कोर्ट (रेल विहार) अल्फा-1
    निकट-रेयॉन इंटरनेशनल स्कूल, ग्रेटर नोएडा 201 308 (उ.प्र)

     

     

     

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    मिशन रिस्पना से मिशन इलेक्शन तकeditorialTue, 07/31/2018 - 18:48

    रिस्पना नदीमिशन रिस्पना से ऋषिपर्णा या मिशन इलेक्शन, एक साधारण राजनीतिक समझ के अनुसार इनमें से किसे प्राथमिकता दी जायेगी। जाहिर है मिशन इलेक्शन को। जुलाई 24 को मलिन बस्तियों के पक्ष में “उत्तराखण्ड अर्बन लोकल बॉडीज एंड ऑथोरिटीज स्पेशल प्रोविजन-2018” लाकर उत्तराखण्ड सरकार ने इस पर मुहर लगा दी है। यह इस अधिनियम का नाम है जो रिस्पना नदी के दोनों किनारों पर बने कच्चे-पक्के मकानों को जमींदोज होने से बचाने के लिए लाया गया है। यह तीन साल के लिए प्रभावी रहेगा। मुद्दा यह है कि क्या सरकार तीन सालों में इस समस्या का हल ढूंढ़ पायेगी? क्या नदी को अतिक्रमण से मुक्त किया जा सकेगा?

    क्यों पड़ी जरूरत

    दरअसल 1910 में तत्कालीन आईसीएस एच जी वॉलटन द्वारा इस शहर पर लिखे गए प्रथम गजेटियर में देहरादून का विवरण गंगा और जमुना नदीतंत्र के क्षेत्र में स्थित एक पठार के रूप में किया गया है जिसके पूर्वी किनारे पर रिस्पना राव नदी और पश्चिमी किनारे पर बिन्दाल नदी बहती थी। उस समय ये दोनों ही नदियां सदानीरा थीं। इसी गजेटियर के उद्धरण को पेश करते हुए 18 जून को उत्तराखण्ड उच्च न्यायलय ने रिस्पना नदी के दोनों ही किनारों पर बसी, बसावटों को खाली कराने का आदेश जारी किया था। इसके लिए न्यायालय ने सरकार को तीन महीने का समय दिया था। उच्च न्यायालय का यह आदेश राजधानी की सड़कों को अतिक्रमण मुक्त करने के आदेश का ही एक हिस्सा था।

    पूर्व में चले अतिक्रमण अभियान

    उच्च न्यायालय के इस आदेश की पृष्ठभूमि पेशे से पत्रकार मनमोहन लखेड़ा द्वारा 2013 में न्यायालय को भेजे गए पत्र से जुड़ी है। लखेड़ा का यह पत्र में देहरादून शहर की सड़कों पर अतिक्रमण के कारण पैदल यात्रियों को होने वाली परेशानियों पर केन्द्रित था।पत्र में उठाये गये मुद्दों को आमजनों से जुड़ा मानते हुए उच्च न्यायालय ने इसे जनहित याचिका में तब्दील कर दिया था। इसके बाद न्यायालय ने 2013 और 2014 में शहर को अतिक्रमण मुक्त करने सम्बन्धी आदेश जारी किये। प्रशासन द्वारा इस सम्बन्ध में किये गए प्रयास से असंतुष्ट न्यायालय ने 2014 देहरादून जिला न्यायालय के बार एसोसिएशन के तत्कालीन अध्यक्ष राजीव शर्मा को कमिश्नर नियुक्त करते हुए शहर के अतिक्रमण के सम्बन्ध में एक विस्तृत रिपोर्ट तलब की। राजीव शर्मा की रिपोर्ट को आधार बनाते हुए उच्च न्यायालय ने देहरादून को अतिक्रमण मुक्त कराने सम्बन्धी कड़े आदेश जारी किये।

    बस्तियों को रेग्युलराइज करने की थी तैयारी

    सरकार ने कोर्ट के आदेश का पालन करते हुये शहर में बड़े पैमाने पर अतिक्रमण अभियान चलाया लेकिन बारी जब रिस्पना के किनारों पर बने मकानों की आयी तो सहसा उसे अध्यादेश का ख्याल आ गया। इस अध्यादेश के माध्यम से सरकार ने तीन सालों के लिए राज्य के सभी मलिन बस्तियों को राहत दे दी है। यानि सरकार तीन सालों के भीतर मलिन बस्तियों का पुनर्विस्थापन करेगी। पर सवाल यह है कि क्या सरकार ऐसा कर पायेगी? यह सन्देह का विषय है क्योंकि यही वह सरकार है जो उच्च न्यायालय के आदेश के पहले तक पिछली सरकार द्वारा लाए गये ‘लैंड ओनरशिप एक्ट 2016” के उपबंधों के अनुसार काम कर रही थी। इस एक्ट के अनुसार राज्य के सभी मलिन बस्तियों के वाशिंदों को उनके मकानों पर मालिकाना हक़ दिया जाना था। इस एक्ट की पृष्ठभूमि पिछली राज्य सरकार द्वारा “स्लम एरियाज डेवलपमेंट कमीशन” का गठन कर तैयार की गयी थी। इसका गठन 2015 में किया गया था। वर्त्तमान सरकार ने इसमें केवल एक बदलाव किया था जिसके तहत बस्तियों को रेग्युलराइज करने में आने वाली परेशानियों के आधार पर उन्हें तीन भागों में बांटा था। पहला, वैसी बस्तियां जिन्हें आसानी से रेग्युलराइज किया जा सके। दूसरा, जिन्हें रेग्युलराइज करने में थोड़ी परेशानी हो। तीसरा, जिन्हें रेग्युलराइज किया जाना काफी मुश्किल हो। इतना ही नहीं नदियों के किनारों पर बड़ी- बड़ी इमारतें भी बना दी गयी हैं जिन्हें “मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण” द्वारा लागू “कंपाउंड” की व्यवस्था की तहत संरक्षण भी प्रदान किया गया है। कंपाउंड की इस व्यवस्था के अंतर्गत मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण कुछ पैसों के एवज में निर्माणकर्ता को उसके द्वारा बनाये गए भवन के इस्तेमाल का अधिकार दे सकता था। हालाँकि इस व्यवस्था पर वर्तमान में प्रतिबंध लगा दिया गया है और इससे सम्बंधित केस फिलहाल सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है।

    सर्वोच्च न्यायालय का आदेश

    जसपाल सिंह बनाम पंजाब से जुड़े मुद्दे में 28 जनवरी 2011 को सर्वोच्च न्यायालय की दो सदस्यीय पीठ जिसमें न्यायमूर्ति मार्कण्डेय काटजू और न्यायमूर्ति ज्ञान सुधा मिश्रा शामिल थे, पीठ ने निर्णय दिया था कि किसी भी पब्लिक प्रॉपर्टी को सरकार को किसी को भी लीज पर देने का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को स्टेटस रिपोर्ट फाइल करने का भी आदेश दिया था। इतना ही नहीं कोर्ट ने यह भी उद्धृत किया था कि राज्य सरकारों ने पूर्व में सरकारी जमीनों का खूब दुरुपयोग किया है। कोर्ट ने यह भी कहा था कि सरकार भूमिहीनों, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों को केवल विशेष परिस्थितियों में जमीन दे सकती है।

    जल संकट है गंभीर मुद्दा

    कभी शहर को अपने जल से पोषित करने वाली रिस्पना और बिंदाल नदियां अब नालों में तब्दील हो चुकी हैं। इन नदियों का किनारा ही शहर की अधिकांश मलिन बस्तियों (जिनकी संख्या 129 है) की शरणस्थली हैं। इन बस्तियों से निकलने वाला मल-जल बिना किसी रोक-टोक इन नदियों में बहाया जाता है। इतना ही नहीं बरसात के दिनों में नदियों के किनारे जलमग्न हो जाते हैं। नदियों में पानी का बहाव इतना तेज होता है कि भविष्य में बड़ी तबाही की संभावना को भी नहीं नकारा जा सकता है। क्या सरकार की यह जिम्मेवारी नहीं बनती कि लोगों को स्वच्छ जल मुहैय्या कराये? देहरादून शहर की अधिकांश जनता के लिए पानी का मुख्य स्रोत सरकार द्वारा पाइप के माध्यम से वितरित किया जाने वाला जल है। लेकिन आलम यह है कि शहर में ऐसे काफी इलाके हैं जिनमें कई दिनों तक पानी नहीं आता। लोगों को पानी के लिए दर-बदर की ठोकरें खानी पड़ती हैं। साफ है कि शहर की बढ़ती आबादी के लिए पानी का आवश्यकता के अनुसार उपलब्ध न होना एक बड़ी समस्या है। इस समस्या को शहर के गिरते भूजल के स्तर ने और भी विकराल बना दिया है। इन दोनों नदियों का पुनर्जीवन लोगों के साथ सरकार को भी इस समस्या से उबार सकता है लेकिन यह तभी संभव होगा जब सरकार इसके लिए सार्थक प्रयास करे।

    क्या होगा मिशन रिस्पना का

    सरकार द्वारा मलिन बस्तियों के लिए लाया गया यह अध्यादेश उसी के द्वारा नदियों को पुनर्जीवित किये जाने के प्रयास में बड़ा रोड़ा साबित होगा। राज्य के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने रिस्पना नदी क्षेत्र में 22 जुलाई को वृक्षारोपण अभियान की शुरुआत करते हुए इस नदी को टेम्स जैसा बनाने का संकल्प लिया था। उन्होंने लोगों द्वारा अपनी तुलना भगीरथ से की जाने की बात की चर्चा करते हुए अभियान से जुड़े लोगों के भागीरथ प्रयास को भी सराहा था। लेकिन क्या ऐसा तब तक किया जाना संभव है जब तक नदी क्षेत्र को पूरी तरह से प्रदूषण मुक्त नहीं किया जाये? नदी क्षेत्र के अतिक्रमण को समाप्त न किया जाये? साफ है कि रिस्पना को सरकारी स्तर पर पुनर्जीवित किया जाने वाला प्रयास महज एक दिखावा लगता है।

     

     

     

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    प्राकृतिक संसाधनों पर जलविद्युत परियोजनाओं का साया

    editorialFri, 08/03/2018 - 17:35
    भिलंगना घाटी में बाँधउत्तराखण्ड राज्य 53,484 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में बसा है। पर्यटन व तीर्थाटन का यह एक अद्भुत केन्द्र भी है। भागीरथी, अलकनंदा, मन्दाकिनी, सरयू, महाकाली जैसी पवित्र नदियों के उद्गम स्थान होने कारण इसे देव भूमि भी कहा जाता है। राज्य का प्राकृतिक स्वरूप धीरे-धीरे बदलता नजर आ रहा है।

    बर्फीली चोटियों की जगह पिघलते ग्लेशियर, प्राकृतिक वनस्पतियों के स्थान पर, पहाड़ी क्षेत्र उजाड़ एवं वीरान घाटियों में तब्दील होते दिखाई दे रहे हैं। अब तो साल 2010 से इस राज्य में आपदा रुकने का नाम नहीं ले रही है। यहाँ कभी बाढ़, कभी भूकम्प, कभी भूस्खलन जैसी आपदा के कारण लोगों के दिलों में चौबीसों घंटे भय बना रहता है। आपदा के बाद जैसे ही लोग अपनी गुजर-बसर करने लगते हैं कि दूसरी आपदा आ जाती है।

    उत्तराखण्ड राज्य को जनप्रतिनिधी, ऊर्जा प्रदेश बनाने की खूब वकालत करते हैं। उन्हें इस बात का कतई मलाल नहीं कि यदि ये परियोजनाएँ बन जाएँ तो लोग इस पहाड़ी राज्य में रह पाएँगे या नहीं? आजकल गंगोत्री, यमुनोत्री, बद्रीनाथ, केदारनाथ क्षेत्र के लोग कह रहे हैं कि जून 2013 की आपदा को निमार्णाधीन जलविद्युत परियोजनाओं ने ही न्यौता दिया है। अब ऑलवेदर रोड भी डरावना रूप दिखा रही है। निर्माणाधीन ऑलवेदर रोड का मलबा सीधे नदियों में फेंका जा रहा है। जिसके कारण नदियों का रूख बदल ही नहीं रहा बल्कि बाढ़ और भूस्खलन के खतरे और अधिक बढ़ गए हैं।

    गौरतलब है कि केदारनाथ से आ रही मन्दाकिनी नदी पर निर्माणाधीन फाटा-व्योेंग और सिंगोली-भटवाड़ी जलविद्युत परियोजना एवं श्रीनगर जलविद्युत परियोजना किसी बड़े बाँध से कम नहीं हैं? मन्दाकिनी और अलकनंदा नदियों के जलग्रहण क्षेत्र में बसे हुए गाँवों के इतिहास के साथ ही भूगोल को भी इन जलविद्युत परियोजनाओं ने बदल दिया है। यही नहीं इन परियोजनाओं ने गरीब और छोटे किसानों के साथ भूमिहीनों को भी चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है।

    सिंगोली-भटवाड़ी जलविद्युत परियोजना का निर्माण कर रही एलएनटी कम्पनी के सहायक प्रबन्धक एसके भारद्वाज बताते हैं कि इस निर्माण पर अब तक 666 करोड़ खर्च हो चुके हैं।वे कहते हैं कि सम्पूर्ण परियोजना को कुल 900 करोड़ का घाटा 2013 की आपदा के कारण हुआ है। बाढ़ के कारण 25,000 घनमीटर वाला मलबे का डम्पींगयार्ड भी मन्दाकिनी बहाकर ले गई जिससे चन्द्रापुरी गाँव का नामों-निशान ही मिट गया। उधर सिंगोली-भटवाड़ी परियोजना की टनल 8 किमी बन चुकी जो मलबे से पट चुकी है। आपदा से पूर्व सिंगोली-भटवाड़ी जलविद्युत परियोजना निर्माण में 800 लोग कार्यरत थे जो आपदा आने के बाद अब अपने आपदा प्रभावित गाँव में वापस चले गए हैं। इन जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण क्षेत्र में किये जा रहे ड्रिलिंग और ब्लास्ट के कारण पहाड़ कमजोर हो चुके हैं।

    एलएनटी कम्पनी के सहायक प्रबन्धक एस के भारद्वाज ने बताया कि कम्पनी ने पहाड़ के कटान और पहाड़ में सुरंग निर्माण के लिये ड्रिलिंग और ब्लास्ट का प्रयोग किया है। कम्पनी के पास पाँच जम्बो ड्रिलिंग मशीनें हैं जिनकी कीमत लगभग 20 करोड़ है।वहीं स्थानीय लोगों का कहना है कि कम्पनी ने बाँध के निर्माण के लिये डायनामाइट का प्रयोग किया है।

    रयाड़ी गाँव की सुशीला भण्डारी बताती हैं कि पहले सिंगोली-भटवाड़ी जलविद्युत परियोजना 66 मेगावाट की थी, जिसको सिंगोली और भटवाड़ी नामक स्थान के बीच में बनना था। पूर्व के प्लान के विपरीत यह अब कुण्ड से बेड़ूबगड़ के बीच बनाई जा रही है। अब इसकी क्षमता 66 मेगावाट से बढ़ाकर 99 मेगावाट कर दी गई है। परन्तु परियोजना का नाम अब भी सिंगोली-भटवाड़ी ही है।

    सुशीला भंडारी का कहना है कि परियोजना स्थल में किये गए बदलाव के अनुसार इसके नाम में परिवर्तन किया जाना चाहिए।उन्होंने बताया कि इस परियोजना के लिये निर्मित आठ किलोमीटर लम्बी सुरंग के दायरे में 33 ग्रामसभाओं की लगभग 20 हजार जनसंख्या निवास करती है, जो पूरी तरह इसके प्रभावों की चपेट में है। लोगों के आवासीय भवन जर्जर हो चुके हैं लेकिन एलएनटी कम्पनी ने अब तक उनके पुनर्वास के लिये कोई नीति तक नहीं बनाई है।वहीं सरकार भी प्रभावित लोगों को विश्वास में लिये बिना ही कम्पनी को निर्माण से सम्बन्धित हर प्रकार की स्वीकृति दे रही है। इस परियोजना को नवम्बर 2015 तक ही पूरा किया जाना था लेकिन 2013 की विनाशकारी आपदा के कारण निर्माण कार्य पूरी तरह प्रभावित हो चुका है।

    नरायणकोटी के मदन सिंह बताते हैं कि मद्महेश्वर घाटी में कुणजेठीगाँव, ब्यौंखी, कालीमठ गाँव सर्वाधिक खतरे की जद में है। उनके गाँव में भू-धसान और बाढ़ की समस्या तथा आवासीय भवनों में खतरनाक दरारों का दौर पिछले पाँच वर्षों में अधिक बढ़ा है।जब से जलविद्युत परियोजनाओं का निर्माण शुरू हुआ है तब से क्षेत्र में प्राकृतिक आपदा की घटनाओं में तेजी से बढ़ोत्तरी होने लगी है। उन्होंने बताया कि सड़कों का चौड़ीकरण भी भारी ब्लास्टिंग से हो रहा है जिससे पहाड़ों की छाती छलनी हो रही है। पहाड़ों के नीचे लम्बी सुरंगों का निर्माण ही गाँवों के लिये सबसे बड़ा खतरा है। वे कहते हैं कि सुरंगों के निर्माण से निकलने वाले मलबे ने आपदा की सम्भावनाओं को और बढ़ा दिया है। ये डम्पिंगयार्ड नदी की प्राकृतिक धारा में अवरोध पैदा कर रहे हैं। कालीमठ पूरा धँस रहा है। यहाँ फाटा-व्योंग जलविद्युत परियोजना के निर्माण से प्रभावित क्षेत्र के कई गाँवों के लोगों में भारी दहशत है।

    जब से जलविद्युत परियोजनाओं का निर्माण शुरू हुआ है तब से क्षेत्र में प्राकृतिक आपदा की घटनाओं में तेजी से बढ़ोत्तरी होने लगी है। उन्होंने बताया कि सड़कों का चौड़ीकरण भी भारी ब्लास्टिंग से हो रहा है जिससे पहाड़ों की छाती छलनी हो रही है। पहाड़ों के नीचे लम्बी सुरंगों का निर्माण ही गाँवों के लिये सबसे बड़ा खतरा है। सुरंगों के निर्माण से निकलने वाले मलबे ने आपदा की सम्भावनाओं को और बढ़ा दिया है। ये डम्पिंगयार्ड नदी की प्राकृतिक धारा में अवरोध पैदा कर रहे हैं।

    जयनारायण नौटियाल कहते हैं, “आने वाली पीढ़ी हमें माफ नहीं करेगी। वर्तमान में जो प्रकृति के साथ अनियोजित तरीके से छेड़छाड़ की जा रही है उसके जिम्मेवार हम सभी हैं क्योंकि हिमालय क्षेत्र में इस आक्रामक विकास को स्वीकृति हमने ही दी है”।फाटा से सीतापुर तक सीमा सड़क संगठन द्वारा मोटर मार्ग का चौड़ीकरण किया जा रहा है। इस निर्माण के प्रयोग में लाई जा रही भारी ब्लास्टिंग से शेरसी गाँव काँप रहा है। क्षेत्र के पंचायत सदस्य विजय सिंह ने बताया कि केदारनाथ के निकट त्रियुगीनारायण के पास सीतापुर से व्योंग तक 9 किलोमीटर की सुरंग बनाई गई थी। इस सुरंग निर्माण से गाँव के भवनों में काफी दरारें आईं और इसके चलते भडियाता तोक पर बहुत बड़ा गड्ढा बन गया था। इसको ढँकने के लिये बाँध निर्माण कम्पनी ने रातों-रात सैकड़ों सीमेंट के कट्टे गड्ढे में भरे दिये।

    कुछ दिन बाद रुड़की से आई इंजीनियरों की टीम को कम्पनी के लोगों ने बताया कि वे यहाँ वृक्षारोपण कर रहे हैं। बताया जाता है कि लैंको कम्पनी ने कभी भी निर्माणाधीन फाटा-व्योंग जलविद्युत परियोजना के सम्बन्ध में प्रभावितों से कोई सलाह-मशविरा नहीं किया। लोग हैरान हैं कि इस कम्पनी को यहाँ निर्माण करने की संस्तुति किसने दी? जलविद्युत परियोजना की सुरंग में जब 16 जून की सुबह बाढ़ का मलबा फँसा तो मन्दाकिनी नदी तीन मिनट के लिये बड़ासू से सीतापुर तक झील में तब्दील हो गई थी। जिस कारण बड़ासू गाँव की जखोली, वैला, चाली नामे तोक में 400 नाली से अधिक कृषि भूमि तबाह हो गई।

    ग्रामीणों ने बताया कि केवलानन्द थपलियाल का मकान जब लैंको कम्पनी के सुरंग निर्माण के दौरान दरारनुमा हो गया तो कम्पनी ने आनन-फानन में उनके लिये दूसरा मकान लगभग पाँच लाख रुपए की लागत से बनवा दिया। इसी तरह गाँव के शारदानन्द, जशोधर सहित 15 परिवारों को कम्पनी ने मुआवजा दिया था। ग्रामीणों के मुताबिक सुरंग बनने के बाद तरसाली गाँव का पेयजल स्रोत सूख गया है।

    अब ग्रामीण पानी के लिये तरस रहे हैं। ऐसी तमाम समस्याओं को लेकर ग्रामीण तत्कालीन पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश से दिल्ली में जाकर मिले थे। श्री रमेश ने ग्रामीणों को आश्वस्त किया था कि वे बाँध निर्माण क्षेत्र की जाँच करवाएँगे। जाँच हुई भी थी, लेकिन जाँच रिपोर्ट कहाँ गायब हुई किसी को पता नहीं है। यहाँ भी लैंको कम्पनी के पास सुरंग निर्माण के लिये मात्र सवा करोड़ रुपए का एक बूमर, एक जैकहोल, एक मेनहोल है। इसके प्रयोग के बाद भी सुरंगों के ऊपर के गाँव विस्फोट के कारण हिल गए हैं। गाँव और सुरंग का फासला 500 मीटर के बीच बताया जाता है। कम्पनी संचालकों का कहना है कि सुरंग के आस-पास हिस्से को उसके डायमीटर की तुलना में दोगुना कवर किया गया है जिससे इसके ऊपर के हिस्से को भविष्य में कोई नुकसान नहीं होगा। इसके बाद भी यहाँ मकानों में दरारें आ रही हैं।

    केदारनाथ जाने वाले मार्ग पर स्थित खुनेरा गाँव की सामाजिक कार्यकर्ता अर्चना बहुगुणा ने कहा कि फाटा में नौ कम्पनियों के हेलीपैड हैं। यात्राकाल में एक दिन में 24 चक्कर एक कम्पनी का हेलीकॉप्टर केदारनाथ में आने-जाने के लिये उड़ान भरता है।अर्चना का यह मानना है कि जब लोगों की साँस से ग्लेशियर पिघलने को खतरा बना रहता है तो फाटा से केदारनाथ के लिये नौ कम्पनियों के हेलीकॉप्टरों की प्रतिदिन 216 उड़ाने ग्लेशियर पर कितना प्रभाव डालती होंगी?वे मानती हैं कि जब से केदारनाथ के लिये हवाई यात्रा आरम्भ हुई है तब से ग्लेशियरों के पिघलने की खबरें भी बड़ी तेजी से बढ़ी हैं।

    नदी बचाओ अभियान के संयोजक सुरेश भाई कहते हैं कि लोगों का उजड़ना और सम्भलना इस राज्य की नीयति बनती जा रही है। इस विपरीत परिस्थिति में भी सरकार में बैठे हुक्मरान जनता के प्रति जबावदेह नहीं हैं। ऐसा कब होगा यह बड़ा सवाल है?


