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    मात्र चार साल में कर्नाटक के जुड़वा शहर हुबली-धारवाड़ में स्थानीय प्रशासन ने 40 करोड़ की लागत से करीब आठ बड़ी झीलें, तीन तालाब, 8 बंध, दो बड़े पार्क, दो पहाड़ियां और कई सांस्कृतिक परिसर समेत करीब एक करोड़ लागत की 600 एकड़ खुली भूमि का संरक्षित व सुरक्षित की। इस काम से शहर की जल भंडारण क्षमता में एक लाख क्युबिक लीटर की वृद्धि हुई है। जलस्तर में प्रशंसनीय बढ़ोतरी हुई, सो अलग। यदि 40 करोड़ की छोटी सी लागत में हुबली-धारवाड़ी अपने सिर पर बरसने वाले पानी का इंतजाम कर सकता है तो, मुंबई के सिर पर तो साल भर पानी बरसता है और दिल्ली की सरकार के पास भी बहुत पैसा है।न सर्विस चार्ज, न सीवेज शुल्क! दिल्लीवासियों को प्रतिदिन 666.66 लीटर पानी एकदम मुफ्त!! सत्ता में आने के महज 48 घंटे के भीतर आम आदमी पार्टी शासन का यह फैसला निश्चित ही अच्छी सूझबूझ और इच्छाशक्ति का परिणाम है। हालांकि प्रयोग के तौर पर यह योजना फिलहाल तीन महीने के लिए है और इसका लाभ भी सिर्फ मौजूदा 27.16 लाख मीटर कनेक्शनधारकों को ही मिलेगा; हाउसिंग सोसाइटी बाशिंदों समेत टैंकर, ट्युबवेल, तालाब व नदी से पानी पाने वाली शेष 6.25 लाख आबादी लाभ से वंचित रहेगी; बावजूद इसके यह निर्णय सराहनीय इसलिए है, चूंकि यह फैसला दिल्लीवासियों को पानी के अनुशासित उपयोग के लिए प्रोत्साहित करेगा।

    उल्लेखनीय है कि प्रति कनेक्शन खपत प्रतिमाह 20 हजार लीटर से अधिक होने की स्थिति में न सिर्फ पूरा बिल वसूला जाएगा, बल्कि इसके लिए टैरिफ में भी 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी कर दी गई है। सच्चाई यह है कि एक सीमा से ऊपर खपत करने वालों के बिल में बढ़ोतरी किए बिना मुफ्त पानी देना ऐसे किसी भी जलापूर्ति तंत्र में संभव ही नहीं है, जिसमें पब्लिक प्राइवेट पाटर्नरशिप यानी ‘पीपीपी’ मॉडल लागू किया जा चुका हो।

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    Author: 
    पंकज कुमार श्रीवास्तव
    Shivraj Singh Ponds (4 Jan 2013) 5 जनवरी 2013, महोबा, बुन्देलखण्ड, उत्तरप्रदेश के महोबा जिले में बरबई गांव के किसान शिवराज सिंह ने वर्षा की बूंदों को समेटने का जतन अपना तालाब बनाकर पूरा किया, तो अपने सदियों से सूखे खेतों को जरूरत का पानी और निराश परिवार को फायदे की खेती का नजरिया मिल गया।

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    Author: 
    पंकज कुमार श्रीवास्तव

    22 दिसम्बर 2013; महोबा जिले के बरबई गाँव में ‘अपना तालाब अभियान’ विस्तार कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला की चर्चा का केंद्र था कि प्रतिभागी किसान आपस में अपने-अपने तालाबों के अनभुव का विनिमय तथा खेतों की जरूरत के अनुरूप आवश्यक विस्तार कार्य योजना।

    बुंदेलखंड के सर्वाधिक जल संकटग्रस्त जनपद महोबा में वर्षाजल आधरित खेती करने वाले क्षेत्र के किसानों द्वारा निर्मित तालाबो में वर्षा जल भंडार की क्षमताओं उनकी फसल सिंचाई में उपयोगिताओं, तालाबों के आकार-प्रकार सहित खेती के बीजों और फसलों के साथ उत्पादन की गुणवत्ता पर विमर्श, आयोजित कार्यशाला की प्राथमिकतायें थीं।

    जिला मुख्यालय से 28 किमी दूर किसान वृजपाल सिंह के खेत, बरबई में आयोजित कार्यशाला का प्रमुख आकर्षण बना; उनका एक हेक्टेयर का 4 मीटर गहरा अपना तालाब, जिससे वे 11 हेक्यटेयर क्षेत्र में खेती करते हैं। उनका अपने खेत के पेड़-पौधों को पर्याप्त सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता, सदियों से अनुपजाऊ जमीन को उपजाऊ बनाकर 8 गुना तक उत्पादन बढ़ाना, अन्ना प्रथा का उनकी कृषि भूमि में कोई प्रभाव न पड़ना आदि मेहमान किसानों के लिए चर्चा-परिचर्चा का विषय रहा।

    कार्यशाला में आने वाले किसानों का समूह पहले वृजपाल सिंह के तालाब के भीटों पर पहुंचकर तालाब निर्माण लागत, लम्बाई, चौड़ाई, गहराई व पानी के भंडारण की क्षमता और सिंचाई की लागत आदि विविध सवाल करते दिखे। वृजपाल सिंह तालाब के हर गुर को सिखाते रहे, और अपने जवाब से संतुष्ट करते रहे। तालाब तक आने-जाने वाले पानी के प्रबंधन, पानी के रास्तों का भी किसानों ने गहराई से अवलोकन किया।