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    उत्तराखण्ड के मंडुआ की पहुँच विदेशों तकeditorialFri, 08/03/2018 - 18:50

    मंडुआ (कोदो)जैसे-जैसे खाद्य पदार्थों में कीटनाशक पदार्थों का प्रयोग बढ़ता जा रहा है वैसे-वैसे लोगों का शरीर बीमारियों का घर बन गया है। मेडिकल रिपोर्ट्स के अनुसार सर्वाधिक बीमारी लोगों को खान-पान में मौजूद रासायनिक पदार्थों की मौजूदगी के कारण हो रही है। इस खतरे से बचने के लिये लोग फिर एक बार वर्षों पूर्व भुला दिये गए पारम्परिक मोटे अनाजों की तरफ लौटना शुरू कर दिया है। उत्तराखण्ड में तो मंडुवे के आटे से रोटी के अलावा बर्फी और बिस्कुट भी बनना शुरू हो गया है। साफ है कि उत्तराखण्ड में धीरे-धीरे मण्डुवा जैसे मोटे अनाज की माँग बढ़ती जा रही है और यह यहाँ के किसानों की आमदानी का भी जरिया बनता जा रहा है।

    उत्तराखण्ड में मोटे अनाजों की 12 प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिसे आम बोल-चाल की भाषा में बारहनाजा कहते हैं। इनमें शामिल मण्डुवा कभी बच्चों के अन्नप्रास में प्रयोग में लाया जाने वाला मुख्य आहार था। समय बदला, देश के सभी क्षेत्रों में खेती के पैटर्न में बदलाव हुए और मोटे अनाज की जगह नए अनाजों ने ले लिया। उत्तराखण्ड की वादियों में रचे-बसे किसान भी पारम्परिक अनाजों को त्यागकर गेहूँ का उत्पादन करने लगे।

    इस तरह गेहूँ के उत्पादन में इजाफा हुआ और मण्डुवा की जगह गेहूँ की रोटी ने ले ली। समय के साथ गेहूँ के उत्पादन में तेजी आई लेकिन उत्पादन में कीटनाशकों के बढ़ते प्रयोग के कारण इसके सेवन से लोग विभिन्न प्रकार की बिमारियों की चपेट में आने लगे। इन्हीं सब कारणों से यहाँ के लोग मण्डुवा सहित अन्य मोटे अनाजों की तरफ फिर से मुड़ गए। इस तरह उत्तराखण्ड में धीरे-धीरे मोटे अनाजों की मंडी में तब्दील होने लगा। राज्य में मंडुआ का बाजार काफी तेजी से विकसित हुआ है।

    टिहरी गढ़वाल के रानीचौरी में दो युवकों ने मण्डुवा की बर्फी बनाने का काम शुरू किया है। अब बाजार में उनकी बनाई बर्फी की खूब माँग है। स्थिति अब ऐसी है कि मण्डुवा से बने उत्पाद जैसे ही बाजार का रुख करते हैं तुरन्त ही बिक जाते हैं क्योंकि माँग की तुलना में उत्पादन कम है। उत्पादन कम होने का एक बड़ा कारण बीज के उपलब्धता की समस्या भी है।

    बनेगा कोदो का बिस्कुट

    यदि सब कुछ ठीक रहा तो उत्तराखण्ड का कोदो यानी मंडुआ लोगों को नगदी फसल के रूप में आर्थिक संसाधन उपलब्ध करवाएगा। अतएव अब कोदो एक बार फिर से उत्तराखण्डियों के खेतों में लहलहाएगा। इसकी शुरुआत केन्द्र सरकार की तरफ से हो गई है। इस पहल से फिलहाल बागेश्वर जनपद के मोनार गाँव सहित 20 गाँवों के 952 परिवार जुड़ गए हैं। ये लोग मण्डुवा के आटे से बिस्कुट बनाएँगे।

    इस बिस्किट को हिलांस नाम से बाजार में उतारा जाएगा। भारत सरकार के अनुसूचित जनजाति मंत्रालय की टीम ने मोनार में कोदो से बनने वाले उत्पाद का परीक्षण भी कर लिया है। खबर है कि इसी महीने मंत्रालय का ‘माँ चिल्टा आजीविका स्वायत्त सहकारिता लोहारखेत’ के साथ अनुबन्ध होगा। आपको बता दें कि मन की बात में पीएम मोदी खुद कोदो की तारीफ कर चुके हैं। क्षेत्र के लोग इस पहल से खासे उत्साहित हैं और कहते हैं कि इस प्रकार यदि स्थानीय स्तर पर स्वरोजगार के साधन उपलब्ध होंगे तो स्वतः ही पलायन पर रोक लग जाएगी।

    केन्द्र सरकार की नई पहल

    केन्द्र सरकार देश भर में 56 आउटलेट तैयार कर रही है। ये महज एक शुरुआत होगी। इनमें मंडुआ से बने उत्पादों को रखा जाएगा। बताया जा रहा है कि मंत्रालय से सम्बन्धित लोगों द्वारा बिस्किट का सैम्पल भी कलेक्ट किया गया है।

    फिलहाल इस मुहिम में प्रत्यक्ष रूप से 8 सदस्य काम कर रहे हैं। उन्हें चार हजार से 12 हजार रुपए तक वेतन मिल रहा है। इसके अलावा इस मुहिम में अप्रत्यक्ष रूप से 20 गाँवों के 952 लोग जुड़े हुए हैं। बताया जा रहा है कि सहकारिता के माध्यम से हर साल लगभग पाँच लाख से ज्यादा की आय अर्जित होने की सम्भावना है। मंडुआ के साथ मक्का और चौलाई (मार्छा-रामदाना) के बिस्किट भी बनाए जा रहे हैं। खास बात ये है कि स्वास्थ्यवर्धक होने की वजह से लोग मंडुवे के उत्पादों को खूब पसन्द कर रहे हैं। 250 ग्राम के एक बिस्किट के पैकेट की कीमत 25 रुपए तय की गई है।

    ज्ञात हो कि उत्तराखण्ड के बागेश्वर जिले के लोहारखेत में 10 हेक्टेयर में मंडुआ का उत्पादन होगा। इसके अलावा 10 हेक्टेयर में कुछ क्लस्टर भी डेवेलप किये गए हैं और जिनमें मंडुआ की खेती कराई जा रही है। इसके लिये लोगों के बीच लगभग डेढ़ क्विंटल बीज का वितरण किया गया है। बताया जा रहा है कि 10 हेक्टेयर में लगभग 160 क्विंटल मंडुवे का उत्पादन होगा।

    इधर कपकोट ब्लॉक के 20 गाँवों के ग्रामीण मण्डुवा और मार्छा का उत्पादन सदियों से कर रहे हैं। इसे अब दोगुना करने का लक्ष्य सरकार द्वारा तैयार किया गया है। लोहारखेत के आउटलेट में ढाई लाख लागत की नैनो पैकेजिंग यूनिट की स्थापना भी की जाएगी। केन्द्र सरकार की मदद से इसे विकसित किया जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे पलायन तो रुकेगा ही, साथ ही स्थानीय स्तर पर लोगों को रोजगार भी मिलेगा।

    बढ़ रही है माँग

    उतराखण्ड के मंडुवे की माँग विदेशों में भी है। अब मण्डुवा लोगों की आजीविका का साधन बनने जा रहा है। मंडुवे की रोटी लोगों के घरों में फिर से जगह बनाने लगी है। इसका इस्तेमाल दवा के रूप में भी किया जाता है। उदाहरण के तौर पर दूधमुहें बच्चों को जब जुकाम आदि की समस्या होती है तो मंडुवे के आटे को गर्म पानी में डालकर उसका भाप लेने से आराम मिलता है।

    कभी मंडुवे के आटे से स्थानीय स्तर पर सीड़े, डिंडके जैसे पारम्परिक नामों से कई प्रकार के व्यंजन तैयार होते थे जो ना तो तैलिय होती और ना ही स्पाईसी होती थीं। लोग इसे अतिपौष्टिक मानते थे। इन्हें हल्की आँच के सहारे दो बर्तनों में रखकर भाप से पकाया जाता है। इसमें चीनी गुड़ और मंडुवे के आटे के अलावा और अन्य किसी चीज का प्रयोग नहीं किया जाता था। अब उम्मीद यह की जा रही है कि ये व्यंजन जल्द ही प्रचलन में आएँगे।

    स्थानीय लोग और वैज्ञानिक संस्थाएँ मंडुवे के आटे और मंडुवे के दाने को लेकर विभिन्न प्रयोग कर रहे हैं। देहरादून स्थित कटियार एकमात्र बेकरी है जहाँ मंडुवे के आटे से बनी डबल रोटी आपको मिल जाएगी। कटियार बेकरीवालों का कहना है कि मंडुवे के आटे से बनी डबल रोटी की माँग तेजी से बढ़ रही है और वे माँग के अनुरूप पूर्ति नहीं कर पा रहे हैं। इसके अलावा कृषि विज्ञान केन्द्र रानीचौरी ने मंडुवे के आटे से बर्फी बनाने का सफल प्रयोग किया है।

    केन्द्र से प्रशिक्षण लेकर शिक्षित बेरोजगार संदीप सकलानी और कुलदीप रावत ने मंडुवे की बर्फी को पिछली दीपावली के दौरान बाजार में उतारा है। औषधीय गुणों से भरपूर इस जैविक बर्फी की कीमत 400 रुपए प्रति किलो है जिसकी ऑनलाइन डिलीवरी हो रही है।

    मंडुवे का वैज्ञानिक नाम इल्यूसीन कोराकाना है। वैज्ञानिक और पकवान बनाने के शौकीन लोगों ने मंडुवे के औषधीय गुण ढूँढ निकाले हैं। इसकी पौष्टिकता को देखते हुए कुछ वर्षों से रोटी के अलावा बिस्कुट और माल्ट यानि मंडुवे की चाय के रूप में भी इसका उपयोग हो रहा है। कृषि विज्ञान केन्द्र, रानीचौरी की विशेषज्ञ एवं मुख्य प्रशिक्षक कीर्ति कुमारी ने बताया कि उनका ध्येय पारम्परिक अनाजों को बढ़ावा देकर किसानों की आर्थिक स्थिति को सुधारना है। इसी को ध्यान में रखते हुए मंडुआ, झंगोरा आदि मोटे अनाजों के कई उत्पाद तैयार किये जा रहे हैं। मंडुआ की बर्फी इसी का एक हिस्सा है।

    ऐसे हुई बर्फी बनाने की शुरुआत

    26 वर्षीय संदीप सकलानी ने बीटेक करने के बाद दो साल अकाउंट इंजीनियर के रूप में राजस्थान में नौकरी की। लेकिन, वहाँ मन न रमने के कारण वह घर लौट आये और कुछ हटकर करने का निर्णय लिया। इसी दौरान 25 वर्षीय कुलदीप रावत से उसकी दोस्ती हो गई, जो स्नातक की पढ़ाई कर रहा था। दोनों के विचार मिले तो दो वर्ष पूर्व देवकौश नाम से एक कम्पनी का गठन किया। इसके माध्यम से उन्होंने फलों व सब्जियों पर आधारित उत्पाद बनाने शुरू किये। इसी दौरान उन्हें पता चला कि केवीके रानीचौरी उत्पाद बनाने का प्रशिक्षण दे रहा है तो उन्होंने भी इसमें भाग लिया और वहाँ मंडुआ की बर्फी बनानी सीखी।

     

     

     

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    सरस्वती की तरह कहीं विलुप्त न हो जाएँ गंगा, यमुना - प्रदीप टम्टा

    editorialSat, 08/04/2018 - 18:11

    टिहरी बाँध

    छात्र राजनीति से अपने जीवन की राजनीतिक पारी शुरू करने वाले राज्यसभा सांसद प्रदीप टम्टा से प्रेम पंचोली ने उत्तराखण्ड के प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, संवर्धन और दोहन से जुड़े मुद्दों पर लम्बी बातचीत की। इस क्रम में उन्होंने कई गम्भीर विषयों पर बड़ी ही बेबाकी से अपनी राय रखी। प्रस्तुत है उनसे बातचीत के प्रमुख अंश

    हिमालय में पर्यटन

    सुन्दर लाल बहुगुणा जी भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में हिमालय और तमाम प्राकृतिक सम्पदा को बचाने के संघर्ष के क्रम में हुए आन्दोलनों के प्रणेता रहे। वे आइडल हैं। उनकी हर बात में योजना है पर दुर्भाग्य है कि हम उन बातों पर गौर नहीं करते। वहीं दुनिया के कई देशों में उनके विचारों की सराहना की जाती है।

    भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय द्वारा एक बैठक का आयोजन किया गया था देश के अन्य हिमालय क्षेत्रों सहित उत्तराखण्ड के सभी सांसद आमंत्रित थे। वहाँ मैंने कहा था कि हिमालय पर सबकी निगाह है चाहे वह पर्यटन मंत्रालय हो या बड़ी मल्टीनेशनल कम्पनियाँ। पर्यटन मंत्रालय, इस देश की सभ्यता और संस्कृति को एक ब्रांड के रूप में प्रचारित करना चाहता है जबकि हिमालय का मूल प्राकृतिक स्वरूप ही पर्यटन का मूल आधार है।

    प्राकृतिक संसाधन और विकास योजनाएँ

    आज मैं सांसद हूँ, कल कोई और होगा। सांसद होना बड़ी बात नहीं है। बड़ी बात तो अपने परिवेश से जुड़े रहना है। वैसे भी मैं छात्र जीवन से जंगल के आन्दोलनों से साथ जुड़ा रहा हूँ। हिमालय पर बड़ा संकट है। मध्य हिमालय से निकलने वाली नदियों जैसे गंगा, यमुना, काली और गौरी आदि के अस्तित्व पर सवाल खड़ा हो गया है।

    सभ्यता और संस्कृति का स्रोत नदियाँ ही हैं जिसमें गंगा, यमुना का महत्त्वपूर्ण स्थान है। ये नदियाँ हिमालय से निकलकर देश के करोड़ों लोगों को जीवन देती हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल सभी हिमालय से निकलने वाली इन्हीं नदियों पर निर्भर हैं। हिमालय के जो तीन महत्त्वपूर्ण मुद्दे हैं वो, जल, जंगल और जमीन के हैं।

    हमारे जंगल हमारी माता-बहनों और नौजवानों द्वारा चलाए गए आन्दोलन जिसे आप चिपको आन्दोलन और वन बचाओ आन्दोलन के नाम से जानते हैं, से ही बचे। अगर ये आन्दोलन न चले होते तो आज हिमालय के जंगल न बचे होते और न ही देश के अन्य जंगल। इसी आन्दोलन का परिणाम है कि इस देश में जंगल को लेकर नए विचार अपनाए गए। फॉरेस्ट कंजर्वेशन एक्ट लागू हुआ।

    सरकारी अधिनियम और लोक मान्यताएँ

    आज इस देश में फॉरेस्ट कंजर्वेशन एक्ट में ढील दी जा रही है जिसकी बड़ी वजह ओड़िशा, झारखण्ड और छत्तीसगढ़ के प्राकृतिक सम्पदा पर सबकी नजर। त्रासदी देखिए कि इन्हीं राज्यों में अकूत सम्पदा के साथ सबसे ज्यादा गरीबी भी है। हमारी सरकार ने भी अपनी ही जनता के दमन के लिये पूरी ताकत लगा दी है। ग्रीन हंट सहित और न जाने कितने हंटों का प्रयोग किया जा रहा है।

    देश के सबसे कमजोर लोगों के साथ ही राज्य सरकारें भी भिड़ी हुई हैं। किस चीज के लिये भिड़ी हुई हैं ये सरकारें? क्या आदिवासियों के विकास के लिये? नहीं! दरअसल इसकी मूल वजह मल्टीनेशनल कम्पनियों को बिजली पैदा करने के साधन उपलब्ध कराना। इन क्षेत्रों के संसाधनों पर सभी की नजर है उत्तराखण्ड में हाइड्रोपावर से जुड़ी सम्भावनाओं के बारे में भी यही कहा जा सकता है। सरकार भी इन्हीं का साथ दे रही है।

    ऊर्जा के अन्य विकल्प

    अगर हम चाहते हैं कि देश विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में आगे बढ़े तो क्यों नहीं हम सोलर एनर्जी के क्षेत्र में आगे बढ़ रहे हैं? जिन लोगों और किसानों को हम अनपढ़ और विज्ञान विरोधी कहते हैं उन्होंने भी अपनी साधारण बुद्धि का इस्तेमाल कर सौर ऊर्जा के प्रयोग से अपने खाद्य पदार्थों को 6-6 महीने तक सुरक्षित रखते थे।

    चीन आज सौर ऊर्जा के क्षेत्र में दुनिया में एक बड़ी ताकत बन रहा है। आपको बिजली की जरूरत है तो विज्ञान को आगे बढ़ाएँ, तकनीक को बेहतर बनाएँ। जब विज्ञान आगे बढ़ रहा है तो ऊर्जा की जरूरतों के लिये हमें पानी से दूर क्यों किया जा रहा है। मैं न्यूक्लियर एनर्जी के पक्ष में था लेकिन जब जापान के फुकुशिमा में जो हुआ उसके बाद मेरे विचार में बदलाव आया और मैंने नए तरीके से सोचना शुरू कर दिया।

    जल, जंगल और जमीन

    मैं जिन तीन मुख्य सवालों जल, जंगल और जमीन की बात कर रहा था उसमें जंगल तो जन आन्दोलनों के दवाब में बने अधिनियमों के कारण बचा। लेकिन अब इनकी निगाह हमारे जल और जमीन पर है। आज उत्तराखण्ड में कोई नदी नहीं बची होगी जो सुरंगों में नहीं जा रही है। एक वक्त था कि हमने टिहरी जैसे बड़े डैम प्रोजेक्ट को सँवारा।

    आज पूरी दुनिया बड़े डैम के खिलाफ है। मैंने तो सुना है कि यूरोप और अमरीका में डैमों को तोड़ा जा रहा है लेकिन हमारे देश में अभी भी बड़े डैम के प्रति जो मोह है उससे मुक्ति नहीं मिली है। टिहरी से बड़े डैम पंचेश्वर के निर्माण के लिये ताने-बाने अभी भी बुने जा रहे हैं। आज नदियाँ टनल में जा रही हैं फिर भी हमारी चेतना नहीं जागी है। सवाल यह है कि जब एक नदी टनल से होकर गुजरती है तो उसका प्राकृतिक स्वरूप समाप्त हो जाता है।

    गौर किजिए यदि नदी 20 किलोमीटर लम्बे टनल के अन्दर जाएगी तो उस क्षेत्र में जो आबादी है उनकी क्या स्थिति होगी? इस पर हम सबको विचार करने की जरूरत है। मेरा मानना है कि पानी न हमारी देन है ना ही सरकार की। यह नेचर की देन है। कोई इसे ईश्वर कहे कोई खुदा कहे, मैं इसे नेचर कहता हूँ।

    जब यह नेचर की देन है तो इसे इसके प्राकृतिक रूप में ही रहने दीजिए। इन्हीं नदियों के अस्तित्व पर भारत की सभ्यता और कृषि टिकी है। हमारे देश के बड़े-बड़े वैज्ञानिकों ने नदियों को जोड़ने का सुझाव दिया है। मैं भी कहता हूँ कि यह केवल सुझाव के तौर पर अच्छा है! यह कैसी विडम्बना है कि नदियों में पानी ही नहीं है और उनको जोड़ने की स्कीम चल रही है। यह पूरी तरह से नेचर के खिलाफ है।

    विकास के मायने

    इस देश को अगर आगे बढ़ना है तो हाइड्रोपावर से बिजली बनाने का सिद्धान्त छोड़ना होगा। इस तरह के दर्शन से मुक्त होना होगा। तभी जाकर खेत और लोगों को पानी मिलेगा। पानी का उपयोग सबसे ज्यादा देश की कृषि और पेयजल की समस्या को दूर करने के लिये है। आज हिमालय की यही त्रासदी है कि वहाँ पानी न पीने के लिये है और न ही खेतों की सिंचाई के लिये। हमारी नदियाँ विलुप्त होती जा रही हैं।

    आने वाले समय में नदियों की अगर यही स्थिति रही तो उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल पर सबसे बड़ा संकट आ पड़ेगा। आज से 50 साल पहले हम यही सोचते थे कि सरस्वती देश की एक प्रमुख नदी है लेकिन अब उसका नामों निशान नहीं है। आज सरस्वती केवल लोगों के विचार में है। कहीं ऐसा न हो कि गंगा, यमुना का भी यही हश्र हो। इसीलिये हम सब को गम्भीरता से सोचना होगा। पानी की ही तरह जमीन का भी सवाल है। इस पर मैं ज्यादा नहीं कहूँगा।

    दिल्ली में बारिश होती है तो हमारी धड़कन तेज हो जाती है कि हम अपने घरों से कैसे निकलेंगे? वहीं हिमालय क्षेत्र के बाशिन्दों को यह चिन्ता होती है कि न जाने क्या होने वाला है? कितने घरों में तबाही होगी? किस परिवार के साथ क्या होगा? सरकार को आज हिमालय के प्रति नए दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है। मुख्य सवाल यह है कि हिमालय की जो सम्पदाएँ हैं वो प्रकृति प्रदत हैं। अगर हम भविष्य के लिये इसे संरक्षित नहीं कर पाये तो हिमालय में बहुत बड़ा संकट आएगा। आज हिमालय में जो सड़कें बन रही हैं उसके लिये कोई वैज्ञानिक सोच नहीं है।

    टिहरी डैम के पास भूस्खलन को रोकने की व्यवस्था की गई है। लेकिन उत्तराखण्ड में कहीं और ऐसी व्यवस्था नहीं है। चाहे वो केन्द्र की सड़क हो या राज्य की। टिहरी डैम में भूस्खलन को रोकने के लिये जो प्रयोग किया गया था तब मैंने ये सवाल किया था कि अन्य जगहों पर इस टेक्नोलॉजी का प्रयोग क्यों नहीं किया जाता? मुझे उत्तर मिला कि यह बहुत खर्चीली टेक्नोलॉजी है। यानी इस देश में खर्चीली टेक्नोलॉजी सिर्फ बड़े लोगों के लिये है।

    आम आदमी के लिये सिर्फ साधारण टेक्नोलॉजी! आम आदमी पर अधिक खर्च करने को हम तैयार नहीं हैं! हम सबको हिमालय के लियेे नई सोच के साथ गम्भीरता से विचार करना होगा। चाहे वो हिमालय की कृषि के सन्दर्भ में हो या विकास के संदर्भ में।

    संघर्ष बनाम विकास

    मुझे याद है कि 6,7,8 अक्टूबर 1974 में जब हम दस बारह लोग नैनीताल की सड़कों पर गिर्दा हुड़का बजाकर यह गा रहे थे कि हिमालय को बचाना हैतो लोग सोचते थे कि ये कौन पागल आ गए हैं, हिमालय को बचाने। आज दुनिया कह रही है कि हिमालय को बचाना है।

    क्लाइमेट चेंज को लेकर बड़ी-बड़ी संस्थाएँ काम कर रही हैं। सब की चिन्ता में हिमालय आ रहा है। उस वक्त हम पागलों की जमात कहे जाते थे। यह इस बात का प्रतीक है कि जब हम किसी परिवर्तन या नए सोच की बात करते हैं तो कम लोग ही हमारे साथ होते हैं, पर जब उसकी मार्केट वैल्यू बढ़ जाती है तो सारी दुनिया आती है। हमारा वह प्रयास सफल हो रहा है।

     

     

     

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    जलवायु परिवर्तन का शिकार बनता कोलकाताeditorialSun, 08/05/2018 - 17:21

    Source
    अमर उजाला, 5 अगस्त, 2018

    ईस्ट कोलकाता वेटलैंडकोलकाता अब पहले से ज्यादा भीषण तूफानों और बाढ़ का सामना कर रहा है। 20वीं सदी के प्रथमार्ध की तुलना में वर्षा यहाँ ज्यादा होने लगी है। एक अध्ययन बताता है कि ग्रीनहाउस गैस का उत्सर्जन अगर इसी तरह जारी रहा, तो 2070 तक समुद्रतटीय बाढ़ से मरने वाले दुनिया के सर्वाधिक लोग कोलकाता में होंगे।
    मैं कोलकाता के भविष्य के बारे में जानना चाहती थी, जहाँ मैं पैदा हुई। इसलिये इस गर्मी में मैं भारत लौटी, ताकि अपनी आँखों से देख सकूँ कि जलवायु परिवर्तन कोलकाता को किस तरह प्रभावित कर रहा है। मेरे जीवन के शुरुआती सात साल इसी महानगर में बीते, जहाँ गंगा समुद्र में मिलती है। मेरी स्मृति का कोलकाता भाप और पसीने का, भात और मछली का, निस्तेज और आर्द्र शाम का शहर था। वह पानी का शहर था, जहाँ पानी इफरात में है।

    लेकिन बढ़ते तापमान के दौर में इस महानगर को मैंने खतरे में पाया। कोलकाता अब पहले से भीषण तूफानों और बाढ़ का सामना कर रहा है। इसके गर्म दिन अब और अधिक गर्म तथा पसीने से तरबतर करने वाले हो गए हैं। मध्य जून में, जब मैं यहाँ थी, तापमान 45 डिग्री सेल्सियस था। जिस गड़ियाहाट बाजार में कभी मैं अपनी माँ को एक के बाद एक साड़ी छांटते देखा करती थी, वहाँ मैंने एक साड़ी विक्रेता को निरन्तर रूमाल से अपने ललाट का पसीना पोछते पाया। सबसे अधिक चिन्ता की बात यह है कि 1.4 करोड़ की आबादी का यह महानगर प्रकृति की चुनौतियों से लड़ने के लिये तैयार ही नहीं है। ‘इस महानगर के लिये खतरा बढ़ता ही जा रहा है, लेकिन उससे निपटने की तैयारी प्रागैतिहासिक जमाने के स्तर की है। साफ है कि हम विनाश का इंतजार कर रहे हैं’,पर्यावरण पर लिखने वाले कोलकाता के एक पत्रकार जयंत बसु कहते हैं।

    कोलकाता के पास प्राकृतिक सुरक्षा कवच हैः उसके पश्चिम में गंगा है, पूर्व में पानी से भरे इलाके हैं-दोनों ही दिशाओं का पानी उस दलदली भू-क्षेत्र में गिरता है, जिसे सुन्दरवन कहते हैं। कोलकाता के तालाबों और झीलों में वर्षाजल के संचय की व्यवस्था है। यहाँ की नरम मिट्टी में, जिससे कोलकाता के शिल्पकार देवी-देवताओं की मूर्तियां बनाते हैं, भूमिगत जल को थामे रखने की क्षमता है।

    लेकिन आज अनेक तालाबों और नहरों को कूड़े से पाट दिया गया है या उन्हें पाटकर उन पर निर्माण कार्य कर लिये गए हैं। जिस निचले इलाके में कभी पानी भरा रहता था, वह अब बहुमंजिली इमारतों से अटा पड़ा उपनगर है, जिसे न्यू कोलकाता कहते हैं। भूमिगत जल के अंधाधुध दोहन से निचले इलाके के धंस जाने का खतरा बढ़ रहा है।

    ‘हम उदारतापूर्वक तमाम प्राकृतिक संपदाओं को नष्ट करते जा रहे हैं’,बसु कहते हैं। और सुन्दरवन की क्या स्थिति है? वहाँ के लोग कोलकाता का रुख कर रहे हैं। बंगाल की खाड़ी में जलस्तर वैश्विक औसत की तुलना में तेज गति से ऊपर उठ रहा है। सुन्दरवन में लोगों के धान के खेतों में खारा पानी भर रहा है, उनके घर गिर रहे हैं। इसलिये वे अपनी गृहस्थी समेटकर कोलकाता जा रहे हैं और महानगर के गरीबों की भीड़ में मिल जा रहे हैं। कोलकाता में वे बाँस और टीन से बनी झुग्गियों में रहते हैं, जहाँ सामने का नाला मानसून में उफनने लगता है और लोगों को गन्दा पानी पार कर अपनी झुग्गियों तक पहुँचना पड़ता है।

    आदिगंगा, जो गंगा की सहायक नदी थी, आज महानगर की भूलभुलैया में खो गई और गाद से भर गई है। मैं आदिगंगा के किनारे की बस्ती में गई। वहाँ ईंट और टीन से बने घर तप रहे थे। इसलिये महिलाएँ संकरी गली में बैठकर अपने बच्चों के बालों में कंघी कर रही थीं या सरकारी नलों में जूठे बर्तन धो रही थीं। मैंने उन महिलाओं से बरसात के बारे में पूछा। वे कहने लगीं, हर बरसात में गलियों में पानी भर जाता है, और उनके घरों में भी घुस जाता है। तब सरकारी नल का पानी भी प्रदूषित हो जाता है। कोलकाता में डेंगू का पहले नाम भी नहीं सुना गया था, लेकिन आज यह यहाँ की आम बीमारी है।

    बाढ़ तो कोलकाता की जैसे पहचान ही है। जाधवपुर विश्वविद्यालय में प्राध्यापक सुमन हाजरा बताते हैं कि सामान्य वर्षा होने पर भी उनके पसंदीदा मूवी थियेटर में पानी भर जाता है। हाजरा याद करते हैं कि एक बार फिल्म के बीच में ही उन्हें अपने पैर ऊपर उठाने पड़े थे, क्योंकि सीट के नीचे बारिश का पानी भर गया था। नालियों की हालाँकि सफाई होती रहती है, लेकिन वर्षा में महानगर के निचले इलाके जलमग्न हो जाते हैं और यातायात बाधित होता है। कोलकाता में बाढ़ का खतरा इसलिये भी बढ़ गया है, क्योंकि अब यहाँ पहले की तुलना में बहुत अधिक वर्षा होती है। हाजरा के एक छात्र अमित घोष ने अपने अध्ययन में पाया है कि 20वीं शताब्दी के प्रथमार्ध की तुलना में 1955 से 2015 के बीच वर्षा बहुत अधिक हुई है।

    यह उस महानगर के लिये विनाशकारी है, जहाँ की एक तिहाई-आबादी झुग्गी बस्तियों में या खुले आकाश के नीचे रहती है। अॉर्गेनाइजेशन फॉर को-अॉपरेशन एंड डेवलपमेंट के मुताबिक, अगर ग्रीनहाउस गैस का उत्सर्जन इसी तरह जारी रहा, तो 2070 तक कोलकाता में समुद्रतटीय बाढ़ से मरने वाले लोग दुनिया में सर्वाधिक होंगे। रविवार की एक सुबह जयंत बसु मुझे 30,000 एकड़ में फैले विशाल जलीय भूमि की ओर ले गए, जहाँ बारिश का पानी जमा होता है। बसु को वहाँ भी बड़े-बड़े भवन बने दिखे, जो पहले नहीं थे। वह कहते हैं, ‘यह नवनिर्मित आबादी वस्तुतः प्राकृतिक प्रकोप में ध्वस्त हो जाने का इंतजार कर रही है।’

     

     

     

     

     

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    जानलेवा है यह प्रदूषण

    editorialMon, 08/06/2018 - 13:47

    वायु प्रदूषणमौजूदा दौर में वायु प्रदूषण एक गम्भीर समस्या बनता जा रहा है। व्यस्त और भागदौड़ भरी जिन्दगी में क्या वायु प्रदूषण का समाधान हो सकता है? आज शहरों में रहने वाले अधिकांश लोग वायु प्रदूषण के शिकार हैं जो मुख्यतः कामकाजी हैं। जानकार बताते हैं कि एक व्यक्ति एक दिन में लगभग 20 हजार बार साँस लेता है जिसमें 35 पौंड वायु का उपयोग होता है। ऐसे में अगर साँसों के माध्यम से दूषित वायु लम्बे समय तक शरीर के अन्दर जाती रहे तो व्यक्ति के स्वास्थ्य को गम्भीर खतरा हो सकता है।

    ज्ञात हो कि 50 वर्ष पहले तक वायु प्रदूषण की इतनी समस्या नहीं थी जितनी आज है। लोग भोग विलासिता की ओर बढ़ रहे हैं। आम और खास लोगों में भी फर्क बहुत बढ़ गया है। जरूरतें असीमित हो गई हैं। यही नहीं हम अपने फायदे के लिये बिना सोचे समझे प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट करने से पहले एक बार भी नहीं सोचते कि इसका हम पर क्या प्रभाव पड़ेगा। इसी वजह से प्रकृति का सन्तुलन पूरी तरह से बिगड़ने लगा है।

    विभिन्न शोध पत्रों में यह बताया जा चुका है कि आज पूरी दुनिया वायु प्रदूषण का शिकार है। वैज्ञानिकों के अनुसार हमारे वायुमंडल में कई गैसें होती हैं जो एक निश्चित अनुपात में होती है और इनमें थोड़ा भी परिवर्तन हो जाये तो वायुमंडल प्रदूषित हो जाता है। जो गैसें वायुमंडल को प्रदूषित करती है उनमें कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, हाइड्रोकार्बन आदि शामिल हैं।

    वर्तमान में इन गैसों की मात्रा बहुतायत में बढ़ रही है। इन्हें सन्तुलित करने के उपाय बहुत ही कम हैं। इसके अलावा वायु प्रदूषण के मुख्य कारणों में से बढ़ती जनसंख्या, औद्योगीकरण, वृक्षों का व्यावसायिक पतन, फैक्टरियों और वाहनों से निकलने वाला धुआँ आदि हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार वायु प्रदूषण के कारण अपने देश में लगभग 30 लाख लोग अस्थमा से पीड़ित हैं।

    हाल ही में हुए एक अध्ययन के मुताबिक भारत के पाँच मुख्य शहर जैसे दिल्ली, ग्वालियर, रायपुर, पटना और लखनऊ दुनिया में सबसे अधिक प्रदूषित शहरों में शामिल हैं। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के अनुसार देश की राजधानी दिल्ली वायु प्रदूषण में चीन के शहर बीजिंग को भी पीछे छोड़ चुकी है। यहाँ के निवासियों को फेफड़े का कैंसर होने की सम्भावना बहुत अधिक रहती है।

    वायु प्रदूषण के प्रभाव

    वायु प्रदूषण के कारण इंसानों पर और हमारे प्रकृति पर बहुत बुरे प्रभाव पड़ रहे हैं। ऐसा बताया जाता है कि ओजोन एक हल्की नीले रंग की गैस है जिसकी परत हमारे वायुमंडल में होती है और यह परत सूरज से निकलने वाली पराबैंगनी किरणों से हमारी और पृथ्वी की रक्षा करती है। अगर ओजोन की यह परत नष्ट हो जाती है तो यूवी किरणों का सीधा प्रभाव धरती पर पड़ेगा जिससे सभी प्राणी नष्ट हो सकते हैं।

    वैज्ञानिक रिपोर्ट के अनुसार वायु प्रदूषण के बढ़ते प्रकोप के कारण ओजोन परत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। जिस कारण फसल चक्र अपने नियत समय से आगे पीछे खिसक रहा है। यही नहीं केदारनाथ जैसे हिमालय के उच्च शिखर पर जहाँ कभी भी बर्फ ही गिरती थी वहाँ अब बरसात होने लग गई है।

    अम्लीय वर्षा प्राकृतिक तौर पर होती है। जब वायुमंडल में मौजूद सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसी गैसें पानी के साथ मिलती हैं। उनमें क्रिया होती है, जिससे नाइट्रिक एसिड आदि का निर्माण होता है। अम्लीय वर्षा से इंसानों और जानवरों की मौत हो सकती है। कुल मिलाकर वायु प्रदूषण का प्रभाव सभी पर पड़ता है चाहे वो जीव-जन्तु, पेंड़-पौधे, मौसम हो या इमारतें। यह वजह है कि निमोनिया, उल्टी, फेफड़े का कैंसर, ब्रोनकाइटिस आदि जैसे संक्रमण रोग तेजी से बढ़ रहे हैं।

    अध्ययन बताते हैं कि वायु प्रदूषण के प्रभाव से मनुष्यों में इस तरह की बीमारी का बढ़ना लाजमी है। पिछले कुछ समय से मौसम में भी जबरदस्त बदलाव नजर आ रहे हैं। इसका असर है कि समुद्र में अचानक तीव्र व जानलेवा लहरों का उठना, बाढ़, भूस्खलन, अतिवृष्टी जैसी घटनाओं का प्रकोप बढ़ता जा रहा है। प्रदूषण के कारण ताजमहल की दीवारें भी पीली पड़ती जा रही हैं।

    गाड़ियों से निकलने वाला धुआँ

    वाहनों से निकलने वाला धुआँ भी वायु प्रदूषण का बहुत बड़ा कारण है। जनसंख्या के साथ-साथ वाहनों की संख्या भी बढ़ रही है। हालांकि, सरकार भी इस प्रदूषण को रोकने के लिये समय-समय पर एहतियाती कदम उठाती हैं। जैसे पिछले वर्ष दिल्ली सरकार ने ऑड-ईवन स्कीम लांच की थी जिसमें एक दिन ईवन और एक दिन ऑड नम्बर की गाड़ियों को सड़कों पर चलने का नियम बनाया था ताकि कम-से-कम धुआँ निकले और वायु प्रदूषण कम हो। इसके अलावा ‘कार या स्कूटर’ को अपने सहकर्मियों या पड़ोसियों के साथ शेयर कर ऑफिस या अन्य जगह जाना भी एक अच्छा विकल्प है।

    हम सबको भी अपने वाहनों की नियमित जाँच करानी चाहिए और इस बात का ध्यान रखना चाहिए की आपके वाहन से हानिकारक धुआँ न निकले। यह भी जरूरी है कि वाहन यात्रा सामूहिक हो। सरकार को भी सार्वजनिक यातायात सुविधा को बेहतर बनाने की जरूरत है।

    धूम्रपान

    धूम्रपान एक ऐसा वायु प्रदूषण है जो आपके साथ-साथ आपके घर के सदस्यों को भी प्रभावित करता है। यह इतना खतरनाक है कि पास वाले को 80 फीसदी का शारीरिक नुकसान होता है। जो चिकित्सकीय जाँच में बार-बार आता है। धूम्रपान करने वाले व्यक्ति के लिये यह मजे की बात हो सकती है किन्तु असल में यह खुद के लिये और आस-पड़ोस के व्यक्तियों के लिये सजा की तरह ही है। इसलिये अगर आप धूम्रपान करते हैं तो इसे छोड़ दें और दूसरे लोगों को भी यह करने की सलाह दें। वायु प्रदूषण से बचने का यह भी एक अच्छा उपाय है।

    स्थानीय स्तर पर रोजगार के साधन

    वायु प्रदूषण का एक बड़ा कारण अधिक जनसंख्या, वाहन और कारखाने हैं। लोग रोजगार की तलाश में गाँवों से निकल कर शहरों की ओर प्रस्थान कर रहे हैं। शहरों में जनसंख्या बढ़ रही है। शहर कंक्रीट के जंगल बन रहे हैं। वाहनों की संख्या भी इसी तेजी से बढ़ रही है। दूसरी ओर गाँव खाली हो रहे हैं। शहरीकरण की इस प्रक्रिया को रोकना चाहिए। गाँवों में ही रोजगार के साधनों को विकसित करना चाहिए ताकि लोग अपने गाँव या कस्बे को छोड़कर शहर न जाएँ।

    वृक्षों की अन्धाधुन्ध कटाई

    जनसंख्या के बढ़ने के साथ-साथ इमारतों के निर्माण और विकासीय योजनाओं के लिये पेड़ों की कटाई के कारण वायु प्रदूषण पर नियंत्रण खत्म हो रहा है। जानकारों के अनुसार पेड़ मनुष्य के सबसे अच्छे मित्र हैं और यह वायु प्रदूषण को रोकने में भी बेहद सहायक हैं इसीलिये वनों के अवैध दोहन पर प्रतिबन्ध लगाना जरूरी है। जितने अधिक पेड़ होंगे उतना ही सुरक्षित हमारा वातावरण होगा और वायु प्रदूषण भी कम होगा।

    जन-जागरूकता

    वायु प्रदूषण से बचने से भी अधिक जरूरी है कि हम लोग जागरूक हो जाएँ और प्राकृतिक संसाधनों पर बन रही विकासीय योजनाओं को प्रकृति के अनुकूल ही सम्पादित करें। बिना वैज्ञानिक सलाह की कोई ऐसी योजना ना बनाएँ जिससे पर्यावरण पर बुरा प्रभाव पड़े। वायु प्रदूषण को प्राइमरी स्तर से ही बच्चों के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए ताकि वे इसके संवर्धन के प्रति सजग हों। इसके अलावा वायु प्रदूषण से होने वाले नुकसान को मीडिया पर प्रचारित व प्रसारित किया जाये। अधिकतर लोग वायु प्रदूषण के लिये स्वयं को नहीं बल्कि दूसरों को और सरकार को उत्तरदायी ठहराते हैं, किन्तु यह सही नहीं है। हम स्वयं छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखकर इसमें सहयोग दे सकते हैं।

    ऐसा माना जा रहा है कि यह सिर्फ शुरुआत है अगर वायु प्रदूषण को समय पर नहीं रोका गया तो आने वाले समय में इसके परिणाम बेहद भयंकर हो सकते हैं। कुल मिलाकर चाहे वायु प्रदूषण हो, भूमि प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, जल प्रदूषण या अन्य कोई प्रदूषण सभी इस सृष्टि के लिये बेहद भयानक हैं। वायु प्रदूषण सबसे खतरनाक है क्योंकि वायु के बिना जीवित रहना असम्भव है।

    वायु प्रदूषण के रोक-थाम के उपाय

    कारखानों को हमेशा रिहायशी इलाकों से दूर बनाना चाहिए ताकि इसके धुएँ का प्रभाव उस इलाके के लोगों पर न पड़े। साथ ही आधुनिक तकनीकों का आवश्यक रूप से प्रयोग करना चाहिए जिससे अधिक जहरीला धुआँ न निकले और हवा में न मिले। आज शहरों में कारखाने और अन्य बड़े उद्योग संकेन्द्रण संयंत्रों का प्रयोग कर रहे हैं ताकि वायु को कम-से-कम नुकसान हो।

     

     

     

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    प्लास्टिकमय होती दुनिया का परिदृश्यeditorialThu, 08/09/2018 - 17:37

    Source
    विज्ञान प्रगति, जून, 2018

    प्लास्टिक कचरा कई समस्याएँ पैदा करता हैप्लास्टिक कचरा कई समस्याएँ पैदा करता है (फोटो साभार - इण्डिया टुडे)आज की दुनिया में हमारे जीवन का कोई पहलू ऐसा नहीं है जो प्लास्टिक से अछूता हो। कॉपी-किताब, पेन-पेन्सिल, स्कूली बस्ते, लंच बॉक्स से लेकर चाय के कप और कृत्रिम गहने तक हर चीज में प्लास्टिक का इस्तेमाल हो रहा है. यहीं नहीं पूरी इलेक्टॉनिक क्रान्ति तो जैसे प्लास्टिक पर ही टिकी हुई है। मोबाइल के हैंडसेट, ईयरफोन, कम्प्यूटर-लैपटॉप, पेन-ड्राइव, टीवी, रिमोट, वॉशिंग मशीन आदि लगभग हर डिवाइस या तो प्लास्टिक की बनी हुई है या उसमें बड़ी मात्रा मे प्लास्टिक का उपयोग किया गया है।

    हमारी दिनचर्या में सुबह से शाम तक प्लास्टिक निर्मित इतनी चीजें शामिल रहती हैं कि अगर किसी रोज उनका प्लास्टिक निकाल दिया जाय तो शायद दुनिया अधूरी लगने लगे। बच्चों के खिलौने हों, दूध या पानी पीने के बोतलें हों, खेल के सामान हों, जूते और यहाँ तक की कपड़ों तक में (विशेष रूप से जींस में) प्लास्टिक प्रयोग में लाई जा रही है।

    प्लास्टिक के ही एक रूप पॉलिथीन का तो विशेष उल्लेख करना होगा क्योंकि इससे बनी मोटी-पतली थैलियों ने पिछले दो-तीन दशकों में सामानों को लाना-ले जाना इतना आसान कर दिया कि किसी को इससे पैदा होने वाले खतरे का अहसास तक नहीं हुआ। बेहद नाजुक, पतली सी पॉलिथीन की थैली में कैसे 5-10 किलो आटा समा जाता है, गर्म चाय और ठंडी लस्सी टिक जाती है और फिर भी उसका बाल-बाँका नहीं होता-यह किसी आश्चर्य से कम नहीं है। पर यही थैलियाँँ कूड़े में फेंके जाने के बाद जब नालियों को जाम करती हैं, गायों से लेकर जंगल के शेरों के पेट में पाई जाती हैं, वर्षों बाद भी सड़ती-गलती नहीं हैं, तो सवाल उठता है कि आखिर कोई इन्हें खत्म क्यों नहीं करता है।

    साफ तौर पर प्लास्टिक के दो पक्ष हैं। एक वह है जिसमें वह हमारे जीवन को सुविधाजनक बनाने की दृष्टि से उपयोगी है। दूसरा वह है, जिसमें वह एक प्रदूषक तत्व और इंसानों व जानवरों में बीमारियाँ फैलाने वाले तत्व के रूप में मौजूद है और उससे छुटकारा पाने या फिर उसका कोई बेहतरीन विकल्प खोजने की जरूरत पैदा होती है। लेकिन यहाँ सवाल उठता है कि प्लास्टिक आखिर दुनिया में क्यों और कब आया।

    दुनिया में जब आया प्लास्टिक

    प्लास्टिक के शुरुआती रूप का जिक्र सदियों पहले मिलता है। दस्तावेज बताते हैं कि 1600 ईसा पूर्व में प्राकृतिक रूप से रबर के पेड़ों से मिलने वाले रबर, माइक्रोसेल्यूलोज, कोलेजन और गैलालाइट आदि के मिश्रण से प्लास्टिक जैसी किसी चीज को तैयार किया गया था, जिसका इस्तेमाल गेंद (बॉल), बैंड और मूर्तियाँ बनाने में किया जाता था। लेकिन आज हम जिस आधुनिक प्लास्टिक के विविध रूपों को देख रहे हैं, उसके आरम्भिक आविष्कार का श्रेय ब्रिटेन के वैज्ञानिक अलेक्जेंडर पार्क्स को जाता है। उन्होंने इसे नाइट्रोसेल्यूलोज कहा, जिसे उनके सम्मान में पार्केसाइन कहा जाने लगा।

    अलेक्जेंडर पार्क्स एक हाथी दाँत का सिथेंटिक विकल्प खोज रहे थे ताकि सजावटी सामान बनाने के लिये हाथी दाँत की जगह उस पदार्थ का इस्तेमाल हो सके और हाथियों की हत्या रोकी जा सके। अलेक्जेंडर पार्क्स इस काम में थोड़ा-बहुत सफल भी रहे। उन्होंने अपनी खोज को 1856 में बर्मिंघम में पेटेंट कराया और फिर भी इससे बनी चीजों को उन्होंने 1862 में लंदन में लगी एक अन्तरराष्ट्रीय प्रदर्शनी में पेश किया। इसके लिये उन्हें एक कांस्य पदक देकर सम्मानित भी किया गया।

    लेकिन प्लास्टिक की यह किस्म इतनी लचीली नहीं थी कि उसे मनचाहा आकार दिया जा सके। बाद में प्लास्टिक को लेकर कई खोजें हुईं। जिनसे इसके परिष्कृत रूप सामने आने लगे। जैसे सन 1897 में जर्मनी के दो रसायनशास्त्रियों विल्हेल्म फ्रिस्क और अडोल्फ स्पिट्लर ने ब्लैक बोर्ड बनाने के स्लेट का विकल्प खोजने की कोशिश शुरू की।

    इसके बाद करीब 40 वर्षों तक प्रयोंगों से कैसीन नामक पदार्थ पर फॉर्मेल्डिहाइड की अभिक्रिया कराते हुए जानवरों के सींग से प्लास्टिक जैसा लचीला पदार्थ हासिल किया गया जो कई चीजें बनाने में काम आने लगा। लेकिन असली क्रान्ति 1900 में हुई थी, जब प्लास्टिक का पूरी तरह से सिथेंटिक (यानी कैमिकल्स से तैयार) स्वरूप सामने आया। यह प्लास्टिक फिनॉल और फॉर्मेल्डिहाइड के उपयोग से बनाया गया था।

    आई बारी सच्चे प्लास्टिक की

    बेल्जियम मूल के अमेरिकी वैज्ञानिक लियो एच. बैकलैंड को इसका श्रेय दिया जा सकता है कि आज हम प्लास्टिक की जिन विभिन्न किस्मों और सभी चीजों में प्लास्टिक के इस्तेमाल को देख रहे हैं, उसकी खोज उन्होंने ही की थी। बेल्जियम में पैदा होने वाले लिये बैकलैंड एक मोची के बेटे थे। उनके पिता अशिक्षित थे और उन्हें अपनी तरह ही जूते बनाने के धंधे में लाना चाहते थे। हैरानी की बात है कि वे समझ नहीं पा रहे थे कि लियो पढ़-लिखकर आखिर क्या करना चाहते हैं।

    बैकलैंड की असली कहानी तब शुरू हुई, जब वह अमेरिका आये और न्यूयॉर्क में हडसन नदी के किनारे पर एक घर खरीदा। इस घर में समय बिताने के लिये उन्होंने एक प्रयोगशाला (लैब) बनाई थी, जहाँ पर 1907 में उन्होंने रसायनों के साथ समय बिताते हुए प्लास्टिक का अविष्कार किया था।

    प्लास्टिक का अविष्कार करने के बाद 11 जुलाई, 1907 को एक जर्नल में लिखे अपने लेख में बैकलैंड ने लिखा, ‘अगर मैं गलत नहीं हूँ तो मेरा ये अविष्कार (बैकेलाइट) एक नए भविष्य की रचना करेगा।’ऐसा हुआ भी उस वक्त प्रसिद्ध मैगजीन- टाइम ने अपने मुख्यपृष्ठ पर लियो बैकलैंड की तस्वीर छापी और उनकी फोटो के साथ उनके नाम की जगह लिखा- ‘ये ना जलेगा और ना पिघलेगा।’

    बैकलैंड असल में इलेक्ट्रिक मोटरों और जेनरेटरों में तारों की कोटिंग के लिये एक ऐसे पदार्थ की खोज कर रहे थे तो प्राकृतिक रूप से कीटों से प्राप्त पदार्थ लाख (गोंद जैसा एक चिपचिपा द्रव जो सूखने पर किसी भी सतह पर चिपककर पपड़ी तैयार कर देता है) का स्थान ले सके। बैकलैंड ने अपनी खोज 1907 में शुरू की और फिनॉल व फॉर्मेल्डिहाइड के मिश्रण से लाख जैसा चिपचिपा द्रव तैयार कर लिया। गर्म करने पर यह द्रव पिघल जाता था और ठंडा होने पर सख्त हो जाता था।

    शुरुआती प्रयोगों के तीन साल 1912 में बैकलैंड ने अपने आविष्कार की घोषणा की और इसका नामकरण बैकेलाइट किया गया। बैकेलाइट का इस्तेमाल बिजली और तमाम ऐसे उपकरणों में होने लगा, जहाँ तापरोधी सतह तैयार करन के लिये किसी कोटिंग की जरूरत होती थी। यह एक सच्चा प्लास्टिक था जो विशुद्ध रूप से सिथेंटिक सामग्री से बना था। यह पहला ऐसा थर्मोसेटिंग प्लास्टिक था, जिसे इसे गर्म करके पिघलाते हुए किसी भी रूप में ढाला जा सकता था।

    बैकेलाइट प्लास्टिक सस्ता, मजबूत और टिकाऊ था और इससे रेडियो, टेलीफोन, घड़ी और बिलियर्ड गेंदों से लेकर हजारों चीजें तैयार की जा सकती थीं। बैकेलाइट कॉर्पोरेशन ने प्लास्टिक के प्रचार के लिये कहा कि इस अविष्कार से इंसान ने जीव, खनिज और वनस्पतियों की सीमा के पार एक नई दुनिया खोज ली है जिसकी अपार सीमाएँ हैं।

    बैकलैंंड के लिये एक अफसोस की बात यह रही कि बैकेलाइट के पेटेंट की अवधि 1930 में खत्म हो गई और तब एक अलग प्रक्रिया का इस्तेमाल कर प्लास्टिक बनाने वाली कम्पनी कैटिलिन कॉर्पोरेशन ने नया पेटेंट हासिल कर लिया। इस कम्पनी ने अपने प्लास्टिक को कैटलिन प्लास्टिक का नाम दिया था।
     

    बेशक डेढ़-दो सौ साल की इस यात्रा में प्लास्टिक ने सबसे ज्यादा तरक्की पिछले 40-50 वर्षों में ही की है जब जीवन से जुड़ी हर जरूरत के सामान में प्लास्टिक ने घुसपैठ कर ली। आज प्लास्टिक को बेशक एक समस्या के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन मानव सभ्यता के विकास में इसके योगदान की अनदेखी नहीं हो सकती।

    वैसे तो प्लास्टिक के मोटे तौर पर दो प्रकार होते हैं। एक है थर्मोप्लास्टिक और दूसरा, थर्मोसेट्स। थर्मोप्लास्टिक को गर्म किया जाय तो वह नर्म हो जाता है और पिघल जाता है, जैसे पॉलिथीन, पॉलीस्टायरीन और पीटीएफई आदि। जबकि गर्म करने पर थर्मोसेट्स नर्म नहीं पड़ते और आसानी से पिघलते भी नहीं हैं। इसकी माइक्रोटा और जीपीओ जैसी किस्में होती हैं। लेकिन अलग-अलग किस्मों की प्लास्टिक को उनकी रासायनिक संरचना के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है।

    इस तरह के वर्गीकरण में एक्रेलिक, पॉलिस्टर, सिलिकॉन, पॉलीयूरेथिन, हैलोगनेटेड, इलास्टोमर, स्ट्रक्चरल, बायोडिग्रेडेबल और विद्युत कुचालक, पॉलीप्रोपाइलिन, पॉली-विनाइल क्लोराइड, पॉलीमाइट (यानी नायलॉन) आदि। इनमें पॉलीस्टाइनिन और (पीएस) और पॉलीविनाइल क्लोराइड (पीवीसी) की खूब चर्चा होती है।

    पॉलीस्टाइनिन एक कठोर, भंगुर, सस्ते किस्म का प्लास्टिक है जिसका इस्तेमाल प्लास्टिक के मॉडल, मूर्तियाँ, ट्रे या किट आदि बनाने में किया जाता है। इसके मुकाबले में पॉलीविनाइल क्लोराइड (पीवीसी) कठोर, मजबूत गर्मी और मौसम प्रतिरोधी प्लास्टिक है। इससे पाइप, जूतों के सोल, कम्प्यूटर-लैपटॉप के पार्ट बनाए जाते हैं। पीवीसी से ही पैकेजिंग की पतली पन्नियाँ भी तैयार होती हैं। प्लास्टिक की एक महत्त्वपूर्ण किस्म है पॉलिथीन या पॉलीएथिलीन (पीई)।