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    Author: 
    अमर उजाला ब्यूरो

    अमर उजाला ब्यूरो, 19 नवंबर 2013, बाँदा। बुंदेलखंड के सूखे खेतों को तालाबों के पानी से तर करने के लिए अब किसानों ने खुद बीड़ा उठाया है। मेहनती किसान अपने खेतों में निजी तालाब खोद रहे हैं। फिलहाल यह अभियान पानी के लिए डार्क जोन घोषित हो चुके महोबा में जोरशोर में चल रहा है। यहाँ छह माह में एक सैकड़ा से ज्यादा तालाब खोदे जा सके हैं। लक्ष्य इस वर्ष एक हजार तालाब खोदने का हैं महोबा के जिलाधिकारी भी इसमें दिलचस्पी ले रहे हैं।

    पुराने ऐतिहासिक तालाबों में ज्यादातर खात्मे की कगार पर हैं, तमाम जीर्ण-शीर्ण है। गाँव में तालाबों की बाढ़ मनरेगा चालू होने के बाद आयी। चटियल धरती से पटे पड़े बुंदेलखंड के हरेक गाँवो में तालाब खुद गए। कुछ गाँवो में तो कई-कई तालाब खुद गए। इनमें से एक तालाब को माडल तालाब का नाम दिया गया। औसतन 5 से 10 लाख रुपये तक प्रत्येक तालाब में ठिकाने लगा दिए गए। इक्का-दुक्का छोड़कर ज्यादातर तालाब सूखे पड़े हैं, इनमें धूल उड़ रही है।

    महोबा में छह माह में खोदे गए सौ तालाब


    सरकारी योजना फ्लॉप होने के बाद अब किसानों ने सिंचाई का पानी जुगाड़ करने के लिए अपने ही खेतों में अपना तालाब खोदने की कमर कस ली है. बुंदेलखंड के कुछ जागरूक किसानों समेत दिल्ली और लखनऊ की स्वयंसेवी संस्थाओं के लोग प्रेरित कर रहे हैं. फिलहाल महोबा में यह अभियान तेजी पकड़े है। यहां अब तक एक सौ तालाब बन चुके हैं। पिछली बारिश में इनमें पानी भी भर चुका है। कबरई ब्लॉक में सर्वाधिक 70 तालाब खोदे गये हैं। ये सारे खेत सिंचाई के मकसद से बनाए गये हैं।

    मुहिम में शामिल प्रेरकों का कहना है कि खेत में तालाब खुदने के बाद उसमें आई लागत दो से ढाई वर्षों में वापस आ जाती है। सलाना एक फसल की जगह दो फसल ली जाने लगती है। भूजल अपने आप ऊपर आ जाता है।

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    Author: 
    पंकज कुमार श्रीवास्तव
    10 जनवरी 2014, महोबा। जिले के विकासखण्ड कबरई का गांव सलारपुर मप्र जनपद छतरपुर की सीमा से सटा है। गांव के एक बरसाती नाले से लगा, किसान रामकृपाल पुत्र मनुवा व उसके छोटे भाई बाबूलाल की 3 एकड़ ढालूदार, बालू कंकड़ युक्त जमीन है, जिसमें उपजाऊ मिट्टी और सिंचाई के पानी के अभाव में नाम मात्र की फसल हाथ लगती रही है। शायद ही कभी इस जमीन से फायदे की फसल काटने का सौभाग्य मिला हो।

    जमीन को मौके पर देखने से पता चलता है कि सैकडो वर्षों से मिट्टी की कटान और नाले में बरसाती पानी के तेज बहाव के चलते अन्दर की परत की बलुई परत उभर कर ऊपर आ गई है। इस गांव में कुंआ सिंचाई का प्रचलन रहा है। पर जमीन की हालत के साथ इन दोनों भाइयों की माली हालत ऐसी नहीं हो सकी जिससे वे कुआं बना सकते।

    खर्चीले कुंआ से आसान और सस्ता है -अपना तालाब


    अपना तालाब अभियान की सदस्य संस्था ग्रामोन्नति संस्थान के कार्यकर्ताओं ने प्रेरित किया तो रामकृपाल ने हिम्मत कर 20×20×3 मीटर का तालाब बनवाना शुरू किया पहले तो किसान रामकृपाल अपने परिवार सहित कुछ श्रमिकों के साथ फावड़ा - कुदाल लेकर खुदाई करते रहे पर कंकरीट की परत पर फावड़ा-कुदाल चलाना मुश्किल हो गया इस काम को पूरा करने के लिए जेसीबी का सहारा लेना पड़ा जिससे तीन चौथाई तालाब ही बना पाए थे कि पानी बरसने लगा।

    वर्षा का पानी खोदे गए तालाब में भरा तो फसल बोने का भरेासा जाग गया। फसल को पानी मिलेगा या नहीं के कसमकश से चना बोना वाजिब समझा। सिंचाई के लिए पम्पिंग सेट रखी गई जो 13 घंटे तक 4×4 इंची पम्प से पानी लेकर 7 बीघे जमीन का पानी से तर कर दिया। इतना ही नहीं पड़ोसी किसान कालका पुत्र दुर्जन की 8 बीघे फसल को इसी तालाब के पानी से सींचा गया। किसान बताते हैं कि खेत में सिंचाई के बाद एक-दो दिन में पर्याप्त पानी भी पुनर्वापसी तालाब में हो गई थी, अभी भी तालाब में उपलब्ध पानी से 2-3 बीघा जमीन की सिंचाई आसानी से की जा सकती है। रामकृपाल कहते हैं, इस साल अपने तालाब का काम पूरा कर लेंगे और अब अपने खेत की बह रही मिट्टी को रोक कर उपजाऊ बनाएंगे।

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    Source: 
    गांधी मार्ग, जनवरी-फरवरी 2014
    सन् 1995 के आसपास हमारी संस्था सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायर्नमेंट ने वायु प्रदूषण के खिलाफ अपना आंदोलन शुरू किया था। तब हमने जो कुछ भी किया वह लीक का काम था। इस आंदोलन ने ईंधन की गुणवत्ता को ठीक करने पर दबाव डाला। गाड़ियों से निकलने वाले बेहद जहरीले धुएँ को नियंत्रित करने के लिए नए कड़े नियम बनवाए। उनकी जांच-परख का नया ढांचा खड़ा करवाया और उस अभियान ने ईंधन का प्रकार तक बदलने का काम किया।यह लेख मैं अपने बिस्तरे से लिख रही हूं- एक सड़क दुर्घटना में बुरी तरह से घायल होने के बाद, हड्डियां टूटने के बाद मुझे ठीक होने तक इसी बिस्तर पर रहना है। मैं साइकिल चला रही थी। तेजी से आई एक मोटर गाड़ी ने मुझे अपनी चपेट में ले लिया था। टक्कर मारकर कार भाग गई। खून से लथपथ मैं सड़क पर थी।

    ऐसी दुर्घटनाएँ बार-बार होती हैं हमारे यहां। हर शहर में होती हैं, हर सड़क पर होती हैं। यातायात की योजनाएं बनाते समय हमारा ध्यान पैदल चलने वालों और साइकिल चलाने वालों की सुरक्षा पर जाता ही नहीं। सड़क पर उनकी गिनती ही नहीं होती। ये लोग बिना कुछ किए, एकदम साधारण-सी बात में, बस सड़क पार करते हुए अपनी जान गँवा बैठते हैं। मैं इनसे ज्यादा भाग्यशाली थी। दुर्घटना के बाद दो गाड़ियाँ रुकीं, अनजान लोगों ने मुझे अस्पताल पहुंचाया। मेरा इलाज हो रहा है। मैं ठीक होकर फिर वापस इसी लड़ाई में लौटूंगी।

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    Author: 
    विपिन जोशी
    Source: 
    चरखा फीचर्स, जनवरी 2014
    नौला सिर्फ पानी का स्रोत नहीं है, इसके साथ एक समुदाय की आस्था भी जुड़ी होती है। हर नौले के पास एक मंदिर बनाने की परंपरा थी। नौले के समीप चौड़ी पत्ती के वृक्ष लगाने का भी चलन था। लेकिन अब पानी बोतल में बंद हो गया तो उसके पीछे की सारी सोच ही व्यावसायिक हो गई। अब पानी पिलाना पुण्य नहीं है। पानी सिर्फ मुनाफे का सौदा बन गया है। ऐसे में भला एक समुदाय के सरोकार पानी से कैसे जुड़ पाएंगे? पारंपरिक ज्ञान में दीर्घकालिक वैज्ञानिकता और सामाजिकता है जो उसके आज भी प्रासंगिक होने का प्रमाण है।पीने का पानी संकट के साए में है। उत्तराखंड की कई प्रमुख बर्फानी नदियों से देश का एक बड़ा तबका अपनी प्यास बुझाता है। इसके बावजूद पीने के पानी का संकट आज तक बरकरार है। अधिकांश ग्रामीण व शहरी इलाकों में धरती को चीर कर हैंडपम्प लगवा दिए गए हैं। गली, मोहल्लों और घरों में नल लगे हैं जिनसे कभी-कभी पानी की बूंद टपकती ज़रूर है। इतने सारे ताम-झाम के अलावा सरकारी और गैर सरकारी जन जागृति के प्रयास भी पानी के लिए होते ही रहते हैं। आंकड़े बताते हैं कि भारत का 70 फीसदी पानी प्रदूषित हो चुका है। आबादी बढ़ी है तो पानी का इस्तेमाल भी। अकेले दिल्ली शहर में 270 करोड़ लीटर पानी प्रतिदिन सप्लाई होता है। चेन्नई में पेयजल की कमी इस कदर है कि वहां प्रति व्यक्ति 70 लीटर पानी प्रतिदिन मुहैया हो पा रहा है। इतना सब एक तरफ है और दूसरी ओर हैं सातवीं सदी के कत्यूरी राजाओं द्वारा निर्मित नौले यानी पेयजल की सर्वोत्तम तकनीक।

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    Author: 
    बाबा मायाराम

    बैगाओं के पारंपरिक मिश्रित खेती में खाद्य सुरक्षा तो होती है स्वास्थ्य सुरक्षा के साथ मवेशियों के लिए भरपूर चारा और भूसा उपलब्ध होता है। जलवायु बदलाव के दौर में भी मिश्रित खेती की उपयोगिता और बढ़ गई है, जिसमें प्रतिकूल मौसम को झेलने की क्षमता होती है। श्री विश्वास बैगाओं के पारंपरिक मिश्रित खेती की विविधता को बचाने और उनके इस खेती के अनाजों की उपयोगिता तथा उनके पारंपरिक जंगल आधारित खान-पान के ज्ञान को सहेज कर नई पीढ़ी तक पहुंचाने के प्रयास में जुटे हैं।