    पॉलिथीन को असल में 1933 में आर.गिब्सन और एरिक फॉवेट नामक रसायनशास्त्रियों ने ब्रिटेन की इंपीरियल कैमिकल इंडस्ट्रीज (आईसीआई) में खोजा था। पीई सस्ता, लचीला, टिकाऊ और रासायनिक रूप से प्रतिरोधी प्लास्टिक है और इसी गुण के कारण थैलियों से लेकर कैमरे की फिल्मों और पैकेजिंग सामग्री बनाने में इसका बहुतायत से इस्तेमाल होता है।

    पॉलिथीन की तरह प्लास्टिक का एक उपयोगी प्रकार टेलॉन यानी पॉली टेट्रा फ्लोरो एथिलीन (पीटीएफई) भी है। इसे 1938 में परमाणु बम के लिये यूरेनियम को परिष्कृत करने की प्रक्रियाओं में संयोगवश खोजा गया था पर कम घर्षण वाली सुरक्षात्मक कोटिंग की इसकी खूबी इसे बर्तनों तक ले आई और फ्राइंग पैन, तवे से लेकर प्रेशर कुकर आदि में इसका इस्तेमाल होने लगा।

    इस समय सबसे ज्यादा चर्चा बायोडिग्रेडेबल (कम्पोस्टेबल) प्लास्टिक की है जो इस्तेमाल में लाये जाने के बाद कचरे में सूर्य के प्रकाश (जैसे-अल्ट्रा वॉयलेट विकिरण), पानी या नमी, बैक्टीरिया, एंजाइमों, वायु के घर्षण और सड़न कीटों की मदद से खत्म होकर मिट्टी में घुल-मिल जाये ताकि प्लास्टिक का पर्यावरण पर कोई विपरीत असर न पड़े। इसकी कुछ किस्में, जैसे कि बायोपॉल, बायोडिग्रेडेबल पॉलीएस्टर इकोलैक्स, इकोजेहआर आदि हैं, लेकिन अभी यह प्लास्टिक काफी महंगा पड़ता है, इसलिये कम्पनियाँ इनके सामान नहीं बनाती हैं।

    बेशक डेढ़-दो सौ साल की इस यात्रा में प्लास्टिक ने सबसे ज्यादा तरक्की पिछले 40-50 वर्षों में ही की है जब जीवन से जुड़ी हर जरूरत के सामान में प्लास्टिक ने घुसपैठ कर ली। आज प्लास्टिक को बेशक एक समस्या के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन मानव सभ्यता के विकास में इसके योगदान की अनदेखी नहीं हो सकती। कहीं-कहीं तो आज भी प्लास्टिक का कोई विकल्प भी नहीं है, जैसे बिजली की तारों के इन्स्युलेशन में यानी उन पर प्लास्टिक की परत चढ़ाने में ताकि विद्युत प्रवाह होने पर उनसे करंट नहीं लगे।

    बिजली से चलने वाले ज्यादातर उपकरणों में प्लास्टिक विद्युत कुचालक होने की खूबी के कारण ही इस्तेमाल में लाया जाता है। वजन में हल्की, किसी भी आकार में आसानी से मोड़ी या डिजाइन करने की सहूलियत के कारण प्लास्टिक को एक बेजोड़ तत्व माना जाता है। वजन सहने की इसकी क्षमता भी लाजवाब है। प्लास्टिक (पॉलिथीन) की थैलियों में दूध और पानी की बोतलों में मनचाहे वजन की पैकिंग की जा सकती है।

    बड़े सामानों की हर किस्म की पैकिंग में प्लास्टिक का उपयोग किया जाता है क्योंकि वह जल्द खराब नहीं होती और मौसम की मार भी सह सकती है। बड़ी कम्पनियों के सामानों की 85 फीसदी पैकिंग में प्लास्टिक के कवर से लेकर रस्सियाँ तक इस्तेमाल में लाई जाती हैं। प्लास्टिक की यह घुसपैठ कितनी ज्यादा है, इसका एक आकलन पुस्तक प्लास्टिकः अ टॉक्सिक लव स्टोरी की लेखिका सुजैन फ्रीनकेल ने किया था।

    इस किताब में उन्होंने अपने एक दिन की दिनचर्या के बारे में लिखा कि वे 24 घंटे में ऐसी कितनी चीजों के सम्पर्क में आईं जो प्लास्टिक की बनी हुईं थीं। इनमें प्लास्टिक के लाइट स्विच-ए-टॉयलेट सीट, टूथब्रश और टूथपेस्ट ट्यूब शामिल थे। ऐसी चीजों की संख्या 196 थी, जबकि गैर-प्लास्टिक चीजों की संख्या 102 थी। यानी अन्य पदार्थों के मुकाबले प्लास्टिक से बनी चीजें हमारी जिन्दगी में ज्यादा हो गई हैं।

    दुनिया में कितनी प्लास्टिक बनती है इसका अन्दाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पूरे तेल उत्पादन का आठ फीसदी हिस्सा प्लास्टिक उत्पादन में खप जाता है। लेकिन जहाँ इस्तेमाल होने तक यह प्लास्टिक सुविधा प्रदान करता है, उपयोग के दौरान होने वाली रासायनिक क्रियाओं और उसके बाद कूड़े-कचरे में बदलने पर यह दुनिया के लिये बड़ी समस्या बन जाता है।

    मुसीबत प्लास्टिक कचरे की

    चूँकि हर चीज में प्लास्टिक की दखल है, इसलिये इसका कचरे में बदलना भी इस धरती और प्रकृति में सीधी दखलंदाजी के हालात पैदा करता है। जैसे, एक आँकड़ा यह है कि दुनिया में हर सेकेंड आठ टन प्लास्टिक का कोई-न-कोई सामान बनता है और इसी तरह हर साल कम-से-कम 60 लाख टन प्लास्टिक कचरा समुद्रों में पहुँच जाता है।

    यह भी उल्लेखनीय है कि प्लास्टिक कचरे का केवल 15 फीसद हिस्सा ही पृथ्वी की सतह यानी जमीन पर बचा रह पाता है, बाकी सारा कचरा समुद्र तल में जाकर जमा हो जाता है। चार दशक पहले वर्ष 1975 में किये गए एक अध्ययन में पाया गया था कि सागरों की ओर जाने वाली नदियों द्वारा लगभग 8 लाख पाउंड प्लास्टिक वार्षिक रूप से फेंक दिया जाता है इसीलिये यह दुनिया में जमीन पर अतिरिक्त रूप में नहीं दिखता है। यह आँकड़ा आज कई गुना बढ़ चुका है और इसमें हमारे देश का योगदान भी कुछ कम नहीं है।

    अगस्त, 2014 में प्रश्नकाल के दौरान संसद में तत्कालीन पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने यह जानकारी दी थी कि देश के 60 बड़े शहर रोजाना 3500 टन से अधिक प्लास्टिक कचरा निकाल रहे हैं। उन्होंने बताया था कि वर्ष 2013-14 के दौरान देश में 1.1 करोड़ टन प्लास्टिक की खपत हुई, जिसके आधार पर यह जानकारी प्रकाश में आई कि दिल्ली, चेन्नई, मुम्बई, कोलकाता और हैदराबाद जैसे बड़े शहर सबसे ज्यादा प्लास्टिक कचरा निकाल रहे हैं।

    उपयोग के दौरान और कचरे के रूप में बच जाने वाला प्लास्टिक इंसानों-जानवरों समेत प्रकृति को भी बड़ा भारी नुकसान पहुँचा रहा है। प्लास्टिक की थैलियों, दूध व पानी की बोतलों, लंच बॉक्स या डिब्बाबन्द खाद्य पदार्थों का सेवन मनुष्य स्वास्थ्य को इसलिये नुकसान पहुँचाता है क्योंकि गर्मी व धूप आदि कारणों से रासायनिक क्रियाएँ प्लास्टिक के विषैले प्रभाव उत्पन्न करती हैं जो कैंसर आदि तमाम बीमारियाँ पैदा कर सकते हैं।

    सच्चाई तो यह है कि प्लास्टिक अपने उत्पादन से लेकर इस्तेमाल तक सभी अवस्थाओं में पर्यावरण और समूचे पारिस्थितिक तंत्र के लिये खतरनाक है। चूँकि इसका निर्माण पेट्रोलियम पदार्थों से प्राप्त तत्वों-रसायनों से होता है, इसलिये यह उत्पादन अवस्था, प्रयोग के दौरान और कचरे के रूप में फेंके जाने पर कई तरह की रासायनिक क्रियाएँ करके विषैले असर पैदा करता है।

    जिन डिस्पोजेबल बर्तनों, कप-प्लेटों में खाने व चाय-कोल्ड ड्रिंक आदि पेय पदार्थ मिलते हैं, कुछ समय तक उनमें रखे रहने के कारण रासायनिक क्रियाएँ होने से वह खान-पान विषैला हो जाता है। कई वैज्ञानिक शोधों में यह दावा तक किया गया है कि प्लास्टिक से बनी पानी की बोतलें यदि कुछ समय तक सूर्य के प्रकाश में रहती हैं, तो उनमें मौजूद पानी का सेवन कैंसर जैसे रोग तक पैदा कर सकता है।

    प्लास्टिक में अस्थिर प्रकृति का जैविक कार्बनिक एस्टर (अम्ल और अल्कोहल से बना घोल) होता है, जो कैंसर पैदा कर सकता है। सामान्य रूप से प्लास्टिक को रंग प्रदान करने के लिये उसमें कैडमियम और जस्ता जैसी विषैली धातुओं के अंश मिलाए जाते हैं। जब ऐसे रंगीन प्लास्टिक से बनी थैलियों, डिब्बों या अन्य पैकिंग में खाने-पीने के सामान रखे जाते हैं, तो ये जहरीले तत्व धीरे-धीरे उनमें प्रवेश कर जाते हैं। उल्लेखनीय है कि कैडमियम की अल्प मात्रा शरीर में जाने से उल्टियाँ हो सकती हैं, हृदय का आकार बढ़ सकता है। इसी प्रकार यदि जस्ता नियमित रूप से शरीर में पहुँचता रहे, तो इंसानी मस्तिष्क के ऊतकों का क्षरण होने लगता है जिससे अल्जाइमर जैसी बीमारियाँ होती हैं।

    प्लास्टिक से होने वाले खतरों से जुड़ी एक चेतावनी ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने भी जारी की है। उन्होंने प्लास्टिक से बने लंच बॉक्स, पानी की बोतल और भोजन को गर्म व ताजा रखने के लिये इस्तेमाल में लाई जाने वाली पतली प्लास्टिक फॉइल (क्लिंज फिल्म) के बारे में सचेत किया है कि इनमें 175 से ज्यादा दूषित घटक होते हैं, जो बीमार करने के लिये जिम्मेदार हैं।

    वैज्ञानिकों का मत है कि यदि भोजन गर्म हो या उसे गर्म किया जाना हो, तो ऐसे खाने को प्लास्टिक में बन्द करने से या प्लास्टिक के टिफिन में रखने से दूषित कैमिकल खाने में चले जाते हैं। इससे कैंसर और भ्रूण के विकास में बाधा समेत कई बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। इन खतरों के मद्देनजर ही ब्रिटेन में कैंसर संस्थान खाने को पैक करने और गर्म रखने के लिये प्लास्टिक उत्पादों का उपयोग बन्द करने की सलाह देने लगे हैं। खतरा तो दूध की प्लास्टिक बोतलों को लेकर भी है।

    असल में प्लास्टिक की बोतल में रासायनिक द्रव्यों की कोटिंग होती है। बोतल में गर्म दूध डालने पर रसायन दूध में मिलकर बच्चे के शरीर में पहुँचकर नुकसान पहुँचाता है। दूध की बोतल के अलावा शराब, कोल्ड ड्रिंक्स, और पैक्ड फूड को नमी से बचाने के लिये कई कम्पनियाँ प्लास्टिक में इसी की खतरनाक रासायनिक कोटिंग करती हैं।

    और दवा की पैकिंग

    सितम्बर, 2015 में केन्द्र सरकार ने एक नोटिफिकेशन जारी करके दवाओं को प्लास्टिक से बनी शीशियों व बोतलों में पैक करने पर रोक लगाने का इरादा जाहिर किया था। कहा गया था कि दवाओं की प्लास्टिक शीशियों व बोतलें मानव स्वास्थ्य व पर्यावरण, दोनों के लिये हानिकारक हैं। हालांकि दवा उद्योग उसके लिये राजी नहीं है क्योंकि इससे उसे कारोबार पर असर पड़ सकता है।
     

    कहीं-कहीं तो आज भी प्लास्टिक का कोई विकल्प भी नहीं है, जैसे बिजली की तारों के इन्स्युलेशन में यानी उन पर प्लास्टिक की परत चढ़ाने में, ताकि विद्युत प्रवाह होने पर उनसे करंट नहीं लगे। बिजली से चलने वाले ज्यादातर उपकरणों मे प्लास्टिक विद्युत कुचालक होने की खूबी के कारण ही इस्तेमाल में लाया जाता है। वजन में हल्की, किसी भी आकार में आसानी से मोड़ी या डिजाइन करने की सहूलियत के कारण प्लास्टिक को एक बेजोड़ तत्व माना जाता है। वजन सहने की इसकी क्षमता भी लाजवाब है।

    असल में, पिछले करीब एक-डेढ़ दशक में कई तरह के सीरप, टॉनिक और दवाएँ प्लास्टिक पैकिंग में बेची जाने लगी हैं। इसकी वजह यह है कि ये शीशियाँ व बोतलें सस्ती पड़ती हैं और उनके टूटने का खतरा भी नहीं होता है। पर सवाल यह है कि इनसे खतरा क्या है? वैज्ञानिकों का दावा है कि प्लास्टिक बोतलों में पाये जाने वाले एक खास तत्व-थैलेट्स मनुष्य की सेहत पर प्रतिकूल असर डालते हैं। इनकी वजह से हॉर्मोनों का रिसाव करने वाली ग्रन्थियों का क्रियाकलाप बिगड़ जाता है।

    ऐसा एक शोध अमेरिका में ब्रीघम यंग विश्वविद्यालय में किया गया है। वहाँ के वैज्ञानिकों ने करीब ढाई हजार महिलाओं पर किये गए अध्ययन में पाया कि प्लास्टिक बोतलों की दवाओं के सेवन से महिलाओं में थैलेट्स की मात्रा ज्यादा हो गई जो उनके शरीर में हॉर्मोनों के रिसाव में गड़बड़ी पैदा करने लगा। इन महिलाओं में मधुमेह के लक्षण पाये गए। कुछ अध्ययन में थैलेट्स को कैंसर पैदा करने में भी सहायक पाया गया है।

    बोतलबन्द पानी में भी प्लास्टिक

    जिस बोतलबन्द पानी को आमतौर साफ-सुथरा और पीने योग्य माना जाता है, उसमें भी प्लास्टिक के कण पाये गए हैं। अमेरिका के न्यूयॉर्क की स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने भारत के अलावा चीन, अमरीका, ब्राजील, इंडोनेशिया, केन्या, लेबनान, मैक्सिकों और थाइलैंड में बेची जा रही 11 ब्रांडों की 250 बोतलों का परिक्षण किया।

    मार्च 2018 में इस अध्ययन की रिपोर्ट के अनुसार बोतलबन्द पानी के 90 प्रतिशत नमूनों में प्लास्टिक के अवशेष पाये गए। सबसे ज्यादा प्लास्टिक के कण अमेरिका और थाईलैंड में बेचे जा रहे एक चर्चित ब्रांड के पानी में मिले। सभी ब्रांडों के एक लीटर पानी में औसतन 325 प्लास्टिक के कण मिले।

    शोधकर्ताओं ने दावा किया कि बोतलबन्द पानी में यह प्रदूषण पैकेंजिंग के दौरान बोतलों के ढक्कन से आता है। प्लास्टिक के जो अवशेष पाये गए हैं, उनमें पॉली प्रोपाइलीन, नायलॉन और पॉलीएथिलीन टेरेप्थेलेट शामिल हैं। इन सभी का इस्तेमाल बोतल के ढक्कन बनाने में होता है। ये बोतलें कितना ज्यादा कचरा पैदा कर रहीं हैं, यह अन्दाजा इससे लगता है कि वर्ष 2016 में पूरी दुनिया में 480 अरब बौतलें खरीदी गईं। आकलन यह है कि दुनिया में हर मिनट 10 लाख प्लास्टिक बोतलें खरीदी जाती हैं, जिनमें से 50 प्रतिशत कचरा बन जाती हैं।

    जानवरों के पेट में पॉलिथीन

    कुछ साल पहले अहमदाबाद के जीवदया चैरिटेबल ट्रस्ट में इलाज के लिये लाई गई एक बीमार गाय के पेट से 100 किलोग्राम कचरा निकला, जिसमें ज्यादातर हिस्सा प्लास्टिक या पॉलिथीन की थैलियों का था। गुजरात के गिर के जंगल में एक शेर के पेट से भी पॉलिथीन की ऐसी ही थैलियाँँ बरामद हुई थीं। गायों के साथ तो ऐसे हादसों की खबर अक्सर ही पढ़ने-सुनने को मिलती हैं। पॉलिथीन और प्लास्टिक की थैलियों से जल-जंगल और जीवन पर असर पड़ रहा है, पर मजबूरी यह है कि किसी को इसका ठोस विकल्प नहीं सूझ रहा है। सरकारें इन पर रोक लगाती हैं, लेकिन वह रोक कारगर नही हो पाती क्योंकि लोगों को इससे ज्यादा सुविधाजनक विकल्प नहीं सूझता है।

    अस्सी के दशक में जब पॉलिथीन की थैलियाँँ कागज और जूट के थैलों का विकल्प बनना शुरू हुई थीं, तो लोग इन्हें देखकर हैरान थे। बेहद पतली, वाटरप्रूफ लेकिन कागज आदि से बने लिफाफों-थैलों के मुकाबले सैकड़ों गुना मजबूत पॉलीथिन की थैलियों ने हर किसी को अपना मुरीद बनाया है। ढाबों से दफ्तरों में गर्म चाय ले जाने से लेकर पाँच-सात किलो वजन तक के सामान आसानी से ये थैलियाँ ढो रही हैं।

    कागज और कपड़ों के थैलों के मुकाबले कम जगह घेरने वाली और अत्यन्त हल्की पॉलीथिन-प्लास्टिक थैलियों को बड़े-बड़े डिपार्टमेंटल स्टोरों में हर किस्म की पैकिंग में इस्तेमाल में लाया जाता रहा है। सामान ढोने, खराब होने से बचाने, भीगने से बचाने आदि कई मामलों में इस विकल्प का कोई जोड़ नहीं है। लेकिन फल-सब्जी से लेकर हमारी हर खरीददारी का हिस्सा रही इन थैलियों के नुकसान भी बहुत हैं। ये आसानी से नष्ट नहीं होतीं, इसलिये हर जगह कचरे के रूप में दिखती हैं।

    प्लास्टिक-पॉलिथीन की थैलियों का सबसे खराब पहलू यह है कि जितनी देर इन्हें इस्तेमाल में लाया जाता है, उसके मुकाबले सैकड़ों गुना ज्यादा वक्त इनके नष्ट होने में लगता है। हो सकता है कि इन्हें सब्जी वाले से घर तक आने में महज एक-डेढ़ घंटे का वक्त लगा हो या कपड़ों की पैकिंग में आई ये थैलियाँँ कुछ महीने या साल भर तक सहेजी गई हों, लेकिन जब एक बार ये कचरे के ढेर में पहुँचती हैं तो वहाँ इन्हें नष्ट होने में कुछ सौ से लेकर हजार साल तक लग जाते हैं।

    इस बीच ये नालियों में फँसकर जलभराव की समस्या पैदा करती हैं, तो कचरे के ढेर में मुँह मारती गायों के पेट में जमा हो जाती हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि हर साल कम-से-कम 60 लाख टन प्लास्टिक कचरा समुद्रों में पहुँच जाता है। यानी कचरे का केवल 15 फीसद हिस्सा पृथ्वी की सतह यानी जमीन पर रह पाता है, बाकी सारा कचरा समुद्र तल में जाकर जमा हो जाता है। चालीस साल पहले वर्ष 1975 में किये गए एक अध्ययन मेें पाया गया कि सागरों की ओर जाने वाली नदियों द्वारा लगभग 8 लाख पाउंड प्लास्टिक-पॉलिथीन वार्षिक रूप से फेंक दी जाती है इसीलिए यह दुनिया में जमीन पर अतिरिक्त रूप में नहीं दिखती है।

    जो खा जाए पचा जाए प्लास्टिक

    प्लास्टिक कोई समस्या न बने, अगर उसे आसानी से रिसाइकिल किया जा सके। प्लास्टिक की कुछ किस्में रिसाइकिल की जा सकती हैं। प्लास्टिक के डिब्बों आदि में उनकी सतह पर बने त्रिकोण में 1 से 7 के बीच में कुछ नम्बर अंकित किये जाते हैं। इन्हें रेसिन पहचान कोड कहा जाता है जो रिसाइक्लिंग में मदद करते हैं। ये कोड ट्रेड एसोशिएसन्स ने बनाए हैं। लेकिन सवाल है कि रिसाइक्लिंंग कैसे हो। पूरी दुनिया के वैज्ञानिक इसके अलग-अलग तरीके खोज रहे हैं। जैसे, कुछ वैज्ञानिकों ने प्लास्टिक कचरे को थ्री-डी प्रिंटर के फिलामेंट में बदलने की तकनीक खोजी है। साथ ही, कुछ वैज्ञानिक प्लास्टिक कचरे को कृषि कचरे (एग्रीकल्चर वेस्ट) और नैनो पार्टिकल के साथ जोड़कर नया मैटिरियल बनाने के प्रयोग कर रहे हैं।

    वर्ष 2017 में कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने गैलेरिया मेलोनेला नामक कैटरपिलर (कीड़े) का पता लगाया जो आमतौर पर मधुमक्खी का छत्ता खा लेता है, पर उसे प्लास्टिक के खिलाफ भी कारगर पाया गया। एक प्रयोग में पता चला कि यह कैटरपिलर प्लास्टिक की कैमिकल संरचना को उसी तरह से तोड़ देता है, जैसे मधुमक्खी के छत्ते को वह पचा लेता है। प्लास्टिक कचरे का एक समाधान वर्ष 2018 में ब्रिटेन की पोर्ट्समाउथ यूनीवर्सिटी और अमेरिका के अक्षय ऊर्जा मंत्रालय से जुड़ी एक प्रयोगशाला ने सुझाया है।

    ये दोनों संस्थान साथ मिलकर जापान में मिले एक ऐसे बैक्टीरिया पर शोध कर रहे हैं, जो प्लास्टिक खाता है। उनकी कोशिश इस बैक्टीरिया की कोई ऐसी किस्म विकसित करने की थी, जो ज्यादा बड़ी मात्रा में प्लास्टिक हजम कर सके। इसमें उन्हें सफलता नहीं मिली, लेकिन इस प्रयोग के दौरान संयोगवश एक ऐसा एंजाइम बन गया, जो प्लास्टिक को गलाकर उसे मिट्टी में मिला सकता है।

    जापानी बैक्टीरिया पर रिसर्च करते हुये वैज्ञानिकों ने उस पर सूरज की रोशनी से दस अरब गुना चमकीली एक्स-रे डाली तो यह चमत्कार घटित हो गया। पता चला यह एंजाइम जापान बैक्टीरिया की तुलना में बीस फीसद ज्यादा तेजी से प्लास्टिक को खत्म करता है। इसका नाम ‘पेटेज’ रखा गया है क्योंकि यह सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक पॉलीएथिलीन टेरेप्थैलेट (पीईटी) को खत्म करता है।

    जापान के एक रिसाइक्लिंग प्लांट में पेटेज एंजाइम पीईटी की रासायनिक बनावट को तोड़ने में कारगर पाया गया। यही नहीं, वैज्ञानिकों ने जब इस एंजाइम में कुछ अमीनो एसिड मिला दिया तो यह दोगुनी तेजी से प्लास्टिक खाने लगा। इससे प्लास्टिक कचरे के खात्मे की एक कई राह मिलता दिखाई दे रही है।

    डॉ. संजय वर्मा वरिष्ठ सहायक सम्पादक, नवभारत टाइम्स 9-10 बहादुरशाह जफर मार्ग, एक्सप्रेस बिल्डिंग प्रथम तल, नई दिल्ली 110002

    (मो.9958724629)

     

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    पलायन आयोग-अठारह वर्ष में चले अढ़ाई कोसeditorialFri, 08/10/2018 - 13:22

    Source
    युगवाणी, जून, 2018

    उत्तराखण्ड में पलायन निरन्तर जारी हैउत्तराखण्ड में पलायन निरन्तर जारी है (फोटो साभार - डाउन टू अर्थ)5 मई 2018 को राज्य पलायन आयोग एवं ग्राम विकास विभाग द्वारा राज्य में हो रहे पलायन पर अपनी रिपोर्ट सार्वजनिक की गई। रिपोर्ट प्रस्तुत कर बेशक सरकार अपनी पीठ थपथपा रही हो, परन्तु वास्तविक चुनौती राज्य से हो रहे पलायन को रोकना है। जो आँकड़े आयोग द्वारा दिये गए हैं, उनमें नया कुछ भी नहीं है। फिर भी रिपोर्ट में पूरे राज्य में समान रूप से हो रहे पलायन की बात चौंकाती जरूर है और यह पूर्व सरकारों के नक्कारेपन को भी दर्शाती है।

    रिपोर्ट कहती है कि 2011 के बाद राज्य के 734 गाँव उजाड़ हो चुके हैं। इनमें सर्वाधिक 186 गाँव पौड़ी जनपद से हैं। राज्य के कुल 7950 ग्राम पंचायतों में से 6338 को पलायन से प्रभावित माना गया है। राज्य भर में आजीविका के लिये पलायन करने वालों की दर 50 प्रतिशत है। शिक्षा और स्वास्थ्य को भी इसमें जोड़ दिया जाय तो यह दर 75 फीसदी हो जाती है।

    पौड़ी जनपद में तो यह दर 80 फीसदी है। इसका सीधा मतलब है कि पलायन करने वाले चार लोगों में से तीन का कारण रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य है। हालांकि 25 प्रतिशत लोगों के पलायन का कारण सड़क, बिजली, पानी, संचार, बैंकिंग, यातायात जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव और जंगली जानवरों द्वारा खेतों को नुकसान और भूमि की उर्वरा शक्ति में कमी को माना गया है।