    11 जनवरी की सुबह-सवेरे डिण्डौरी जिले के गौरा गांव में गोबर से लिपे-पुते आंगन में बैगा आदिवासी बैठे हैं। ये अपने-अपने घर से पारंपरिक अनाजों से भोजन बनाकर लाए हैं। कोई ज्वार की रोटी लाया है तो कोई कुटकी का भात। कोई मक्के की रोटी लाया है तो महुआ का लड्डू। कोई डोंगजीकांदा, बैचांदी कांदा और विरारकांदा लाया है तो सलहार का पेज।

    मैंने इन्हें देखा तो देखता रह गया। इनकी रंग-बिरंगी पोषाकों की तरह ही इनके भोजन व व्यंजन थे। न केवल ये रंग-रूप में भिन्न थे बल्कि इसमें विविधता थी। पौष्टिकता से भरपूर थे और स्वाद में भी बेजोड़ थे। पूरा संतुलित भोजन था। माहुल के पत्तों में अनाजों और व्यंजनों को सजाया गया था। साथ में कागज़ पर स्केच पेन से नाम भी लिखा गया था।

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    25 जनवरी, राष्ट्रीय मतदाता दिवस पर विशेष


    उल्लेखनीय है कि जलबिरादरी ने 2013 के प्रादेशिक चुनावों से पहले लोक जल घोषणापत्र बनाकर राजनीतिक दलों के समक्ष रखा था। इसमें नदी की सुरक्षा हेतु उसकी जमीन को चिन्हित व अधिसूचित करने, रिवर-सीवर को अलग रखने, प्रवाह का मार्ग बाधा मुक्त करने तथा नदी जल व रेत का अति दोहन रोकने की बात जोर-शोर से उठाई गई थी। नदी जलग्रहण क्षेत्र विकास तथा जल सुरक्षा अधिनियम प्रमुख मांग की तरह दर्ज थे। कहा गया था कि भूजल की सुरक्षा लाइसेंस अथवा जलनियामक आयोगों की बजाए जनसहमति से भूजल निकासी की गहराई सुनिश्चित कर की जाए।हर पांच साल में कोई आकर चुपके से हमारा मत चुरा ले जाता है; कभी जाति-धर्म-वर्ग-वर्ण, तो कभी किसी लोभ, भय या बेईमानी की खिड़की खोलकर और हम जान भी नहीं पाते। ये खिड़कियां कब सीलबंद करेगा मतदाता? इस राष्ट्रीय मतदाता दिवस द्वारा मतदाता से जवाब मांगता मूल प्रश्न यही है। हां! इस राष्ट्रीय मतदाता दिवस पर हम यह सोचकर जरूर खुश हो सकते हैं कि स्वाधीन भारत के राजनीतिक इतिहास में यह पहला मौका है जब मतदान के अलावा किसी अन्य काम के लिए भी मतदाता की पूछ हो रही है। आगामी लोकसभा चुनाव स्वाधीन भारत का ऐसा पहला चुनाव होने जा रहा है कि जब मतदाता पार्टियों का भविष्य ही नहीं, भविष्य के काम का घोषणापत्र भी तय करेगा। ‘आप’ के अलावा देश की प्रमुख आला राजनीतिक पार्टियों ने अपने घोषणापत्रों की निर्माण प्रक्रिया को मतदाताओं के लिए खोल दिया है। कांग्रेस ने जनसुनवाई कर घोषणा पत्र तैयार करने की घोषणा कर दी है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के पढ़े कुछ नौजवान अमेठी लोकसभा क्षेत्र में लोकमत संग्रह कर रहे हैं।

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    Source: 
    लोकसभा टीवी

    जब अंग्रेज भारत में राज करने आए थे तो यहां पर करीब 25 लाख तालाब, झील व अन्य वाटर बॉडीज, पानी का काम हो चुका था। आज के वाटर बॉडीज तालाब, झील छोटा हो या बड़ा उसे सिविल इंजीनियर बनाता है लेकिन तब हमारे यहां कोई सिविल इंजीनियरिग की इंस्टीट्यूट नहीं थी, ऐसी पदवी, डिग्री वाले लोग नहीं थे जो पांच साल की पढ़ाई करते हों।
    इस खबर के स्रोत का लिंक: 

    http://www.youtube.com

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    हकीकत यह है कि उत्तरखंड विनाश को लेकर एक माह तो पूरे देश में खूब हो-हल्ला मचा, उसके बाद हमने उसे भूला दिया। अभी हाल ही में हिमालयी प्राधिकरण की मांग का दस्तावेज उत्तराखंड मुख्यमंत्री को सौंपने की फोटो तो खूब छपी, लेकिन उसे सौंपने वाले इसे व्यापक चर्चा में तब्दील नहीं कर सके। उत्तराखंड में हुए विनाश के समय हिमालयी राज्यों के विकास और उसके लिए नीति निर्माण हेतु केन्द्र में एक अलग मंत्रालय की मांग करने वालों का भी अब कहीं पता नहीं है।जिस जल नियामक आयोग को लेकर स्वयं लखनऊ के संगठनों ने कभी पुरजोर विरोध किया था, उसी लखनऊ में राज्य सरकार द्वारा उत्तर प्रदेश जलनियामक आयोग के गठन को धीमे से मंजूरी दे दी गई। अखबारों में एक कॉलम खबर छपी और बात आई-गई हो गई। कोई विरोध नहीं हुआ। राजस्थान की भाजपा सरकार पूर्ववर्ती कांग्रेसी सरकार के कुछ पुराने निर्णयों को उलटने की शुरुआत कर चुकी है। इस सरकार ने अपने पिछले कार्यकाल में जयपुर-अलवर में पानी का अतिदोहन करने वाले उद्योगों पर लगी रोक को हटाकर शराब, चीनी और शीतल पेय की कई कंपनियों को मंजूरी दे दी थी। दिल्ली की ‘अराजक’ कही जा रही सरकार द्वारा मिलेनियम बस डिपो के जरिए यमुना नदी क्षेत्र से अस्थाई निर्माण हटाने के अच्छे रुख की पीठ थपथपाने कोई नहीं आया। ताज्जुब यह भी है कि पर्यावरण मंत्रालय में पर्यावरण मंजूरी की फाइल पर पैसे के वन संबंधी मोदी आरोप के बाद से जो स्वर मुखर होने चाहिए थे, वे तस्वीर से ही गायब हो गए हैं। मोइली के पर्यावरण मंत्री बनने के बाद फाइलों की मंजूरी में आई तेजी की वजह जो भी हो, उन परियोजनाओं से नफे-नुकसान के अध्ययन के लिए क्या किसी अध्ययन केन्द्र द्वारा पहल की खबर किसी को सुनाई दी?

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    Author: 
    पंकज चतुर्वेदी
    Source: 
    जनसत्ता (रविवारी), 26 जनवरी 2014
    देश के पचास फीसद से अधिक जिलों का भूजलस्तर तेजी से गिर रहा है। कई महानगरों समेत देश के सैकड़ों स्थानों पर भूजल खतरनाक ढंग से जहरीला हो चुका है। जनजीवन पर इसका विपरीत असर पड़ रहा है। जल्द ही इस समस्या से न निपटा गया तो स्थिति भयावह हो सकती है। इसके संकटों का जायजा ले रहे हैं पंकज चतुर्वेदी।

    धरती के नीचे पानी का अकूत भंडार है। यह पानी का सर्वसुलभ और स्वच्छ जरिया है, लेकिन अगर एक बार दूषित हो जाए तो इसका परिष्करण लगभग असंभव होता है। भारत में जनसंख्या बढ़ने के साथ घरेलू इस्तेमाल, खेती और औद्योगिक उपयोग के लिए भूजल पर निर्भरता साल-दर-साल बढ़ती जा रही है। धरती के भीतर से पानी निचोड़ने की प्रक्रिया में सामाजिक और सरकारी लापरवाही की वजह से भूजल खतरनाक स्तर तक जहरीला होता जा रहा है।दिल्ली सहित कुछ राज्यों में भूजल के अंधाधुंध इस्तेमाल को रोकने के लिए कानून बन गए हैं, लेकिन भूजल को दूषित करने वालों पर अंकुश महज कानून की किताबों तक महदूद हैं। यह आशंका जताई जा रही है कि आने वाले दशकों में पानी को लेकर सरकार और समाज को बेहद मशक्कत करनी होगी। ऐसे में प्रकृतिजन्य भूजल का जहर होना मानव जाति के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगा सकता है।

    पिछले दिनों अग्निकांड के कारण चर्चा में आए हरियाणा के मंडीडबवाली कस्बे के करीबी गांव जज्जल के लोग पीने का पानी लेने सात किलोमीटर दूर गांव जाते हैं। कारण जज्जल और उससे सटे तीन गाँवों में पिछले कुछ सालों से सैकड़ों लोग कैंसर से मारे गए हैं। कपास उत्पादन करने वाले इस इलाके में यह बात घर-घर फैल गई है कि उनके गांव के नलकूप और हैंडपंप पानी नहीं, जहर उगलते हैं। यह बात सरकार भी स्वीकार कर रही है कि अंधाधुंध कीटनाशकों के इस्तेमाल ने यहां के भूजल को ‘विशेष’ बना दिया है।

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    खुली हुई आर्थिकी के यदि कुछ लाभ हैं तो खतरे भी कम नहीं। ये खतरे अलग-अलग रूप धरकर आ रहे हैं; आगे भी आते रहेंगे। जरूरत अंतरराष्ट्रीय संगठनों की गतिविधियों को पूरी सतर्कता व समग्रता के साथ पढ़ने और गुनने की है। इस समग्रता और सतर्कता के बगैर भ्रम भी होंगे और ग़लतियाँ भी। अतः अपनी जीडीपी का आकलन करते वक्त प्राकृतिक संसाधन, सामाजिक समरसता और ‘हैप्पीनेस इंडेक्स’ जैसे समग्र विकास के संकेतकों को कभी नहीं भूलना चाहिए।पर्यावरण की चिंता करना पर्यावरणीय संगठनों का काम है और शिक्षा की चिंता करना शैक्षिक संगठनों का। किंतु क्या आपको यह देखकर ताज्जुब नहीं होता कि भारत में शैक्षिक संस्थानों की रैंकिंग का काम राजनीतिक पत्रिकाओं ने संभाल लिया है। औद्योगिक रैंकिंग करते ऐसे संगठन देखे गए हैं, जिन्होंने खुद कभी उद्योग नहीं चलाए। इसी तरह की उलटबांसी पर्यावरण के क्षेत्र में भी दिखाई दे रही है। पिछले दो दशक से कई अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संगठन दुनिया भर की पर्यावरण रेटिंग करने में बड़ी शिद्दत से जुटे दिखाई दे रहे हैं।