    विगत दस वर्षों में एक लाख अठारह हजार नौ सौ इक्यासी लोग अपना आशियाना छोड़ चुके हैं, राज्य से अन्यत्र पलायन करने वालों की दर कुल पलायन का 29 प्रतिशत है और इसी तरह के पलायन को रोकना सरकार का लक्ष्य भी होना चाहिए। हालांकि पलायन से पूर्व यह जानना सम्भव नहीं है फिर भी इसके लिये समग्रता से कार्य करने की आवश्यकता है।

    सरकार निश्चित रूप से अपना काम करेगी, लेकन एक सुधी सजग और राज्य हितैषी नागरिक के रूप में हम भी अपने सुझाव सरकार को दे सकते हैं, अब यह सरकार पर है कि वह इन सुझावों पर कितना अमल करती है।

    1. अक्सर यह देखने को मिलता है कि जो लोग राज्य से बाहर पलायन कर चुके होते हैं उन्हें राज्य में उनकी थोड़ी सी सफलता पर भी हीरो की तरह पेश किया जाता है भले ही उनकी दूसरी-तीसरी पीढ़ी वहाँ रह रही हो। इसके बजाय हमें राज्य में कार्य कर रहे उन युवाओं को बढ़ावा देना होगा, जो रिवर्स माइग्रेशन का उदाहरण हैं और अपने क्षेत्र में स्वरोजगार अपनाकर सहकारिता के साथ कार्य कर रहे हैं। सरकार को चाहिए कि अपने विज्ञापनों के जरिए ऐसे लोगों को नायक के रूप में प्रचारित-प्रसारित करें।

    2. पलायन को रोकने के लिये राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में मनरेगा जैसा सौ दिनों का रोजगार गारण्टी कार्यक्रम शुरू किया जाय, मनरेगा की खामियों से बचते हुए इसे जल संरक्षण और कृषि से भी जोड़ा जाय।

    3. राज्य बनने के बाद पहाड़ की आर्थिकी का सबसे ज्यादा नुकसान कुकुरमुत्तों की तरह उग आये बी.एड. और बी.टेक संस्थानों ने किया है जिन्होंने लाखों रुपए देकर मान्यता अर्जित की और जनता की जेबें ढीली कर करोड़ों रुपए कमाए, परन्तु यहाँ के युवाओं को आजीविका के लिये अन्यत्र भटकने के लिये मजबूर कर दिया। इस तरह के संस्थानों को निरुत्साहित कर उद्यमिता आधारित कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया जाय।

    4. राज्य के केन्द्रस्थल गैरसैंण को राजधानी घोषित किया जाय। इससे राजधानी क्षेत्र देहरादून में बसने की प्रवृत्ति में तो कमी आएगी ही साथ में गैरसैंण के 150 किलोमीटर की परिधि में पलायन की दर न्यून हो जाएगी।

    5. किसी भी उद्योग को संचालित करने में बिजली की आश्यकता होती है। सरकार को चाहिए कि राज्य के प्रत्येक तोक तक बिजली पहुँचाकर 24 घंटे बिजली की उपलब्धता सुनिश्चित करें।

    6. राज्य के प्रत्येक क्षेत्र में पेयजल उपलब्ध कराना। इतिहास गवाह है कि सभ्यताओं का विकास और विनाश दोनों जल के कारण हुआ है। पौड़ी जनपद में पलायन का एक बडा कारण पानी की अनुपलब्धता भी रही है, जिसने दशकों पूर्व यहाँ की कृषि को नष्ट कर दिया था। जिन क्षेत्रों में पानी नहीं होता, वहाँ के लोगों का बहुत अधिक समय इसके इन्तजामात में व्यय होता है।

    7. आज राज्य में स्वास्थ्य सेवाएँ बुरी तरह चरमरा गई है। राज्य के मेडिकल कॉलेजों से निकले डॉक्टरों को सरकार दुर्गम क्षेत्र में सेवा नहीं करा पा रही है। मेेडिकल कॉलेजों में सीटें बढ़ाकर इन क्षेत्रों में उनका ठहराव सुनिश्चित करना होगा। सभी जिलों में कम-से-कम एक मेडिकल कॉलेज खोला जाना चाहिए और विकासखण्ड स्तर पर एक सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र खोलकर प्राथमिक सामुदायिक और जिला चिकित्सालयों को आपस में जोड़ा जाना चाहिए।

    8. राज्य में शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिये न्याय पंचायत स्तर पर एक से बारहवीं तक के मॉडल आवासीय विद्यालय खोले जाने चाहिए, जहाँ प्रतियोगितात्मक परीक्षा के आधार पर शिक्षकों को भेजा जाय। आठवीं के बाद विद्यार्थियों के कौशल विकास पर बल दिया जाय और नियुक्तियों और पठन-पाठन में सरकारी हस्तक्षेप को न्यूनतम कर दिया जाय।

    9. बिजली, सड़क, पानी, संचार, स्वास्थ्य, शिक्षा और बैंकिंग जैसी मूलभूत आवश्यकताओं पर ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है और राज्य भर में इनकी उपलब्धता और अनुपलब्धता पर एक व्यापक सर्वे सरकारी और गैर-सरकारी स्तर पर किया जाय और उसके बाद इन क्षेत्रों में विकास को फोकस किया जाय।

    10. जब 2005 में नारायण दत्त तिवारी सरकार में वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली स्वरोजगार योजना प्रारम्भ की गई तो इस योजना के व्यापक प्रचार-प्रसार के बावजूद इसमें मुख्यतः होटल एवं वाहन खरीदने के लिये ऋण दिये गए और उसमें बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार हुआ। सरकार को चाहिए कि अगर वह किसी प्रकार की स्वरोजगार योजना लाती है तो पूर्व योजनाओं की खामियों और खूबियों का अवश्य अध्ययन करे और ऋण देने वाले क्षेत्रों का भी चिन्हीकरण करें।

    पलायन को खत्म नहीं किया जा सकता, लेकिन काफी हद तक कम किया जा सकता है क्योंकि स्वैच्छिक रूप से पलायन करने वालों की भी एक बड़ी तादाद है। समाज विज्ञानियों के आँकड़ों को यदि आधार माना जाय तो 2050 तक देश की आबादी स्थिर हो जाएगी और तब देश की आबादी एक सौ साठ करोड़ होगी। इनमें 80 करोड़ की आबादी शहरों में निवास करेगी जो कि वर्तमान मेें 36 करोड़ है तब भारत की ग्रामीण जनसंख्या 80 करोड़ होगी जो आज 84 करोड़ है। राज्य के सन्दर्भ में भी यह आँकड़ा इसी तरह का होगा। सरकार को यह भी चाहिए कि ग्रामीण क्षेत्रों के आस-पास हो रहे कस्बों का संरचनात्मक विकास करें ताकि राज्य से बाहर की ओर हो रहे पलायन को रोका जा सके।

     

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    कार्बन के अॉक्साइड विविध अनुप्रयोगeditorialSat, 08/11/2018 - 17:19

    Source
    विज्ञान प्रगति, जून, 2018

    कार्बन डाइऑक्साइडकार्बन डाइऑक्साइड (फोटो साभार - किस पीएनजी)कार्बन के दो अकार्बनिक, अॉक्साइड कार्बन डाइअॉक्साइड और कार्बन मोनोऑक्साइड हैं, जो गैसीय अवस्था में पाये जाते हैं। इनमें से कार्बन डाइअॉक्साइड के बारे में ही ज्यादा चर्चा होने के कारण इसी गैस से जनसाधारण का अधिक परिचय है। कार्बन मोनोऑक्साइड को एक विषैली गैस के रूप में ही जाना जाता है। यह गैस जब हमारे शरीर में पहुँचती है तो रक्त के हीमोग्लोबिन से रासायनिक संयोग कर कार्बोक्सिहीमोग्लोबिन नामक संकुल (कॉम्पलैक्स) बनाती है यह संकुल लाल रक्त कणिकाओं की अॉक्सीजन वहन करने की क्षमता को बाधित करता है। कार्बन मोनोऑक्साइड का प्रभाव अगर बहुत देर तक बना रहा तो इससे व्यक्ति की मृत्यु तक हो सकती है। लेकिन, इस खतरनाक रूप के अलावा कार्बन मोनोऑक्साइड के कुछ विशिष्ट अनुप्रयोग भी हैं।

    कार्बन मोनोऑक्साइड के अनुप्रयोग

    प्रोड्यूसर एवं वॉटर गैस के रूप में कार्बन मोनोऑक्साइड गैस एक औद्योगिक ईंधन का काम करती हैं। प्रोड्यूसर गैस में 25 प्रतिशत कार्बन मोनोऑक्साइड होती है। इसके अलावा इसमें 4 प्रतिशत कार्बन डाइअॉक्साइड तथा 70 प्रतिशत नाइड्रोजन होती है। प्रोड्यूसर गैस में अल्प अंश में हाइड्रोजन, मिथेन तथा अॉक्सीजन गैसें भी मौजूद होती हैं। वाटर गैस भी एक औद्योगिक ईंधन का काम करती है। इसमें 40 प्रतिशत कार्बन मोनोऑक्साइड, 50 प्रतिशत हाइड्रोजन 5 प्रतिशत कार्बन डाइअॉक्साइड तथा 5 प्रतिशत नाइट्रोजन एवं मिथेन गैसें मौजूद होती हैं।

    कार्बन मोनोऑक्साइड का उपयोग मेथेनॉल के विनिर्माण तथा फॉस्जीन, जिसका रंजक उद्योग में इस्तेमाल होता है, को बचने के लिये किया जाता है। इसके अलावा कुछ धातुकर्मीय प्रक्रियाओं में एक अपचायक (रिड्यूसिंग एजेंट) के रूप में कार्बन मोनोऑक्साइड के उपयोग हैं मॉन्ड्स प्रक्रम में निकेत के निष्कर्षण एवं शुद्धिकरण में भी इस गैस के उपयोग हैं। इस प्रकार विषैली समझी जाने वाली कार्बन मोनोऑक्साइड गैस के भी ढेरों रासायनिक अनुप्रयोग हैं।

    आइए, अब जनसाधारण के बीच अधिक परिचित गैस कार्बन डाइअॉक्साइड की चर्चा करते हैं।

    कार्बन डाइअॉक्साइड गुणधर्म एवं उपयोग

    कार्बन डाइअॉक्साइड एक रंगहीन गैस है जो वायु से करीब डेढ़ गुना भारी है। यह जल में घुलनशील होती है। 15 डिग्री सेल्सियस तापमान पर एक आयतन जल में करीब एक आयतन कार्बन डाइअॉक्साइड घुल सकती है। ठंडे पेय पदार्थों या सोडा की बोतलों में उच्च दाब पर कार्बन डाइअॉक्साइड गैस ही भरी होती है। इसमें थोड़ी मात्रा में पोटेशियम बाइकार्बोनेट भी मिलाया जाता है।

    कार्बन डाइअॉक्साइड एक महत्त्वपूर्ण जैव अणु है तथा पौधों एवं प्राणधारियों के बीच सन्तुलन को बनाए रखती है। प्राणी कार्बन डाइअॉक्साइड गैस छोड़ते हैं जिसको पौधे ग्रहण करके कार्बोहाइड्रेट्स में बदलते हैं।

    साँस द्वारा अॉक्सीजन लेकर हम मनुष्य भी कार्बन डाइअॉक्साइड को बाहर छोड़ते हैं। वायुमण्डल में प्राकृतिक तौर पर 0.03 प्रतिशत कार्बन डाइअॉक्साइड मौजूद होती है। लेकिन, साँस द्वारा जिस कार्बन डाइअॉक्साइड को हम छोड़ते हैं वह करीब 4 प्रतिशत होती है। निस्सन्देह, हमारे फेफड़ों को कार्बन डाइऑक्साइड को बाहर फेंकने में काफी मेहनत करनी पड़ती है। लेकिन, 4 प्रतिशत जितनी कार्बन डाइअॉक्साइड को बाहर फेंकने की इनमें पूर्ण क्षमता मौजूद होती है। हालांकि कार्बन मोनोऑक्साइड के बरक्स कार्बन डाइअॉक्साइड विषैली नहीं है, लेकिन शरीर में अधिक परिमाण में इसकी उपस्थिति अॉक्सीहीमोग्लोबिन संकुल यानी अॉक्सीजन और हीमोग्लोबिन के बन्धन को कमजोर कर देती है। फलतः अॉक्सीजन की अनुपलब्धता के कारण व्यक्ति की श्वासवरोध से मृत्यु तक हो सकती है।

    कार्बन डाइअॉक्साइड का एक अन्य महत्त्वपूर्ण गुण धर्म भी है। यह सूर्य से आने वाली अवरक्त (इन्फ्रारैड) विकिरणों का अवशोषण करती है। उल्लेखनीय है कि वायुमण्डल में मौजूद नाइट्रोजन तथा अॉक्सीजन में दोनों ही गैसें अवरक्त विकिरणों को अवशोषित करने की क्षमता नहीं रखती हैं। वायुमण्डल में कार्बन डाइअॉक्साइड की मात्रा ही पृथ्वी द्वारा (सूर्य से प्राप्त) ऊष्मा तथा इसके द्वारा उत्सर्जित होने वाली ऊष्मा का निर्धारण करती है। कार्बन डाइअॉक्साइड का अधिक सान्द्रण पृथ्वी के ऊष्मा बजट के सन्तुलन को बिगाड़ कर पृथ्वी के बढ़ते तापमान यानी ग्लोबल वार्मिंग की परिघटना को जन्म देता है। इस प्रकार अपने बढ़ते सान्द्रण के कारण कार्बन डाइअॉक्साइड एक ग्रीनहाउस गैस के रूप में कार्य कर पृथ्वी के तापमान को बढ़ाने में अपना योगदान देती है। यह कार्बन डाइअॉक्साइड का एक नकारात्मक पक्ष ही है।

    लेकिन कार्बन डाइअॉक्साइड के काफी यौगिक एवं अन्य अनुप्रयोग भी हैं। अग्निशामकों में इसे आग बुझाने के काम में लाया जाता है। ठोस कार्बन डाइअॉक्साइड, जिसे ‘ड्राई आइस’ कहते हैं, की खाद्य पदार्थों एवं दवाओं आदि को संरक्षित रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका है। बादलों के कृत्रिम बीजायन (आर्टिफिशियल सीडिंग अॉफ क्लाउड्स) में भी ड्राई आइस का इस्तेमाल किया जाता है। इसे अलावा श्वेत लेड, सोडियम कार्बोनेट के विनिर्माण तथा यूरिया के विनिर्माण में भी बड़े परिमाण में कार्बन डाइअॉक्साइड का उपयोग किया जाता है। आइए, अब ड्राई आइस के बारे में जरा विस्तार से जानते हैं।

    ड्राई आइस

    ड्राई आइस का तापमान अति निम्न-78.5 डिग्री सेल्सियस होता है। खाद्य पदार्थों के संरक्षण में बर्फ की तुलना में इसे बेहतर माना जाता है। क्योंकि ड्राई आइस ऊर्ध्वपातन के अपने गुणधर्म के कारण सीधे ही कार्बन डाइअॉक्साइड गैस में बदलती है जबकि बर्फ गलकर पानी में बदलता है। आखिर, कार्बन डाइऑक्साइड गैस से ड्राई आइस बनती कैसे है? इसके लिये कार्बन डाइअॉक्साइड गैस पर बहुत उच्च दाब लगाकर इसे संपीडित करना होता है। इससे कार्बन डाइअॉक्साइड का द्रवण होता है। और वह द्रव के रूप में आ जाती है। अग्निशामकों में उच्च दाब पर द्रव कार्बन डाइअॉक्साइड ही भरी होती है। जब यह द्रव कार्बन डाइअॉक्साइड निर्मुक्त होती है तो तेजी से इसका प्रसरण होता है और फिर इसका वाष्पन होता है जिससे थोड़े द्रव कार्बन डाइअॉक्साइड का ताप-78.5 डिग्री सेल्सियस हो जाता है। इस प्रकार सूखी बर्फ (जो ठोस कार्बन डाइअॉक्साइड होती है) या ‘ड्राई आइस’ बनती है।

    ड्राई आइस के इस्तेमाल में सावधानी बरते जाने की आवश्यकता है। हाथों में मोटे दस्ताने पहन कर ही इसे छूना चाहिए, अन्यथा त्वचा को गहरी क्षति पहुँच सकती है। इसे देखने और खाने से भी परहेज करना चाहिए।

    ड्राई आइस के इस्तेमाल में एक और सावधानी भी जरूरी है। जहाँ ड्राई आइस रखी हो उस कमरे में वेंटिलेसन आदि की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए। इसका कारण यह है कि ऊर्ध्वपातन द्वारा यह सीधे कार्बन डाइअॉक्साइड गैस में बदलती है। और वायु से हल्की होने के कारण इस गैस का जमाव बन्द कमरों में हो सकता है। यही बाद बन्द वाहनों या बन्द कारों के लिये भी लागू होती है। इसलिये बन्द वाहनों या कारों में इसे लाना ले जाना नहीं चाहिए।

    श्री आभास मुखर्जी

    43, देशबंधु सोसाइटी, 15, पटपड़गंज दिल्ली 110092

    मो.:9873594248;
    ई-मेलःabhasmukherjee@gmail.com


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    भारत पर मँडरा रहा गुम हुए प्लूटोनियम का खतराeditorialMon, 08/13/2018 - 13:28

    बेस कैम्प जहाँ प्लूटोनिम कैप्सुल्स खो गयाबेस कैम्प जहाँ प्लूटोनिम कैप्सुल्स खो गया (फोटो साभार - मेंस एक्सपी)अभी हाल ही में हॉलीवुड की एक फिल्म आई है। नाम है- मिशन इम्पॉसिबल: फॉलआउट।फिल्म की कहानी प्लूटोनियम की एक बड़ी खेप तक खलनायकों की पहुँच को रोकने के मिशन पर आधारित है। फिल्म में मुख्य किरदार टॉम क्रूज ने निभाया है।

    प्लूटोनियम तक अगर खलनायक पहुँच जाएगा, तो वह उससे (प्लूटोनियम) भारत, चीन और पाकिस्तान पहुँचने वाले पानी को प्रदूषित कर देगा, जिससे करोड़ों लोगों की मौत हो जाएगी।

    फिल्म पूरी तरह काल्पनिक कहानी पर आधारित है और जैसा कि अधिकतर फिल्मों में होता है, इस फिल्म में बुराई पर अच्छाई की जीत होती है।

    ‘मिशन इम्पॉसिबल: फॉलआउट’ की यह काल्पनिक कहानी भारत पर मँडराते असली खतरे की याद दिलाती है और संयोग से फिल्म के तार भारत से भी जुड़ते हैं।

    भारत पर यह खतरा पिछले कई दशकों से मँडरा रहा है, लेकिन सोचने वाली बात यह है कि इस खतरे को टालने पर कभी भी गम्भीरता से विचार किया ही नहीं गया।

    भारत को यह खतरा पाँच दशक पहले नंदा देवी पर्वत शृंखला में गुम हुए उन प्लूटोनियम-238 और 239 भरे 7 कैप्सुल्स से है, जो करोड़ों लोगों को कैंसर का मरीज बना सकता है।

    इसके खतरे का अन्दाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि हिरोशिमा पर गिराए गए ‘फैट मैन’ परमाणु बम बनाने में जितने प्लूटोनियम लगे थे, उससे महज एक किलोग्राम कम प्लूटोनियम नंदा देवी में गुम हुआ है।

    घटना 70 के दशक की है। भारत और चीन के बीच हुए युद्ध में चीन के हाथों भारत की शर्मनाक हार हुई थी और पूर्वी व पश्चिमी मुल्कों के बीच शीत युद्ध परवान पर था। हर देश चाहता था कि वह खुद को परमाणु बमों से लैस कर ले और प्रतिद्वंद्वी देशों को आँखें तरेरे।

    इसी बीच सन 1964 में चीन ने जिनजियांग प्रान्त में पहला परमाणु परीक्षण कर दुनिया को हैरत में डाल दिया था।

    अमरीका समेत तमाम देश चीन के इस परीक्षण से सकते में आ गए थे और उन्हें अन्देशा होने लगा था कि चीन आने वाले वर्षों में खुद को ऐसे ही घातक बमों से लैस कर लेगा, जिससे शक्ति सन्तुलन बिगड़ सकता है।

    ऐसे में अमरिका ने तय किया कि चीन की इस तरह की तमाम गतिविधियों पर वह नजर रखेगा। इसके लिये अमरिकी खुफिया एजेंसी सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (सीआईए) ने भारत के इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) के साथ मिलकर उत्तराखण्ड के चमोली में स्थित भारत की दूसरी सबसे ऊँची चोटी नंदा देवी पर रिमोट सेंसिंग डिवाइस लगाने का फैसला लिया।

    नंदा देवी का चुनाव इसलिये किया गया था कि इसकी चोटी से जिनजियांग से आगे तक की गतिविधियों पर नजर रखी जा सकती थी।

    इस डिवाइस को लगाने के लिये भारी-भरकम उपकरणों को 7816 मीटर (नंदा देवी की ऊँचाई) ऊपर ले जाना था। भारी-भरकम मशीनों में 56 किलोग्राम के एक उपकरण के अलावा 8 से 10 फीट ऊँचा एंटीना, दो ट्रांसीवर और न्यूक्लियर ऑक्जिलरी पॉवर जेनरेटर शामिल थे। इनके अलावा 7 कैप्सुल्स में 5 किलोग्राम प्लूटोनियम भरकर लाया गया। प्लूटोनियम पावर जेनरेटर के लिये बिजली मुहैया कराने का काम करता और प्रतिकूल मौसम में भी जेनरेटर चलता रहता, इसलिये प्लूटोनियम के इस्तेमाल का निर्णय लिया गया था।

    वैसे मुख्य मिशन को अंजाम देने से पहले अलास्का की पर्वत चोटी पर प्रायोगिक तौर पर ऐसे ही यंत्र लगाए गए गए थे। इसमें भी भारतीय व अमरिकी एक्सपर्ट मौजूद थे। अलास्का का प्रयोग सफल होने के बाद नंदा देवी की चोटी पर इस डिवाइस को इंस्टॉल करने का काम शुरू हुआ।

    इन वजनी उपकरणों को सही-सलामत चोटी तक ले जाना दुरूह कार्य था। इसके लिये स्थानीय पर्वतारोहियों, सीआईए तथा आईबी के अफसरों, विशेषज्ञों को मिलाकर 200 लोगों की एक मजबूत टीम तैयार की गई। टीम का नेतृत्व करने का जिम्मा मिला कैप्टन मनमोहन सिंह कोहली को।

    उस वक्त इस मशीन को दुनिया का सबसे बड़ा मिशन बताया गया था। इसकी वजह थी 200 लोगों की टीम। इसमें खर्च भी बहुत हुआ था। कहते हैं कि टीम में शामिल लोगों को सीआईए की तरफ से वे जैकेट मुहैया कराए गए थे, जिनका इस्तेमाल अन्तरिक्ष में जाते वक्त वैज्ञानिक किया करते हैं।

    बहरहाल, 18 अक्टूबर 1965 को सभी जरूरी उपकरण लेकर टीम 7239 मीटर (कैम्प-4) तक पहुँच गई। वहाँ से नंदा देवी चोटी महज 577 मीटर दूर थी।

    टीम के सदस्य चोटी को देख पा रहे थे और मिशन को लगभग पूरा मान चुके थे। लेकिन ऐन वक्त बर्फानी तूफान आ गया और मौसम बेहद खराब हो गया। मौसम इतना खराब था कि अगर वे वहाँ थोड़ी देर भी रुक जाते, तो हिम समाधि ले लेते।

    नतीजतन, कोहली ने मिशन को स्थगित कर देने की घोषणा की और सारे उपकरण वहीं छोड़कर लौट जाने को कहा। पूरी टीम सही-सलामत लौट आई।

    करीब छह महीने तक इन्तजार करने के बाद मई 1966 में अधूरा मिशन पूरा करने के लिये टीम के कुछ सदस्य और एक अमरिकी वैज्ञानिक ने दोबारा वहाँ जाने का फैसला लिया।

    हालांकि, तब तक टीम के सदस्यों और खुद कोहली इस नतीजे पर पहुँच चुके थे कि नंदा देवी की चोटी पर पहुँचना मुश्किल है और खुफिया मशीन लगाने की ही बात है, तो उसे किसी छोटे पर्वत पर भी लगाई जा सकती है।

    आखिर में यह तय किया गया कि नंदा देवी से उपकरण उतारे जाएँगे और उन्हें पास के 6861 मीटर ऊँचे पर्वत नंदा कोट पर स्थापित किया जाएगा।

    उपकरण वापस लाने के लिये टीम नंदा देवी पर्वत के कैम्प-4 पर पहुँचे, तो उनके पैरों के नीचे की जमीन ही खिसक गई। वहाँ न तो एंटीना था, न जेनरेटर और न ही प्लूटोनियम से भरे कैप्सुल। था तो बस बर्फ।

    हैरानी की बात ये थी कि जिस नंदा देवी पर्वत शृंखला में प्लूटोनियम कैप्सुल गुम हुआ, वहीं ऋषि गंगा का उद्गम स्थल है, जो आगे जाकर गंगा में मिल जाती है।

    गंगा भारत की जीवनरेखा है। ऐसे में यह खयाल ही रोंगटे खड़े कर देता है कि अगर प्लूटोनियम गंगा नदी में मिल जाएगा, तो क्या होगा।

    हालांकि, मानने वाले इस खयाल को अव्यावहारिक या काल्पनिक मान सकते हैं। लेकिन, सच यही है कि वे कैप्सुल नंदा देवी में ही कहीं दबे पड़े हैं और किसी भी समय बाहर निकलकर करोड़ों लोगों की जिन्दगी तबाह कर सकते हैं।

    कैप्सुल्स में प्लूटोनियम से बेखबर थे कोहली

    नंदा देवी पर रिमोट सेंसिंग डिवाइस स्थापित करने का पूरा मिशन बेहद सावधानी से और एहतियात बरतते हुए अंजाम दिया गया था।

    नन्दा देवी पर्वत शृंखलानन्दा देवी पर्वत शृंखला (फोटो साभार - लाइवमिंट)कहा तो यह भी जाता है कि टीम के अधिकतर सदस्यों को यह नहीं बताया गया था कि कैप्सुल में जो रसायन है, उससे परमाणु बम बनता है।

    प्लूटोनियम की तासीर गर्म होती है, इसलिये कैप्सुल भी गर्म रहता था। यही वजह थी कि सर्दी के मौसम में इस मिशन को अंजाम देने का निर्णय लिया गया था।

    कैप्सुल उठाने वाले सभी पर्वतारोहियों के ऊपरी कपड़ों पर सफेद दाग लगाए गए थे। ऐसा इसलिये किया गया था क्योंकि प्लूटोनियम का रिसाव होने पर सफेद दाग का रंग बदल जाता और इससे विज्ञानियों को पता चल जाता।

    कोहली ने एक इंटरव्यू में बताया था कि सर्दी बहुत थी, जबकि कैप्सुल गर्म रहते थे, इसलिये स्थानीय पर्वतारोही खुशी-खुशी उन्हें उठाकर चलते थे। यही नहीं, रात में ये कैप्सुल ही उन्हें गर्माहट दिया करते।

    इस पूरे मामले में दिलचस्प पहलू यह है कि खुद कोहली को नहीं पता था कि प्लूटोनियम ऐसा तत्व है जो हवा, पानी को प्रदूषित कर लोगों की जान ले सकता है!

    उन्होंने एक इंटरव्यू में स्पष्ट तौर पर कहा था, ‘हमारे लिये यह एक विफल मिशन रहा। सबसे बुरा तो यह रहा कि किसी ने हमें यह नहीं बताया कि यह कितना खतरनाक है और लोगों की जान ले सकता है। यह भी कि पर्यावरण को भी यह नुकसान पहुँचा सकता है।’

    उन्होंने आगे कहा, ‘अगर मुझे इसका जरा भी इल्म होता, तो खराब मौसम होने के बावजूद मैं उन्हें लेकर लौटने की पूरी कोशिश करता।’

    प्लूटोनियम खोजने की हर कोशिश का नतीजा सिफर

    मई 1966 में टीम नंदा देवी से बैरंग लौट गई, लेकिन उनके दिल-ओ-दिमाग में एक बेचैनी तो थी ही कि अगर उन्हें बरामद नहीं किया गया, तो कुछ भी हो सकता है। लिहाजा 1967 में दोबारा टीम वहाँ पहुँची, लेकिन इस बार भी उन्हें खाली हाथ ही लौटना पड़ा।

    प्लूटोनियम का गुम होना एक बड़ी चूक थी। अगर इसे सार्वजनिक कर दिया जाता, तो देशवासियों के लिये खौफ का बायस बन जाता। इसलिये तय हुआ कि इस राज को किसी भी सूरत में फाश न किया जाये।

    मिशन में शामिल अफसरों ने भी भरसक कोशिश की कि इसे सार्वजनिक नहीं किया जाये, लेकिन ऐसा हो न सका। मिशन के विफल होने के एक दशक तक पूरा मामला दबा रहा लेकिन सन 1977 में यह सार्वजनिक हो गया।

    सन 1977 में ‘आउटसाइड’ नाम की एक पत्रिका ने इसके बारे में विस्तार से एक स्टोरी छाप दी। इस स्टोरी के छपने के बाद देश के सांसदों ने संसद में इस मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाया। नतीजतन तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई को संसद में इस ऑपरेशन के बारे में बताना पड़ा।

    यही नहीं, सांसदों के दबाव में आकर उन्होंने गुम हुए प्लूटोनियम कैप्सुल का पता लगाने की पूरी कोशिश करने का आश्वासन भी दिया।

    इसके लिये उस वक्त के प्रधानमंत्री के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार डॉ. आत्मा राम और परमाणु ऊर्जा आयोग के चेयरमैन होमी सेठना के नेतृत्व में 6 सदस्यीय वैज्ञानिक कमेटी का गठन किया गया।

    मगर इस कमेटी के साथ दिक्कत यह रही कि उन्हें पड़ताल के लिये पूरी तरह से अमरीका की ओर से मुहैया कराए गए दस्तावेज पर ही निर्भर रहना पड़ा। अमरीका की तरफ से 94 पन्नों की एक रिपोर्ट सौंपी गई। इसी के आधार पर जाँच की शुरुआत हुई।

    कमेटी ने केन्द्र सरकार को कई अनुशंसाएँ कीं। इनमें नंदा देवी के करीब हवा, पानी और मिट्टी में विकिरण की सम्भावित मौजूदगी को लेकर नियमित जाँच, प्लूटोनियम कैप्सुल का पता लगाने के लिये नई तकनीक विकसित करना आदि शामिल थी।

    इन अनुशंसाओं के बावजूद प्लूटोनियम कैप्सुल का पता नहीं लगाया जा सका।

    सीआईए का अलर्ट : ‘कोलकाता तक होगा असर’

    जब प्लूटोनियम कैप्सुल गुम हुए थे, तो उस वक्त कई तरह की शंकाएं-आशंकाएं थीं। कुछ वैज्ञानिक यह मान रहे थे कि अगर प्लूटोनियम पानी में मिल भी गया, तो बहुत खतरा नहीं होगा। वहीं, कुछ वैज्ञानिकों का कहना था कि यह लाखों लोगों को मौत की नींद सुला देगा।

    इन सबके बीच प्लूटोनियम कैप्सुल के गुम होने के कुछ समय बाद ही सीआईए ने आईबी को अलर्ट किया था कि यह गम्भीर चिन्ता की बात है। सीआईए ने आईबी से कहा था – (गंगा के उद्गम से लेकर) कोलकाता तक के लोग इसकी जद में आ सकते हैं।

    हालांकि, बाद में सीआईए खुद ही अपनी बात से मुकर गई और कहा कि इससे बहुत खतरा नहीं है और अगर गंगा में भी मिल जाये, तो इसका मानव पर बहुत कम असर होगा। मगर सीआईए यह बताना भूल गई या छिपा गई कि विकिरण का असर तुरन्त पता नहीं चलता है बल्कि धीरे-धीरे इसका असर बढ़ता है। मोरारजी देसाई के निर्देश पर गठित कमेटी के सदस्य रहे एमजीके मेनन हालांकि मानते हैं कि इसके खतरे बड़े हैं।

    2010 में एक मैगजीन को दिये इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, ‘देखिए, अगर वह डिवाइस लीक करने लगे और प्लूटोनियम निकलकर पानी में मिल जाये, तो खतरनाक है। यह लोगों की जान ले सकता है। यह जहरीला और रेडियोएक्टिव है।’

    उन्होंने गुम हुए कैप्सुल पर नियमित नजरदारी करने की वकालत करते हुए कहा था, ‘इस पर नजर रखी जानी चाहिए, लेकिन यह खर्चीला है। अगर आपने कोई खतरनाक चीज गुम कर दी है, तो उसे ढूँढा जाना चाहिए या फिर उस क्षेत्र की लगातार निगरानी की जानी चाहिए। आपको उस क्षेत्र के लोगों के लिये जिम्मेवारीपूर्ण कार्य करना चाहिए।’

    ‘सीटल पोस्ट-इंटेलिजेंसर’ नामक जर्नल में छपे एक लेख में मिशन का हिस्सा रहे रॉबर्ट स्केलर बताते हैं, ‘जेनरेटर और अन्य उपकरण गायब थे। इससे हमलोग चिन्ता में पड़ गए थे। क्योंकि न्युक्लियर आधारित जेनरेटर नंदा देवी पर्वत पर खो गया था।’

    लेख में आगे लिखा गया है, ‘उपकरणों के गायब होने की दो चिन्ताएँ थीं। एक तो यह कि ये तकनीकी गलत हाथों में न पड़ जाये और दूसरी यह कि प्लूटोनियम कहीं गंगा में मिलकर पानी को प्रदूषित न कर दे।’

    लेख में स्केलर कहते हैं, ‘यह कल्पनातीत है कि उसे कैसे नष्ट किया जा सकेगा।’

    क्या मोदी सरकार कराएगी जाँच

    मोरारजी देसाई की सरकार में जो कमेटी बनी थी, उसकी अनुशंसाओं पर नहीं के बराबर काम हुआ, जिस वजह से सरकार के लिये ठोस तौर पर यह कह पाना मुश्किल है कि आखिरकार प्लूटोनियम भरे कैप्सुल्स के साथ क्या हुआ? अगर वे हैं, तो कहाँ हैं?

    अलबत्ता 70 के दशक में थोड़ी-बहुत पड़ताल जरूर हुई, लेकिन उसे बाद मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

    इस बीच, 2007 में सीटल पोस्ट-इंटेलिजेंसर में छपे लेख में एक हैरतंगेज खुलासा हुआ जो बताता है कि प्लूटोनियम का खतरा अब भी बरकरार है।

    मनमोहन सिंह कोहलीमनमोहन सिंह कोहली (फोटो साभार - लाइवमिंट)लेख में लिखा गया है कि 2005 में अमरीका पर्वतारोही व लेखक पी. टेकेडा ने नंदा देवी अभयारण्य से पानी के नमूने लिये थे।

    इन नमूनों की जाँच में प्लूटोनियम 239 की मौजूदगी की आशंका जताई गई है। लेख में यह भी बताया गया है कि प्रकृति में ऐसे तत्व प्राकृतिक रूप से नहीं पाये जाते हैं।

    लेख में उल्लिखित ये तथ्य निश्चित तौर पर चिन्ता के सबब हैं, लेकिन अफसोस की बात सरकार की तरफ से इसको लेकर भी गम्भीरता नहीं दिखाई गई।

    हाँ, सतपाल महाराज अक्सर यह मुद्दा उठाते रहते हैं। उन्होंने नंदा देवी के करीब के गाँवों के लोगों व गंगा को प्लूटोनियम के सम्भावित खतरों को लेकर यूपीए की सरकार के वक्त तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर इस मामले की तरफ ध्यान खींचने की कोशिश की थी। लेकिन, पत्र मिलने की पावती रसीद के सिवा कुछ नहीं हुआ।

    हाल ही में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी इससे अवगत कराया है। पीएम मोदी ने उन्हें जरूरी कदम उठाने का आश्वासन दिया है। अब देखना यह है कि भाजपा सरकार क्या करती है।

    अन्त में यह भी बता दें कि हॉलीवुड इस विफल मिशन को लेकर फिल्म बनाने जा रहा है। यह इस मिशन पर आधिकारिक फिल्म होगी।

    अमरीका के फिल्म प्रोड्यूसर स्कॉट रोजेनफेल्ट फिल्म का निर्माण करेंगे। इसके लिये कोहली की किताब ‘स्पाइज इन हिमालयाज’के राइट्स 2007 में ही खरीद लिये गए। फिल्म का अनुमानित बजट 20 मिलियन अमरिकी डॉलर रखा गया है।

    मिशन की बारीकियों से रूबरू होने के लिये कोहली और रॉबर्ट स्केलर का इंटरव्यू लिया गया है। बताया जाता है कि फिल्म में भारतीय और अमरिकी कलाकार होंगे तथा इसकी शूटिंग भारत, अमरीका समेत कई देशों में की जाएगी।

    कई बार सिनेमा सरकार की आँखें खोलने का काम करता है। अतः उम्मीद की जानी चाहिए कि फिल्म बनने पर फिर एक बार इस मिशन पर बहस छिड़ेगी और गुम हुए प्लूटोनियम कैप्सुल की पड़ताल दोबारा शुरू की जाएगी।

     

     

     

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    बंगाल में उपजने वाले चावल में भी आर्सेनिक

    editorialTue, 08/14/2018 - 13:10
    चावल में आर्सेनिकचावल में आर्सेनिक (फोटो साभार - ऑल इण्डिया तृणमूल कांग्रेस)क्या आप पश्चिम बंगाल से आने वाला चावल खाते हैं? सवाल अटपटा जरूर है, लेकिन इसका जवाब जानना बहुत जरूरी है। और अगर आपका जवाब हाँ है, तो आपके लिये बुरी खबर है!

    भूजल में सबसे ज्यादा आर्सेनिक पाये जाने वाले राज्यों में शुमार पश्चिम बंगाल में उपजने वाले चावल में भी आर्सेनिक पाया गया है।

    हाल ही में हुए एक शोध में इस सनसनीखेज तथ्य का खुलासा हुआ है, जो गम्भीर मामला है। यह शोध बताता है कि अगर आर्सेनिक का स्थायी समाधान नहीं निकाला गया, तो हालात भयावह होंगे।

    जादवपुर विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ एनवायरनमेंटल स्टडीज ने एक शोध में पाया कि पश्चिम बंगाल के जिन हिस्सों के पानी में आर्सेनिक अधिक मात्रा में पाया जाता है, वहाँ उगने वाले धान में भी आर्सेनिक मौजूद है।

    यानी कोई आर्सेनिकयुक्त पानी नहीं भी पी रहा है और अगर आर्सेनिकयुक्त चावल खाता है, तो उसके शरीर में आर्सेनिक प्रवेश कर जाएगा, जिससे कैंसर का खतरा हो सकता है।

    यहाँ यह भी बता दें कि गंगा तटवर्ती क्षेत्रों के भूगर्भ में प्राकृतिक तौर पर आर्सेनिक पाया जाता है। एक लीटर में 0.05 मिलीग्राम आर्सेनिक की मौजूदगी शरीर के लिये हानिकारक नहीं, लेकिन अगर इससे ज्यादा आर्सेनिक शरीर में प्रवेश करने लगता है, तो वह कैंसर का कारण बन जाता है।

    केमोस्फेयर नाम के जर्नल में ‘आर्सेनिक एकुमुलेशन इन पेडी प्लांट्स ऐट डिफरेंट फेजेज ऑफ प्री-मानसून कल्टीवेशन’ नाम से छपे शोध में विस्तार से बताया गया है कि किस तरह मानसून से पहले बोई जाने वाली धान की फसल की सिंचाई आर्सेनिकयुक्त पानी से करने के कारण आर्सेनिक जमा होता और वह चावल तक पहुँचता है।

    शोध के लिये उत्तर 24 परगना जिले के देगंगा ब्लॉक के 10 खेतों से नमूने जुटाए गए और कई स्तरों पर उनकी जाँच की गई। जाँच में पाया गया कि चावल में आर्सेनिक की मात्रा चिन्तनीय स्थिति में है।

    हालांकि, ऐसा नहीं है कि अनाज खासकर धान में आर्सेनिक की उपलब्धता को लेकर पहले कभी शोध नहीं हुआ है। पहले भी कई शोध हो चुके हैं, लेकिन इस बार जो शोध किया गया है, वह कुछ मामलों में बिल्कुल नया है और इसमें कई नई चीजें सामने आई हैं।

    शोध से जुड़े विशेषज्ञों ने बताया कि धान की बुआई से लेकर कटाई तक के तीन नमूने लिये गए थे। एक नमूना बुआई के चार हफ्ते बाद लिया गया। दूसरा नमूना 8 हफ्ते बाद और तीसरा नमूना फसल की कटाई के वक्त लिया गया।

    स्कूल ऑफ एनवायरनमेंट स्टडीज के डायरेक्टर और शोधकर्त्ताओं में शामिल तरित राय चौधरी कहते हैं, ‘शोध में धान का बीज लगाने के शुरुआती दौर में यानी 28 दिनों में पौधों में ज्यादा आर्सेनिक पाया गया। इसके बाद 29 से 56 दिनों की अवधि में पौधों में आर्सेनिक की मात्रा कम रही, लेकिन फसल की कटाई के समय दोबारा आर्सेनिक की मात्रा बढ़ गई।’

    दरअसल, शुरुआती दौर में जड़ भारी मात्रा में आर्सेनिक संग्रह करती है जिस कारण पौधों में अधिक आर्सेनिक पाया जाता है। मध्य में जड़ में आयरन भी अधिक जमा हो जाता है, जो आर्सेनिक को सोख लेता है। इससे स्वाभाविक तौर पर पौधों में आर्सेनिक की मात्रा में कमी आ जाती है। तीसरे चरण में आयरन की क्षमता खत्म हो जाती है जिस कारण वह संग्रहित आर्सेनिक छोड़ने लगता है, जो जड़ों से होते हुए दोबारा पौधों में पहुँच जाता है।

    तरित रायचौधरी कहते हैं, ‘फसल की तीन चरणों में शोध पहले कभी नहीं हुआ था। यह नया शोध है और इससे यह भी पता चलता है कि किस तरह फसलों में आर्सेनिक की मात्रा कम की जा सकती है।’

    उन्होंने आगे कहा, ‘शोध से पता चलता है कि आयरन में आर्सेनिक को सोखने की क्षमता है। यानी अगर धान की बुआई से लेकर कटाई तक अगर खेतों में आयरन का इस्तेमाल किया जाये, तो चावल में आर्सेनिक के प्रवेश को रोका जा सकता है।’

    वह इस बात पर हैरानी भी जताते हैं कि अगर आयरन का हस्तक्षेप न होता, तो चावल में आर्सेनिक की मौजूदगी खतरनाक स्थिति में पहुँच जाती और इसका सेवन करने वाला कैंसर की चपेट में आ जाता।

    चावल के अलावा धान के डंठल और चावल के खोल में भी आर्सेनिक पाये गए हैं। धान के डंठल और खोल का इस्तेमाल मवेशियों के चारे के रूप में किया जाता है। यानी कि मवेशियों के शरीर में भी आर्सेनिक प्रवेश कर रहा है।

    उल्लेखनीय है कि पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना, मालदा, मुर्शिदाबाद समेत कुल 9 जिलों के 79 ब्लॉकों में रहने वाले एक करोड़ से ज्यादा लोग आर्सेनिक के शिकंजे में हैं।

    पश्चिम बंगाल में आर्सेनिक की शिनाख्त 3 दशक पहले वर्ष 1983 में ही कर ली गई थी।

    बताया जाता है कि सबसे पहले उत्तर 24 परगना के बारासात और दक्षिण 24 परगना जिले के बारुईपुर में आर्सेनिक युक्त पानी मिला था। इसके बाद मुर्शिदाबाद, मालदा, नदिया व अन्य जिलों में इसकी मौजूदगी पाई गई। महानगर कोलकाता का दक्षिणी हिस्सा भी आर्सेनिक से अछूता नहीं है। कई ब्लॉकों के पानी में आर्सेनिक की मात्रा विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक से कई गुना अधिक पाई गई है।

    पश्चिम बंगाल सरकार दावा करती है कि 90 फीसदी से ज्यादा लोगों को आर्सेनिकमुक्त पानी मुहैया कराया जा रहा है। सरकार का यह भी दावा है कि लोगों को साफ पानी उपलब्ध कराने के लिये हर साल सरकार लाखों रुपए खर्च कर रही है, लेकिन शोध में सामने आये तथ्य बता रहे हैं कि पानी ही नहीं अब तो खाने में भी आर्सेनिक है।

    राज्य सरकार साफ पानी मुहैया कराने की योजनाओं पर भले ही लाखों रुपए खर्च करने का दावा कर रही है, लेकिन ये शोध बताते हैं कि जमीनी स्तर पर इसका फायदा नहीं मिल रहा है।

    अगर लोगों को पीने के लिये साफ पानी मिल भी रहा है, तो चावल के माध्यम से उनके शरीर में आर्सेनिक प्रवेश कर रहा है। सरकार का इस तरफ कोई ध्यान ही नहीं है।

    पश्चिम बंगाल में चावल प्रमुख भोज्य पदार्थ है। बंगाली समुदाय रोटी की जगह चावल को ज्यादा तरजीह देता है और यही वजह है कि पश्चिम बंगाल में चावल की खेती अधिक होती है।

    पश्चिम बंगाल में 2.5 करोड़ टन धान का उत्पादन होता है, जिससे 1.5 करोड़ टन चावल निकलता है। बंगाल में उत्पादित होने वाले चावल की खपत बंगाल में ही ज्यादा हो जाती है। थोड़ा बहुत दूसरे राज्यों को निर्यात किया जाता है।

    सोचने वाली बात यह है कि पश्चिम बंगाल के जिन जिलों में आर्सेनिक अधिक पाया जाता है वहाँ उपजने वाला चावल उन जिलों में भी जाता है, जहाँ चावल की खेती कम होती है। इसका मतलब है कि जिन जिलों के ग्राउंडवाटर में आर्सेनिक नहीं है, उन जिलों के लोगों के शरीर में भी चावल के माध्यम से आर्सेनिक जा रहा है। शहरी क्षेत्रों में लोगों के खान-पान का स्तर ठीक है जिस कारण उनमें रोगों से लड़ने की क्षमता अधिक होती है और वे आर्सेनिक से लड़ सकते हैं। लेकिन, ग्रामीण क्षेत्रों में यह सम्भव नहीं है, इसलिये ग्रामीण लोगों पर खतरा ज्यादा है।

    दूसरी तरफ, जादवपुर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसरों द्वारा किये गए एक अन्य शोध में अरवा और उसना चावल में आर्सेनिक अलग-अलग मात्रा में पाया गया है।

    शोध में पता चला है कि अरवा चावल की तुलना में उसना चावल में आर्सेनिक की मात्रा अधिक पाई गई। इसके अलावा चावल से बनने वाले अन्य उत्पाद मसलन फरही, चूड़ा, आटा आदि में भी आर्सेनिक मिला है।

    ‘इम्पैक्ट ऑफ आर्सेनिक कॉन्टेमिनेटेड ग्राउंडवाटर यूज्ड ड्यूरिंग डोमेस्टिक स्केल पोस्ट हार्वेस्ट ऑफ पेडी क्रॉप इन बंगाल: आर्सेनिक पार्टिसिपेटिंग इन रॉ एंड परबॉयल्ट होल ग्रेन’ (Impact of Arsenic Contaminated Groundwater Used During the Domestic Scale Post Harvest of Paddy Crop in Bengal : Arsenic Participating in Raw and Peribault Hole Grain) नाम से छपे शोध में बताया गया है कि चावल से बनने वाले फरही, चूड़ा और आटा के साथ ही अरवा और उसना चावल नमूने के तौर पर लिये गए।

    इन नमूनों की जाँच की गई, तो पाया गया कि इनमें आर्सेनिक है। खासकर जब अरवा और उसना चावल में आर्सेनिक की मात्रा की जाँच की गई, तो देखा गया कि प्रति किलोग्राम अरवा चावल में जितना आर्सेनिक है, उसना चावल में उसकी मात्रा 200 प्रतिशत से अधिक बढ़ी हुई है। एक किलोग्राम अरवा चावल में 66 माइक्रोग्राम आर्सेनिक मिला जबकि उसना चावल में 186 माइक्रोग्राम आर्सेनिक पाया गया।

    दरअसल, अरवा चावल को तो उबाला नहीं जाता है, इसलिये उसमें आर्सेनिक की मात्रा कम रही। वहीं, उसना चावल को कई दफे उच्च तापमान पर उबाला जाता है।

    विशेषज्ञ बताते हैं कि उसना चावल बनाने के लिये धान को लम्बे समय तक पानी में उबाला जाता है। जिन क्षेत्र के ग्राउंडवाटर में आर्सेनिक है। वहाँ आर्सेनिकयुक्त पानी से ही धान को उबाला जाता है। इन क्षेत्रों में उगने वाले धान में पहले से ही आर्सेनिक मौजूद रहता है और उस पर आर्सेनिकयुक्त पानी से उसे लम्बे समय तक उबाल दिया जाता है, जिस कारण चावल में और आर्सेनिक प्रवेश कर जाता है।

    अफसोस की बात ये है कि धान उगाने वाले किसानों को इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है, जिस कारण उनके स्तर पर किसी तरह का एहतियाती कदम नहीं उठाया जाता है। हालांकि, उनके पास वैसा संसाधन भी नहीं है कि वे कुछ कर पाएँ।

    उनकी सारी उम्मीदें सरकार से है। लेकिन, सरकार की तरफ से बमुश्किल पीने के लिये साफ पानी मुहैया कराया जा रहा है और वह भी कहीं-कहीं।

    पिछले दिनों बंगाल के कुछ स्कूलों के छात्रों की जाँच हुई थी, जिसका रिजल्ट हैरान करने वाला था। जाँच में पता चला था कि ज्यादातर बच्चों के शरीर में आर्सेनिक मौजूद था।

    इन स्कूलों के शिक्षकों का कहना था कि यहाँ साफ पानी मुहैया कराने की कोई व्यवस्था नहीं की गई है, जिस कारण बच्चे स्कूल के ट्यूबवेल (इनसे आर्सेनिकयुक्त पानी निकलता है) से पानी पीने को विवश हैं। पानी के अलावा इन्हीं ट्यूबवेल के पानी से दोपहर का खाना भी बनता है। यानी कि खाने से लेकर पीने तक में आर्सेनिक उनके शरीर में जा रहा है।

    यहाँ तक कि वे घर में जिस पानी का इस्तेमाल करते हैं, वे भी आर्सेनिकयुक्त ही हैं।

    विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को कई मोर्चों पर गम्भीरता से काम करने की जरूरत है।पहला तो यह कि भूजल का इस्तेमाल बेहद सावधानी से किया जाना चाहिए। दूसरी बात ये कि बारिश के पानी के संचयन पर फोकस किया जाना चाहिए। बारिश के पानी में आर्सेनिक नहीं होता है, इसलिये सिंचाई में इसका इस्तेमाल करने से खाद्यान्न में आर्सेनिक के प्रवेश की आशंका नहीं के बराबर रहती है।

    इसके अलावा आर्सेनिक प्रभावित इलाकों की शिनाख्त कर साफ पानी मुहैया कराने की कवायद तेज करनी चाहिए, ताकि समय रहते आर्सेनिक के दुष्परिणामों को रोका जा सके।


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    सानंद के स्वास्थ्य में आ रही है गिरावटeditorialWed, 08/15/2018 - 19:36

    स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंदस्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद (फोटो साभार - डेली मेल)

    गंगा संरक्षण के लिये केन्द्र सरकार द्वारा अब तक उठाए गए कदमों से असन्तुष्ट, वयोवृद्ध पर्यावरणविद प्रोफेसर जीडी अग्रवाल सह स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद 55 दिनों से अनशन पर हैं। उनके स्वास्थ्य में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है और उनका वजन 15 किलोग्राम कम हो गया है। हाल ही उन्हें 13 अगस्त को ऋषिकेश स्थित एम्स में भर्ती कराया गया है।

    मिली जानकारी के अनुसार उनकी हृदय गति में भी अनियमितता दर्ज की गई है जिससे उन्हें बोलने में तकलीफ हो रही है। हालांकि, बुधवार को अस्पताल द्वारा जारी रिपोर्ट में उनकी स्थिति सामान्य बताई गई है। स्वामी सानंद ने एक बार फिर अपनी माँगों के न पूरा होने तक अनशन को जारी रखने संकल्प को दुहराया है। सरकार जब तक गंगा एक्ट पर संसद में चर्चा करा कर उसे पास नहीं कराती, मेरा अनशन जारी रहेगा - स्वामी सानंद

    मालूम हो कि गंगा एक्ट को लागू करने, गंगा परिषद के गठन, उत्तराखण्ड में गंगा और उसकी सहायक नदियों पर निर्माणाधीन और प्रस्तावित सभी जलविद्युत परियोजना को तत्काल प्रभाव से निरस्त करने की माँग को लेकर स्वामी सानंद 22 जून से आमरण अनशन पर हैं। अपनी माँगों के समर्थन में वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अब तक तीन बार पत्र लिख चुके हैं। इसी महीने के पहले सप्ताह में उन्होंने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर संसद के वर्तमान सत्र में गंगा एक्ट को पास कराने की माँग को फिर से उठाया है। उन्होंने पत्र में गंगा एक्ट का ड्राफ्ट तैयार करवाने के लिये पिछली यूपीए सरकार की तारीफ भी किया है। इसके अलावा प्रधानमंत्री द्वारा पिछले दो पत्रों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त करने पर उन्होंने नाराजगी भी जाहिर किया है।

    इधर, केन्द्रीय जल संसाधन मंत्री उमा भारती ने भी 5 जून को स्वामी सानंद से मुलाकात कर उनसे अनशन त्यागने का अनुरोध किया था लेकिन बात नहीं बन पाई थी। इस मुलाकात को उमा भारती ने व्यक्तिगत प्रयास बताया था। उन्होंने कहा था कि स्वामी सानंद की माँग पर सरकार गम्भीरता से विचार कर रही है और जल्द ही गंगा एक्ट को कैबिनेट से पास करा कर शीतकालीन सत्र में संसद में पेश किया जाएगा।
     

    Tags: Fast unto Death for Ganga, Swami Sanand, Prof. G.D. Aggarwal, Aamaran Anshan, Matri Sadan in Haridwar, AIIMS, Prime Minister Narendra Modi.