    क्या ये सब उलटबांसियां निरर्थक हैं? नहीं! गौर करें तो पता चलेगा कि इनका मकसद येन-केन-प्रकारेण सिर्फ और सिर्फ कमाना है। ये अंतरराष्ट्रीय संगठन कुछ देशों की सरकारों, बहुउद्देशीय कंपनियों और न्यासियों के गठजोड़ हैं, जो दूसरे देशों की पानी-हवा-मिट्टी की परवाह किए बगैर परियोजनाओं को कर्ज और सलाह मुहैया कराते हैं; निवेश करते हैं। ऐसी परियोजनाओं के जरिए पर्यावरण के सत्यानाश के उदाहरण भारत में कई हैं।

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    Author: 
    पंकज चतुर्वेदी
    Source: 
    जनसत्ता (रविवारी), 26 जनवरी 2013
    जहां एक तरफ लाखों लोग फ्लोरोसिस के अभिशाप से घिरे हैं, वहीं प्रदेश के लोक स्वास्थ यांत्रिकी विभाग की रुचि अधिक से अधिक ‘फ्लोरोडीशन संयंत्र’ खरीदने में है। यह किसी से छिपा नहीं है कि सरकार खरीद-फरोख्त में किनके और कैसे वारे-न्यारे होते हैं। इस बात को सभी स्वीकारते हैं कि जहां फ्लोरोसिस का आतंक इतना व्यापक हो, वहां ये इक्का-दुक्का संयंत्र फिजूल ही होते हैं। फ्लोराइड से निबटने में ‘नालगोंडा विधि’ खासी कारगर रही है। दस साल पहले मध्य प्रदेश के मंडला जिले के तिलइपानी के बाशिंदों का जीवन देश के अन्य हजारों आदिवासी गाँवों की ही तरह था। वहां थोड़ी बहुत दिक्कत पानी की जरूरत थी। अचानक अफसरों को इन आदिवासियों की जल समस्या खटकने लगी। तुरत-फुरत हैंडपंप रोप दिए गए। लेकिन उन्हें क्या पता था कि यह जल जीवनदायी नहीं, जहर है। महज 542 आबादी वाले इस गांव में 85 बच्चे विकलांग हैं।

    तीन से बारह साल के अधिकांश बच्चों के हाथ-पैर टेढ़े हैं। वे घिसट-घिसट कर चलते हैं और उनकी हड्डियों और जोड़ों में असहनीय दर्द रहता है।

    यह हृदय विदारक कहानी अकेले तिलइपानी की नहीं है। मध्य प्रदेश और उससे अलग हो कर बने छत्तीसगढ़ राज्य के आधा दर्जन जिलों के सैकड़ों गाँवों में ‘तिलइपानी’ देखा जा सकता है। पारंपरिक जल स्रोतों, नदी-नालों और तालाब-बावड़ियों से पटे मध्य प्रदेश में पिछला दशक समस्या का चरम काल रहा है। हालांकि इस समस्या को उपजाने में समाज के उन्हीं लोगों का योगदान अधिक रहा है, जो इन दिनों इसके निदान का एकमात्र जरिया भूगर्भ जल दोहन बता रहे हैं।

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    Author: 
    अश्वनी वर्मा
    Source: 
    जनसत्ता (रविवारी), 12 जनवरी 2014
    हिमाचल प्रदेश अपने ठंडे मौसम और कुदरती खूबसूरती के लिए जाना जाता है, लेकिन कुछ समय से इसके कई क्षेत्रों में पनबिजली परियोजनाओं का जाल सा बिछता गया है। इससे वन संपदा और पर्यावरण काफी नुकसान हुआ है। इन परियोजनाओं से संभावित खतरों का आंकलन कर रहे हैं अश्वनी वर्मा।

    पर्यावरणविद और परियोजना विशेषज्ञों का मानना है कि सतलुज नदी पर बिजली परियोजनाओं के कारण गंभीर संकट पैदा हो गया है। सतलुज की तीन सौ बीस किलोमीटर की लंबाई में डेढ़ सौ किलोमीटर को बिजली परियोजनाओं की सुरंगे घेर लेंगी। ऐसे में इस बात की पूरी आशंका है कि कहीं केदारनाथ जैसी तबाही हिमाचल में भी न घटित हो जाए। किन्नौर जिले में यह आभास होने लगा है। किन्नौर को बचाने के लिए जरूरी है कि उत्तराखंड में उत्तरकाशी से गंगोत्री तक को जिस तरह पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र घोषित किया जा रहा है, वैसे इस क्षेत्र को भी किया जाए।

    यों तो हिमाचल अपने ठंडे मौसम, ठंडे मिजाज, प्राकृतिक सुंदरता और संपदा के लिए जाना जाता है। लेकिन हाल के कुछ सालों से स्थितियाँ बदल रही हैं। इसका प्राकृतिक वैभव नष्ट हो रहा है, नदियों की लूट मची है। अपने भविष्य को लेकर आशंकित सीधे-सादे लोगों का मिजाज गरम हो रहा है। इस सबके पीछे अगर सबसे बड़ी कोई वजह है तो चारों तरफ फैल गई पनबिजली कंपनियां।

    पिछले जुलाई में हुई बारिश के वक्त प्रदेश में सौ से अधिक लोगों की मौत हुई, जिसमें अकेले किन्नौर जिले में उनतीस लोग काल के गाल में समा गए। इसके अलावा फसलों और दूसरी तमाम चीजों को भारी क्षति पहुंची। इसकी तुलना उत्तराखंड में हुई तबाही से की गई और माना गया कि इसके पीछे कहीं न कहीं प्राकृतिक संपदा का अंधाधुंध दोहन और वनों की कटाई है।

    किन्नौर में पनबिजली कंपनियों का जाल फैल गया है। यह स्थिति विस्फोटक है और नागरिकों में इनके खिलाफ गुस्सा भर रहा है। इससे पर्यावरणविदों की नींद उड़ी हुई है।

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    Source: 
    यू-ट्यूब

    बढ़ते जल संकट और मानव समाज द्वारा उदासीन रवैये से परंपरागत जल स्रोतों पर संकट मंडरा रहा है इसी पर आधारित अनुपम मिश्र का यह वीडियो।

    इस खबर के स्रोत का लिंक: 

    http://www.youtube.com


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    Source: 
    ग्रामीण विकास विज्ञान समिति
    सतही जल की कमी के कारण राजस्थान को बहुत हद तक भूजल संसाधनों पर निर्भर रहना पड़ता है। बड़ी संख्या में कुएं, बावड़ियां और झालरें प्रमुख परंपरागत जल साधन हैं। राज्य में भूजल की स्थिति भू-आकारकीय संरचना तथा भूमिगत जल धारक संरचनाओं की प्रकृति पर निर्भर करती है। भूजल विकास राजस्थान के पश्चिमी भागों की तुलना में पूर्वी भागों में अधिक है। पश्चिमी राजस्थान में भूजल पुनर्भरण अपेक्षाकृत कम है। अनिश्चित वर्षा, सतही जल संसाधनों की अनुपस्थिति तथा उच्च वाष्पोत्सर्जन इसके कारण हैं।मानव विकास हेतु जल एक सीमांत कारक है, तथा मानव के अस्तित्व हेतु अत्यंत आवश्यक है। राजस्थान में भूमि व सूर्य का प्रकाश प्रचुर मात्रा में है, परंतु उपलब्ध जल-संसाधनों के संबंध में कम भाग्यशाली है। राज्य में ऐसी कोई नदी नहीं है, जिसका उद्गम स्थल हिमपात वाले क्षेत्रों से हो। मानचित्र 3 राजस्थान की नदियों को दर्शाता है।

    अधिकांश नदियां मौसमी हैं तथा इनमें बहने वाले जल की मात्रा वर्षा ऋतु के दौरान होने वाले वृष्टिपात के परिणाम पर निर्भर करती है।

    सामान्यतः राज्य के पश्चिमी भाग में वार्षिक वर्षा बहुत कम होती है। प्रत्येक मानसून के दौरान राज्य के विभिन्न् भागों में एक ही समय पर अकाल व बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होना इस बात का साक्षात उदाहरण है कि सामान्यतः संपूर्ण राज्य में, और विशेषतया इसके पश्चिमी भाग में वर्षा की अवधि व मात्रा परिवर्तनशील रहते हैं।

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    फ्लोराइड नॉलेज एंड एक्शन नेटवर्क
    फ्लोराइड का अधिक मात्रा में शरीर में जाना इंसानों और पशुओं के लिए खतरनाक होता है, इस बात की खोज सबसे पहले भारत में ही 1937 में (तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी, वर्तमान में आंध्र प्रदेश के प्रकाशम जिले में) में शार्ट, पंडित और राघवाचारी ने की थी. तब से अब तक देश और दुनिया में फ्लोराइड के कुप्रभाव के कई मामले सामने आये हैं. हालांकि फ्लोरोसिस मुख्यतः पानी में फ्लोराइड की अधिक मात्रा होने की वजह से होता है, मगर भोजन, धुआं और दूषित वातावरण में फ्लोराइड की अधिक मात्रा से भी इसके प्रसार के कई उदाहरण मिले हैं.

    फ्लोराइड अधिकांश भूगर्भीय वातावरण में पाया जाता है, इसलिए हम क्रिस्टलाइन और ग्रेनाइटिक बनावट वाले भूजल में फ्लोराइड की अधिक मात्रा पाते हैं. (उदा. आंध्र प्रदेश में नलगौंडा और कर्नाटक में कोलार), सिंधु-गंगा बेसिन और दूसरे जलोढ़ (उदा. उत्तर प्रदेश में उन्नाव और गुजरात में मेहसाना). इसके अलावा देश के विभिन्न हिस्सों के भूजल में अलग-अलग गहराई में फ्लोराइड पाया जाता है.

    फ्लोराइड के दो मुख्य प्रभाव हैं, डेंटल और स्केलेटल फ्लोरोसिस. डेंटल फ्लोरोसिस दांत के एनामेल के विकास में प्रतिरोध को कहा जाता है यह दांत के विकास के दौरान अधिक सांद्रता वाले फ्लोराइड के संपर्क में आने की वजह से होता है, इसकी वजह से ऐनामेल में खनिज तत्व की कमी हो जाती है और इसकी सारंध्रता बढ़ जाती है. एक साल से चार साल तक के बच्चों में डेंटल फ्लोरोसिस होने की संभावना अत्यधिक होती है. आठ साल की उम्र के बाद जब स्थायी दांत विकसित हो जाते हैं तो डेंटल फ्लोरोसिस का खतरा कम हो जाता है.