     

     

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    तराजू में एक तरफ नमक तो दूसरी तरफ मेवाeditorialFri, 08/17/2018 - 18:39

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    डाउन टू अर्थ, अगस्त 2018

    प्रवीर कृष्णप्रवीर कृष्ण (फोटो साभार - डाउन टू अर्थ)लघु वनोपज (minor forest produce - MFP) पर आदिवासियों का एकाधिकार होने के बावजूद वे उसके उचित दामों से वंचित हैं। बस्तर क्षेत्र में आदिवासी चिरौंजी जैसे महंगे मेवे को नमक के भाव बेचते हैं। तराजू में एक तरफ नमक होता है तो दूसरी और मेवा (ड्राइफूड) लघु वनोपज पर निर्भर आदिवासियों के शोषण की ये एक मिसाल है। शोषण की इस खाई को पाटने के लिये आदिवासियों को उनके लघु वनोपज का न्यूनतम समर्थन मूूल्य दिलाने के लिये ट्राइफेड (tribal cooperative marketing development federation of india limited) अब वन-धन योजना शुरू कर रही है। उसका दावा है कि आदिवासियों को उनके वनोपज का सही दाम मिलेगा। सरकार अब तक लघु वनोपज का सही मूल्य नहीं दिला पाई है। सही मूल्य दिलाने में योजना कितनी कारगर होगी? प्रस्तुत है ट्राइफेड के प्रबन्ध निदेशक प्रवीर कृष्ण से अनिल अश्विनी शर्मा की बातचीत पर आधारित साक्षात्कार।



     

    लघुवनोपज पर वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) का कितना प्रभाव पड़ेगा? संग्रहित वनोपज की संख्या और कितनी बढ़ाई जाएगी?

    कायदे से देखा जाय तो इसका असर शून्य है। लघु वनोपज का न्यूनतम समर्थन मूल्य केन्द्र सरकार ने 2013-14 में लागू किया था। इसमें तब 10 लघु वनोपज शामिल थीं। जैसे इमली, महुआ, तोरा, आँवला आदि। इस आधार पर 2014-15 में रुपए 55 से रुपए 60 करोड़ की खरीद की गई इसके बाद 2016-17 में 10 लघु वनोपज बढ़ाकर 23 कर दिया गया। इस पर लगभग रुपए 125 करोड़ की खरीदारी की गई, लेकिन हम मानते हैं कि यह बहुत ही कम है। इसकी क्षमता लगभग रुपए 1200 करोड़ प्रतिवर्ष है। इससे अभी हम बहुत पीछे हैं।

    इसकी क्षमता को बढ़ाने के लिये क्या-क्या उपाय किये जा रहे हैं?

    अब हमें इस लक्ष्य को हासिल करने के लिये कम-से-कम 75 वनोपज को शामिल करना होगा और न्यूनतम समर्थन मूल्य को बाजार मूल्य के आस-पास रखना होगा। क्योंकि अभी लघु वनोपज के मूल्य वास्तविक रूप से कम हैं। इस बरसात बाद 75 वनोपजों का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित कर ग्रामीण हाट बाजारों से खरीदने की कार्य योजना तैयार की जा रही है। 27 राज्यों के साथ समझौते पत्रों पर हस्ताक्षर करने की तैयारी है। इस योजना से देश भर के ढाई करोड़ आदिवासी सीधे तौर पर जुड़ेंगे।

    आदिवासियों को उनके लघु वनोपज का सही दाम मिले, इसके लिये वन-धन योजना कितनी कारगर साबित होगी?

    वन-धन योजना के तहत देश भर में 3000 वन-धन केन्द्र स्थापित किये जाएँगे। हर केन्द्र पर लगभग 300 आदिवासी अपनी लघु वनोपज लाएँगे व उनकी उपज को परिष्कृत करने की व्यवस्था होगी। योजना का उद्देश्य है लघु वनोपज को परिष्कृत करना। इस काम में जिलाधीश को शामिल किया गया है। जैसे सामान्य इमली रुपए 30 किलो बिकती है। लेकिन उसी इमली के बीज व रेशे निकाल दिये जाएँ तो वह रुपए 120 किलो में बिकेगी। आदिवासियों को इस कार्य में निपुण करना होगा। तभी उनका सतत विकास सम्भव होगा। यही नहीं, लगभग 20 से 25 लाख आदिवासियों को इस योजना के माध्यम से उद्यमी बनाया जाएगा। जब तक सरकार हाट बाजार में जाकर आदिवासियों के लघु वनोपज नहीं खरीदेगी तब तक उन्हें सीधे लाभ नहीं मिलेगा। अकेले क्रय से ही काम नहीं चलेगा बल्कि इसके बाद उस उपज का भण्डारण, परिवहन, फिर विक्रय और आखिरी में मूल्य संवर्धन व परिष्कृत करना। प्राइमरी बाजार से लेकर मुख्य बाजार तक की कड़ी को देखना होगा।

    आदिवासियों के विकास के लिये उनके जंगल की उपज को सही समर्थन मूल्य दिलाने की दिशा में सरकार क्या उपाय कर रही है?

    देश भर के जंगलों में लगभग 10 करोड़ आदिवासी रहते हैं। उनकी 40 से 60 फीसद आय वनोपज से होती है। यदि उनके वर्तमान मूल्य के मुकाबले सही समर्थन मूल्य दें तो उनकी आय में दो गुनी से अधिक वृद्धि होगी। अगर उनकी उपज को परिष्कृत (वैल्यू एडिशन) किया जाये तो उनकी आय तीन से चार गुणा हो जाएगी।

    आदिवासियों कल्याण के लिये योजनाएँ तो बीते 7 दशकों में कई बनीं, लेकिन उन योजनाओं के क्रियान्वयन में कमी क्या रह जाती है?

    इस बार हमारा लक्ष्य यही है कि योजना के क्रियान्वयन पर अधिक जोर रहेगा। कारण कि कागजों पर तो योजना बहुत अच्छी होती है, लेकिन सही क्रियान्वयन नहीं होने से वे बस कागजों में ही रह गईं। जमीनी क्रियान्वयन के लिये सही मूल्य का निर्धारण, हाट बाजारों में खरीद-बिक्री की व्यवस्था, बाजार में क्रय करने वाली समितियों को सही मात्रा में भुगतान, एडवांस भुगतान को स्थायी रूप से निर्धारित कर, दिशा-निर्देश बनाकर उसे राज्य सरकार व जिला कलेक्टरों के माध्यम से क्रियान्वयन किये जाने की योजना है।

    यह काम कब से शुरू हो रहा है?

    बस, इस बरसात के बाद यह योजना शुरू हो जाएगी। क्योंकि बरसात में वनोपजों का संग्रहण कार्य ठीक से नहीं हो पाता। आगामी नवम्बर-दिसम्बर में लघु वनोपज का मौसम आएगा। हम 27 राज्यों के लगभग 5000 हाट बाजारों में इस योजना को अमल में लाएँगे।

    आपने बस्तर क्षेत्र में काम किया है और वहाँ दशकों से नक्सलवाद का असर है। क्या ट्राइफेड की योजनाओं के माध्यम से नक्सलवाद के दुष्प्रभावों का इलाज सम्भव है?

    हाँ, बस्तर में मैंने काम किया है और इसके आधार पर मैंने मंत्रालय के सामने प्रस्ताव रखा है। आदिवासियों के लघु वनोपज व हस्तशिल्प का व्यापार रुपए 20-25 करोड़ का नहीं है बल्कि इसके रुपए 2000 करोड़ तक के बढ़ने की क्षमता है। आज रुपए 2 लाख करोड़ का लघु वनोपज देश में उपलब्ध हैं। और हम इसके माध्यम से प्रतिवर्ष दो से तीन हजार करोड़ रुपए का व्यापार कर सकते हैं। और यदि इसमें वैल्यू एडिशन जोड़ दिया तो यह 10 हजार करोड़ रुपए का व्यापार तक बढ़ सकता है। आज आदिवासी रुपए 20 से 25 कमा रहा है। यदि उसके हाथ में रुपए 200 रोज के आएँगे तो वह दिन भर काम करेगा। उसका ध्यान नक्सलवाद की ओर जाएगा ही नहीं। आदिवासी क्षेत्रों में बिचौलिए शोषण करते हैं। ये आदिवासियों से चिरौंजी नमक के भाव खरीदते हैं। अभी रुपए 2000 के सामान पर आदिवासी के हाथ में रुपए 100 आता है जबकि उसे रुपए 1200 मिलने चाहिए। क्योंकि दुनिया की कोई ऐसी तकनीक नहीं विकसित हुई है, जिसके माध्यम से जंगलों से आदिवासियों को छोड़ कोई दूसरा समुुदाय लघु वनोपज संग्रहित कर सके। उसकी इस दक्षता को थोड़ा और परिष्कृत कर आदिवासियों का एक जनआन्दोलन खड़ा करने की तैयारी है।

    बाँस आदिवासियों के लिये अहम वनोपज है, इनके उपयोग पर आदिवासियों को उत्पीड़न झेलना पड़ता है। इस सम्बन्ध में ट्राइफेड क्या कर रहा है?

    यह एक अच्छी बात हुई है कि जिस बाँस को पहले लकड़ी की श्रेणी में रखा जाता था, अब यह ग्रास (झाड़ियों) की श्रेणियों में आ गया है। इससे अब कोई भी व्यक्ति अपने निजी क्षेत्र में लगए गए बाँस को बिना किसी सरकारी अनुमति के खरीद व बेच सकता है। अब आदिवासी समुदाय बाँस का व्यावसायिक उपयोग भी कर सकेगा।

    आदिवासी हस्तशिल्प कला उत्पादों के लिये ट्राइफेड की क्या योजना है?

    आदिवासी हस्तशिल्प कला के अन्तर्गत लगभग 5000 किस्म की चीजें बनाते हैं। काठ, लोहे, मिट्टी के सामान व आभूषण आदि को हम ‘ट्राइब्स इण्डिया’ ब्रांड के तहत विक्रय करते हैं। अभी हमारे पास 100 दुकानें हैं और इसे 3000 तक बढ़ाने की योजना है। इसके माध्यम से रुपए 20 से रुपए 25 करोड़ का विक्रय हो रहा है। इसे रुपए 100 करोड़ तक पहुँचाने का लक्ष्य है। इससे लगभग ढाई लाख आदिवासी परिवारों की आजीविका जुड़ेगी।

    ट्राइफेड की योजनाओं से कितनी आदिवासी परिवारों को रोजगार मिलेगा?

    लघु वनोपज के माध्यम से लगभग 25 लाख आदिवासी परिवारों का सीधा लाभ पहुँचाने का लक्ष्य रखा गया है। जबकि उनके द्वारा तैयार किये गए हस्तशिल्प उत्पाद से लगभग ढाई लाख आदिवासी परिवारों की आय में दोगुनी वृद्धि का लक्ष्य रखा गया है।

     

     

     

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    बर्बाद होता खजानाeditorialFri, 08/17/2018 - 18:55

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    डाउन टू अर्थ, अगस्त, 2018
    वर्षाजल से मछलीपालन किया जाता हैवर्षाजल से मछलीपालन किया जाता है (फोटो साभार - डाउन टू अर्थ)क्या गोवा के पर्यावरण में गिरावट आई है? जवाब है ‘हाँ’ और इसका सबसे अच्छा उदाहरण है यहाँ की खजाना भूमि की बदहाली, जो इस तटीय इलाके की एक खास व्यवस्था है। राज्य की जलवायु और आर्थिक-पारिस्थितिक जीवन के हिसाब से भी यह व्यवस्था बहुत महत्त्वपूर्ण रही है।

    वैसे तो गोवा अपनी अनाज की जरूरतों के लिये एक हद तक बाहर से आये अनाज पर भी आश्रित है, पर खेती इस तटीय प्रदेश का सबसे मुख्य पेशा है। 12 लाख आबादी में से करीब 1.6 लाख लोग खेती करते हैं और यहाँ की करीब 35 फीसदी जमीन पर खेती होती है (1995 के आँकड़े)। सिर्फ धान की खेती ही 45,000 हेक्टेयर से ज्यादा जमीन पर होती है।

    राज्य सरकार के अनुमान के अनुसार, उसके सकल घरेलू उत्पादन में खेती का हिस्सा 125 करोड़ रुपए है। धान यहाँ की प्रमुख फसल है। धान के खेतों में भी पहाड़ों पर स्थित सीढ़ीदार खेत-जिन्हें स्थानीय लोग मोरोड कहते हैं- का क्षेत्रफल करीब 6,600 हेक्टेयर होगा। पानी निकासी की अच्छी व्यवस्था वाली रेतीली जमीन का विस्तार भी करीब 17,000 हेक्टेयर होगा। इसे स्थानीय लोग खेर कहते हैं। शेष करीब 18,000 हेक्टेयर जमीन खजाना कहलाती है।

    खजाना शब्द पुर्तगाली के कसाना से आया माना जाता है, जिसका अर्थ होता है धान के बड़े खेत। गोवा के इतिहासकार जेसेफ बरोस बताते हैं कि लोक मान्यताओं के अनुसार, इस तरह की जमीन 4,000 वर्ष पूर्व समुद्र से निकाली गई थी।ये इस बात के गवाह भी हैं कि गोवा के लोगों को स्थानीय जलवायु, समुद्री ज्वार-भाटों के चक्रों, मिट्टी के गुणों, मछलियों और समुद्री जीव-जन्तुओं तथा पेड़-पौधों के बारे में कितनी विस्तृत जानकारी थी। पानी के बहाव को नियंत्रित करने के लिये जिन फाटकों का निर्माण उन्होंने किया था, उनसे भी तकनीकी कौशल झलकता है।

    खजाना खेत राज्य की दो प्रमुख नदियों जुआरी और मांडोवी के बहाव वाले निचले हिस्से में स्थित हैं। नीचे इन नदियों से नहरें खुद भी निकली हैं और निकाली भी गई हैं। इनसे निकला पानी या समुद्री ज्वार का खारा पानी मछलियों और झींगों के लिये फलने-फूलने का अच्छा ठिकाना है। बरसात में जब पानी का खारापन कम हो जाता है तो इस जमीन पर धान की फसल लगाई जाती है। धान के खेतों तक जिन रास्तों से पानी जाता है, बाद में उनमें जमा पानी ही मछलियों और झींगों के लिये जन्मने-पलने-बढ़ने का घर बन जाता है।

    ये दोनों नदियाँ लम्बे मैदानी और समतल इलाके को पार करके समुद्र में जा गिरती हैं। समुद्री ज्वार का पानी इनके अन्दर तक आ जाता है। इससे गर्मियों के मौसम में इन नदियों के पानी में भी खारापन आ जाता है। फिर यह खारापन अन्य सोतों और चश्मों में भी पहुँचता है।

    इन नदियों से लगे निचली जमीन वाले खेतों की सिंचाई इनके पानी से होती है। इनसे निकली नालियों-नहरों पर बने फाटक इन खेतों की सिंचाई महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं क्योंकि इनमें ही समुद्र ज्वार का पानी पाया जाता है। बाँस के एक खम्भे वाली सरल तकनीक से चलने वाले फाटक ही ज्वार को रोककर खेतों को डूबने और फसल को बर्बाद होने से बचाते हैं। अगर यह व्यवस्था न हो तो फसल के साथ ही जमीन भी बर्बाद होती है, क्योंकि खारापन खेतों की उर्वरता को भी नष्ट करता है।

    जल मार्गों पर बने फाटक मछली पकड़ने के काम को भी व्यवस्थित करते हैं। स्थानीय ग्रामीण समुदाय कम्युनिडाडेस और शासन, दोनों ही बहुत ज्यादा मछलियाँ पकड़ने की अनुमति नहीं देते। इन फाटकों के आस-पास और छोटे ज्वारों के बीच ही मछली पकड़ने की अनुमति दी जाती है। जब ज्वार ऊँचा हो तब मछली मारने पर सख्त रोक रहती है, क्योंकि ऐसे में मछलियाँ भागकर और इलाके में चली जाती हैं।

    पारम्परिक रूप से इन फाटकों के पास मछली मारने के हक की नीलामी की जाती थी और कम्युनिडाडेस यह इन्तजाम भी करता था कि पकड़ी गई मछलियों में गाँव वालों को सही हिस्सा भी मिल जाये। पानी को खारेपन से बचाने के लिये गाँव के लोग ही फाटकों का संचालन करते हैं। अगर फाटक खोलने और बन्द करने के नियमों का उल्लंघन किया जाता है तो उसके लिये जुर्माना लगता है।

    बाँध

    खजाना खेतों की हिफाजत का एक अन्य महत्त्वपूर्ण इन्तजाम स्थानीय सस्ते साधनों-मिट्टी, पुआल, बाँस, पत्थर और गरान की टहनियों से बने बाँध हैं। ये बाँध भी खेतों में खारे पानी का प्रवेश रोकते हैं। इसमें अन्दर वाला बाँध तो कम ऊँचा होता है और मिट्टी का बना होता है, पर बाहरी बाँध मखरला पत्थरों का होता है जो यहाँ खूब मिलते हैं। इन्हीं पर ज्वार को सम्भालने का असली बोझ आता है और ये पत्थर भी खारा पानी सह-सहकर और कठोर बन जाते हैं। फिर इनमें घोंघे या केंकड़े वगैरह बांबी नहीं बना पाते। ऐसे छेदों से भी बाँध खराब हो जाते हैं। पणजी स्थित राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक एस. ऊंटवले कहते हैं कि ये बाँध जमीन और समुद्र की पक्की जानकारियों के आधार पर बनाए जाते हैं।

    बाँधों की लम्बाई करीब 2,000 किमी. होगी और ये गोवा की सबसे बड़ी सामुदायिक सम्पदा हैं। खेतों में पानी ले जाने और अतिरिक्त पानी निकालने वाली नालियाँ बनी हैं। इन तटबंधों पर उगने वाली गरान की झाड़ियाँ बाँधों को बचाने और ज्वार के जोर को थामने का काम करती हैं। किसानों ने सदियों से इन झाड़ियों को लगाने और सम्भालने का काम किया है।

    खजाना के स्वामी

    खजाना जमीन आमतौर पर निजी मिल्कियत वाली है, पर कहीं-कहीं कम्युनिडाडेस-सामूहिक मिल्कियत वाले भी खेत हैं। पहल काश्तकार-जिन्हें यहाँ बाटीकार कहा जाता है-खुद ही खेती करते थे। पर धीरे-धीरे बटाई पर खेती शुरू हुई। बटाईदारों को यहाँ मुंडकार कहा जाता है। पर जमीन पर चाहे जिसकी मिल्कियत हो, कम्युनिडाडेस द्वारा तय नियमों से ही इन खेतों में खेती और सिंचाई होती है। तटबंध के कटान को हर हाल में बोउस (किसानों के संगठन) द्वारा 24 घंटे के अन्दर-बन्द करना होता है। इस प्रणाली के रख-रखाव और आपातस्थिति से निपटने में किसानों की साझेदारी अनिवार्य है।

    1882 में पुर्तगाली सरकार ने नियम बना दिया कि सभी बाटीकारों और मुंडकारों को बोउस का सदस्य होना ही पड़ेगा। सिंचाई प्रणालियों के रख-रखाव, मरम्मत और संचालन का जिम्मा बोउस का था। उसके काम की निगरानी गौंकार करते थे। गाँव का लेखा-जोखा कुलकर्णी के पास होता था। और पैनी बाँधों की रखवाली करते थे। बोउस का खर्च उसके सदस्य मिलजुलकर उठाते थे। गाँवों को पुराने कागजातों से स्पष्ट होता है कि किसानों को अपने खेतों से कटे धान का बोझ उठाने के पहले सारे बकाए का भुगतान करना होता था।

    जरूरत पड़ने पर कई गाँवों के बोउस मिल-जुलकर काम करते थे और इस पूरी व्यवस्था का सबसे दिलचस्प और महत्त्वपूर्ण पहलू खारे पानी को रोकना है। जो खेती और मछली पालन, सबके लिये बहुत महत्त्वपूर्ण है। इस बारे में बरता जाने वाला अनुशासन तोड़ने पर सख्त सजा और जेल भी हो जाती थी। सरकार भी सिर्फ कीड़े-मकोड़े, घोंघे, खरपतवार को मारने के नाम पर ही खारा पानी आने देेने की अनुमति देती थी। पर ऐसी अनुमति होने पर भी 20 सेंमी. से ज्यादा पानी नहीं रखा जा सकता था।

    बाँधों पर खतरा

    1950 के दशक में नौकाओं की आवाजाही बढ़ने से बाँधों पर पहली बार गम्भीर खतरा उत्पन्न हुआ। इनसे हुए नुकसानों की मरम्मत और रख-रखाव के लिये ज्यादा धन जुटाने वाले नए कानून बनाए गए।



    1961 में एक नए कानून कोडिगो दास कम्युनिडाडेस के जरिए बोउस को पूरी तरह खत्म कर देने से बोउस और बाँधों, दोनों के लिये खतरा पैदा हो गया। इसके बाद से इन क्षेत्रों का प्रशासन सरकार का काम हो गया। गोवा की आजादी के बाद बने 1964 के काश्तकारी कानूम से कम्युनिडाडेस को खजाना खेतों के प्रबन्ध की जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया गया।

    नए कानून में यह प्रावधान भी था कि खेतों के संरक्षण वाले बाँध के रख-रखाव का आधा तक खर्च सरकार उठाएगी और खजाना क्षेत्र में पड़े खेतों के मालिकों को अनिवार्य रूप से अपना संगठन बनाना होगा। लेकिन जैसा कि 1992 में पेश अपनी रिपोर्ट में कृषि भूमि विकास पैनल ने कहा है, यह संगठन कम्युनिडाडेस वाली भूमिका नहीं निभा सका। इस रिपोर्ट से संकेत मिलता है कि खजाना भूमि व्यवस्था की बदहाली कम्युनिडाडेस की समाप्ति के साथ ही जुड़ी है।

    बर्बादी बढ़ी

    सरकार और स्थानीय समुदाय की उपेक्षा शुरू होने के साथ ही खजाना भूमि के लिये खतरा बढ़ता गया। इसके साथ ही, गोवा में जिस रफ्तार से प्रवासी लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है उससे भी यहाँ का ग्रामीण समुदाय संकट में पड़ा है। गोवा विश्वविद्यालय में अर्थशास्र के अध्यापक एरोल डिसूजा बताते हैं कि परिवारों के बँटने से जमीन भी बँटी है और जमीन का टुकड़ा जितना छोटा होता गया है उस पर खेती उतनी ही कम लाभकारी रह गई है।राज्य के काश्तकारी कानून किसी भी व्यक्ति को जमीन से बेदखल होने नहीं देते और जमींदार अपनी जमीन पर खास ध्यान नहीं दे पाते, क्योंकि उनसे अब कोई खास लाभ नहीं मिलता। छोटे मुंडकारों (बँटाईदारों) के पास इतनी अार्थिक ताकत नहीं रहती कि वे बाँध पर ध्यान देने की सोचें भी।

    अगर कोई व्यक्ति खुद से श्रम नहीं करता तो मजदूर रखकर खेती करना और जमीन का रख-रखाव कराना भी आसान नहीं है, क्योंकि गोवा में दिहाड़ी मजदूरी की दर देश में सबसे ज्यादा है। पत्रकार मारियों कैब्रेल ऐसा बताते हैं कि इन्हीं सब बातों के चलते खजाना भूमि के चारों तरफ बनी सुरक्षा ‘कवच’ अक्सर जहाँ-तहाँ से दरकती है और सरकारी काम अपने खास अन्दाज में होता है।एक-एक दरार को पाटने में कई-कई दिन लग जाते हैं और परिणाम यह होता है कि खेतों में खारा पानी भरा रहता है।

    झींगा भी झमेले का कारण

    गोवा में खेती की आमदनी में गिरावट आने के साथ एक और डरावना बदलाव आया है। खारे पानी से भरे खजाना खेत कुछ खास किस्म की मछलियों और खासतौर से झींगा पालन के लिये बहुत ही अच्छा साबित हो रहे हैं। झींगों की बाजार में काफी ऊँची कीमत मिलती है। ऐसे मामले खूब हो रहे हैं जब बाटीकार या मुंडकार खुद ही तटबंध को काट देते हैं जिससे उनके खेतों में समुद्री पानी भर जाता है और वे इस पानी में मछलीपालन करते हैं, जो धान लगाने से ज्यादा लाभदायक है।