    शरीर में हड्डियों के निर्माण के दौरान कैल्सियम चयापचय में व्यवधान की वजह से स्केलेटल फ्लोरोसिस विकसित हो जाता है. परिणामस्वरूप हड्डियां मुलायम और कमजोर हो जाती हैं और इंसान विकलांग होने लगता है. इसकी वजह से कैल्सियम से संबंधित रोग भी हो जाते हैं, जैसे बच्चों में रिकेट्स और बड़ों में ओस्टियोपोरोसिस. ऐसे लोग जो दशकों तक उच्च फ्लोराइड के प्रभाव में रहते हैं वे विकलांगता का शिकार भी हो जाते हैं.

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    Source: 
    ग्रामीण विकास विज्ञान समिति
    भूजल का अत्यधिक दोहन तथा उसमें अधिक मात्रा में फ्लोराइड व्याप्त होने के कारण इस क्षेत्र की स्थिति अत्यंत गंभीर है। पिछले दशक में भूजल स्तर में 6 मीटर से भी अधिक तक की गिरावट दिखाई देती रही है। अनेक व्यक्तियों के पास निजी नलकूप हैं, लेकिन पी.एच.ई.डी. द्वारा लगाए गए कैंप के दौरान की गई जाँच में इन नलकूपों का जल फ्लोराइड से दूषित पाया गया। कुछ सरकारी हैंडपंप भी हैं, जिनमें से अधिकांश के पानी में फ्लोराइड के अंश बहुत अधिक मात्रा में हैं। गाँवों के लोग जल एकत्रित करने की किसी भी पारंपरिक विधि का उपयोग नहीं कर रहे हैं।कहा जाता है कि भविष्य में जल के लिए युद्ध होंगे। कम से कम राजस्थान में तो शहरी क्षेत्रों को पानी हस्तांतरित करने पर ग्रामीण जनता द्वारा हिंसात्मक विरोध आम बात होती जा रही है।

    जवाई बाँध से जोधपुर शहर को पानी दिए जाने के कारण किसानों को सिंचाई हेतु आवश्यक मात्रा में जल उपलब्ध नहीं होने से परेशानी हो रही है। निमज व आस-पास के गाँवों में ग्रामीणों ने अपने हाथों से पाइप लाइन हटा कर ब्यावर शहर को जल आपूर्ति करने हेतु गाँवों में नलकूप खोदे जाने का विरोध प्रदर्शित किया है।

    वर्ष 2000-2001 में जब राजस्थान को लगातार तीसरे साल अकाल का सामना करना पड़ा, तो 200 वर्षों के इतिहास में पहली बार सबसे बड़ी मानव निर्मित झील राजसमंद पूर्णतया सूख गई। जल व्यवस्था विशेष रेलगाड़ियों द्वारा करनी पड़ी।

    1. सन् 2000-2001 के अकाल के दौरान पेयजल की स्थिति एवं आपातकालीन आवश्यकताएं


    राज्य के 32 जिलों में से दो में अपर्याप्त वर्षा (60 प्रतिशत या कम) तथा 21 जिलों में वर्षा का अभाव (20 प्रतिशत से 59 प्रतिशत) अवलोकित किया गया।

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    Source: 
    ग्रामीण विकास विज्ञान समिति

    1. फ्लोराइड एवं इसके भौतिक गुण


    मनुष्य की शारीरिक संरचना में फ्लोराइड की उपस्थिति अत्यंत कम मात्रा में अति आवश्यक है। कुछ एन्जाइम प्रक्रियाएं फ्लोराइड की कम मात्रा से या तो धीमी हो जाती हैं अथवा तेज हो जाती हैं और अन्य कार्बनिक एवं अकार्बनिक तत्वों के साथ रासायनिक प्रक्रियाएं संपन्न होती हैं। शरीर में अस्थियों एवं दांतों में कैल्शियम की सर्वाधिक मात्र पाई जाती है कैल्शियम एक विद्युत धनात्मक तत्व है और अपने धनात्मक प्रभाव के द्वारा विद्युत ऋणात्मक फ्लोराइड को अधिकाधिक मात्रा में अपनी तरफ खींचता है।फ्लोराइड भू-पटल में बहुतायत से पाया जाने वाला तेरहवां (13वां) तत्व है। इसकी खाज प्रोफेसर हेनरी मॉइसन द्वारा सन् 1886 में की गई। प्रोफेसर हेनरी को उनकी उपलब्धियों के लिए सन् 1905 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। पिछली शताब्दियों में फ्लोराइड से संबंधित प्रश्न प्रयोगशालाओं तक ही सीमित थे, परंतु सन् 1920 में फ्लोरीन के कई उपयोगी गुणों की खोज हुई। इसके पश्चात् आधुनिक उद्योग में फ्लोराइड अनिवार्य माना जाने लगा।

    फ्लोरीन अत्यधिक सक्रिय तत्व है और अन्य तत्वों के साथ संयुक्त होने की दृढ़ क्षमता द्वारा फ्लोराइड नामक यौगिक निर्मित करता है। फ्लोराइड सभी तत्वों में सर्वाधिक विद्युत ऋणात्मक तत्व है, इसलिए यह हमारी जानकारी में सबसे मजबूत ऑक्सीकारक तत्व है। स्वतंत्र अवस्था में यह एक हल्के पीले रंग की उत्तेजक गंध वाली गैस है। इसका क्वथनांक -188 डिग्री सेल्सियस एवं हिमांक -220 डिग्री सेल्सियस है।

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