    कृषि भूमि विकास पैनल की रिपोर्ट में बताया गया है कि अनेक खेतों में 15-15 वर्षों से पानी भरा पड़ा है और इनमें झींगा पालन हो रहा है। पैनल से ऐसे उदाहरण मिले हैं जब बाटीकार और मुंडकार ने मिलकर जमीन को बेच दिया है। धान लगाना छोड़कर मछली पालन शुरू करना कितने बड़े पैमाने पर हो रहा है, इसका पता इस बात से भी चलता है कि 1991 में सरकार ने ऐसा करने पर कानूनी रोक लगा दी। सिर्फ पाँच साल से बिना खेती वाली जमीन पर ही मछलीपालन की अनुमति दी जाती है, पर झींगा पालने में लगे लोगों का धंधा इससे नहीं रुका है। हाँ, उन्हें जमीन के मालिक और गाँव के कर्मचारी से झूठा प्रमाणपत्र लेने की जरूरत भर हो गई है।

    शहरीकरण का सिरदर्द

    बढ़ते जनसंख्या घनत्व से भी खजाना भूमि पर दबाव बढ़ा है। गोवा में आबादी मुख्यतः जुआरी-मांडोवी के मैदानी इलाके में है और यहीं खजाना खेत भी हैं। शहरों का विस्तार और विकास तो पूरी तरह खेती वाली इसी जमीन को नष्ट करके हुआ है। गोवा के पूर्व विपक्षी नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री रमाकांत खलप कहते हैं कि शहर के योजनाकारों और डेवलपरों ने खजाना को ही खाया है।

    शहरों के विस्तार के साथ ही सड़कों का भी भारी विस्तार हुआ है और इनसे खजाना भूमि की जल विकासी व्यवस्था भी प्रभावित हुई है। जैसे, कुछ वर्ष पहले बने पणजी बाईपास रोड ने काफी नुकसान पहुँचाया है। खलप कहते हैं, ‘शहरों के आस-पास विस्तार की जो भी योजनाएँ चलती हैं, सबकी मार इसी जमीन पर पड़ती है।’वह बताते हैं कि मापुसा राजमार्ग, कदंब बस पड़ाव और पणजी की अनेक ऊँची इमारतें खजाना जमीन पर ही बनी हैं।

    पर्यावरण में आ रही आम गिरावट का कुप्रभाव भी इन खेतों पर पड़ रहा है। नदियों के जलग्रहण क्षेत्र में जंगलों की कटाई और खनन के चलते उनके पानी में मिट्टी की मात्रा बढ़ गई है। यह मिट्टी आकर मुहाने वाले खेतों में बैठती है और मानसून के समय ज्यादा जमीन डूबी रहती है।

    शहरों के पास नदियों में प्रदूषण का स्तर काफी बढ़ गया है और काफी सारा कचरा बहकर खजाना खेतों में भी पहुँचता है। नौकाओं, ट्रालरों और टैंकरों से होने वाला पेट्रोलियम का रिसाव इस समस्या को और भी बढ़ाता है।

    राज्य सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी अपना नाम गुप्त रखने की शर्त पर बताते हैं, ‘अब मुश्किल यह हो गई है कि गोवा में होने वाली विकास की हर गतिविधि की कीमत खजाना खेतों को देनी पड़ रही है। हम उन्हें बचाने की जितनी इच्छा रखें, जितना शोर मचाएँ, पर इस विकास से जिस पर अब हमारा भी वश नहीं रह गया है, उनकी बर्बादी हो रही है।’पर कोंकण रेलवेे को लेकर पर्यावरणविदों के विरोेध से लोगों का ध्यान अपने इस खजाने की बर्बादी की तरफ भी गया है। यह चेतना क्या रंग लाती है, यह देखना अभी बाकी है।

    (‘बूँदों की संस्कृति’ पुस्तक से साभार)


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    महत्व खोती महत्वाकांक्षी योजनाeditorialFri, 08/17/2018 - 18:10

    Source
    डाउन टू अर्थ, अगस्त 2018

    पीएमएफबीवाईपीएमएफबीवाईदेश भर के किसान केन्द्र सरकार की महत्त्वाकांक्षी योजना प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) को लेकर बहुत कम उत्साहित नजर आ रहे हैं। योजना के चार क्रॉप सीजन बीत चुके हैं। मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के एक किसान लीलाधर सिंह 2016 में इस योजना के लिये नामांकन कराने वाले किसानों के पहले बैच में से एक हैं। हालांकि, उनका नामांकन अपने आप ही हुआ था।

    कृषि लोन उठाने वाले किसान होने के नाते, उन्हें अनिवार्य रूप से पीएमएफबीवाई के तहत लाया गया था। वह कहते हैं, ‘2016 के खरीफ सीजन का प्रीमियम मेरे बैंक खाते से अपने-आप काटा गया था। मुझे बीमा का अब तक एक रुपए नहीं मिला है।’वह इस बात को लेकर आश्वस्त हैं कि अगर उन्हें विकल्प दिया जाये तो वह पीएमएफबीवाई के तहत नहीं आना चाहेंगे।

    अप्रैल 2016 में केन्द्र सरकार ने पीएमएफबीवाई लांच की थी। यह योजना मौसम व फसलों को होने वाले अन्य नुकसान के बदले बीमा देती है। यह क्षेत्र और पुनर्गठित मौसम आधारित फसल बीमा योजना के आधार पर फसलों का बीमा करता है। योजना के तहत, किसान खरीफ सीजन में खाद्य फसल और तिलहन के लिये बीमा राशि का 2 प्रतिशत और रबी फसल के लिये 1.5 प्रतिशत प्रीमियम का भुगतान करते हैं। वास्तविक प्रीमियम दर और किसानों द्वारा देय बीमा दर के बीच का अन्तर राज्य और केन्द्र सरकार द्वारा समान रूप से साझा किया जाता है।

    इण्डियन काउंसिल फॉर रिसर्च अॉन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशंस (indian council for research on international economic relations - ICRIER) की एक शोधकर्ता प्रेरणा टेर्वे कहती हैं, ‘इस तरह की योजना की सफलता का आकलन इस तथ्य पर निर्भर करता है कि कितने गैर-ऋणी (लोन न लेने वाले) किसान इसमें रुचि रखते हैं क्योंकि उनके लिये यह योजना ऐच्छिक है। उनकी संख्या कम होती जा रही है, जो निश्चित रूप से इस योजना के बारे में अच्छा संकेत नहीं है।’ऐसे किसानों के बीच योजना की शुरुआत के समय काफी हलचल थी लेकिन अब वे इसमें दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं।

    कर्नाटक राज्य किसान संघ के अध्यक्ष चमारसा माली पाटिल गैर ऋणि किसान हैं जिन्होंने पहले साल के अनुभव के बाद ही योजना का नामांकन त्याग दिया। वह चना और जौ की खेती करते हैं। वह कहते हैं, ‘योजना शुरू होने के बाद मैंने प्रीमियम के तौर पर 6,000 रुपए का निवेश किया था लेकिन अब तक मुझे बीमा की राशि नहीं मिली है। उसके बाद से मैंने किसी भी तरह की कृषि बीमा योजना में निवेश बन्द कर दिया।’

    13 मार्च 2018 में लोकसभा में सरकार की ओर से दिये जवाब से पता चलता है कि इस योजना के प्रति किसानों में कितनी दिलचस्पी कम हुई है। जवाब के मुताबिक, लोन लेने वाले और नहीं लेने वाले, दोनों तरह के किसानों के नामांकन में भारी गिरावट आई है।

    2016-17 में यह संख्या जहाँ 57.48 मिलियन थी, वह घटकर 2017-18 में 47.9 मिलियन हो गई। इनमें से लोन लेने वाले किसानों की संख्या, जो बीमा योजना में अनिवार्य रूप से जोड़े गए, 2016-17 की 43.7 मिलियन से घटकर 2017-18 में 34.9 मिलियन हो गई। सरकार के पास इसका एक व्यावहारिक कारण है। भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार, 2016-17 की तुलना में 2017-18 में कृषि ऋण में बहुत कम वृद्धि देखी गई। पिछले वर्ष यह वृद्धि जहाँ 12.4 प्रतिशत थी, वह 2017-18 में सिर्फ 3.8 प्रतिशत हुई। जाहिर है, इससे बीमा का लाभ लेने वाले ऐसे किसानों की संख्या कम हो जाती है।

    योजना की सबसे चिन्ताजनक बात है, लोन न लेने वाले किसानों की संख्या में गिरावट आना। 2016-17 में ऐसे किसानों की संख्या जहाँ 13.8 मिलियन थी, वह 2017-18 में 13 मिलियन तक आ गई। इसका मतलब है कि चमारसा जैसे 0.8 मिलियन लोन न लेने वाले किसानों ने इस अवधि में योजना का लाभ न लेने का फैसला किया है। यह योजना अपने तीसरे वर्ष और 2018 के महत्त्वपूर्ण खरीफ सीजन में प्रवेश कर चुकी है। इसलिये सरकार 2018-19 तक इस योजना के तहत देश के सम्पूर्ण खेतिहर क्षेत्र के 50 प्रतिशत हिस्से को कवर करने के अपने महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य को लेकर चिन्तित है।

    वर्तमान में, केवल 30 प्रतिशत क्षेत्र ही दायरे में हैं। पिछले दो वर्षों में कुल बीमाकृत क्षेत्र में भी गिरावट आई है। 2016-17 में 56.8 मिलियन हेक्टेयर खेत बीमित थे, वह घटकर 2017-18 में 49.3 मिलियन हेक्टेयर हो गया है।

    किसान बारीकियों से अनजान

    किसान बताते हैं कि क्लेम प्रोसेसिंग में देरी और दावों का भुगतान न होना, दो सबसे बड़ी समस्याएँ हैं, जो उन्हें इस योजना से दूर करती हैं। इस योजना के तहत, पिछले तीन फसल सीजन में किसानों द्वारा किये गए दावों में से केवल 45 प्रतिशत दावों का भुगतान ही बीमा कम्पनियों द्वारा किया गया है। 2017 में इस योजना का मूल्यांकन नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने किया था। कैग ने बताया कि इस योजना में शिकायत निवारण तंत्र का गम्भीर अभाव है। अॉडिट कहती है कि सिर्फ 37 प्रतिशत किसान ही इस योजना की बारीकी के बारे में जानते थे। उत्तर प्रदेश के मुबारकपुर गाँव के किसान नेता हरपाल सिंह कहते हैं, ‘मुझे लोने लेने और प्रीमियम कटवाने के लिये बैंक जाना होता था लेकिन क्लेम का भुगतान न होने पर बैंक मुझे उस कम्पनी से सम्पर्क करने के लिये कहता है, जिसे मैं नहीं जानता।’

    इस साल मई में, इस योजना की राष्ट्रीय निगरानी समिति की बैठक के दौरान, सरकार ने स्वीकार किया कि पहले वर्ष में दावा निपटान में सात महीने से अधिक का समय लगा, जबकि दूसरे वर्ष में यह देरी दो महीने की रही। दरअसल, यह समस्या दावों का निपटान करने वाले उस अकेले तंत्र की वजह से है, जिसे क्रॉप कटिंग एक्सपेरीमेंट्स (crop cutting experiment - CCE) कहते हैं। यह तंत्र ही समस्या को और बढ़ा रहा है। राज्य सरकारें सीसीई से फसल उपज का डेटा जुटाती हैं और बीमा कम्पनियों के पास जमा कराती हैं। इसी के आधार पर, बीमा कम्पनियाँ फसल क्षति का निर्णय लेती हैं और फिर दावा निपटान पर निर्णय लेती हैं। बीमा कम्पनियाँ डेटा मिलने के तीन सप्ताह के भीतर दावों के निपटान के लिये बाध्य हैं।

    पीएमएफबीवाई की सफलता के लिये व्यापक पारदर्शी और भरोसेमन्द सीसीई की आवश्यकता है। आईसीआरआईईआर के पेपर के मुताबिक, 2016-17 में सरकार ने 0.92 मिलियन सीसीई किये थे। जबकि दोनों फसल सीजन के लिये लगभग तीन मिलियन की जरूरत थी। हालांकि, जैसाकि इस योजना की शुरुआत से ही उम्मीद थी, सीसीई को विश्वसनीय और समयबद्ध बनाने के लिये शायद ही कोई निवेश किया गया हो। एग्रीकल्चर इंश्योरेंस कम्पनी (agriculture insurance company - AIC) एक वरिष्ठ अधिकारी ने डाउन टू अर्थ को बताया, ‘राज्य सरकारों के पास लक्षित हिस्से के आधे हिस्से में भी सीसीई के संचालन करने के लिये जनशक्ति नहीं है।’

    कृषि मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, अधिकांश राज्यों ने उपज डेटा भेजने में तीन महीने से अधिक की देरी की है, जबकि झारखण्ड, पश्चिम बंगाल और गुजरात जैसे राज्यों में डेटा दिया ही नहीं। झारखण्ड और तेलंगाना ने 2016 का खरीफ फसलों के लिये अब तक डेटा नहीं दिया है। लेकिन, जब भी बीमा कम्पनियों के साथ डेटा साझा किया गया है, अक्सर यह उनके और राज्य सरकारों के बीच विवाद की एक बड़ी वजह बना है। विवाद इस बात पर है कि सीसीई के लिये भूखण्ड कैसे चुने जाते हैं और वे कैसे किये जा रहे हैं।

    पीएमएफबीवाई दिशा-निर्देशों के मुताबिक, भूखंड को सैम्पलिंग के लिये रिमोट सेंसिंग टेक्नोलॉजी का उपयोग किया जाना चाहिए। हालांकि, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, उड़ीसा, तमिलनाडु, तेलंगाना और छत्तीसगढ़ जैसे कुछ ही राज्यों ने ऐसा किया है और वह भी केस टू केस आधार पर ऐसा न कर पाने के पीछे वे एक मानक प्रोटोकॉल न होने का हवाला देते हैं। पीएमएफबीवाई के परिचालन दिशा-निर्देशों में, जीपीएस तकनीक के साथ मोबाइल आधारित तकनीक का उपयोग, सीसीई की पारदर्शिता और गुणवत्ता में सुधार के लिये अनिवार्य किया गया है लेकिन ज्यादातर राज्यों ने आवश्यक संख्या में स्मार्टफोन नहीं खरीदे हैं।

    एक बार पारदर्शिता को लेकर सवाल उठते ही सीसीई डेटा की विश्वसनीयता भी सन्देह के घेरे में आ जाती है। महाराष्ट्र के परभणी जिले में करीब 1,000 किसान 20 जून से विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। उनका कहना है कि सीसीई के लिये चुने गए यूनिट का क्षेत्र गलत था। वे केन्द्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह से मिलने दिल्ली आये थे। प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करने वाले मावोली कदम कहते हैं, ‘एक बड़ी इकाई के चयन ने उपज हानी डेटा में विसंगति पैदा कर दी और इसलिये कम्पनियों ने किसानों के सही दावों को भी अस्वीकार कर दिया।’कृषि मंत्रालय के मुताबिक, असम में 10.10 करोड़ रुपए के दावे लम्बित हैं, क्योंकि राज्य द्वारा प्रदत्त उपज डेटा ग्राम पंचायत स्तर के बजाय राजस्व सर्कल स्तर का था। नेशनल इस्टीट्यूट अॉफ एग्रीकल्चर एक्सटेंशंस मैनेजमेंट (national institute of agricultural extension management) के निगरानी और मूल्यांकन निदेशक ए अमरेंद्र रेड्डी कहते हैं, ‘अधिकांश समस्या इसलिये है कि सरकार और बीमा कम्पनियाँ ग्राम स्तर पर सीसीई नहीं कर रही हैं। यह उनकी प्राथमिकता में नहीं है।’

    राज्यों की उदासीनता

    राज्य भी इस योजना में उतनी सहायता नहीं दे रहे हैं, जितनी उनसे अपेक्षा की जाती है। शुरुआत से ही कई राज्य भारी वित्तीय भार का हवाला देते हुए, बीमा कम्पनियों को भुगतान किये जाने वाले प्रीमियम में अपने हिस्से का नियमित भुगतान नहीं कर रही है। जब तक राज्य सरकार भुगतान नहीं करती, तब तक केन्द्र सरकार भी अपने हिस्से का भुगतान नहीं करती।

    इस वजह से बीमा प्रक्रिया की शुरुआत नहीं होती। यह इस योजना की शुरुआत के बाद से ही एक मुद्दा रहा है। 24 राज्यों में से 10 राज्यों ने 2017 के खरीफ सीजन के लिये अपना हिस्सा नहीं दिया है। उदाहरण के लिये बिहार ने खरीफ 2017 के लिये प्रीमियम शेयर का भुगतान करने की तुलना में अपनी खुद की योजना शुरू करना पसन्द किया। नतीजतन पीएमएफबीवाई के तहत इस सीजन के लिये बिहार के किसी भी किसान को क्लेम नहीं दिया गया।

    खरीफ 2016 और रबी 2016-17 के दावे भी अभी लम्बित हैं। पंजाब ने पीएमएफबीवाई को खारिज कर दिया है और अपनी योजना लांच की है। राज्यों की एक आम शिकायत है कि पीएमएफबीवाई उनके किसानों के लिये अच्छा नहीं है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा ‘यह केवल बीमा कम्पनियों के खजने को भर रहा था।’टेर्वे कहती हैं, ‘राज्य समय पर सब्सिडी नहीं देते, इसलिये दावों का निपटान भी सही समय पर नहीं किया जाता। फिर राज्य कहते हैं कि वे लाभान्वित नहीं हो रहे हैं और तब अगले फसल मौसम के लिये सब्सिडी में देरी कर देते हैं।’

    योजना के तहत अनुमानित प्रीमियम की उच्च लागत राज्य सरकारों और केन्द्र सरकार के लिये एक प्रमुख मुद्दा बन रही है। यह पहले से ही केन्द्रीय कृषि सहयोग और किसान कल्याण विभाग के लगभग एक तिहाई हिस्से के लिये जिम्मेदार है। कई राज्यों का कहना है कि उनके वार्षिक कृषि बजट का 40 प्रतिशत तक प्रीमियम खाते में चला जाता है। खरीफ 2015 में अनुमानित प्रीमियम दरों में बढ़ोत्तरी हुई है।

    खरीफ 2015 में बीमित राशि का प्रीमियम 11.6 प्रतिशत था जो खरीफ 2016 में 12.5 प्रतिशत हो गया। मौसम आधारित फसल बीमा योजना के तहत खरीफ 2016 के लिये, राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे राज्यों के लिये अनुमानित प्रीमियम दर 43 प्रतिशत और 33.5 प्रतिशत थीं।

    यह तब है, जब बीमित क्षेत्रों में वृद्धि के साथ प्रीमियम कम होने की उम्मीद थी। लेकिन अब, कम कवरेज के कारण आगे इसके और बढ़ने की उम्मीद है। मुख्य रूप से यह दो कारणों से है- बीमा कम्पनियों द्वारा री-इंश्योंरेंस की बढ़ती आउटसोर्सिंग और बीमा कम्पनियों द्वारा बोली लगाने के लिये राज्यों द्वारा देरी से अधिसूचना जारी करना।

    पीएमएफबीवाई दिशा-निर्देशों का कहना है कि अधिसूचना क्रॉप सीजन के शुरू होने के कम-से-कम एक महीने पहले जारी होनी चाहिए। हालांकि, ऐसा हो नहीं रहा है।

    खरीफ 2018 के मामले में, जिसकी बुआई जुलाई में शुरू होती है, केवल गुजरात, महाराष्ट्र, सिक्किम, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल ने 13 जून तक अधि सूचना जारी की थी। बीमा कम्पनियों के लिये निविदा प्रक्रिया जारी करने में देरी का मतलब प्रीमियम दर का उच्च होना है। पिछले अनुभव बताते हैं कि राज्यों ने 2016 में अप्रैल और मई में यह प्रक्रिया शुरू की थी। उन्हें 4 से 9 प्रतिशत के बीच अनुमानित दर प्राप्त हुई। लेकिन बिहार गुजरात और राजस्थान जैसे राज्यों ने देर से निविदा प्रक्रिया शुरू की और उन्हें 20 प्रतिशत प्रीमियम दर मिला।

    राज्यों द्वारा अधिसूचना में देरी से समस्या और बढ़ी है, क्योंकि बीमा कारोबार मूल रूप से बदल गया है। एआईसी के वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, ‘ज्यादातर बीमा कम्पनियाँ अपने जोखिम को री-इंश्योरेंस कम्पनियों को स्थानान्तरित कर देती हैं पहले जनरल इंश्योरेंस कारपोरेशन ने 50 प्रतिशत से अधिक री-इंश्योरेंस किया था। हालांकि, अब विदेश में बैठे री-इंश्योरेंस से ये काम थोक में किया जा रहा है।

    राज्यों द्वारा असामयिक अधिसूचना और देरी से सब्सिडी भुगतान से री-इंश्योरेंस का विश्वास कम होता है। इसलिये, वे बहुत अधिक प्रीमियम दर बताते हैं।’
    13 जून 2018 को पीएमओ में स्टॉक टेकिंग बैठक में भी इस बात को स्वीकार किया गया था। एआईसी के अधिकारी कहते हैं, ‘कई राज्य एक ही सीजन में फिर से निविदा जारी करते हैं, जिससे हमें नुकसान होता है। इसके अलावा, हर फसल मौसम में बोली लगाने की बजाय, इसे तीन साल में एक बार किया जाना चाहिए, ताकि कम्पनियों को ग्राम स्तर पर आधारभूत संरचना बनाने के लिये आत्मविश्वास मिल सके।’

    नजरों का धोखा है एमएसपी में इजाफा

    केन्द्र सरकार ने 4 जून को खरीफ की 14 फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (minimum support price - MSP) बढ़ा दिया। इसी के साथ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन (एनडीए) सरकार ने दावा किया कि उसने लागत का डेढ़ गुणा एमएसपी बढ़ाकर स्वामीनाथन आयोग की एक महत्त्वपूर्ण सिफारिश को पूरा कर दिया है। घोषित मूल्य को गौर से देखने पर पता चलता है कि स्वामीनाथन आयोग के फॉर्मूले के अनुसार मूल्य नहीं बढ़ाएँ गए हैं।

    लागत की गणना के दो तरीके हैं। पहले में बीज की लागत, श्रम (मानवीय, पशु और मशीन), उर्वरक, खाद, कीटनाशक और अन्य लागतों को शामिल किया जाता है। जिसे ए-2 कहा जाता है। इसमें पारिवारिक श्रम (एफएल) भी जोड़ा जाता है। दूसरे फॉर्मूले में ए-2+ एफएल में जमीन का किराया और जमीन का ब्याज जोड़ा जाता है। इसका जोड़ अन्तिम लागत यानी सी-2 कहलाएगा। किसानों की माँग है कि एमएसपी अन्तिम लागत का डेढ़ गुणा होना चाहिए जिसकी सिफारिश स्वामीनाथन आयोग ने भी की थी। यह एमएसपी ए-2 और एफएल का जोड़ नहीं बल्कि सी-2 होना चाहिए। पत्र सूचना कार्यालय की विज्ञप्ति में दावा किया गया है कि एमएसपी में भूमि का किराया शामिल किया गया है लेकिन डाउन टू अर्थ की गणना दूसरी ही तस्वीर दिखाती है।

    उदाहरण के लिये चावल को ही लीजिए। सरकार की घोषणा के मुताबिक, आम चावल पर 200 रुपए का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाया गया है और अब इसका एमएसपी 1750 रुपए प्रति क्विंटल हो गया है। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के निकाय कमिशन फॉर एग्रीकल्चर कॉस्ट एंड प्राइसेस (commission for agricultural costs and prices - CACP) के अनुमान के मुताबिक, 2018-19 में सी-2 फॉर्मूले के तहत चावल की उत्पादन लागत 1560 रुपए प्रति क्विंटल होगी। अगर इसमें स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के मुताबिक 1.5 गुणा उत्पादन लागत जोड़ दी जाएँ तो वह 2340 रुपए प्रति क्विंटल बैठेगी। सरकार ने जो एमएसपी घोषित की है वह इससे 590 रुपए कम है।

    अरहर का मामला भी इससे बहुत अलग नहीं है। सी-2 फॉर्मूले के मुताबिक, 2018-19 में इसकी उत्पादन लागत 4981 होगी और इसलिये एमएसपी 7471.5 रुपए होना चाहिए। लेकिन सरकार ने इसकी एमएसपी 5676 रुपए प्रति क्विंटल ही की है। स्वामीनाथन आयोग के फॉर्मूले के मुताबिक, अरहर की एमएसपी 1796.5 रुपए कम है।

    डाउन टू अर्थ ने सी-2 फॉर्मूले के मद्देनजर सभी फसलों 14 फसलों की लागत डेढ़ गुणा मूल्य की गणना की है। हमने पाया कि किसी भी फसल का एमएसपी स्वामीनाथन आयोग के सी-2 फॉर्मूले के मुताबिक उत्पादन लागत का डेढ़ गुणा नहीं है। घोषित एमएसपी और स्वामीनाथन आयोग द्वारा सुझाए गए फॉर्मूले के बीच मूल्य का अन्तर 36 रुपए प्रति क्विंटल से लेकर 2830.5 रुपए प्रति क्विंटल तक है।

    दूसरी तरफ सरकार ने केवल चुनिन्दा कृषि उत्पाद को ही एमएसपी में शामिल किया है। कहने को तो सरकार की ऐसी बहुत सी योजनाएँ और रणनीतियाँ हैं जिनसे बाजार के उतार-चढ़ाव से किसानों को बचाने के दावे किये जाते हैं। केन्द्र और राज्य सरकार की करीब 200 योजनाएँ लागू हैं जिनसे मौसम की अनियमितताओं आदि से बचाने की कवायद की जाती है। लेकिन कोई भी योजना 10 प्रतिशत किसानों को भी कवर नहीं करती। एमएसपी भी 94 प्रतिशत किसानों को कवर नहीं करता और इस बात की भी कोई गांरटी नहीं है कि जो किसान इसके तहत कवर हैं, उन्हें फायदा ही हो।

     

     

     

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